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सरकारी मीटिंग समय और पैसे की बरबादी

सरकारी मीटिंग समय और पैसे की बरबादी

Date : 10-Dec-2019
फिलिस हार्टमैन को पता है कि दफ़्तरों में होने वाली अंतहीन बैठकों से गुज़रना क्या होता है. एचआर की उनकी पिछली नौकरी में मैनेजर इतनी बैठकें करते थे कि वहां लोगों को नींद आ जाती थी या वो जान-बूझकर देर से आते थे. रोज़ाना कई घंटे गैर ज़रूरी बैठकों में ख़र्च करने के बाद हार्टमैन को अक्सर काम निपटाने के लिए ओवरटाइम करना पड़ता था. हार्टमैन कहती हैं, मुझे जितने घंटे काम करना चाहिए था, मैं वास्तव में उससे ज़्यादा काम कर रही थी. वह पेनसिल्वेनिया के पिट्सबर्ग में पीजीएचआर कंसल्टिंग की संस्थापक और प्रेसिडेंट हैं. वह सोसाइटी फ़ॉर ह्यूमेन रिसोर्स मैनेजमेंट की विशेषज्ञ पैनलिस्ट भी हैं बैठकों से हताश होने वालों में हार्टमैन अकेली नहीं हैं. अमरीका में रोजाना 1.10 करोड़ से 5.50 करोड़ बैठकें होती हैं जिन पर कंपनियों के कार्मिक बजट का 7 से लेकर 15 फ़ीसदी तक ख़र्च होता है. हर हफ़्ते कर्मचारी बैठकों पर करीब 6 घंटे ख़र्च करते हैं, जबकि मैनेजर इस पर औसतन 23 घंटे बिताते हैं. कुछ फ़ैसले लेने और रणनीति बनाने के लिए बैठकें ज़रूरी हैं, लेकिन कुछ कर्मचारी उनको दिन का सबसे फालतू हिस्सा मानते हैं. इसमें न सिर्फ़ सैकड़ों अरब डॉलर की बर्बादी होती है, बल्कि फालतू की बैठकों के बाद काम पर दोबारा ध्यान लगाने में भी कर्मचारियों का वक़्त ज़ाया होता है. संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक इसे मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम (MRS) कहते हैं. औपचारिक नौकरी करने वाले लगभग सभी लोग इस तजुर्बे से गुज़रते हैं. बैठक के बाद थकान महसूस करना नई बात नहीं है. हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने इसे जांच के लायक माना. मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम किसी संगठन की दक्षता और कर्मचारियों के कल्याण से जुड़ा है, तो मनोवैज्ञानिकों ने भी इसके कारण और निदान तलाशने शुरू कर दिए. MRS को मोटे तौर पर मानसिक और शारीरिक थकान से उबरने की धीमी रफ़्तार के रूप में समझा जा सकता है. उटाह यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जोसेफ ए एलेन का कहना है कि कर्मचारी जब फिज़ूल की बैठकों में हिस्सा लेते हैं तो उनका दिमाग ख़र्च होता रहता है. मीटिंग अगर बहुत लंबी खिंच जाए तो सहनशक्ति घटने लगती है. कर्मचारी उसमें मन से शरीक नहीं हो पाते और वह सिर्फ़ एकतरफा व्याख्यान भर रह जाता है. इससे उबरने में समय लगता है, लेकिन बार-बार ऐसा होने से उत्पादकता पर बुरा असर पड़ता है. 1989 में डॉ. स्टीवन हॉबफ़ोल ने संसाधनों के संरक्षण का सिद्धांत दिया था जो कहता है कि जब इंसान के संसाधनों को ख़तरा होता है या वे ख़त्म होने लगते हैं तब मनोवैज्ञानिक तनाव पैदा होता है. जब संसाधन कम होते हैं तो आदमी उनको बचाने में लग जाता है. दफ़्तर के कुछ कर्मचारियों का सबसे कीमती संसाधन उनका ध्यान, सतर्कता और प्रेरणा होती है. बैठकों के बाद उनकी उत्पादकता में अचानक गिरावट आती है, क्योंकि उनको उबरने में समय लगता है. किसी भी व्यक्ति को एक काम से दूसरे काम- जैसे मीटिंग में बैठने से लेकर सामान्य काम करने तक- में अपना दिमाग शिफ़्ट करना पड़ता है. एलेन का कहना है कि हमें पिछले काम से ख़ुद को अलग करना चाहिए और मानसिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अगले काम पर ख़र्च करना चाहिए. अगर हम पहले ही ख़तरनाक स्तर तक खाली हो चुके हैं तो अगले काम में मन लगाना और कठिन हो सकता है. हताश करने वाली बैठकों के बाद लोगों को इंटरनेट पर वक़्त बिताना, कॉफी पीने चले जाना, सहकर्मियों को रोककर उनको मीटिंग के बारे में बताना आम है. बैठकों की थकान से उबरने की सबकी क्षमता अलग-अलग होती है. कुछ लोग इससे ज़ल्दी उबर सकते हैं तो कुछ लोग दिन ख़त्म होने तक इससे नहीं उबर पाते. एलेन का अनुमान है कि सामान्य बैठकों के बाद उबरने में 10 से 15 मिनट लगते हैं, लेकिन मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम की स्थिति में इसमें औसतन 45 मिनट लग सकते हैं. स्थिति तब और ख़राब होती है जब किसी कर्मचारी को आधे-आधे घंटे के अंतराल पर कई बैठकों में हिस्सा लेना पड़ता है. एक के बाद एक कई फालतू बैठकों के बाद वे किसी काम के नहीं रह जाते. एलेन ने जोसेफ म्रोज़ और नेब्रास्का ओमाहा यूनिवर्सिटी में उनके सहकर्मियों के साथ एक रिपोर्ट तैयार की है. इसमें MRS के जाल से बचने के सबसे बेहतर उपायों और दफ़्तर में क्या करें क्या न करें का संक्षिप्त चेकलिस्ट शामिल किया गया है. म्रोज़ और उनकी टीम ने यह सूची बनाने के लिए 200 शोध-पत्रों का अध्ययन किया. उनके पास अब MRS का आधुनिक निदान हो सकता है. म्रोज़ सबसे पहले ख़ुद से यह सवाल करने का सुझाव देते हैं कि क्या हमारी बैठकें ज़रूरी हैं. यदि एजेंडे में शामिल चीज़ें आसानी से समझी जा सकती हैं या वे सिर्फ़ सूचनाएं साझा करने के लिए हैं तो बेहतर हो कि समूह में एक ई-मेल भेज दिया जाए. म्रोज़ कहते हैं, दूसरी चीज़ जो मैं हमेशा कहूंगा कि मीटिंग को जितना संभव हो छोटा रखें. यदि लोगों के पास किसी तरह का तत्काल इनपुट नहीं है तो उसे बाद में देखा जा सकता है. उन्हें घंटे भर लंबी मीटिंग में बैठने की ज़रूरत नहीं है. नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर क्लिफ़ स्कॉट का कहना है कि जब कर्मचारियों को समूह में किसी बैठक में शामिल होने के लिए बुलाया जाता है तब भी वे उसे उबाऊ महसूस करते हैं. फिज़ूल की बैठक के बाद भावनाएं जाहिर करने, शिकायत करने और फिर से काम में ध्यान लगाने में उनका कीमती समय लगता है. यह MRS का मुख्य नुकसान है. समय के साथ कर्मचारी ख़ुद को ऐसी फालतू बैठकों में अधिक बंधा हुए पाते हैं और मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम में ख़र्च होने वाले घंटे अपमानजनक लगने लगते हैं. हार्टमैन को लगता है कि म्रोज़ की तरकीबें कारगर हैं और उनसे गैर ज़रूरी बैठकों का बोझ कम करने में उनको मदद मिली है. अब वह कोई बैठक बुलाती हैं तो उनमें न सिर्फ़ ज़रूरी कर्मचारी होते हैं, बल्कि हर उस विभाग के प्रतिनिधि भी होते हैं जिनका बैठक के एजेंडे से ताल्लुक हो. वह फ़ैसले लेने से पहले गैर-विशेषज्ञों से भी इनपुट लेती हैं. हार्टमैन जैसे मैनेजर अपने सहकर्मियों से अधिक समर्थन और सहयोग हासिल कर सकते हैं. लेकिन बैठकों को ट्रैक पर रखने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मैनेजरों की नहीं होती. म्रोज़ का कहना है कि बैठकों में शामिल लोगों का रुख नकारात्मक हो तो वे सुनियोजित बैठकों को भी पटरी से उतार सकते हैं. यदि अन्य लोग उनकी आलोचना से सहमत होना शुरू कर देते हैं तो शिकायत चक्र शुरू हो जाता है और लीडर के लिए सबको वापस पटरी पर लाना मुश्किल हो जाता है. यदि कोई संगठन म्रोज़ और एलेन के सभी 22 सुझावों को अपनाए तो बैठकों की संख्या बहुत घट जाएगी. बैठक छोटे होंगे तो उसमें कर्मचारियों की भागीदारी भी बढ़ेगी. विशेषज्ञों को लगता है कि भविष्य में यही मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम के मामलों का समाधान होगा. MRS से बचाव के कोई भी उपाय अभी प्रयोगसिद्ध नहीं है, फिर भी एलेन का कहना है कि कुछ तरकीबें मूड को नकारात्मक से सकारात्मक में बदल सकती हैं. यह बहुत आसान है. ऐसी जगह ढूंढ़िए जहां आपको ख़ुशी मिलती हो. वहां जाइए और लौटकर सीधे काम में लग जाइए. इससे रिकवरी की रफ़्तार बढ़ जाएगी. द सरप्राइजिंग साइंस ऑफ़ मीटिंग्स के लेखक स्टीवन रोगेलबर्ग का कहना है कि टीम लीडर सहकर्मियों के बहुमूल्य समय का रक्षक होता है. उसमें कर्मचारियों की सहन-शक्ति और संभावित ख़तरों को देखने का कौशल हो तो टीम लीडर सीमित अवधि में उनको मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम से बचा सकते हैं. एलेन का कहना है कि संगठनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है बैठकों के बारे में लचीला रुख. कर्मचारियों के समय को प्राथमिकता देकर कंपनियां समस्या की जड़ को ही समाप्त कर सकती हैं. एलेन कहते हैं, हमें समाजीकरण की वर्षों पुरानी स्क्रिप्ट और बैठकों को दुख की जगह मानना बंद करना होगा. बैठकें कुछ हासिल करने की जगह होनी चाहिए. हमें बस लोगों को इस बात के लिए तैयार करना है कि वे असहाय नहीं है, इसका निदान हो सकता है. कुछ चीज़ें जिनको आप पहले से जानते हैं वे आपके कामकाजी जीवन को बेहतर बना सकती हैं- एक बार में केवल एक मीटिंग.

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