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हमारे घर हमें कैसे प्रभावित करते हैं इसकी धारणा बचपन से ही बनने लगती है

हमारे घर हमें कैसे प्रभावित करते हैं इसकी धारणा बचपन से ही बनने लगती है

Date : 21-Sep-2019
घरों का आकार हमारी ज़िंदगी को आकार देता है. बुनियादी तौर पर घर वह जगह है जहां परिवार के लोग साथ रहते हुए अपना सुख-दुख बांटते हैं. घर के आयाम और उसकी बनावट हमारे रिश्तों को विकसित होने का आधार देती है. घर के अंदरूनी हिस्सों का इस्तेमाल कैसे हो, कमरों का विभाजन किस तरह हो और खुली जगह कितनी रहे- इससे हमारे घुलने-मिलने के अवसर और सीमाएं तय होती हैं. लेकिन हमारे रिश्तों को बनाने में सिर्फ़ जगह का हाथ नहीं होता. अमरीका के उटाह प्रांत की ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी की रिसर्च रिपोर्ट 2019 के मुताबिक घर को लेकर हम जितने सकारात्मक रहते हैं, हमारे रिश्ते उतने ही स्वस्थ होते हैं. कार्ली थॉर्नोक पेशे से इंटीरियर डिजाइनर हैं. उन्होंने पश्चिमी अमरीका के 164 परिवारों पर शोध करने वाले दल का नेतृत्व किया. इन सभी परिवारों में बच्चे थे. वे अलग आय वर्ग के थे और उनके घरों का आकार अलग था- कुछ घरों में प्रति व्यक्ति 100 वर्ग फुट से भी कम जगह थी. शोधकर्ताओं ने दो साल तक इन परिवारों के चार बुनियादी पहलुओं पर भौतिक वातावरण के प्रभाव का अध्ययन किया. ये पहलू थे- स्नेह, भावनात्मक जवाबदेही, स्वीकार्यता और फ़ैसले लेना. बच्चों और उनके माता-पिता से सर्वे के कुछ सवालों के लिए रेटिंग देने को कहा गया, जैसे- घर में मुझे भीड़भाड़ लगती है, घर के सदस्यों को लगता है कि वे जैसे हैं परिवार को स्वीकार्य हैं शोधकर्ताओं ने उनके जवाब को घर के आकार, परिवार की आमदनी, कमरे और परिवार के सदस्यों की संख्या के आधार पर परखा. उन्होंने पाया कि प्रति व्यक्ति जगह बढ़ने से परिवार की ख़ुशहाली बढ़ रही थी. लेकिन इस बात ने उन्हें हैरत में डाल दिया कि जगह से ज़्यादा जगह के बारे में परिवार के ख़याल ने रिश्तों पर असर डाला. घर से जुड़ा अतीत हमारे घर हमें कैसे प्रभावित करते हैं इसकी धारणा बचपन से ही बनने लगती है. जिन घरों में हम बड़े होते हैं उनको देखकर हम घर के बारे में अवचेतन में बनी प्राथमिकताओं और धारणाओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं. डॉ. टोबी इसरायल डिजाइन साइकोलॉजिस्ट हैं. उन्होंने Some Place Like Home: Using Design Psychology to Create Ideal Places किताब लिखी है. वह मानती हैं कि हर व्यक्ति की एक विशिष्ट परिवेश आत्मकथा होती है- उस जगह से जुड़ा एक निजी इतिहास होता है जो अवचेतन में मौजूद रहता है. भौतिक स्थानों के साथ जुड़ी हमारी संवेदना समय के साथ संशोधित होती है, दोहरायी जाती है या ख़ारिज की जाती है. इसरायल का कहना है कि बचपन के घरों से मौजूदा घरों की तुलना करना उस स्थान से जुड़े अपने निजी इतिहास को जानने का मज़ेदार तरीका हो सकता है. कई बार लोग उसी तरह के ले-आउट का घर पसंद करते हैं जैसा उनके बचपन में था. कई बार वे पूरी तरह अलग ले-आउट का घर चुनते हैं. यह सब अतीत के अनुभवों पर निर्भर करता है कि आप उनको बदलना चाहते हैं या संरक्षित करना चाहते हैं. इसरायल एक दंपति को याद करती हैं जो अलग-अलग परिवेश के थे. पत्नी न्यूजर्सी के उपनगर में एकल-परिवार घर में पली-बढ़ी थी. उनके पड़ोस में कई परिवार रहते थे और गली बच्चों से भरी रहती थी. पति की परवरिश ग्रीस में पहाड़ों से घिरे समुद्र किनारे मछुआरों के गांव में हुई थी. पति ऐसे घर की तलाश में थे जिसके साथ ढेर सारी जमीन हो और आसपास प्राकृतिक ख़ूबसूरती हो. उनको इस बात की फिक्र नहीं थी कि उनका घर उपनगर में हो या बस्ती में. पत्नी ऐसा घर चाहती थीं जहां ढेर सारे पड़ोसी हों और उनके बच्चों के साथ खेलने वाले बच्चे हों. ऐसा लगता था कि दोनों दो विपरीत धुरों पर खड़े हों. मनोवैज्ञानिक अभ्यास के जरिये उन्होंने घर के बारे में एक-दूसरे की पिछली धारणाओं को समझा और आख़िर में उनमें आम राय बन गई. दोनों को पर्यावरण से प्रेम था, इसलिए उन्होंने ऐसा घर चुना जिसके आसपास ख़ूब पेड़ थे. वह एक विकसित हो रही सोसाइटी का हिस्सा था और मुहल्ले से सीधा जुड़ा था. चूंकि यह घर दोनों की ज़रूरतों को पूरा करता था, इसलिए वे ख़ुशी से इसमें रह सकते थे. फ्लैटमेट्स के साथ रहने वाले लोग पूरे घर को अपने हिसाब से नहीं ढाल सकते, फिर भी वहां गुंजाइश रहती है कि बेडरूम को अपनी पसंद से तैयार किया जाए. आप अपने कमरे को आसरा बनाना चाहते हैं या मनोरंजन की जगह? क्या आपने फ्लैट के कॉमन एरिया में अपने लिए कोई जगह बना ली है या बड़े लॉन्ज को सभी के लिए खुला रखा है? कॉमन एरिया साथ रहने वाले सभी लोगों की स्थानिक ज़रूरतों को प्रतिबिंबित कर सकते हैं- अतीत और वर्तमान दोनों के मन से डिजाइन करना यदि आप अपने घर में बेहतर रिश्ते बनाना चाहते हैं तो संभव है कि यह आर्थिक रूप से मुमकिन न हो या जगह को अपग्रेड करना बहुत चुनौतीपूर्ण हो. लेकिन थॉर्नोक कहती हैं कि अपने घर को बेहतर बनाना हमेशा हमारी पहुंच में होता है. सबसे अहम बात यह है कि हमारी धारणाएं हमारे नियंत्रण में होती हैं और ये सबसे बड़ा प्रभाव डालती हैं, भले ही आपकी जगह एक आलमारी से ज़्यादा बड़ी न हो. थॉर्नोक कहती हैं, शहर तेज़ी से बढ़ रहे हैं. वहां पर्याप्त जगह नहीं है. ऐसे में आपको रचनात्मक होना होगा, क्योंकि मुमकिन है कि आपके हालात बदलने वाले न हों. छोटी से छोटी जगह को भी काम लायक बनाया जा सकता है. उदाहण के लिए, यदि भीड़भाड़ महसूस होता हो तो आप रोशनी और आईनों की मदद से जगह बना सकते हैं. लोग अपने लिए एक आसरा चाहते हैं, जो कई बार पर्दे लगाने या फर्श पर कुछ तकिए व्यवस्थित करने भर से हो जाता है. परिवारों के लिए इसरायल एक और तरकीब सुझाती हैं- एक दूसरी की पसंद साझा करना. अपने घर का एक ले-आउट खींचें और परिवार के हर सदस्य से पूछें कि वे घर के किस हिस्से को प्राइवेट, सेमी प्राइवेट और कॉमन समझते हैं, उसके हिसाब से ले-आउट में अलग-अलग रंग भर दें. इसरायल का कहना है कि एक ही घर को अलग-अलग नज़रिये से देखने पर समस्या क्षेत्रों की पहचान हो सकती है और कहां सुधार करना है, यह भी आसानी से स्पष्ट हो सकता है. थॉर्नोक के मुताबिक स्वस्थ घर के लिए सक्रिय बदलाव करने का मतलब है कि उसमें भौतिक स्थान और वहां होने वाले संवाद का भी ख़याल रखा जाए. फ्लैटमेट्स के साथ कोई घर साझा करना हो या पूरी तरह पारिवारिक घर हो, अपनी जगह को दूसरों के मुताबिक डिजाइन करना सह-जीवन सद्भाव की कुंजी है. वह कहती हैं, हमें इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि हम अपने घर में क्या डाल रहे हैं, हम उसकी संरचनाओं और आसपास की चीज़ों को कैसे बदल रहे हैं. छोटे घरों या मैरी कोन्डो के न्यूनतमवाद की पसंद से प्रेरित सांस्कृतिक आंदोलनों को ध्यान में रखकर हम अक्सर अपने आसपास की चीज़ों और जगह को प्राथमिकता देने की ग़लती करते हैं. इसकी जगह जीवन में बदलाव लाने का असल तरीका यह है कि घर में रहने वाले लोगों पर ध्यान दिया जाए.

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