Chhattisgarh

किसान सब्जी हाॅट में राजधानीवासियों को जल्द मिलेंगी हरी और ताजी सब्जियां

रायपुर, 18 जुलाई 2019/ राजधानीवासी जल्द ही किसान सब्जी हाॅट से हरी और ताजी सब्जियां का आनंद उठा सकेंगे। राजधानी के नई मंडी पण्डरी में शीघ्र ही किसान सब्जी हाॅट प्रारंभ होगा। कलेक्टर डाॅ. एस. भारतीदासन ने आज यहां जिला कलेक्टोरेट के सभाकक्ष में किसान सब्जी हाॅट प्रारंभ करने और वहां की आवश्यक व्यवस्था के संबंध में अधिकारी की बैठक लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। बैठक में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डाॅ. गौरव कुमार सिंह, मण्डी बोर्ड के प्रबंध संचालक श्री अभिनव अग्रवाल सहित अन्य विभागीय अधिकारी उपस्थित थे। कलेक्टर डाॅ. एस. भारतीदासन ने कहा कि राजधानी रायपुर के नई मण्डी पण्डरी और पुरानी मण्डी गंजपारा में किसान सब्जी हाॅट के लिए चबूतरों का निर्माण किया गया है। पहले चरण में नई मण्डी पण्डरी में किसान सब्जी हाॅट प्रारंभ किया जाएगा। उन्होंने इसके लिए आगामी 10 दिवस के भीतर आस-पास क्षेत्र के सब्जी उत्पादक किसानों का सर्वे कर उनका पंजीयन करने के निर्देश उद्यान विभाग को दिए है। कलेक्टर ने कहा कि सुबह 6 बजे से 10 बजे तक इसका संचालन किया जाएगा। यदि किसान चाहेंगे तो निर्धारित समय के बाद भी यहां वे अपनी सब्जी बेच सकेंगे। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन सुबह पहले आओ पहले पाओं की तर्ज पर किसानों को चबूतरों तराजू-बांट का आबंटन किया जाएगा। डाॅ. भारतीदासन ने यहां दाम निर्धारण, पेयजल, शौचालय, साफ-सफाई, पार्किंग और विद्युत व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए विभागीय अधिकारियों को निर्देशित किया है। गौरतलब है कि किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य दिलाने में किसान सब्जी हाॅट महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे किसानों और उपभोक्ताओं के बीच सीधा संपर्क स्थापित होगा। किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिलेगा और उन्हें बिचैलियों से मुक्ति मिलेगी। किसान सब्जी हाॅट किसानों के लिए तकनीकी सूचना प्रचार-प्रसार केन्द्र के साथ ही सब्जियों, फलों के ग्रेड निर्धारण, सफाई और भण्डारण के लिए यहां आवश्यक सुविधा मिलेगी। इसमें फल और सब्जियों की कीमतों का निर्धारण जिला प्रशासन द्वारा गठित समिति के माध्यम से किया जाएगा। किसानों को उनके उत्पाद के विक्रय के लिए निःशुल्क तराजू-बांट की सुविधा यहां रहेगी। मण्डी बोर्ड के प्रबंध संचालक श्री अभिनव अग्रवाल ने बताया कि उपमंडी प्रांगण पंडरी में 96 ढके हुए चबूतरें तथा पुरानी गंज मण्डी प्रागंण में 60 ढके हुए चबूतरों का निर्माण किया जा चुका है।

Politics

 इक्छा मृत्यु की राह पर है कांग्रेस?

कांग्रेस मौजूदा राजनीति के संभवत: अपने सबसे बड़े संकट से जूझ रही है. पार्टी की उम्मीद कहे जा रहे युवा अध्यक्ष राहुल गांधी ने पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं और कार्यसमिति के सामने इस्तीफ़ा सौंपने के पचास दिन के बाद भी नए नेतृत्व का चुनाव नहीं हो पाया है. उधर लगातार प्रदेश इकाइयों से कांग्रेस के लिए बुरी ख़बरें आ रही हैं. कर्नाटक में वह जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के साथ अपनी गठबंधन सरकार बचाने के लिए संघर्ष कर रही है और गोवा में उसके दो तिहाई विधायकों ने रातोंरात भाजपा का पटका पहन लिया है. मध्य प्रदेश में भी मुख्यमंत्री कमलनाथ की बड़ी ऊर्जा विधायकों को एकजुट रखने में ख़र्च हो रही है. कांग्रेस की ऐसी हालत का ज़िम्मेदार कौन है, क्या पार्टी ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कांग्रेस मुक्त भारत के सपने की ओर बढ़ चली है और इससे उबरने का क्या कोई रास्ता नज़र आता है? इन्हीं सवालों के साथ  कुलदीप मिश्र ने कांग्रेस की सियासत पर नज़र रखने वाले दो वरिष्ठ पत्रकारों विनोद शर्मा और स्वाति चतुर्वेदी से बात की. कांग्रेस राजनीति करना ही नहीं चाहती: स्वाति चतुर्वेदी का नज़रिया कांग्रेस मुक्त भारत का सपना नरेंद्र मोदी और अमित शाह नहीं, बल्कि ख़ुद कांग्रेस पार्टी साकार कर रही है. ऐसा लगता है कि उन्होंने ख़ुद इच्छामृत्यु का फ़ैसला कर लिया है. मैं एक पत्रकार हूं और चुनाव नतीजे आने के पहले ही मैंने लिखा था कि भाजपा यह चुनाव जीतती है तो कांग्रेस की तीनों प्रदेश सरकारें ख़तरे में आ जाएंगी. एक पत्रकार को अगर ये बात पता है तो कांग्रेस के नेता किस दुनिया में रह रहे हैं. कर्नाटक की वह तस्वीर याद करिए जब मुंबई में कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार सरकार बचाने की कोशिश में कितने अकेले नज़र आ रहे थे. जब यह बात ट्विटर पर आ गई तो हाल ही में मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा का बयान आया कि उन्होंने डीके शिवकुमार से फोन पर बात कर ली है. क्या आज कल कांग्रेस नेता शक्तिप्रदर्शन और समर्थन फोन पर करने लगे हैं? मध्य प्रदेश में ये हाल है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक-एक मंत्री को दस-दस विधायकों पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी दी है ताकि वे टूटे नहीं. ऐसे सरकार कैसे चलेगी? ये हाल तब है, जब हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में इसी साल चुनाव होने हैं. यहां सीधे भाजपा और कांग्रेस की टक्कर है. एक ज़माने में कांग्रेस की हाईकमान बड़ी शक्तिशाली समझी जाती है जो अब लगता है कि बिल्कुल ख़त्म ही हो गई है. राहुल गांधी को इस्तीफ़ा दिए पचास दिन हो गए. वो दो दिन पहले अमेठी गए. अच्छा होता कि वो मुंबई जाते और वहां कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार के बगल में खड़े होते, अपनी मुंबई इकाई को बुलाते, उनके पास तीन पूर्व मुख्यमंत्री हैं, उन्हें बुलाते और एक संदेश देते. राजनीति सड़कों पर होती है, सोशल मीडिया पर नहीं. पर आज कल ऐसा लगता है कि कांग्रेस राजनीति करना ही नहीं चाहती. सही बात है कि विपक्ष के बिना लोकतंत्र हो ही नहीं सकता. लेकिन विपक्ष ख़ुद को ख़त्म कर रहा है तो हम इसमें भाजपा को कैसे दोष दे सकते हैं. यहां तक कि इतना समय बीत जाने के बाद भी नेतृत्व परिवर्तन पर न कोई गंभीरता है, न कोई नेता है. इसके पीछे एक वजह ये भी हो सकती है कि कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसके केंद्र में वंशवाद है. वहां अब तक ये व्यवस्था थी कि शीर्ष पद गांधी परिवार के साथ रहेगा और बाक़ी सब उनके नीचे होंगे. और गांधी परिवार उन्हें चुनाव जिताएगा. अब गांधी परिवार चुनाव जिता नहीं पा रहा. अब जो भी नया अध्यक्ष बनेगा, उसे ताक़त के दूसरे केंद्र गांधी परिवार से भी डील करना होगा. कांग्रेस जिस तरह की पार्टी है, वे लोग सब गांधी परिवार की तरफ़ जाएंगे. दरबारी परंपरा इस देश में कांग्रेस के साथ आई है. मेरी ख़ुद कई नेताओं से बात हुई है और वे कहते हैं कि हमें इस पद से क्या मिलेगा? हम ये पद क्यों लें? एक तो हमें गांधी परिवार की कठपुतली की तरह काम करना होगा और सारी पार्टी हम पर ही हमले करेगी. धागे से बंधा पत्थर और कांग्रेस की केंद्रीय ताक़त: विनोद शर्मा का नज़रिया अभी जो हुआ है, वो बहुत ही विचलित करने वाला है. एक वैज्ञानिक सिद्धांत है कि केंद्रीय बल, जिसे सेंट्रिफ्यूगल फोर्स कहते हैं, जब वो ख़त्म हो जाता है तो यही होता है. जब आप किसी धागे पर पत्थर बांधकर उसे घुमा रहे हों और बीच में उसे छोड़ दें तो पत्थर धागे समेत छिटककर दूर जा गिरता है. यही हो रहा है. कांग्रेस का नेतृत्व जो उसका केंद्रीय बल था, वो आज नदारद है. इसका असर उसकी प्रांतीय इकाइयों पर दिख रहा है. ख़ासकर उन प्रांतों में जहां कांग्रेस कमज़ोर हैं और जहां नेताओं की नीयत भी ख़राब हैं, वहां टूट-फूट हो रही है. मैं गोवा को इस संदर्भ में नहीं गिनूंगा. गोवा का आयाराम गयाराम वाला इतिहास रहा है. वहां के विधायक एक पार्टी में स्थिर नहीं रहे और वे दल बदलने में माहिर हैं. लेकिन कर्नाटक में जो हो रहा है और उससे पहले तेलंगाना में जो हुआ, वो परेशान करने वाली स्थिति है. जहां तक कांग्रेस मुक्त भारत के नारे का ताल्लुक़ है, वो नारा जिसने भी दिया हो, मैं नहीं समझता कि वो आदमी लोकतंत्र में विश्वास रखता है. देश को एक मज़बूत विपक्ष की ज़रूरत होती है. मनोविज्ञान में एंटी नेस्ट सिन्ड्रोम होता है. जब चिड़िया के बच्चे घोंसला छोड़कर उड़ जाते हैं तो उनकी मां डिप्रेशन में आ जाती है. ये 134 बरस की पार्टी राहुल गांधी के घर छोड़ जाने से डिप्रेशन के दौर से गुज़र रही है. उसे समझ नहीं आ रहा है कि फ़ैसला कैसे ले. काफ़ी दोष राहुल का, पर सारा नहीं अगर आप ये चाहते हैं कि इसका सारा दोष मैं राहुल गांधी पर मढ़ दूं, तो उन्हें सारा दोष तो नहीं लेकिन बहुतेरा दोष ज़रूर दूंगा. अगर वो पद छोड़ना चाहते थे तो उससे पहले उन्हें अपने अंतरिम उत्तराधिकारी के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करानी चाहिए थी. उस अंतरिम नेता के तत्वाधान में कार्यसमिति या नए अध्यक्ष के चुनाव हो सकते थे. ऐसे चिट्ठी लिखकर चले जाना कोई अच्छी प्रथा नहीं है. अगर आप जा रहे हैं तो आप अपने तमाम नेताओं को बुलाइए, एक समागम कीजिए, अपनी बात रखिए और कहिए कि अध्यक्ष पद पर न रहते हुए भी आप पार्टी में सक्रिय रहेंगे. ये सब उन्हें करना चाहिए था जिससे कार्यकर्ता का हौसला बना रहता, उसे लगता कि यह नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है लेकिन पार्टी विघटित नहीं हो रही. जब मैं नेतृत्व परिवर्तन की बात करता हूं तो मैं व्यवस्था परिवर्तन की भी बात करता हूं. अगर आपको याद हो तो मशीरुल हसन साहब ने तीन-चार अंकों में कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्तावों का एक सारांश प्रकाशित किया. वो जलवा था उस समय कांग्रेस कार्यसमिति का कि उसके प्रस्ताव देश का राजनीतिक एजेंडा तय करते थे. आपको कांग्रेस कार्यसमिति को एक सामूहिक नेतृत्व के स्वरूप में स्वीकार करना चाहिए. कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव हों. वहां जो साठ-सत्तर लोग बैठते हैं, उनकी जगह कोई 12 या 21 लोग बैठे हों. जो संजीदा हों और विवेकशील हों और जिनका पार्टी में सम्मान हो. ये सामूहिक नेतृत्व राजनीतिक फ़ैसले लेने में नए अध्यक्ष की मदद करे. मैं समझता हूं कि इस नए सामूहिक नेतृत्व में गांधी परिवार की भी भूमिका हो सकती है. ये बात सच है कि गांधी परिवार कांग्रेस के लिए बोझ भी है और ताक़त भी है. बोझ इसलिए कि उसके साथ कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप नत्थी होता है. लेकिन हमें ये समझना चाहिए कि गांधी परिवार लोकतांत्रिक वंशवाद का उदाहरण है. वो चुनाव लड़कर आते हैं, चुनाव में हारते और जीतते हैं. लोकतांत्रिक वंशवाद के ऐसे उदाहरण पूरे दक्षिण एशिया और पूरी दुनिया में हैं. मैं नहीं कहता कि ये अच्छी बात है. इसके बिना अगर आप काम चला सकते हैं तो चलाइए. लेकिन मैं समझता हूं कि आने वाले वक़्त में गांधी परिवार की एक भूमिका होगी और वह भूमिका फ़ैसले लेने की सामूहिकता तक सीमित होना चाहिए. ऐसा न हो कि वो पार्टी के भीतर ताक़त का एक समांतर केंद्र बन जाएं. इसके लिए मानसिक बदलाव लाना होगा. रवैया बदलना होगा. संगठन में बदलाव करने होंगे और फ़ैसला लेने की प्रक्रिया को बदलना होगा. 

Sports

भारतीय क्रिकेट को आने वाले समय में कुछ सख़्त बदलावों का सामना करना पड़ सकता है?

वर्ल्ड कप 2019 के सेमीफ़ाइनल में भारत हार गया. हर हार की समीक्षा होती है और उस समीक्षा के बाद कुछ कड़े फ़ैसले लिए जाते हैं. क्या भारतीय क्रिकेट को भी आने वाले समय में कुछ सख़्त बदलावों का सामना करना पड़ सकता है? भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन यह सवाल इस वक़्त सोशल मीडिया और गली-नुक्कड़ों पर चर्चा का विषय बना हुआ है. क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019 में भारतीय बल्लेबाज़ 240 रनों का लक्ष्य हासिल नहीं कर सके और हार कर टूर्नामेंट से बाहर हो गये. तो क्या आने वाले समय में भारतीय क्रिकेट टीम के नेतृत्व में बदलाव के आसार हैं? वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन मानते हैं कि कप्तान के संबंध में बदलाव की ज़रूरत और आसार नहीं है लेकिन कोच बदलने पर विचार ज़रूर किया जा सकता है. वह कहते हैं, विराट कोहली की अगुवाई में भारतीय टीम नियंत्रण में है. यह दुनिया का बेहतरीन बल्लेबाज़ी क्रम है. टीम सही दिशा में बढ़ रही है और कप्तान बदलने का कोई कारण नहीं है. लेकिन कोच के संबंध में कुछ बातें ज़रूर हैं. यह इस पर निर्भर करता है कि ख़ुद रवि शास्त्री कोच बने रहना चाहते हैं या नहीं और बोर्ड क्या सोचता है और कप्तान कोहली क्या सोचते हैं. हालांकि सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इच्छा जताई है कि उपकप्तान रोहित शर्मा को वर्ल्ड कप में शानदार प्रदर्शन का ईनाम मिलना चाहिए और उन्हें वनडे और टी-20 मैचों की कप्तानी सौंप दी जानी चाहिए, भले ही टेस्ट की कप्तानी कोहली के पास ही रखी जानी चाहिए. प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं, रोहित शर्मा में एक कप्तान की कुशाग्रता ज़रूर है. वह समझदार हैं और बतौर कप्तान उनका रिकॉर्ड भी अच्छा है. लेकिन जिन देशों की टीमों में टेस्ट और वनडे में अलग कप्तान हैं, उनमें से कई मामलों में टेस्ट कप्तान वनडे मैच नहीं खेलता है. लेकिन यहां अगर विराट टेस्ट में कप्तान होंगे और वनडे में किसी और की कप्तानी में खेलेंगे तो यह खेल के लिए ठीक नहीं होगा. भारतीय सेटअप में यह प्रयोग नहीं चलेगा. हालांकि अतीत में ऐसा रहा है जब अनिल कुम्बले टेस्ट कप्तान थे और महेंद्र सिंह धोनी वनडे की कमान संभाल रहे थे. उसके बाद धोनी टेस्ट कप्तान रहे और वनडे कप्तानी विराट कोहली को सौंप दी गई. बतौर कप्तान रिकॉर्ड देखें तो 70 से ज़्यादा मैचों में कप्तानी करने वालों में विराट कोहली की सफलता दर सबसे ज़्यादा है. उन्होंने 77 मैचों में से 56 मैच जीते हैं. उनकी कप्तानी में भारत 74.34 फ़ीसदी की दर से मैच जीत रहा है जो महेंद्र सिंह धोनी और अज़हरुद्दीन से कहीं ज़्यादा है. लेकिन बतौर कप्तान रोहित शर्मा का प्रदर्शन भी शानदार रहा है. विराट को आराम दिए जाने पर रोहित शर्मा ने जिन 10 वनडे मैचों में कप्तानी की उनमें से 8 मैच भारत जीता है. 2018 में उनकी कप्तानी में भारत एशिया कप और बांग्लादेश के ख़िलाफ़ निधास ट्रॉफ़ी जीत चुका है. आईपीएल में रोहित शर्मा मुंबई इंडियंस की कप्तानी करते हैं जो सबसे ज़्यादा चार बार आईपीएल विजेता बन चुकी है. रोहित ने कई बार ज़िम्मेदारी को गंभीरता से स्वीकार किया है और अपनी इंद्रियों पर भरोसा रखते हुए समझदार फ़ैसले किए हैं. आईपीएल में उन्होंने काफ़ी स्मार्ट कप्तानी मूव्स दिखाए हैं, चाहे वह एबी डिविलियर्स के ख़िलाफ़ क्रुणाल पंड्या का इस्तेमाल हो या फिर हार्दिक पंड्या को बीच के ओवरों में पूरे ओवर कराना ताकि बल्लेबाज़ों को तेज़ी से रन बनाने का लालच दिया जा सके. हालांकि प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं कि इस वर्ल्ड कप में हार की वजह विराट कोहली की ख़राब कप्तानी नहीं है कि उन्हें सज़ा दी जाए. वह कहते हैं, रणनीति के लिहाज़ से आप कह सकते हैं कि सेमीफ़ाइनल में धोनी को देर से भेजना एक ग़लती थी और ऋषभ और हार्दिक को उनके बाद भेजना चाहिए था. लेकिन उस पर सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं. कप्तानी के स्तर पर उनकी एक चूक यही है कि वह समय रहते अपने मध्यक्रम को मज़बूत नहीं कर सके. पर इसकी ज़िम्मेदारी सबकी है और यह कोई ऐसी चूक नहीं कि कप्तान को हटा दिया जाए. भारतीय टीम के मुख्य कोच समेत बाकी सपोर्ट स्टाफ़ का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है और बीसीसीआई ने नए आवेदन मंगाए हैं. आवेदन की आख़िरी तारीख़ 30 जुलाई है. अभी रवि शास्त्री मुख्य कोच हैं जबकि बल्लेबाज़ी कोच संजय बांगर, गेंदबाज़ी कोच भरत अरुण और फील्डिंग कोच आर श्रीधर हैं. अभी सपोर्ट स्टाफ़ को 45 दिनों का एक्सटेंशन दिया गया है ताकि वे 3 अगस्त से शुरू हो रहे वेस्टइंडीज़ दौरे तक बने रहें. लेकिन वेस्टइंडीज़ दौरे के बाद भारतीय टीम के सपोर्ट स्टाफ़ में कुछ बदलाव हो सकते हैं. प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं, मौजूदा हालात में कप्तान विराट कोहली को हटाने का कोई कारण नहीं है. चूंकि किसी पर तो गाज़ गिरनी है, इसलिए लोग कहेंगे कि कोच को हटाना चाहिए और टीम के मार्गदर्शन के लिए एक ताज़े दिमाग वाले आदमी की ज़रूरत है. लेकिन मेरा मानना है कि बोर्ड को विराट कोहली की राय का सम्मान करना होगा. अगर कोहली रवि शास्त्री को हटाने के पक्ष में नहीं है तो बोर्ड के लिए चाहकर भी उन्हें हटाना आसान नहीं होगा. भारतीय टीम इस वर्ल्ड कप में मध्यक्रम में बल्लेबाज़ी की अस्थिरता से जूझती रही. ख़ास तौर से नंबर चार को लेकर सबसे ज़्यादा शिकायती स्वर रहे. प्रदीप मैगज़ीन मानते हैं कि कोहली और शास्त्री की सबसे बड़ी चूक यही रही कि वे नंबर चार का बल्लेबाज़ तैयार नहीं कर पाए. वह कहते हैं, उन्होंने जिन बल्लेबाज़ों को नंबर चार के लिए चिह्नित किया, उन्हें पर्याप्त समय तक खेलने का मौक़ा नहीं दिया और यह भारत की हार का एक अहम कारण रहा. वहां बदलाव तो ज़रूर आएंगे. वर्ल्ड कप में पहले विजय शंकर, फिर केएल राहुल और फिर ऋषभ पंत ने नंबर चार पर बल्लेबाज़ी की थी. प्रदीप मैगज़ीन ऋषभ पंत की टीम में जगह ज़रूर देखते हैं लेकिन नंबर चार पर नहीं. वह कहते हैं, महेंद्र सिंह धोनी अगर वर्ल्ड कप के तुरंत बाद भी संन्यास ले लें. यह भी हो सकता है कि उन्हें एक विदाई सिरीज़ मिल जाए और उसके बाद वह संन्यास लें. ऋषभ पंत उनके प्राकृतिक उत्तराधिकारी हैं और वो एक आक्रामक विकेटकीपर बल्लेबाज़ के तौर पर टीम में होंगे. नंबर चार की ज़िम्मेदारी किसी और को देनी होगी. और जिसे भी यह ज़िम्मेदारी दी जाए, उसे खेलने के लिए पर्याप्त समय भी दिया जाए.

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