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अब भी धोनी का खेलना भारत की मजबूरी नही जरूरत है

अब भी धोनी का खेलना भारत की मजबूरी नही जरूरत है

Date : 07-Jul-2019
इंग्लैंड में जारी 12वें विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में रविवार और सोमवार को अवकाश के दिन हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय क्रिकेट टीम के लिए कम से कम रविवार का दिन बेहद व्यस्त और ख़ुशी भरा साबित होने वाला है. इसका पहला कारण तो यह है कि भारतीय टीम शनिवार को श्रीलंका को आख़िरी लीग मैच में सात विकेट से हराकर शान से सेमीफाइनल में पहुंच चुकी है. अब मंगलवार को उसका सामना पहले सेमीफाइनल में न्यूज़ीलैंड से होगा. इसके अलावा रविवार को व्यस्त होने का दूसरा कारण है महेंद्र सिंह धोनी का जन्मदिन. महेंद्र सिंह धोनी रविवार को अपना 38वां जन्मदिन मनाने जा रहे है. ज़ाहिर है होटल में बाक़ी भारतीय खिलाड़ी इस मौक़े को आसानी से नहीं जाने देंगे. इस अवसर पर केक से धोनी का मुंह पोतने से लेकर पार्टी का माहौल भारतीय खिलाड़ियो के लिए होगा. धोनी को मिलेगा जीत का तोहफ़ा? माना जा रहा है कि ये महेंद्र सिंह धोनी का आख़िरी विश्व कप है. ऐसे में तमाम भारतीय खिलाड़ी उन्हें विश्व कप में ख़िताबी जीत का तोहफ़ा अगले सप्ताह होने वाले सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल जीतकर देना चाहेंगे. ख़ुद धोनी ने भी तो अपनी कप्तानी में साल 2007 में टी-20 विश्व कप और साल 2011 में आईसीसी विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट जिताकर भारत को असीम ख़ुशियां दी हैं. 38 साल की उम्र में जब किसी भी खिलाड़ी की आंखे कमज़ोर होने लगती हैं और रन लेते समय क़दमों की रफ़्तार भी धीमी होने लगती है, वहीं धोनी आज भी विकेट के पीछे दूसरे विकेट कीपरों के मुक़ाबले सबसे तेज़-तर्रार है. इतना ही नहीं विकेट के बीच में दौड़ में तो वह कई युवा खिलाड़ियो को भी पानी पिलाने की क्षमता रखते है. क्या धीमे हो गए हैं धोनी? इस विश्व कप में भले ही धोनी की धीमी बल्लेबाज़ी को लेकर आलोचना के सुर सुनाई दे रहे हैं लेकिन सब यह भी जानते है कि अगर वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ जब भारत का टॉप ऑर्डर बिखर चुका था वैसे में अगर धोनी भी जल्दी आउट हो जाते तो क्या होता. हांलाकि धोनी का आसान सा स्टंप करने का अवसर वेस्ट इंडीज़ के विकेट कीपर ने गंवाया, लेकिन जीत तो आख़िर जीत ही होती है. वैसे टूर्नामेंट में धोनी स्ट्राइक रेट 93 का है जिसे धीमा नहीं कहा जा सकता है. यानी वो हर सौ गेंदों पर 93 रन बना रहे हैं. सबसे बड़ी बात भारत के कप्तान विराट कोहली जानते हैं कि महेंद्र सिंह धोनी की टीम में क्या अहमियत है, तभी तो कोहली मानते हैं कि धोनी को सलाह देने की कोई ज़रूरत नही. धोनी ख़ुद जानते हैं कि उन्हें किस समय क्या करना है. ये सिर्फ़ कहने की बात नहीं बल्कि मैदान पर भी दिखता है. जब टीम गेंदबाज़ी करती है तो बॉलर को सलाह देना, फील्डिंग में बदलाव करना और यहां तक कि डीआरएस लेने या न लेने के फ़ैसले में भी धोनी की राय सबसे अहम होती है. उनकी मौजूदगी के कारण ही कप्तान विराट कोहली बाउंड्री पर फील्डिंग करते दिखते हैं. यानी कप्तान न होकर भी धोनी कप्तान का रोल निभाते हैं. अब इसे इत्तेफ़ाक़ ही कहा जाएगा कि धोनी न तो सैयद किरमानी की तरह कलात्मक और परंपरागत तरीक़े से विकेट कीपिंग करते है और न ही फ़ारूख इंजीनियर की तरह धुआंधार सलामी बल्लेबाज़ हैं. इसके बावजूद धोनी भारत के सबसे क़ामयाब विकेट कीपर होने के साथ-साथ क़ामयाब बल्लेबाज़ और कप्तान भी रहे हैं. धोनी हमेशा चौंकाने वाले निर्णय लेते हैं. कुछ ऐसा ही तब हुआ जब उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के टेस्ट क्रिकेट में कप्तानी की टोपी विराट कोहली के सिर रख दी. इसके बाद उन्होंने एकदिवसीय और टी-20 में भी कप्तानी छोड़ दी और टेस्ट क्रिकेट को तो उन्होंने अलविदा कह ही दिया था. एक कप्तान के तौर पर उन्होंने आईपीएल में चेन्नई सुपर किंग्स को तीन बार चैंपियन बनाया. उन्हीं की कप्तानी में भारत ने पहली बार आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी जीती तो पहली बार आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में भी नंबर एक बना. माही है तो मुमकिन है! धोनी के खाते में ढ़ेरों कामयाबियां हैं तो ढ़ेरों क़िस्से भी हैं. आईपीएल में उनकी टीम चेन्नई सुपर किंग्स को स्पॉट फिक्सिंग जैसे तथाकथित मामलों में फँसकर दो साल के लिए आईपीएल से बाहर होना पड़ा. लेकिन धोनी ने साल 2018 में उसकी वापसी लगभग अपने ही दम पर चैंपियन बनाकर की. धोनी पर यह भी आरोप लगे कि उनकी वजह से ही गौतम गंभीर, वीरेंद्र सहवाग, वीवीएस लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ को टेस्ट क्रिकेट छोडना पड़ा. लेकिन यह भी सच है कि धोनी की कप्तानी में ही विराट कोहली, रोहित शर्मा और दूसरे खिलाडी भी जमकर चमके. रोहित शर्मा को तो एकदिवसीय क्रिकेट में सलामी बल्लेबाज़ धोनी ने ही बनाया. विकेट के पीछे धोनी आज भी बल्लेबाज़ो के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. पलक झपकते ही स्टंप करने में उनका कोई सानी नही है. कभी अपने लंबे बालों के कारण पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ से तारीफ़ बटोरने वाले धोनी छक्का लगाकर मैच जिताने में भी माहिर माने जाते रहे. धोनी जैसा कोई नहीं आज भी उनके कंधो पर मैच फिनिशर की ज़िम्मेदारी है. वक़्त के साथ धोनी कभी आह तो कभी वाह से दो चार होते रहते हैं लेकिन मैदान पर शायद ही कभी उन्होंने किसी अवसर पर दूसरे खिलाड़ियो की तरह जोश में बल्ला घुमाया हो या मैच जिताने के बाद ख़ुशी से उछले हों. दरअसल. वह कैप्टन कूल कहलाते रहे हैं. धोनी के बारे में इतना कुछ कहा सुना जा चुका है कि कोई भी बात नई नहीं लगती. लेकिन इसके बावजूद जब भारत के पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर अक्सर कहते हैं- वो चाहते हैं कि उनकी आंखों के सामने हमेशा वह समां रहे जब धोनी ने साल 2011 का विश्व कप फाइनल श्रीलंका के ख़िलाफ़ छक्का जमाकर जिताया था तो शायद इससे बड़ी बात कोई और नहीं हो सकती. वैसे भी धोनी ने न जाने कितने मैच इस अंदाज़ में भारत को जिताए हैं. उम्मीद है उनकी ज़िंदगी का एक और नया पन्ना उनकी क़ामयाबी का नया इतिहास लेकर आएगा. फ़िलहाल अब भी धोनी का खेलना भारत की मजबूरी नही ज़रूरत है.

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