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अनुच्छेद 370 हटाना: लोकभावना के अनुरूप

अनुच्छेद 370 हटाना: लोकभावना के अनुरूप

Date : 06-Aug-2019
राज्यसभा के अपने ऐतिहासिक संबोधन में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि, हमें पांच वर्ष दें और हम कश्मीर को देश का सबसे विकसित राज्य बना देंगे अपने सुस्पष्ट व मुखर तर्कों से गृहमंत्री ने पिछले कुछ दिनों से लग रहे क़यासों और मीडिया, सोशल मीडिया और टिप्पणीकारों के बीच कश्मीर के हालात को लेकर व्याप्त भ्रम और आशंकाओं का निवारण कर दिया. चुनावों के कुछ परिणाम होते हैं और भारत के सत्तारूढ़ दल भाजपा का सदैव से ही अनुच्छेद 370 को हटाने का स्पष्ट इरादा रहा है जो कि जनसंघ विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार एक ऐसा अनुच्छेद था जो कश्मीर राज्य के लोगों को राष्ट्रीय और भावनात्मक एकात्मता की अनुभूति से रोकता था. स्वतंत्रता के 72 वर्षों के उपरांत बड़े स्तर पर लोकभावना, लोगों के मन और मस्तिष्क में अलगाववाद उपजाने वाले अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के पक्ष में है. एक-एक करके सारे राजनैतिक दल (कुछ दलों को छोड़कर) जो कि सत्ता प्रतिष्ठान के विपक्ष में खड़े थे उन्होंने भी राजनीतिक मतभेदों को किनारे रखकर, सरकार का समर्थन किया. आम आदमी पार्टी, जिसके द्वारा अक्सर लेफ्टिनेंट गवर्नर का विरोध करते हुए पूर्ण राज्य की मांग की जाती है, ने कहा कि आतंकवाद को कुचलने और देश की भौगोलिक अखंडता हेतु वह भी सरकार के निर्णय का समर्थन करती है. एक आम भारतीय के लिए इस ऐतिहासिक दिन संसद में हुई बहस इस बात को स्पष्ट रूप से रेखांकित कर रही थी कि कौन सा राजनैतिक दल किस पाले में खड़ा है और यह कहा जा सकता है कि जनता सबको तौल रही थी. कांग्रेस के चीफ़ व्हिप भुवनेश्वर कलिता ने यह कहते हुए राज्यसभा से इस्तीफ़ा दे दिया कि कांग्रेस द्वारा इस अनुच्छेद को हटाये जाने का विरोध राष्ट्रीय भावना के विपरीत और आत्मघाती है. लंबे समय से जम्मू और कश्मीर को एक विवाद या समस्या की तरह प्रस्तुत किया गया है - इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि कैसे मात्र सात प्रतिशत भू-भाग के मुद्दे को बढ़ा चढ़ा कर संपूर्ण राज्य बना दिया जाता है, पूरा कथानक उच्च ध्वनियों और विवादास्पद शब्दावलियों से परिपूर्ण रहा है. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ब्रिटिश इंडिया के किसी भू-भाग की स्वतंत्रता की ओर इंगित नहीं करता बल्कि दो भिन्न और स्वतंत्र भू-भागों भारत और पाकिस्तान की स्थापना की बात करता है जिसका स्वरूप ब्रिटिश इंडिया और रियासतों के अंतर्गत आने वाला भू-भाग और इसके लोग लेंगे. स्वतंत्रता पूर्व सभी चर्चाओं में सक्रिय भूमिका निभाने वाले महाराजा हरि सिंह ने स्वतंत्रता का कभी कोई दावा नहीं किया. संविधान सभा की चर्चा के दौरान जम्मू-कश्मीर के चार सदस्यों ने हिस्सा लिया और अन्य शासकों की तरह ही महाराजा हरि सिंह ने भारतीय संविधान का पालन करते हुए अपने हस्ताक्षर किए. अनुच्छेद 370 लंबे समय से भारतीय एकता और कश्मीर को भारत से अखंड रूप से जोड़ने की राह में कांटा बना रहा है. इस विशेष दर्जे ने घाटी की परिस्थितियों को सुधारने के लिए शायद ही कुछ किया है और राज्य के दूसरे हिस्सों- जम्मू और लद्दाख को भी पीछे घसीटने का कार्य किया है. कश्मीर समस्या ने राज्य में विकास और अधिकार की सभी बातों पर ग्रहण लगा दिया है और इसका प्रयोग श्रीनगर के सत्ताधारियों द्वारा अपनी मांगों की पूर्ति के लिए केंद्र को बंदी बनाने के लिए किया गया है. जैसा कि अमित शाह ने संसद में कहा कि मात्र तीन परिवारों द्वारा घाटी का भविष्य निर्धारण होता रहा है जिस प्रक्रिया में वह स्वयं तो संपन्न होते रहे परंतु आम जनता को लाभ से दूर रखा गया. 2016 में कराये गये एक वित्तीय विश्लेषण के अनुसार राज्यों को दी जाने वाली कुल केंद्रीय सहायता का 10% जम्मू-कश्मीर को प्राप्त हुआ जबकि 2000 से 2016 की इसी अवधि के मध्य देश की सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश का हिस्सा मात्र 8.2 % रहा है. जहाँ कश्मीर में मिलने वाली सहायता प्रति व्यक्ति 91,300 रुपए थी, वहीं उत्तर प्रदेश के लिए यह मात्र 4300 रुपए प्रति व्यक्ति थी. इस असंतुलन को मात्र विशेष परिस्थितियों का हवाला देकर समझाया नहीं जा सकता, जबकि केंद्रीय महालेखाधिकारी ने यह उल्लेखित किया है कि ऑडिट के दौरान संबंधित प्रश्न राज्य सरकार की तरफ़ से नियमित रूप से अनुत्तरित रह जाते थे. एक तरफ़ जहाँ जम्मू और कश्मीर में वित्तीय अनियमितताएं रही हैं वहीं भेदभाव भी प्रत्यक्ष होता रहा है. एक कश्मीरी महिला जो राज्य के बाहर विवाह करती है उसे उत्तराधिकार और संपत्ति संबधी कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं थे. निकट अतीत में, अप्रैल 2019 में ही जम्मू के वाल्मीकि समुदाय को समानता हेतु कोर्ट में याचिका दाख़िल करनी पड़ी थी. अधिकारों के इस संघर्ष को प्रचलित कथानक में कहीं भी स्थान नहीं प्राप्त हो पाया है तथा कश्मीर के संबंध में बहुसंख्यक भावनाएँ कश्मीर समस्या वाले तर्क के आस पास सिमट जाती हैं. साथ ही कश्मीरी पंडितों के घाटी से निष्कासन पर मानवाधिकार के गलियारों में कोई प्रतिध्वनि सुनाई नहीं पड़ती है. क्या भारत ने कश्मीर मामले में यूएन प्रस्तावों को ताक पर रखा? भाजपा द्वारा सही समय पर लोकभावना को साध लिया गया जो कि तीव्र रूप से अनुच्छेद 370 को हटाने के पक्ष में है. पिछले कुछ वर्षों में आतंकी गतिविधियों में कमी आई है यह ग़ुलाम नबी आज़ाद द्वारा भी स्वीकार किया गया, जो कि विडंबनापूर्ण ढंग से कश्मीर में सेना भेजे जाने के विरोध में बोल रहे थे. यह स्पष्ट है कि अनुच्छेद 370 से आतंकवाद को रोकने में कोई सहायता नहीं मिली. बल्कि इससे घाटी में असंतोष फैला है, जिसका राज्य के नैरेटिव पर असंतुलित नियंत्रण है. हालांकि यह कहना अनुचित होगा की यह एक महज़ लोकलुभावन फ़ैसला है, बीजेपी और इसका पूर्ववर्ती जनसंघ अनुच्छेद 370 को हटाने को लेकर तबसे दृढ़प्रतिज्ञ रहे हैं जब उनकी सरकार भी नहीं थी, और उन्होंने वही किया है. यह बहुत संभव है कि जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह के कहे अनुसार राज्य की पार्टियों द्वारा इस क़दम को चुनौती दी जायेगी परन्तु यह भी निश्चित है कि यह क़दम सोच समझकर और विधिक सलाह के उपरांत उठाया गया है तथा देश के सर्वोच्च न्यायालयों में इसका समुचित बचाव कर लिया जायेगा. अंत में यह कहा जा सकता है कि यह एक ऐसा क़दम था जिसकी मांग लंबे समय से थी तथा इसे उठाने के लिए मात्र राजनैतिक इच्छा और साहस ही नहीं वरन् अप्रतिम दृढ़निश्चय की आवश्यकता थी.

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