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पैदा होना. प्यार करना और मर जाना. 10 परसेंट ज़िंदगी यही है, बाक़ी 90 परसेंट रिएक्शन है.

पैदा होना. प्यार करना और मर जाना. 10 परसेंट ज़िंदगी यही है, बाक़ी 90 परसेंट रिएक्शन है.

Date : 25-Jun-2019
तुम पर प्यार या ग़ुस्से से ज़्यादा तरस आता है. ये तरस किसी फ़िल्मी कहानी में टूटे दिल के साथ तुम्हारी बेचारगी पर नहीं है. तकलीफ़ कुछ और है. पैदा होना. प्यार करना और मर जाना. 10 परसेंट ज़िंदगी यही है, बाक़ी 90 परसेंट रिएक्शन है. फ़िल्म वालों ने इस डॉयलॉग को तुमसे बुलवा तो दिया लेकिन इसे कबीर सिंह को जिया पाने में वो नाकाम रहे. अपने प्रेमी जीवन में तुमने 90 परसेंट रिएक्शन को कभी ऑब्जर्व ही नहीं किया. कैसे किसी का नाम पूछने से पहले दिल धड़क-धड़क कर इंजन हो जाता है. कॉलेज के खंबों से छिपकर देखते हुए नज़रें मिलने पर होंठों की मुस्कान दिल में शिफ्ट हो जाती है. पहली बार चूमें तो पूरे शरीर में सरसरी दौड़ जाती है. घूरते, पहली बार चूमते, भरी क्लासों में सबके सामने मेरी बंदी है कहते हुए तुम्हारा किरदार प्रेम के इन सबसे यादगार रिएक्शन को दर्ज करने में नाकाम रहा. एक टॉपर डॉक्टर वासेपुर वाले अनपढ़ फ़ैज़ल ख़ान को मिला वो सबक भी सीख नहीं पाया, जिसमें परमिशन लेना चाहिए न... मेरे सहप्रेमी कबीर, प्यार का इज़हार आंखों में आंखें और हाथों में हाथ डालकर किया जाता है. घूंसों से किसी का मुंह फोड़ते हुए पीठ दिखाकर ये नहीं सुनाया जाता कि आई रियली लव हर मैन. तरस कि फ़िल्मी कहानी में अपने इज़हार का महबूब पर फर्स्ट रिएक्शन देखना तुम मिस कर गए. तुम कभी नहीं बता पाओगे कि जब तुमने आई लव हर कहा तो वो कैसे शरमाई, मुस्काई या चौंकी होगी. कबीर तुम हालिया फ़िल्मों के सबसे प्यारे फेमिनिस्ट हीरो हो सकते थे. मगर तुम्हारा ग़ुस्सा और हॉल में ताली बजाते लोगों की कंडीशनिंग फ़िल्मी लेखकों पर हावी रही. अरगनी पर प्रीति के कपड़े फैलाना, पीरियड्स में प्यार से उसको गोद में बैठाकर पुचकारना, किसी मशहूर फ़िल्मी अभिनेत्री से सच बोलना कि फिजिकली हेल्प चाहिए और प्यार की बात सुनते ही पीछे हट जाना कि कहीं इसके साथ धोखा न हो जाए. ये सारी बातें लड़की का नाड़ा खुलवाने की जल्दी में चाकू दिखाकर, काम करती बाई के पीछे भागने, प्रेमिका को थप्पड़ मारने और बैकग्राउंड में हिंसा के लिए प्यार जगाते तेज़ साउंड में कहीं छिप गईं. कबीर इस दौर में जब मुझ जैसे कई लड़के अपनी अतीत की करतूतों और कंडीशनिंग से निकलने की अभी कोशिश वाले स्टेज में ही हैं, तब तुम्हारी कहानी हमें पीछे धकेलती है. एक भी लड़का तुम्हारे रास्ते पर चला तो नाम में महबूब का सरनेम लगाने जैसी छोटी कोशिशें...कहीं पीछे छूट जाएंगी. कबीर तुम्हारे पागलपन को देखकर हॉल में बजती तालियां, शोर से ये समझ आया कि क्रूरता को मुस्कान के साथ स्वीकार किया जाने लगा है. मन सिर्फ़ बदला चाहता है. पर्दे पर भी और उससे बाहर भी. इंसाफ की परिभाषा शायद जो मेरा है, वो सिर्फ़ मेरा है पर टिक गई है. कबीर, एक प्रेमी की आलोचना होता देख दुख सा होता है. तुम्हारी बुराइयों का फ़िल्म की यूएसपी बनना तुम्हारे लिटिल थिंग्स को नज़रअंदाज कर गया. प्रेमिका का बैग उठाने की जल्दी, बैग के भार से कंधों का लाल होना देखना, बाइक पर पीछे लगाई नई गद्दी, प्रेमिका की छोटी चोट देखकर पिता सा बन जाना. प्रेमिका के गाल पर सबसे पहले रंग लगाने का प्यारा ख्याल, किसी बदमाश के छेड़ने पर मुंहतोड़ जवाब देना. तुम्हारा पागलपन तुम्हारे इस रियल जैसे रील प्रेम का सर्जन बन गया, सब चीरफाड़ कर दी और तुम्हारे किरदार ही तरह ख़ून देखकर ख़ुश हुआ. लेकिन तुम अकेले दोषी नहीं हो. चुप रहना आदत बन जाता है.फिल्म का ये डॉयलॉग किसी ने बिल्कुल नहीं माना तो वो प्रीति थी. कॉलेज के टॉपर और प्रॉपर गुंडे के सामने वो सफ़ेद चुनरी, चूड़ीदार पायजामा लिए विरोध का एक वाक्य तक नहीं बोल पाई. प्रीति को पिंक की नो मीन्स नो या शायद तेरे नाम की निर्जरा जैसी हिम्मत दिखानी चाहिए थी. चलती ट्रेन में हड़काकर कहना चाहिए था- डोंट टच मी, हाथ मत लगाओ मुझे. गुंडे मवाली कहीं के. कबीर तुम नहीं समझ पाए कि जब प्रीति सब कुछ सहन करे जा रही है तो ये ख़तरनाक है. तुम्हारे, प्रीति, शिवा और उसकी शादी की इच्छुक बहन से कहीं ज़्यादा.... उस प्रेम के लिए जिसमें तुम सब आपस में ऐसे जुड़े थे जैसे किसी मज़बूत रिश्ते की स्वेटर हो जो दिल्ली की सर्दी में पहनें तो गरमाहट गुलाबी पन के साथ गाल के कपोलो तक आ जाती हैं. कबीर तुम्हारे किरदार में कमियां निकालने वाले आस-पास होती क्रूरता को देख तनिक क्रूर हो गए हैं. तुम्हारी गिनती की ख़ूबियों को देखना भूल गए. जिस समाज के नाम पर घर से भागने वाले लड़कों, लड़कियों के पेट में छूरा घोंप दिया जाता है. उसी समाज के नाम पर वो तुम्हारी-प्रीति की पहले जबर्दस्ती और बाद में आपसी समझ में पनपे और जबरन पनपाए प्यार के लिए क्रूर ही तो हो रहे हैं? हमने असल ज़िंदगी में दिल टूटने पर शुरुआती दिनों में ही महबूब को माफ़ करना क्यों नहीं सीख लिया था? इन उलझनों का जवाब कबीर तुम्हारी कहानी में ही था, डिपेंड्स ऑन इंडीविजुअल्स. फ़िल्में समाज का आईना हैं कहने वाले लोगों को पानी में शक्ल देखना शुरू कीजिए क्योंकि आपका आईना आपको मन मार्फत चीजें ही दिखा रहा है. ये पर्दे नहीं समाज में चलवाया जा रहा सिनेमा ही सब रच रहा है. कबीर इन बातों से तुम पर आया तरस कम नहीं हो जाता है. एक प्रेमिका, दोस्त, परिवार और एक लेखक. ये लोग तुम्हें निर्दोष बता तो सकते हैं लेकिन एक कहानी में प्रेम पर जो तुमने मिस किया है, वो तुम्हें कभी पता नहीं चल पाएगा. प्रेम में तुम काफी चूक गए चौहान खुसरो दरिया प्रेम का, वाकी उल्टी धार- जो उबरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार. कबीर अफ़सोस कि तुम्हें खुसरो तो याद रहे. लेकिन अपने हमनाम कबीर का कहा याद नहीं रहा. पोथि पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोए ढाई आखर प्रेम के, पढ़ा सो पंडित होए कबीर तुमने डॉक्टरी तो पढ़ी लेकिन प्यार के ढाई आखर न पढ़ पाए, न जी पाए. बस एक ऐलान कर पाए.... ये मेरी बंदी है.कबीर प्रेम में बंदी नहीं...आज़ाद हुआ जाता है. तुम्हारा सहप्रेमी

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