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इंसान की फ़ितरत है कि उसे अच्छाई कम और बुराई ज़्यादा नज़र आती हैं.

इंसान की फ़ितरत है कि उसे अच्छाई कम और बुराई ज़्यादा नज़र आती हैं.

Date : 18-Jul-2019
18 जुलाई 2019 दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं जिसमें सिर्फ़ अच्छाई या सिर्फ़ बुराई हो. लेकिन इंसान की फ़ितरत है कि उसे अच्छाई कम और बुराई ज़्यादा नज़र आती हैं. शायद इसीलिए किसी के अच्छे व्यवहार से ज़्यादा उसका बुरा बर्ताव याद रहता है. तमाम रिसर्च भी कहती हैं कि शख़्सियत का नकारात्मक पहलू इंसान में रचनात्मक सोच पैदा करता है. लेकिन ऐसी सोच वाले किसी को धोखा देने से भी नहीं चूकते. नई रिसर्च से साबित होता है कि हर इंसान में क़ुदरती तौर पर बहुत सी अच्छाइयां होती हैं. व्यक्तित्व के बहुत से पहलुओं पर रिसर्च करने वाले मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि हर इंसान बुनियादी तौर पर अच्छा होता है. दो दशक पहले रिसर्च की गई थी कि कोई इंसान किसी को धोखा देने या कोई भी बुरा काम करने से पहले कुछ सोचता क्यों नहीं. इसके बाद डार्क ट्रायड की थ्योरी दी गई. यानी ऐसे गुण, जिनकी वजह से लोग किसी को भी नुक़सान पहुंचाने की सोच रखते हैं. या सिर्फ़ अपने भले की सोचते हैं. इनके लिए तीन नाम दिए गए. नारसिसिज़्म, साइकोपैथ और मैकियावेलियनिज़्म. अमरीका की कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक स्कॉट बेरी कॉफ़मेन ने ये पता लगाने की कोशिश की कि आख़िर ऐसे लोग अपने काम-काज में कैसे कामयाबी हासिल कर लेते हैं या रिश्तों में निबाह कैसे करते हैं? उन्होंने इसके लिए लंबी रिसर्च की. कुछ समय बाद प्रोफ़ेसर बेरी को लगा कि नकारात्मकता के साथ-साथ शख़्सियत के पॉजिटिव यानी लाइट ट्रायड पर भी रिसर्च की जानी चाहिए. लिहाज़ा अपने तीन साथियों के साथ उन्होंने इंसानी शख़्सियत के तीन सकारात्मक पहलुओं पर रिसर्च की. पहला पहलू है मानवतावाद, यानी एक इंसान का दूसरे इंसान से कैसा रिश्ता रहता है. दूसरा पहलू है कैन्टियानिज़्म यानी आचारनीति. ये शब्द जर्मनी के बड़े दार्शनिक विचारक इमैनुअल कांट के नाम पर आधारित है, जिन्हें इस थ्योरी का जन्मदाता कहा जाता है. तीसरा पहलू है मानवता में विश्वास. माना जाता है कि हर इंसान बुनियादी तौर पर अच्छा होता है. अमरीका की वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक विलियम फ़लीसन का कहना है कि शख़्सियत के ये तीनों ही पहलू इंसान को बेहतर बनाने के मामले में फिट बैठते हैं. इनके मुताबिक़ जब इंसान ये सोच बना लेता है कि दूसरे लोग भी अच्छे है तो उसमें ख़ुद को ख़तरों से बचाने का डर कम हो जाता है. दूसरों को उनके ग़लत कामों की सज़ा देने का भाव कम हो जाता है. रिसर्च से पता चलता है कि ना तो कोई भी शख़्स ख़ुद में पूरी तरह डार्क ट्रायड रखता है और ना ही लाइट ट्रायड रखता है. अगर आपको ख़ुद के बारे में जानना हो कि आप में कौन सा ट्रायड किस स्तर का है? तो आप कॉफ़मेन की वेबसाइट पर एक टेस्ट के ज़रिए पता कर सकते हैं. शख़्सियत का डार्क ट्रायड पहलू इतना भी बुरा नहीं है जितना कि माना जाता है. बल्कि ऐसे लोगों में लीडरशिप संभालने की भरपूर क्षमता होती है साथ ही वो मुखर और बहादुर होते हैं. लिहाज़ा रिसर्चर कहते हैं कि इस पहलू को छिपाने से बेहतर है कि इसका भरपूर लाभ उठाया जाए. वहीं अगर किसी की शख़्सियत में लाइट ट्रायड पहलू ज़्यादा है, तो इसका मतलब ये नहीं कि उनकी ज़िंदगी बहुत बेहतर और आसान होती है. इस पहलू के लोगों की ख़ासियत होती है कि वो सभी को ख़ुश रखने की कोशिश करते हैं. लेकिन ऐसा संभव नहीं है. बहुत से लोग होंगे जो आप से सहमत नहीं होंगे. ऐसे में अपनी प्रामाणिकता बरक़रार रखना ज़रूरी है. लाइट ट्रायड पहलू वाले लोगों की एक कमी और भी है कि वो बहुत जल्द ख़ुद को क़ुसूरवार मान लेते हैं. और शर्मिंदा भी ज़ल्दी हो जाते हैं. मनोवैज्ञानिक टाया कोहेन का कहना है कि अपने किए ग़लत काम पर शर्मिंदा होना बुरी बात नहीं है. बल्कि इससे इंसान को भविष्य में सावधान रहने की प्रेरणा मिलती है. लेकिन छोटी-छोटी बातों पर ख़ुद को ही ग़लत मानकर आत्मग्लानि से घिर जाना अच्छा नहीं है. रिसर्च साबित करती हैं कि हमारा किरदार जीवन भर बनता और बदलता रहता है. बुनियादी तौर पर हमारी शख़्सियत हमारी आदतों का परिणाम होती है. हमारी आदतों के मुताबिक़ ही हमारा मिज़ाज बनता है. लेकिन ज़िंदगी में हम जिस तरह के लोगों के साथ मिलना-जुलना शुरू कर देते हैं, उसी के मुताबिक़ हमारे अंदर अच्छाइयां और बुराइयां पनपने लगती हैं. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि तमाम बुराइयों के बावजूद कोई ना कोई अच्छाई हर इंसान में ज़रूर होती है.

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