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राहुल गाँधी बदले-बदले से नज़र आते हैं !  रेहान फ़ज़ल

राहुल गाँधी बदले-बदले से नज़र आते हैं ! रेहान फ़ज़ल

Date : 01-Apr-2019
जब इंदिरा गाँधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं तो वो सिर्फ़ 42 साल की थीं. संजय गांधी ने जब अपना पहला चुनाव लड़ा था तो वो मात्र 30 साल के थे. राजीव गाँधी जब राजनीति में आए थे तो उन्होंने अपने जीवन के सिर्फ़ 36 वसंत देखे थे. राहुल जब पहली बार 2004 में राजनीति में आए तो वो भारतीय राजनीति के मानकों के हिसाब से बच्चे ही थे, हालाँकि उस समय उनकी उम्र 34 साल की हो चुकी थी. दिलचस्प बात ये है कि राजनीति में डेढ़ दशक से भी अधिक समय बिता देने और चालीस की उम्र पार कर जाने के बावजूद उन्हें बच्चा ही समझा जाता रहा. लेकिन, जब 2008 में एक इंटरव्यू में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने राहुल को बच्चा कह कर ख़ारिज करने की कोशिश की तो उन्होंने उसका अच्छा प्रतिवाद भी किया और कहा- अगर मैं उनकी नज़र में बच्चा हूँ तो आप इसे पसंद कीजिए या नापसंद , भारत की 70 फ़ीसदी आबादी भी बच्चा है. भारतीय राजनीति में अभी भी युवा होने को नादानी से जोड़ कर देखा जाता है. लेकिन, भारतीय राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले पंडित मानेंगे कि राहुल गांधी उस लेबल से अब बाहर निकल आए हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव में शीर्ष पद के दावेदार हैं. जब राउल विंसी कहलाते थे राहुल गांधी अगर लोकसभा चुनाव मोदी बनाम राहुल न हुए तो... इंदिरा गांधी के बहुत चहेते थे राहुल राहुल गाँधी का राजनीतिक बपतिस्मा अपनी दादी इंदिरा गाँधी को देखते-देखते हुआ. 19 जून, 1970 को राहुल के जन्म के कुछ दिनों बाद इंदिरा गाँधी ने अमरीका में रह रही अपनी दोस्त डोरोथी नॉर्मन को लिखा, राहुल की झुर्रियाँ ख़त्म हो गईं हैं लेकिन उसकी डबल चिन अब भी बरकरार है. इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वालीं कैथरीन फ़्रैंक लिखती हैं, बचपन से ही प्रियंका और राहुल अक्सर सुबह उनके निवास के लॉन में होने वाले दर्शन दरबार में उनके साथ हुआ करते थे. इस दरबार में वो आम लोगों से मिलती थीं. रात में भी वो इन दोनों को अक्सर अपने ही शयन-कक्ष में सुलाती थीं.दून, स्टीवेंस, हारवर्ड और केंब्रिज में पढ़ाई राहुल गांधी ने पहले दून स्कूल में पढ़ाई की और फिर इसके बाद दिल्ली के मशहूर सेंट स्टीफेंस कॉलेज में. इसके बाद वो अमरीका चले गए जहाँ उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के छात्र के रूप में दाख़िला लिया. सुरक्षा कारणों से उन्हें हार्वर्ड से हट कर विंटर पार्क, फ़्लोरिडा के एक कॉलेज में दाख़िला लेना पड़ा. वहाँ से उन्होंने 1994 में अंतरराष्ट्रीय संबंधों में डिग्री ली. इसके बाद वो केंब्रिज विश्वविद्यालय के मशहूर ट्रिनिटी कॉलेज चले गए. वहाँ से उन्होंने 1995 में डेवलपमेंट स्टडीज़ में एमफ़िल किया. इसके बाद वो लंदन में दुनिया में ब्रैंड स्ट्रेटेजी की बड़ी कंपनी मॉनीटर ग्रुप में नौकरी करने लगे. उन्होंने इस कंपनी में अपना नाम बदल कर तीन साल तक नौकरी की. जब तक वो वहाँ रहे उनके साथियों को इसकी भनक भी नहीं लग पाई कि वो इंदिरा गाँधी के पोते के साथ काम कर रहे हैं. वर्ष 2002 में राहुल वापस भारत लौटे. उन्होंने कुछ लोगों के साथ मिल कर मुंबई में एक कंपनी शुरू की, बैकॉप्स सर्विसेज़ लिमिटेड. वर्ष 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में दिए गए हलफ़नामे में उन्होंने साफ़ लिखा कि इस कंपनी में उनके 83 फ़ीसदी शेयर हैं. 2008 की गर्मियों में भारत के उस समय के सबसे बड़े बॉक्सिंग कोच और द्रोणाचार्य विजेता ओमप्रकाश भारद्वाज के पास भारतीय खेल प्राधिकरण की तरफ़ से एक फ़ोन आया. उनको बताया गया कि 10, जनपथ से एक साहब आपसे संपर्क करेंगे. कुछ देर बाद पी माधवन ने भारद्वाज को फ़ोन कर कहा कि राहुल गाँधी आपसे बॉक्सिंग सीखना चाहते हैं. भारद्वाज इसके लिए तुरंत राज़ी हो गए. राहुल गांधी की जीवनी लिखने वाले जतिन गांधी बताते हैं, जब फ़ीस की बात आई तो भारद्वाज ने सिर्फ़ ये मांग की कि उन्हें उनके घर से पिक करा लिया जाए और ट्रेनिंग के बाद उन्हें वापस उनके घर छोड़ दिया जाए. भारद्वाज ने 12 तुग़लक लेन के लॉन पर राहुल गांधी को मुक्केबाज़ी की ट्रेनिंग दी. ये सिलसिला कई हफ़्तों तक चला, सप्ताह में तीन दिन. इस दौरान कई बार सोनिया, प्रियंका और उनके बच्चे माएरा और रेहान भी राहुल को ट्रेनिंग करते देखने आते थे. भारद्वाज याद करते हैं कि वो जब भी राहुल को सर या राहुल जी कह कर संबोधित करते थे, तो वो उन्हें हमेशा टोक कर कहते थे कि वो उन्हें सिर्फ़ राहुल कहें. वो उनके छात्र हैं. भारद्वाज बताते हैं, एक बार मुझे प्यास लगी और मैंने पानी पीने की इच्छा प्रकट की. हालांकि, वहाँ कई नौकर मौजूद थे, लेकिन राहुल खुद दौड़ कर मेरे लिए पानी लाए. ट्रेनिंग ख़त्म हो जाने के बाद वो हमेशा मुझे गेट तक छोड़ने जाते थे.बॉक्सिंग ही नहीं राहुल ने तैराकी, स्क्वॉश, पैराग्लाइडिंग और निशानेबाज़ी में भी महारत हासिल की. अब भी वो चाहे जितना व्यस्त हों, कसरत के लिए थोड़ा समय निकाल ही लेते हैं. अप्रैल, 2011 में मुंबई में खेले जा रहे विश्व कप मैच के दौरान राहुल अपने कुछ साथियों के साथ चौपाटी के न्यू यॉर्कर रेस्तराँ पहुंचे जहाँ उन्होंने पित्ज़ा, पास्ता और मेक्सिकन टोस्टाडा का ऑर्डर किया. रेस्तराँ के मैनेजर ने राहुल से खाने का बिल लेने से इनकार कर दिया लेकिन उन्होंने ज़ोर देकर 2223 रुपए का बिल चुकाया. अब भी राहुल दिल्ली की मशहूर ख़ान मार्केट में कभी-कभी कॉफ़ी पीने जाते हैं. आंध्र भवन की कैंटीन में भी उन्होंने कई बार दक्षिण भारतीय थाली का आनंद उठाया है.

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