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फील्ड मार्शल की उपाधि अब तक केवल दो लोगों को मिली है- फील्ड मार्शल के. एम.करियप्पा और फील्ड मार्शल सैम मोनक शॉ को।

Date : 28-Jul-2019
जानें इंडिया आर्मी की वो रोचक बातें, जो इसके अधिकारियों को बनाती है खास देश की सुरक्षा के लिए भारतीय सेना हमेशा तत्पर रहती है। फील्ड मार्शल से लेकर जेनरल या सेना प्रमुख, लेफ्टिनेंट जेनरल, मेजर जेनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल, लेफ्टिनेंट कर्नल, मेजर, कैप्टन, लेफ्टिनेंट सबकी एक अलग भूमिका है। इन सभी के लिए क्या कार्यकाल निश्चित है   1. अब तक किसको मिली है फील्ड मार्शल (अवैनिक पद) की उपाधि? -फील्ड मार्शल की उपाधि अब तक केवल दो लोगों को मिली है- फील्ड मार्शल के. एम.करियप्पा और फील्ड मार्शल सैम मोनक शॉ को। 2. लेफ्टिनेंट जेनरल बैज की पहचान क्या है?  - डंडा क्रॉस और तलवार के ऊपर राष्ट्रीय चिंह का निशान मौजूद है। इनका कार्यकाल 60 वर्ष तक होता है।  
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अगर हाई-टेक निगरानी की परिपाटी बन जाए तो ऐसा लगेगा चौबीसों घंटे हम जेल मे है

Date : 25-Jul-2019
हायर और फ़ायर वाली गिग इकॉनमी तेज़ी से पैर पसार रही है. एक अनुमान के मुताबिक़ अमरीका में 5.7 करोड़ लोग और ब्रिटेन में 11 लाख लोग अल्पकालिक नौकरियां कर रहे हैं. इसमें और तेज़ी आने वाली है. 2035 तक हममें से ज़्यादातर लोग लंबी अवधि के क़रार के बिना नौकरियां कर रहे होंगे और इंटरनेट से जुड़े अरबों उपकरणों (IoT) के ज़रिये हमारी हर हरकत पर नज़र रहेगी. भविष्य की चुनौतियों और अवसरों को रेखांकित करने वाली रॉयल सोसाइटी ऑफ़ आर्ट्स, मैन्युफ़ैक्चरर्स एंड कॉमर्स (आरएसए) की एक रिपोर्ट में इसका ख़ाका खींचा गया है, लेकिन यह पहले से ही हक़ीक़त बन रही है. एक ऑनलाइन रिटेलर की पूर्व कर्मचारी सारा मैकिंटोश कहती हैं, शिफ्ट शुरू होने और ख़त्म होने के समय मुझे (सॉफ्टवेयर में) लॉग इन करना पड़ता था और हर ब्रेक के बारे में बताना पड़ता था, यहां तक कि टॉयलेट जाने के बारे में भी. वे गिनेंगे कि मैंने उनके सिस्टम पर कितना काम किया, फिर मेरे काम के घंटे से ब्रेक निकालकर उसमें भाग देंगे और देखेंगे कि मैंने दिन का टारगेट पूरा किया है या नहीं. ट्रेडस यूनियन कांग्रेस (टीयूसी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्रिटेन के 56% श्रमिकों को लगता है कि काम पर उनकी जासूसी होती है. उनके इंटरनेट इस्तेमाल, कीस्ट्रोक्स और वेब कैमरे की निगरानी होती है. पहनने योग्य उपकरणों और चेहरे पहचानने की तकनीक का इस्तेमाल करके उनके लोकेशन और पहचान की जांच की जाती है. ट्रेड्स यूनियन कांग्रेस की रिपोर्ट में एक कंस्ट्रक्शन मज़दूर का उदाहरण दिया गया है, जिसे अंगूठा लगाने के बाद काम मिला है. उसके साथ कोई क़रार नहीं हुआ. किसी प्रक्रिया में समय नहीं लगा, लेकिन यह उसकी निजता का उल्लंघन है. रॉयल सोसाइटी की रिपोर्ट में 2035 तक चार स्थितियों की कल्पना की गई है. इनमें से एक को सटीक अर्थव्यवस्था कहा गया है. लेखकों ने 2035 इसलिए चुना क्योंकि यह लोगों की कल्पना में थोड़ा दूर लगता है, लेकिन यह समय इतना पास भी है कि इसकी संभावनाओं के बारे में आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है. RSA में अर्थव्यवस्था के निदेशक असीम सिंह कहते हैं, 2035 परिचित सा होगा, लेकिन अलग होगा. उनका कहना है कि रिपोर्ट के चार परिदृश्य इसलिए डिजाइन किए गए हैं ताकि यह देखा जा सके कि भविष्य किधर जा सकता है. सटीक अर्थव्यवस्था का परिदृश्य होने की संभावना अन्य तीन परिदृश्यों से अधिक नहीं है, लेकिन यह सबसे ज़्यादा परेशान करने वाला है. सटीक अर्थव्यवस्था परिदृश्य में कंपनियां सेंसरों से जुटाए गए रियल-टाइम डेटा का इस्तेमाल संसाधनों के कुशल आवंटन में कर सकेंगी. स्वास्थ्य और खुदरा क्षेत्र में 2035 तक गिग इकॉनमी पैटर्न सामान्य बात हो जाएगी, ऐसे में कंपनियां मांग के हिसाब से श्रम रणनीतियां बना सकेंगी. इसके अलावा सेंसर्स के विस्तार से वे कर्मचारियों की हर गतिविधि का विश्लेषण भी कर सकेंगी. खुदरा क्षेत्र की दुकानों में सेंसर्स से ग्राहकों की संख्या के बारे में सूचना इकट्ठा की जाएगी. पहने जा सकने वाले उपकरणों से स्टाफ़ की हरकतों पर नज़र रखी जा सकेगी. डेटा के आधार पर कर्मचारियों को स्टार रेटिंग दी जाएगी और मैनेजर उनका इस्तेमाल कर्मचारियों को पुरस्कृत करने या दंडित करने में कर सकेंगे. सिंह का कहना है कि टाइमशीट और निगरानी उपकरणों के ज़रिये गोदामों और कॉल सेंटरों में काम करने वाले लोगों पर नज़र रखने का काम शुरू हो चुका है. बेथिया स्टोन एक पीआर एजेंसी में काम करती हैं. वहां टाइमशीट सॉफ्टवेयर के सहारे हर 15 मिनट, 30 मिनट और एक घंटे के ब्लॉक का लॉग तैयार किया जाता है. इसका नतीजा यह हुआ है कि कर्मचारी पहले से ज़्यादा ओवरटाइम करने लगे हैं और माहौल चिंताजनक और तनावपूर्ण हो गया है. स्टोन ने छात्र रहते हुए भी इस निगरानी का अनुभव किया था जब वह एक सुपरमार्केट में काम करती थी. मुझे हर मिनट एक निश्चित संख्या में चीज़ों को स्कैन पड़ता था. यदि वह संख्या घट जाए तो अंडर परफॉर्मेंस माना जाता था और अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती थी. सिंह का कहना है कि इस तरह की निगरानी बढ़ती जा रही है. नौकरियां घट रही हैं और श्रमिक एक अस्थायी काम से दूसरे अस्थायी काम में जा रहे हैं. नियोक्ता उनसे और अधिक की उम्मीद कर रहे हैं. यह सिर्फ़ काम के घंटे का मामला नहीं है. यह निजता, ख़ुशी, स्वायत्तता और मशीनीकृत दुनिया में ख़ुद को इंसान के रूप में महसूस करने के सामने चुनौती है. कुछ कर्मचारी ख़ुश हैं रिपोर्ट के मुताबिक़, निगरानी की इस व्यवस्था को उन श्रमिकों का समर्थन भी मिल सकता है जिनको लगता है कि इससे कामचोर सहकर्मियों पर लगाम लगेगी, प्रदर्शन के आधार पर उनको ज़्यादा भुगतान किया जाएगा और उनके लिए आगे बढ़ने के नये मौक़े खुलेंगे. सिंह कहते हैं, इस अर्थव्यवस्था का चरम लक्ष्य 1984 उपन्यास के परिदृश्य से मेल खाता है जिसमें एक ऐसी दुनिया की बात है जहां काम की दुनिया, राजनीतिक और सामाजिक दुनिया एक दूसरे से जुड़े हैं और पूरी तरह नियंत्रित हैं. उनको लगता है कि अगर हम अनुमति देते हैं तो तकनीक इस प्रक्रिया की रफ़्तार बढ़ा सकती है. गिग इकॉनमी की डिजाइन नियोक्ताओं को मांग के आधार पर कर्मचारियों को समायोजित करने की आज़ादी देती है. श्रमिक अल्प अवधि में अपनी पसंद का काम चुन सकते हैं. सैद्धांतिक तौर पर सुनने में यह भले ही अच्छा लगे, लेकिन इसके नुक़सान भी हैं. एबरडीन यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर कीथ बेंडर का कहना है कि कंपनियां अपने कर्मचारियों की निष्ठा खो देती हैं. दूसरी नौकरी नहीं होने पर श्रमिकों को शून्य घंटे के क़रार करने को मजबूर किया जाता है जिसमें नौकरी की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती. रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़िलहाल शून्य-घंटे के अनुबंधों में ख़राब भुगतान किया जाता है, लेकिन भविष्य में विशेष प्लेटफॉर्म तैयार होंगे. गिग इकॉनमी में ध्रुवीकरण होगा. ऊंची रेटिंग वाले लोगों को उनकी पसंद के काम मिलेंगे, जबकि दूसरे निराश-हताश श्रमिकों को हतोत्साहित करने वाले कामों में झोंक दिया जाएगा. मांग वाले श्रमिकों- जैसे नर्स या डॉक्टर- को फ़ायदा होगा क्योंकि वे असामान्य घंटों में काम के ज़्यादा पैसे ले सकेंगे. नियोक्ता की लगातार निगरानी में अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए कुछ श्रमिक दिमाग़ी क्षमता बढ़ाने वाली दवाइयां भी ले सकते हैं. युवा श्रमिकों के लिए आगे बढ़ना और करियर की सीढ़ी पर तेज़ी से चढ़ना आसान होगा, लेकिन ऐसा पुराने और कम लचीले सहकर्मियों की क़ीमत पर होगा. बेंडर पूछते हैं कि क्या बूढ़े लोग हार जाएंगे. वह कहते हैं, रुढ़िवादी सोच तो यही है कि पुरानी पीढ़ी तकनीक और नई पीढ़ी के साथ नहीं चल पाएगी. लेकिन एक तर्क यह भी है कि नये लोग निजता को पिछली पीढ़ी जितनी अहमियत नहीं देते, इसलिए वे भी जोखिम में रहेंगे. बूढ़े हों या जवान, बेंडर मानते हैं कि अधिक संपन्न लोग अस्थायी कार्य स्थितियों में अपने हितों का बचाव कर पाएंगे क्योंकि उनके पास अधिक नक़दी है. सिंह इससे सहमत हैं. उनका कहना है कि हम निगरानी असमानता की दोहरी प्रणाली का भी जोखिम उठा रहे हैं. जिनके पास साधन हैं वे बेहतर स्थितियों की मांग कर सकते हैं, लेकिन जिनके पास साधन नहीं हैं वे पीड़ित होंगे. इस प्रकार संभावना यह है कि कई श्रमिक कम भुगतान वाली नौकरियों के लिए लड़ने के लिए छोड़ दिए जाएंगे. बेंडर कहते हैं, अगर हम व्यापक हो गिग इकॉनमी की जड़ तक जाएं तो हमें मौलिक रूप से पुनर्विचार करना होगा. उदाहरण के लिए, नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) और सेहत की देखरेख करने वाली दूसरी एजेंसियों के पास लोगों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं सुलझाने के लिए ज़्यादा संसाधन होने की संभावना होगी, क्योंकि रोज़गार की सुरक्षा नहीं होना तनावपूर्ण होगा. पीआर कर्मचारी स्टोन कहती हैं कि हालांकि किसी ने भी उनके काम के घंटे को लेकर उनकी आलोचना नहीं की, लेकिन वह जानती हैं कि उनकी निगरानी की जा रही है. यही तनावपूर्ण है. दिमाग़ में यह चलता रहता है कि आपके सीनियर यह न सोचें कि आप कम काम कर रहे हैं. निगरानी से दफ़्तरों में भरोसा भी टूटता है. सेल्स टीम की एडमिन सहायक कार्ली थॉम्पसेट ने जो ईमेल और संदेश अपने सहकर्मी को भेजे, उसे उनके नियोक्ता ने भी पढ़ लिए. वह कहती हैं, इससे हमारे और मैनेजरों के संबंध बिगड़ गए क्योंकि हमें लगा कि हमसे बच्चों की तरह सलूक किया जा रहा था. ऑफ़लाइन निगरानी भी जारी रही. यदि हम खड़े होते या एक-दूसरे से बातें कर रहे होते तो हम पर हमेशा नज़र रखी जाती थी. ऐसा लगता था जैसे हम जेल में हों. थियोडोसिउ कहते हैं, इस तरह की निगरानी का एक ऑर्वेलियन (मुक्त समाज विरोधी) पहलू है क्योंकि कर्मचारियों की हर गतिविधि की निगरानी और उसका विश्लेषण हो सकता है. उन पर कर्मचारियों का नियंत्रण नहीं होता और वे नहीं जानते कि उनकी सूचनाएं नियोक्ता किस तरह मनमाने ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं. वह चेतावनी देते हैं कि लगातार निगरानी के कारण कर्मचारी दफ़्तर से अपने जीवन के किसी भी पहलू को नियंत्रित करना बंद कर देंगे, जिससे तनाव बढ़ने का ख़तरा रहेगा. इस तरह की कार्यस्थितियां से कर्मचारियों का मानसिक और शारीरिक दोनों नुक़सान होगा. रॉयल एकेडमी ऑफ़ इंजीनियरिंग की वाइस प्रेसिडेंट नाओमी क्लाइमर कहती हैं, वैसे तो कर्मचारियों की निगरानी के पक्ष में भी कुछ सकारात्मक तर्क दिए जाते हैं, जैसे सुरक्षा और अच्छे प्रदर्शन की पहचान, लेकिन यह अक्सर इस तरह लागू किया जाता है जिससे यह कर्मचारियों की स्वायत्तता और गरिमा को कम करता है और तनाव बढ़ाता है. गिग इकॉनमी को पहले से ही ग़रीबों को और क़मजोर करने का दोषी ठहराया जाता है. अत्यधिक निगरानी की तकनीक आ जाने से आख़िरी नतीजा सरकारों, श्रम संगठनों और संघों पर निर्भर करेगा कि वे जोखिम में पड़े लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए कैसा नियामक ढांचा तैयार करते हैं. सिंह का कहना है कि हमें नये सामाजिक अनुबंधों या 21वीं सदी के सुरक्षा तंत्र की ज़रूरत है, जो सभी को समृद्ध करने और आगे बढाने में सहायक हो. कल्याणकारी योजनाओं को और बड़ा और साहसिक बनाना होगा, जितना 7 दशक पहले (ब्रिटिश सुधारक) विलियम बेवरिज ने कल्याणकारी राज्य बनाते समय सोचा था. वैसा ही जैसे 1984 में विंस्टन स्मिथ बिग ब्रदर से लड़ते हैं. लीड्स यूनिवर्सिटी बिज़नेस स्कूल में अर्थशास्त्र के प्रमुख डेविड स्पेंसर का मानना है कि अत्यधिक निगरानी का विरोध होगा और इसका प्रभाव सीमित रह जाएगा. आख़िर में, हमारे पास विकल्प होगा कि तकनीक का विकास कैसे हो. सिंह कुछ उदाहरण देते हैं. हर नियोक्ताओं को सामूहिक रूप से यह कहना चाहते हैं कि गोदाम के कर्मचारियों को टैग करना ठीक नहीं है. हमें ज़ोर देकर कहना चाहिए कि निगरानी के इस युग में मानव अधिकार क़ानून पर फिर से विचार करना चाहिए. हमें यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि हमारी आवाज़ सुनी जाए. हमें स्वचालन और मशीनी अक़्ल पर विचार-विमर्श के लिए मंच चाहिए. हमें ख़राब परिपाटियों पर चर्चा करके उनको दूर करने की ज़रूरत है और सरकार और व्यापार को अपने साथ लाने की आवश्यकता है. आज़ादी का मतलब ग़ुलामी नहीं है. हम बिग ब्रदर को सब कुछ देखने से रोक सकते हैं, अगर हम सतर्क रहें.
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सोना हो, पढ़ना हो या कभी ऐसे ही शांति से बैठे रहना हो तो पहली जगह, बिस्तर ही याद आती है

Date : 21-Jul-2019
दिनभर की थकान अपने बिस्तर पर जाकर ही दूर होती है. सोना हो, पढ़ना हो या कभी ऐसे ही शांति से बैठे रहना हो तो पहली जगह, बिस्तर ही याद आती है. लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है कि जिस बिस्तर पर सोकर आप अपनी सारी थकान दूर करते हैं उसका इतिहास क्या रहा है? वो आया कहां से? इतिहासकार ग्रेग जेनर का कहना है कि बिस्तर के अस्तित्व का सबसे पहला प्रमाण 77 हज़ार साल पहले पाषाण काल में मिलता है. दक्षिण अफ्ऱीका की गुफाओं में लोग अपने हाथ से बने बिस्तरों पर सोते थे. वो बिस्तर चट्टान के बने होते थे. ग्रेग कहते हैं, गुफाएं बहुत आरामदायक नहीं थी और वहां तरह-तरह के कीड़े होते थे. ऐसे में फ़र्श से थोड़ा ऊपर उठकर सोना पड़ता था. ग्रेग बताते हैं कि उस समय के लोग खाना भी बिस्तर पर ही खाते थे जिसके बाद वो बिस्तर चिकना हो जाता था. इसलिए फिर वो उनमें आग लगा देते थे. पुरात्तवविदों को राख की कई ऐसी जली हुई परते मिली हैं जो इस बात का प्रमाण देती हैं. ग्रेग बताते हैं, 10 हज़ार साल पहले नव-पाषाण काल में तुर्की के आधुनिक दिनों में कैटैलहॉक ऐसा पहला शहर था, जहां सोने के लिए लोग ज़मीन के थोड़ा ऊपर बिस्तर लगाते थे. वहीं, ओर्कनेयस (स्कॉटलैंड) के स्कारा ब्रे नाम के गांव में भी इसी तरह के पत्थर के बने बिस्तर देखे गए हैं. ग्रेग कहते हैं, वहां के निवासी पत्थरों का ढेर लगाकर उससे एक तरह से बिस्तर बना लेते थे जिससे वो उस पर लेट सकें. इस पर कुछ बिछा भी सकते थे. ज़मीन के ऊपर लगाए गए पत्थर के बिस्तर असल में दुनिया के पहला पलंग था. ग्रेग का कहना है, लकड़ी के बने बेड को जानवरों के आकार में बनाया जाता था. बेड के पैरों को जानवरों की तरह बनाने में सुंदर नक्काशी का काम किया जाता था. लेकिन वे आधुनिक बेड की तरह सपाट नहीं थे. वे नीचे की ओर थोड़े से झुके होते थे. साथ ही आप नीचे की ओर फिसले नहीं, इसके लिए बेड के निचले सिर पर एक आड़ बनी होती थी. पश्चिम देशों के साथ-साथ चीन के कुछ हिस्सों में भी उठे हुए बेड को ऊंचे दर्जे से जोड़कर देखा जाता था. लेकिन, जापान में ऐसा नही था. वहां आज भी पारंपरिक टेटामी बिस्तर लोकप्रिय हैं और लोग ज़मीन पर बिस्तर लगाकर सोते हैं. ग्रेग के मुताबिक़, कज़ाकिस्तान में आज भी ज़मीन पर बिस्तर लगाने की परंपरा है. वो एक तरह से गद्दे इस्तेमाल करते हैं जिन्हें तशक कहा जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पारंपरिक तौर पर यहां के लोग खानाबदोश रहे हैं और उन्हें अपना टैंट व बेड साथ लेकर घूमना पड़ता है. ये परंपरा आज भी बनी हुई है.
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बुजुर्ग लुक में नजर आए सेलेब्स के लिए बुरी खबर, सुरक्षित नहीं Face App

Date : 18-Jul-2019
दुनिया भर में फ़ेसऐप की धूम मची है. इस ऐप के ज़रिए लोग अपने बुढ़ापे की संभावित तस्वीर देख रहे हैं. सोशल मीडिया पर फ़ेसऐप की तस्वीरें अंधाधुंध पोस्ट की जा रही हैं. यह ऐप किसी भी व्यक्ति की तस्वीर को कृत्रिम तरीक़े से बुज़ुर्ग चेहरे में तब्दील कर देता है. लेकिन आपको अपने बुढ़ापे की तस्वीर जितनी रोमांचित कर रही है उसके अपने ख़तरे भी हैं. यह रूसी ऐप है. जब आप ऐप को फ़ोटो बदलने के लिए भेजते हैं तो यह फ़ेसऐप सर्वर तक जाता है. फ़ेसऐप यूज़र्स की तस्वीर को चुनकर अपलोड करता है. इसमें बदलाव कृत्रिम इंटेलिजेंस के ज़रिए किया जाता है. इसमें सर्वर का इस्तेमाल होता है और ऐप के ज़रिए ही आपको फ़ोटो खींचना होता है. दरअसल, उस ऐप को केवल आप एक फ़ोटो ही नहीं दे रहे हैं बल्कि बहुत कुछ दे रहे होते हैं. आपकी इस तस्वीर का उस वक़्त तो लगता है कि निजी इस्तेमाल हो रहा है लेकिन बाद में इसका सार्वजनिक इस्तेमाल भी किया जा सकता है.यह ऐप आपके फ़ोन से सूचनाओं को हासिल कर सकता है और बाद में इन सूचनाओं का विज्ञापन में इस्तेमाल किया जा सकता है. संभव है कि यह ऐप आपकी आदतों और रुचियों का समझने की कोशिश कर रहा है ताकि विज्ञापन में इस्तेमाल किया जा सके. इसे मार्केटिंग के हथियार के तौर पर भी देखा जा रहा है. कई लोग इस बात की चिंता भी जता रहे हैं कि यह ऐप आपके फ़ोन की सारी तस्वीरों तक पहुंच सकता है. कई लोगों ने यह भी दावा किया है कि ऐप खोलते ही इंटरनेट पर सारी तस्वीरें अपलोड होने लगीं. हालांकि आईओएस और आईफ़ोन में यह विकल्प आता है कि किन तस्वीरों को हैंडओवर करना चाह रहे हैं और किन तस्वीरों को नहीं. फ़ेसऐप को लेकर अमरीकी सीनेट में भी चिंता जताई गई है. सीनेट में अल्पसंख्यक नेता चक शुमर ने फ़ेसऐप की जांच की मांग की है. ट्विटर पर पोस्ट किए पत्र में शुमर ने लिखा है, यह बहुत ही चिंताजनक है. अमरीकी नागरिकों के निजी डेटा विदेशी ताक़तें हासिल कर रही हैं. इन चिंताओं को फ़ेसऐप ने सिरे से ख़ारिज कर दिया है. यह ऐप सेंट पीटर्सबर्ग स्थित कंपनी वायरलेस लैब की है. इस कंपनी का कहना है कि लोगों की तस्वीरें स्थायी रूप से स्टोर नहीं की जा रही हैं और न ही पर्सनल डेटा में सेंधमारी की जा रही है. कंपनी का कहना है कि यूजर्स जिन तस्वीरों को चुन रहे हैं उन्हीं की एडिटिंग की जा रही है. शुमर ने इस ऐप की जांच एफ़बीआई और फ़ेडरल ट्रेड कमिशन से कराने की मांग की है. शुमर ने अपने पत्र में लिखा है, मैं अमरीकी नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा और उसमें सेंधमारी की आशंका को लेकर चिंतित हूं. कई लोग इस बात से अनजान हैं कि इसके ख़तरे क्या हैं. शुमर ने जांच की मांग तब की है जब डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी ने कथित रूप से 2020 के अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में ऐप के इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दी है.सुरक्षा अधिकारी बॉब लॉर्ड ने कथित रूप से अपने स्टाफ़ से कहा है कि निजता पर कितना संकट है इसे लेकर स्थिति बहुत साफ़ नहीं है लेकिन यह साफ़ है कि इसे इस्तेमाल नहीं करने का फ़ायदा ही है. कंपनी का कहना है कि अभी उसके आठ करोड़ यूजर्स हैं. 2017 में फ़ेसऐप काफ़ी विवाद में आ गया था जब उसके एक फीचर में यूजर्स की नस्ल को एडिट करने की सुविधा थी. इसकी आलोचना शुरू हुई तो बाद में कंपनी ने माफ़ी मांग ली और उस फीचर को वापस ले लिया था. नई डिवाइस अलग अलग भाषाओं के लोगों को आपक में बात करने में मदद करती है. फ़ेसऐप कोई नया नहीं है. एथनिसिटी फिल्टर्स को लेकर दो साल पहले यह विवाद में आया था. इसमें एक नस्ल से दूसरे नस्ल में चेहरा बदलने का टूल था. हालांकि फ़्रेंच साइबर सिक्यॉरिटी के एक रिसर्चर का कहना है कि फ़ेसऐप केवल वही तस्वीर लेता है जो यूज़र्स सबमिट करते हैं.
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295 तलाबों का शहर दरभंगा पानी के लिए तरस रहा है

Date : 18-Jul-2019
दरभंगा(बिहार) 18 जुलाई। बीते चार महीनों से जिस जल संकट के चलते दरभंगा और आसपास के जिले के लोगों का जन जीवन अस्त व्यस्त हो रखा था, वह संकट अब दूर हो चुका है. बूंद बूंद पानी को तरस रहे लोगों के सामने अब बाढ़ की चुनौती सामने है. लेकिन महज एक सप्ताह पहले दरभंगा भीषण जल संकट के दौर से गुजर रहा था. बीते चार महीनों से दरभंगा के लोग पानी के लिए तरस रहे थे. इस दौरान आम चुनाव की सरगर्मियां भी देखने को मिलीं, लेकिन दरभंगा में पानी की किल्लत कोई चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया. चुनाव किसी उत्सव की भांति ही हुआ और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार गोपाल ठाकुर एक बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब रहे. शहर में उनके चुनावी प्रचार का केंद्र रहा दरभंगा का वीआईपी माना जाने वाला बलभद्रपुर. इसी बलभद्रपुर में एक चापाकल के पास भरी दोपहरिया में पानी के लिए कुछ लोग जमा थे, इसकी वजह यह थी कि यह इंडियन मार्का चापाकल था और उसमें पानी आ रहा था. कैमरे और माइक को देखती हुई कई महिलाएं भी घरों से बाहर निकल आईं और बताने लगीं कि पानी के लिए तरस रहे हैं और काम चलाने जितने पानी के लिए उन्हें घंटों टैंकरों के सामने संघर्ष करना पड़ रहा है. यह दरभंगा के शहरी हिस्से के करीब हर कोने की तस्वीर थी. इसकी सबसे बड़ी वजह इलाके में भूजल के स्तर का अचानक से गिर जाना था. जून महीने में दरभंगा के शहरी इलाकों में करीब 75 फीसदी घरों के चपाकल पानी नहीं दे रहे थे. कुछ चपाकलों में सुबह सुबह पानी जरूर रहा करता था जो दिन चढ़ने के साथ ही सूखने लगता था. दरभंगा के लहेरियासराय स्टेशन के समीप बहादुरपुर मोहल्ले के मदन मोहन बताते हैं, "पांच सौ घरों के बीच एक ही चापाकल काम कर रहा है. पानी की विकट समस्या है. यह चापाकल भी जिला प्रशासन की ओर खुदवाया गया इंडियन मार्का चापाकल है और एक चपाकल से आस पास के करीब पांच सौ परिवारों का गुजारा जैसे तैसे हो पाया. दरभंगा नगर निगम के मुताबिक इंडियन मार्का -2 के करीब 720 चापाकल दरभंग के शहरी इलाकों में लगाए गए हैं. ऐसे एक चापाकल लगाने में सरकार करीब 50 हज़ार रुपये ख़र्च कर रही है. जाहिर है दरभंगा शहर की तीन लाख आबादी के लिए इतने चापाकल पूरे नहीं हैं और पूरे जिले की आबादी तो 35 लाख से ज्यादा है. ग्रामीण इलाकों में भी पानी का संकट ऐसा ही था, हालांकि बारिश और आस पड़ोस में आयी बाढ़ के बाद स्थिति में काफी सुधार हुआ है. लेकिन इस सुधार से पहले सैकड़ों की संख्या में लोगों ने अपने अपने घरों पर समरसबिल पंप लगवाने पड़े. समरसबिल पंप लगाने के लिए तीन सौ फीट से ज्यादा की खुदाई करना पड़ता है और इस पंप को लगाने का औसत ख़र्च भी करीब एक लाख रुपये बैठता है. बलभद्रपुर के निवासी वसीम अहमद काजमी बताते हैं, हमारे चापाकल में पानी आ नहीं रहा था और टैंकरों के सामने घंटो खड़े रहना पड़ता था. आख़िरकार जैसे तैसे पैसों का इंतजाम करके 90 हज़ार रुपये में समरसिबल पंप लगवाया है, तब राहत मिली है. दरभंगा के मशहूर कुशेश्वरस्थान में है घर है हृदय नारायण चौधरी का. चौधरी गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उनके काका (पिता के भाई) गिरीश्वर चौधरी बिहार के इकलौते ऐसे शख्स थे जो गांधी के दांडी यात्रा में उनके साथ चले थे. हृदय नारायण चौधरी दरभंगा और आसपास के जिलों में नदियों को बचाने का अभियान चला रहे हैं. वे बताते हैं, हमारे यहां तो 30 फीट नीचे कुओं में पानी मिल जाता था. नदी तलाबों में हम नहा लेते थे. आज स्थिति ये हो गई कि पत्नी एक दिन टैंकर से पानी लाते हुए गिर गई तो कर्जा लेकर समरसिबल पंप गड़वाया है. 80 हज़ार रुपये का ख़र्चा आया है. समरसिबल पंप एक तरफ तो सुविधासंपन्न लोग लगा रहे हैं, लेकिन इससे नुकसान आस पड़ोस में रह रहे गरीबों को उठाना पड़ रहा है. समरसिबल पंप लगाए जाने के बाद आस पास के घरों के चापाकल का पानी आना बंद हो जाता है वैसे तो दरभंगा में जल संकट मार्च के बाद से ही गहराने लगा था. इसकी सबसे बड़ी वजह पिछले साल बारिश में हुई कमी मानी जा रही है. पिछले साल यानी 2018 में दरभंगा में औसत से 40-45 फीसदी कम बारिश हुई थी. लेकिन लोगों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले दिनों में पानी का संकट इतना बढ़ जाएगा. दरभंगा के जिला विकास आयुक्त कारी प्रसाद महतो कहते हैं, दरभंगा में जल संकट की तीन प्रमुख वजहें हैं- बीते कुछ सालों से लगातार वर्षा कम हो रही है, हमारे जल स्रोत भी तेजी से सूखते जा रहे हैं, कहीं उसको भर लिया गया है तो कई जगहों पर उसका अतिक्रमण किया जा रहा है. इसके अलावा घरों में भी इस्तेमाल होने वाला पानी नालियों में बहकर बर्बाद हो रहा है, वह जमीन के नीचे तक नहीं पहुंचता है. दरभंगा नगर निगम आयुक्त रवींद्रनाथ बताते हैं, दरभंगा में बारिश के जल संचयन को लेकर जागरूकता का नितांत अभाव है, सरकार 2014 के बाद से कोशिश कर रही है कि रेन हार्वेस्टिंग की दिशा में प्रगति हो लेकिन वह नहीं हो रही है. इत्तेफाक़ यह है कि जिले के जिलाधिकारी त्यागराजन एसएम भी इसी दौरान जिले में पदस्थापित हुए हैं. कह सकते हैं कि उनके लिए स्थिति सिर मुंडाते ही ओले पड़ने जैसी है, लेकिन 34 साल के त्यागराजन समस्या की गंभीरता को युद्धस्तर पर निपटने की कोशिश की. उन्होंने ज्यादा संकट झेल रहे इलाकों में टैंकर और नल के जरिए पानी भेजने के लिए एक कंट्रोल रूम बनाकर उसकी खुद ही मानिटरिंग शुरू की. उनकी इस कोशिश की तारीफ़ ज़िले के आम लोग खूब कर रहे हैं. त्यागराजन इससे पहले राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालांदा में नल जल योजना को सुचारू रूप से संचालित कर चुके हैं, लिहाजा उन्होंने इस काम को यहां भी युद्ध स्तर पर कराने की कोशिश की है, हालांकि अब उनके सामने जिले के अलग अलग हिस्सों में होने वाले जल जमाव को हटाने की भी हो गई है. यह भी संयोग है कि राज्य के जल संसाधन मंत्रालय का ज़िम्मा दरभंगा क्षेत्र से ही आने वाले जनता दल यूनाइटेड के नेता संजय झा के जिम्मे है. वे अपने इलाके में पानी के संकट को लोगों की आदतों से जोड़कर भी देखते हैं. वे कहते हैं, किसने सोचा होगा कि हमेशा पानी से लबालब रहने वाले दरभंगा में लोग पानी के लिए तरसेंगे. हम लोगों ने मनमाने ढंग से पानी को बर्बाद किया है, अब हमें उसको सही ढंग से इस्तेमाल का तरीका सीखना होगा. त्यागराजन यह मानते हैं कि मौजूदा समस्या का स्थायी हल भूजल का स्तर बढ़ाना ही है और इसके लिए कोशिश की जा रही है. उन्होंने बताया कि कई जगहों पर तलाब और नहर की खुदाई की जा रही है. इसके तहत अहिल्याबाई तलाब का जीर्णोद्वार कराया गया है. त्यागराजन के मुताबिक, ज़िले में 217 तलाब हैं, जिनकी नापी कराई जा रही है, 26 तलाबों का अब तक नापी कराई गई है, इनमें पांच तलाबों में अतिक्रमण पाया है और अतिक्रमण करने वालों को नोटिस भेजा गया है. ऐतिहासिक तौर पर दरभंगा तलाबों, नदियों और नालों का शहर रहा है. पश्चिम में बागमती और पूर्व और उत्तर में कमला नदी के बीच में बसा है दरभंगा शहर, जिसके शहर के तौर पर स्थापित होने का प्रमाण 1150 ईस्वी में मिलता है. तिरहुत के राजा गंगदेव सिंह के समय में इस शहर के निर्माण हुआ था. पौराणिक रूप से त्रेता युग में राम के मिथिला यात्रा में दरभंगा में उनके रात्रि विश्राम करने का उल्लेख भी मिलता है. लेकिन 12वीं सदी से लेकर 19वीं सदी तक बागमती और कमला नदी के बीचों बीच बसा दरभंगा, बिहार का एक प्रमुख राजनीतिक केंद्र बना रहा. मिथिलांचल के इलाके को अगर भू विज्ञान की नजर से देखें तो यह हिस्सा ऐसा है जहां हिमालय से उतरने वाली कई नदियां सीधे उतरती है और फिर मैदान हिस्सों में सरपट भागती हुई आगे बढ़ती हैं. ऐसे तिरहुत का यह इलाका डूबने और तैरने वाले लोगों का समाज था, जो नदियों के साथ रहने और जीने की कला सीख चुका था. मौजूदा समय में उत्तर बिहार में आई बाढ़ को जिस तरह से आपदा बताया जा रहा है, वह यह भी बताता है कि हमारे योजनाकारों का स्वभाव, प्रकृति के नियमों को बदलने में ज्यादा विश्वास रखने वाला हो गया है. एक समय था जब इस जिले में 15 से भी ज्यादा नदियां बहा करती थीं. इन नदियों के नाम थे- जीबछ, बकिया, जमबाड़ी, नून, कदाना, व्या, खिरौदी, लकंडी, करेह, धमड़ा, जमुनी, कमला, बलान, बागमती, गंडक, कोसी, गंगा, कल्याणी, परावना, तिलयुगा. इन नामों को देखें तो इनमें किसी के नाम में दुख या पीड़ा का बोध होने वाला पर्यायवाची शब्द नहीं मिलेगा. आज जिन नदियों को आपदा के तौर पर देखा जाता है उन्हें प्राचीन समाज आभूषणों के तौर पर देखता रहा था. दरअसल, उत्तर बिहार की नदियां हिमालय से उतरते समय इधर-उधर सीदी बहने के बदले आड़ी-तिरछी गोल आकार में क्षेत्र को बांधती हुई चलती हैं, गांवों को लपेटती है और उन गांवों का आभूषणों से श्रृंगार किया करती है. प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहा करते थे कि उत्तरी बिहार के गांव नदियों के आभूषणों से ऐसे सजे हुए हैं कि बिना पैर धोए आप इन गांवों में प्रवेश नहीं कर सकते. खिरौदी नामक नदी का नामकरण ही क्षीर अर्थात दूध से हुआ है यानी इस नदी का पानी इतना साफ़ था. लेकिन अब ये नदियां आपको दरभंगा में दिखाई नहीं देती हैं, क्योंकि बाढ़ की आशंका के चलते दरभंगा से पहले ही नदियों के पानी को रोक दिया गया है. कमला और बागमती की नदियों के पानी को भी बाढ़ की आशंका के चलते दरभंगा से पहले बांध के जरिए रोक दिया गया है, जिसके चलते इन नदियों के जल दरभंगा में निकलने वाले दूसरे चौर, आहर, पाइन जैसे परंपरागत स्रोत भी सूख गए हैं जिसका असर भूजल स्तर पर पड़ा है. दरभंगा में हर कस्बे में एक तलाब हुआ करता था. लेकिन इसकी संख्या लगातार कम होती गई. जिले में तालाब बचाओ अभियान समिति चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता नारायण चौधरी बताते हैं, ज़िला गजेटियर 1964 के मुताबिक ज़िले में 350 से 400 तलाबों का जिक्र है. 300 से इनकी संख्या कम होते होते कागजों में 200 तक रह गई है, जबकि हकीकत में ज़िले में 100 तलाब ही रह गए हैं राज्य के जल संसाधन मंत्री संजय झा, बहुत सारे तलाब को भर लिया गया है, एक-एक गांव में 10-15 तलाब थे. लेकिन अब वे कम होते जा रहे हैं जो हैं उनकी देखभाल नहीं हो रही है. बेहद डरावनी स्थिति है. हालांकि दरभंगा के जिलाधिकारी एम त्यागराजन बताते हैं कि जिला प्रशासन के पास 217 तलाबों के रिकॉर्ड मौजूद हैं. हर तलाब की मापी हो रही है और अतिक्रमण करने वालों को हम लगातार नोटिस भेज रहे हैं, कार्रवाई कर रहे हैं. हालांकि ऐसा कर पाने के लिए राज्य प्रशासन कितनी इच्छाशक्ति दिखाती है, ये सवाल बना हुआ है. तलाब भरने की एक समस्या की ओर इशारा करते हुए नारायण चौधरी बताते हैं, असल में है क्या कि दरभंगा में ट्रेड कामर्स है नहीं, इंडस्ट्री है नहीं. ऐसे में भ्रष्ट नौकरशाह और नेता आपस में मिलकर एक तलाब भर लेते हैं और यह चार-पांच करोड़ का बिजनेस हो जाता है, सबमें पैसा बंट जाता है. ऐसा भी नहीं है कि दरभंगा के तलाबों को लेकर एकदम चुप्पी व्याप्त रही है, पिछले कुछ सालों में कुछ तलाबों को भर लिए जाने के मामले स्थानीय तौर पर सुर्खियां भी बटोरते रहे हैं, लोगों की हत्याएं तक हो चुकी हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में कुछ होता नहीं है. तलाबों का अतिक्रमण और उसको भरा जाना ही एकलौता संकट नहीं है, जो तलाब मौजूद हैं, उनकी उड़ाही भी सालों से नहीं हो सकी है. जिसके चलते तलाब का तल, कूड़ा कचरा तलछट आदि से जम चुका है. जिसके चलते तलाबों का पानी भी सड़ने लगा है. ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विद्यानाथ झा बताते हैं, तलाबों के पानी सड़ने से तलाबों के जीवों का जीवन भी नष्ट होता जा रहा है. एक समय दरभंगा में अलग अलग तरह के एक सौ से ज्यादा प्रजाति की मछलियां पाई जाती थीं. आज दरभंगा के तलाबों में इतना प्रदूषण है कि मछलियां मर जाती है. यह संकट अकेले दरभंगा का भी नहीं है. बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 1990 की शुरुआत तक बिहार में 2,50,000 तलाब हुआ करते थे लेकिन इनमें अब महज 93,000 तलाब बचे हैं. उधर जुलाई महीने के पहले सप्ताह में सूखा एवं जल संकट के समाधान के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि प्रदेश के सभी तलाबों और कुओं के अतिक्रमण मुक्त कराने का निर्देश दिया है. उन्होंने कहा कि पताल से भी खोजकर निकाल लेंगे सारे तलाब. लेकिन पटना से लेकर दरभंगा तक जिन तलाबों पर अवैध निर्माण की विशाल इमारतें खड़ी हो चुकी हैं, उन तलाबों को कैसे निकाल पाएगी सरकार, ये सवाल बना हुआ है. दरभंगा के तलाबों पर कब्जे के कई मामलों में ज़िले में राजनतीति की संलिप्ता भी बताई जाती है. दरभंगा शहरी क्षेत्र के विधायक संजय सरावगी कहते हैं, दरअसल यह प्रशासन की इच्छाशक्ति का मामला है, अगर प्रशासन सख्ती बरते तो तलाबों का अतिक्रमण नहीं हो सकता है. हमलोग विधायिका में हैं, यह अतिक्रमण रोकना प्रशासन का काम है, हम लोगों ने तलाबों के अतिक्रमण की बात को विधानसभा में भी उठाया है.हम प्रशासन का हर संभव सहयोग करने को भी तैयार हैं. वहीं दरभंगा के बहादुरपुर विधानसभा से राष्ट्रीय जनता दल के विधायक भोला प्रसाद यादव कहते हैं, सरकार में जो लोग हैं उनकी संलिप्ता की बदौलत कई तलाबों को भर कर लोगों ने घर बना लिया. तलाब आवासीय भूखंड के तौर पर विकसित हो गए. राज्य सरकार ने इसपर कोई सख्ती से ध्यान नहीं दिया. लोग मनमाने ढंग से तलाबों का अतिक्रमण कर रहे हैं दरभंगा और आसपास के लिए यह संकट भले नया हो लेकिन बिहार के पटना-गया-नालंदा जैसे जिलों में भी पानी का संकट बीते कई सालों से गर्मी के महीनों में गहराता रहा है. इसी को ध्यान में रखते हुए बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पिछले दिनों अपने सात निश्चय कार्यक्रम में हर घर को पीने के लिए नल का पानी मुहैया कराने की योजना बनाई है. राज्य के जल संसाधन मंत्री संजय झा कहते हैं, जल नल योजना नहीं होती तो दरभंगा में और भी भयानक स्थिति हो जाती है. लोगों की आधी जान इस योजना के चलते ही बची है. बिहार के नौ सौ गांवों तक नल जल योजना पहुंच चुकी है. इस नल जल योजना के शुरुआत की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. राज्य सरकार ने इस योजना का पायलट चरण पटना से सटे पाली इलाके में किया था. इस योजना की शुरुआत जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि यह प्रयोग पाली गांव में पहले पहल 150 घरों तक पानी पहुंचाने के लिए किया गया और तीन चार दिन के बाद स्थिति यह थी कि वहां के लोगों की प्रतिक्रिया थी- नल जल से बेहतर अपना चापाकल. हालांकि सरकार ने अपनी योजना जारी रखी और आज यह योजना राज्य के अलग अलग हिस्सों में शुरू हो चुकी है. दरभंगा में इस जल संकट के दौरान ही इस योजना को लागू किया गया है. लेकिन कम समय को देखते हुए अभी बस्तियों के सामने तक ही नल लगा है, जहां पर पानी के लिए लोगों की भीड़ जमा हो जाती है क्योंकि पानी सुबह और शाम निर्धारित घंटों के लिए ही आता है. दरभंगा के जिला विकास आयुक्त कारी प्रसाद महतो बताते हैं, जल नल योजना को ठीक ढंग से लागू करने के लिए हमें हर घर तक पाइप पहुंचानी होगी, प्रशिक्षित प्लंबरों की कमी के चलते इस काम को तेज रफ्तार से करना संभव नहीं है. हालांकि जिन इलाकों में भूजल की स्थिति पहले से ही खराब रही हो, उन इलाकों में नल के जरिए जल पहुंचाने का विचार अच्छा हो सकता है लेकिन दरभंगा जैसे जिलों में इस योजना को लागू करने का विरोध भी शुरू हो गया है. दरभंगा के बहादुरपुर के विधायक भोला प्रसाद यादव कहते हैं, यह पूरी तरह से फेल योजना है. यह पैसे का जबर्दस्त लूट है. डीप बोरिंग के चलते पानी तो है लेकिन उसका पाइप लाइन ठीक नहीं है, ठीक ढंग से कनेक्शन नहीं है, पानी आता है तो पूरा का पूरा सड़क पर बह जाता है. इससे बेहद कम पैसे में इंडियन मार्का चापाकल लगाया जा सकता है, लेकिन सरकार का ध्यान समस्या ख़त्म करने पर नहीं है. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे डब्ल्यू कलाम के सहयोगी और तेजस को विकसित करने वाले वैज्ञानिक टीम में शामिल रहे मानस बिहारी वर्मा दरभंगा में ही रहते हैं. वे बताते हैं कि राज्य सरकार की नल जल योजना एक्सपर्ट और विभिन्न साझेदारों की सलाह के बिना आनन फानन में तैयार की गई थी. यह भी जाहिर होता है कि सरकार इस योजना को आनन फानन में लागू भी कर रही है. वैसे नल के जरिए पीने का पानी पहुंचाने से लोगों को सुविधाएं जरूर मिलती हैं, लेकिन यह समस्या कोई स्थायी समाधान नहीं है. चर्चित पुस्तक जल-थल-मल के लेखक और पर्यावरण से जुड़े मसलों पर गंभीरता से काम करने वाले पत्रकार सोपान जोशी बताते हैं, हमारे देश की जलवायु बाकी दुनिया से अलग है, हमारा देश-समाज-इतिहास सब-का-सब चौमासे से बना है, यानी मॉनसून से. हमारी जल व्यवस्था अपने मिट्टी-पानी के स्वभाव से बनी थी. हर कोई बारिश के पानी को संजो के ज़मीन में रोकने के जतन करता था. गुलामी के 200 साल में इन पुराने तरीकों को तोड़ के पानी की लूट पर आधारित एक नयी व्यवस्था खड़ी की गयी. वर्ल्ड बैंक के निर्देशों पर मानवीय सूचकांकों का हवाला देकर सरकारें नल जल योजना को लागू करने पर जोर देती रहती हैं और भारत के तमाम महानगरों में यह व्यवस्था दिखाई देती है. लेकिन इसके योजनाकार ये बात भूल जाते हैं कि शहरों में बड़े बड़े पाइपों के जरिए ग्रामीण इलाकों से पानी खींचकर लाया जाता है और फिर उसे घर-घर तक पहुंचाया जाता है. दिल्ली में जहां पीने का पानी यमुना के जरिए लाया जा रहा है वहीं इसके एनसीआर रीजनल में गंगा का पानी खींचकर लाया जा रहा है. लेकिन जब यह सिलसिला छोटे शहरों और कस्बों में अपनाया जाना लगा, तो सबसे बड़ी समस्या ये उत्पन्न होगी कि उन हिस्सों के लिए पानी किन लोगों के हक को मारकर लाया जाएगा. इतना ही नहीं, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर में पानी की उपलब्धता और उसके उपयोग को राशनिंग करना, पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे के बड़े खेल का हिस्सा भर है. यह माना जाता है कि नल के जरिए जल आने पर एक तो प्रत्येक घर को इसके लिए कीमत देनी होगी. और आगे चलकर पानी की उपलब्धता कुछ लीटर और कुछ घंटे तक सीमित कर दिया जाएगा. यानी जल जैसे प्राकृतिक संसाधन का मामूली हिस्से पर आम लोग निर्भर बनाए जाएंगे जबकि वहीं दूसरी ओर बोतलबंद पानी का कारोबार करने वाले कारपोरेट समूह जमीन के नीचे के पानी का अंधाधुंध दोहन करते रहेंगे. सोपान जोशी इस मुद्दे पर कहते हैं, आज़ादी के बाद हमारे पढ़े-लिखे समाज और उसकी राजनीति ने पानी की इसी लूट को आदर्श मान लिया, इसे विकास का नाम दे दिया. हमारी सरकारें इस विकास के बोरवेल से हमारे समाज के पानी का दोहन कर रही हैं. हर राजनीतिक दल लूटे हुए पानी को बाँट के वोट बटोरना चाहता है. इसमें हर तरह के राजनीतिक नारे भी खप जाते हैं.अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय व्यापार भी इस लूट से मुनाफ़ा कमाने के लिए तैयार हैं. इस लूट की मानसिकता में राष्ट्रीयता से कोई अंतर नहीं पड़ता, राष्ट्रवाद से भी नहीं. जमीन के नीचे के पानी पर प्रभुत्व की इस लड़ाई से दरभंगा के आम लोगों को बहुत ज्यादा मतलब नहीं है. क्योंकि उन्हें तो पीने के पानी की चिंता ज्यादा है, जिसका सामना वे पहली बार कर रहे हैं. दरभंगा के लहेरियासराय स्टेशन के समीप बहादुरपर मोहल्ले की महिलाओं को टैंकर से पानी लेने के लिए रोजाना तीन से चार घंटे तक संघर्ष करना पड़ रहा था, ऐसे में ज्यादातर महिलाएं चाहती है कि जल्दी से घर घर तक नल लग जाए ताकि पानी के लिए बेहद मुश्किल नहीं हो. एक महिला का कहना था, कितना समय बर्बाद करें अगर घर घर तक नल पहुंच जाए तो बहुत अच्छा हो जाएगा. पानी के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. लेकिन नल जल योजना के लिए पानी कहां से आएगा, यह पूछे जाने पर वह कोई जवाब नहीं देती हैं, कहती हैं पहले सरकार तक हमारी बात तो पहुंचाइए. लेकिन असली सवाल यही है कि जल नल योजना से क्या बिहार में जल संकट का स्थायी हल है. संजय झा भरोसा जताते हैं कि उनकी सरकार बिहार में जल संरक्षण को लेकर काफी गंभीर है और आने वाले दिनों इसको लेकर एक व्यापक नीति बनाने पर काम कर रही है. हालांकि बरसात शुरू होने के बाद जल संकट की समस्या कम होती जाएगी, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार जल संरक्षण को लेकर किस तरह का प्रावधान लेकर आती है और अपने नदी और तलाब के जल स्तर को बनाए रखने के लिए कितनी गंभीर कोशिश करती है. नरायण चौधरी बताते हैं, दरभंगा में इस साल पानी का जो संकट देखने को मिला है वह 15 साल से लगातार दस्तक दे रही चुनौती के बाद आया है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बिहार सरकार इन सालों में कभी तलाब और नदियों को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम नहीं कर रही है. नरायण चौधरी कहते हैं, हमने अपने तलाबों और नदियों की हत्या कर दी है, अगर हम उनको पुनर्जीवित नहीं करेंगे तो कोई भी हल जल संकट की समस्या का निदान नहीं हो सकता. सोपान जोशी कहते हैं, कोई सरकार पानी पर कुछ समझदारी से काम करना चाहती है, तो सबसे पहले वह ईमानदारी से इसका आकलन करेगी कि सरकारी योजनाओं ने पानी की लूट और बर्बादी को कैसा बढ़ावा दिया है. इसके बाद यह बात हो कि पहले की गलतियों को सुधारने के व्यवहारिक तरीके क्या हो सकते हैं. ऐसा होता है, तो कुछ नया-ताज़ा होने की उम्मीद जगेगी. वर्ना किसी नये नाम से, किसी नयी योजना के माध्यम से पानी की लूट के और नये तरीके निकल आएँगे. दरभंगा से आने वाले फिल्मकार और सामाजिक कार्यकर्ता रवि पटवा पिछले कुछ महीनों से दरभंगा को ग्रीन सिटी बनाने के लिए जल संरक्षण अभियान चला रहे हैं. रवि पटवा कहते हैं, मिथिला की धरती पर कम से कम दो लाख पेड़ लगाने की योजना है हमलोगों की है. इससे जिले में जल संकट को दूर करने में मदद मिलेगी. हालांकि अपने इस अभियान में रवि पटवा जून महीने तक केवल 670 पेड़ ही लगा पाए हैं और उनके अभियान को एक लंबा रास्ता तय करना है. लेकिन ऐसे लोगों के चलते दरभंगा में जल और पर्यावरण को लेकर जागरूकता का स्तर निश्चित तौर पर बढ़ रहा है. हालांकि पिछले एक सप्ताह के बाद बारिश के बाद दरभंगा के आम चापाकलों में पानी आने लगा है और दरभंगा शहर में जगह जगह जल जमाव भी हो चुका है. पीने का पानी का संकट पूरी तरह भले दूर नहीं हुआ है लेकिन आम लोगों के सामने अब घर से बाहर निकलने का संकट पैदा हो गया है, जाहिर है जल जमाव और जल निकासी के लिए भी जिला प्रशासन के पास कोई व्यवस्था नहीं है. दरभंगा शहरी क्षेत्र के विधायक संजय सारावगी बताते हैं, दरभंगा में आज तक सीवर सिस्टम नहीं बन पाया है. क्योंकि इस काम के लिए 450 करोड़ रुपये का अनुमानित बजट है. इतनी बड़ी धनराशि सरकार के पास नहीं है. अकेला विधायक कहां से पैसा दे सकता है. लेकिन हम लोग लगे हुए हैं. पहले तो नाली और गड्ढे थे, वह अब नहीं हैं. हक़ीकत में, नदियों और तलाबों के रहने से हर साल आने वाली बाढ़ों का असर भी कम होता है और गर्मी के दिनों में पानी का संकट भी नहीं होता है इस बुनियादी बात को दरभंगा के लोग, अधिकारी और नेता जब तक नहीं समझेंगे तब तक दरभंगा एक त्रासदी से दूसरी त्रासदी की ओर भागते हुए लोगों का शहर बना रहेगा.
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क्या भगवान से आपकी मुलाक़ात हुई थी अंतरिक्ष में?

Date : 10-Jul-2019
अंतरिक्ष में जाने वाले राकेश शर्मा एकमात्र भारतीय हैं. अंतरिक्ष जाने वाले पहले भारतीय राकेश शर्मा से वहां से लौटने के बाद भारत में अक्सर लोग पूछा करते थे कि क्या उनकी अंतरिक्ष में भगवान से मुलाक़ात हुई. इस पर उनका जवाब होता था, नहीं मुझे वहां भगवान नहीं मिले. राकेश शर्मा 1984 में अंतरिक्ष यात्रा पर गए थे. उनकी अंतरिक्ष यात्रा को तीन दशक से ज्यादा हो चुके हैं. और अब उनसे मिलने वाले उनके प्रशंसक सच्चाई और अपनी काल्पनिकता के बीच का फर्क बड़ी आसानी से मिटा रहे हैं. वो बताते हैं, अब मेरे पास आने वाली कई महिलाएं, अपने बच्चों से मेरा परिचय यह कह कर कराती है कि ये अंकल चांद पर गए थे. अंतरिक्ष से लौटने के एक साल बाद तक राकेश शर्मा हमेशा प्रशंसकों से घिरे रहते थे. वो हमेशा कहीं ना कहीं जाते रहते थे. होटलों और गेस्ट हाउस में रुका करते थे. समारोहों में वे लोगों के साथ तस्वीरें खिंचवाया करते थे. भाषण दिया करते थे. राकेश शर्मा ने 1984 में अंतरिक्ष केंद्र में आठ दिन बिताए थे. बुजुर्ग महिलाएं दुआएं देती थीं. प्रशंसक उनके कपड़े तक फाड़ देते थे. ऑटोग्राफ लेने के लिए चीखा करते थे. नेता वोट बटोरने के लिए उन्हें अपने क्षेत्र में होने वाले जुलूसों में ले जाया करते थे. वो पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, यह एक बिल्कुल ही अलग एहसास था. प्रशंसकों के इस दीवानेपन से मैं खीझ चुका था और थक चुका था. हर वक्त मुझे हंसते रहना होता था. राकेश शर्मा 21 साल की उम्र में भारतीय वायु सेना से जुड़े थे और वहां वे सुपरसोनिक जेट लड़ाकू विमान उड़ाया करते थे. पाकिस्तान के साथ 1971 की लड़ाई में उन्होंने 21 बार उड़ान भरी थी. उस वक्त वो 23 साल के भी नहीं हुए थे. 25 साल की उम्र में वे वायु सेना के सबसे बेहतरीन पायलट थे. उन्होंने अंतरिक्ष में 35 बार चहल कदमी की थी. और अंतरिक्ष में ऐसा करने वाले वो 128 वें इंसान थे. राकेश शर्मा कहते हैं कि उनकी अंतरिक्ष यात्रा पर बहुत शानदार समारोह हुआ था. जो बात सबसे आसानी से भुला दी गई वो यह थी कि जिस साल राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष में जाने की उपलब्धि हासिल की वो साल सिर्फ़ इस उपलब्धि को छोड़ दें तो भारतीय इतिहास के सबसे ख़राब सालों में शुमार किया जाता है. 1984 का यह साल पंजाब के स्वर्ण मंदिर में सिख अलगाववादियों के ख़िलाफ़ फ़ौजी कार्रवाई और इसके प्रतिशोध में सिख अंगरक्षकों के द्वारा इंदिरा गांधी की हत्या के लिए भी जाना जाता है. इसके बाद देश भर में सिखों के ख़िलाफ़ दंगे भड़क गए थे. इस साल के आख़िरी में भोपाल गैस कांड में हज़ारों लोग मारे गए थे. यह दुनिया के सबसे त्रासदीपूर्ण दुर्घटनाओं में से एक था. एक सोवियत रॉकेट से राकेश शर्मा और दो रूसी अंतरिक्ष यात्री यूरी माल्यशेव और गेनाडी सट्रेकालोव अंतरिक्ष यात्रा पर गए थे. इंदिरा गांधी 1984 से पहले भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों को शुरू करने के लिए प्रयासरत थी. इसके लिए वो सोवियत संघ से मदद ले रही थीं. राकेश शर्मा को 50 फाइटर पायलटों में टेस्ट के बाद चुना गया था. उनके अलावा रवीश मल्होत्रा को भी इस टेस्ट में चुना गया था और इन दोनों को रूस प्रशिक्षण के लिए भेजा गया था. अंतरिक्ष में जाने से एक साल पहले राकेश शर्मा और रवीश मल्होत्रा स्टार सिटी गए थे जो कि मास्को से 70 किलोमीटर दूर था और अंतरिक्ष यात्रियों का प्रशिक्षण केंद्र था. राकेश याद करते हुए कहते हैं, वहां बहुत ठंड थी. हमें बर्फ में एक इमारत से दूसरी इमारत तक पैदल जाना होता था. उनके सामने जल्दी से जल्दी रूसी भाषा सीखने की चुनौती थी. क्योंकि ज़्यादातर उनकी ट्रेनिंग रूसी भाषा में ही होने वाली थी. हर दिन वो छह से सात घंटे रूसी भाषा सीखते थे. इसका असर यह हुआ कि उन्होंने तीन महीने में ठीक-ठाक रूसी सीख ली थी. तीनों अंतरिक्ष यात्रियों की ट्रेनिंग मॉस्को के बाहर स्थित एक केंद्र में हुई थी. उनके खान-पान पर भी ध्यान रखा जाता था. ओलंपिक ट्रेनर उनके स्टेमिना, गति और ताक़त पर नज़र रखे हुए थे और उन्हें प्रशिक्षित कर रहे थे. प्रशिक्षण के दौरान ही मुझे बताया गया कि मुझे चुना गया है और रवीश मल्होत्रा बैकअप के रूप में होंगे. राकेश शर्मा बड़ी विनम्रता से मानते हैं, यह कोई बहुत मुश्किल नहीं था. लेकिन विज्ञान पर लिखने वाले लेखक पल्लव बागला का मानना है कि राकेश शर्मा ने विश्वास की ऊंची छलांग लगाई है. उन्होंने लिखा है, वो एक ऐसे देश से थे जिसका कोई अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम नहीं था. उन्होंने कभी अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना नहीं देखा था. लेकिन उन्होंने विषम भौगोलिक परिस्थितियों में एक दूसरे देश जाकर कठोर प्रशिक्षण हासिल किया. नई भाषा सीखी. वो वाकई में एक हीरो हैं. तीन अप्रैल 1984 को एक सोवियत रॉकेट में राकेश शर्मा और दो रूसी अंतरिक्ष यात्रियों, यूरी माल्यशेव और गेनाडी सट्रेकालोव अंतरिक्ष के लिए रवाना हुए थे. यह उस वक्त के सोवियत रिपब्लिक ऑफ़ कजाख़स्तान के एक अंतरिक्ष केंद्र से रवाना हुई थी. राकेश शर्मा उस लम्हे को याद करते हुए कहते हैं, जिस समय हम रवाना हो रहे थे वो बहुत ही बोरिंग था क्योंकि हम लोगों ने इसका इतना अभ्यास किया था कि यह किसी रूटीन की तरह हो गया था. जब मैंने पूछा कि पृथ्वी से अंतरिक्ष में जाते वक्त क्या वे परेशान भी थे. राकेश का जवाब था, देखिए अंतरिक्ष में जाने वाला मैं 128वां इंसान था. 127 लोग ज़िंदा वापस लौट आए थे. इसलिए घबराने की कोई ऐसी बात नहीं थी. मीडिया ने इस अंतरिक्ष मिशन को भारत और सोवियत संघ की दोस्ती को और प्रगाढ़ होने के रूप में देखा. राकेश शर्मा और उनके साथ जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों ने अंतरिक्ष में करीब आठ दिन गुजारे. राकेश शर्मा वो पहले इंसान थे जिन्होंने अंतरिक्ष में योग का अभ्यास किया. उन्होंने योगाभ्यास करके यह जानने की कोशिश की इससे गुरुत्व के असर को कम करने में मदद मिल सकती है क्या. उन्होंने बताया,यह बहुत मुश्किल था. आपके पैरों के नीचे किसी भी वजन का एहसास नहीं होता है. आप पूरी तरह से हवा में तैरते रहते हैं. इसलिए हमें ख़ुद को थाम कर रखने के लिए कोई उपाय कर के रखना था. जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राकेश शर्मा से पूछा था कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिख रहा है तो उन्होंने हिंदी में कहा था, सारे जहां से अच्छा राकेश शर्मा वायु सेना के टेस्ट पॉयलट के रूप में रिटायर हुए थे. यह मोहम्मद इक़बाल का एक कलाम है जो वो स्कूल के दिनों में हर रोज़ राष्ट्रीय गान के बाद गाया करते थे. राकेश शर्मा बयां करते हैं, यह मुझे अच्छी तरह से याद है. इसमें कुछ भी देशभक्ति के उन्माद जैसा नहीं था. वाकई में अंतरिक्ष से भारत बहुत मनमोहक दिख रहा था. न्यूयॉर्क टाइम्स ने उस वक्त लिखा था कि लंबे समय तक भारत की अपनी कोई मानव अंतरिक्ष यात्रा नहीं होने वाली है. बहुत लंबे समय तक राकेश शर्मा अंतरिक्ष जाने वाले इकलौते भारतीय बने रहेंगे. न्यूयॉर्क टाइम्स की यह बात सही साबित हो रही है. आज 33 सालों के बाद भी राकेश शर्मा अकेले ऐसे भारतीय अंतरिक्ष यात्री हैं जिन्होंने अंतरिक्ष में चहल कदमी की है. भारत अभी तक अपने लोगों को अपनी धरती से अपने रॉकेट में अंतरिक्ष भेजने के ख्वाब ही देख रहा है. राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष से लौटने के बाद फिर से एक जेट पायलट के तौर पर अपनी ज़िंदगी शुरू की. उन्होंने जगुआर और तेजस उड़ाए. उन्होंने बोस्टन की एक कंपनी में चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर के तौर पर भी सेवा दी जो जहाज, टैंक और पनडुब्बियों के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करती थी. आठ साल पहले वो रिटायर हुए और अपने सपनों का घर बनाया. इस घर की छतें तिरछी हैं, बाथरूम में सोलर हीटर लगे हुए हैं, बारिश का पानी एक जगह इकट्ठा होता है. वो अपनी इंटीरियर डिजाइनर बीवी मधु के साथ इस घर में रहते हैं. उनके ऊपर एक बायोपिक बनने की चर्चा है जिसमें चर्चा ये है कि आमिर खान राकेश शर्मा की भूमिका निभाएंगे. मेरा उनसे आख़िरी सवाल था. क्या आप फिर से अंतरिक्ष जाना चाहेंगे? अपनी बालकनी से बाहर देखते हुए उन्होंने कहा, मैं अंतरिक्ष में दोबारा जाना पसंद करूंगा. लेकिन इस बार मैं एक पर्यटक के तौर पर जाना चाहूंगा. जब मैं वहां गया था तो हमारे पास बहुत सारे काम थे करने को.
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अंग्रेजों ने भारत में जाति व्यवस्था का बीज कैसे बोया था?

Date : 22-Jun-2019
भारत की जाति व्यवस्था के बारे में बुनियादी जानकारी के लिए जब आप गूगल करेंगे तो आपको कई वेबसाइटों के सुझाव मिलेंगे, जो अलग-अलग बातों पर ज़ोर देते हैं. इनमें से जिन तीन प्रमुख बिंदुओं को आप रेखांकित कर पाएंगे, वे हैं: पहला, हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था का वर्गीकरण चार श्रेणियों में किया गया है, जिनमें सबसे ऊपर हैं ब्राह्मण. ये पुजारी और शिक्षक होते हैं. इसके बाद क्षत्रिय होते हैं, जो शासक या योद्धा माने जाते हैं. तीसरे स्तर पर वैश्य आते हैं, जो आमतौर पर किसान, व्यापारी और दुकानदार समझे जाते हैं. और वर्गीकरण की इस सूची में सबसे निचला स्थान दिया गया है शुद्रों को, जिन्हें आमतौर पर मजदूर कहा जाता है. इन सभी के अलावा जाति वहिष्कृत लोगों का एक पांचवां समूह भी है, जिसे अपवित्र काम करने वाला समझा गया और इसे चार श्रेणी वाली जाति व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया. दूसरा, जाति व्यवस्था का यह रूप हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ (हिंदू क़ानून का स्रोत समझे जाने वाले मनुस्मृति) में लिखे उपदेशों के आधार पर दिया गया है, जो हजारों साल पुराना है और इसमें शादी, व्यवसाय जैसे जीवन के सभी प्रमुख पहलुओं पर उपदेश दिए गए हैं. तीसरा, जाति आधारित भेदभाव अब गैर-क़ानूनी है और सकारात्मक भेदभाव के लिए कई नीतियां भी हैं. जाति को आधिकारिक बनाए जाने की कहानी समस्या यह है कि पारंपरिक ज्ञान में समय के साथ विद्वानों के किए गए शोध और निष्कर्षों के साथ बदलाव नहीं किया गया है. एक नई किताब, The Truth About Us: The Politics of Information from Manu to Modi में मैंने यह दर्शाया है कि आधुनिक भारत में धर्म और जाति की सामाजिक श्रेणियां कैसे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान विकसित की गई थी. इसका विकास उस समय किया गया था जब सूचना दुर्लभ थी और इस पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा था. यह 19वीं शताब्दी की शुरुआत में मनुस्मृति और ऋगवेद जैसे धर्मग्रंथों की मदद से किया गया था. 19वीं शताब्दी के अंत तक इन जाति श्रेणियों को जनगणना की मदद से मान्यता दी गई. अंग्रेजों ने भारत के स्वदेशी धर्मों की स्वीकृत सूची बनाई, जिसमें हिंदू, सिख और जैन धर्म को शामिल किया गया और उनके ग्रंथों में किए गए दावों के आधार पर धर्मों की सीमाएं और क़ानून तय किए गए. जाति व्यवस्था की शुरुआत जिस हिंदू धर्म को आज व्यापक रूप में स्वीकार किया गया है वो वास्तव में एक विचारधारा (सैद्धांतिक या काल्पनिक) थी, जिसे ब्राह्मणवाद भी कहा जाता है, जो लिखित रूप (वास्तविक नहीं) में मौजूद है और यह उस छोटे समूह के हितों को स्थापित करता है, जो संस्कृत जानता है. इसमें संदेह नहीं है कि भारत में धर्म श्रेणियों को उन्हीं या अन्य ग्रंथो की पुनर्व्याख्या करके बहुत अलग तरीके से परिभाषित किया जा सकता है. कथित चार श्रेणियों वाली जाति व्यवस्था की शुरुआत भीउन्हीं ग्रंथों से किया गया है. वर्गीकरण की यह व्यवस्था सैद्धांतिक थी, जो काग़ज़ों में थी और इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था. 19वीं शताब्दी के अंत में की गई पहली जनगणना से इसका शर्मनाक रूप सामने आया था. योजना यह थी कि सभी हिंदूओं को इन चार श्रेणियों में रखा जाए. लेकिन जातिगत पहचान पर लोगों की प्रतिक्रिया के बाद यह औपनिवेशिक या ब्राह्मणवादी सिद्धांत के तहत रखा जाना मुमकिन नहीं हुआ. 1871 में मद्रास सूबे में जनगणना कार्यों की देखरेख करने वाले डब्ल्यूआर कॉर्निश ने लिखा है कि ...जाति की उपत्पति के संबंध में हम हिंदुओं के पवित्र ग्रंथों में दिए गए उपदेशों पर निर्भर नहीं रह सकते हैं. यह अत्यधिक संदिग्ध है कि क्या कभी कोई ऐसा कालखंड था जिसमें हिंदू चार वर्गों में थे. इसी तरह 1871 में बिहार की जनगणना का नेतृत्व करने वाले नेता और लेखक सीएफ़ मगराथ ने लिखा, मनु द्वारा बनाई गई चार जातियों के अर्थहीन विभाजन को अब अलग रखा जाना चाहिए. वास्तव में यह काफी संदेहास्पद है कि अंग्रेजों की परिभाषित की गई जाति व्यवस्था से पहले समाज में जाति का बहुत महत्व था. आश्चर्यजनक विविधता अंग्रेजों के कार्यकाल से पहले के लिखित दस्तावेजों में पेशेवर इतिहासकारों और दार्शनिकों ने जाति का ज़िक्र बहुत कम पाया है. सामाजिक पहचान लगातार बदलती रही थी. ग़ुलाम सेवक और व्यापारी राजा बने, किसान सैनिक बने, सैनिक किसान बन गए. एक गांव से दूसरे गांव जाते ही सामाजिक पहचान बदल जाती थी. व्यवस्थित जाति उत्पीड़न और बड़े पैमाने पर इस्लाम में धर्म परिवर्तन के बहुत कम ही प्रमाण मिलते हैं. जितने भी साक्ष्य मौजूद हैं वे अंग्रेजों के शासन से पहले भारत में सामाजिक पहचान की एक मौलिक पुनर्कल्पना की बात कहते हैं. जो तस्वीर देखनी चाहिए वह आश्चर्यजनक विविधता की है. अंग्रेजों ने इस पूरी विविधता को धर्म, जाति और जनजाति में बांट दिया. जनगणना का उपयोग श्रेणियों को सरल बनाने और उसे परिभाषित करने के लिए किया गया था, जिसे अंग्रेज शायद ही समझते थे. इसके लिए उन्होंने सुविधाजनक विचारधारा और बेतुकी कार्यप्रणाली का इस्तेमाल किया था. अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी में सुविधा के हिसाब से भारत में सामाजिक पहचान की स्थापना की. यह सबकुछ अंग्रेजों ने अपने मतलब के लिए किया ताकि भारत जैसे देश पर वो आसानी से शासन कर सके. मान्यता और सामाजिक पहचानों की विविधता को एक हद तक सरल बनाने की कोशिश की गई और पूरी तरह से नई श्रेणियां और औहदे बनाए गए. असमान लोगों को एक साथ कर दिया गया, नई सीमाएं तय कर दी गईं. जो नई श्रेणियां बनाई गई थीं, वो अपने मूल अधिकारों के लिए एक और मजबूत होने लगीं. ब्रिटिश भारत में धर्म आधारित मतदाता और स्वतंत्र भारत में जाति आधारित आरक्षण ने इन जाति समूहों को और मजबूती प्रदान की. यह धीरे-धीरे भारत की नियति बन गई. पिछले कुछ दशकों में जो कुछ भी हुआ है उससे यह कहा जा सकता है कि अंग्रेजों ने भारतीय इतिहास का पहला और परिभाषित मसौदा लिखा था. जनता की कल्पना में इस मसौदे को इतनी गहराई से उकेरा गया है कि अब इसे सच मान लिया गया है. यह अनिवार्य हो गया है कि हम इन पर सवाल उठाना शुरू करें.
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हिन्दी के हाथी पर सवार अंग्रेज़ी का महावत.. प्रियदर्शन

Date : 03-Jun-2019
हिंदी से तमिलनाडु का झगड़ा पुराना रहा है. कहते हैं, 1928 में मोतीलाल नेहरू ने हिंदी को भारत में सरकारी कामकाज की भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा तो तमिल नेताओं ने विरोध किया. 10 साल बाद महान तमिल नेता सी राजागोपालाचारी ने हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव दिया तो फिर तमिल नेता इसके विरोध में खड़े हो गए. तमिलनाडु के पहले मुख्यमंत्री अन्ना दुरई के हिंदी विरोध की कहानी वहीं से शुरू होती है. बरसों बाद- संभवतः 1960 में- अन्ना दुरई ने वह मशहूर भाषण दिया जिसमें उन्होंने हिंदी के संख्या बल के तर्क पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि शेरों के मुक़ाबले चूहों की संख्या ज़्यादा है तो क्या चूहों को राष्ट्रीय पशु बना देना चाहिए? उन्होंने पूछा कि मोर के मुक़ाबले कौवों की संख्या ज़्यादा है तो क्या कौवों को राष्ट्रीय पक्षी बना देना चाहिए? वैसे तमिलनाडु में जो बहुत मुखर विरोध थे, उनकी कुछ अभिव्यक्तियां महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल तक में सुनाई पड़ती थीं- यानी उन प्रदेशों में जहां लोग मानते थे कि उनकी भाषा हिंदी के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा प्राचीन और समृद्ध हैं. वैसे राष्ट्र-निर्माण में भाषाओं की अहमियत हमारे राजनेताओं को समझ में आती थी. उन्होंने देखा था कि यूरोप धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर एक होने के बावजूद सिर्फ़ भाषिक आधार पर अलग-अलग देशों में बँटा है. यही नहीं भाषाओं की शक्ति उनकी अपनी आंतरिक गति, शब्द संख्या, संप्रेषण-क्षमता या साहित्यिक समृद्धि से नहीं, उन्हें बोलने वाले देशों की शक्ति से आती है. भाषिक विविधता का सवाल आज़ादी की लड़ाई के दौरान भाषाओं के आधार पर राज्यों के विभाजन को लेकर कांग्रेस के भीतर लगभग आम सहमति थी. महात्मा गांधी ने 10 अक्टूबर 1947 को अपने एक सहयोगी को लिखी चिट्ठी में कहा, मेरा मानना है कि हमें भाषिक प्रांतों के निर्माण में जल्दी करनी चाहिए.....कुछ समय के लिए यह भ्रम हो सकता है कि अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन यह भी संभव है कि भाषिक आधार पर प्रदेशों के गठन के बाद यह ग़ायब हो जाए. जब मुझे समय मिलेगा तो मैं इस पर लिखूंगा.नेहरू भी भारत की भाषिक विविधता को सम्मान से देखते थे. लेकिन सांप्रदायिक आधार पर हुए विभाजन के बाद नेहरू और पटेल दोनों इस राय के हो चुके थे कि अब भाषिक आधार पर किसी विभाजन की ज़मीन तैयार न हो. जबकि उस दौर में पंजाब, मद्रास और बंबई में भाषिक आधार पर राज्यों के बँटवारे को लेकर आंदोलन तीखे हो रहे थे. सबसे तीखा आंदोलन मद्रास के तेलुगू भाषी लोगों ने छेड़ा. गांधीवादी नेता पोट्टी श्रीरामुलू अलग तेलुगू राज्य के गठन के लिए आमरण अनशन पर बैठे जो 50 दिन से ज़्यादा चला और अंततः उनके देहावसान के साथ ख़त्म हुआ. इसके बाद भड़के आंदोलन के दबाव में आंध्र को अलग करने का फ़ैसला लेना पड़ा. बाद में राज्यों के भाषिक आधार पर पुनर्गठन की कहानी सर्वविदित है. हालांकि इस भाषिक पुनर्गठन ने बताया कि इसके आधार पर किसी नए विभाजन का अंदेशा काल्पनिक था. लेकिन नए भारत के नवगठित राज्यों की भाषाओं और हिंदी के बीच का रिश्ता क्या हो, यह सवाल उलझन भरा रहा. संविधान सभा ने राजकाज की भाषा के तौर पर 15 साल के लिए अंग्रेज़ी को मान्यता दी थी जो ग़ैरहिंदीभाषी राज्यों के विरोध की वजह से अब तक बनी हुई है. त्रिभाषा फॉर्म्युला इस भाषाई संकट को हल करने की एक कोशिश थी जिसमें हिंदी, अंग्रेज़ी और एक मातृभाषा पढ़ने का सुझाव था. त्रिभाषा फॉर्मूला तमिलनाडु में हिंदी को लेकर ताज़ा विवाद भी- दिलचस्प है कि इसी पुराने फार्मूले की वजह से पैदा हुआ है. हालांकि केंद्र सरकार अब कह रही है कि त्रिभाषा फार्मूले का यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है. लेकिन सवाल है कि यह बहुत संतुलित दिखने वाला फार्मूला इन तमाम वर्षों में किसकी वजह से फेल हुआ? निश्चय ही इसका दोष हिंदी भाषी प्रदेशों पर आता है. ग़ैर हिंदी भाषी प्रदेशों के छात्रों ने अंग्रेज़ी-हिंदी के साथ कहीं तमिल पढ़ी, कहीं तेलुगू और कहीं मराठी और कहीं बांग्ला, लेकिन हिंदी भाषी प्रदेशों के छात्रों ने संस्कृत को अपनी तीसरी भाषा बना लिया जो देश के किसी भी हिस्से में प्रमुखता से बोली नहीं जाती. निस्संदेह संस्कृत एक प्राचीन और समृद्ध भाषा है जिसका अलग से अध्ययन होना चाहिए, लेकिन इसे त्रिभाषा फार्मूले में फिट कर हिंदी भाषी प्रदेशों ने ग़ैर हिंदी भाषी प्रदेशों से अपनी जो दूरी बढ़ाई, वह लगभग अक्षम्य है. आज अगर हिंदी भाषी भी बड़ी तादाद में तमिल, तेलुगू, मराठी या बांग्ला बोल रहे होते तो वह हिंदी विरोध इन 50 वर्षों में काफी कुछ कम हो चुका होता जो आज एक प्रस्ताव भर से नए सिरे से भड़कता नज़र आता है. वैसे हिंदी प्रेम या हिंदी विरोध के इन ध्रुवों की त्रासदी और भी है. आज की तारीख़ में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाएं वे सौतेली बहनें रह गई हैं जिनकी अम्मा अंग्रेज़ी है. अंग्रेज़ी में ही देश का राजकाज चलता है, कारोबार चलता है, विज्ञान चलता है, विश्वविद्यालय चलते हैं और सारी बौद्धिकता चलती है. अंग्रेज़ी का विशेषाधिकार या आतंक इतना है कि अंग्रेज़ी बोल सकने वाला शख़्स बिना किसी बहस के योग्य मान लिया जाता है. अंग्रेज़ी में कोई अप्रचलित शब्द आए तो आज भी लोग ख़ुशी-ख़ुशी डिक्शनरी पलटते हैं जबकि हिंदी का ऐसा कोई अप्रचलित शब्द अपनी भाषिक हैसियत की वजह से हंसी का पात्र बना दिया जाता है. पिछले तीन दशकों में हिंदी की यह हैसियत और घटी है. पूरे देश में पढ़ाई-लिखाई की भाषा अंग्रेज़ी है और हिंदी घर में बोली जाने वाली बोली रह गई अंग्रेज़ी ने किया बेदख़ल 70 और 80 के दशकों में जो छात्र स्कूल में हिंदी और घर पर मगही, मैथिली, भोजपुरी बोलते थे आज उनके बच्चे स्कूलों में अंग्रेज़ी और घरों में हिंदी बोलते हैं. यानी अंग्रेज़ी ने हिंदी को बेदख़ल कर दिया है और हिंदी ने बोलियों को. बहुत सारे लोगों को यह बात प्रमुदित करती है कि हिंदी को बाज़ार की वजह से बहुत बढ़ावा मिला है. हिंदी फ़िल्में देश-विदेश जा रही हैं, हिंदी के सीरियल हर जगह देखे जा रहे हैं, कंप्यूटर और स्मार्टफोन में हिंदी को जगह मिल रही है, इंटरनेट पर हिंदी दिख रही है, लेकिन वे यह नहीं देखते कि यह अंततः एक बोली के रूप में हिंदी का इस्तेमाल है जो बाज़ार कर रहा है. हिंदी विशेषज्ञता की भाषा नहीं रह गई है. हिंदी फ़िल्मों के निर्देशक और कलाकार अंग्रेज़ी बोलते हैं और हिंदी टीवी चैनलों और अख़बारों के संपादक अंग्रेज़ी के लोग होने लगे हैं. कुछ साल पहले वाणी प्रकाशन के एक आयोजन में उदय प्रकाश, सुधीश पचौरी, और हरीश त्रिवेदी के साथ इन पंक्तियों का लेखक हिंदी के सवाल पर संवादरत था. हरीश त्रिवेदी ने कहा कि हिंदी का हाथी बाज़ार में बहुत शान से चल रहा है. इस लेखक ने ध्यान दिलाया कि इस हाथी पर अंग्रेज़ी का महावत बैठा हुआ है. हिंदी के इस दुर्भाग्य को कुछ और करीने से देखना हो तो यह देखना चाहिए कि पिछले कुछ वर्षों में जो तकनीकी विकास हुआ है, उसके लिए अपनी कोई शब्दावली गढ़ने में हिंदी बुरी तरह नाकाम रही है, बल्कि उसने इसकी कोशिश भी नहीं की है जबकि एक दौर था जब अंग्रेज़ी के तकनीकी शब्दों के बहुत सुंदर अनुवाद हिंदी में हुए और वे चले भी. आज हिंदी ऐसे नए शब्द गढ़ने का अभ्यास और उन्हें चला सकने का आत्मविश्वास खो चुकी है. जो हाल हिंदी का है, संभवतः बहुत दूर तक दूसरी भाषाओं का भी. तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मराठी बांग्ला में प्रकाशनों और कामकाज की स्थिति पहले जैसी नहीं रही. अंग्रेज़ी पर उनकी निर्भरता बढ़ रही है. तमाम राज्यों के पाठ्यक्रम में अंग्रेज़ी को अनिवार्य किया जा रहा है. तमिलनाडु के विरोध का अर्थ ऐसे में तमिलनाडु के हिंदी विरोध का प्रतीकात्मक अर्थ जो भी हो, उसका वास्तविक अर्थ बहुत बचा नहीं है. सच तो यह है कि अब हिंदी और तमिल समेत सभी भारतीय भाषाओं को अंग्रेज़ी के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ मिल कर लड़ने की ज़रूरत है. दुर्भाग्य से भाषाएं अब किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे पर नहीं हैं. कभी समाजवादी लोग हिंदी और भारतीय भाषाओं का आंदोलन चलाते थे. संघ और जनसंघ हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की बात करते थे. लेकिन उनकी हिंदी उस उर्दू से झगड़ा करती रही जिसकी एक शाखा के रूप में वह विकसित हुई और जिसके बिना सहज बोलचाल में उसका काम नहीं चलता रहा. हिंदी की श्रेष्ठ कविता अपनी सारी उत्कृष्टता और अपने सारे वैभव के बावजूद एक ऐसी भाषा में है जिसे बहुसंख्यक हिंदी भाषी भी सीधे-सीधे नहीं समझ पाते. बहरहाल, तमिलनाडु को इस हिंदी विरोध की ज़रूरत नहीं पड़ेगी- एक तो इसलिए कि हिंदी वाक़ई किसी पर थोपी नहीं जा रही और दूसरे इसलिए कि हिंदी हमारी सरकार के एजेंडे पर नहीं है. उसका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बहुत सीमित दृष्टि वाला है जिसमें भाषा को लेकर कोई आग्रह नहीं है. इसलिए ऐसा कोई प्रस्ताव होगा तो वह वापस हो जाएगा. लेकिन यह सवाल फिर भी मौजूं है कि क्या भारतीय राष्ट्र राज्य को हमेशा-हमेशा के लिए अंग्रेज़ी के साम्राज्यवादी वर्चस्व के साथ जीने का अभ्यास करना चाहिए या भारतीय भाषाओं के साझे से एक स्वतंत्र-विविधभाषी समाज का निर्माण करना चाहिए. हालांकि अभी का जो माहौल है, उसमें अंग्रेजी इतनी अपरिहार्य हो उठी है कि ऐसी कोई कल्पना तक हास्यास्पद लगती है.
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अदालतों के लिए गर्मियों की छुट्टियां क्यों? अनघा पाठक

Date : 19-May-2019
गर्मियों की छुट्टियों का मज़ा कौन लेते हैं? इस सवाल के जवाब में आप तुरंत कहेंगे कि स्कूल और कॉलेज. लेकिन इनके साथ एक नाम और जोड़ दीजिए देश के न्यायालय. देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट 13 मई से 30 जून तक गर्मियों की छुट्टियों पर रहेगी. वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट में 6 मई से 1 जून तक छुट्टियां रहेंगी. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में तो सर्दियों की छुट्टियां भी होती हैं- इस साल कोर्ट 2 दिसंबर 2019 से 3 जनवरी 2020 तक बंद रहेगी. अदालतों में छुट्टियों का यह कैलेंडर देखने का बाद आपका मन भी करने लगा होगा कि काश हम भी इन अदालतों के कर्मचारी होते, तो इतनी सारी छुट्टियां मिल जातीं. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट में 193 दिन काम हुआ. जबकि देश की विभिन्न हाईकोर्ट औसतन 210 दिन खुली रहीं. इसके अलावा अन्य अधीनस्त अदालतें 254 दिनों तक काम करती रहीं. लेकिन इन अदालतों से परे ज़िलों और तालुका स्तर की आपराधिक मामलों की अदालतें छुट्टी वाले दिनों में भी काम करती रहीं. हालांकि, छुट्टी वाले दिनों में काम के दौरान किसी भी पुराने मामले के लिए नई तारीखों की घोषणा नहीं होती और सिर्फ ज़मानत याचिकाओं और अन्य ज़रूरी मामलों का निपटारा किया जाता है. अदालतों के अलावा दूसरा कोई भी सरकारी विभाग इतने दिनों तक छुट्टियों पर नहीं जाता. यही वजह है कि अदालतों की ये छुट्टियां हमेशा चर्चा का विषय बनी रहती हैं. कई लोगों का मामना है कि अदालतों की इन छुट्टियों की वजह से ही आम जनता को न्याय मिलने में देरी होती है. साल 2018 के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय अदालतों में 3.3 करोड़ से अधिक मामले अभी विचाराधीन हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि छुट्टियों के चलते यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर अदालतों में इतनी छुट्टियां मिलती क्यों हैं और छुट्टियों का यह नियम आया कहां से? अंग्रेजों का बनाया नियम कई लोगों का कहना है कि अदालतों में गर्मियों की छुट्टियों का नियम अंग्रेज़ों ने अपनी सुविधा के अनुसार बनाया था. महाराष्ट्र के एक पूर्व महाधिवक्ता श्रीहरि अनेय इन छुट्टियों की बहुत ही कड़े शब्दों में निंदा करते हैं. वो कहते हैं, अंग्रेज़ों ने यह व्यवस्था बनाई. गर्मियों के दिनों में अंग्रेज जज किसी पहाड़ी इलाके में या फिर इंग्लैंड चले जाते थे. आज़ादी के बाद भी हम उनके इस नियम को लागू कर रहे हैं. मेरे विचार से अदालतों के पास बहुत ज़्यादा छुट्टियां हैं. दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं जहां कि अदालतें इतनी लंबी छुट्टियों पर जाती हैं. वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता असीम सरोडे को लगता है कि अदालतों में लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए जजों का गर्मियों की छुट्टियों पर जाना उचित नहीं है. वे कहते हैं, मैं यह नहीं कहता कि अदालतों में छुट्टियां होनी ही नहीं चाहिए. लेकिन छुट्टियों के चलते अदालतों का काम पूरी तरह ठप्प नहीं होना चाहिए. इसके स्थान पर कुछ न कुछ वैकल्पिक व्यवस्था ज़रूर होनी चाहिए. कई बार ऐसे मामले आते हैं जिसमें तुरंत न्याय की आवश्यकता होती है. कई बार मानवाधिकार से जुड़े मामलों में तुरंत न्याय की गुंजाइश होती है लेकिन अदालत छुट्टी पर चल रही होती है, ऐसे हालात में यह साबित करना होता है कि हमें तुरंत न्याय क्यों चाहिए. यह बहुत बड़ा अन्याय है. इसीलिए अदालतों में जजों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए. सभी जजों को छुट्टी पर भेजने की जगह इसमें रोटेशन नीति अपनानी चाहिए. असीम सरोडे पुराने नियमों और व्यवस्था को ढोते रहने का विरोध करते हैं और नई व्यवस्था लागू करने की बात करते हैं. वो कहते हैं, दरअसल अदालतों में मिलने वाली यह छुट्टियां अंग्रेज़ों की गुलामी का प्रतीक हैं. हम अभी तक इनसे बाहर नहीं निकल सके हैं. हम विकासशील देश हैं. हमें और तरक्की की ज़रूरत है. और इसके लिए हमें और अधिक काम करने की ज़रूरत है. लेकिन हम तो छुट्टियां ले रहे हैं तनाव कम करने के लिए छुट्टियां ज़रूरी हालांकि, कुछ लोगों का मत है कि अदालतों में छुट्टियां आवश्यक होती हैं. बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील प्रवर्तक पाठक कहते हैं, न्यायव्यवस्था के भीतर वकील और जज बहुत अधिक दबाव में काम कर रहे हैं. इस दबाव को कम करने के लिए छुट्टियां बहुत आवश्यक हैं. वो साथ ही कहते हैं, अदालत में रहना जज की नौकरी का हिस्सा है. लेकिन जब वो कोर्ट में नहीं रहते तब भी वो कोई रिसर्च, किसी ऑर्डर का लेखन, दूसरे आदेश को पढ़ना और क़ानून को लगातार पढ़ते रहने का काम करते रहते हैं. इसलिए उन्हें लंबी छुट्टियों की ज़रूरत महसूस होती है. छुट्टियों के चलते नहीं लंबित होते हैं मामले मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस हरि पारानथमन मानते हैं कि कोर्ट से दूसरे सरकारी विभागों की छुट्टियों की तुलना करना ठीक नहीं है. वो कहते हैं, ये एक अलग तरह का काम होता है. ये सवाल उठाना ग़लत है कि जब किसी अन्य विभाग में छुट्टियां नहीं होती हैं तो कोर्ट में क्यों होनी चाहिए लेकिन एक सवाल अभी भी मौजूद है कि क्या अदालतों में करोड़ों मामले कोर्ट की छुट्टियों की वजह से लंबित हैं. न्यायपालिका में जजों की संख्या में कमी मामलों के लंबित होने के लिए ज़िम्मेदार है. जस्टिस पारानथमन कहते हैं, छुट्टियां कोई मुद्दा नहीं हैं. अदालतों में मामले लंबित हैं क्योंकि किसी तरह की जवाबदेही नहीं है. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. निचली अदालतों में अगर कोई फैसला दो साल में नहीं आता है तो हाई कोर्ट उनसे देरी को लेकर सवाल करती हैं. लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ये सवाल पूछने वाला कोई नहीं है. ऐसे में कानूनी मामले 20 साल तक चलते रहते हैं. न्यायपालिका है आम आदमी के लिए श्रीहरि अनेय मानते हैं कि अदालतों में छुट्टियों के लिए वकील भी ज़िम्मेदार हैं. वह कहते हैं, मैं सभी जजों और वकीलों को मिलने वाली छुट्टियों के ख़िलाफ़ हूं. लेकिन वकील भी इस सिस्टम के ख़िलाफ़ नहीं हैं वे असुरक्षित महसूस करते हैं. वे मानते हैं कि अगर वो छुट्टियों पर गए तो कोई दूसरा वकील उनके क्लाइंट ले उड़ेगा. ऐेसे में वे इन छुट्टियों को ठीक मानते हैं. जब अनेय महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल थे तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र लोढ़ा को पत्र लिखकर उच्च न्यायालयों को मिलने वाली छुट्टियों को कम करने की मांग उठाई थी. इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने एक नोटिस जारी करके सभी बार काउंसिलों और बार एसोशिएसन से छुट्टियों को कम करने पर उनकी राय मांगी थी. अनेय बताते हैं, उस वक्त मुझे और छत्तीसगढ़ के एडवोकेट जनरल को छोड़कर सभी बार एसोशिएसन, सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल और भारतीय बार काउंसिल ने एक मत में कहा कि उन्हें छुट्टियां चाहिए हैं. अनेय मानते हैं कि लोग न्यायपालिका का असली मकसद भूल चुके हैं. वो कहते हैं, न्यायपालिका जज़ों को नौकरी देने और वकीलों को आय का स्रोत देने के लिए गठित नहीं की गई थी. इसका उद्देश्य लोगों को हो रही समस्याओं का निवारण करने और न्याय देने के लिए किया गया था लेकिन मुख्य उद्देश्य नज़रअंदाज़ हो रहा है. छुट्टियों के ख़िलाफ़ मुकदमा अदालतों की छुट्टियों को लेकर कई बार चर्चा की गई है. लेकिन साल 2018 में इन छुट्टियों को लेकर एक मुकदमा दर्ज किया गया था. बीजेपी प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल मुकदमे में मांग की गई उच्च अदालतों को साल के 225 दिन चलने चाहिए और प्रतिदिन न्यूनतम काम के घंटे छह होने चाहिए. इसके साथ ही कोर्ट को कानून मंत्रालय को ये नियम बनाने के लिए आदेश देना चाहिए. उपाध्याय अपने मुकदमे में मांग करते हैं, तत्काल न्याय पाना हर व्यक्ति का मूल अधिकार है. संविधान ने ये अधिकार हर भारतीय नागरिक को दिया है. कोर्ट की छुट्टियां न्याय दिए जाने में देरी करती हैं और आम आदमी के लिए इससे दिक्कतें पैदा होती हैं. इस वजह से अदालतों की छुट्टियां कम होनी चाहिए और जजों के काम करने के घंटे बढ़ाए जाने चाहिए. भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर ने भी साल 2017 में एक सुझाव दिया था कि गर्मियों की छुट्टियों को कुछ मामलों की सुनवाई के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए. अपने सुझाव में उन्होंने कहा था, भारत में लंबित मामले होना कोई नई बात नहीं है. लेकिन अब ये कुछ ज़्यादा ही बढ़ गए हैं. एक तरह न्यायपालिका लंबित मामलों की वजह से काफ़ी तनाव में है तो वहीं न्याय देने में बेहद देरी के चलते आम आदमी ने न्यायपालिका में विश्वास खो दिया है. कोई भी न्याय में देरी होने के लिए ज़िम्मेदार कारणों पर बात नहीं करना चाहता है. ऐसे में त्वरित न्याय का संवैधानिक आश्वासन उपहास का विषय बन गया है. ज़्यादा जज़ों की ज़रूरत लंबित मामलों के त्वरित न्याय को लेकर लगभग हर पक्ष ये मानते है कि जजों की संख्या को बढ़ाकर ही इस समस्या का समाधान निकल सकता है. पूर्व जस्टिस पारानथमन सुझाव देते हैं, भारत में प्रति हज़ार व्यक्ति पर उपलब्ध जज़ों की संख्या दूसरे देशों के मुक़ाबले काफ़ी कम है. ऐसे में लंबित मामलों की समस्या कभी सुलझती नहीं है. छुट्टियों पर दोष देने की जगह न्यायपालिका को ज़्यादा संसाधन उपलब्ध कराया जाना ही इस समस्या का समाधान है.
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हाउस ऑफ़ हॉररः अपने ही 13 बच्चों को सालों जंजीर से बांधे रखा, मां-बाप को 25 साल की सज़ा

Date : 22-Apr-2019
कैलिफ़ोर्निया में अपने 13 बच्चों को गैरक़ानूनी रूप से बिस्तर से बांध कर रखने और उन्हें भूखा रखने के दोषी दंपति को उनके बच्चों ने माफ़ कर दिया है। 13 बच्चों के माता-पिता डेविड और लुईस टर्पिन ने शुक्रवार को रिवरसाइड काउंटी की अदालत में अपना अपराध स्वीकार कर लिया।  इसके बाद अदालत ने इस दंपति को 25 साल की सज़ा दी है। उम्मीद है कि अब ये दंपति अपनी बाकी की ज़िंदगी जेल की सलाखों के पीछे गुजारेगी। इस दंपति को जनवरी 2018 में तब गिरफ़्तार किया गया था जब उनकी एक 17 साल की बेटी ने घर से भाग कर इसकी जानकारी दी टर्पिन दंपति कम-से-कम 9 वर्षों तक अपने 13 में से 12 बच्चों को यातना देने, दुर्व्यवहार करने और जंजीर से बांध कर रखने का दोषी पाया गया है। डेविड और लुईस के बच्चों ने कोर्ट से कहा कि वो तमाम दुर्व्यवहारों के बाद भी अपने माता-पिता से प्यार करते हैं बच्चों ने क्या कहा? दंपति की एक बेटी के बयान को उसके भाई ने पढ़ा, मैं अपने माता-पिता से बेहद प्यार करती हूं। यह हमें पालने का सबसे अच्छा तरीका नहीं था, लेकिन इन्होंने ही मुझे वह इंसान बनाया जो मैं आज हूं। डेविड टुर्पिन (56) और लुईस टुर्पिन (49) अपने बच्चों को बार-बार सज़ा देते और पीटते थे, इसके बाद बच्चों ने घर से भागने की योजना बनाई। दंपति के एक और बच्चे ने जो बताया उसकी आपबीती सुनकर रोंगटे खड़े हो गए। उसने कहा, मैं इसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता कि मुझपर क्या बीती है। कभी कभी मुझे आज भी बुरे सपने आते हैं कि मेरे भाई-बहनों को जंजीर से बांध कर पीटा जाता था। वह बीत चुका है और अब बस यही कहना चाहूंगा कि मैंने अपने माता-पिता को जो बहुत सी चीज़ें उन्होंने हमारे साथ कीं उसके लिए माफ़ कर दिया है। लेकिन सभी बच्चे इतने सुलझे हुए नहीं थे। एक बेटी ने कहा, मेरे माता-पिता ने मुझसे मेरी पूरी ज़िंदगी छीन ली, लेकिन अब मैं अपना जीवन वापस ले रही हूं। मैं मजबूत हूं, एक फ़ाइटर हूं, रॉकेट की तरह ज़िंदगी में आगे बढ़ रही हूं। उसने कहा, मेरे पिता ने मेरी मां को बदल दिया, मैंने ऐसा होते देखा। उन्होंने मुझे लगभग बदल ही दिया था तभी मुझे यह अहसास हुआ कि आखिर हो क्या रहा है। माता-पिता ने क्या कहा? कोर्ट में डेविड और लुईस ने रोते हुए अपने किये पर बच्चों से माफ़ी मांगी। पिता का बयान उनके वकील ने पढ़ा, इसमें लिखा था, मैंने सही मंशा से घर पर शिक्षा देने और अनुशासन सिखाने की कोशिश की। मैंने कभी अपने बच्चों को हानि नहीं पहुंचाना चाहता था। मैं अपने बच्चों से प्यार करता हूं और मुझे लगता है कि मेरे बच्चे भी मुझसे प्यार करते हैं। डेविड अमरीका के प्रसिद्ध रक्षा उत्पादक लॉकहीड मार्टिन और नोर्थ्रोप ग्रुमैन में इंजीनियर रह चुके हैं। हाउसवाइफ़ लुईस ने कोर्ट में अपने किये पर माफ़ी मांगी और कहा, मैं अपने बच्चों से बेहद प्यार करती हूं, मैं उम्मीद करती हूं कि मुझे उन्हें देखने, गले लगाने और उन्हें सॉरी बोलने का मौका मिलेगा। जज ने क्या कहा? कोर्ट में जब जज ने उनके स्वार्थी, क्रूर और अमानवीय व्यवहार की निन्दा की तो दंपति के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। जज बर्नार्ड श्वार्ट्ज़ ने कहा, आपने अपने बच्चों के साथ जो किया वो अब दुनिया के सामने है। आपको कम सज़ा दिए जाने का कारण मेरी नज़र में सिर्फ इतना है कि आपने शुरुआती दौर में ही इसकी ज़िम्मेदारी स्वीकार की है। आपके हॉउस ऑफ़ हॉरर में बच्चों ने अपमान सहन किया और आपने उन्हें नुकसान पहुंचाया है।   बच्चों ने क्या-क्या सहन किये? लॉस एंजेलिस के बाहर दक्षिण में 112 किलोमीटर दूर साफ़-सुथरे इलाके में स्थित इस घर में जब प्रशासन के अधिकारी पहुंचे तो उन्हें चारों ओर गंदगी और बदबू फैली हुई मिली। पुलिस के छापे के दौरान घर में 2 से 29 साल के ये बच्चे बुरी तरह कुपोषित पाए गए। दंपति का एक 22 वर्षीय लड़का बिस्तर से जंजीर से बंधा मिला। उसकी दो बहनों को कुछ समय पहले ही जंजीरों से आज़ाद किया गया था। पीड़ितों को साल में एक बार से अधिक नहाने की मनाही थी, वे शौचालय का उपयोग करने में असमर्थ थे और उनमें से किसी भी बच्चे को कभी दांत के डॉक्टर से नहीं दिखाया गया था। कुछ वयस्क भाई-बहनों का ग्रोथ इतनी कम थी कि अधिकारियों ने उन्हें पहली नज़र में बच्चा समझा। मामला कैसे सामने आया? एबीसी को दंपति की एक बेटी का 911 पर किए गए कॉल का ऑडियो मिला जिसमें उसने वहां रह रहे बच्चों की स्थिति का ज़िक्र किया था। इमरजेंसी ऑपरेटर को उसने बताया... मेरी दो बहनें और एक भाई... बिस्तर में जंजीर से बंधे हैं। 17 वर्षीय इस लड़की को अपने घर का पता तक मालूम नहीं था। उसने कहा, कभी-कभी जब मैं सो कर जागती हूं तो ठीक से सांस तक नहीं ले पाती क्योंकि घर में बहुत बदबू आती है। उस लड़की को महीने और साल तक का पता नहीं था और न ही वो मेडिकेशन यानी चिकित्सा शब्द का मतलब ही जानती थी। इन सभी बच्चों का नाम अंग्रेज़ी का वर्ण जे से शुरू होता है। इन्हें घर में ही रखा जाता था, लेकिन हैलोवीन, डिज़नीलैंड और लास वेगास के फैमिली ट्रिप पर ले जाया गया था। नर्सों, मनोवैज्ञानिकों समेत देश भर के क़रीब 20 लोगों ने इन सात वयस्क भाई-बहनों और छह बच्चों की देखभाल की पेशकश की है।
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