Education

क्या रोज़ाना सिर्फ़ एक घंटे पढ़कर भी कामयाब हुआ जा सकता है?

Date : 21-Apr-2019
बराक ओबामा से लेकर इलोन मस्क तक दुनिया के कई ताक़तवर लोग कहते हैं कि उन्हें पढ़ने से प्यार है. क्या रोज़ाना एक घंटे की पढ़ाई में ही सफलता का राज़ छिपा है? फरवरी 2018 में इलोन मस्क का फाल्कन हेवी रॉकेट अंतरिक्ष में गया तो अपने साथ अंतरिक्ष यात्रियों के काम आने वाली मशीनें ले जाने की जगह टेस्ला की रोडस्टार कार का मॉडल भी ले गया. लाल रंग की इस कार की ड्राइवर सीट पर अंतरिक्ष यात्रियों के कपड़े पहने एक पुतला बैठा था. असली अचंभा ग्लोवबॉक्स में था. उसमें आईसैक ऐसिमोव की फाउंडेशन सिरीज़ की एक किताब रखी थी. सालों पहले 50 हज़ार साल बाद अंतरिक्ष के एक साम्राज्य से जुड़े इस विज्ञान की कहानी ने ही इलोन मस्क के अंदर अंतरिक्ष यात्रा के प्रति दिलचस्पी जगाई थी.यह क़िताबों की ताक़त है. स्नो क्रैश उपन्यास में कल्पना किए गए अर्थ सॉफ्टवेयर में गूगल अर्थ की एक झलक थी. ख़ुद सवाल का उत्तर देने वाले टेलीफ़ोन की एक छोटी कहानी ने संभवतः इंटरनेट के आविष्कार को प्रोत्साहित किया था. किताबों ने अनगिनत आविष्कारकों के दिमाग़ में नई खोजों के बीज डाले हैं. अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का कहना है कि पढ़ाई ने ही उन्हें सिखाया कि वह कौन हैं और किसमें विश्वास करते हैं.अगर आपकी इतनी बड़ी महत्वाकांक्षाएं न भी हों तो किताबें पढ़ने से आपके करियर को बढ़ावा तो ज़रूर मिलता है. पढ़ने की आदत तनाव कम करती है, दिमाग़ को सक्रिय रखती है और आपके संवेदना के स्तर को भी सुधारती है. साथ ही किताबों में दर्ज सूचनाएं तो आपको मिलती ही हैं. किताबें आपको विशिष्ट लोगों के क्लब में शामिल करा सकती हैं. संवेदना के लिए पढ़ें व्यापार जगत पारंपरिक रूप से भावनात्मक मेधा को हाशिए पर रखकर आत्मविश्वास और महत्वपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता को तरज़ीह देता है. लेकिन हाल के वर्षों में भावनात्मक मेधा को एक महत्वपूर्ण कौशल के रूप में देखा जाने लगा है. मानव संसाधन सलाहकार कंपनी डेवलपमेंट डाइमेंशन्स इंटरनेशनलके 2016 के एक अध्ययन के मुताबिक़ जो लीडर संवेदनाओं को समझते हैं वे अन्य के मुक़ाबले 40 फीसदी आगे निकल जाते हैं. सामाजिक मनोवैज्ञानिक डेविड किड का कहना है कि काल्पनिक कहानियां पढ़ने से हम नियमित रूप से दूसरे लोगों के अनूठे अनुभवों से गुज़रते हैं. न्यूयॉर्क के दि न्यू स्कूल फ़ॉर सोशल रिसर्च ने अपने एक सहकर्मी के साथ मिलकर डेविड किड ने यह जांचा कि क्या किताबें पढ़ने से तथाकथित मन में चलने वाले सिद्धांतों में सुधार हो सकता है. यह मोटे तौर पर समझने की क्षमता है कि दूसरे लोगों में विचार और इच्छाएं हैं और वे आपके विचारों और इच्छाओं से अलग हो सकते हैं. यह संवदेना नहीं है, लेकिन ये दोनों कौशल एक-दूसरे से निकटता से जुड़े हुए हैं. किड ने प्रतिभागियों को चार्ल्स डिकेंस की ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स जैसी पुरस्कृत साहित्यिक कथाएं या लोकप्रिय कहानियां जैसे अपराध कथाएं या रोमांटिक उपन्यास पढ़ने को कहा. दूसरे प्रतिभागियों को कोई एक नॉन-फिक्शन किताब पढ़ने को कहा गया. उन्हें कुछ भी न पढ़ने का भी विकल्प दिया गया. फिर यह जांचने के लिए उनका परीक्षण किया गया कि क्या उनके मन के सिद्धांत में सुधार हुआ है. इस अध्ययन के पीछे विचार यह था कि क्या वास्तव में अच्छा लेखन, जिसे पुरस्कारों के लिए चुना जाता है, ज़्यादा यथार्थवादी पात्रों को सामने लाते हैं, जिनके मन से पाठक जुड़ सकते हैं और जो दूसरों के बारे में हमारी समझ विकसित करने में मददगार होते हैं. सामान्य काल्पनिक कथाओं में यह बात नहीं होती. इन्हें आलोचकों का समर्थन नहीं मिलता. शोधकर्ताओं को लगता है कि शायद ऐसे लेखन की गुणवत्ता कम होती है और इनके चरित्र एक-आयामी होते हैं जो पूर्वानुमानित तरीक़े से काम करते हैं. किड के अध्ययन के परिणाम हैरान करने वाले थे. आलोचकों द्वारा सुझाए गए साहित्य के पाठकों ने हर परीक्षण में उच्चतम स्कोर बनाए. जो सामान्य कहानियां पढ़ रहे थे या जिन्होंने कुछ नहीं पढ़ा था, वे पिछड़ गए. विन्फ्रें उन कामयाब लोगों में से एक हैं जिन्हें किताब पढ़ने का शौक है शोधकर्ताओं ने सीधे तौर पर यह नहीं मापा कि वास्तविक दुनिया में मन का यह सिद्धांत कैसे काम करता है, लेकिन किड का कहना है कि नियमित पढ़ना, पाठकों की संवेदना का स्तर बढ़ता है. ज़्यादातर लोग, अगर वे यह जानते हैं कि लोग कैसा महसूस कर रहे हैं तो वे इन सूचनाओं का उपयोग समाज की बेहतरी के लिए करते हैं. सहकर्मियों और कर्मचारियों से रिश्ते सुधारने की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ समानुभूति अधिक सफल बैठकों और सहयोगों में सहायक हो सकती है. किड का कहना है कि जिन समूहों में असहमति प्रकट करने की आज़ादी होती है, वहां लोग ज़्यादा उत्पादक होते हैं- ख़ासकर रचनात्मक कार्यों में. यह बात शोध प्रमाणित है. मुझे लगता है कि यह एक उदाहरण है जहां अन्य लोगों के अनुभवों के प्रति आपकी संवेदनशीलता और उसमें रुचि कार्यस्थलों पर सहायक हो सकती है. ब्रिटिश मीडिया नियामक ऑफ़कॉम ने 2017 में 1875 लोगों के बीच एक सर्वे कराया था. इसके मुताबिक़ ब्रिटिश वयस्क हर दिन औसत रूप से दो घंटे 49 मिनट फ़ोन पर बिताते हैं. एक घंटे किताब पढ़ने के लिए उनको अपना स्क्रीनटाइम बस एक तिहाई घटाना होगा. अगर आपने यह सोचकर ढेरों किताबें इकट्ठा की हैं कि एक दिन उनका ज्ञान ख़ुद ब ख़ुद आपके दिमाग़ में घुस जाएगा या फिर किसी किताब के बारे में बहुत प्रचार करके भी आपने सिर्फ़ पहला पन्ना पढ़ा है तो आपके लिए कुछ टिप्स हैं. 1. पढ़िए क्योंकि आप पढ़ना चाहते हैं क्रिस्टिना चिपरिकी ने चार साल की उम्र में पढ़ना सीखा था. जैसे-जैसे उनके नये जुनून ने ज़ोर पकड़ा, उन्होंने घर में रखी सभी किताबें पढ़ डालीं. वे कहती हैं, जब मैं प्राइमरी स्कूल में पहुंची और पढ़ना अनिवार्य हो गया तो अपनी भाषा शिक्षक के कारण किताबें पढ़ने से एक विकर्षण शुरू हो गया. उसके बाद मैं किताबें पढ़ने से बचने लगी. किताबों से यह विरोध करीब 20 साल तक रहा. फिर धीरे-धीरे उनको अहसास हुआ कि वह क्या खो रही हैं. पढ़ने वाले लोग कहां तक आगे निकल गए और किताबों की शिक्षा उनके करियर को बदल सकती थी. उन्होंने किताबों से फिर से प्यार करना सीखा और सीईओ लाइब्रेरी की स्थापना की. यह एक वेबसाइट है जो उन किताबों के बारे में बताती है जिन्होंने दुनिया के सबसे क़ामयाब लोगों के करियर को बनाया है. ऐसे लोगों में लेखक से लेकर नेता और निवेश प्रबंधक तक शामिल हैं. चिपरिकी में आए इस बदलाव के पीछे कई कारण थे. कुछ शुभेच्छुओं ने उनको इसकी सलाह दी थी. उन्होंने एक ऑनलाइन कोर्स में निवेश करने का फ़ैसला किया था, जहां उनको एक अलग शिक्षण प्रणाली का पता चला. मार्केटिंग कल्चर पर कई किताबों के लेखक रेयान होलीडे का ब्लॉग पढ़ने से भी उनको प्रेरणा मिली. इस कहानी का मर्म यह है कि पढ़िए क्यों आप पढ़ना चाहते हैं. इस आदत को छूटने न दें. 2. वैसे पढ़ें जो आपके काम आए पुस्तक प्रेमी कहलाने के लिए हर वक़्त बगल में किताबें दबाकर घूमने की ज़रूरत नहीं है. इसके लिए किताबों के पहले संस्करण के पीछे भागने की भी ज़रूरत नहीं है. किड कहते हैं, मुझे घर से दफ़्तर आने-जाने में दो-दो घंटे लगते है. यह पढ़ने का आदर्श समय नहीं है, लेकिन मेरे पास ढेर सारा समय रहता है. जब वह सफ़र कर रहे होते हैं ड्राइविंग नहीं तो उनके लिए किताबों की जगह फोन स्क्रीन पर पढ़ना सुविधाजनक होता है. नॉन फिक्शन साहित्य पढ़ते समय आसपास के लोगों की ताक-झांक से बचने के लिए वह किताबों के ऑडियो वर्जन पर चले जाते हैं. 3. अपने लिए डरावने लक्ष्य न बनाएं सीईओ की आदतों पर चलना ख़तरनाक हो सकता है. सीईओ लाइब्रेरी के लिए इंटरव्यू देने वाले दो बेहद ही सफल सीईओ में से एक हैं फैब्रिस ग्रिंडा. टेक उद्यमी ग्रिंडा ने क्रेडिट कार्ड पर एक लाख डॉलर 77 हजार पाउंड के कर्ज़ से शुरुआत की थी. हाल में उन्होंने अपने सफल निवेशों में अपना हिस्सा बेचकर 30 करोड़ डॉलर जुटाए हैं. उद्यमी और समाजसेवी नवीन जैन ने मून एक्सप्रेस का गठन किया था. सिलिकॉन वैली का यह स्टार्ट-अप चंद्रमा पर प्राकृतिक संसाधनों की खुदाई करने की उम्मीद रखता है. ग्रिंडा हर साल 100 किताबें पढ़ते हैं. नवीन जैन हर सुबह 3 घंटे पढ़ने के लिए सुबह 4 बजे जगते हैं. लेकिन सबके लिए ऐसा करना जरूरी नहीं. आंद्रा ज़हारिया एक फ्रीलांस कंटेंट मार्केटर, पॉडकास्ट होस्ट और जुनूनी पाठक हैं. उनकी सलाह है कि अवास्तविक उम्मीदों और डरावने लक्ष्यों से बचना चाहिए. वह कहती हैं, रोज़ाना पढ़ने की शुरुआत छोटे से हो. ज़हारिया का सुझाव है कि दोस्तों से अच्छी किताबों के बारे में पूछें और एक या दो पन्ने पढ़ने से ही शुरुआत करें. आपको गुडरीड्स पर जाकर साल में 60 किताबें पढ़ने का लक्ष्य तय करने की जरूरत नहीं है. किंडल पर किताबें पढ़ना आसान हो सकता है क्योंकि आप बचे हुए पन्नों की संख्या आसानी से नहीं देख सकते. यदि आप किसी किताब के 4 पन्ने पढ़ने के बाद ही उसे छोड़ देने के लिए तैयार हैं या मोटी किताब के पन्ने जल्दी-जल्दी पलटकर उसे ख़त्म कर देना चाहते हैं तो विचार यह है कि उसके 50 पन्ने पढ़ें. 50 पन्ने पढ़ने के बाद मैरी कोंडो के शब्दों में यदि वह किताब खुशी बिखेरती है तो उसे पढ़ें. अगर ऐसा नहीं होता है तो उसे छोड़ दें. इस रणनीति की खोज लेखक, लाइब्रेरियन और साहित्यिक समीक्षक नैंसी पर्ल ने की थी. उन्होंने अपनी किताब बुक लस्ट में इसकी व्याख्या की है. इसमें 50 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों के लिए एक पूर्व-शर्त भी शामिल है. नैंसी का सुझाव है कि ऐसे लोगों को 100 में से अपनी उम्र के साल की संख्या घटानी चाहिए. जो संख्या आती है उतने पन्ने पढ़कर ही वे किसी किताब के बारे में फ़ैसला कर सकते हैं कि किताब आगे पढ़ी जाए या नहीं. क्योंकि बूढ़े होने पर ज़िंदगी के दिन इतने कम बचे रहते हैं कि उसे बुरी किताबों पर ख़र्च नहीं किया जा सकता. तो रणनीति तैयार है. मोबाइल फोन को एक घंटे के लिए अपने हाथ से दूर करें और हथेलियों में कोई किताब थाम लें. यह आपकी संवेदना के स्तर को बढ़ा सकती है, आपको ज़्यादा उत्पादक बना सकती है. यदि दुनिया के सबसे ज़्यादा व्यस्त और क़ामयाब लोग इसे कर सकते हैं तो आप भी कर सकते हैं. कौन जानता है कि अतिरिक्ति ज्ञान और प्रेरणा का आप क्या करें. हो सकता है कि आप भी अंतरिक्ष तक पहुंचने का अपना उद्यम शुरू कर दें
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दुनिया में अब पोते-पोतियों से ज़्यादा दादा-दादी हैं

Date : 20-Apr-2019
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि दुनिया में बच्चों से ज़्यादा बुजुर्ग हो गए हैं. 2018 के अंत में 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों की संख्या 5 साल से कम उम्र के बच्चों से अधिक हो गई. संसार में 65 साल से ज़्यादा उम्र के बूढ़ों की तादाद करीब 70.5 करोड़ है, जबकि शून्य से चार साल के बच्चे करीब 68 करोड़ हैं. ये रुझान जारी रहे तो 2050 में शून्य से चार साल के हर बच्चे पर 65 साल से ज़्यादा उम्र के दो बुजुर्ग होंगे. जनसांख्यिकी विशेषज्ञ पिछले कई दशकों से इस रुझान पर नज़र रखे हुए हैं. ज़्यादातर देशों में इंसान की जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है. वे लंबे वक़्त तक जी रहे हैं और कम बच्चे पैदा कर रहे हैं. जन्म दर घट गई वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट फ़ॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैलुएशन के डायरेक्टर क्रिस्टोफर मरे कहते हैं, बच्चे बहुत कम होंगे और 65 साल से ज़्यादा उम्र के बूढ़े ढेर सारे होंगे. इससे वैश्विक समाज को बनाए रखना बहुत मुश्किल होगा. मरे ने 2018 के एक पेपर भी लिखा था जिसमें उनका कहना है कि दुनिया के लगभग आधे देशों में आबादी के मौजूदा आकार को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त बच्चे नहीं हैं. वह कहते हैं, पोते-पोतियों से अधिक दादा-दादी वाले समाज में इसके सामाजिक और आर्थिक परिणामों के बारे में सोचिए. विश्व बैंक के मुताबिक 1960 में महिलाओं की औसत प्रजनन दर लगभग 5 बच्चों की थी. करीब 60 साल बाद यह आधे से भी कम 2.4 रह गई है. इस दौरान हुई सामाजिक-आर्थिक तरक्की ने धरती पर जन्म लेने वालों को फ़ायदा पहुंचाया है. 1960 में लोग औसत रूप से 52 साल जीते थे. 2017 में जीवन प्रत्याशा बढ़कर 72 साल हो गई है. हम लंबे समय तक जी रहे हैं. जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ रही है हम ज़्यादा संसाधनों की मांग कर रहे हैं. इससे पेंशन और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है. बूढ़ी आबादी बूढ़ी होती आबादी की समस्या विकसित देशों में ज़्यादा बड़ी है. वहां कई वजहों से जन्म दर कम रहती है. ये कारण मुख्यतः आर्थिक समृद्धि से जुड़े हैं. इन देशों में बाल मृत्यु-दर कम है. जन्म नियंत्रण आसानी से संभव होता है और बच्चों की परवरिश महंगी है. इन देशों में महिलाएं अक्सर जीवन के बाद के हिस्से में बच्चे पैदा करती हैं, इसलिए उनकी संख्या कम होती है. जीवन स्तर बेहतर होने से इन देशों में लोग लंबे समय तक जीवित रहते हैं. जापान एक प्रमुख उदाहरण है, जहां बच्चे के जन्म के समय उसकी जीवन प्रत्याशा लगभग 84 साल की है दुनिया में सबसे ज़्यादा. 2018 में जापान की कुल आबादी में 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों का हिस्सा 27 फीसदी था. यह भी दुनिया में सबसे ज़्यादा है. यूएन के मुताबिक यहां की आबादी में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा सिर्फ़ 3.85 फीसदी है. इस दोहरी चुनौती ने पिछले कई दशकों से जापान के अधिकारियों को चिंता में डाल रखा है. पिछले साल सरकार ने रिटायरमेंट की उम्र 65 साल से बढ़ाकर 70 साल कर दी थी. रिटायरमेंट का नया नियम जब लागू होगा तो जापान में रिटायर होने की उम्र दुनिया में सबसे ज़्यादा होगी. जनसंख्या में असंतुलन असंतुलित आबादी विकासशील देशों के लिए भी ख़तरा है. चीन की आबादी में जापान के मुक़ाबले 65 साल से ज़्यादा उम्र के बुजुर्गों का हिस्सा कम 10.6 फीसदी है. लेकिन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में 1970 के दशक में लागू किए आबादी नियंत्रण उपायों के कारण प्रजनन दर अपेक्षाकृत बहुत कम है प्रति महिला सिर्फ़ 1.6. चीन की आबादी में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा 6 फीसदी से भी कम है. बच्चों की संख्या बनाम जीवन की गुणवत्ता ऊंची प्रजनन दर के मामले में अफ्रीकी देश अव्वल हैं. मिसाल के लिए, नाइजर दुनिया का सबसे "उर्वर" देश है. 2017 में यहां महिलाओं की औसत प्रजनन दर 7.2 थी. लेकिन इन देशों में बच्चों की मृत्यु दर भी ऊंची है. नाइजर में हर 1,000 जन्म आधे देशों में संकट आबादी के मामले में 2.1 जादुई नंबर है. जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का मानना है कि यह वह प्रजनन दर है, जिस पर आबादी स्थिर रहती है. जितने बुजुर्गों की मृत्यु होती है, उतने ही बच्चे जन्म ले लेते हैं. संयुक्त राष्ट्र के सबसे ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के आधे देशों 113 में ही इस दर से बच्चे पैदा हो रहे हैं. शोधकर्ता यह भी बताते हैं कि जिन देशों में शिशुओं की मृत्यु दर ऊंची है और जीवन प्रत्याशा कम है, वहां 2.3 प्रजनन दर जरूरी होती है. फिलहाल केवल 99 देश इस आंकड़े को छू पा रहे हैं. दुनिया की कुल आबादी बढ़ रही है. 2024 में वैश्विक आबादी 8 अरब हो सकती है. लेकिन घटती जन्म दर के कारण कई देशों में आबादी गिरने की संभावना है. चरम स्थिति वाले देशों में एक देश रूस है. यहां की महिलाओं की औसत प्रजनन दर 1.75 है. आने वाले कुछ दशकों में रूस की आबादी में भारी गिरावट होने की आशंका है. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रभाग ने हिसाब लगाया है कि रूस की आबादी फिलहाल के 14.3 करोड़ से घटकर 2050 में 13.2 करोड़ हो जाएगी. आर्थिक प्रभाव आबादी घटने और बूढ़ों की संख्या बढ़ने का मतलब होगा काम करने वाले लोगों की संख्या घट जाना. इससे आर्थिक उत्पादकता घट सकती है और विकास बाधित हो सकता है. पिछले नवंबर में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष IMF ने चेतावनी दी थी कि बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के कारण अगले 40 साल में जापान की अर्थव्यवस्था 25 फीसदी तक सिकुड़ सकती है. ऑक्सफोर्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ पॉपुलेशन एजिंग के डायरेक्टर जॉर्ज लीसन कहते हैं, जनसांख्यिकी हमारे जीवन के हर पहलू पर असर डालती है. आप बस अपनी खिड़की से बाहर गली में, सड़क पर झांककर देखिए, लोगों के उपभोग को देखिए. सब कुछ जनसांख्यिकी से प्रेरित है नीति और राजनीति इस बात पर आम सहमति है कि सरकारों को बुढ़ापे के टाइम बम को निष्क्रिय करने के लिए काम करना चाहिए और वे कोशिश कर भी रही हैं. चीन ने 2015 में अपनी वन-चाइल्ड पॉलिसी की समीक्षा की और 2018 में संकेत दिया कि 2019 में वह जनसंख्या प्रतिबंधों को हटा लेगा. सरकारी अखबार पीपुल्स डेली में छपे ऑप-एड के मुताबिक बच्चे को जन्म देना पारिवारिक और राष्ट्रीय मुद्दा भी है. लेकिन पाबंदियों को आसान करने से भी शायद ही समस्या का समाधान हो. 2018 में चीन में 1 करोड़ 52 लाख बच्चों का जन्म हुआ जो पिछले 60 साल में सबसे कम है. चीनी शिक्षाविद इसके पीछे प्रजनन कर सकने वाली महिलाओं की घटती तादाद और आर्थिक कारणों को जिम्मेदार मानते हैं. आर्थिक वजहों से कई परिवार बच्चे पैदा करने की योजना टाल देते हैं. जिन परिवारों में महिलाएं ज़्यादा पढ़ी-लिखी हैं, वे मां की परंपरागत भूमिका निभाने को तैयार नहीं हैं. बूढ़े और मज़बूत जनसंख्या विशेषज्ञों का कहना है कि बूढ़ी होती आबादी के असर को कम करने में बुजुर्गों की सेहत को बढ़ावा देने वाली नीतियों की अहम भूमिका है. सेहतमंद व्यक्ति लंबे वक़्त तक और अधिक ऊर्जा के साथ काम करने में सक्षम होते हैं. इससे स्वास्थ्य सेवाओं की लागत घट सकती है. एक क्षेत्र जिसे अनदेखा किया गया है वह है काम करने वाले लोगों की विविधता, ख़ास तौर पर लैंगिक विविधता. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ILO के मुताबिक 2018 में महिलाओं के लिए वैश्विक श्रम बाज़ार में भागीदारी की दर 48.5 फीसदी थी जो पुरुषों से 25 फीसदी कम रही. आईएलओ के अर्थशास्त्री एक्कहार्ड अर्न्स्ट कहते हैं, जिन अर्थव्यवस्थाओं में महिला श्रम शक्ति की भागीदारी ज़्यादा रहती है वहां विकास दर में गिरावट कम आती है. महिला श्रमिक न सिर्फ़ अर्थव्यवस्था को प्रतिकूल झटकों से उबरने के काबिल बनाती हैं, बल्कि वे एक सशक्त गरीबी-निरोधी उपकरण का प्रतनिधित्व भी करती हैं.
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परिवारों के टूटने बिखरने की क्या वजह हैं...?

Date : 16-Apr-2019
हमारे देश में परिवार को सबसे ज़्यादा अहमियत दी जाती है. लोग अपने परिवार के लिए क्या नहीं कर गुज़रते. कभी परिवार की ख़ुशी के लिए अपनी निजी ख़ुशियों की क़ुर्बानी देते हैं. तो, कभी परिवार के साथ मिल-जुलकर रहने और परिवार को ख़ुश रखना ही अपनी ज़िंदगी का मक़सद बना लेते हैं. दुनिया के बहुत से देशों में परिवार को तरज़ीह देने की संस्कृति है. वहीं कुछ ऐसे देश भी हैं जहां मां-बाप और बच्चे ग़ैरों की तरह ज़िंदगी गुज़ारते हैं. ख़ुदपरस्ती इनकी संस्कृति का हिस्सा है. बुज़ुर्ग मां-बाप को साथ रखना निजी ज़िंदगी में दख़लअंदाज़ी माना जाता है. पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि भूमंडलीकरण की वजह से उन देशों में भी परिवार टूट रहे हैं, जहां अकेले रहने की रिवायत नहीं है. भारत की ही बात करें तो बड़ी संख्या में लोग रोज़गार की तलाश में गांवों से शहरों में या विदेशों में पलायन कर रहे हैं. जिसकी वजह से ना चाहते हुए भी परिवारों में एक दूरी बन रही है. यही हालात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैं और आज रिसर्च का विषय बन गए हैं. ब्रिटेन में स्टैंड अलोन नाम की एक संस्था है, जो परिवार से अलग हो चुके लोगों की मदद करती है. इस संस्था की रिसर्च रिपोर्ट बताती है कि ब्रिटेन में हर पांचवें परिवार में कोई एक सदस्य परिवार से अलग होता है. इसी तरह अमरीका में क़रीब दो हज़ार मांओं और उनके बच्चों पर की गई रिसर्च बताती है कि दस फ़ीसद माएं अपने बच्चों से अलग हो चुकी हैं. अमरीका की ही एक और रिसर्च बताती है कि कुछ समुदायों में मां-बाप का बच्चों से अलग होना इतना ही आम है जितना कि तलाक़ होना.आम चलन स्टैंड अलोन संस्था की संस्थापक बेका ब्लैंड ख़ुद इसी तरह के तजुर्बे से गुज़री हैं. उनका अपने माता-पिता से कोई संपर्क नहीं है. इनका कहना है कि अब से पांच साल पहले तक ये बात इतनी चर्चा में नहीं थी. लेकिन, जब से गूगल पर अकेलेपन से संबंधित शब्द को तलाशा जाने लगा ये शब्द गूगल ट्रेंड्स डेटा में सबसे ऊपर नज़र आने लगे. ख़ास तौर से कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर में तो ये शब्द गूगल पर सबसे ज़्यादा देखा गया. बेका इसकी एक और वजह बताती हैं. उनका कहना है कि साल 2018 में ब्रिटेन के लोगों ने अपने राजकुमार प्रिंस हैरी की पत्नी मेगन मार्कल के बारे में गूगल पर सबसे ज़्यादा सर्च किया. मेगन मार्कल अमरीकियों की सर्च लिस्ट में दूसरे नंबर पर थीं. असल में मेगन मार्कल अपने पिता से अलगाव की वजह से सुर्ख़ियों में थीं. उनके अपने पिता के साथ संबंध अच्छे नहीं रहे थे. कई और बड़े सेलेब्रिटी भी इसी तरह के अनुभव से गुज़र रहे हैं. मिसाल के लिए साल 2018 में ही हॉलीवुड कलाकार सर एंथनी हॉपकिंस ने माना था कि पिछले बीस वर्षों में उन्होंने शायद ही कभी अपनी बेटी से बात की हो. ये चलन नामी शख़्सियतों के साथ-साथ आम लोगों की ज़िंदगी में भी आम बात बनता जा रहा है.अलग होने और साथ रहने की वजह लगभग सभी देशों में आज बुज़ुर्गों के लिए ओल्ड एज हाउस बनने लगे हैं. उन्हें वहां हर तरह की सहूलतें मिल जाती हैं. जिन देशों में कल्याणकारी सुविधाएं बड़े पैमाने पर दी जाती हैं, वहां परिवार के नौजवान सदस्यों को अलग करने में कोई बुराई भी नज़र नहीं आती. उन्हें लगता है कि हर उम्र के लोगों को हमउम्रों की ज़रूरत होती है. वो अपने बुज़ुर्गों के साथ रिश्ता मज़बूत बनाए रखने के लिए भी उनसे दूरी बना लेते हैं. वहीं जिन देशों में सरकार की ओर से बेहतर सुविधाएं नहीं मिलतीं वहां बुज़ुर्ग, नौजवान और बच्चों के बीच मज़बूत रिश्ता और एक दूसरे से लगाव देखने को मिलता है. इसकी मिसाल हमें यूरोप के कुछ देशों में देखने को मिलती है. इसके अलावा शिक्षा का उच्च स्तर भी अलगाव की एक वजह है. जिन लोगों के पास अच्छी शिक्षा है ज़ाहिर वो अच्छे पदों पर काम करते हैं. वो काम के सिलसिले में दूसरे देशों में जाते हैं. इसकी वजह से माता-पिता से दूरी बन जाती है. साथ ही ऐसे परिवारों में आर्थिक रूप से लोग एक दूसरे पर निर्भर नहीं करते. लिहाज़ा उन्हें अलग होने में कोई हिचक भी महसूस नहीं होती. ये भी देखा गया है कि जो अल्पसंख्यक समुदाय के लोग एक दूसरे से ज़्यादा क़रीब रहते हैं. उनके यहां बड़े परिवार भी एक छत के नीचे रहना पसंद करते हैं. ये भी हो सकता है कि असुरक्षा का भाव उन्हें ऐसा करने को कहता हो 20 साल बाद कैसा होगा समाज रिसर्च बताती हैं कि युगांडा के परिवारों में दूरी का चलन तेज़ी से जगह बना रहा है. कम्पाला यूनिवर्सिटी की रिसर्चर स्टीफ़न वनडेरा का कहना है कि रिवायती तौर पर युगांडा में बहुत बड़े-बड़े परिवार होते हैं. पूरा कुनबा एक साथ रहता है. लेकिन हाल के कुछ दशकों में इसमें बदलाव आया है. पहले बड़े परिवारों के बहुत से सदस्य युगांडा में गृह युद्ध के शिकार या एड्स के मरीज़ों की मदद में सारा जीवन समर्पित कर देते थे. पर, अब हालात बदल गए हैं. अब युगांडा में 50 से ऊपर की उम्र के क़रीब 9 फ़ीसद लोगों ने अकेले जीवन गुज़ारना शुरू कर दिया है. शायद इसकी वजह शहरीकरण है. शहरों में बड़े परिवार को साथ रखना आसान नहीं है. इसलिए भी बुज़ुर्गों के साथ अलगाव की स्थिति पैदा हो रही है. और गुज़रते दौर के साथ ये स्थिति और मज़बूत होगी. लेकिन कुछ रिसर्चर मानते हैं कि किसी भी समाज में सांस्कृतिक मूल्य बहुत मज़बूत होते हैं. वो आसानी से ख़त्म नहीं होते. लिहाज़ा जिन समाज में परिवार के साथ रहने का चलन है वो आगे भी रहेगा. लेकिन रिसर्चर वनडेरा को यक़ीन है कि आने वाले 20 साल में स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी.तलाक़ और अलगाव समाज में तलाक़ का चलन बढ़ता जा रहा है और परिवार टूट रहे हैं. इसके अलावा अलग सेक्सुअल पहचान वाले लोगों के लिए भी परिवार के साथ रहना मुश्किल हो जाता है और ख़ामोशी से अलग हो जाते हैं. ऐसा नहीं है कि परिवार में अलगाव तेज़ी से और रातों रात हो रहा है. बल्कि ये बहुत धीरे-धीरे हो रहा है. कई बार छोटी सी घटना भी परिवार को तोड़ देती है. कहने को तो वो एक घटना होती है लेकिन उसके नतीजे दूरगामी होते हैं. उम्र के फ़र्क़ के साथ-साथ मां और बच्चों के मूल्यों में अंतर आ जाता है. मिसाल के लिए अगर मां बहुत धार्मिक हैं और उन्होंने बच्चों को भी वहीं संस्कार दिए तो भी ज़रूरी नहीं कि बच्चे उन्हीं संस्कारों को मानें. यहीं से टकराव की शुरूआत होती है. अलगाव की स्थिति पैदा हो जाती है. ये भी देखा गया है कि आमतौर से अलग होने वाले माता-पिता और बच्चों के बीच अलग होने की वजह को लेकर कोई संवाद नहीं होता. इसलिए पता ही नहीं चलता कि आख़िर वजह क्या है. इसके अलावा भाई-बहनों के अलग मिज़ाज और माता-पिता का किसी एक बच्चे के प्रति गहरा लगाव भी अलगाव की वजह बन जाते हैं.दूसरा पहलू अलगाव के नतीजे हमेशा ही ख़राब हों ऐसा भी नहीं. बहुत से केस में इसके नतीजे बहुत सकारात्मक रहे हैं. मिसाल के लिए कई समाज में तलाक़ को बुरा माना जाता है. लेकिन एक तल्ख़ रिश्ते में रहने से बेहतर है अलग हो जाना. हालांकि बच्चों के लिए मुश्किल होती है. लेकिन, पति पत्नी की ज़िंदगी बेहतर हो जाती है. जिंदगी में आगे बढ़ने का मौक़े मिल जाते हैं. मर्द हो या औरत वो स्वाभाविक तौर पर आज़ाद रहना चाहता है. और अलग होने के बाद वो इस आज़ादी का मज़ा ले पाता है. ऐसा भी नहीं है कि परिवार में अलगाव स्थाई हो या पूरे परिवार से अलगाव हो. कई मर्तबा कुछ समय बाद लोग फिर से मिल जाते हैं. वियतनाम में ऐसे बहुत से परिवार हैं जहां एलजीबीटी सदस्यों को मां-बाप अपने से अलग कर देते हैं. लेकिन, भाई बहन उनके साथ रहते हैं. इसके अलावा परिवार से अलग होने के मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होते हैं. लेकिन ये प्रभाव जज़्बाती तौर पर मज़बूत करते हैं. महिलाओं पर ख़ास तौर से ज़ज़्बाती तौर पर बुरा असर पड़ता है. यहां तक कि कई परिवार समाज में अलग पड़ जाते हैं. वो अपने परिवार की स्थिति के बारे में किसी से बात करने से कतराते हैं. इस सबके बावजूद रिसर्चरों का कहना है कि जो लोग परिवार से अलग होने का फ़ैसला करते हैं, वो ज़्यादा मज़बूत इरादों वाले और आत्मनिर्भर होते हैं. हर बात के एक नहीं कई पहलू होते हैं और हर पहलू अहम होता है. अलगाव के अगर नुक़सान हैं तो फ़ायदे भी हैं. अलगाव किसी भी व्यक्ति को समाज में अपनी पहचान बनाने और अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीने का मौक़ा देता है.
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शादी के बहाने बार-बार बेची जाती हैं यहां लड़कियां

Date : 14-Apr-2019
यूपी के लोग जुआ खेलते हैं, शराब पीते हैं और दूसरी-तीसरी शादी करने में जरा भी नहीं हिचकते. गार्जियन अपने देस, अपने क्षेत्र में देखकर शादी क्यों नहीं करता. ये कहते हुए गुस्से से भरी राबिया का गला रुंध जाता है. जैसे अतीत में छुपा उसका कोई जख़्म ताजा हो गया हो. तीन बच्चों की मां राबिया की शादी किस साल हुई, उत्तर प्रदेश में कहां हुई, उसे नहीं मालूम. बस इतना मालूम है कि उसके पति का घर किसी जनाना अस्पताल के पास था. राबिया को उसकी मौसी ने शादी के नाम पर दलाल को बेच दिया था. राबिया बताती हैं, मेरी झूठ बोलकर शादी हुई थी. कहा कि लड़के का अपना घर है, पेपर में नौकरी करता है. लेकिन, वो झोपड़ी में रहता था और रिक्शा चलाता था. बहुत मार पीट करता था, खाने में मिट्टी डाल देता था, दूसरों के साथ सोने के लिए कहता और बच्चों को बीड़ी से दाग देता था. हम कटिहार भाग आए. यहां मां- बाप, भाभी का ताना सुनते हैं लेकिन जी तो रहे हैं. कइयों के जीवन का दर्द राबिया के घर से कुछ किलोमीटर दूर रहने वाली सोनम भी पति के यहां से भाग आई थी. गांव में एक छोटी सी किराने की दुकान उसका सहारा है. बिन मां बाप की इस बच्ची का सौदा पड़ोसियों ने किया था. हले ट्रेन और फिर बस से उसका दूल्हा उसे विदा कर यूपी ले गया था. इतना लंबा सफर उसने ज़िंदगी में पहली बार किया था और सुखी ज़िंदगी के ढेर सारे सपने भी उसकी आंखों में पहली बार बंद हुए थे. लेकिन, जब असल ज़िंदगी से पाला पड़ा तो वो बिखर गई. सोनम बताती हैं, पति कहता था कि दूसरे मर्द के साथ सोना है. नहीं जाने पर बहुत मारता था और कहता था तुम्हें बेच कर दूसरी शादी करेंगे. सोनम के पास अपने बीत चुके जीवन की दो निशानियां है. पहला उसके बच्चे और दूसरा दाएं पांव में लगे चाकू के जख़्म के गहरे निशान. दर्द की इसी कश्ती की सवार 26 साल की आरती भी है. मानसिक तौर पर बीमार इस लड़की के माथे पर जख्म के बहुत गहरे निशान है. उसकी शादी के लिए 3 दलाल आए थे. आरती की मां से कहा कि लड़का बहुत अच्छा है. वो बताती हैं, रात में शादी हो गई. कोई पंडित नहीं था, मंतर भी नहीं पढ़े गए और गांव का भी कोई आदमी नहीं था. पुराने कपड़ों में ही शादी कराकर ले गए. बाद में पता चला कि बेटी को बहुत मारता है तो हम ढूंढ़कर बेटी को वापस ले आए. अब ये बकरी चराती है. राबिया, सोनम और आरती जैसी तमाम पीड़िताओं को नहीं मालूम कि यूपी में उनकी शादी हुई कहां थी. सीमांचल में ब्राइड ट्रैफिकिंग बिहार में ब्राइड ट्रैफिकिंग यानि झूठी शादी करके मानव तस्करी के मामले आम हैं. खासतौर पर सीमांचल यानी पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया जिले के ग्रामीण हिस्सों में. जहां गरीबी, प्राकृतिक आपदा और लड़की की शादी से जुड़े खर्चों के चलते लड़कियों को शादी के नाम पर बेच दिया जाता है. शिल्पी सिंह बीते 16 साल से इलाके में ट्रैफिकिंग पर काम कर रही हैं. उनकी संस्था भूमिका विहार ने साल 2016-17 में कटिहार और अररिया के दस हजार परिवारों के बीच एक सर्वे किया था. जिसमें 142 मामले में दलाल के जरिए शादी की गई थी. सबसे ज़्यादा ऐसी शादियां उत्तर प्रदेश में होती हैं. उत्तर प्रदेश के अलावा हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और पंजाब भी ब्राइड ट्रैफिकिंग के केन्द्र हैं. शिल्पी बताती हैं, यहां दलाल स्लीपर सेल की तरह काम करते हैं और वो लगातार संभावित शिकार पर नज़र रखते हैं. जब उन्हें मालूम चलता है कि परिवार मुश्किल में है तो खुद या किसी रिश्तेदार को पैसे देकर झूठी शादी करा देते हैं. बाद में लड़की कहां गई, किसी को मालूम नहीं चलता. मानव तस्करी का स्रोत है बिहार स्टेट बैंक आफ इंडिया के इकोरैप नाम के पब्लिकेशन में मार्च 2019 में छपी रिपोर्ट के मुताबिक बिहार मानव विकास सूचकांकों में सबसे नीचे है. 1990 से 2017 तक के आंकड़े दिखाते हैं कि मानव विकास सूचकांक में बेहतरी के लिए काम करने में भी बिहार भारतीय राज्यों में सबसे बेहाल है. बिहार से सस्ते श्रम, देह व्यापार, मानव अंग और झूठी शादी के लिए मानव तस्करी होती है. बीते एक दशक में मानव तस्करी के कुछ 753 मामले पुलिस ने दर्ज किए. 2274 मानव तस्करों की गिरफ्तारी हुई. 1049 महिला और 2314 पुरुषों को मानव तस्करों के चंगुल से मुक्त कराया गया. अपराध अनुसंधान विभाग के अपर पुलिस महानिदेशक विनय कुमार कहते हैं, जहां कहीं भी लिंगानुपात कम है, वहां शादी के नाम पर लड़कियों की तस्करी के लिए गैंग ऑपरेट करते हैं. ये गैंग मां-बाप को लालच देते हैं और वो पैसे के लिए ऐसी शादियों के लिए सहमत हो जाते हैं. बाद में कई लड़कियों की री -ट्रैफिकिंग भी हो जाती है. ये पूरी प्रक्रिया मांग और आपूर्ति की है. बिहार का लिंगानुपात 918 है जबकि सीमांचल का 927. यही वजह है कि जिन राज्यों में लिंगानुपात कम है, उनके लिए सीमांचल की लड़कियां आसान शिकार हैं. यही वजह थी कि साल 2014 में बीजेपी नेता ओ पी धनकड़ ने एक सभा में कहा था, हरियाणा में बीजेपी सरकार आती है तो राज्य के नौजवानों की शादी के लिए बिहार से लड़कियां लाई जाएंगी. बार-बार बिकती हैं लड़कियां खैनी मजदूर घोली देवी की ननद भी री-ट्रैफिकिंग की शिकार हुई हैं. घोली देवी बताती हैं, ननद साफ रंग की थी. एक दिन सुंदर से दुल्हे के साथ दलाल आया और ननद को ब्याह ले गया. बाद में मेरी सास ने 6000 रूपये खर्च करके दो बार ननद का पता ढूंढ़ा लेकिन पता चला कि ननद बिक गयी थी. मेरी सास इस दुख में पागल होकर मर गई. घोली देवी जैसे कई परिवार सालों से अपनी बेटी की ख़बर का इंतज़ार कर रहे हैं. नेता से ट्रैफिकिंग कहते, ते वो ट्रैफिक व्यवस्था समझते बीजेपी नेता किरन घई बिहार विधान परिषद बाल विकास महिला सशक्तीकऱण समिति की अध्यक्ष रही हैं. वो मानती है कि ट्रैफिकिंग का मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए अहमियत नहीं रखता. वो कहती हैं, समिति के अध्यक्ष रहते हुए मेरा अनुभव है कि नेता ट्रैफिकिंग को ट्रैफिक व्यवस्था से जोड़ देते थे. ये सामाजिक मुद्दे पॉलिटिकल एजेंडा में तब्दील हो, इसके लिए बहुत संवेदनशीलता की जरूरत है, जो फिलहाल नहीं दिखती. तस्करी के जाल से निकली रीता ने फिर से पढ़ाई शुरू कर दी है. उम्मीद भी है...... कटिहार के ही एक गांव में एक चबूतरे पर 15 लड़कियां जुटी हैं. वो मिलकर गीत गा रही हैं..... दूल्हा बनके गांव में घुसे, जाने सबके भेदवा दारू भी पिलावे, सबके ताड़ी भी पिलावे आपन गांव के बेटी बिके बनके दुल्हनियां 12 से 18 साल की लड़कियों के इस किशोरी समूह में रीता भी है. आठवीं में पढ़ने वाली रीता 15 साल की थी जब गइसा देवी नाम की दलाल ने अपने साथियों के साथ मिलकर जबरन उसकी शादी करवा दी थी. रीता तीन महीने बीतते-बीतते भाग आई और फिर से पढ़ाई शुरू कर दी. रीता कहती हैं, पढ़ते-लिखते हैं और अपनी सहेलियों को बताते हैं कि दलाल के चक्कर में शादी मत करना. सीमांचल के इलाके में रीता जैसी कई लड़कियों ने इस बार इंटरमीडिएट की परीक्षा फर्स्ट डिवीजन से पास की है.
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अकेले यात्रा करना हो तो कुन्नूर अच्छा आप्शन हो सकता है

Date : 12-Apr-2019

अगर आप सोलो ट्रिप यानी अकेले कहीं जाना चाहते हैं तो इसके लिए दक्षिण भारत स्थित हिल स्टेशन कुन्नूरअच्छा ऑप्शन हो सकता है। यहां न सिर्फ आपको रोमांचित होने वाला अनुभव मिलेगा बल्कि प्रकृति की गोद में मन को शांति भी मिलेगी। तो अगर आप यहां जाने वाले हैं तो हम बता रहे हैं यहां के कुछ फेमस टूरिस्ट स्पॉट्स।तमिलनाडु में कुन्नूर से ऊटी के बीच चलने वाली टॉय ट्रेन का मजा जरूर लें। भाप से चलने वाली यह माउंटेन ट्रेन पहाड़ियों के बीच से होती हुई जाती है, जो आपको नैचर को इंजॉय करने का मौका देने के साथ ही रोमांच का मजा भी देगी। 
 


डॉल्फिन्स नोज 
जैसा की नाम से ही पता चलता है यह जगह डॉल्फिन की नाक के शेप जैसी है। यह स्थान कुन्नूर के फेमस टूरिस्ट स्पॉट में से एक है। मुख्य शहर से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस जगह से आप घने जंगल, ग्रीनरी और पहाड़ियों के दिल को लुभाने वाले नजारे देख सकेंगे। 

लेडी कैनिंग्स सीट 
इस जगह से आप नीलगिरी की पहाड़ियों के खूबसूरत नजारे देख सकेंगे। यहां पर चाय के बड़े बागान भी हैं, जिसके कारण आपकी नजरों के आगे सिर्फ ग्रीनरी ही ग्रीनरी दिखाई देगी। शहर की इमारतों और ऑफिस की बिल्डिंग में करीब आधा दिन बिताने वालों के लिए यह अनुभव काफी सुकूनभरा होगा।रालि बांध 
ट्रेकिंग का शौक रखने वालों के लिए यह जगह बेस्ट है। इस बांध तक पहुंचने का रास्ता जंगल से होते हुए खूबसूरत ट्रेक से है। इससे आप जंगलों की खूबसूरती को इंजॉय करते हुए बांध में भरे पानी और वहां आने वाले पक्षियों की आवाज से रोमांच के साथ ही शांति को एक्सपीरियंस कर पाएंगे। 

सिम्स पार्क 
कुन्नूर के प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट में से एक सिम्स पार्क फेमस बॉटैनिकल गार्डन है, जहां पर कई तरह के सुंदर फूल लोगों को अपनी ओर अट्रैक्ट करते हैं। 12 एकड़ में फैले इस गार्डन में रोज गार्डन भी है जहां पर देशभर में पाई जाने वाले गुलाब देखे जा सकते हैं। यह जगह सुबह 7 बजे से लेकर शाम को 6 बजे तक खुली रहती है।  

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रवांडा का वो नरसंहार जब 100 दिनों में हुआ था 8 लाख लोगों का क़त्लेआम

Date : 11-Apr-2019
जिस दिन मेरे बेटे की हत्या हुई, उस सुबह उसने अपने दोस्त से कहा था कि उसे लगता है कि कोई उसकी गर्दन काट देगा. जब-जब मुझे उसकी ये बात याद आती है तो मैं अंदर से टूट जाती हूं. उस दिन सेलिस्टिन दो हमलावरों के साथ मेरे घर में दाख़िल हुआ. उनके हाथों में लंबे-लंबे चाकू और तलवार नुमा हथियार थे. हमनें अपनी जान बचाकर घर से भागने की कोशिश की. लेकिन सेलिस्टिन ने अपने तलवार नुमा हथियार से मेरे दो बच्चों की गर्दनें काट दीं. ये शब्द हैं रवांडा में तुत्सी और हूतू समुदायों के बीच हुए भयानक जनसंहार में ज़िंदा बचने वाली एक मां ऐन-मेरी उवीमाना के. उवीमाना के बच्चों को मारने वाला शख़्स सेलिस्टन कोई और नहीं बल्कि उनका पड़ोसी था. सेलिस्टिन की तरह ही हूतू समुदाय से जुड़े तमाम लोगों ने 7 अप्रैल 1994 से लेकर अगले सौ दिनों तक तुत्सी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अपने पड़ोसियों, अपनी पत्नियों और रिश्तेदारों को जान से मारना शुरू कर दिया. इस तरह इस जनसंहार में लगभग आठ लाख लोगों की मौत हुई. तुत्सी समुदाय की तमाम महिलाओं को सेक्स स्लेव बनाकर रखा गयाकैसे शुरू हुआ ये नरसंहार? इस नरसंहार में हूतू जनजाति से जुड़े चरमपंथियों ने अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों और अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया. रवांडा की कुल आबादी में हूतू समुदाय का हिस्सा 85 प्रतिशत है लेकिन लंबे समय से तुत्सी अल्पसंख्यकों का देश पर दबदबा रहा था. साल 1959 में हूतू ने तुत्सी राजतंत्र को उखाड़ फेंका. इसके बाद हज़ारों तुत्सी लोग अपनी जान बचाकर युगांडा समेत दूसरे पड़ोसी मुल्कों में पलायन कर गए. इसके बाद एक निष्कासित तुत्सी समूह ने विद्रोही संगठन रवांडा पैट्रिएक फ्रंट आरपीएफ़ बनाया. ये संगठन 1990 के दशक में रवांडा आया और संघर्ष शुरू हुआ. ये लड़ाई 1993 में शांति समझौते के साथ ख़त्म हुई.लेकिन छह अप्रैल 1994 की रात तत्कालीन राष्ट्रपति जुवेनल हाबयारिमाना और बुरुंडी के राष्ट्रपति केपरियल नतारयामिरा को ले जा रहे विमान को किगाली, रवांडा में गिराया गया था. इसमें सवार सभी लोग मारे गए. किसने ये जहाज गिराया था, इसका फ़ैसला अब तक नहीं हो पाया है. कुछ लोग इसके लिए हूतू चरमपंथियों को इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं जबकि कुछ लोग रवांडा पैट्रिएक फ्रंट आरपीएफ़ को. चूंकि ये दोनों नेता हूतू जनजाति से आते थे और इसलिए इनकी हत्या के लिए हूतू चरमपंथियों ने आरपीएफ़ को ज़िम्मेदार ठहराया. इसके तुरंत बाद हत्याओं का दौर शुरू हो गया. आरपीएफ़ ने आरोप लगाया कि विमान को हूतू चरमपंथियों ने ही मार गिराया ताकि नरसंहार का बहाना मिल सके.नरसंहार को कैसे अंजाम दिया गया? इस नरसंहार से पहले बेहद सावधानी पूर्व चरमपंथियों को सरकार की आलोचना करने वालों के नामों की सूची दी गई. इसके बाद इन लड़ाकों ने सूची में शामिल लोगों को उनके परिवार के साथ मारना शुरू कर दिया. हूतू समुदाय से जुड़े लोगों ने अपने तुत्सी समुदाय के पड़ोसियों को मार डाला. यही नहीं, कुछ हूतू युवकों ने अपनी पत्नियों को भी सिर्फ़ इसलिए ख़त्म कर दिया क्योंकि उनके मुताबिक़, अगर वो ऐसा न करते तो उन्हें जान से मार दिया जाता.उस समय हर व्यक्ति के पास मौजूद पहचान पत्र में उसकी जनजाति का भी ज़िक्र होता था, इसलिए लड़ाकों ने सड़कों पर नाकेबंदी कर दी, जहां चुन-चुनकर तुत्सियों की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई. हज़ारों तुत्सी महिलाओं का अपहरण कर लिया गया और उन्हें सेक्स स्लेव की तरह रखा गया.रेडियो से आवाज़ आई- तिलचट्टों को साफ़ करो रवांडा बहुत ही नियंत्रित समाज रहा है, ज़िले से लेकर सरकार तक. उस समय की पार्टी एमआरएनडी की युवा शाखा थी इंतेराहाम्वे जो लड़ाकों में तब्दील हो गई थी उसने ही इन हत्याओं को अंजाम दिया. स्थानीय ग्रुपों को हथियार और हिट लिस्ट सौंपी गई, जिन्हें पता था कि उनके शिकार कहां मिलेंगे. हूतू चरमपंथियों ने एक रेडियो स्टेशन स्थापित किया, आरटीएलएम और एक अख़बार शुरू किया जिसने नफ़रत का प्रोगैंडा फैलाया. इनमें लोगों से आह्वान किया गया, तिलचट्टों को साफ़ करो मतलब तुत्सी लोगों को मारो. जिन प्रमुख लोगों को मारा जाना था उनके नाम रेडियो पर प्रसारित किए गए. यहां तक कि पादरी और ननों का भी उन लोगों की हत्याओं में नाम आया, जो चर्चों में शरण मांगने गए थे. 100 दिन के इस नरसंहार में लगभग 8 लाख तुत्सी और उदारवादी हूतू मारे गए.क्या किसी ने रोकने की कोशिश की? रवांडा में संयुक्त राष्ट्र और बेल्जियम की सेनाएं थीं लेकिन उन्हें हत्याएं रोकने की इजाज़त नहीं दी गई. सोमालिया में अमरीकी सैनिकों की हत्या के एक साल बाद अमरीका ने तय किया था कि वो अफ़्रीकी विवादों में नहीं पड़ेगा.बेल्जियम के 10 सैनिकों के मारे जाने के बाद बेल्जियम और संयुक्त राष्ट्र ने अपने शांति सैनिकों को वापस बुला लिया. हूतू सरकार के सहयोगी फ़्रांस ने अपने नागरिकों को बाहर निकालने के लिए एक विशेष सैन्य दस्ता भेजा और एक सुरक्षित इलाका बनाया. लेकिन उन पर आरोप है कि उन्होंने इन हत्याओं को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया. रवांडा के वर्तमान राष्ट्रपति पॉल कागामे ने फ़्रांस पर आरोप लगाया है कि उसने उन लोगों को समर्थन दिया जिन्होंने हत्याएं कीं. पेरिस ने इससे इनकार किया है.कैसे ख़त्म हुआ नरसंहार? युगांडा सेना समर्थित, सुव्यवस्थित आरपीएफ़ ने धीरे-धीरे अधिक से अधिक इलाक़ों पर कब्ज़ा कर लिया. 4 जुलाई 1994 को इसके लड़ाके राजधानी किगाली में प्रवेश कर गए.मानवाधिकार संस्थाओं का कहना है कि सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के बाद आरपीएफ़ के लड़ाकों ने हज़ारों हूतू नागरिकों की हत्या की. इससे भी ज़्यादा हत्याएं उन्होंने इंतराहाम्वे को खदेड़ते हुए कांगो में कीं. आरपीएफ़ इससे इनकार करता है. कांगो में हज़ारों हैज़ा से मारे गए,जबकि सहायता समूहों पर आरोप लगे कि उन्होंने अधिकांश सहायता हूतू लड़ाकों को दे दिए.डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में क्या हुआ? रवांडा में इस समय आरपीएफ़ सत्ता में है. इनकी समर्थित सेनाओं की भिड़ंत कांगो की सेना और हूतू लड़ाकों से हुई. विद्रोही ग्रुपों ने कांगो की राजधानी किन्शासा की ओर मार्च किया तो रवांडा ने समर्थन किया. उन्होंने मोबुतु सेसे सेको की सरकार को पलट दिया और लॉरेंट कबीला को राष्ट्रपति बना दिया.लेकिन नए राष्ट्रपति हूतू लड़ाकों को नियंत्रित करने के प्रति उदासीन रहे, और इसके कारण जो युद्ध शुरू हुआ जो छह देशों में फैल गया और ऐसे छोटे-छोटे लड़ाके समूह बन गए जो खनिज सम्पन्न देश के अलग-अलग हिस्से पर क़ब्ज़े के लिए लड़ रहे थे. इस विवाद के कारण क़रीब 50 लाख लोग मारे गए और इसका अंत 2003 में हुआ. कुछ हथियारबंद समूह अभी भी रवांडा की सीमा के आसपास बने हुए हैं.क्या किसी को सज़ा मिली? रवांडा नरसंहार के बहुत सालों बाद 2002 में एक अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत का गठन हुआ लेकिन उसमें हत्या के ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा नहीं मिल पाई. इसकी जगह दोषियों को सज़ा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने तंज़ानिया में एक इंटरनेशनल क्रिमिलन ट्रिब्यूनल बनाया. कुल 93 लोगों को दोषी ठहराया गया और पूर्व सरकारों के दर्जनों हूतू अधिकारियों को भी सज़ा दी गई.रवांडा में सामाजिक अदालतें बनाई गईं ताकि नरसंहार के लिए ज़िम्मेदार हज़ारों संदिग्धों पर मुकदमा चलाया जा सके. संवाददताओं का कहना है कि मुकदमा चलने से पहले ही 10 हज़ार लोगों की मौत जेलों में हो गई.एक दशक तक ये अदालतें पूरे देश में हर हफ़्ते लगती थीं, अक्सर ये बाज़ारों या किसी पेड़ के नीचे लगती थीं. इनके सामने हल करने को 12 लाख मामले थे.इस समय रवांडा में हालात कैसे हैं? आंतरिक संघर्ष से टूट चुके इस देश को पटरी पर लाने के लिए राष्ट्रपति पॉल कागामे को श्रेय दिया जाता है. जिनकी नीतियों ने देश में तेज़ आर्थिक विकास की नींव रखी. उन्होंने रवांडा को टेक्नोलॉजी हब बनाने की कोशिश की और वो ख़ुद ट्विटर पर बहुत सक्रिय रहते हैं. लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि वो विरोधियों को बर्दाश्त नहीं करते और उनके कई विरोधियों की देश में और बाहर भी रहस्यमय तरीक़े से मौतें हो गई.जनसंहार रवांडा में अभी भी एक संवेदनशील मुद्दा है और जनजातीयता एथ्नीसिटी के बारे में बोलना ग़ैर-क़ानूनी है. सरकार का कहना है कि और अधिक ख़ून बहाने और नफ़रत फैलाने से रोकने के लिए ऐसा किया गया है.लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि इससे असल मेल मिलाप बाधित होता है. कागामे तीन बार राष्ट्रपति चुने गए और 2007 के चुनाव में उन्हें 98.63 प्रतिशत वोट मिले थे.
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ग्राफिक डिजाइनर ने खुद की शादी में कर दिया एक्सपेरिमेंट, वाट्सऐप फॉरमेट में भेजा मैरिज इन्विटेशन

Date : 11-Apr-2019
दूसरों के लिए बहुत डिजाइन किए कार्ड, खुद की शादी में भी दिखाई क्रिएटिविटी रायपुर. मैंने दूसरों की शादी को अट्रेक्टिव बनाने के लिए मैरिज कार्ड में कई इनोवेशन किए। जाहिर है लोगों को मेरी शादी में भी लीक से हटकर करने की उम्मीद थी। मैंने एक्सपेरिमेंट किया लेकिन ट्रेडिशनल नहीं डिजिटल कार्ड पर। यह कहना है आकाश राव मोहिते ने। आकाश पेशे से ग्राफिक डिजाइनर हैं। वे कहते हैं कि दौर इनोवेशन का चल रहा है। यानि हर चीज में कुछ न कुछ नयापन। वैसे तो शादी के कार्ड को लेकर गल्र्स और ब्वॉजय हमेशा चुजी रहते हैं। बीते कुछ दिनों से डिजिटल तरीके से इन्विटेशन का क्रेज चल रहा है। ट्रेडिशनल कार्ड तो छपते ही हैं वाट्सएेप में भेजने के लिए भी निमंत्रण कार्ड बनाए जा रहे हैं। आकाश की शादी 16 अप्रैल को होनी है। इसके लिए उन्होंने डिजिटल फ्रेम में कार्ड बनाया है जो वाट्सएप थीम पर है। उनके इस अनोखे अंदाज को देखकर लोगों के मुंह वाह निकलना स्वाभाविक है। इस थीम पर क्यों आकाश बताते हैं कि आज की तारीख में हर किसी के पास एंड्रायड फोन है। सभी वाट्सएप यूज करते हैं। मैं अपनी शादी को यादगार बनाना चाहता हूं जिसके लिए मैंने दो तरह के कार्ड बनाए हैं। एक तो ट्रेडिशनल जिसे भेजना ही है। दूसरा डिजिटल। इसे वाट्सएप के जरिए भेजना है।वाट्सएप थीम की खासियत सबसे पहले तो यह कार्ड पूरी तरह वाट्सएप थीम पर है। इसमें तारीख की जगह वर्जन लिखा हुआ है। बड़े ही अट्रेक्टिव तरीके से इस निमंत्रण कार्ड पर कब और कहां का जवाब है। क्यूआर कोर्ड भी है जिसे स्केन कर आपको डिटेल मिल सकती है। रोचक है इन्फो इन्फो कॉलम में स्पेशल लोगो के साथ एंगेजमेंट रिंग सेरेमनी, हल्दी, संगीत एंड मेहंदी, वेडिंग सेरेमनी एंड रिसेप्शन और लोकेशन को बताया गया है।
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बूंद बूंद को क्यों तरसने वाला है ब्रिटेन?

Date : 31-Mar-2019
कहते हैं कि लंदन की बारिश का कोई भरोसा नहीं. कभी भी आ जाती है. ब्रिटेन को बारिशों का देश कहा जाता है. ऐसे में अगर हम ये कहें कि इतनी बारिश के बावजूद ब्रिटेन को पानी की किल्लत होने वाली है, तो शायद ही कोई यक़ीन करे. ब्रिटेन में सालाना औसतन 1200 मिलीमीटर बारिश होती है. इसे समझना हो तो ये जानिए कि अफ़ग़ानिस्तान में सालाना केवल 300 मिलीमीटर बारिश होती है, वहीं मिस्र में केवल 600 मिलीमीटर वर्षा होती है. लेकिन, कुछ महीनों बाद ही ब्रिटेन के कई इलाक़ों में नलों की टोटियां सूख जाने का ख़तरा है. ब्रिटेन की सालाना औसत बारिश का ज़्यादातर हिस्सा, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी इग्लैंड में बरसता है. जबकि, दक्षिणी-पूर्वी इंग्लैंड में बारिश का सालाना औसत महज़ 500-600 मिलीमीटर है, जो कि दक्षिणी सूडान या पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर से भी कम है. ब्रिटेन की आबादी का ज़्यादातर हिस्सा इसी इलाक़े में आबाद है. दक्षिणी-पूर्वी इंग्लैंड के 19 हज़ार वर्ग फुट इलाक़े में 1 करोड़ 80 लाख से ज़्यादा लोग रहते हैं. इसमें राजधानी लंदन भी शामिल है. ब्रिटेन का ये हिस्सा तेज़ी से सूखता जा रहा है. साल 2018 में ब्रिटेन के इस इलाक़े में लगातार छह महीने तक औसत से कम बारिश हुई. नतीजा ये कि यहां के कई जलाशयों का स्तर ख़तरनाक ढंग से कम हो गया. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. साल 2017 के 10 महीने, पिछले 100 साल में सबसे सूखे महीनों के तौर पर दर्ज़ किए गए थे. ब्रिटिश सरकार का हालिया जल-दोहन प्लान यानी ज़मीन से पानी निकालने की योजना कहती है कि इंग्लैंड के 28 फ़ीसद पानी के स्रोत और 18 फ़ीसद जलाशय और नदियों से पानी नहीं निकाला जा सकता. आज की तारीख़ में इंग्लैंड की केवल 17 प्रतिशत नदियों की सेहत ही ठीक कही जा रही है. भूजल का सबसे अधिक दोहन ब्रिटेन के ज़्यादातर लोग पानी के इस संकट के बारे में नहीं जानते. ब्रिटेन में ज़मीन से निकाले जाने वाले पानी का 55 फ़ीसद घरेलू कामों में इस्तेमाल होता है. खेती में केवल एक प्रतिशत पानी का प्रयोग होता है. ब्रिटेन में औसतन हर नागरिक रोज़ 150 लीटर पानी ख़र्च करता है. इसमें नहाना-धोना, खाना पकाना, बर्तन-कपड़े धोना और बाग़ीचों में छिड़काव शामिल है. इसकी तुलना पिछले साल भयंकर जल संकट झेलने वाले दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन से करें, तो वहां के लोग रोज़ 50-70 लीटर पानी में ही काम चलाते हैं. जबकि दक्षिणी अफ्रीका में सालाना औसतन 500 मिलीमीटर बारिश होती है. ब्रिटेन में पानी बचाने का अभियान चलाने वाली संस्था वाइल्डफाउल ऐंड वेटलैंड ट्रस्ट डब्ल्यूडब्ल्यूटी की हैना फ्रीमैन कहती हैं, ब्रिटिश नागरिकों को पानी बचाने की ज़रूरत ही नहीं महसूस होती. लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से हमारे यहां सूखा पड़ने की आशंका 50 फ़ीसद बढ़ गई है. ब्रिटेन का औसत तापमान भी लगातार बढ़ रहा है. यहां सर्दियां गर्म रहने लगी हैं. हाल ही में ब्रिटेन ने सबसे गर्म फ़रवरी का महीना झेला. फ़रवरी में तापमान 21.2 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा था. ये पहली बार था जब सर्दियों में ब्रिटेन में 20 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा तापमान दर्ज किया गया था. इंग्लैंड इस बात की मिसाल है कि कभी पानी से सराबोर रहने वाले देश किस तरह सूखे की तरफ़ बढ़ रहे हैं. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ़ फंड के कॉनर लिनस्टेड कहते हैं कि बहुत से देश पानी की किल्लत इसलिए झेल रहे हैं क्योंकि वो ज़मीन से बहुत ज़्यादा पानी निकाल रहे हैं. जल्द ही ऐसे बहुत से इलाक़े भयंकर सूखा झेलने को मजबूर होंगे. ब्राज़ील की ही मिसाल लीजिए. ब्राज़ील में दुनिया के कुल मीठे पानी का 12-16 फ़ीसद हिस्सा पाया जाता है. लेकिन, इसके शहर साओ पाउलो में 2014 में पानी कमोबेश ख़त्म ही हो गया था. ये ब्राज़ील के इतिहास का सबसे भयंकर सूखा था. शहर के सबसे अहम जलाशय में केवल 3 प्रतिशत पानी बचा था. जबकि केपटाउन के प्रमुख जलाशय में 13.5 फ़ीसद पानी रहने पर ही ज़ीरो डे की आशंका जताई जाने लगी थी. पिछले साल अगस्त में यूरोप की सबसे अहम नदी डेन्यूब, हंगरी में सबसे निचले स्तर तक चली गई थी. ब्रिटेन के कारण बाकी देशों पर असर ब्रिटेन की पर्यावरण एजेंसी ने लंदन और टेम्स नदी की घाटी को पानी की कमी वाला इलाक़ा घोषित किया हुआ है. टेम्स नदी से पानी निकालने के प्रबंधक स्टीव टक कहते हैं कि हमारे पास पानी को सहेजकर रखने की क्षमता बहुत कम है. इसीलिए हम नदियों और ज़मीन से पानी निकालकर सप्लाई करते हैं. जब सर्दियों में तेज़ बारिश होती है, तो काफ़ी पानी गिरता है. इस पानी से ज़रूरतें पूरी हो जानी चाहिए. लेकिन, बढ़ती आबादी और पानी के बेतहाशा इस्तेमाल से इसकी किल्लत होती जा रही है. अब दक्षिणी-पूर्वी इंग्लैंड में पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए वेल्श के पहाड़ों के बीच बहने वाली सेवर्न नदी का पानी पाइप से लंदन तक पहुंचाने की योजना बन रही है. इसके अलावा टेम्स नदी से और पानी निकाला जा रहा है. आज की तारीख़ में विकसित देश, विकासशील देशों के पानी को भी सोख रहे हैं. ब्रिटेन में पूरे साल ताज़े फल और सब्ज़ियां मिलती हैं. ब्रिटेन अपनी खपत का महज़ दो फ़ीसद फल और सब्ज़ियां ही उगाता है. बाक़ी के फल और सब्ज़ियां दूसरे देशों से आते हैं. यानी इन्हें उगाने में लगने वाले पानी का ख़र्च दूसरे देश उठाते हैं. वॉटर विटनेस इंटरनेशनल नाम की संस्था के डोर्कास प्रैट कहते हैं कि ब्रिटेन के पानी के कुल ख़र्च का 62 फ़ीसद बोझ तो दूसरे देश उठाते हैं. क्योंकि जो फल-सब्ज़ियां ब्रिटेन के लोग खाते हैं, वो तो कहीं और उगाये जाते हैं. तो ब्रिटेन में पानी का संकट सिर्फ़ अपने संसाधनों के दोहन का नतीजा नहीं है. इसकी वजह से दूसरे देशों पर भी असर पड़ना तय है. जैसे कि ब्रिटेन में आने वाली सतावर पेरू में उगाई जाती है. इसकी ज़्यादा खपत से पेरू में पानी की खपत बढ़ जाती है. हालांकि जानकार मानते हैं कि ब्रिटेन में पानी के संकट की बड़ी वजह इसका बेजा इस्तेमाल है. पानी को क़ीमती बनाने से इसकी बर्बादी रोकी जा सकती है. इंग्लैंड और वेल्श के केवल आधे घरों में ही पानी के मीटर लगे हैं. बाक़ी के आधे परिवार हर महीने एक तय रक़म देते हैं. इसके एवज़ में वो मनमर्ज़ी का पानी बहा सकते हैं. घंटों नहा सकते हैं. लॉन में पानी भर सकते हैं. ब्रिटेन में बिकने वाले सब्जियां दूसरे देशों में उगाई जाती हैं, इसका असर पड़ों देशों के पानी ख़पत पर पड़ता है. ब्रिटेन कैसे उबरेगा इस संकट से वहीं, डेनमार्क और फिनलैंड जैसे देशों में हर घर में पानी के मीटर लगे हैं. पानी महंगा है. इसलिए लोग संभालकर ख़र्च करते हैं. ब्रिटेन में हर इंसान औसतन 150 लीटर पानी ख़र्च करता है. तो, फिनलैंड में ये ख़र्च केवल 115 लीटर है. हालांकि आज से क़रीब 50 साल पहले ऐसा नहीं था. 1970 में फिनलैंड के लोग औसतन 350-420 लीटर पानी रोज़ाना बहाते थे. लेकिन, मीटर लगने और पानी के बिल बढ़ने के बाद ख़र्च में कमी आ गई. लिनस्टेड कहते हैं कि जिस देश ने भी पानी को बचाने के लिए ये क़दम उठाए हैं, वो पानी का ख़र्च कम करने में कामयाब हुए हैं. डेनमार्क में भी ढेर सारी झीलें और नदियां हैं. 1989 में यहां केवल 2 यूरो में 1000 लीटर पानी मिल जाता था. लेकिन, सरकार ने जब हर घर में पानी का मीटर लगाना अनिवार्य किया और पानी की क़ीमत बढ़ाई, तो ख़र्च अपने आप कम होता गया. पानी का लीकेज रोकने के लिए पाइपलाइनें और दूसरी मशीनें बदली गईं. इससे भी डेनमार्क में पानी की बर्बादी रुकी. इंग्लैंड में भी इसकी कोशिशें हो रही हैं. सदर्न वाटर्स नाम की कंपनी ने हर घर में मीटर लगाना ज़रूरी कर दिया है. इससे पानी की खपत 16 फ़ीसद तक कम हो गई है. हैना फ्रीमैन कहती हैं, इसमे कोई शक़ नहीं कि ब्रिटेन पानी के संकट से छुटकारा पा सकता है. हमे बारिश से ख़ूब पानी मिलता है. ज़रूरत इसके सावधानी से इस्तेमाल की है.
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क्या इंसान अगली सदी देख भी पाएगा?

Date : 30-Mar-2019
  क्या इंसानों का वही हाल होने वाला है जो डायनोसोर का हुआ था? इस समय इंसान की नस्ल जलवायु परिवर्तन, परमाणु युद्ध, महामारी या धरती से उल्का पिंड के टकरा जाने के जानलेवा ख़तरों का सामना कर रही है. रेडियो ब्राडकॉस्टर और दार्शनिक डेविड एडमंड्स ने इन मामलों के विशेषज्ञों से बात कर ये जानने की कोशिश की कि क्या इस शताब्दी के अंत तक इंसान का वजूद मिट तो नहीं जाएगा. सबसे बड़ा ख़तरा क्या है?ऑक्सफ़ोर्ड के फ्यूचर ऑफ़ ह्यूमैनिटीज़ इंस्टीट्यूट से जुड़े शोधकर्ता एंडर्स सैंडबर्ग के अनुसार,मानव जाति के सामने लुप्त होने का ऐसा ख़तरा है जो पूरी कहानी ख़त्म कर देगा.20वीं शताब्दी तक हम सोचते थे कि हम बहुत सुरक्षित जगह रह रहे हैं लेकिन अब स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है. मानव जाति के लुप्त होने के ख़तरे, चिंताजनक रूप से बहुत अधिक और बहुत तरह के बढ़ गए हैं. इसके कुछ उदाहरण लिए जा सकते हैं. उल्का पिंड के टकराने का ख़तरा1980 के दशक तक हमें नहीं लगता था कि आकाश से गिरने वाले उल्का पिंडों की वजह से धरती पर कोई महाविनाश आएगा. लेकिन इसी दशक में वैज्ञानिक बाप-बेटे लुईस और वॉल्टर एवारेज़ ने एक अवधारणा रखी कि उल्का पिंडों की वहज से सारे डायनासोर मारे गए. जब मैक्सिको की यूकटान खाड़ी में एक बड़े गढ्ढे का पता चला, इसके बाद हाल ही में वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय पैनल ने भी इस विचार का समर्थन किया है. हालांकि उल्कापिंड के टकराने से विनाश की संभावना अभी बहुत दूर है, बल्कि उससे ज्यादा ख़तरा हम खुद पैदा कर रहे हैं. जनसंख्या की अतिवृद्धि, स्रोतों का क्षय और जलवायु परिवर्तनजलवायु परिवर्तन से आने वाले ख़तरों से हम परिचित हैं लेकिन लंदन विश्वविद्यालय की शोधकर्ता कैरिन कुल्हेमन जनसंख्या वृद्धि पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं. घटते प्राकृतिक संसाधनों के साथ इसकी ख़बरें शायद ही सुर्खियां बनती हैं, क्योंकि हमें बुरा लगता है और इसलिए हम इस पर सोचना नहीं चाहते. कैरिन के अनुसार, अन्य चीजें, जिससे इंसानी आबादी सामूहिक कब्र में दफ़्न हो सकती है, जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि का मसला भी आपसे में जुड़ा हुआ है. उनके मुताबिक, जनसंख्या वृद्धि का जलवायु परिवर्तन पर ख़ासा असर है क्योंकि संसाधन ख़त्म हो रहे हैं और उनका दोहन बढ़ रहा है और ये जलवायु परिवर्तन को और भयावह बना रहा है. वो कहती हैं कि अगर जनसंख्या वृद्धि रुक भी जाए तो जलवायु परिवर्तन को रोकना एक असंभव काम हो सकता है. जैव विविधता का विनाशकुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि इस सदी के मध्य तक आते आते व्यावसायिक मछली पकड़ने के उद्योग के लिए समंदर में पर्याप्त मछलियां नहीं बचेंगी. इसका मतलब है कि दुकानों में खरीदने के लिए मछली, चिप्स या फ़िश करी नहीं मिलेगी. कीट पतंगे भी तेजी से लुप्त हो रहे हैं और इसके साथ ही चिड़ियों की कई किस्में ख़त्म हो रही हैं क्योंकि इनका भोजन वो कीट हैं जो अब बचे ही नहीं. कैरिन कहती हैं कि हम नहीं जानते कि ख़त्म होती जैव विविधता का क्या असर होगा लेकिन ऐसा ज़रूर लगता है कि इसका हमारे ऊपर सबसे बुरा असर पड़ने वाला है. महामारीकैंब्रिज के सेंटर फॉर एक्सटेंशियल रिस्क से जुड़ी ललिथा सुंदरम बॉयोलॉजिकल ख़तरे का अध्ययन कर रही हैं. वो कहती हैं कि 1918 में स्पैनिश फ्लू की महामारी के दौरान एक अनुमान के अनुसार, क़रीब आधी आबादी इसकी चपेट में आ गई थी और इसे पांच से 10 करोड़ लोगों की मौत हो गई थी. महामारी तब होती है जब बड़े पैमाने पर विस्थापन होता हो, उस समय भी लोगों को युद्ध से वापस भेजा जा रहा था और वे दड़बे नुमा कमरों में रहते थे. हालांकि वैक्सीन बनाने में हम पहले से अधिक कुशल हुए हैं लेकिन वैश्विकरण के अपने ख़तरे हैं. स्पैनिश फ्लू के दौरान लोग ट्रेन और नावों से सफ़र करते थे, लेकिन हवाई यात्रा के इस दौर में महामारी के कहीं तेजी से फैलने की आशंका है. सिरफ़िरों से ख़तरामानव निर्मित विनाश के अधिकांश ख़तरों के पीछे कोई मंशा नहीं होती. लेकिन विज्ञान और तकनीक के इस दौर में विनाशकारी हमलों की संभावना बढ़ रही है. उदाहरण के लिए सिंथेटिक बॉयोलॉजी का इस्तेमाल कर लैब में जानलेवा वायरस बनाना. फ़्यूचर ऑफ़ लाइफ़ इंस्टीट्यूट में शोधकर्ता फ़िल टोरेस के अनुसार, अगर कोई विनाशकारी बटन हो जो सबकुछ नष्ट कर दे, तो ऐसे लोगों की कमी नहीं जो उस बटन को दबा देना चाहेंगे. ये बटन दबाने वाले धार्मिक कट्टरपंथी हो सकते हैं जो ये मानते हैं कि उन्हें भगवान की ओर से दुनिया को नष्ट करने का आदेश मिला है ताकि उसे बचाया जा सके. जैसा जापान में हुआ. फ़िल के अनुसार, ऐसे लोगों से भी ख़तरा है जो मानव जाति के विनाश को लेकर अपने अपने कारणों से खुद ही प्रेरित हो जाते हैं जैसे सार्वजनिक जगहों पर अंधाधुंध गोली बारी करने वाले. ये सार्वजनिक या निजी स्तर पर सबको ख़त्म कर देने की इच्चा व्यक्त करने वाले लोग हो सकते हैं. लेकिन इनकी संख्या कितनी होगी? एक अनुमान के मुताबिक, इस समय दुनिया में मानसिक बीमार (साइकोपैथ) लोगों की संख्या 30 करोड़ हो सकती है, इनमें से कई लोग ख़तरा बन सकते हैं. परमाणु युद्धपरमाणु युद्ध हमें पूरी तरह नहीं ख़त्म कर सकता है, लेकिन इसका असर हो सकता है कि हमें ख़त्म कर दे. ग्लोबल कैटोस्ट्रोफ़िक रिस्क इंस्टीट्यूट के सेथ बॉम के अनुसार, परमाणु विस्फ़ोट से धूल का गुबार वायुमंडल में बहुत ऊंचा जा सकता है. ये गुबार दशकों तक वहां बना रह सकता है और सूरज की रोशनी को रोक सकता है. परमाणु युद्ध के कारण, पहला असर बड़े पैमाने पर विनाश, फिर आर्थिक बाधाएं और अंत में वैश्विक पर्यावरण का बुरा असर हो सकता है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंसतो हमारी सभ्यता कितने संकट में है? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि किस ख़तरे की बात की जा रही है. ध्यान में रखने वाली सबसे अहम बात ये है कि भविष्य पत्थर पर लिखी कोई इबारत नहीं. ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिनको हम कर सकते हैं और अब समय कदम उठाने का है. लेकिन कैरिन कुहलमन मानती हैं कि जनसंख्या वृद्धि सबसे बड़ी समस्या है. वो कहती हैं, परिवार के आकार से जुड़े सामाजिक तौर तरीक़ों को बदलने की ज़रूरत है और ये रवैया छोड़ने की ज़रूरत है कि हमें मनचाहे बच्चे पैदान करने और जो मन करे खाने की आज़ादी है. इस तरह से हम वैश्विक विनाश को रोकने में अपनी भूमिका निभा सकते हैं. दूरदर्शी एहतियात बरतने के मामले में इंसानों का बहुत बुरा रिकॉर्ड रहा है और हमारी संस्थाएं भविष्य की पीढ़ी के हित में बहुत तत्पर नहीं दिखतीं. लेकिन कैरिन कहती हैं कि 21वीं सदी आखिरी न साबित हो, इसके लिए हमें इन ख़तरों को और गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.
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LIC Recruitment 2018: भारतीय जीवन बीमा निगम में असिस्टेंट, असोसिएट और असिस्टेंट मैनेजर के 300 पदों पर वैकेंसी

Date : 12-Oct-2018

नई दिल्ली: LIC Recruitment 2018:  भारतीय जीवन बीमा निगम ने असिस्टेंट, असोसिएट और असिस्टेंट मैनेजर के पदों पर वैकेंसी निकाली हैं. हाउसिंग फाइनैंस लिमिटेड (LIC Housing Finance Limited) ने कुल 300 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मांगे गए हैं. इन पदों पर ग्रेजुएट से लेकर से एमबीए पास उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं. आवेदन करने की प्रक्रिया आज से शुरू हो गई है. उम्मीदवार 6 सितंबर तक आवेदन कर सकते हैं. LIC में नौकरी करने के लिए जो उम्मीदवार इच्छुक हैं, वे नीचे दी गई जानकारी को ध्यान से पढ़ने के बाद ही आवेदन करें.

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