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आमार शोनार बांग्ला, आमि तोमाए भालोबाशी...

आमार शोनार बांग्ला, आमि तोमाए भालोबाशी...

Date : 07-Aug-2019
आमार शोनार बांग्ला, आमि तोमाए भालोबाशी... चिरोदिन तोमार आकाश, तोमार बाताश, आमार प्राने बजाए बाशी.... हिंदी में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का ये गीत कुछ इस तरह से है, मेरा प्रिय बंगाल, मेरा सोने जैसा बंगाल, मैं तुमसे प्यार करता हूँ... सदैव तुम्हारा आकाश, तुम्हारी वायु, मेरे प्राणों में बाँसुरी सी बजाती है... रवींद्रनाथ टैगोर ने साल 1905 में बंगभग के समय इसे लिखते समय शायद ही ये सोचा होगा कि 66 साल बाद बांग्लादेश वजूद में आएगा और ये गीत उसका राष्ट्रगान बनेगा. बांग्लादेश से रवींद्रनाथ का रिश्ता केवल इसी गीत तक सीमित नहीं है. उनकी कविताएं बांग्लादेश के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं. उनके लिखे साहित्य का एक बड़ा हिस्सा यहीं लिखा गया. एक तरह से कहा जाए तो टैगोर जितने भारत के हैं, टैगोर दुनिया में शायद पहली ऐसी शख्सियत हैं जिनके लिखे गीत दुनिया के दो बड़े देशों का राष्ट्रगान हैं. बांग्लादेश में टैगोर परिवार की तीन बड़ी ज़मींदारियां थीं. पहला कालीग्राम परगना स्थित पोतिसर. दूसरा इब्राहिमपुर परगने में सिलाईदाहा, जो इस समय कुश्तिया ज़िले में है लेकिन बंटवारे से पहले ये अविभाजित नदिया ज़िले का हिस्सा था. तीसरा पाबना ज़िले में शहज़ादपुर परगना. ढाका से क़रीब ढाई सौ किलोमीटर दूरी पर मौजूद पोतिसर गांव पहले राजशाही ज़िले का हिस्सा था, लेकिन 1984 में ये नौगांव में शामिल हो गया बांग्लादेश अवामी लीग से जुड़े इसराफिल आलम नौगांव के सांसद हैं. वे बताते हैं, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल क्रांतिकारी प्रफुल्ल चंद्र चाकी का गृह ज़िला बोगरा भी पोतिसर ज्यादा दूर नहीं है. रवींद्रनाथ टैगोर के इस गांव में सर्किट हाउस का होना यहां की अहमियत बताने के लिए काफ़ी था. बदलते वक्त के साथ इस गांव में भी काफ़ी तब्दीलियां हुईं हैं, लेकिन पोतिसर की पहचान आज भी कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर से होती है. सांसद इसराफिल आलम ने बताया कि साल 1830 में रवींद्रनाथ टैगोर के दादा सर द्वारकानाथ टैगोर ने अंग्रेजों से यहां की जमींदारी ख़रीदी थी. नागौर नदी के किनारे बसा ये गांव राजधानी ढाका समेत देश के बाकी ज़िलों से भी रेल-सड़क मार्ग से जुड़ा है. पोतिसर से बारह किलोमीटर दूर अतरई रेलवे स्टेशन है. ब्रिटिश भारत के समय बने इस स्टेशन का अपना ऐतिहासिक महत्व है. महात्मा गांधी, प्रफुल्ल चंद्र रॉय, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और मोहम्मद अली जिन्ना समेत कई बड़े नेताओं के आगमन का गवाह रहा है अतरई स्टेशन. रवींद्रनाथ टैगोर पहली बार साल 1891 में पोतिसर आए थे. एक ज़मींदार परिवार से संबंध रखने के बावजूद ज़मींदारी के पेशे से कोई ख़ास लगाव उन्हें नहीं था. वे विशुद्ध प्रकृति प्रेमी थे. उनके मन में लोगों के प्रति करुणा का भाव था. शायद यही वजह है कि उन्होंने अपने समय की रूढ़ियों और विसंगतियों पर भी ज़ोरदार प्रहार किया. ज़मींदारी प्रथा के उस दौर में कोई रैयत-किसान अपने मालिक के समक्ष बैठने की हिम्मत नहीं कर सकते थे. ऐसे दौर में रवींद्रनाथ टैगोर पोतिसर में अपने रैयत-काश्तकारों से आमने-सामने बैठकर बातें करते थे. टैगोर ने जहां पतिसर में आम, पलाश और पीपल के पेड़ों की छांव में बैठकर कालजयी उपन्यास, लघु कहानियां एवं कविताओं की रचना की. वहीं, उन्होंने वहां के चासी-किसानों की समस्याओं को भी रेखांकित किया. साल 1909 में प्रकाशित चर्चित उपन्यास गोरा की रचना टैगोर ने पोतिसर में ही की थीं. साथ ही उन्होंने अपने मशहूर काव्य संग्रह चैताली में शामिल चौवन कविताएं, बिदाय ओभिशाप, लघु कहानी प्रतिहिंसा ठाकुर दा और निबंध इंग्रेज ओ भारतबासी यहीं लिखी गई थीं. रवींद्रनाथ टैगोर संग्रहालय के प्रभारी मोहम्मद सोहेल इम्तियाज़ बताते हैं, साल 1913 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उन्हें मिला ये सम्मान पोतिसर वासियों के लिए भी बेहद गर्व की बात थी. गांव वासियों के आग्रह पर रवींद्रनाथ टैगोर 1914 में पोतिसर आए और उन्होंने अपने रैयतों को संबोधित किया. नोबेल पुरस्कार में मिले एक लाख आठ हज़ार रुपये से किसानों की बेहतरी के लिए उन्होंने पोतिसर में कृषि बैंक और सहकारी समिति की स्थापना की. भूमिहीन किसानों के बच्चों की शिक्षा के लिए टैगोर ने यहां एक स्कूल भी बनाया, जो आज भी चल रहा है. पोतिसर से उनका बहुत लगाव था. यही वजह थी कि जब भी उन्हें मौका मिलता वे यहां आते. अपने एक पत्र में टैगोर ने लिखा है, पोतिसर आना आत्म साक्षात्कार जैसा अनुभव है. 76 साल की उम्र में गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर आख़िरी बार पोतिसर आए थे. तारीख़ थी 27 जुलाई 1937 और मौक़ा था बांग्ला त्योहार पुण्य उत्सव का. चार साल बाद (7 अगस्त 1941) उनका निधन हो गया. राजशाही यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर मोहम्मद अमीरूल मोमिन चौधरी बताते हैं, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की हुकूमत यहां बांग्ला भाषी आवाम पर जबरन उर्दू थोपना चाहती थी. उनकी नज़रों में हमारी भाषा और साहित्य का कोई मतलब नहीं था. उनकी ज्यादा दिनों तक नहीं चली और चौबीस साल बाद यानी 1971 में लाखों लोगों की कुर्बानियां और संघर्ष के बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ. नया देश बनने पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का सम्मान और बढ़ गया, जब उनके लिखे गीत आमार शोनार बांग्ला को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया. पोतिसर में तीन एकड़ जमीन पर जो संग्रहालय है, उसे कचहरीबाड़ी और कुटीबाड़ी भी कहते हैं. यहां कुल तेरह कमरे हैं और यही रवीद्रनाथ टैगोर की पुश्तैनी हवेली थी. इस संग्रहालय में उनके जीवन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण चीज़ें मौजूद हैं. जिस पलंग और कुर्सी पर कभी टैगोर बैठा करते थे, वो इस संग्रहालय में आज भी अच्छी स्थिति में है. इस संग्रहालय में उनसे जुड़ीं क़रीब तीन सौ चीज़ें हैं. रवींद्र सरोवर के किनारे उनकी एक भव्य प्रतिमा भी है, जिसकी डिजाइन राजशाही यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट के प्रोफ़ेसर कनक कुमार पाठक ने तैयार किया था. कचहरीबाड़ी संग्रहालय की कस्टोडियन नाहिद सुल्ताना बताती हैं कि इस मुद्रा में कविगुरु की प्रतिमा पूरे उप-महाद्वीप में नहीं है. पोतिसर स्थित कचहरीबाड़ी संग्रहालय को देखने के लिए देश-विदेश से हजारों लोग हर साल आते हैं. विशेषकर उनके जन्मदिन (7 मई) और पुण्यतिथि (7अगस्त) को. बांग्लादेश कला एवं संस्कृति मंत्रालय की तरफ से साल के इन दो तिथियों पर रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में यहां भव्य आयोजन होता है. बांग्लादेश अवामी लीग से जुड़े इसराफिल आलम यहां के स्थानीय सांसद हैं. वो बताते हैं, रवींद्रनाथ टैगोर की वजह से इस गांव की पहचान पूरे विश्व में है. दुनिया के अलग-अलग कोने से यहां लोग घूमने और उनके विषय में शोध करने के लिए आते हैं.

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