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नोटबंदी: फ़िल्म लाइन छोड़ रिक्शा चलाने या दूसरे काम करने पर मजबूर

नोटबंदी: फ़िल्म लाइन छोड़ रिक्शा चलाने या दूसरे काम करने पर मजबूर

Date : 09-Nov-2019
मुम्बई 9 नवंबर । हिंदी फ़िल्म का एक बड़ा तबका मानता है कि नोटबंदी से फ़िल्मी जगत को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है. वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ये मानते है कि नोटबंदी से कई चीज़ें बेहतर हुई हैं. 8 नवंबर 2016 की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जो फ़ैसला किया उसका असर समाज के हर वर्ग, हर क्षेत्र पर और हर उद्योग पर हुआ है. इस फैसले का दूरगामी परिणाम भले ही हो, पर फ़िलहाल कई क्षेत्र ऐसे हैं, जिन पर सरकार के इस फ़ैसले का गहरा असर पड़ा है. फ़िल्म जगत उसमें सर्वोपरि है. हिंदी फ़िल्म जगत की बात करें तो ऐसा बहुत बड़ा तबका है जो मानता है कि नोटबंदी के चलते फ़िल्मी जगत को बहुत बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है, लेकिन वही कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ये मानते हैं कि नोटबंदी के चलते कई चीज़ें सुधरी है. हिंदी फ़िल्म जगत एक ऐसी इंडस्ट्री है, जिसके पास सर्वाधिक दर्शक हैं, पर दर्शकों का एक बड़ा वर्ग कई वजहों से सिनेमाघरों से दूर है और जिसकी वजह है नोटबंदी और सरकार के द्वारा लगाईं गई जीएसटी. जिसकी वजह से कई लोग बेरोजगार और लाचार हो गए हैं. कई मजदूरों को होना पड़ा बेरोज़गार आल इंडियन सिने वर्कर एसोसिएशन के लीडर सुरेश श्यामलाल का कहना है, नोटबंदी को तीन साल हो गया है. इन तीन सालों में वर्कर्स के लिए काम बहुत कम हो गया है. फ़िल्म इंडस्ट्री अनधिकृत तरीके से काम करती है यहां वर्कर्स को रोज़ के काम के पैसे मिलते है. कुछ वर्कर्स है जिन्हें तीन महीने बाद पैसे मिलते है. पहले के मुक़ाबले 70 प्रतिशत फ़र्क़ पड़ गया है अब मजदूरों के पास काम नहीं है क्योंकि अब फ़िल्मों और सीरियल्स की इतनी शूटिंग नहीं होती. जब नोटबंदी हुई थी तब कई फ़िल्मों की शूटिंग बीच में ही रुक गई थी. फ़िल्मों के पैसे डूब गए थे, कई लोगों के हाथों से रोज़गार चला गया था जिसका असर आज तक पड़ा हुआ है. नोटबंदी के बाद 28% एंटरटेनमेंट टैक्स लगा हुआ है जिसके चलते पहले जहां 10 फ़िल्में बनती थी अब एक ही बन रही है. फ़िल्म निर्माता हमसे कहते हैं कि, हम कम पैसे ही दे सकते हैं, हमारे पास ज़्यादा पैसे नहीं हैं तुम लोगों को देने के लिए, हमको पिक्चर भी बनानी है, हीरो को भी देना है और जीएसटी भी भरनी है अगर आप लोग जीएसटी को 12% पर ले आओ तब कुछ हो सकता है. पैसों में हो रही है कटौती सुरेश अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि, इंडस्ट्री का बहुत बुरा हाल है. मुंबई के कई शूटिंग स्टूडियो बंद हो चुके है और कई बंद होने की कतार पर है. मज़दूर फ़िल्म लाइन छोड़ रिक्शा चलाने या दूसरे काम करने पर मजबूर हो गए हैं. पहले 2000 से लेकर 3000 वर्कर को काम मिलता था लेकिन अब 1200 मजदूरों को काम मिलता है. सिर्फ जूनियर आर्टिस्ट ही नहीं लाइटमैन हो या कैमरामैन या फिर स्पोर्ट बॉय सबकी हालत बुरी है. पहले उन्हें अच्छे पैसे मिलते थे लेकिन अब उन्हें 1500 से 2000 दिए जाते है और 16 से 17 घंटे काम कराते है. जो लोग पुराने है उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया क्यूंकि उन्हें ज़्यादा पैसे देने पड़ते थे इस लिए अब नए लोगों को लेते है. कैमरा चलाने से लेकर टेक्निकल का काम संभालने वाले लोगों को भी पहले 3000 दिया जाता था लेकिन अब उन्हें भी कम दिया जाता है और रही बात स्पॉट बॉय और बाक़ी आर्टिस्ट की तो 300 से 400 रूपये ही दिए जाते हैं और काम भी दुगुना कराते हैं. बाक़ी सुविधाएं, जैसे रहने और खाने की स्थिति तो बहुत बेकार हो गयी है. काम ना होने के चलते फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े मजदूर दर-दर भटक रहे है. ये इंडस्ट्री बाहर से जितनी कलरफुल दिखती है अंदर से उतनी की ब्लैक एंड व्हाइट है. सुरेश का कहना है कि फ़िल्म लाइन में ब्लैक का पैसा और दादागीरी बहुत चलती है. कोई नहीं पूछेगा कि ये ब्लैक का पैसा है या व्हाइट का ? जाने माने ट्रेड एनालिस्ट विनोद मिरानी की माने तो नोटबंदी का फ़िल्मों पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा है. ना इसका असर फ़िल्म बनाने वाले प्रोड्यूसर पर हुआ और ना ही टिकट ख़रीदने वाली दर्शकों पर. नोटबंदी के बाद भी कुछ ऐसे काम है, जैसे रेस्टॉरेंट में खाना खाना, सब्ज़ी ख़रीदने से लेकर पिक्चर देखना ये काम कैश में हो सकते हैं और ये आपसे कोई नहीं पूछेगा कि ये ब्लैक का पैसा है या व्हाइट का? विनोद मिरानी की माने तो उनका कहना है कि, फ़िल्म इंडस्ट्री में अब सबकुछ व्हाइट में होने लगा है लेकिन पहले ऐसा नहीं था. पहले पैसों का लेनदेन हुआ करता थी लेकिन अब जबसे स्थापित कंपनी आ गई है तबसे ब्लैक में काम होना बंद हो गया है. आज निर्माता खुद के पैसे से कभी काम नहीं करता पहले के ज़माने में ऐसा होता था लेकिन अब वो काम करते है बड़ी - बड़ी प्रोडक्शन कंपनी के साथ, डिस्ट्रब्यूशन कंपनी , सैटेलाइट चैनल, ओ.टी.टी प्लेटफार्म जैसे ऐमज़ॉन, नेटफ्लिक्स उससे भी अच्छी कमाई हो जाती है. फिर उनके पास म्यूजिक़ कंपनी है वो भी फ़ायदा कराती है. आज कल सिर्फ़ बॉक्स-ऑफ़िस की कमाई तक ही निर्भर नहीं है, फ़िल्म मेकर बाक़ी प्लेटफ़ार्म से भी अच्छा पैसा आ जाता है. मेरी कमाई बढ़ी, क्योंकि मैंने पैसे नहीं बढ़ाये जाने माने एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मनोज देसाई जोकि मुंबई के जाने-माने थिएटर मराठा मंदिर, गेट्टी गैलेक्सी और सात और बड़े थिएटर के मालिक हैं. उनका कहना है कि, तीन साल पहले हुए नोटबंदी से कोई ज़्यादा फ़र्क़ नहीं हुआ. मराठा मंदिर थिएटर में 25 साल होने जा रहे हैं दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे के, वो आज भी चल रही है इसकी ख़ास वजह है टिकट के दाम जो हमें कभी नहीं बढ़ाए. आज भी हम 18 से 20 रूपये ही लेते हैं. नई फ़िल्म के लिए भी हमारे पैसे ठीक हैं जो ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग, मध्य वर्ग और उच्च वर्ग लोगों को ध्यान में रखकर तय किए गए हैं . कुछ थिएटर में हमारे पास हज़ार सीट है तो किसी थिएटर में 250 सीटें हैं और सभी थिएटर भरे रहते है. जीएसटी आ गया है और वो हम सबको बर्दाश्त करना पड़ रहा है लेकिन मैं खुश हूं कोई नुकसान नहीं हुआ है. उन्हें उम्मीद है कि आगे जाकर सरकार हमारे बारे में ज़रूर सोचेगी. थिएटर में फ़िल्में लगती है लेकिन मुनाफ़ा नहीं मिलता मनोज देसाई की बात से बिलकुल भी सहमत नहीं है दीपक कुदळे, जो कि आईपीपी (इमीडियेट पास्ट प्रेजिडेंट) हैं सिनेमा ओनर और एक्ज़क्यूटिव एसोसिएशन के. वो कहते हैं कि नोटबंदी के चार महीने तक तो हम इतने परेशान थे कि हमें लगा कि अब तो सिंगल थिएटर पूरी तरह से बंद हो जाएंगे. धीरे-धीरे हम संभले लेकिन हालात आज भी सुधरे नहीं है. वे कहते हैं, नोटबंदी के बाद सब कुछ ऑनलाइन होने लगा और हमारे पास ऑनलाइन पेमेंट वाली सुविधाएं इतनी नहीं थी. अब जाकर आ पाई है लेकिन जहां मल्टीप्लेक्सेस में 70 % ऑनलाइन बुकिंग होती है और 10% ही कैश पेमेंट होती है वही सिंगल थिएटर्स में उल्टा है हमारे यहां कैश पेमेंट करने वाले 70% और ऑनलाइन करने वाले 10% जिसकी वजह है. 10% सर्विस टैक्स जो काट लेती है पेएटीएम और बुक माय शो. जिसके चलते ग़रीब और मिडिल क्लास ऑनलाइन बुकिंग करना नहीं करते पसंद. आज थिएटर में फ़िल्में लगती भी है तो मुनाफ़ा नहीं हो पा रहा है. त्योहारों पर करती है फ़िल्में अच्छा बिज़नेस दीपक कुदळे अपनी बात को समझाते हुए कहते हैं कि, 5 से 6 फिल्में आती है जिसका बिज़नेस अच्छा होता है. दिवाली हो , ईद हो या क्रिसमस त्योहारों पर फ़िल्में चलती है. पूरे साल को देखा जाए तो 13 औसत फ़िल्में आती है, 13 औसत से कम और तेरा सुपर बंपर फ़िल्में होती है. सुपर बंपर को छोड़ जो की 5 से 6 फ़िल्में ही रहती है पूरे साल तो बाक़ी फ़िल्मों के लिए दर्शक ही नहीं आते है. हमें बहुत कुछ करना पड़ता है, कई तरह से लुभाने की कोशिश करते है फिर भी दर्शक नहीं आते है. महाराष्ट्र सरकार के साथ मिलकर हम डेवलेपर कंट्रोल रूल बनाने की कोशिश कर रहे है, जिसमें हम इन्हीं सब मुद्दों पर चर्चा करेंगे और अभी कुछ और कानून भी बनाए हैं. जैसे किसी भी प्लेटफार्म पर 2 महीने तक कोई फ़िल्म नहीं दिखा सकते फिर वो सैटेलाइट चैनल हो, या कोई ओटीटी प्लेटफार्म. दम तोड़ रहा है छोटा और स्वतंत्र सिनेमा युसूफ शेख़ जो कि फ़िल्म डिस्ट्रब्यूटर है उनका कहना है कि ,'बॉक्स ऑफ़िस की अच्छी कमाई और बिज़नेस सिर्फ़ बड़ी-बड़ी फ़िल्मों को ही फहीदा दिला रहे हैं छोटे मोटे प्रोडक्शन हाउस जिनकी तदात 100 से भी ज़्यादा है, 100 से भी ज़्यादा स्वतंत्र सिनेमा अब धीरे-धीरे ख़त्म हो रहे है क्यूंकि उनको ख़रीददार नहीं मिल रहे. कोई भी अब स्वतंत्र फ़िल्ममेकर और प्रोड्यूसर पैसा लगाने से डर रहे हैं पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री को सिर्फ़ 10 शक्तिशाली लोग चला रहे है वही फ़िल्में बनाते है और उन्हीं की फ़िल्म चल रही है बाक़ी सबकी हालत ठीक नहीं है. नोटबंदी और जीएसटी के चलते एक छोटी इंडस्ट्री जो थी जो 5 करोड़ के बजट में फ़िल्म बनाया करती थी वो अब ख़त्म हो गयी है. यही वजह है कि अब वो लोग जो चाहे टेक्निकल से जुड़े हों या प्रोडक्शन से अब वो फ़िल्म छोड़ वेब सीरीज़ बना रहे हैं. अब जो फ़िल्ममेकर फ़िल्म नहीं बना सकता वो अब वेब सीरीज़ बना रहा है और छोटा सिनेमा अब पूरी तरह से ख़त्म होता जा रहा है ये है आज का सबसे बड़ा बदलाव.

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