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अक्सर थका हुआ महसूस करना कितना ख़तरनाक है?

अक्सर थका हुआ महसूस करना कितना ख़तरनाक है?

Date : 27-Jun-2019
27 जून 2019 1970 के दशक की शुरुआत में अगर आपने बर्नआउट से पीड़ित होने की बात की होती तो तय मानिए कि कुछ भौंहें ज़रूर तन जातीं. उन दिनों अनौपचारिक रूप से इस शब्द का इस्तेमाल नशीली दवाइयों के सेवन से पड़ने वाले दुष्प्रभावों को बताने में किया जाता था. मसलन दिमाग की सक्रियता घट जाना, जो अक्सर पार्टियों में जाने वालों के लिए आम बात थी. न्यूयॉर्क में जर्मन-अमरीकी मनोवैज्ञानिक हर्बर्ट फ्रायडेनबर्गर ने 1974 में पहली बार नशेड़ियों और बेघर लोगों के एक क्लीनिक में इस समस्या की पहचान की. लेकिन वह नशेड़ियों के बारे में नहीं सोच रहे थे. क्लीनिक चलाने वाले स्वयंसेवक मुश्किलों से गुज़र रहे थे. उनके पास बहुत काम था, प्रेरणा की कमी थी और वे मानसिक रूप से थक गए थे. यह काम पहले उनको बहुत फायदेमंद लगता था, लेकिन अब वे चिड़चिड़े और खिन्न रहने लगे थे. वे अपने रोगियों का भी उतना ख्याल नहीं रख पा रहे थे जिसके वे हकदार थे. विश्वव्यापी बीमारी फ्रायडेनबर्गर ने इस चिंताजनक स्थिति को लंबे समय तक ज़्यादा काम करने से होने वाली थकान के रूप में परिभाषित किया. इसका वर्णन करने के लिए उन्होंने बर्नआउट शब्द को चुना. यह शब्द तुरंत ही लोकप्रिय हो गया. आज दुनिया भर में इसे जाना जाता है. बर्नआउट कितना व्यापक है, इसके आंकड़े आने बहुत मुश्किल हैं. 2018 में अकेले ब्रिटेन में ही काम के तनाव से 5,95,000 लोग पीड़ित थे. खिलाड़ी इससे पीड़ित हैं. यूट्यूब के सितारे इसके शिकार हैं. उद्यमी इससे परेशान हैं. ख़ुद फ्रायडेनबर्गर इसके शिकार हो गए थे. पिछले महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस विश्वव्यापी समस्या को बीमारी की मान्यता दी. बीमारियों के वर्गीकरण के अंतरराष्ट्रीय मैनुअल में इसे लगातार काम के तनाव से उत्पन्न सिंड्रोम बताया गया. WHO के मुताबिक बर्नआउट के तीन तत्व हैं- थकान, नौकरी से ऊब और ख़राब प्रदर्शन. इसे नज़रंदाज़ करना और इसके इलाज में देरी करना ठीक नहीं है. किसी भी दूसरी बीमारी की तरह इसे बढ़ने देना और देर हो जाने पर इलाज ढूंढना कारगर नहीं हो सकता. आयरलैंड की डबलिन काउंटी की मनोचिकित्सक सिओबन मरे कहती हैं, बर्नआउट से पहले के संकेत और लक्षण बहुत हद तक अवसाद जैसे होते हैं. मरे ने दि बर्नआउट सॉल्यूशन नामक किताब भी लिखी है. वह शराब और शुगर के ज़्यादा इस्तेमाल से बचने की सलाह देती हैं. थकान यदि नहीं उतर रही है तो उस पर भी ध्यान दीजिए. सुबह 10 बजे तक सोने पर भी अगर फिर से सोने की इच्छा करे या टहलने की ऊर्जा ना मिले तो सतर्क हो जाइए. जैसे ही आप इस तरह महसूस करना शुरू करते हैं, मरे डॉक्टर के पास जाने की सलाह देती हैं. वह कहती हैं, अवसाद और बर्नआउट से पहले की स्थिति एक जैसी है. बर्नआउट को बीमारी मान लेने के बारे में बहुत उत्साह है, लेकिन इसे अब भी पेशेगत घटना ही माना गया है. दोनों में अंतर समझने वाले पेशेवर चिकित्सक की सहायता लेना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अवसाद के इलाज के लिए तो कई विकल्प मौजूद हैं लेकिन बर्नआउट का सबसे बेहतर इलाज अब भी जीवनशैली के बदलाव में ही है.

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