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भारतीय अर्थव्यवस्था मे खतरनाक विरोधाभास

भारतीय अर्थव्यवस्था मे खतरनाक विरोधाभास

Date : 21-Apr-2019
भारतीय अर्थव्यवस्था में एक गहरा विरोधाभास देखा जा रहा है। नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की ग्रोथ रेट 6.6 प्रतिशत है। पिछले डेढ़ दशकों में अपने ही प्रदर्शन की तुलना में यह कमजोर है, लेकिन वैश्विक परिदृश्य में तुलनात्मक दृष्टि से इसे प्रशंसनीय कहा जाएगा। बहरहाल, कई अन्य महत्वपूर्ण संसूचकों पर नजर डालें तो अर्थव्यवस्था की स्थिति सिरे से निराशाजनक लगती है। फरवरी 2019 में आए आंकड़े बताते हैं कि कोर सेक्टर में केवल 2.1 प्रतिशत वृद्धि हुई है और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक मात्र 0.1 प्रतिशत ऊपर गया है। भारत की निर्यात वृद्धि पिछले पांच वर्षों में शून्य रही है, जो 1991 के बाद से शायद ही कभी हुआ हो। भारत की बचत और निवेश की दरें 2003 में 30 प्रतिशत की सीमा पार करने के बाद 2008 में 35 प्रतिशत तक गईं, जिससे भारत पूर्वी एशिया की तीव्र वृद्धि वाली अर्थव्यवस्थाओं जैसा लगने लगा। लेकिन अभी ये 30 प्रतिशत से नीचे चली गई हैं। नौकरियों की किल्लत हमारा कृषि क्षेत्र भी लड़खड़ा रहा है, लेकिन भारत पर नजर रखने वालों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय देश में नौकरियों की स्थिति है। इस बारे में आधिकारिक आंकड़े जारी करने पर रोक लगा दी गई है, लेकिन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनमी के विस्तृत अध्ययन तथा बीच-बीच में सरकारी नौकरियों के लिए उमड़ने वाली आवेदनकर्ताओं की प्रचंड तादाद से यह स्पष्ट है कि हालात बहुत खराब हैं। भारत की शानदार ग्रोथ और इन संसूचकों को एक साथ कैसे देखा जाए? चौंकाएंगे ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के परिणाम, जनता मोदी के पक्ष विरोधाभास की व्याख्या बढ़ती असमानता के जरिये की जा सकती है। देश की आर्थिक वृद्धि चोटी के अमीरों के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जबकि समाज का व्यापक हिस्सा- कामगार तबके, किसान, छोटे व्यापारी बड़ी मुश्किल से इंच-इंच आगे बढ़ पा रहे हैं। ऐसा कैसे हुआ और इससे उबरने के लिए भारत क्या करे? यहां यह मानना जरूरी है कि भारत में कई अच्छी नीतिगत पहलकदमियां ली गई हैं तो 2016 की नोटबंदी जैसी कुछ गलतियां भी हुई हैं। संसार भर के विशेषज्ञों में अब इस बात को लेकर सहमति सी बन गई है कि नोटबंदी एक भारी भूल थी। इसने छोटे व्यापारियों, मजदूरों और किसानों पर काफी नकारात्मक प्रभाव डाला, जबकि अमीरों को कमोबेश अप्रभावित छोड़ दिया। दिलचस्प बात यह है कि 2016-17 के आर्थिक सर्वे में वित्त मंत्रालय ने 1982 के बाद से अचानक नोटबंदी करने वाले जिन देशों की सूची दी है, वे हैं- उत्तरी कोरिया, वेनेजुएला, म्यांमार, इराक, रूस, सोवियत संघ, घाना, ब्राजील और साइप्रस। यह सूची स्वयं नोटबंदी की विफलता को व्याख्यायित करती हुई सी लगती है। पॉलिसी बनाने में गलतियां हो जाती हैं। इन गलतियों को समय से स्वीकार करके इन्हें दुरुस्त करना प्रफेशनल होने की निशानी है। इससे देश में भरोसा कायम रहता है। पहलकदमियों में भी दिखती रही है। जैसे नई आरक्षण नीति को लें, जिसके तहत ‘आर्थिक रूप से कमजोर’ तबके को सरकारी नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण मिलना है। इसका दायरा कुछ इस तरह तैयार किया गया है कि इसमें देश की सबसे अमीर 5 फीसदी आबादी को छोड़ कर सभी आ जाते हैं। मगर इसमें भी जो चीज ज्यादा चर्चा में नहीं आई, वह है यह प्रावधान कि अनुसूचित और अन्य वंचित जातियों के प्रत्याशी ये नौकरियां हासिल नहीं कर पाएंगे। यूं कहें कि नई आरक्षण नीति ने वंचित जातियों को उन दस फीसदी नौकरियों की दौड़ से बाहर कर दिया जो पहले उनकी पहुंच में हुआ करती थीं। व्यापार एक ऐसा क्षेत्र है जहां भारत को स्वाभाविक बढ़त हासिल है। चीन में बढ़ती मजदूरी को देखते हुए हमारे लिए निर्यात बढ़ाना खास मुश्किल नहीं होना चाहिए था। इससे रोजगार पैदा होते और खेती पर भी इसका अच्छा असर होता। लेकिन निर्यात में बढ़ोतरी श्रम सस्ता होने भर से नहीं हो जाती। इसके लिए सुविचारित नीतियों की, मसलन विनिमय दरों के प्रबंधन की भी आवश्यकता होती है। संपन्न देशों की ही तरह भारत भी चलायमान विनिमय दर व्यवस्था फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट सिस्टम को लेकर प्रतिबद्ध है। लेकिन फ्लोटिंग सिस्टम का मतलब यह नहीं होता कि कोई हस्तक्षेप ही न किया जाए। इस बारे में काफी रिसर्च उपलब्ध है, जिसका उचित इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सरकार की जिस एक पहलकदमी का मैंने समर्थन किया है और वह है नौकरशाही से जुड़े खर्चों में कटौती। वर्ल्ड बैंक के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स के मुताबिक भारत 2016 में 189 देशों में 130वें स्थान से 2018 में 190 देशों में सीधे 77वें नंबर पर आ गया। इससे भारत को रोजगार और निर्यात बढ़ाने में खासी मदद मिलनी चाहिए थी। मगर पीछे मुड़ कर देखने से साफ हो जाता है कि वास्तव में हुआ क्या। नौकरशाही पर खर्च में व्यापक कटौती करने के बजाय खास तौर पर उन दस मदों में ही खर्चे कम किए गए, जिन्हें आधार बनाकर विश्व बैंक किसी देश की नौकरशाही पर आने वाले खर्चों का आकलन करता है। इस तरह की चुनिंदा छेड़छाड़ ने भारत सरकार को वर्ल्ड बैंक की पुरजोर तारीफ तो दिला दी, लेकिन इससे ज्यादा कुछ भी हासिल नहीं किया जा सका। बांटने वाली नीति आखिर में, मैं यही कहना चाहूंगा कि आर्थिक नीतियों से जुड़ी ज्यादातर गड़बड़ियां थोड़े या इससे कुछ ज्यादा समय के लिए ही मुश्किलें पैदा करती हैं। भारत के लिए दीर्घकालिक चिंता की बात यह है कि यहां कुछ खास समूह लोगों को बांटने वाली बातें प्रचारित कर रहे हैं। भारत में विभिन्न जातियों के हिंदू ही नहीं, ईसाई, यहूदी, मुस्लिम, पारसी, सिख, बौद्ध आदि भी रहते हैं। सवर्ण हिंदुओं और बाकी समुदायों के बीच दरार डालने की यह कोशिश पूरे देश का मनोबल तोड़ सकती है और विकास को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकती है।

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