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एक समय एक काम करना चाहिये

एक समय एक काम करना चाहिये

Date : 22-Jul-2019
स्मार्ट फ़ोन और कंप्यूटर स्क्रीन पर लगातार आने वाले संदेश हमें व्यस्त रखते हैं. हो सकता है कि वे हमारा भला करने से ज़्यादा नुक़सान कर रहे हों. हमें लगता है कि हमें जवाब ज़रूर देना चाहिए, क्योंकि यह काम से जुड़ी चीज़ है, लेकिन लगातार जुड़े रहने का मतलब है कि हमें गहराई से सोचने का मौक़ा नहीं मिल पाता. यही उन कंपनियों के लिए समस्या है जो अपने कर्मचारियों से ज़्यादा से ज़्यादा हासिल करना चाहती हैं. एक व्यक्ति हमारे काम करने के तरीक़े को बदलना चाहते हैं. उनके मुताबिक़ दफ़्तरों में होने वाली अगली बड़ी क्रांति के लिए इसे दुरुस्त करने की ज़रूरत होगी. उनका मानना है कि कोई व्यक्ति किसी कंपनी के लिए कितना मूल्यवान है, यह उसके कौशल से नहीं बल्कि उसके ध्यान केंद्रित करने की क्षमता से आंका जाएगा. सवाल यह भी है कि हम ध्यान भटकाने वाली चीज़ों को रोकने के लिए समय कैसे निकालें और कैसे अपना बेहतरीन काम करें? कैल न्यूपोर्ट जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर हैं और उन्होंने डीप वर्क एंड डिजिटल मिनिमलिज्म सहित कई बेस्टसेलर किताबें लिखी हैं. उनका कहना है कि हमारे दफ़्तर सुविधाओं के लिहाज़ से बने हैं, हमारे दिमाग़ से बेहतरीन काम लेने के लिए नहीं. नॉलेज सेक्टर की नौकरियों में, जहां उत्पाद मशीनों की जगह मानवीय मेधा से तैयार किए जाते हैं, वहां हमें हमेशा (नेटवर्क से) जुड़े रहने की ज़रूरत होती है और एक साथ कई काम निपटाने के लिए तैयार रहना होता है. ये दोनों चीज़ें गहरी, रचनात्मक और पैनी सोच के अनुकूल नहीं है. न्यूपोर्ट कहते हैं, ज्ञान के काम में मुख्य संसाधन हमारा दिमाग़ और नई सूचनाएं पैदा करने की इसकी क्षमता है, लेकिन हम इसका लाभ नहीं उठा पाते. कुछ लोग एक साथ कई काम करने की क़समें खाते हैं, जबकि हम जानते हैं कि हमारे दिमाग़ को एक बार में एक से ज़्यादा चीज़ों पर ध्यान केंद्रित में कठिनाई होती है. मनोवैज्ञानिकों ने पहले सोचा था एक साथ कई काम करने वाले लोगों का अपने ध्यान पर असामान्य नियंत्रण होता है. लेकिन सबूत बताते हैं कि उनके पास (ईश्वर का दिया) ऐसा कोई उपहार नहीं होता. हक़ीक़त में, दिमाग़ लगाने वाले कई कामों में मल्टीटास्कर पिछड़ जाते हैं. इंसानी दिमाग़ की क्षमता सीमित है. किसी निश्चित समय में वे उतना ही काम कर सकते हैं. काम के दौरान उसमें कई चीज़ों को ठूंसकर भर देने से फ़ायदे की जगह नुक़सान होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है. न्यूपोर्ट का कहना है कि हर समय (नेटवर्क से) जुड़े रहना और तुरंत प्रतिक्रिया देने की उम्मीद करना हमारी ज़िंदगी को दयनीय बना देती है. यह हमारे दिमाग़ के सामाजिक सर्किट से मेल नहीं खाता. हमें अच्छा नहीं लगता कि कोई हमारे जवाब के इंतज़ार में बैठा है. यह हमें बेचैन करता है. ईमेल, स्लैक या दूसरे मैसेजिंग ऐप्स पर तुरंत उत्तर देना बहुत आसान है. ऐसा नहीं करने पर हम दोषी महसूस करते हैं और हमसे उम्मीद रहती है कि हम ऐसा करेंगे. न्यूपोर्ट का कहना है कि यह हमारे दिमाग़ को भरता रहता है. नॉलेज सेक्टर के कर्मचारी ईमेल आने से पहले की तुलना में अब ज़्यादा चीज़ों के लिए ज़िम्मेदार हैं. यह हमें उतावला बनाता है. हमें सोचना चाहिए कि बेमतलब की चीज़ों को दिमाग़ से कैसे निकालें और काम को कैसे कम करें. काम के लिए हमेशा जुड़े रहने से क्या हो सकता है? निस्संदेह, बर्नआउट. मैसेजिंग ऐप्स पर या मीटिंगों में होने वाली दिशाहीन बातचीत हमारे दिमाग़ में भीड़भाड़ बढ़ाती रहती है. लोगों को भटकाव के बिना बेहतरीन काम करने के मौक़े देना न्यूपोर्ट की अगली किताब- दि वर्ल्ड विदाउट ईमेल का मुख्य विषय है. उनका विचार श्रमिकों को कम लेकिन बेहतर काम करने की अनुमति देता है. गैरज़रूरी चटर-पटर को कम करना महत्वपूर्ण है लेकिन तभी जब संगठन की संस्कृति धीमे संचार की अनुमति देती हो. न्यूपोर्ट कहते हैं, मैनेजरों के समय का 85% हिस्सा बैठकों में, फोन पर या लोगों से काम के बारे में बातें करते हुए निकल जाता है. यह लचीला है और इसका अनुकूलन आसान है, लेकिन इंसानी दिमाग़ जिस तरह काम करता है, उससे इसका टकराव होता है. विषय परिवर्तन आपको थका देते हैं. लोग नो-ईमेल फ्राइडे जैसे तरीक़े आज़माते हैं. लेकिन यह कारगर नहीं होता क्योंकि एक-दूसरे को ईमेल किए बिना काम करने का कोई विकल्प तैयार नहीं होता. ईमेल या स्लैक का कम इस्तेमाल तभी कारगर होगा जब कोई विकल्प तैयार हो. न्यूपोर्ट का सुझाव है (जैसा कुछ अन्य लोग करते हैं) कि आमने-सामने का संचार ज़्यादा प्रभावी है. लेकिन महत्वपूर्ण चीज़ है एक ऐसी संस्कृति को प्रोत्साहित करना जहां स्पष्ट संचार ही मानदंड हो. न्यूपोर्ट का कहना है कि लोगों को दूसरे काम में दिमाग़ लगाने से पहले एक काम को पूरी तरह बंद करने की ज़रूरत होती है. जब हम लगातार ईमेल देख रहे होते हैं या जब हमें पहले के काम के बारे में बार-बार याद दिलाया जा रहा हो तो ऐसा करना मुश्किल होता है. हमारे ध्यान का कुछ हिस्सा पहले काम पर अटक जाता है- इस प्रभाव को ध्यान अवशेष कहा जाता है. हम जितने व्यस्त होते हैं, उतने ही काम बदलते हैं. इसलिए व्यस्त महसूस करना गहरी एकाग्रता में सहायक नहीं है. ध्यान भटकने के बाद दोबारा ध्यान केंद्रित करने में कितना समय लगता है, यह अलग-अलग हो सकता है. एक अध्ययन में पाया गया कि रुकावट के बाद दोबारा गहन ध्यान केंद्रित करने में औसत रूप से 23 मिनट 15 सेकेंड लगते हैं. इसका दूसरा पहलू यह है कि किसी बातचीत में सभी का शामिल होना बहुत सुविधाजनक है. लेकिन बिज़नेस का लक्ष्य कभी भी सुविधा नहीं होता. लक्ष्य होता है मूल्य. असेंबली लाइन ने कार के उत्पादन में क्रांति ला दी, लेकिन यह सुविधाजनक व्यवस्था नहीं है. यह व्यवस्था अधिक गाड़ियों के जल्दी उत्पादन के लिए बनाई गई है न्यूपोर्ट के मुताबिक़ सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में सबसे अधिक ध्यान केंद्रित करके काम होता है. वहां भी लक्ष्य एक उत्पाद का उत्पादन करना है. वह कहते हैं, इन सेक्टरों में कुछ समय के लिए चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था तैयार की जाती है. वे किसी एक चीज़ पर ही तीन दिनों के लिए काम करते हैं और उस दौरान उनका पूरा ध्यान उस एक उत्पाद पर होता है. सॉफ्टवेयर इंजीनियर कभी भी तदर्थ व्यवस्था के तहत काम नहीं करते. कारख़ानों में भी यह उपयोगी है क्योंकि सबसे ज़्यादा समय किसी उत्पाद को सबसे बेहतर ढंग से तैयार करने का तरीक़ा ढूंढ़ने में ही लगता है. ऐतिहासिक रूप से कुशल कारीगर शुरू से लेकर आख़िर तक उत्पादों का निर्माण करते थे. यह सुविधाजनक था, लेकिन तेज़ नहीं था. प्रोडक्शन लाइन की शुरुआत 20वीं सदी में जाकर हुई. इसमें श्रमिकों को सिर्फ़ उस एक काम पर ध्यान केंद्रित करना होता है, जिसमें वह निपुण होता है. दूसरा श्रमिक वह काम करता है जिसमें वह दक्ष होता है. ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं है कि नॉलेज सेक्टर में काम करने वालों के लिए फ़िलहाल हमारे पास काम का सबसे अच्छा तरीक़ा है. जैसा कि न्यूपोर्ट कहते हैं कि कुछ क्षेत्र प्रोडक्शन लाइन मॉडल के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं, जैसे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग. लेकिन आप जो कुछ भी बनाना चाहते हैं, चाहे ग्राहक के लिए एक पिच हो या नये उत्पाद का विचार, वह तेज़ रफ़्तार से बन सकता है. किसी परियोजना की शुरुआत से लेकर आख़िर तक सिर्फ़ सबसे दक्ष लोगों को जुटाकर, उन्हें भटकाव से बचाकर और स्पष्ट लक्ष्य के साथ काम कराने से प्रक्रिया कुशल बनी रहेगी. न्यूपोर्ट कहते हैं, नॉलेज सेक्टर में हम शुरुआती चरण में हैं. हम अभी तक औद्योगिक क्रांति तक नहीं पहुंचे हैं. नॉलेज सेक्टर में प्राथमिक पूंजी निवेश इंसानी दिमाग़ है, फैक्ट्री की मशीनें नहीं. न्यूपोर्ट का कहना है कि उन्हें अभी तक ऐसी किसी बड़ी कंपनी के बारे में नहीं मालूम जो उनके तरीक़े से काम करती हो, लेकिन यह स्थिति जल्द ही बदल जाएगी. इस बीच, जो कंपनियां अपने कर्मचारियों को एक साथ कई कामों के लिए प्रोत्साहित करती हैं, वे पीछे छूट जाएंगी. और जो कंपनियां धीमी, मगर गहरी और गुणवत्ता से भरी सोच का मूल्य समझती हैं वे आगे निकल जाएंगी.

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