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डेटिंग: शर्मिंदगी का फ़ायदा उठाकर कॉल सेंटरों का धंधा फल फूल रहा

डेटिंग: शर्मिंदगी का फ़ायदा उठाकर कॉल सेंटरों का धंधा फल फूल रहा

Date : 01-Nov-2019
25 साल की अंकिता (बदला हुआ नाम) अंग्रेजी में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद दो साल से बेरोजगार थी. ऐसे में उन्हें जब एक सहेली ने 20 हजार रुपए महीने की नौकरी का प्रस्ताव दिया तो उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ. सहेली ने बताया था कि उन्हें कोलकाता के संभ्रांत इलाके अलीपुर में एक कॉल सेंटर में काम करना है. अंकिता ने दो दिन बाद ही सहेली के साथ वहां जाकर काम शुरू कर दिया. जब अंकिता को पता चला कि उन्हें क्या काम करना है तो उनकी आंखें हैरत से खुली रह गईं. लेकिन वह एक ऐसे दलदल में फंस चुकी थीं जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था. अंकिता ने अपने काम के बारे में अपने घरवालों को भी नहीं बताया था. आखिर में दिवाली से ठीक पहले विशाखापत्तनम पुलिस ने कोलकाता के साइबर क्राइम विभाग के अधिकारियों की एक टीम के साथ उनके दफ्तर पर दबिश डाल कर उसके साथ की 23 युवतियों समेत 26 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया. उसके बाद ही अंकिता के घरवालों और पड़ोसियों को पता चला कि आख़िर वह करती क्या थीं. किस अपराध में हुई गिरफ़्तारी? दरअसल, अंकिता और उसके साथ काम करने वाली दूसरी युवतियों पर आरोप है कि वो युवकों को महिलाओं के साथ डेटिंग का लालच देकर अपने जाल में फंसाती थीं. युवकों को कॉलेज छात्राओं के अलावा मॉडल और बांग्ला फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्रियों के साथ डेटिंग करने का लालच दिया जाता था. इसके एवज़ में उन युवकों से फ़ीस के तौर पर अच्छी खासी रकम जमा करवाई जाती थी. यह रकम कई मामलों में लाखों में भी होती थी. कैसे काम करती थी यह फ़र्ज़ी डेटिंग साइट? कोलकाता में साइबर क्राइम विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी, जो इन कॉल सेंटरों पर छापा मारने वाली टीम में शामिल रहे हैं, उन्होंने कोलकाता में मौजूद  सहयोगी एम तिवारी को बताया,कॉल सेंटर चलाने वाले लोग फ़र्ज़ी वेबसाइट पर कई महिलाओं की फ़ेक प्रोफ़ाइल बना कर अपलोड कर देते थे. इसके जरिए युवाओं और दूसरे लोगों को सदस्यता का ऑफ़र दिया जाता था. वहीं विशाखापत्तनम में साइबर क्राइम के सर्किल इंस्पेक्टर गोपीनाथ ने बताया कि इन डेटिंग एप में रजिस्ट्रेशन के लिए शुरुआत में 1000 रूपये मांगे जाते हैं. पुलिस अधिकारी ने बताया, वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन के बाद कोई युवती फोन पर युवक से संपर्क करती है और बताती है कि वह चार लाख रुपए जमा करने के बाद ही अपनी पसंद की महिला के साथ डेट पर जा सकते हैं. उन्हें भरोसा दिया जाता था कि जब चाहे चार लाख की रकम उन्हें वापस कर दी जाएगी. इतना ही नहीं वेबसाइट पर युवकों को लालच देने के लिए सिल्वर, गोल्ड और प्लेटिनम कार्ड के अलग-अलग ऑफ़र भी दिए जाते थे. ये ऑफ़र युवकों की ख़र्च करने की क्षमता पर आधारित होते थे. इन कार्ड की रेंज दो लाख से 10 लाख के बीच होती थी. अगर कोई युवक प्लेटिनम कार्ड इस्तेमाल करता तो उन्हें डेटिंग, बाहर घूमना, फ़िल्मे दिखाना और सेक्स करने का लालच दिया जाता था. निश्चित रकम जमा करने के साथ ही यूजर को एक युवती की कॉल आती और वह कुछ वक़्त तक उसके साथ बातचीत करती लेकिन फिर कुछ समय बाद कॉल आना बंद हो जाता. पुलिस के मुताबिक, वेबसाइट पर अपलोड की गई तमाम प्रोफ़ाइल फ़र्ज़ी होती थी. पैसे जमा करने के बाद बार-बार फ़ोन करने पर भी जब संबंधित व्यक्ति अपनी पसंदीदा महिला से नहीं मिल पाते थे तब उनको अपने ठगे जाने का पता चलता था. जब कोई शख़्स अपने पैसे वापस मांगता तो उन्हें कहा जाता कि वो पांच लाख रुपए और जमा करें, इसके बाद उसमें से 10 हज़ार रुपए काटकर पूरी रकम वापस कर दी जाएगी. इस तरह कुछ लोगों से तो दो-तीन किश्तों में कई लाख रुपए ठग लिए जाते थे. पुलिस के अनुसार ऐसे मामले बहुत जल्दी सामने नहीं आते क्योंकि अधिकतर लोग शर्मिंदगी की वजह से अपने साथ हुई लाखों की ठगी के बाद भी चुप्पी साधे रहते हैं. लोगों की इसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाकर इन कॉल सेंटरों का धंधा तेज़ी से फल-फूल रहा था. पुलिस को कैसे मिली जानकारी? विशाखापत्तनम पुलिस से इस मामले की शिकायत करने वाले एक व्यक्ति से तो युवतियों की लच्छेदार बातों में फंसकर लगभग 18 लाख रुपए उनके बताए बैंक खातों में ट्रांसफ़र कर दिए थे. पुलिस के अनुसार उन्होंने 6 महीने तक इस मामले की छानबीन की और उसके बाद उन्होंने कॉल सेंटर की लोकेशन का पता लगाया. इसके साथ ही आईपी एड्रेस, व्हट्सएप डेटा और फ़ोन कॉल्स को भी खंगाला गया. पुलिस ने बताया कि यह वेबसाइट गो डैडी के डोमेन पर रजिस्टर्ड थी. पुलिस के मुताबिक गिरफ़्तार की गई अधिकतर लड़कियों ने कॉलेज की पढ़ाई भी पूरी नहीं की है. विशाखापत्तनम पुलिस के साइबर क्राइम विभाग के इंस्पेक्टर रवि कुमार ने यहां पत्रकारों को बताया, ऐसी फ़र्ज़ी डेटिंग वेबसाइटों का धंधा पूरे देश में चल रहा है. ज़्यादातर मामलों में इनका संचालन कॉल सेंटरों के ज़रिए किया जाता है. पुलिस से कैसे बच जाती हैं ये कंपनियां? पुलिस के अनुसार ये फ़र्ज़ी कंपनियां अपने दफ़्तर लगातार बदलती रहती हैं जिससे पुलिस उनकी लोकेशन तलाश नहीं पाती. इसके अलावा वो बेसिक मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं ताकि उन्हें ट्रैक नहीं किया जा सके. जैसे ही इन लोगों को शक़ होता है कि पुलिस उन तक पहुंचने वाली है वो अपने सिमकार्ड को नष्ट कर नया नंबर चालू कर देते हैं. पुलिस ने यह भी पता लगाया है कि एक ही कंपनी की कई शाखाएं बनी हैं. पुलिस ने गो डैडी के डोमेन पर बनी क़रीब 6 वेबसाइटों को बंद किया है. इसके अलावा पुलिस ने 40 बेसिक मोबाइल फ़ोन, 15 स्मार्ट फ़ोन और तीन लैपटोप भी बरामद किए हैं. पुलिस का कहना है कि ये वेबसाइटें देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रही हैं, जिसमें तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और महाराष्ट्र प्रमुख हैं. कोलकाता पुलिस के साइबर क्राइम विभाग का कहना है कि हाल के वर्षों में कोलकाता ऐसी फर्जी वेबसाइटों के संचालन के प्रमुख केंद्र के तौर पर उभरा है. बीते साल भी ऐसे ही एक मामले में पांच लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. इसके अलावा बीते महीने से अब तक अमरीका और इंग्लैंड के कई लोगों को करोड़ों का चूना लगाने के आरोप में कम से कम तीन कॉल सेंटरों में काम करने वाले डेढ़ दर्जन लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है. ठगी के शिकार युवकों से ज़्यादतर व्हाट्सऐप काल के ज़रिए ही बात की जाती थी. जांच टीम को कॉल सेंटर संचालकों के दो दर्जन से ज़्यादा बैंक खातों के बारे में भी पता लगा है. उनकी जांच की जा रही है. कोलकाता पुलिस के मुख्यालय लालबाजार में एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, इस नेटवर्क का जाल पूरे देश में फैला है. अनुमान है कि इसने अब तक हज़ारों लोगों से करोड़ों रुपए की ठगी की है. उनसे इस बारे में पूछताछ की जा रही है.

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