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कांग्रेस के लिए नेहरू-गांधी बोझ भी है और बड़ी संपत्ति भी,  विनोद शर्मा राजनीतिक विश्लेषक

कांग्रेस के लिए नेहरू-गांधी बोझ भी है और बड़ी संपत्ति भी, विनोद शर्मा राजनीतिक विश्लेषक

Date : 11-Aug-2019
नई दिल्ली 11 अगस्त । शनिवार को देर रात तक चली कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद सोनिया गांधी को पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया गया. बैठक के बाद कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने मीटिया को बताया उन्हें तब तक के लिए पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुना गया है जब तक एक पूर्णकालिक अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो जाता. बैठक में अध्यक्ष पद से दिया गया राहुल गांधी का इस्तीफ़ा भी स्वीकार कर लिया गया. कार्यसमिति की बैठक से पहले ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि किसी अनुभवी और ग़ैर-गांधी परिवार के शख़्स को चुना जाएगा. लेकिन बैठक ख़त्म हुई और कोई नया नाम सामने नहीं आया. तो क्या कांग्रेस के पास अब वाकई कोई नाम नहीं है या फिर नेहरू-गांधी परिवार के बिना उनका काम नहीं चलता? कांग्रेस की हालत खस्ता है. कांग्रेस के लिए नेहरू-गांधी परिवार एक बहुत बड़ा बोझ भी है और बहुत बड़ी संपत्ति भी. आज के दिन किसी और का नाम किसी को लेने की हिम्मत भी नहीं हुई होगी. ये बता भी नहीं रहे हैं कि किसी और का नाम चला भी या नहीं चला. सोशल मीडिया पर महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेताओं में से एक मुकुल वासनिक का नाम आ रहा था. क्या उनके नाम पर बैठक में चर्चा नहीं हुई होगी? बैठक में किसी समिति में उनके नाम का प्रस्ताव ही नहीं दिया गया या फिर समिति में उनके नाम का प्रस्ताव आया तो शायद उसे समर्थन नहीं मिला. महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेताओं में से एक मुकुल वासनिक के राजनीतिक जीवन की शुरुआत एनएसयूआई से हुई थी. उन्होंने बुलढाना की अपनी पारंपरिक सीट से 1984, 1991 और 1998 में लोकसभा चुनाव जीता था. इस समय वह कांग्रेस महासचिव हैं और गांधी परिवार के काफ़ी क़रीबी समझे जाते हैं. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि सोनिया गांधी के तत्वाधान में क्या चुनाव होंगे और क्या कोई नया अध्यक्ष बनेगा. या फिर सोनिया गांधी ही अंतरिम अध्यक्ष बन रहेंगी और फिर वही पूर्णकालिक अध्यक्ष बनेंगी. सवाल ये भी उठता है कि अगर पार्टी एक कार्यकारी अध्यक्ष भी नहीं चुन पा रही है तो क्या पूर्णकालिक अध्यक्ष चुन सकेगी. आज के दिन की सच्चाई यही है कि कांग्रेस की हालत खस्ता है और उसके हौसले पस्त है. पार्टी को ख़ुद को आने वाले दो-तीन विधानसभा चुनावों के लिए तैयार करना है ना कि पार्टी के भीतर चुनाव करवाने में वो व्यस्त हो जाए. मुझे लगता है कि ये कोई ऐसा फ़ैसला नहीं है कि जिस पर ताली बजाई जाए लेकिन ये ऐसा फ़ैसला भी नहीं है जिस पर बड़ा विवाद हो. ये स्थायी अध्यक्ष का पद नहीं है इसलिए इसमें इतना विवाद भी नहीं है. स्थायी अध्यक्ष के पद के लिए पहले और चुनाव के वक्त व्यापक चर्चा होगी. वैसे भी जब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया तो उनके बाद सोनिया गांधी ही सभी फ़ैसले ले रही थीं. बस हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि अंतरिम अध्यक्ष का जो कार्यकाल हो वो बहुत लंबा न हो जाए, बल्कि कम हो. चार प्रांतों में चुनाव होने तक ही कार्यकाल हो तो बेहतर जिसके बाद पार्टी को अपनी व्यवस्था में परिवर्तन करना चाहिए और पार्टी में चुनाव करवाने चाहिए.

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