Health

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रेड वाइन पीना स्वास्थ्य के लिए बेहतर है..?

Date : 24-Nov-2019
शराब की वजह से पूरी दुनिया में हर साल दसियों लाख लोग मरते हैं. फिर भी इंसान हज़ारों बरसों से शराब पीता आ रहा है. पिछले कुछ दशकों में वाइन को ये शोहरत हासिल हो गई है कि ये हमारी सेहत के लिए अच्छी है. ख़ास तौर से रेड वाइन. इसका ताल्लुक़ लंबी उम्र और दिल की बीमारी का जोखिम कम करने से बताया जाता है. पर, क्या वाक़ई वाइन हमारी सेहत के लिए मुफ़ीद है? और, इससे भी पहले सवाल तो ये बनता है कि हमारे लिए अच्छा क्या है? जब बात वाइन की आती है, तो बहुत से लोग अच्छे का मतलब दिल की बेहतरी से लगाते हैं. हालांकि, ज़्यादातर लोगों को ये नहीं मालूम है कि कैंसर और शराब के बीच गहरा ताल्लुक़ पाया गया है. इस संबंध की पुष्टि कई रिसर्च में हो चुकी है. हर हफ़्ते एक बोतल वाइन गटकने से कैंसर की बीमारी का ख़तरा धूम्रपान न करने वाले मर्दों और औरतों को कैंसर के क़रीब ले जाता है. यानी एक बोतल वाइन का नुक़सान मर्दों के पांच सिगरेट पीने और महिलाओं के दस सिगरेट फूंकने से होने वाले नुक़सान के बराबर है. ब्रिटेन के वेल्स में पब्लिक हेल्थ विभाग के डायरेक्टर ऑफ़ पॉलिसी, रिसर्च मार्क बेलिस कहते हैं कि, धूम्रपान और कैंसर के बीच के संबंध को बहुत प्रचारित किया गया है. लेकिन, शराब और कैंसर के संबंध को उस तरह से प्रचारित नहीं किया गया है. क्योंकि इसकी ज़िम्मेदारी शराब उद्योग पर डाली गई है. और वो अपने उत्पाद की कम बिक्री तो नहीं चाहेंगे. वाइन को हेल्दी किसने बताया वाइन पीना सेहत के लिए अच्छा है, ये ख़याल 1970 के दशक का है. उस समय वैज्ञानिकों ने पाया था कि फ्रांस के लोगों में अन्य देशों के मुक़ाबले दिल की बीमारी कम होती है. जबकि फ्रांस के बाशिंदे, अन्य लोगों से ज़्यादा सैचुरेटेड फैट खाते हैं. वैज्ञानिकों ने कहा कि फ्रांस के लोगों में दिल की बीमारी की कम तादाद का सीधा ताल्लुक़ वाइन पीने से है. इसे, वैज्ञानिकों ने फ्रेंच पैराडॉक्स यानी फ्रांसीसी विरोधाभास का नाम दिया था. ये ऐसी पहेली है, जिसे वैज्ञानिक आज तक नहीं सुलझा पाए हैं. लेकिन, फ्रांसीसी विरोधाभास का इतना प्रचार हुआ है कि अब पूरी दुनिया में ये ख़याल पाया जाता है कि थोड़ी सी वाइन पीना स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद है. इससे वज़न बढ़ने की समस्या के अलावा दिल की बीमारी और उच्च रक्तचाप की परेशानियों के साथ-साथ डायबिटीज़ पर क़ाबू पाने में भी मदद मिलती है. इंटरनेशनल साइंटिफ़िक फ़ोरम ऑन एल्कोहल रिसर्च की सह-निदेशक हेलेना कोनीबियर कहती हैं कि, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में वाइन पीने से बेहतर सेहत मिलने, उम्र के साथ अक़्लमंदी में कमी आने की परेशानी दूरी जैसे फ़ायदे सामने आए. इसके बाद से ऐसे नतीजों पर पहुंचने वाले एक हज़ार से ज़्यादा रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं. इसी का नतीजा ये हुए कि लंबे समय से लोगों के बीच ये आम राय है कि शराब से दूरी बनाना इसे पीने के मुक़बाले ज़्यादा क्षति पहुंचाने वाला क़दम है. हल्की तादाद में शराब सेहत के लिए फ़ायदेमंद होती है. लेकिन, अब इस तर्क की आलोचना तेज़ हो गई है. इस विचार के विरोधी ये मानते हैं कि शराब से सेहत को फ़ायदे से जुड़े ज़्यादातर आंकड़े सही नहीं हैं. और ये दावा तो क़तई ग़लत है कि शराब से दूर रहने से लोग बीमार हो जाते हैं. 2006 में शराब के नुक़सान और फ़ायदे पर हुए 54 रिसर्च का निचोड़ निकाला गया. निष्कर्ष ये निकला कि थोड़ी-थोड़ी शराब पीने का दिल की बीमारी होने की आशंका कम होने से कोई ताल्लुक़ है ही नहीं. हेलेना कोनीबियर कहती हैं कि पिछले पांच वर्षों में हम ने ये देखा है कि वाइन पीने वाले लोगों की सेहत बेहतर तो होती है. वो ज़्यादा पढ़े-लिखे होते हैं और उनकी दिनचर्या दिन भर बैठे रहने वाली भी नहीं होती. इसी साल चीन में 5 लाख वयस्कों पर एक रिसर्च के नतीजे सामने आए. ये रिसर्च पिछले दस वर्षों से चल रही थी. चीन के लोगों के दो जीन्स ऐसे होते हैं, जो उनकी शराब पीने की लत को प्रभावित करते हैं. मज़े की बात ये है कि इनका उन लोगों की सेहत ख़राब होने से कोई संबंध नहीं होता. रिसर्च में पता चला कि जिनकी सेहत ठीक रहती है, वो अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ शराब पी सकते हैं. लेकिन, जिनके एंजाइम ठीक से काम नहीं करते, उन्हें शराब नुक़सान पहुंचा सकती है. इस रिसर्च में शराब और दिल की बीमारी के बीच सीधा ताल्लुक़ सामने आया. हालांकि, शराब पीने से ब्लड प्रेशर बढ़ता है. लेकिन, इससे दिल की बीमारी होने की संभावना कम ही होती है. हालांकि इस रिसर्च में शराब को अलग कर के सिर्फ़ वाइन के फ़ायदे नुक़सान को नहीं परखा गया. तो, ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि वाइन पीने का फ़ायदा होगा ही. रेड वाइन वाइन को आम तौर पर इसलिए सेहतमंद माना जाता है क्योंकि इसमें पॉलीफिनोल नाम के केमिकल होते हैं. इनकी वजह से शरीर में जलन कम होती है. रेड वाइन में पॉलीफिनोल व्हाइट वाइन के मुक़ाबले दस गुना ज़्यादा होते हैं. इटली के वैज्ञानिक अल्बर्टो बर्टेली ने पाया है कि रेड वाइन की थोड़ी मात्रा लेना लोगों को दिल की बीमारी से दूर रखता है. इसकी बड़ी वजह पॉलीफिनोल होते हैं. जो शरीर में जलन कम करते हैं. बर्टेली लोगों को रोज़ 160 मिलीलीटर वाइन पीने की सलाह देते हैं, वो भी सिर्फ़ खाने के साथ. वाइन से जुड़े रिसर्च पॉलीफिनोल रेसवेराट्रोल पर ही केंद्रित रहे हैं. रेसवेराट्रोल अंगूर की चमड़ी और इस के बीजों में पाया जाता है. इसके बारे में माना जाता है कि ये हाई ब्लड प्रेशर से बचाता है क्योंकि ये धमनियों में ख़ून को पतला कर देता है. वैसे, ये ख़ूबी सिर्फ़ रेड वाइन में नहीं होती, बल्कि व्हाइट वाइन में भी पायी जाती है. हालांकि सफ़ेद अंगूर में रेसवेराट्रोल नहीं पाया जाता. बर्टेली कहते हैं कि वाइन में पाए जाने वाले कई केमिकल हमें अल्झाइमर जैसी बीमारी से भी बचाते हैं. हालांकि ज़्यादातर रिसर्च यही कहते हैं कि रेड वाइन ही ज़्यादा फ़ायदेमंद है. रेड वाइन पेट की सेहत के लिए मुफ़ीद हो सकती है. और अगर हमारा पेट ठीक रहता है, तो उसके कई और लाभ होते हैं. जैसे कि हमारी इम्युनिटी यानी रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है. खाना आसानी से पचता है, तो वज़न भी ठीक रहता है. वाइन पीने से हमारे पेट में पाये जाने वाले बैक्टीरिया में विभिन्नता बढ़ती है. यानी आंतों में पलने वाले बैक्टीरिया में कई नस्लें हो जाती हैं. लेकिन, जिस रिसर्च में ये बात सामने आई, उसके मुताबिक़ ऐसा करने के लिए हफ़्ते में केवल एक गिलास रेड वाइन पीने की ज़रूरत है. क्योंकि ऐसे ही लोग इस रिसर्च में शामिल किए गए थे. जो लोग सीमित मात्रा में वाइन पीते हैं उनका बीएमआई यानी बॉडी मास इंडेक्स भी कम होता है. शायद यही वजह है कि वाइन पीने को अच्छी सेहत से जोड़ दिया गया है. वैसे, वाइन पीने की वक़ालत करने वालों की इस रिसर्च से वो लोग इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते, जो शराब को बुरा मानते हैं. मार्क बेलिस कहते हैं कि, जो लोग रेड वाइन पीते हैं, वो आम तौर पर ज़्यादा वर्जिश करते हैं. चलते-फिरते हैं. इसीलिए वो औसत इंसान से ज़्यादा स्वस्थ रहते हैं. पेट की अच्छी स्थिति के बारे में भी यही कहा जा सकता है. रिसर्च से ये साफ़ नहीं हुआ कि वाइन पीने वालों का पेट ठीक रहता है. या फिर जिन के पेट ठीक थे, उन्हीं के वाइन पीने की आदत पर रिसर्च की गई. 2016 में हुई एक रिसर्च में देखा गया कि जो लोग रोज़ शाम के खाने के साथ एक गिलास वाइन लेते थे, छह महीने की इस आदत के बाद भी उनके ब्लड प्रेशर पर कुछ ख़ास असर नहीं देखा गया. स्वास्थ्यवर्धक विकल्प हो सकता है कि वाइन पीना अच्छी सेहत में योगदान देता हो. लेकिन, ज़्यादातर जानकार ये कहते हैं कि इससे दूरी बनाना ज़्यादा स्वास्थ्यवर्धक होता है. लंदन के किंग्स कॉलेज की कैरोलिन ली रॉय कहती हैं कि, हमें पता है कि शराब हमारे लिए बुरी है. फिर भी अगर आप पीते ही हैं, तो आप को रेड वाइ को तरज़ीह देना चाहिए. क्योंकि यही इकलौती ऐसी शराब है, जिसके स्वास्थ्यवर्धक गुण भी पाए गए हैं. लेकिन, इसका ये मतलब नहीं कि मै लोगों को वाइन पीने की सलाह दे रही हूं. वाइन की रोगों से लड़ने की क्षमता इसके अवयव रेसवेराट्रोल से आती है. कई कंपनियों ने इसकी गोली बनाकर बेचनी भी शुरू कर दी है. हालांकि बर्टेली कहते हैं कि इसका कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होता. शराब पीने को लेकर ब्रिटेन की गाइडलाइन सब से सख़्त मानी जाती है. इसके मुताबिक़ हर हफ़्ते 14 यूनिट से ज़्यादा शराब नहीं पीना चाहिए. यूं तो वाइन पीने के फ़ायदे गिनाए जाते रहे हैं. लेकिन, ज़्यादा अच्छा विकल्प अभी भी इसे न पीना ही है. और जो लोग शराब पीना ही चाहते हैं, उनके लिए रेड वाइन सबसे अच्छा विकल्प है. लेकिन, रेड वाइन पीते समय ये ध्यान रखना चाहिए कि इसे आप सेहत के लिए नहीं पी रहे हैं. बल्कि इसलिए पीते हैं क्योंकि आप को शराब पीने का शौक़ है. अगर आप को सेहत की बेहतरी के लिए कुछ करना ही है, तो शराब पीने के अलावा बहुत से सेहतमंद विकल्प मौजूद हैं. जैसे कि ज़्यादा फल और सब्ज़ियां खाएं. नियमित रूप से वर्ज़िश करें. आज भी अच्छी सेहत ये नुस्खे ज़्यादा आज़माए हुए हैं. रेड वाइन पीना इनका विकल्प नहीं है.
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पुरुषों की गर्भनिरोधक गोलियां क्यो नही आती ?

Date : 19-Oct-2019
दुनिया भर के वैज्ञानिक लगभग आधी सदी से पुरुषों के इस्तेमाल के लिए गर्भनिरोधक जैसी गोली विकसित करने पर काम कर रहे हैं. इससे जुड़ी कई बेहतरीन रिपोर्ट तो देखने को मिलती हैं लेकिन अभी भी इन गोलियां मेडिकल स्टोर्स तक नहीं पहुंच पाई हैं. पैसों की कमी और पुरुषों की उदासीनता की वजह से इन गोलियों का उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं हो पाया. इसके अलावा अभी भी महिलाओं से ही यह उम्मीद की जाती है कि गर्भ न ठहरने की ज़िम्मेदारी वो उठाएं. हालांकि कई रिसर्च से यह पता चला है कि अगर पुरुषों के लिए ऐसी गोलियां होतीं तो पुरुष आसानी से उसे स्वीकार कर लेते. ब्रिटेन में सेक्शुअली सक्रिय लोगों में एक तिहाई लोगों ने माना है कि वे गोली या फिर प्रत्यारोपण की तकनीक के इस्तेमाल से संतान उत्पति पर अंकुश का रास्ता अपनाना चाहते हैं किसकी ज़िम्मेदारी गर्भनिरोध सर्वे में शामिल 10 में से आठ लोगों का मानना है कि गर्भनिरोध किसी एक की ज़िम्मेदारी नहीं है इसे महिला और पुरुष दोनों को आपस में शेयर करना चाहिए. वहीं दूसरी ओर, अमरीका में 18 से 44 साल के आयुवर्ग के सेक्शुअल सक्रिय लोगों में 77 प्रतिशत लोगों ने पुरुष नसबंदी और कंडोम के बदले किसी अन्य तरीके वाले गर्भनिरोधक के इस्तेमाल में दिलचस्पी दिखाई है. ऐसे में सवाल यही उठता है कि सार्वजनिक तौर पर इतनी स्वीकार्यता मिलने और लैंगिक भूमिका से छुटकारा मिलने के बाद क्या पुरुषों की गर्भनिरोधक गोलियां वास्तविकता बन पाएंगी? दुनिया भर में गर्भनिरोध का सबसे आम तरीका क्या है? संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के मुताबिक दुनियाभर में सेक्शुअली सक्रिय कपल्स में से एक तिहाई कपल्स किसी भी तरीके के गर्भनिरोध का इस्तेमाल नहीं करते. इसके साथ ही जो कपल्स गर्भनिरोध का इस्तेमाल करते हैं, उनमें महिलाओं द्वारा गर्भनिरोधक अपनाने का चलन ज़्यादा है. शादीशुदा या सेक्शुअल संबंध रखने वाली महिलाओं में करीब 19 प्रतिशत महिलाएं गर्भनिरोध के लिए नसबंदी पर भरोसा करती हैं, 14 प्रतिशत महिलाओं क्वाइल का इस्तेमाल करती हैं जिसे कॉपर टी भी कहा जाता है, नौ प्रतिशत महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियों और पांच प्रतिशत महिलाएं इंजेक्शन का इस्तेमाल करती हैं. पुरुषों से जुड़े गर्भनिरोधक के जो तरीके मौजूद हैं, उनका चलन पुरुषों में बेहद कम है. महज आठ प्रतिशत पुरुष कंडोम का इस्तेमाल करते हैं, जबकि दो प्रतिशत पुरुष नसबंदी कराते हैं. गर्भनिरोधक गोलियों से पहले क्या होता था? गर्भनिरोधक गोलियों से पहले, पुरुषों को गर्भनिरोध की प्रक्रिया में शामिल होना होता था, उदाहरण के लिए उन्हें कंडोम इस्तेमाल करना होता था. 1960 के दशक में जब महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक गोलियां बड़े पैमाने पर तैयार होने लगीं तब गर्भनिरोध का फ़ैसला महिलाओं के नियंत्रण हो गया. महिलाएं यह काम अपने सेक्शुअल पार्टनर को बिना बताए भी कर सकती थीं. आज, दुनियाभर में 10 करोड़ से ज़्यादा महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियां इस्तेमाल करती हैं. यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में यह गर्भनिरोध का सबसे प्रचलित तरीका है. वहीं अफ्ऱीका, लैटिन अमरीका और उत्तरी अमरीका में गर्भनिरोधक गोलियां गर्भनिरोध का दूसरा सबसे प्रचलित तरीका है. जबकि एशिया में यह तीसरा सबसे प्रचलित तरीका है. पिछले कुछ दशक में गर्भनिरोधक गोलियों के चलते महिलाओं की ज़िंदगी थोड़ी आसान हुई है. वे अपनी सुविधा से यह तय कर पा रही हैं कि वे कब मां बनना पसंद करेंगी. इससे उन्हें उच्च शिक्षा और नौकरी के क्षेत्र में फ़ायदा भी हुआ है. यह भी एक वजह है जिसके चलते इसे महिला अधिकारों की दिशा में एक अहम पड़ाव माना जाता है. वैसे इसकी गिनती 20वीं शताब्दी के सबसे महान आविष्कारों में होती है. महिला-पुरुष बराबरी समाज में जेंडर समानता की बात बढ़ रही है, उसका दायरा विस्तृत हो रहा है. तब यह बात खटकती है कि गर्भनिरोध से संबंधित दुष्प्रभावों के अलावा भावनात्मक, सामाजिक, वित्तीय और समय से संबंधित चुनौतियों का सामना केवल महिलाओं को ही करना पड़ रहा है. ऐसे में, हम लोगों के पास अभी तक पुरुषों वाली गर्भनिरोधक गोलियां क्यों नहीं है? महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक गोलियों की जब खोज हुई, उसके एक दशक के भीतर ही ये आम लोगों के लिए उपलब्ध हो गईं थीं. पुरुषों की गोलियों के बाज़ार में पहुंचने में इतना लंबा वक्त क्यों लग रहा है, जबकी इसका पहला ट्रायल 1970 में हो गया था. कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक गोलियों का विकास करने की प्रक्रिया महिलाओं की गर्भनिरोधक गोलियों की तुलना में कहीं ज़्यादा जटिल है. पुरुषों की गर्भनिरोधक गोलियां स्पर्म उत्पादन को रोक कर अपना काम करती है, लेकिन ऐसा करने के लिए जिस तरह के हॉर्मोन की ज़रूरत होती है उसके साइड इफेक्ट्स होते हैं. इसके अलावा सामाजिक और आर्थिक कारकों की भी अपनी भूमिका है. प्रजनन संबंधी विज्ञान और मेडिसीन की दुनिया मुख्य तौर पर महिलाओं के शरीर पर केंद्रित है, इसमें पुरुषों की अनदेखी होती है. उदाहरण के लिए, हर कोई यह तो जानता है कि गायनोकोलॉजिस्ट क्या करते हैं लेकिन लोगों को एंड्रोलॉजिस्ट के बारे में मालूम नहीं होता. एंड्रोलॉजिस्ट उन विशेषज्ञों को कहा जाता है जो पुरुषों के प्रजनन संबंधी विज्ञान में दक्ष होते हैं क्यों रुका हुआ है काम? महिलाओं की गर्भनिरोधक गोलियों के कई दशकों के बाद पुरुषों के लिए ऐसी गोलियों पर काम शुरू हुआ और इसके बाद यह काम फ़ंड की कमी के चलते अटकता रहा. पुरुषों के लिए ऐसी ही एक गोली क्लीन शीट्स पर रिसर्च रुकी हुई है, यह गर्भनिरोधक गोली सेक्स के दौरान पुरुष में वीर्य नहीं बनने देती. असल में वीर्य के निकलने को पुरुषों की सेक्शुअलिटी में अहम माना जाता है. हालांकि कई दशक पहले हुए शोध के मुताबिक लंबे समय तक संबंधों में रहने वाली महिलाएं अपने पुरुष साथी पर भरोसा करती हैं और जहां बात कैज़ुएल सेक्स की आती है तो महिलाएं पुरुषों पर कम भरोसा करती हैं फिर चाहे पुरुष गर्भनिरोध का ही इस्तेमाल क्यों ना कर रहे हों. ये महिलाओं का काम है गर्भनिरोध को महिलाओं के काम के तौर पर देखा जाता है, ये धारणा भी है कि पुरुष गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल नहीं करते. वैसे अब जेंडर की भूमिका बदल रही है और पुरुष घर की ज़िम्मेदारी भी उठा रहे हैं और बच्चों की देखरेख की ज़िम्मेदारी भी संभाल रहे हैं. यह संतुलन गर्भनिरोधक तक बढ़ सकता है क्योंकि शोध अध्ययन बता रहे हैं कि युवा पुरुष इसे साझा ज़िम्मेदारी के तौर पर देख रहे हैं. पुरुषों के कुछ समूह, जो कहीं ज़्यादा शिक्षित हैं, प्रभावी हैं और परंपरागत तौर पर जेंडर भूमिकाओं में विश्वास नहीं रखते हैं वे पुरुषों की गर्भनिरोधक गोली को लेकर उत्सुक हैं. भले ही पुरुष इन गर्भनिरोधक गोलियों का स्वागत कर रहे हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी पुरुष इन्हें इस्तेमाल करने लगेंगे. हम नसबंदी के मामले में यह देख सकते हैं. पुरुषों की नसबंदी की प्रक्रिया 200 साल पहले शुरू हो गई थी लेकिन फिर भी महिलाओं की नसबंदी पुरुषों की तुलना में 10 गुना ज़्यादा होती है. पुरुषों की गर्भनिरोधक गोलियों को विकसित करने के लिए सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से निपटना होगा. इसमें सबसे ज़रूरी और पहला कदम है लैंगिक समानता का दायरा बढ़ाना. हम पुरुषों की गर्भनिरोधक गोली का इंतज़ार 50 साल से कर रहे हैं, अब और 50 साल का इंतजार नहीं कर सकते.
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MentalHealth: माँ के डर, शक और दुनिया को भ्रम कहने वाली मैं कौन हूं दीपांजना सरकार

Date : 14-Oct-2019
एक रोज़ की बात है. रात के लगभग डेढ़ बज चुके थे. लेकिन काफ़ी समझाने-बुझाने और मिन्नतें करने के बाद भी मेरी माँ सोने का नाम नहीं ले रही थीं. वे दीवार पर पीठ टिकाकर चुप बैठी थीं. उनकी आँखें शून्य में देख रही थीं. एक तरह का ग़ुस्सा, शक और चिड़चिड़ाहट थी उनकी आँखों में. काफ़ी कोशिशों के बाद भी जब वह सोने के लिए तैयार नहीं हुईं तो मेरा सब्र का बांध टूट गया. माँ जिस कमरे में बैठी थीं मैं वहां से निकलकर दूसरे कमरे में गई और घंटों तक रोती रही. मुझे लगा कि अब तक तो माँ थककर सो चुकी होंगी. लेकिन मैं जब वापस गईं तो वो उसी स्थिति में बैठी थीं. उन्होंने ग़ुस्से में मेरी ओर देखकर कहा - तुम दूसरे कमरे में जाकर मेरे ख़िलाफ़ काला जादू कर रही थीं न... ये मेरी कहानी है, प्यार की, मोहब्बत की, दर्द की और बेबसी की... डिप्रेशन की शिकार माँ का ख़याल रखने वाली बेटी की कहानी अगर मैं ठीक से याद करूं तो दिसंबर 2017 में पता चला कि मेरी माँ डिप्रेशन से जूझ रही हैं. अविवाहित होने और उनके साथ रहते हुए उनकी देख-रेख करने की ज़िम्मेदारी मेरी ही थी. इसकी शुरुआत कुछ इस तरह से हुई कि उनके बर्ताव से मुझे बहुत खीझ होती थी. उन्हें अपने आसपास हर घटना, हर चीज़, हर व्यक्ति पर शक होता था. मेरी माँ बचपन में यौन उत्पीड़न की शिकार हुई थीं. इस वजह से उनके लिए किसी पर भरोसा करना हमेशा से मुश्किल रहा था. लेकिन ये वो बात थी, जो उन्होंने मेरे साथ तब शेयर की, जब उनकी उम्र 74 बरस हो गई थी. बीमारी के दौरान उनकी दूसरों के प्रति अविश्वास की आदत और बढ़ गई. घर में हर वक़्त तनाव बना रहता था. घर में कामवाली बाई की मौजूदगी से भी उन्हें परेशानी होती थी. डर लगता था. उन्होंने हमारे घर की उस कामवाली बाई पर भी यक़ीन करने से साफ़ इनकार कर दिया था जो बरसों से हमारे परिवार के साथ थीं. हमें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक माँ को क्या हो गया है. उनकी बीमारी का पता चलने और फिर दिनों-दिन उनकी हालत बिगड़ने का तजुर्बा मेरे लिए हैरान करने वाला था. Image captionदीपांजना सरकार की माँ अपने पति के साथ 14 बरस पहले मेरे पिता के देहांत के बाद माँ की देख-रेख करने वाली मैं अकेली ही थी. लेकिन, शारीरिक रूप से बीमार किसी इंसान और मानसिक परेशानी से जूझ रहे इंसान की देख-भाल में बहुत फ़र्क़ होता है. बीमारी की सूरत में ज़हनी हालत का बहुत असर होता है. मानसिक बीमारी के शिकार किसी शख़्स की देख-रेख के दौरान कई जज़्बाती तजुर्बे होते हैं. कई बार बहुत डरावने और निराश करने वाले लम्हे भी आते हैं. एक बार कुछ हुआ यूं कि मैं पूरे दिन काम करने के बाद बहुत थकी हुई थी. मेरी कमर में दर्द हो रहा था. उस दिन किसी तरह मुझे नींद आई. लेकिन रात में लगभग ढाई बजे मेरी माँ ने मुझे जगाकर कहा कि बेटा देखो, खिड़की पर कोई बैठा है. जब उन्होंने मुझे ये बताया तब मैं सो रही थी. दिमाग़ और मन तर्क गढ़ने की स्थिति में नहीं था. तो माँ से ये बात सुनकर मैं बुरी तरह डर गई. ऐसी स्थिति में आप ख़ुद को बेबसी के दलदल में फँसा हुआ पाते हैं. आप को ग़ुस्सा भी आता है. आप को लगता है कि आप हार जाएंगे. कई बार आप ख़ुद को ही दोषी मानने लगते हैं. डर, बेबसी और दुख लेकिन, मानसिक बीमारी के शिकार किसी इंसान की देख-रेख के दौरान आप कई बार समर्पण, मोहब्बत, विशुद्ध हमदर्दी, ख़ुशी और तसल्ली के जज़्बातों से भी गुज़रते हैं. मुझे ये स्वीकार करने में एक साल लग गया कि मेरी माँ अब पहले जैसी स्थिति में नहीं लौटेगी. मेरे लिए ये और भी हैरान करने वाली बात थी क्योंकि ख़ुद को ये बात समझाने के बाद से मेरे दिल से हिंसक जज़्बात बाहर हो गए. इससे पहले मैं अपनी मां पर नाराज़ रहती थी. मैं सोचती थी कि, आख़िर कैसे मेरी माँ ख़ुद को ऐसे हालात में पहुंचा सकती है. चूंकि मैं और मेरी मां का मिज़ाज बिल्कुल अलग था. हम दोनों में कई बातों पर बहुत फ़र्क़ था. और मैं ये सोच रही थी कि जिन विवादित बातों को मैं लंबे समय से नेपथ्य में डालती आई थी, वो मसले अब अनसुलझे ही रह जाएंगे, क्योंकि मेरी मां की मानसिक सेहत लगातार बिगड़ती ही जा रही थी.  बीमारी के शुरुआती महीनों में हर सुबह उठने का मतलब होता था, दोधारी तलवार पर चलना. इसमें भयंकर अनिश्चितता होती थी. आगे क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता था. भारी झुंझलाहट होती थी. कई बार तो मां उस घर को ही पहचानने से इनकार कर देती थीं, जिस में हम बरसों से रहते आए थे. कई महीनों तक तो ऐसा हुआ कि मेरी मां सारे कपड़े उतार कर पूरे घर में यूं ही घूमती रहती थी. हम बार-बार कपड़े पहनाते थे और वो हज़ार बार उतार डालती थी. मेरे लिए ये देख-रेख करने से ज़्यादा एक बेटी का संघर्ष था. बेटी होने का संघर्ष हालांकि, मुझे कई लोगों ने कहा कि मुझे मां से ख़ुद को जज़्बाती तौर पर काट लेना चाहिए. लेकिन, कई बार आप के लिए ऐसा करना मुमकिन नहीं होता. आख़िर एक बेटी अपनी मां से भावनात्मक जुड़ाव कैसे ख़त्म कर सकती है. वो भी अगर मां ज़हनी तौर पर बीमार हो तो. लेकिन, मेरे लिए उन्हें इस रूप में स्वीकार कर पाना मुश्किल हो रहा था. मैं उस वक़्त लाचारी में अक्सर चीख़ उठती थी, जब वो मेरे पिता को बड़ी शिद्दत से तलाशना शुरू कर देती थीं. जबकि मेरे पिता की मौत तो 14 बरस पहले ही हो चुकी थी. मेरी मां, अपने पति यानी मेरे पिता की याद में बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रोती थी और मुझ से मिन्नतें करती थीं कि मैं उन्हें मेरे पिता और उनके पति के पास ले चलूं. एक बार मैंने घर पर फ़ोन किया और फ़ोन पर उन्होंने मुझसे मिन्नतें करते हुए कहा कि बेटा तुमसे एक चीज़ मांगू, तुम दोगी क्या. इस पर मैंने कहा - हाँ, माँ कहो तो क्या चाहिए. इस पर उन्होंने कहा कि मुझे अपने पिता के पास ले चलो, मुझे समझ नहीं आ रहा है कि वो कहां चले गए हैं, उन्होंने खाना खाया भी होगा कि नहीं. मुझे प्लीज़ उनके पास ले चलो... ऐसे लम्हों में मुझे समझ में नहीं आता था कि मैं क्या करूं और क्या कहूं. मैं तब तक बुरी तरह लाचार महसूस करती थी, जब तक डिमेंशिया पर रिसर्च कर रहे एक शख़्स ने मुझे ऐसे हालात से निपटने का तरीक़ा बताया. उससे पहले मैं केवल अपनी मां के सो जाने की दुआएं मांगा करती थी. और ये उम्मीद लगाती थी कि कल का दिन नया होगा और वो पुरानी बातें याद नहीं रखेंगी. कई दिनों तक तो वो रात में जागती थीं और उन्हें दौरे जैसे पड़ जाते थे. वो दिन बहुत डरावने होते थे. लेकिन आख़िर में मैंने इन हालात से समझौता कर लिया. अक्सर मैं थक कर सो जाया करती थी. मेरी मां एक कामकाजी महिला थीं और वो 22 साल पहले रिटायर हुई थीं. लेकिन अब ये बात उनके ज़हन से पूरी तरह मिट चुकी थी. कई ऐसे दिन भी होते हैं कि वो दफ़्तर जाना चाहती हैं. और जब उन्हें बताया जाता कि वो तो लंबे समय पहले रिटायर हो गई थीं और उन्हें तो अब पेंशन मिल रही है, तो वो बहुत हिंसक हो जाती थीं. मेरी मां को रोज़ाना नहलाना-धुलाना पड़ता था. क्योंकि वो एकदम भुलक्कड़ी हालत में रहती थीं. क्योंकि उनके ज़हन से ज़्यादातर पुरानी यादें मिट चुकी थीं. धुंधली होती माँ की यादें हालांकि, ये बहुत ही परेशानी भरी बात थी कि मां अब ज़्यादातर बातें भूलती जा रही थीं. लेकिन, अचानक ऐसा भी वक़्त आया कि मैं उनसे कोई उम्मीद लगाना ही छोड़ दिया. अब यादें, मोहब्बत, उम्मीदें और निर्भरता, सब कुछ मेरे हाथ से निकलते जा रहे थे और मैं लाचार थी. कुछ भी कर पाने की हालत में नहीं थी. ये बहुत असहाय महसूस करने वाले लम्हे थे, जिन्हें समझाया नहीं जा सकता. लेकिन, मुझे ये भी महसूस हुआ कि इंसान के तौर पर हम कितने बौने और तुच्छ हैं. और इसीलिए आज ये ज़रूरी हो गया था कि हम धरातल पर ही रहें. एक साल से ज़्यादा वक़्त तक मेरी हालत ऐसी थी कि मैं या तो इस स्थिति से सोते हुए पार पाना चाहती थी. या फिर मैं इन सब मुश्किलों से दूर भाग जाना चाहती थी. कई ऐसे दिन भी होते थे जब मैं रोती ही चली जाती थी और मेरा रोना रोके नहीं रुकता था. उस वक़्त मेरी मां ये सोचती थीं कि मैं अपने कमरे में कोई काला जादू कर रही होती हूं. लेकिन, सच तो ये था कि मैं शायद आराम करना चाहती थी, ताकि उनकी मानसिक परेशानी भरे लम्हों का सामना कर सकूं. चुनौतियां और शिकायतें इस में कोई दो राय नहीं कि किसी की देख-भाल करना बहुत मुश्किल है. लेकिन मैं इसे अपनी आध्यात्मिक जागरूकता का एक सफ़र तय करने जैसा मानती हूं. इस तजुर्बे ने मुझे सिखाया कि कैसे कुछ शिकायतों को पीछे छोड़ देना चाहिए. मिले हुए मौक़ों ही नहीं चुनौतियों का भी सम्मान करना चाहिए और उन्हें स्वीकार करना चाहिए. उन बातों को मंज़ूर कर लेना चाहिए, जो नियत हैं. ज़िंदगी के जितने भी रूप देखने को मिलें, उन से शिकवा करने के बजाय उनका मान रखना चाहिए. हमें हर लम्हा मृत्यु को स्वीकार करने को तैयार रहना चाहिए क्योंकि उस के बाद ही पुनर्जन्म होता है. इस तजुर्बे ने मुझे ख़ामोशी की अहमियत का एहसास कराया. मुझे पता चला कि ख़ुद के साथ होना और उन के साथ होना क्या होता है, जो ख़ुद ही बहुत लाचार हो. ख़ुद को दोषी समझे कि उसने अपने कपड़े गंदे कर लिए हैं और इस बात का उस को ख़ुद ही अंदाज़ा नहीं है. इस तजुर्बे ने मुझे इस ख़ूबसूरत एहसास से वाक़िफ़ कराया कि कैसे किसी की आंखों में प्यार से आंखे डाल कर देखते हैं और उसे ये भरोसा देते हैं कि कमज़ोर या किसी पर निर्भर होने में कोई बुराई नहीं है. मैं ने शायद कभी भी ये अनुभव नहीं किया होगा कि केवल हाथ पकड़ कर मुस्कुरा देने से कितनी राहत मिलती है. हालांकि मैं महीनों तक ख़ुद को मुजरिम मानने के एहसास से गुज़री हूं, जब भी मुझे ख्याल आया है कि इस सफ़र के दौरान मैंने हमेशा बहुत ख़ुशनुमा बर्ताव नहीं किया. लेकिन, मैं ख़ुद को दोषी मानने के उस दौर से बाहर आई, तो उसके लिए साहस और ताक़त मुझे इस अनुभव ने ही दी. मुझे अगर ऐसा तजुर्बा नहीं होता, तो मैं शायद कभी ये नहीं जान पाती कि उम्मीदों को त्याग कर किसी को बिना शर्त स्वीकार करना क्या होता है. ये ऐसी प्रक्रिया नहीं है, जो रातों-रात हो. और इसकी शायद यही बात सब से मुश्किल है. लेकिन, ये ख़ुद को आज़ाद करने का सबसे शानदार अनुभव भी है. ये स्वीकार करना आसान नहीं है कि आप की मां शारीरिक तौर पर तो मौजूद हैं, लेकिन जज़्बाती और मानसिक तौर पर वो आप से दूर जा चुकी हैं. जब माँ ने उठाई एक किताब लेकिन, ये हक़ीक़त कि वो अभी भी शारीरिक तौर पर क़रीब हैं, बहुत राहत देती है. क्योंकि आपके पास थका देने वाले दिन के बाद घर लौटने पर उसके क़रीब आने का भरोसा तो होता है. ख़ुशी वो है कि जब उन्हें ये याद हो कि मुझे मछली बहुत पसंद है और वो अपने हिस्से में से कुछ बचा कर मेरे लिए रखती हैं. ख़ुशी वो है जब मैं दफ़्तर से देर से आती हूं और ये देखती हूं कि वो साथ में खाना खाने के लिए मेरा इंतज़ार कर रही हैं. और जब मैं जल्दी घर आ जाती हूं और मुझे देख कर मां मुस्कुराती हैं, तो उससे ख़ूबसूरत कोई और एहसास हो ही नहीं सकता. मैं कितना भी थकी क्यों न हूं, फिर भी मुझे काम करने की ताक़त मिलती है, जब मैं उनके लिए कोई ख़ास पसंदीदा डिश बनाती हूं और वो उसकी तारीफ़ करती हैं. मुझे उम्मीद जगती है, जब महीनों बाद मैं देखती हूं कि मां ने कोई किताब उठाई है और वो उसे पढ़ने की कोशिश करती हैं. या फिर पहले की तरह रोज़ शाम को टीवी देखने लगती हैं. मैं इन दिनों तब बहुत ख़ुश हो जाती हूं जब वो किसी बात पर साफ़ तौर से अपनी नाख़ुशी का इज़हार करती हैं. ये बात कि वो अभी भी मज़बूती से अपनी बात कह सकती हैं, ख़ुशी देने के लिए पर्याप्त है. घरेलू स्तर पर मां की देख-भाल करना मेरे अकेले का ही सफ़र रहा है. ये ऐसी लड़ाई थी, जो मैंने लड़ी, जिस में मैंने कई बार शिकस्त भी खाई, लाचारी भी महसूस की, ख़ुद को दोषी भी माना, खीझ भी हुई और कई बार तो मुझे समझ ही नहीं आता था कि मैं करूं तो आख़िर क्या करूं. एक अलग दुनिया हालांकि, मुझे अपने दोस्तों, मेरा भला चाहने वालों और ख़ुद को परिवार मानने वाले लोगों से काफ़ी सहयोग मिला. लेकिन, इस देख-भाल वाले तजुर्बे ने मुझे कई बातों का गहराई से एहसास कराया. मैं अगर इस सफ़र पर नहीं निकली होती तो शायद मैं ज़िंदगी के कई पहलुओं से अनजान ही रह जाती. हालांकि, ये बेहद मुश्किल काम है कि आप जिस व्यक्ति का ख्याल रख रहे हों, उसके हिसाब से ख़ुद को ढालें. लेकिन, ये अनुभव आप को हौसला भी देता है, आप की तेज़ रफ़्तार को भी धीमा करता है. ये अनुभव आप को मौक़ा देता है कि आप ठहर कर कई ऐसी बातों पर ग़ौर करें, जिसकी आप आम तौर पर अनदेखी कर देते हैं. मैंने ये सीखा कि ठहरना कितना अहम होता है. ये ऐसी चीज़ है जो हम अपनी भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में आम तौर पर नहीं करते. मुझे ये एहसास हुआ कि हमारे लिए ठहरना बहुत मुश्किल है क्योंकि हम सामाजिक रूप से इस के लिए ढले ही नहीं हैं. शुरुआत में मां के पास रहना बहुत डरावना लगता था. ख़ास तौर से जब उन्हें दौरे पड़ते थे. लेकिन, तभी एक दिन मैं ने इस अनुभव के साथ क़दम ताल करने का फ़ैसला किया. मैं उनकी ख्याली दुनिया का हिस्सा बन गईं. आख़िर मैं होती कौन हूं उनकी दुनिया को ख्याली कहने वाली. देख-रेख करने के इस सफ़र ने मुझे अहसास कराया कि मैं कितनी बुरी तरह से ज़ख़्मी इंसान थी और मुझे ख़ुद को राहत देने की कितनी सख़्त ज़रूरत थी. और किसी को राहत तभी मिलती है, जब कोई उन ताज़ा ज़ख़्मों के साथ आगे बढ़ता है और उनका आंखों में आंखें डाल कर सामना करता है. हालांकि इसमें ख़ून बहता है. लेकिन, बहुत सारा ख़ून बह जाने के बाद ये ज़ख़्म भर भी जाते हैं. मुझे लगता है कि मां की देख-भाल का ये सफ़र ज़िंदगी की तरफ़ से मुझे एक तोहफ़ा है, जिसका माध्यम मेरी मां बनीं. इससे मुझे जीवन के कई बेशक़ीमती सबक़ जो मिले. हो सकता है कि मैं थकी हूं. लेकिन आज मैं निश्चित रूप से एक बेहतर इंसान हूं. जो ज़्यादा जागरूक है. जिसमें ज़्यादा सहनशक्ति है, ताक़त है, साहत है, चीज़ों को जस का तस स्वीकार करने की क्षमता है. जिस के अंदर दया है, हमदर्दी है. जिसको शिकायतें कम हैं. जो किसी के बारे में फौरन राय नहीं क़ायम करती और जिस में हिचक नहीं है. अगर ये ज़िंदगी के इनाम माने जाते हैं, तो हां, ये सफ़र निश्चित रूप से बहुत फ़ायदेमंद और तसल्ली देने वाला रहा है. जहां मेरा दिल बार बार ख़ाली भी हुआ है और हर बार नई ऊर्जा और नई रोशनी से सराबोर भी हुआ है. ये ऐसा अनुभव था जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती.
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हममें से बहुत लोग टॉयलेट सीट पर बैठकर ग़ुस्से में इस तरह दांत भींचते हैं और इतना ज़ोर लगाते हैं कि हमारे नसें सूज जाती हैं और दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं.

Date : 04-Oct-2019
 04 अक्टूबर 2019 अगर आप ये लेख टॉयलेट में बैठे-बैठे पढ़ रहे हैं और इस चक्कर में आपको ज़्यादा वक़्त लग रहा है तो टॉयलेटसीट पर सही पोज़िशन में बैठ जाइए. ये विषय पहली बार में हास्यास्पद लग सकता है लेकिन ये कोई छोटी बात नहीं है. एक औसत व्यक्ति अपनी पूरी ज़िंदगी में छह महीने से ज़्यादा का वक़्त टॉयलेट में बिताता है और हर साल तक़रीबन 145 किलो मल त्याग करता है. इसका मतलब ये हुआ कि एक औसत व्यक्ति हर साल अपने शरीर के भार के दोगुना मल त्याग करता है. उम्मीद है अब तक आपको ये समझ आ गया कि ये विषय हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है. आप जानते हैं कि टॉयलेट में बैठने का सही तरीक़ा क्या है. ये बात तो तय है कि हममें से हर कोई टॉयलेट में ठीक से नहीं बैठता. 20वीं सदी के मध्य में यूरोपीय डॉक्टरों की एक टीम अफ़्रीका के ग्रामीण इलाक़ों में काम कर रही थी. डॉक्टर ये देख कर हैरान थे कि वहां के स्थानीय लोगों को पाचन और पेट से जुड़ी तकलीफ़ें न के बराबर थीं. दुनिया के अन्य कई विकासशील देशों में भी ऐसा ही पाया गया. डॉक्टरों ने पता लगाया कि ये सिर्फ़ खाने में अंतर की वजह से नहीं था बल्कि लोगों के टॉयलेट इस्तेमाल करने के तरीक़े और मल त्याग करते समय बैठने की पोज़िशन में अंतर की वजह से भी था. पश्चिमी देशों में लोग जितनी बार टॉयलेट में जाते हैं, औसतन वो वहां 114-130 सेकेंड बिताते हैं. इसके उलट, भारत समेत कई विकासशील देशों में लोग टॉयलेट में उकड़ूं होकर मल त्याग करते हैं और महज़ 51 सेकेंड में निबट लेते हैं. विकासशील देशों के शौचालयों का डिज़ाइन भी ऐसा होता है कि उसे इस्तेमाल करने के लिए आपको उकड़ूं बैठना होता है. विशेषज्ञों का मानना है कि उकड़ूं बैठने वाला तरीक़ा बेहतर है. जब हम टॉयलेट सीट पर बैठते हैं तो हमारी गुदा नलिका 90 अंश के कोण पर होती है इस वजह से हमारी मांसपेशियों में खिंचाव होता है. यही वजह है कि हममें से कई लोग टॉयलेट में बैठने पर तनाव महसूस करते हैं. इस तनाव की वजह से कई लोगों को बवासीर, बेहोशी और यहां तक कि दौरे आने जैसी तकलीफ़ें भी हो जाती हैं. तो फिर हम वेस्टर्न शैली के टॉयलेट क्यों इस्तेमाल करते हैं? ऐसा माना जाता है कि पहला साधारण टॉयलेट सबसे पहले तक़रीबन 6 हज़ार साल पहले मेसोपोटिया में मिला था. सन् 315 तक रोम में 144 सार्वजनिक शौचालय थे और बाथरूम जाना सामाजिक चलन जैसा हो गया था. पहला फ़्लश वाला टॉयलेट साल 1592 में ब्रिटेन के जॉन हैरिंगटन ने बनाया था. उन्होंने इसे द एजैक्स का नाम दिया था. इसके बाद वर्ष 1880 में थॉमस क्रैपर ने यू-बेंड का आविष्कार किया और इस आविष्कार के साथ बहुत कुछ बदल गया. यू-बेंड सीधे टॉयलेट के नीचे से मल निकाल देता था और इससे बदबू नहीं आती थी. इस तरह पाश्चात्य शैली के टॉयलेट यूरोपीय सभ्यता का प्रतीक बन गए लेकिन इससे कुछ चीज़ें मुश्किल भी हो गईं. सेहत पर ख़तरा हममें से बहुत लोग टॉयलेट सीट पर बैठकर ग़ुस्से में इस तरह दांत भींचते हैं और इतना ज़ोर लगाते हैं कि हमारे नसें सूज जाती हैं और दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं. ऐसा क़ब्ज़, बदहज़मी, अपच या पेट की दूसरी दिक्क़तों की वजह से भी हो सकता है. लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीयन शैली के टॉयलेट भी ऐसी समस्याओं के लिए काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं. 1960 के मध्य में कोर्नेल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एलेक्ज़ेंडर किरा ने यूरोपीय शैली के टॉयलेट्स को सबसे बुरी डिज़ाइन में बनाई गई चीज़ कहा. मशहूर अमरीकी कलाकार एल्विस प्रेस्ली के डॉक्टर का कहना था कि जिस दिल के दौरे से उनकी मौत हुई थी, वो उन्हें टॉयलेट में ज़्यादा ज़ोर लगाने के कारण हुई थी । इतनी सारी बड़ी-बड़ी समस्याओं का बहुत आसान सा हल है. अगर आप यूरोपीय शैली के टॉयलेट में बैठते हैं तो बस इतना कीजिए कि अपने घुटनों को 90 डिग्री के बजाय 35 डिग्री कोण पर मोड़ लीजिए. इससे आपके पेट और गुदा पर ज़ोर कम पड़ेगा और चीज़ें आसान हो जाएंगी. इसके लिए आप टॉयलेट में एक छोटा सा पायदान रख सकते हैं और अपने पैर इस पर टिका सकते हैं. अगर आप जल्दी में या कहीं बाहर नहीं हैं तो गोद में मोटी किताबों का एक बंडल या ऐसी ही कोई चीज़ रख सकते हैं. यानी किताबें और पत्रिकाएं टॉयलेट में भी काम आ सकती हैं!
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कल्कि केकलां ने कहा कि वो अपने बच्चे को वॉटर बर्थ के ज़रिए जन्म देंगी.

Date : 02-Oct-2019
मुम्बई 2 अक्टूबर । कल्कि केकलां ने हाल ही में अपने प्रेंग्नेंट होने की खबर साझा की है. उन्होंने कहा कि वो अपने बच्चे को वॉटर बर्थ के ज़रिए जन्म देंगी. लेकिन बहुत कम लोग वॉटर बर्थ डिलीवरी की प्रक्रिया के बारे में जानते हैं. आख़िर वॉटर बर्थ है क्या? ये एक ऐसी ख़ास प्रक्रिया है जिसमें प्रसव पीड़ा के दौरान गर्भवती महिला को पानी से भरे पूल या टब में बैठा दिया जाता है और बच्चे की डिलीवरी पानी के भीतर ही करवाई जाती है. ये मां की इच्छा पर निर्भर करता है कि वो अपने बच्चे को पानी के अंदर जन्म देना चाहती हैं या नहीं.
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क्यों मलेरिया की दवाएं हो रही हैं बेअसर

Date : 27-Jul-2019
दक्षिण पूर्वी एशिया के इलाके में मलेरिया से लड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली ज़रूरी दवाएं बेअसर हो रही हैं. मलेरिया के परजीवी इन दवाओं को लेकर इम्यून हो गए हैं यानी अब इन दवाओं का भी उन पर असर नहीं हो रहा. कंबोडिया से लेकर लाओस, थाईलैंड और वियतनाम में अधिकतर मरीज़ों पर मलेरिया में दी जाने वाली प्राथमिक दवाएं असर नहीं कर रही हैं. खासकर कंबोडिया में इन दवाओं के फेल होने के सबसे ज़्यादा मामले सामने आए हैं. अगर दक्षिण एशियाई देश भारत की बात करें तो साल 2017 में आई वर्ल्ड मलेरिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मलेरिया के मामलों में 24 फ़ीसदी तक कमी आई है. दुनिया के 11 देशों में कुल मलेरिया मरीज़ों के 70 फ़ीसदी केस पाए जाते हैं, और इन देशों में भारत का नाम भी शामिल है. साल 2018 में भारत में मलेरिया बीमारी के मामलों में 24 फ़ीसदी कमी आई है और इसके साथ ही भारत अब मलेरिया के मामले में टॉप तीन देशों में से एक नहीं है. हालांकि अब भी भारत की कुल आबादी के 94 फ़ीसदी लोगों पर मलेरिया का ख़तरा बना हुआ है. भारत ने साल 2027 तक मलेरिया मुक्त होने और साल 2030 तक इस बीमारी को खत्म करने का लक्ष्य रखा है. इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मलेरिया के मामले कमी का लक्ष्य ओडिशा के इस बीमारी से लड़ने में मिली कामयाबी के कारण मुमकिन हो सका है. इससे पहले भारत में कुल मलेरिया मरीज़ों का 40 फ़ीसदी हिस्सा ओडिशा राज्य से आता था. कंबोडिया में मलेरिया के लिए दो दवाओं का इस्तेमाल होता है- आर्टेमिसिनिन और पिपोराक्विन इन दवाओं का कॉम्बिनेशन कंबोडिया में साल 2008 में लाया गया. लेकिन साल 2013 में कंबोडिया के पश्चिमी हिस्से में पहला ऐसा मामला सामने आया जब मलेरिया के परजीवी पर इन दोनों दवाओं का असर खत्म होने लगा. लेंसेंट की हालिया एक रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण पूर्वी एशिया के मरीज़ों के खून के सैंपल लिये गए. जब इन परजीवियों के डीएनए की जांच की गई तो पाया गया कि ये परजीवी दवा प्रतिरोधी हो चुके हैं और ये प्रभाव कंबोडिया से होकर लाओस, थाईलैंड और वियतनाम तक फैल चुका है. इसका म्यूटेशन, समस्या को और भी विकराल बना रहा है. इन देशों के कई इलाकों में 80 फ़ीसदी तक मलेरिया परजीवियों पर दवा बेअसर हो चुकी हैं. क्या अब मलेरिया लाइलाज हो गया है? नहीं, लैंसेंट के ही दूसरे जर्नल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में कहा गया कि इन रोगियों को स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट से ठीक नहीं किया जा रहा है. इलाज वैकल्पिक दवाओं से किया जा सकता है. वियतनाम में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी क्लिनिकल रिसर्च यूनिट के प्रोफ़ेसर ट्रान तिन्ह हिएन कहते हैं, मलेरिया के परजीवियों में प्रतिरोध के प्रसार और गहराते इस संकट ने वैकल्पिक उपचारों को अपनाने की ज़रूरत पर प्रकाश डाला. अब मलेरिया में आर्टेमिसियम के साथ दूसरी दवाओं के इस्तेमाल और तीन दवाओं के कॉम्बिनेशन से इसका इलाज संभव है. समस्या क्या है? दुनिया को मलेरिया से मुक्त करने की दिशा में हो रहे तमाम प्रयासों को इससे झटका लगा है. सबसे बड़ा संकट है कि अगर ये अफ़्रीका में पहुंच गया तो क्या होगा, जहां मलेरिया के मामले सबसे ज़्यादा हैं. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ओलिवियो मियोट्टो के मुताबिक, परजीवियों का ये बढ़ता प्रतिरोध प्रभावी तरीके से बढ़ रहा है और नए क्षेत्रों में जाने और नए जेनेटिक को अपनाने में सक्षम है. अगर ये अफ़्रीका पहुंच गया तो इसके नतीजे भयानक होंगे, क्योंकि मलेरिया अफ़्रीका की सबसे बड़ी समस्या है. लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन और ट्रॉपिकल मेडिसिन के प्रोफ़ेसर कॉलिन सदरलैंड कहते हैं, ये परजीवी एक डरावने जानवर जैसे हैं इसमें कोई संशय नहीं है. हालांकि, मुझे लगता है कि ये परजीवी बहुत फिट नहीं हैं, क्योंकि इनकी संख्या में गिरावट हो रही है. प्रोफ़ेसर कॉलिन मानते हैं कि परजीवियों का दवा प्रतिरोधी होना एक बड़ी समस्या तो है लेकिन इसे वैश्विक संकट तो नहीं कहा जा सकता. इसके परिणाम इतने भयानक नहीं होंगे जैसा हम सोच रहे हैं. हर साल दुनियाभर में मलेरिया के 21.9 करोड़ मामले सामने आते हैं. कपकपी, ठंड लगना और तेज़ बुखार मलेरिया के लक्षण है. अगर मलेरिया का सही इलाज ना हो तो समस्या गंभीर हो सकती है.
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एक सेक्स थेरपिस्ट का अनुभव उन्हीं के शब्दों में, मेरे सबसे ज़्यादा उम्र के क्लाइंट 89 साल के थे

Date : 26-Jul-2019
पीटर सैडिंग्टन सेक्स थेरपिस्ट हैं. उनके और उनके क्लाइंट्स के बीच हुई बातचीत गोपनीय है. उसके बारे में बात करके वो उनका विश्वास नहीं तोड़ेंगे. उनकी बताई गई कहानियां, एक सेक्स थेरेपिस्ट के तौर पर युवाओं के साथ किए गए उनके काम पर आधारित हैं. उनकी आपबीती पीटर के शब्दों में ही पढ़िए- मैं लोगों से उनकी बेहद निजी बातों पर चर्चा करता हूं लेकिन वो मेरे बारे में कुछ नहीं जानते और ये काम इसी तरह होता है. मैं एक सेक्स थेरेपिस्ट हूं इसलिए लोग मेरे पास अपनी यौन संबंधों से जुड़ी समस्याएं लेकर आते हैं. अगर कोई क्लाइंट मुझसे पूछता है क्या आप शादी-शुदा हैं? मैं बता देता हूं कि हां.इस बात को छुपाना बहुत अजीब होगा. इसके अलावा मैं सभी चीज़ों को प्रोफेशनल रखता हूं. मैं लोगों से उनके थेरपिस्ट के तौर पर बात करता हूं. उनके दोस्त की तरह नहीं. ये ज़ाहिर सी बात है कि लोगों को सहज करने के लिए उनसे थोड़ी हल्की-फुल्की बातचीत करनी पड़ती है लेकिन ये सब उनकी परेशानियों का हल ढ़ूढ़ने का बस एक हिस्सा भर है. जिस क्लिनिक में मैं काम करता हूं, वो एक घर के बैठक वाले कमरे की तरह है. वहां सिर्फ़ तीन आरामदायक कुर्सियां हैं, एक मेरे लिए और बाकि दो क्लाइंट्स के लिए. वहां मेरे पास मेरे परिवार की कोई फोटो नहीं है और न ही अन्य निजी सामान. इससे लोगों से दूरी बनाए रखने में मदद मिलती है क्लाइंट अकेले भी मुझसे बात करने आते हैं और जोड़े में भी. कुछ साल पहले 29 साल के रॉब अकेले मेरे पास आए थे क्योंकि वो अपनी नई गर्ल फ्रेंड के साथ अपने यौन संबंधों को लेकर चिंता में थे. उनकी गर्ल फ्रेंड को इन सब का बहुत अनुभव था लेकिन उन्हें नहीं. वो थेरपी में अपनी गर्लफ्रेंड को शामिल नहीं करना चाहते थे क्योंकि वो इसे लेकर शर्मिंदा महसूस कर रहे थे. सेशन के दौरान मैंने रॉब से पूछा कि अगर कैली आपकी जगह होतीं तो क्या आप भी उन्हें अनुभव की कमी की वजह से अलग तरह से देखते? उन्हें मेरी बात समझ आई और उन्होंने कैली से थेरपी में शामिल होने के लिए पूछा. रॉब का आत्मविश्वास वापस आ गया. जिस चीज़ ने रॉब की मदद की वो था दिखावा करने के बजाय अपनी परेशानियों को लेकर पार्टनर से ईमानदार होना. नौजवानों को भी समस्या मेरे क्लाइंट्स 20 साल से लेकर 45 साल की उम्र के होते हैं. लोग सेक्स थेरपी को लेकर इतने डरे हुए नहीं होते हैं जितना कि दूसरों को लगता है. पिछले 15 सालों में मैंने देखा है कि सेक्स थेरपी के लिए आने वालों में कम उम्र के लोगों की संख्या बढ़ी है. साथ ही मैंने उन उम्रदराज लोगों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखी है जिन्होंने नए रिश्तों की शुरुआत की है. यौन समस्याओं के बारे में बात करना अब वर्जित नहीं रहा. मुझे लगता है कि पोर्न के प्रभाव और सेक्स को लेकर बदलती अपेक्षाओं के कारण लोग इस तरह की परेशानियों का सामना करते हैं और युवावस्था में समस्याएं लेकर आते हैं. जिस संस्थान के लिए मैं काम करता हूं उसके अनुसार 2018 में थेरपी के लिए आने वाले लोगों में 42 प्रतिशत 35 साल से कम उम्र के थे. इसके अलावा मेरे सबसे ज़्यादा उम्र के क्लाइंट 89 साल के थे. वो एक नए रिश्ते में आए थे. उन्हें और उनकी पार्टनर को यौन संबंधी में कुछ दिक्कतें आ रही थीं. वो पहले किसी डॉक्टर के पास गए थे लेकिन वो ये देख कर हैरान हो गया कि इस उम्र में ये लोग यौन संबंध बना रहे हैं. इसके चलते उन्हें कोई मदद नहीं मिली और फिर वो मेरे पास आ गए. सेक्स थेरेपी के लिए मेरे पास आने वाले ज़्यादतर लोग पहले किसी डॉक्टर के पास जा चुके होते हैं. अक्सर लोगों को अपनी समस्याओं पर बात करने के लिए बस किसी की ज़रूरत होती है. कई लोग घबराए होते हैं. कई जोड़ों को लगता है कि उन्हें अपनी यौन समस्याएं मेरे सामने दिखानी पड़ेंगी. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होता है. मेरा सबसे कम उम्र के क्लाइंट 17 साल के थे, जिन्हें संबंध बनाने में कुछ समस्या हो रही थी. इसकी वजह से उनका ब्रेक-अप हो गया था. उन्होंने काफ़ी कोशिश की लेकिन परेशानी दूर नहीं हुई. उनकी क्लास में एक लड़की थी जो उन्हें पंसद करती थी लेकिन पहले जो हुआ उसके कारण वो थोड़ा डरे हुए थे. वो पहले इस बारे में सलाह लेने एक डॉक्टर के पास गए थे. डॉक्टर ने कहा था कि उनकी उम्र अभी कम है इसी वजह से ऐसा हो रहा है और आने वाले समय में ये परेशानी दूर हो जाएगी. लेकिन फिर वो मेरे पास आए. जब वो मेरे पास आए थे तो बहुत घबराए हुए थे. सेशन के दौरान उनका चेरहा लाल ही रहा. हर सेशन अलग होता है. ऐसे मामलों में हम ज़्यादातर जो करते हैं, वो है सेक्स एजुकेशन देना. चित्रों की मदद से समस्या को समझाने की कोशिश करना. मैंने उनकी मदद की. उनकी घबराहट ही उनकी समस्या का कारण बन रही थी. मैंने उन्हें घर पर तीन बार इरेक्शन की सलाह दी ताकि उन्हें ये भरोसा हो सके कि वो इसे दोबारा कर सकता है. धीरे-धीरे उनमें आत्मविश्वास आने लगा और उसकी समस्या को दूर करने में सिर्फ़ सात सेशन लगे. थेरपी ख़त्म होने के क़रीब एक महीने बाद उन्होंने सेंटर में फ़ोन करके मेरे लिए एक संदेश भी छोड़ा था कि वो अपनी क्लास की लड़की के साथ बाहर जा रहा है और उन्हें लगता है कि अब उनकी समस्या दूर हो गई है. थेरपिस्ट बनने से पहले मैंने विशेष शैक्षणिक आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए बने एक आवासीय विद्यालय में काम किया था. मैंने देखा है कि बच्चे के लिए सही स्कूल ढूंढने और उसके भविष्य की चिंता के चलते कुछ लोगों के संबंधों में कितना दबाव आ जाता है. काश! मैं उनके लिए कुछ कर पाता. मेरी नौकरी के अलावा मैंने दो साल की कपल्स काउंसलिंग की ट्रेनिंग भी ली. लोगों की काउंसलिंग के दौरान कई बार मुझे ये पता चलता था कि उनकी समस्या सेक्शुअल के साथ-साथ भावनात्मक है. इसलिए, मैं सेक्स थेरपी भी देता था ताकि हर स्तर पर उनकी मदद कर सकूं. एक समलैंगिक जोड़ा थेरपिस्ट के तौर पर शुरुआत करने पर मेरे पास एक ऐसा कपल भी आया था जिनका भावानात्मक रिश्ता बहुत मज़बूत था लेकिन उन्हें सेक्स लाइफ में मदद की ज़रूरत थी. मेरे क्लाइंट मैट और एलेक्स उस वक़्त क्रमश: 20वें और 30वें साल में थे. पहले सेशन में दोनों बहुत ही झिझक महसूस कर रहे थे. वो बार-बार अपनी ही कुर्सी पर जगह बदलते और मेरे सवालों के जवाब देने से बचते. वो समलैंगिक थे और उन्हें ये संकोच भी था कि मैं इस बात को स्वीकार करूंगा या नहीं. उनकी समस्या इरेक्शन संबंध पुरुष मेरे पास जिन कारणों से आते हैं उनमें इरेक्शन से जुड़ी और शीघ्रपतन की समस्या सबसे आम है. मैंने मैट और एलेक्स को एक टचिंग एक्सरसाइज की सलाह दी. मेरा मकसद उनमें उत्तजेना पैदा करना था. उन्होंने धीरे-धीरे समझा कि कैसे एक-दूसरे को समझा जा सकता है. उन दोनों ने इसमें बहुत मेहनत की और आख़िरकार मैट का आत्मविश्वास बढ़ गया. उन्होंने बाद में शादी कर ली. दोस्त या डॉक्टर बनने की मुश्किल मेरे दोस्तों को मेरा काम दिलचस्प लगता है. ख़ुद को सेक्स थेरेपिस्ट बताने पर लोगों को आपकी बातों में एक उत्सुकता जाग जाती है. कुछ दोस्त मुझसे यौन संबंधो पर बात करने में थोड़ा असहज महसूस करते हैं लेकिन कुछ बहुत आराम से अपनी सेक्स संबंधी समस्याओं के बारे में बताते हैं. कुछ दोस्तों ने ये भी पूछा है कि क्या उनका मुझसे एक पेशेवर की तरह भी संबंध हो सकता है क्योंकि उनके लिए अपने दोस्त से समस्याओं पर बात करना ज़्यादा आसान होगा. लेकिन, मैंने उन्हें मना कर दिया. मैं अपना काम घर पर लेकर नहीं आता और आप अपने दोस्तों व परिवार के सदस्यों के साथ डॉक्टर का संबंध नहीं बना सकते. कई बारी सेक्शुअल समस्याएं अतीत की किसी बुरी याद से भी जुड़ी होती हैं जैसे यौन उत्पीड़न या यौन शोषण. मेरी एक महिला क्लाइंट मेरी वैजिनिज़्मस से परेशान थीं. उन्होंने घर में ये सुना था कि उनके भाई के जन्म के समय उनकी मां लगभग मरने की स्थिति में पहुंच गई थीं. दूसरे सेशन में मैंने उनसे उनके परिवार, बचपन और पुराने सेक्शुअल अनुभवों के बारे में बात की. तब मेरी ने बचपन में अपनी मां को लेकर सुनी बात के बारे में बताया. मेरी की समस्या को दूर करने के लिए हमने कई कॉग्निटिव बिहेव्यरल थेरेपी दी और उनके डर को ख़त्म करने की कोशिश की. मैंने उन्हें पेल्विक फ्लोर मसल्स को ढीला छोड़ना सिखाया. अगर मुझे शुरू में ही समस्या को पहचान कर अलग-अलग करना नहीं आता तो मैं इस काम को नहीं कर पाता. मैं कई मुश्किल और परेशान करने वाली कहानियां सुनता हूं. लेकिन, मुझे इन सबसे प्रभावित होने से बचना होता है. क्लाइंट के लिए दुख या खेद महसूस करना कोई मदद नहीं करता. लेकिन, दुख भरे पलों के साथ ख़ुशी के भी पल आते हैं. कभी-कभी मुझे थेरेपी के बाद कपल्स के धन्यवाद संदेश और कार्ड भी मिलते हैं. एक कपल ने 12 साल बाद मुझे संदेश भेजा कि उनकी ज़िंदगी कैसी चल रही है. उन्होंने अपने एक बच्चे का नाम मेरे नाम पर भी रखा है जो एक सम्मान की बात है. आप इस काम में बहुत ज़्यादा पैसा भले ही न कमाते हों लेकिन इसे करने का एक और कारण है. लोगों को आपकी सलाह मानते हुए और उनकी ज़िंदगी बदलते हुए देखना एक असाधारण अहसास है.
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एक समय एक काम करना चाहिये

Date : 22-Jul-2019
स्मार्ट फ़ोन और कंप्यूटर स्क्रीन पर लगातार आने वाले संदेश हमें व्यस्त रखते हैं. हो सकता है कि वे हमारा भला करने से ज़्यादा नुक़सान कर रहे हों. हमें लगता है कि हमें जवाब ज़रूर देना चाहिए, क्योंकि यह काम से जुड़ी चीज़ है, लेकिन लगातार जुड़े रहने का मतलब है कि हमें गहराई से सोचने का मौक़ा नहीं मिल पाता. यही उन कंपनियों के लिए समस्या है जो अपने कर्मचारियों से ज़्यादा से ज़्यादा हासिल करना चाहती हैं. एक व्यक्ति हमारे काम करने के तरीक़े को बदलना चाहते हैं. उनके मुताबिक़ दफ़्तरों में होने वाली अगली बड़ी क्रांति के लिए इसे दुरुस्त करने की ज़रूरत होगी. उनका मानना है कि कोई व्यक्ति किसी कंपनी के लिए कितना मूल्यवान है, यह उसके कौशल से नहीं बल्कि उसके ध्यान केंद्रित करने की क्षमता से आंका जाएगा. सवाल यह भी है कि हम ध्यान भटकाने वाली चीज़ों को रोकने के लिए समय कैसे निकालें और कैसे अपना बेहतरीन काम करें? कैल न्यूपोर्ट जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर हैं और उन्होंने डीप वर्क एंड डिजिटल मिनिमलिज्म सहित कई बेस्टसेलर किताबें लिखी हैं. उनका कहना है कि हमारे दफ़्तर सुविधाओं के लिहाज़ से बने हैं, हमारे दिमाग़ से बेहतरीन काम लेने के लिए नहीं. नॉलेज सेक्टर की नौकरियों में, जहां उत्पाद मशीनों की जगह मानवीय मेधा से तैयार किए जाते हैं, वहां हमें हमेशा (नेटवर्क से) जुड़े रहने की ज़रूरत होती है और एक साथ कई काम निपटाने के लिए तैयार रहना होता है. ये दोनों चीज़ें गहरी, रचनात्मक और पैनी सोच के अनुकूल नहीं है. न्यूपोर्ट कहते हैं, ज्ञान के काम में मुख्य संसाधन हमारा दिमाग़ और नई सूचनाएं पैदा करने की इसकी क्षमता है, लेकिन हम इसका लाभ नहीं उठा पाते. कुछ लोग एक साथ कई काम करने की क़समें खाते हैं, जबकि हम जानते हैं कि हमारे दिमाग़ को एक बार में एक से ज़्यादा चीज़ों पर ध्यान केंद्रित में कठिनाई होती है. मनोवैज्ञानिकों ने पहले सोचा था एक साथ कई काम करने वाले लोगों का अपने ध्यान पर असामान्य नियंत्रण होता है. लेकिन सबूत बताते हैं कि उनके पास (ईश्वर का दिया) ऐसा कोई उपहार नहीं होता. हक़ीक़त में, दिमाग़ लगाने वाले कई कामों में मल्टीटास्कर पिछड़ जाते हैं. इंसानी दिमाग़ की क्षमता सीमित है. किसी निश्चित समय में वे उतना ही काम कर सकते हैं. काम के दौरान उसमें कई चीज़ों को ठूंसकर भर देने से फ़ायदे की जगह नुक़सान होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है. न्यूपोर्ट का कहना है कि हर समय (नेटवर्क से) जुड़े रहना और तुरंत प्रतिक्रिया देने की उम्मीद करना हमारी ज़िंदगी को दयनीय बना देती है. यह हमारे दिमाग़ के सामाजिक सर्किट से मेल नहीं खाता. हमें अच्छा नहीं लगता कि कोई हमारे जवाब के इंतज़ार में बैठा है. यह हमें बेचैन करता है. ईमेल, स्लैक या दूसरे मैसेजिंग ऐप्स पर तुरंत उत्तर देना बहुत आसान है. ऐसा नहीं करने पर हम दोषी महसूस करते हैं और हमसे उम्मीद रहती है कि हम ऐसा करेंगे. न्यूपोर्ट का कहना है कि यह हमारे दिमाग़ को भरता रहता है. नॉलेज सेक्टर के कर्मचारी ईमेल आने से पहले की तुलना में अब ज़्यादा चीज़ों के लिए ज़िम्मेदार हैं. यह हमें उतावला बनाता है. हमें सोचना चाहिए कि बेमतलब की चीज़ों को दिमाग़ से कैसे निकालें और काम को कैसे कम करें. काम के लिए हमेशा जुड़े रहने से क्या हो सकता है? निस्संदेह, बर्नआउट. मैसेजिंग ऐप्स पर या मीटिंगों में होने वाली दिशाहीन बातचीत हमारे दिमाग़ में भीड़भाड़ बढ़ाती रहती है. लोगों को भटकाव के बिना बेहतरीन काम करने के मौक़े देना न्यूपोर्ट की अगली किताब- दि वर्ल्ड विदाउट ईमेल का मुख्य विषय है. उनका विचार श्रमिकों को कम लेकिन बेहतर काम करने की अनुमति देता है. गैरज़रूरी चटर-पटर को कम करना महत्वपूर्ण है लेकिन तभी जब संगठन की संस्कृति धीमे संचार की अनुमति देती हो. न्यूपोर्ट कहते हैं, मैनेजरों के समय का 85% हिस्सा बैठकों में, फोन पर या लोगों से काम के बारे में बातें करते हुए निकल जाता है. यह लचीला है और इसका अनुकूलन आसान है, लेकिन इंसानी दिमाग़ जिस तरह काम करता है, उससे इसका टकराव होता है. विषय परिवर्तन आपको थका देते हैं. लोग नो-ईमेल फ्राइडे जैसे तरीक़े आज़माते हैं. लेकिन यह कारगर नहीं होता क्योंकि एक-दूसरे को ईमेल किए बिना काम करने का कोई विकल्प तैयार नहीं होता. ईमेल या स्लैक का कम इस्तेमाल तभी कारगर होगा जब कोई विकल्प तैयार हो. न्यूपोर्ट का सुझाव है (जैसा कुछ अन्य लोग करते हैं) कि आमने-सामने का संचार ज़्यादा प्रभावी है. लेकिन महत्वपूर्ण चीज़ है एक ऐसी संस्कृति को प्रोत्साहित करना जहां स्पष्ट संचार ही मानदंड हो. न्यूपोर्ट का कहना है कि लोगों को दूसरे काम में दिमाग़ लगाने से पहले एक काम को पूरी तरह बंद करने की ज़रूरत होती है. जब हम लगातार ईमेल देख रहे होते हैं या जब हमें पहले के काम के बारे में बार-बार याद दिलाया जा रहा हो तो ऐसा करना मुश्किल होता है. हमारे ध्यान का कुछ हिस्सा पहले काम पर अटक जाता है- इस प्रभाव को ध्यान अवशेष कहा जाता है. हम जितने व्यस्त होते हैं, उतने ही काम बदलते हैं. इसलिए व्यस्त महसूस करना गहरी एकाग्रता में सहायक नहीं है. ध्यान भटकने के बाद दोबारा ध्यान केंद्रित करने में कितना समय लगता है, यह अलग-अलग हो सकता है. एक अध्ययन में पाया गया कि रुकावट के बाद दोबारा गहन ध्यान केंद्रित करने में औसत रूप से 23 मिनट 15 सेकेंड लगते हैं. इसका दूसरा पहलू यह है कि किसी बातचीत में सभी का शामिल होना बहुत सुविधाजनक है. लेकिन बिज़नेस का लक्ष्य कभी भी सुविधा नहीं होता. लक्ष्य होता है मूल्य. असेंबली लाइन ने कार के उत्पादन में क्रांति ला दी, लेकिन यह सुविधाजनक व्यवस्था नहीं है. यह व्यवस्था अधिक गाड़ियों के जल्दी उत्पादन के लिए बनाई गई है न्यूपोर्ट के मुताबिक़ सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में सबसे अधिक ध्यान केंद्रित करके काम होता है. वहां भी लक्ष्य एक उत्पाद का उत्पादन करना है. वह कहते हैं, इन सेक्टरों में कुछ समय के लिए चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था तैयार की जाती है. वे किसी एक चीज़ पर ही तीन दिनों के लिए काम करते हैं और उस दौरान उनका पूरा ध्यान उस एक उत्पाद पर होता है. सॉफ्टवेयर इंजीनियर कभी भी तदर्थ व्यवस्था के तहत काम नहीं करते. कारख़ानों में भी यह उपयोगी है क्योंकि सबसे ज़्यादा समय किसी उत्पाद को सबसे बेहतर ढंग से तैयार करने का तरीक़ा ढूंढ़ने में ही लगता है. ऐतिहासिक रूप से कुशल कारीगर शुरू से लेकर आख़िर तक उत्पादों का निर्माण करते थे. यह सुविधाजनक था, लेकिन तेज़ नहीं था. प्रोडक्शन लाइन की शुरुआत 20वीं सदी में जाकर हुई. इसमें श्रमिकों को सिर्फ़ उस एक काम पर ध्यान केंद्रित करना होता है, जिसमें वह निपुण होता है. दूसरा श्रमिक वह काम करता है जिसमें वह दक्ष होता है. ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं है कि नॉलेज सेक्टर में काम करने वालों के लिए फ़िलहाल हमारे पास काम का सबसे अच्छा तरीक़ा है. जैसा कि न्यूपोर्ट कहते हैं कि कुछ क्षेत्र प्रोडक्शन लाइन मॉडल के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं, जैसे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग. लेकिन आप जो कुछ भी बनाना चाहते हैं, चाहे ग्राहक के लिए एक पिच हो या नये उत्पाद का विचार, वह तेज़ रफ़्तार से बन सकता है. किसी परियोजना की शुरुआत से लेकर आख़िर तक सिर्फ़ सबसे दक्ष लोगों को जुटाकर, उन्हें भटकाव से बचाकर और स्पष्ट लक्ष्य के साथ काम कराने से प्रक्रिया कुशल बनी रहेगी. न्यूपोर्ट कहते हैं, नॉलेज सेक्टर में हम शुरुआती चरण में हैं. हम अभी तक औद्योगिक क्रांति तक नहीं पहुंचे हैं. नॉलेज सेक्टर में प्राथमिक पूंजी निवेश इंसानी दिमाग़ है, फैक्ट्री की मशीनें नहीं. न्यूपोर्ट का कहना है कि उन्हें अभी तक ऐसी किसी बड़ी कंपनी के बारे में नहीं मालूम जो उनके तरीक़े से काम करती हो, लेकिन यह स्थिति जल्द ही बदल जाएगी. इस बीच, जो कंपनियां अपने कर्मचारियों को एक साथ कई कामों के लिए प्रोत्साहित करती हैं, वे पीछे छूट जाएंगी. और जो कंपनियां धीमी, मगर गहरी और गुणवत्ता से भरी सोच का मूल्य समझती हैं वे आगे निकल जाएंगी.
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सबूत मिल जाएं कि कोई खाना आपकी कामेच्छा, मर्दाना ताक़त या यौन सुख को बढ़ा सकता है तो शायद इसे हाथों-हाथ ख़रीद लिया जाएगा.

Date : 19-Jul-2019
अगर इस बात के सबूत मिल जाएं कि कोई खाना आपकी कामेच्छा, मर्दाना ताक़त या यौन सुख को बढ़ा सकता है तो शायद इसे हाथों-हाथ ख़रीद लिया जाएगा. एक संतुलित आहार, सक्रिय जीवनशैली और अच्छा मानसिक स्वास्थ्य आपकी सेक्स लाइफ़ को बढ़ा सकता है, लेकिन क्या कोई ख़ास खाने की चीज़ें हैं जिससे वास्तव में प्राकृतिक सेक्स लाइफ़ को बढ़ाया जा सकता है? आइए इस थ्योरी के पीछे के इतिहास और विज्ञान को देखें कि क्या कोई खाद्य पदार्थ वास्तव में आपकी सेक्स लाइफ़ को बेहतर बना सकता है. कैसेनोवा को इतिहास में सबसे प्रसिद्ध प्रेमी माना जाता है. कहा जाता है कि वह नाश्ते में 50 सीपी खाता था. हालांकि, इसका कोई साक्ष्य नहीं है कि सीपी खाने से कामशक्ति बढ़ती है या नहीं. तो आख़िर यह अफ़वाह कहां से आई? ऐसा माना जाता है कि जब प्यार की ग्रीक देवी, एफ़्रोडाइट, पैदा हुईं तो वह समुद्र से उठी और इसलिए समुद्री भोजन को सेक्स लाइफ़ बढ़ाने वाले भोजने के तौर पर माना जाने लगा. सीप जस्ता से भरे होते हैं, जो टेस्टोस्टेरोन उत्पादन के लिए एक आवश्यक पोषक तत्व हैं. एक रिसर्च में सुझाव दिया गया है कि जस्ता पुरुष बांझपन का इलाज करने और शुक्राणु की गुणवत्ता बढ़ाने में सक्षम हो सकते हैं. जस्ता के अन्य अच्छे स्रोतों में शेलफ़िश, लाल मांस, कद्दू, तिल, काजू-बादाम, दूध, मटर, पन शोधकर्ताओं का कहना है कि डार्क चॉकलेट खाने से इंसान में प्यार करने की एक भावना पैदा हो सकती है क्योंकि इसमें फिनाइल इथेलामाइन (पीईए) रसायन होता है जिसे लव केमिकल भी कहा जाता है. पीईए शरीर में रिलेशनशिप शुरू होने के कुछ महीनों बाद पैदा होता है, जो डोपामाइन जैसे अच्छे हार्मोन को बनाता है और मानव मस्तिष्क में आनंद और ख़ुशी को नियंत्रित करने वाले केंद्र को उत्तेजित करता है. चॉकलेट में बहुत कम मात्रा में पीईए मौजूद होता है और क्या चॉकलेट खाने के बाद भी यह सक्रिय रहता है, इस बात पर भी संदेह है. ये भी कहा जाता है कि कोकोओ रक्त प्रवाह को बढ़ाता है और ख़ुश रखने वाले हार्मोन सेरोटोनिन के स्तर को बढ़ाता है. 16वीं शताब्दी के एक स्पेनिश खोजकर्ता एर्नान कोर्तेस थे जिन्हें चॉकलेट की खोज करने वाला पहला यूरोपीय भी कहा जाता है. उन्होंने माया और एज़टेक साम्राज्य में काफ़ी समय बिताया था. उन्होंने स्पेन के राजा कार्लोस प्रथम को लिखा था कि वह माया पीने वाली कोकोआ चॉकलेट के बारे में जान रहे हैं, जो प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण करती है और थकान से लड़ती है. लेकिन स्पैनिश लोगों ने चॉकलेट के लिए चिकित्सीय लाभों को सही ठहराया होगा जो माया साम्राज्य ने नहीं किया था. लेकिन इसके सबूत नहीं हैं कि यह सेक्स की इच्छा बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता था. ट्रिप्टोफ़ैन तनाव, एंग्ज़ाइटी से लड़ने में मदद करता है और इसके अन्य स्रोतों में सैल्मन मछली, अंडे, पालक, बादाम और सोया के उत्पाद शामिल हैं. अध्ययन से पता चलता है कि मिर्च में कैपसाइसिन होता है, जो शरीर एंडोर्फिन की मात्रा को बढ़ाता है और यह ख़ुश रखने वाला एक और हार्मोन है. यह आपके मेटोबॉलिज़्म, शरीर के तापमान और हृदय गति को बढ़ाता है, जिसका अनुभव हम सेक्स करते समय करते हैं. शराब संकोच को कम करके सिर्फ़ इच्छाओं को बढ़ा सकती है. बहुत अधिक शराब पीने से पुरुषों और महिलाओं दोनों में भावुकता कम हो जाती है. और समय के साथ यह आपकी सेक्स की ताक़त को कम कर सकता है या गंभीर मामलों में नपुंसकता पैदा कर सकता है. शोध में बताया गया है कि कुछ फ्लेवोनॉयड्स (पौधों से बने) से समृद्ध खाद्य पदार्थ खाने से नपुंसकता का ख़तरा कम होता है. अध्ययन में पाया गया कि ब्लूबेरी और अन्य खट्टे फलों में पाए जाने वाला एंथोसायनिन में नपुंसकता को रोकने की क्षमता होती है. फ्लेवोनोइड्स से भरे खाद्य पदार्थों और व्यायाम से नपुंसकता की समस्या को 21% तक कम किया जा सकता है. कुछ शोध बताते हैं कि नपुंसकता को रोकने और यौन क्रिया को बनाए रखने के लिए संतुलित आहार बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. इनमें साबुत अनाज, फल, सब्ज़ियां, फलियां, अखरोट और जैतून का तेल शामिल है. एंथोसायनिन इसमें बड़ी भूमिका निभान सकते हैं और इसके स्रोतों में चेरी, ब्लैकबेरी, क्रैनबेरी, रास्पबेरी, कुछ अंगूर और लाल पत्ता गोभी शामिल हैं . सेक्स की इच्छा बढ़ाने वाली खाद्य सामग्री को एफ़्रोडिज़ियेक्स कहा जाता है जिसका नाम ग्रीक देवी एफ़्रोडाइटी के नाम पर पड़ा है. इन्हें तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: कामेच्छा, सेक्स की ताक़त और यौन सुख. वैज्ञानिक रूप से यह साबित नहीं हुआ है कि यह मनुष्यों पर काम करता है या नहीं. वास्तव में एकमात्र एफ़्रोडिज़ियेक्स खाद्य पदार्थ के काम करने की पुष्टि हुई है जो पके और सड़े हुए फल की गंध है. यौन स्वास्थ्य के विशेषज्ञ डॉ. क्रिकमैन का कहना है कि उन्हें लगता है कि लोग कामोत्तेजक चीजें सिर्फ इसलिए खाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे काम करेंगे. वह सुझाव देते हैं कि अगर आपके लिए कुछ काम करता है, तो उसने काम कैसे किया है यह बात मायने नहीं रखती है? कई कामोत्तेजक खाद्य पदार्थ हैं, लेकिन कई बार पौधे के अर्क और पदार्थों को सेवन करने की सलाह दी जाती है अगर उन्हें इस बात का नहीं पता कि इससे फ़ायदा होगा या नुकसान तो उन्हें प्रयोग नहीं करना चाहिए. यदि आपकी सेक्स की इच्छा या शक्ति कम है, तो संभव है कि आपको कोई मेडिकल समस्या हो इसलिए हमेशा अपने डॉक्टर से परामर्श करें
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पॉकेट में पड़ा मोबाइल फोन बना जासूस स्मार्ट फोन बना खतरा

Date : 30-Jun-2019
30 जून 2019 अधिकांश लोगों के लिए उनका स्मार्ट फ़ोन दुनिया देखने की एक खिड़की जैसा है. लेकिन क्या हो, अगर ये खिड़की आपकी निजी ज़िंदगी में झांकने का ज़रिया बन जाए. क्या आपने कभी इस तथ्य पर मनन किया है कि आपकी जेब में ही आपका जासूसी करने वाला मौजूद है? फ़र्ज़ करिए, अगर हैकर दूर से ही आपके फ़ोन में स्पाईवेयर इंस्टाल कर दें, जिसके सहारे आपकी सारी निजी सूचनाओं तक उनकी पहुंच हो जाए, यहां तक कि कूट भाषा में बंद संदेशों तक और यही नहीं अगर ये स्पाईवेयर आपके फ़ोन के कैमरे और माइक्रोफ़ोन तक को नियंत्रित करने की सुविधा हैकर को दे दे, तो इसका नतीजा क्या होगा? जितना असंभव ये लगता है, उतना है नहीं और हमने कुछ ऐसे साक्ष्यों की जांच पड़ताल की है जिसमें पूरी दुनिया भर में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों के कामों की जासूसी करने के लिए ऐसे सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन सवाल उठता है कि ये कौन कर रहा है और क्यों? और अपने जेब में मौजूद इन ख़ुफ़िया सॉफ़्टवेयर से बचने के लिए क्या किया जा सकता है? हथियार जितना ताक़तवर सॉफ्टवेयर सैन फ़्रैंसिस्को के लुकआउट में माइक मरे एक सिक्युरिटी एक्सपर्ट हैं. ये कंपनी सरकारों, उद्योगों और उपभोक्ताओं को उनके फ़ोन में डेटा सुरक्षित करने को लेकर सलाह देती है. वो बताते हैं कि अभी तक विकसित जासूसी के अत्याधुनिक सॉफ़्टवेयर कैसे काम करते हैं और ये सॉफ़्टवेयर इतने ताक़तवर हैं कि इन्हें एक हथियार के रूप में क्लासीफ़ाइड किया गया है और उन्हें कड़ी शर्तों पर ही बेचा जा सकता है. माइक कहते हैं, ऑपरेटर आपके जीपीएस के सहारे आपको ट्रैक कर सकता है. वो बताते हैं, वे कभी और कहीं भी आपके कैमरे को ऑन कर सकते हैं और आपके चारो ओर जो घटित हो रहा है उसे रिकॉर्ड कर सकते हैं. आपके पास सोशल मीडिया के जितने ऐप हैं उनके अंदर तक पहुंच बना लेते हैं. इसके मार्फ़त वे आपकी सारी तस्वीरें, सारे संपर्क, आपके कैलेंडर की सूचनाएं, आपके इमेल की सूचनाओं और आपके हर दस्तावेज तक उनकी पहुंच है. आपका ही फ़ोन करता है आपकी जासूसी, आख़िर कैसे? ये सॉफ़्टवेयर आपके फ़ोन को लिसनिंग डिवाइस में बदल देते हैं जो आपको ट्रैक करता है और जो कुछ भी इसमें होता है, वो चुरा लेता है. स्पाईवेयर सालों से बनते रहे हैं, लेकिन इन नए स्पाईवेयर से हमारे सामने एक पूरी नई दुनिया का रहस्य खुलता है. यात्रा के दौरान ये सॉफ़्वेयर डेटा नहीं पकड़ता, लेकिन जब ये स्थिर होता है, आपके फ़ोन के सारे फंक्शन पर उसका नियंत्रण हो जाता है और टेक्नोलॉजी इतनी अत्याधुनिक है कि इसे पकड़ पाना लगभग नामुमकिन है. मैक्सिको के ड्रग माफ़िया के पकड़े जाने की कहानी मैक्सिको का ड्रग माफ़िया एल चैपो का साम्राज्य अरबों खरबों का था. जेल से भागने के बाद वो छह महीने तक फरार रहा. इस दौरान उसके विशाल नेटवर्क में सुरक्षा और पनाह मिलती रही. एहतियात के तौर पर वो कूट भाषा वाले फ़ोन ही इस्तेमाल करता था, जिसे हैक करना असंभव माना जाता है. लेकिन ये दावा किया जाता है कि मैक्सिको के अधिकारियों ने एक नया जासूसी सॉफ़्टवेयर ख़रीदा और एल चैपो के क़रीबियों के फ़ोन में उसे इंस्टाल कर दिया, जिसके सहारे वे उसके छिपने की जगह तक पहुंचने में क़ामयाब हो गए. पॉकेट में पड़ा मोबाइल फोन बना जासूस एल चैपो की गिरफ़्तारी दिखाती है कि इस तरह के सॉफ़्टवेयर, चरमपंथियों और संगठित अपराध के ख़िलाफ़ लड़ाई में क़ीमती हथियार साबित हो सकते हैं. सुरक्षा कंपनियों ने कूट भाषा वाले फ़ोन और ऐप में सेंध लगाकर कई हिंसक चरमपंथियों को रोका और बहुतों की जानें बचाईं. ब्रिटिश ब्लॉगर जिसे निशाना बनाया गया रोरी डोनाघी एक ब्लॉगर हैं जिन्होंने मध्यपूर्व के लिए एक अभियान शुरू किया और वेबसाइट बनाई. वो संयुक्त अरब अमीरात में मानवाधिकार उल्लंघन की कहानियां बाहर ला रहे थे. इनमें आप्रवासी कामगारों से लेकर क़ानून के शिकार होने वाले टूरिस्टों तक की कहानियां. उनको पढ़ने वालों की संख्या बहुत नहीं थी, यानी कुछ सौ लोग थे और उनकी कहानियों के शीर्षक भी आज की ख़बरों की तरह चटपटी या सनसनीखेज़ नहीं होती थीं. जब उन्होंने एक नई वेबसाइट मिडिल ईस्ट आई पर काम करना शुरू किया तो उनके साथ कुछ अजीब घटित हुआ. उन्हें अजनबियों की ओर से अजीबोग़रीब मेल आने शुरू हो गए जिनमें लिंक हुआ करते थे. रोरी ने इन संदिग्ध इमेल को यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो में एक रिसर्च ग्रुप सिटिज़ेन लैब को भेजा. ये ग्रुप पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ डिज़िटल जासूसी की घटनाओं की पड़ताल करता है. उन्होंने पाया कि ये लिंक उन्हें अपने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट में डाउनलोड करने के लिए भेजे जा रहे थे. बल्कि भेजने वाले को इस बात की जानकारी देने के लिए भी ये भेजे जा रहे थे कि टार्गेट के पास किस किस्म का एंटीवायरस सुरक्षा है ताकि मालवेयर की पहचान न होने पाए. ये बहुत ही उच्च परिष्कृत तकनीक थी. पता चला कि रोरी को मेल भेजने वाली कंपनी अबू धाबी में संयुक्त अरब अमीरात के लिए काम करती है. ये कंपनी उन लोगों पर नज़र रखती है जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा या उन्हें चरमपंथी माना जाता है. कंपनी ने ब्रिटिश ब्लॉगर का कोड नाम भी रखा था, गिरो, इसके साथ ही वे उनके पूरे परिवार के साथ उनकी भी निगरानी करता था. नागरिक अधिकार कार्यकर्ता की निगरानी पुरस्कारों से सम्मानित नागरिक अधिकार कार्यकर्ता अहमद मंसूर सालों से यूएई सरकार के निशाने पर रहे हैं. साल 2016 में उन्हें संदिग्ध टेक्स्ट मिला, उसे उन्होंने सिटिज़न लैब को भेजा. एक ब्लैंक आईफ़ोन का इस्तेमाल करते हुए रिसर्च टीम ने उस लिंक पर क्लिक किया और जो दिखा वो हैरान करने वाले था. स्मार्टफ़ोन का नियंत्रण किसी और के पास चला गया था और वहां डेटा ट्रांसफ़र होने लगा. आईफ़ोन को सबसे सुरक्षित माना जाता है लेकिन स्पाईवेयर ने इसमें भी सेंध लगा ली थी. फ़ोन हैकिंग में गोपनीयता क़ानून का सहारा इसके बाद से ऐपल को अपने हर ग्राहक को नियमित रूप से अपडेट भेजना शुरू करना पड़ा. ये तो पता नहीं चला कि मंसूर के फ़ोन से क्या सूचनाएं इकट्ठा हुईं, लेकिन बाद में उन्हें गिरफ़्तार किया गया और दस साल के लिए जेल में डाल दिया गया. इस समय वो एकांतवास की सज़ा भुगत रहे हैं. लंदन में स्थित यूएई के दूतावास ने बीबीसी को बताया कि उनके सुरक्षा संस्थान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करते हैं लेकिन ख़ुफ़िया मामलों पर टिप्पणी करने से उसने मना कर दिया. पत्रकार जो शिकार हुए अक्तूबर 2018 में पत्रकार जमाल खशोग्ज़ी इस्तांबुल में सऊदी दूतावास में गए और लौट कर कभी वापस नहीं आए. सऊदी सरकार के एजेंट के हाथों वो मारे गए. खशोग्ज़ी के मित्र उमर अब्दुलअजीज़ ने पाया कि उनका फ़ोन सऊदी सरकार ने हैक कर लिया था. उमर का मानना है कि इस हत्या में इस हैकिंग की बड़ी भूमिका थी. हालांकि सऊदी सरकार ने हैकिंग के पीछे अपना हाथ होने से इनकार किया है. ज़ीरो क्लिक टेक्नोलॉजी मई 2019 में व्हाट्सऐप मैसेंजर की सुरक्षा में एक बहुत बड़ी सेंध लगी थी. ये ऐप फ़ोन के सॉफ़्टवेयर में घुसपैठ का ज़रिया बन गया. एक बार ओपन होते ही हैकर अपना स्पाईवेयर फ़ोन में डाउनलोड कर सकता था. यहां तक कि उपभोक्ता को क्लिक करने की भी ज़रूरत नहीं थी. एक कॉल के बाद फ़ोन में सेंध लग जाती और वो हैंग हो जाता. इसे ज़ीरो क्लिक टेक्नोलॉजी कहते हैं. इसके बाद व्हाट्सऐप ने अपने डेढ़ अरब उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा अपडेट जारी किए. कैसे निपटें इस तरह के स्पाईवेयर बनाने वाले डेवलपर्स के लिए ख़ास एस्पोर्ट लाइसेंस की ज़रूरत होती है, जैसे डिफ़ेंस के अन्य मामलों में होता है. इसका एकमात्र मकसद होता है गंभीर अपराधियों को पकड़ना. लेकिन सिटिज़न लैब ने एक पूरी सूची तैयार की है जिसमें दर्ज है कि किस सरकार ने इसका कब कब ग़लत इस्तेमाल किया. हथियारों की तरह ही सॉफ़्टवेयर बेचने के बाद भी इसके रख रखाव की ज़िम्मेदारी डेवलपर्स की होती है, इसलिए उन्हें भी ज़िम्मेदार ठहराए जाने की संभावना बनती है. डिज़िटल जासूसी के मामले में इसराइली कंपनी एएसओ ग्रुप अग्रणी रही है. अब्दुलअज़ीज़ के वकील अब इस कंपनी को कोर्ट में घसीटने जा रहे हैं क्योंकि उनके फ़ोन की हैकिंग में इस कंपनी का हाथ था. लेकिन तभी से उस वकील के पास रहस्यमयी व्हाट्सऐप कॉल आने लगे. एनएसओ ने टिप्पणी करने से इनकार किया है लेकिन एक बयान जारी कर कहा है कि वो अधिकृत सरकारी एजेंसियों को टेक्नोलॉजी मुहैया कराता है और इससे कई लोगों को जान बचाई गई है. पकड़ में न आने वाला स्पाईवेयर क़ानूनी डिज़िटल जासूसी उद्योग का मक़सद है ऐसा स्पाईवेयर बनाना जो 100 प्रतिशत पकड़ा न जा सके. अगर ये संभव हुआ तो कोई इस बात की भी शिकायत नहीं कर पाएगा कि इसका ग़लत इस्तेमाल हुआ है, क्योंकि किसी को पता ही नहीं चलेगा. हम सभी डेवलपर्स के हाथों की कठपुतली होंगे, चाहे वे क़ानूनी हों या नहीं. हो सकता है कि ये जेम्स बॉंड टाइप लगे, लेकिन वाकई ये हकीक़त में है. ये ख़तरा सच्चाई है और हम सभी को भविष्य के लिए अपने दिमाग में इसे रखना ज़रूरी है.
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