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हममें से बहुत लोग टॉयलेट सीट पर बैठकर ग़ुस्से में इस तरह दांत भींचते हैं और इतना ज़ोर लगाते हैं कि हमारे नसें सूज जाती हैं और दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं.

Date : 04-Oct-2019
 04 अक्टूबर 2019 अगर आप ये लेख टॉयलेट में बैठे-बैठे पढ़ रहे हैं और इस चक्कर में आपको ज़्यादा वक़्त लग रहा है तो टॉयलेटसीट पर सही पोज़िशन में बैठ जाइए. ये विषय पहली बार में हास्यास्पद लग सकता है लेकिन ये कोई छोटी बात नहीं है. एक औसत व्यक्ति अपनी पूरी ज़िंदगी में छह महीने से ज़्यादा का वक़्त टॉयलेट में बिताता है और हर साल तक़रीबन 145 किलो मल त्याग करता है. इसका मतलब ये हुआ कि एक औसत व्यक्ति हर साल अपने शरीर के भार के दोगुना मल त्याग करता है. उम्मीद है अब तक आपको ये समझ आ गया कि ये विषय हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है. आप जानते हैं कि टॉयलेट में बैठने का सही तरीक़ा क्या है. ये बात तो तय है कि हममें से हर कोई टॉयलेट में ठीक से नहीं बैठता. 20वीं सदी के मध्य में यूरोपीय डॉक्टरों की एक टीम अफ़्रीका के ग्रामीण इलाक़ों में काम कर रही थी. डॉक्टर ये देख कर हैरान थे कि वहां के स्थानीय लोगों को पाचन और पेट से जुड़ी तकलीफ़ें न के बराबर थीं. दुनिया के अन्य कई विकासशील देशों में भी ऐसा ही पाया गया. डॉक्टरों ने पता लगाया कि ये सिर्फ़ खाने में अंतर की वजह से नहीं था बल्कि लोगों के टॉयलेट इस्तेमाल करने के तरीक़े और मल त्याग करते समय बैठने की पोज़िशन में अंतर की वजह से भी था. पश्चिमी देशों में लोग जितनी बार टॉयलेट में जाते हैं, औसतन वो वहां 114-130 सेकेंड बिताते हैं. इसके उलट, भारत समेत कई विकासशील देशों में लोग टॉयलेट में उकड़ूं होकर मल त्याग करते हैं और महज़ 51 सेकेंड में निबट लेते हैं. विकासशील देशों के शौचालयों का डिज़ाइन भी ऐसा होता है कि उसे इस्तेमाल करने के लिए आपको उकड़ूं बैठना होता है. विशेषज्ञों का मानना है कि उकड़ूं बैठने वाला तरीक़ा बेहतर है. जब हम टॉयलेट सीट पर बैठते हैं तो हमारी गुदा नलिका 90 अंश के कोण पर होती है इस वजह से हमारी मांसपेशियों में खिंचाव होता है. यही वजह है कि हममें से कई लोग टॉयलेट में बैठने पर तनाव महसूस करते हैं. इस तनाव की वजह से कई लोगों को बवासीर, बेहोशी और यहां तक कि दौरे आने जैसी तकलीफ़ें भी हो जाती हैं. तो फिर हम वेस्टर्न शैली के टॉयलेट क्यों इस्तेमाल करते हैं? ऐसा माना जाता है कि पहला साधारण टॉयलेट सबसे पहले तक़रीबन 6 हज़ार साल पहले मेसोपोटिया में मिला था. सन् 315 तक रोम में 144 सार्वजनिक शौचालय थे और बाथरूम जाना सामाजिक चलन जैसा हो गया था. पहला फ़्लश वाला टॉयलेट साल 1592 में ब्रिटेन के जॉन हैरिंगटन ने बनाया था. उन्होंने इसे द एजैक्स का नाम दिया था. इसके बाद वर्ष 1880 में थॉमस क्रैपर ने यू-बेंड का आविष्कार किया और इस आविष्कार के साथ बहुत कुछ बदल गया. यू-बेंड सीधे टॉयलेट के नीचे से मल निकाल देता था और इससे बदबू नहीं आती थी. इस तरह पाश्चात्य शैली के टॉयलेट यूरोपीय सभ्यता का प्रतीक बन गए लेकिन इससे कुछ चीज़ें मुश्किल भी हो गईं. सेहत पर ख़तरा हममें से बहुत लोग टॉयलेट सीट पर बैठकर ग़ुस्से में इस तरह दांत भींचते हैं और इतना ज़ोर लगाते हैं कि हमारे नसें सूज जाती हैं और दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं. ऐसा क़ब्ज़, बदहज़मी, अपच या पेट की दूसरी दिक्क़तों की वजह से भी हो सकता है. लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीयन शैली के टॉयलेट भी ऐसी समस्याओं के लिए काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं. 1960 के मध्य में कोर्नेल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एलेक्ज़ेंडर किरा ने यूरोपीय शैली के टॉयलेट्स को सबसे बुरी डिज़ाइन में बनाई गई चीज़ कहा. मशहूर अमरीकी कलाकार एल्विस प्रेस्ली के डॉक्टर का कहना था कि जिस दिल के दौरे से उनकी मौत हुई थी, वो उन्हें टॉयलेट में ज़्यादा ज़ोर लगाने के कारण हुई थी । इतनी सारी बड़ी-बड़ी समस्याओं का बहुत आसान सा हल है. अगर आप यूरोपीय शैली के टॉयलेट में बैठते हैं तो बस इतना कीजिए कि अपने घुटनों को 90 डिग्री के बजाय 35 डिग्री कोण पर मोड़ लीजिए. इससे आपके पेट और गुदा पर ज़ोर कम पड़ेगा और चीज़ें आसान हो जाएंगी. इसके लिए आप टॉयलेट में एक छोटा सा पायदान रख सकते हैं और अपने पैर इस पर टिका सकते हैं. अगर आप जल्दी में या कहीं बाहर नहीं हैं तो गोद में मोटी किताबों का एक बंडल या ऐसी ही कोई चीज़ रख सकते हैं. यानी किताबें और पत्रिकाएं टॉयलेट में भी काम आ सकती हैं!
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कल्कि केकलां ने कहा कि वो अपने बच्चे को वॉटर बर्थ के ज़रिए जन्म देंगी.

Date : 02-Oct-2019
मुम्बई 2 अक्टूबर । कल्कि केकलां ने हाल ही में अपने प्रेंग्नेंट होने की खबर साझा की है. उन्होंने कहा कि वो अपने बच्चे को वॉटर बर्थ के ज़रिए जन्म देंगी. लेकिन बहुत कम लोग वॉटर बर्थ डिलीवरी की प्रक्रिया के बारे में जानते हैं. आख़िर वॉटर बर्थ है क्या? ये एक ऐसी ख़ास प्रक्रिया है जिसमें प्रसव पीड़ा के दौरान गर्भवती महिला को पानी से भरे पूल या टब में बैठा दिया जाता है और बच्चे की डिलीवरी पानी के भीतर ही करवाई जाती है. ये मां की इच्छा पर निर्भर करता है कि वो अपने बच्चे को पानी के अंदर जन्म देना चाहती हैं या नहीं.
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क्यों मलेरिया की दवाएं हो रही हैं बेअसर

Date : 27-Jul-2019
दक्षिण पूर्वी एशिया के इलाके में मलेरिया से लड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली ज़रूरी दवाएं बेअसर हो रही हैं. मलेरिया के परजीवी इन दवाओं को लेकर इम्यून हो गए हैं यानी अब इन दवाओं का भी उन पर असर नहीं हो रहा. कंबोडिया से लेकर लाओस, थाईलैंड और वियतनाम में अधिकतर मरीज़ों पर मलेरिया में दी जाने वाली प्राथमिक दवाएं असर नहीं कर रही हैं. खासकर कंबोडिया में इन दवाओं के फेल होने के सबसे ज़्यादा मामले सामने आए हैं. अगर दक्षिण एशियाई देश भारत की बात करें तो साल 2017 में आई वर्ल्ड मलेरिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मलेरिया के मामलों में 24 फ़ीसदी तक कमी आई है. दुनिया के 11 देशों में कुल मलेरिया मरीज़ों के 70 फ़ीसदी केस पाए जाते हैं, और इन देशों में भारत का नाम भी शामिल है. साल 2018 में भारत में मलेरिया बीमारी के मामलों में 24 फ़ीसदी कमी आई है और इसके साथ ही भारत अब मलेरिया के मामले में टॉप तीन देशों में से एक नहीं है. हालांकि अब भी भारत की कुल आबादी के 94 फ़ीसदी लोगों पर मलेरिया का ख़तरा बना हुआ है. भारत ने साल 2027 तक मलेरिया मुक्त होने और साल 2030 तक इस बीमारी को खत्म करने का लक्ष्य रखा है. इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मलेरिया के मामले कमी का लक्ष्य ओडिशा के इस बीमारी से लड़ने में मिली कामयाबी के कारण मुमकिन हो सका है. इससे पहले भारत में कुल मलेरिया मरीज़ों का 40 फ़ीसदी हिस्सा ओडिशा राज्य से आता था. कंबोडिया में मलेरिया के लिए दो दवाओं का इस्तेमाल होता है- आर्टेमिसिनिन और पिपोराक्विन इन दवाओं का कॉम्बिनेशन कंबोडिया में साल 2008 में लाया गया. लेकिन साल 2013 में कंबोडिया के पश्चिमी हिस्से में पहला ऐसा मामला सामने आया जब मलेरिया के परजीवी पर इन दोनों दवाओं का असर खत्म होने लगा. लेंसेंट की हालिया एक रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण पूर्वी एशिया के मरीज़ों के खून के सैंपल लिये गए. जब इन परजीवियों के डीएनए की जांच की गई तो पाया गया कि ये परजीवी दवा प्रतिरोधी हो चुके हैं और ये प्रभाव कंबोडिया से होकर लाओस, थाईलैंड और वियतनाम तक फैल चुका है. इसका म्यूटेशन, समस्या को और भी विकराल बना रहा है. इन देशों के कई इलाकों में 80 फ़ीसदी तक मलेरिया परजीवियों पर दवा बेअसर हो चुकी हैं. क्या अब मलेरिया लाइलाज हो गया है? नहीं, लैंसेंट के ही दूसरे जर्नल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में कहा गया कि इन रोगियों को स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट से ठीक नहीं किया जा रहा है. इलाज वैकल्पिक दवाओं से किया जा सकता है. वियतनाम में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी क्लिनिकल रिसर्च यूनिट के प्रोफ़ेसर ट्रान तिन्ह हिएन कहते हैं, मलेरिया के परजीवियों में प्रतिरोध के प्रसार और गहराते इस संकट ने वैकल्पिक उपचारों को अपनाने की ज़रूरत पर प्रकाश डाला. अब मलेरिया में आर्टेमिसियम के साथ दूसरी दवाओं के इस्तेमाल और तीन दवाओं के कॉम्बिनेशन से इसका इलाज संभव है. समस्या क्या है? दुनिया को मलेरिया से मुक्त करने की दिशा में हो रहे तमाम प्रयासों को इससे झटका लगा है. सबसे बड़ा संकट है कि अगर ये अफ़्रीका में पहुंच गया तो क्या होगा, जहां मलेरिया के मामले सबसे ज़्यादा हैं. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ओलिवियो मियोट्टो के मुताबिक, परजीवियों का ये बढ़ता प्रतिरोध प्रभावी तरीके से बढ़ रहा है और नए क्षेत्रों में जाने और नए जेनेटिक को अपनाने में सक्षम है. अगर ये अफ़्रीका पहुंच गया तो इसके नतीजे भयानक होंगे, क्योंकि मलेरिया अफ़्रीका की सबसे बड़ी समस्या है. लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन और ट्रॉपिकल मेडिसिन के प्रोफ़ेसर कॉलिन सदरलैंड कहते हैं, ये परजीवी एक डरावने जानवर जैसे हैं इसमें कोई संशय नहीं है. हालांकि, मुझे लगता है कि ये परजीवी बहुत फिट नहीं हैं, क्योंकि इनकी संख्या में गिरावट हो रही है. प्रोफ़ेसर कॉलिन मानते हैं कि परजीवियों का दवा प्रतिरोधी होना एक बड़ी समस्या तो है लेकिन इसे वैश्विक संकट तो नहीं कहा जा सकता. इसके परिणाम इतने भयानक नहीं होंगे जैसा हम सोच रहे हैं. हर साल दुनियाभर में मलेरिया के 21.9 करोड़ मामले सामने आते हैं. कपकपी, ठंड लगना और तेज़ बुखार मलेरिया के लक्षण है. अगर मलेरिया का सही इलाज ना हो तो समस्या गंभीर हो सकती है.
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एक सेक्स थेरपिस्ट का अनुभव उन्हीं के शब्दों में, मेरे सबसे ज़्यादा उम्र के क्लाइंट 89 साल के थे

Date : 26-Jul-2019
पीटर सैडिंग्टन सेक्स थेरपिस्ट हैं. उनके और उनके क्लाइंट्स के बीच हुई बातचीत गोपनीय है. उसके बारे में बात करके वो उनका विश्वास नहीं तोड़ेंगे. उनकी बताई गई कहानियां, एक सेक्स थेरेपिस्ट के तौर पर युवाओं के साथ किए गए उनके काम पर आधारित हैं. उनकी आपबीती पीटर के शब्दों में ही पढ़िए- मैं लोगों से उनकी बेहद निजी बातों पर चर्चा करता हूं लेकिन वो मेरे बारे में कुछ नहीं जानते और ये काम इसी तरह होता है. मैं एक सेक्स थेरेपिस्ट हूं इसलिए लोग मेरे पास अपनी यौन संबंधों से जुड़ी समस्याएं लेकर आते हैं. अगर कोई क्लाइंट मुझसे पूछता है क्या आप शादी-शुदा हैं? मैं बता देता हूं कि हां.इस बात को छुपाना बहुत अजीब होगा. इसके अलावा मैं सभी चीज़ों को प्रोफेशनल रखता हूं. मैं लोगों से उनके थेरपिस्ट के तौर पर बात करता हूं. उनके दोस्त की तरह नहीं. ये ज़ाहिर सी बात है कि लोगों को सहज करने के लिए उनसे थोड़ी हल्की-फुल्की बातचीत करनी पड़ती है लेकिन ये सब उनकी परेशानियों का हल ढ़ूढ़ने का बस एक हिस्सा भर है. जिस क्लिनिक में मैं काम करता हूं, वो एक घर के बैठक वाले कमरे की तरह है. वहां सिर्फ़ तीन आरामदायक कुर्सियां हैं, एक मेरे लिए और बाकि दो क्लाइंट्स के लिए. वहां मेरे पास मेरे परिवार की कोई फोटो नहीं है और न ही अन्य निजी सामान. इससे लोगों से दूरी बनाए रखने में मदद मिलती है क्लाइंट अकेले भी मुझसे बात करने आते हैं और जोड़े में भी. कुछ साल पहले 29 साल के रॉब अकेले मेरे पास आए थे क्योंकि वो अपनी नई गर्ल फ्रेंड के साथ अपने यौन संबंधों को लेकर चिंता में थे. उनकी गर्ल फ्रेंड को इन सब का बहुत अनुभव था लेकिन उन्हें नहीं. वो थेरपी में अपनी गर्लफ्रेंड को शामिल नहीं करना चाहते थे क्योंकि वो इसे लेकर शर्मिंदा महसूस कर रहे थे. सेशन के दौरान मैंने रॉब से पूछा कि अगर कैली आपकी जगह होतीं तो क्या आप भी उन्हें अनुभव की कमी की वजह से अलग तरह से देखते? उन्हें मेरी बात समझ आई और उन्होंने कैली से थेरपी में शामिल होने के लिए पूछा. रॉब का आत्मविश्वास वापस आ गया. जिस चीज़ ने रॉब की मदद की वो था दिखावा करने के बजाय अपनी परेशानियों को लेकर पार्टनर से ईमानदार होना. नौजवानों को भी समस्या मेरे क्लाइंट्स 20 साल से लेकर 45 साल की उम्र के होते हैं. लोग सेक्स थेरपी को लेकर इतने डरे हुए नहीं होते हैं जितना कि दूसरों को लगता है. पिछले 15 सालों में मैंने देखा है कि सेक्स थेरपी के लिए आने वालों में कम उम्र के लोगों की संख्या बढ़ी है. साथ ही मैंने उन उम्रदराज लोगों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखी है जिन्होंने नए रिश्तों की शुरुआत की है. यौन समस्याओं के बारे में बात करना अब वर्जित नहीं रहा. मुझे लगता है कि पोर्न के प्रभाव और सेक्स को लेकर बदलती अपेक्षाओं के कारण लोग इस तरह की परेशानियों का सामना करते हैं और युवावस्था में समस्याएं लेकर आते हैं. जिस संस्थान के लिए मैं काम करता हूं उसके अनुसार 2018 में थेरपी के लिए आने वाले लोगों में 42 प्रतिशत 35 साल से कम उम्र के थे. इसके अलावा मेरे सबसे ज़्यादा उम्र के क्लाइंट 89 साल के थे. वो एक नए रिश्ते में आए थे. उन्हें और उनकी पार्टनर को यौन संबंधी में कुछ दिक्कतें आ रही थीं. वो पहले किसी डॉक्टर के पास गए थे लेकिन वो ये देख कर हैरान हो गया कि इस उम्र में ये लोग यौन संबंध बना रहे हैं. इसके चलते उन्हें कोई मदद नहीं मिली और फिर वो मेरे पास आ गए. सेक्स थेरेपी के लिए मेरे पास आने वाले ज़्यादतर लोग पहले किसी डॉक्टर के पास जा चुके होते हैं. अक्सर लोगों को अपनी समस्याओं पर बात करने के लिए बस किसी की ज़रूरत होती है. कई लोग घबराए होते हैं. कई जोड़ों को लगता है कि उन्हें अपनी यौन समस्याएं मेरे सामने दिखानी पड़ेंगी. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होता है. मेरा सबसे कम उम्र के क्लाइंट 17 साल के थे, जिन्हें संबंध बनाने में कुछ समस्या हो रही थी. इसकी वजह से उनका ब्रेक-अप हो गया था. उन्होंने काफ़ी कोशिश की लेकिन परेशानी दूर नहीं हुई. उनकी क्लास में एक लड़की थी जो उन्हें पंसद करती थी लेकिन पहले जो हुआ उसके कारण वो थोड़ा डरे हुए थे. वो पहले इस बारे में सलाह लेने एक डॉक्टर के पास गए थे. डॉक्टर ने कहा था कि उनकी उम्र अभी कम है इसी वजह से ऐसा हो रहा है और आने वाले समय में ये परेशानी दूर हो जाएगी. लेकिन फिर वो मेरे पास आए. जब वो मेरे पास आए थे तो बहुत घबराए हुए थे. सेशन के दौरान उनका चेरहा लाल ही रहा. हर सेशन अलग होता है. ऐसे मामलों में हम ज़्यादातर जो करते हैं, वो है सेक्स एजुकेशन देना. चित्रों की मदद से समस्या को समझाने की कोशिश करना. मैंने उनकी मदद की. उनकी घबराहट ही उनकी समस्या का कारण बन रही थी. मैंने उन्हें घर पर तीन बार इरेक्शन की सलाह दी ताकि उन्हें ये भरोसा हो सके कि वो इसे दोबारा कर सकता है. धीरे-धीरे उनमें आत्मविश्वास आने लगा और उसकी समस्या को दूर करने में सिर्फ़ सात सेशन लगे. थेरपी ख़त्म होने के क़रीब एक महीने बाद उन्होंने सेंटर में फ़ोन करके मेरे लिए एक संदेश भी छोड़ा था कि वो अपनी क्लास की लड़की के साथ बाहर जा रहा है और उन्हें लगता है कि अब उनकी समस्या दूर हो गई है. थेरपिस्ट बनने से पहले मैंने विशेष शैक्षणिक आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए बने एक आवासीय विद्यालय में काम किया था. मैंने देखा है कि बच्चे के लिए सही स्कूल ढूंढने और उसके भविष्य की चिंता के चलते कुछ लोगों के संबंधों में कितना दबाव आ जाता है. काश! मैं उनके लिए कुछ कर पाता. मेरी नौकरी के अलावा मैंने दो साल की कपल्स काउंसलिंग की ट्रेनिंग भी ली. लोगों की काउंसलिंग के दौरान कई बार मुझे ये पता चलता था कि उनकी समस्या सेक्शुअल के साथ-साथ भावनात्मक है. इसलिए, मैं सेक्स थेरपी भी देता था ताकि हर स्तर पर उनकी मदद कर सकूं. एक समलैंगिक जोड़ा थेरपिस्ट के तौर पर शुरुआत करने पर मेरे पास एक ऐसा कपल भी आया था जिनका भावानात्मक रिश्ता बहुत मज़बूत था लेकिन उन्हें सेक्स लाइफ में मदद की ज़रूरत थी. मेरे क्लाइंट मैट और एलेक्स उस वक़्त क्रमश: 20वें और 30वें साल में थे. पहले सेशन में दोनों बहुत ही झिझक महसूस कर रहे थे. वो बार-बार अपनी ही कुर्सी पर जगह बदलते और मेरे सवालों के जवाब देने से बचते. वो समलैंगिक थे और उन्हें ये संकोच भी था कि मैं इस बात को स्वीकार करूंगा या नहीं. उनकी समस्या इरेक्शन संबंध पुरुष मेरे पास जिन कारणों से आते हैं उनमें इरेक्शन से जुड़ी और शीघ्रपतन की समस्या सबसे आम है. मैंने मैट और एलेक्स को एक टचिंग एक्सरसाइज की सलाह दी. मेरा मकसद उनमें उत्तजेना पैदा करना था. उन्होंने धीरे-धीरे समझा कि कैसे एक-दूसरे को समझा जा सकता है. उन दोनों ने इसमें बहुत मेहनत की और आख़िरकार मैट का आत्मविश्वास बढ़ गया. उन्होंने बाद में शादी कर ली. दोस्त या डॉक्टर बनने की मुश्किल मेरे दोस्तों को मेरा काम दिलचस्प लगता है. ख़ुद को सेक्स थेरेपिस्ट बताने पर लोगों को आपकी बातों में एक उत्सुकता जाग जाती है. कुछ दोस्त मुझसे यौन संबंधो पर बात करने में थोड़ा असहज महसूस करते हैं लेकिन कुछ बहुत आराम से अपनी सेक्स संबंधी समस्याओं के बारे में बताते हैं. कुछ दोस्तों ने ये भी पूछा है कि क्या उनका मुझसे एक पेशेवर की तरह भी संबंध हो सकता है क्योंकि उनके लिए अपने दोस्त से समस्याओं पर बात करना ज़्यादा आसान होगा. लेकिन, मैंने उन्हें मना कर दिया. मैं अपना काम घर पर लेकर नहीं आता और आप अपने दोस्तों व परिवार के सदस्यों के साथ डॉक्टर का संबंध नहीं बना सकते. कई बारी सेक्शुअल समस्याएं अतीत की किसी बुरी याद से भी जुड़ी होती हैं जैसे यौन उत्पीड़न या यौन शोषण. मेरी एक महिला क्लाइंट मेरी वैजिनिज़्मस से परेशान थीं. उन्होंने घर में ये सुना था कि उनके भाई के जन्म के समय उनकी मां लगभग मरने की स्थिति में पहुंच गई थीं. दूसरे सेशन में मैंने उनसे उनके परिवार, बचपन और पुराने सेक्शुअल अनुभवों के बारे में बात की. तब मेरी ने बचपन में अपनी मां को लेकर सुनी बात के बारे में बताया. मेरी की समस्या को दूर करने के लिए हमने कई कॉग्निटिव बिहेव्यरल थेरेपी दी और उनके डर को ख़त्म करने की कोशिश की. मैंने उन्हें पेल्विक फ्लोर मसल्स को ढीला छोड़ना सिखाया. अगर मुझे शुरू में ही समस्या को पहचान कर अलग-अलग करना नहीं आता तो मैं इस काम को नहीं कर पाता. मैं कई मुश्किल और परेशान करने वाली कहानियां सुनता हूं. लेकिन, मुझे इन सबसे प्रभावित होने से बचना होता है. क्लाइंट के लिए दुख या खेद महसूस करना कोई मदद नहीं करता. लेकिन, दुख भरे पलों के साथ ख़ुशी के भी पल आते हैं. कभी-कभी मुझे थेरेपी के बाद कपल्स के धन्यवाद संदेश और कार्ड भी मिलते हैं. एक कपल ने 12 साल बाद मुझे संदेश भेजा कि उनकी ज़िंदगी कैसी चल रही है. उन्होंने अपने एक बच्चे का नाम मेरे नाम पर भी रखा है जो एक सम्मान की बात है. आप इस काम में बहुत ज़्यादा पैसा भले ही न कमाते हों लेकिन इसे करने का एक और कारण है. लोगों को आपकी सलाह मानते हुए और उनकी ज़िंदगी बदलते हुए देखना एक असाधारण अहसास है.
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एक समय एक काम करना चाहिये

Date : 22-Jul-2019
स्मार्ट फ़ोन और कंप्यूटर स्क्रीन पर लगातार आने वाले संदेश हमें व्यस्त रखते हैं. हो सकता है कि वे हमारा भला करने से ज़्यादा नुक़सान कर रहे हों. हमें लगता है कि हमें जवाब ज़रूर देना चाहिए, क्योंकि यह काम से जुड़ी चीज़ है, लेकिन लगातार जुड़े रहने का मतलब है कि हमें गहराई से सोचने का मौक़ा नहीं मिल पाता. यही उन कंपनियों के लिए समस्या है जो अपने कर्मचारियों से ज़्यादा से ज़्यादा हासिल करना चाहती हैं. एक व्यक्ति हमारे काम करने के तरीक़े को बदलना चाहते हैं. उनके मुताबिक़ दफ़्तरों में होने वाली अगली बड़ी क्रांति के लिए इसे दुरुस्त करने की ज़रूरत होगी. उनका मानना है कि कोई व्यक्ति किसी कंपनी के लिए कितना मूल्यवान है, यह उसके कौशल से नहीं बल्कि उसके ध्यान केंद्रित करने की क्षमता से आंका जाएगा. सवाल यह भी है कि हम ध्यान भटकाने वाली चीज़ों को रोकने के लिए समय कैसे निकालें और कैसे अपना बेहतरीन काम करें? कैल न्यूपोर्ट जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर हैं और उन्होंने डीप वर्क एंड डिजिटल मिनिमलिज्म सहित कई बेस्टसेलर किताबें लिखी हैं. उनका कहना है कि हमारे दफ़्तर सुविधाओं के लिहाज़ से बने हैं, हमारे दिमाग़ से बेहतरीन काम लेने के लिए नहीं. नॉलेज सेक्टर की नौकरियों में, जहां उत्पाद मशीनों की जगह मानवीय मेधा से तैयार किए जाते हैं, वहां हमें हमेशा (नेटवर्क से) जुड़े रहने की ज़रूरत होती है और एक साथ कई काम निपटाने के लिए तैयार रहना होता है. ये दोनों चीज़ें गहरी, रचनात्मक और पैनी सोच के अनुकूल नहीं है. न्यूपोर्ट कहते हैं, ज्ञान के काम में मुख्य संसाधन हमारा दिमाग़ और नई सूचनाएं पैदा करने की इसकी क्षमता है, लेकिन हम इसका लाभ नहीं उठा पाते. कुछ लोग एक साथ कई काम करने की क़समें खाते हैं, जबकि हम जानते हैं कि हमारे दिमाग़ को एक बार में एक से ज़्यादा चीज़ों पर ध्यान केंद्रित में कठिनाई होती है. मनोवैज्ञानिकों ने पहले सोचा था एक साथ कई काम करने वाले लोगों का अपने ध्यान पर असामान्य नियंत्रण होता है. लेकिन सबूत बताते हैं कि उनके पास (ईश्वर का दिया) ऐसा कोई उपहार नहीं होता. हक़ीक़त में, दिमाग़ लगाने वाले कई कामों में मल्टीटास्कर पिछड़ जाते हैं. इंसानी दिमाग़ की क्षमता सीमित है. किसी निश्चित समय में वे उतना ही काम कर सकते हैं. काम के दौरान उसमें कई चीज़ों को ठूंसकर भर देने से फ़ायदे की जगह नुक़सान होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है. न्यूपोर्ट का कहना है कि हर समय (नेटवर्क से) जुड़े रहना और तुरंत प्रतिक्रिया देने की उम्मीद करना हमारी ज़िंदगी को दयनीय बना देती है. यह हमारे दिमाग़ के सामाजिक सर्किट से मेल नहीं खाता. हमें अच्छा नहीं लगता कि कोई हमारे जवाब के इंतज़ार में बैठा है. यह हमें बेचैन करता है. ईमेल, स्लैक या दूसरे मैसेजिंग ऐप्स पर तुरंत उत्तर देना बहुत आसान है. ऐसा नहीं करने पर हम दोषी महसूस करते हैं और हमसे उम्मीद रहती है कि हम ऐसा करेंगे. न्यूपोर्ट का कहना है कि यह हमारे दिमाग़ को भरता रहता है. नॉलेज सेक्टर के कर्मचारी ईमेल आने से पहले की तुलना में अब ज़्यादा चीज़ों के लिए ज़िम्मेदार हैं. यह हमें उतावला बनाता है. हमें सोचना चाहिए कि बेमतलब की चीज़ों को दिमाग़ से कैसे निकालें और काम को कैसे कम करें. काम के लिए हमेशा जुड़े रहने से क्या हो सकता है? निस्संदेह, बर्नआउट. मैसेजिंग ऐप्स पर या मीटिंगों में होने वाली दिशाहीन बातचीत हमारे दिमाग़ में भीड़भाड़ बढ़ाती रहती है. लोगों को भटकाव के बिना बेहतरीन काम करने के मौक़े देना न्यूपोर्ट की अगली किताब- दि वर्ल्ड विदाउट ईमेल का मुख्य विषय है. उनका विचार श्रमिकों को कम लेकिन बेहतर काम करने की अनुमति देता है. गैरज़रूरी चटर-पटर को कम करना महत्वपूर्ण है लेकिन तभी जब संगठन की संस्कृति धीमे संचार की अनुमति देती हो. न्यूपोर्ट कहते हैं, मैनेजरों के समय का 85% हिस्सा बैठकों में, फोन पर या लोगों से काम के बारे में बातें करते हुए निकल जाता है. यह लचीला है और इसका अनुकूलन आसान है, लेकिन इंसानी दिमाग़ जिस तरह काम करता है, उससे इसका टकराव होता है. विषय परिवर्तन आपको थका देते हैं. लोग नो-ईमेल फ्राइडे जैसे तरीक़े आज़माते हैं. लेकिन यह कारगर नहीं होता क्योंकि एक-दूसरे को ईमेल किए बिना काम करने का कोई विकल्प तैयार नहीं होता. ईमेल या स्लैक का कम इस्तेमाल तभी कारगर होगा जब कोई विकल्प तैयार हो. न्यूपोर्ट का सुझाव है (जैसा कुछ अन्य लोग करते हैं) कि आमने-सामने का संचार ज़्यादा प्रभावी है. लेकिन महत्वपूर्ण चीज़ है एक ऐसी संस्कृति को प्रोत्साहित करना जहां स्पष्ट संचार ही मानदंड हो. न्यूपोर्ट का कहना है कि लोगों को दूसरे काम में दिमाग़ लगाने से पहले एक काम को पूरी तरह बंद करने की ज़रूरत होती है. जब हम लगातार ईमेल देख रहे होते हैं या जब हमें पहले के काम के बारे में बार-बार याद दिलाया जा रहा हो तो ऐसा करना मुश्किल होता है. हमारे ध्यान का कुछ हिस्सा पहले काम पर अटक जाता है- इस प्रभाव को ध्यान अवशेष कहा जाता है. हम जितने व्यस्त होते हैं, उतने ही काम बदलते हैं. इसलिए व्यस्त महसूस करना गहरी एकाग्रता में सहायक नहीं है. ध्यान भटकने के बाद दोबारा ध्यान केंद्रित करने में कितना समय लगता है, यह अलग-अलग हो सकता है. एक अध्ययन में पाया गया कि रुकावट के बाद दोबारा गहन ध्यान केंद्रित करने में औसत रूप से 23 मिनट 15 सेकेंड लगते हैं. इसका दूसरा पहलू यह है कि किसी बातचीत में सभी का शामिल होना बहुत सुविधाजनक है. लेकिन बिज़नेस का लक्ष्य कभी भी सुविधा नहीं होता. लक्ष्य होता है मूल्य. असेंबली लाइन ने कार के उत्पादन में क्रांति ला दी, लेकिन यह सुविधाजनक व्यवस्था नहीं है. यह व्यवस्था अधिक गाड़ियों के जल्दी उत्पादन के लिए बनाई गई है न्यूपोर्ट के मुताबिक़ सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में सबसे अधिक ध्यान केंद्रित करके काम होता है. वहां भी लक्ष्य एक उत्पाद का उत्पादन करना है. वह कहते हैं, इन सेक्टरों में कुछ समय के लिए चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था तैयार की जाती है. वे किसी एक चीज़ पर ही तीन दिनों के लिए काम करते हैं और उस दौरान उनका पूरा ध्यान उस एक उत्पाद पर होता है. सॉफ्टवेयर इंजीनियर कभी भी तदर्थ व्यवस्था के तहत काम नहीं करते. कारख़ानों में भी यह उपयोगी है क्योंकि सबसे ज़्यादा समय किसी उत्पाद को सबसे बेहतर ढंग से तैयार करने का तरीक़ा ढूंढ़ने में ही लगता है. ऐतिहासिक रूप से कुशल कारीगर शुरू से लेकर आख़िर तक उत्पादों का निर्माण करते थे. यह सुविधाजनक था, लेकिन तेज़ नहीं था. प्रोडक्शन लाइन की शुरुआत 20वीं सदी में जाकर हुई. इसमें श्रमिकों को सिर्फ़ उस एक काम पर ध्यान केंद्रित करना होता है, जिसमें वह निपुण होता है. दूसरा श्रमिक वह काम करता है जिसमें वह दक्ष होता है. ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं है कि नॉलेज सेक्टर में काम करने वालों के लिए फ़िलहाल हमारे पास काम का सबसे अच्छा तरीक़ा है. जैसा कि न्यूपोर्ट कहते हैं कि कुछ क्षेत्र प्रोडक्शन लाइन मॉडल के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं, जैसे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग. लेकिन आप जो कुछ भी बनाना चाहते हैं, चाहे ग्राहक के लिए एक पिच हो या नये उत्पाद का विचार, वह तेज़ रफ़्तार से बन सकता है. किसी परियोजना की शुरुआत से लेकर आख़िर तक सिर्फ़ सबसे दक्ष लोगों को जुटाकर, उन्हें भटकाव से बचाकर और स्पष्ट लक्ष्य के साथ काम कराने से प्रक्रिया कुशल बनी रहेगी. न्यूपोर्ट कहते हैं, नॉलेज सेक्टर में हम शुरुआती चरण में हैं. हम अभी तक औद्योगिक क्रांति तक नहीं पहुंचे हैं. नॉलेज सेक्टर में प्राथमिक पूंजी निवेश इंसानी दिमाग़ है, फैक्ट्री की मशीनें नहीं. न्यूपोर्ट का कहना है कि उन्हें अभी तक ऐसी किसी बड़ी कंपनी के बारे में नहीं मालूम जो उनके तरीक़े से काम करती हो, लेकिन यह स्थिति जल्द ही बदल जाएगी. इस बीच, जो कंपनियां अपने कर्मचारियों को एक साथ कई कामों के लिए प्रोत्साहित करती हैं, वे पीछे छूट जाएंगी. और जो कंपनियां धीमी, मगर गहरी और गुणवत्ता से भरी सोच का मूल्य समझती हैं वे आगे निकल जाएंगी.
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सबूत मिल जाएं कि कोई खाना आपकी कामेच्छा, मर्दाना ताक़त या यौन सुख को बढ़ा सकता है तो शायद इसे हाथों-हाथ ख़रीद लिया जाएगा.

Date : 19-Jul-2019
अगर इस बात के सबूत मिल जाएं कि कोई खाना आपकी कामेच्छा, मर्दाना ताक़त या यौन सुख को बढ़ा सकता है तो शायद इसे हाथों-हाथ ख़रीद लिया जाएगा. एक संतुलित आहार, सक्रिय जीवनशैली और अच्छा मानसिक स्वास्थ्य आपकी सेक्स लाइफ़ को बढ़ा सकता है, लेकिन क्या कोई ख़ास खाने की चीज़ें हैं जिससे वास्तव में प्राकृतिक सेक्स लाइफ़ को बढ़ाया जा सकता है? आइए इस थ्योरी के पीछे के इतिहास और विज्ञान को देखें कि क्या कोई खाद्य पदार्थ वास्तव में आपकी सेक्स लाइफ़ को बेहतर बना सकता है. कैसेनोवा को इतिहास में सबसे प्रसिद्ध प्रेमी माना जाता है. कहा जाता है कि वह नाश्ते में 50 सीपी खाता था. हालांकि, इसका कोई साक्ष्य नहीं है कि सीपी खाने से कामशक्ति बढ़ती है या नहीं. तो आख़िर यह अफ़वाह कहां से आई? ऐसा माना जाता है कि जब प्यार की ग्रीक देवी, एफ़्रोडाइट, पैदा हुईं तो वह समुद्र से उठी और इसलिए समुद्री भोजन को सेक्स लाइफ़ बढ़ाने वाले भोजने के तौर पर माना जाने लगा. सीप जस्ता से भरे होते हैं, जो टेस्टोस्टेरोन उत्पादन के लिए एक आवश्यक पोषक तत्व हैं. एक रिसर्च में सुझाव दिया गया है कि जस्ता पुरुष बांझपन का इलाज करने और शुक्राणु की गुणवत्ता बढ़ाने में सक्षम हो सकते हैं. जस्ता के अन्य अच्छे स्रोतों में शेलफ़िश, लाल मांस, कद्दू, तिल, काजू-बादाम, दूध, मटर, पन शोधकर्ताओं का कहना है कि डार्क चॉकलेट खाने से इंसान में प्यार करने की एक भावना पैदा हो सकती है क्योंकि इसमें फिनाइल इथेलामाइन (पीईए) रसायन होता है जिसे लव केमिकल भी कहा जाता है. पीईए शरीर में रिलेशनशिप शुरू होने के कुछ महीनों बाद पैदा होता है, जो डोपामाइन जैसे अच्छे हार्मोन को बनाता है और मानव मस्तिष्क में आनंद और ख़ुशी को नियंत्रित करने वाले केंद्र को उत्तेजित करता है. चॉकलेट में बहुत कम मात्रा में पीईए मौजूद होता है और क्या चॉकलेट खाने के बाद भी यह सक्रिय रहता है, इस बात पर भी संदेह है. ये भी कहा जाता है कि कोकोओ रक्त प्रवाह को बढ़ाता है और ख़ुश रखने वाले हार्मोन सेरोटोनिन के स्तर को बढ़ाता है. 16वीं शताब्दी के एक स्पेनिश खोजकर्ता एर्नान कोर्तेस थे जिन्हें चॉकलेट की खोज करने वाला पहला यूरोपीय भी कहा जाता है. उन्होंने माया और एज़टेक साम्राज्य में काफ़ी समय बिताया था. उन्होंने स्पेन के राजा कार्लोस प्रथम को लिखा था कि वह माया पीने वाली कोकोआ चॉकलेट के बारे में जान रहे हैं, जो प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण करती है और थकान से लड़ती है. लेकिन स्पैनिश लोगों ने चॉकलेट के लिए चिकित्सीय लाभों को सही ठहराया होगा जो माया साम्राज्य ने नहीं किया था. लेकिन इसके सबूत नहीं हैं कि यह सेक्स की इच्छा बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता था. ट्रिप्टोफ़ैन तनाव, एंग्ज़ाइटी से लड़ने में मदद करता है और इसके अन्य स्रोतों में सैल्मन मछली, अंडे, पालक, बादाम और सोया के उत्पाद शामिल हैं. अध्ययन से पता चलता है कि मिर्च में कैपसाइसिन होता है, जो शरीर एंडोर्फिन की मात्रा को बढ़ाता है और यह ख़ुश रखने वाला एक और हार्मोन है. यह आपके मेटोबॉलिज़्म, शरीर के तापमान और हृदय गति को बढ़ाता है, जिसका अनुभव हम सेक्स करते समय करते हैं. शराब संकोच को कम करके सिर्फ़ इच्छाओं को बढ़ा सकती है. बहुत अधिक शराब पीने से पुरुषों और महिलाओं दोनों में भावुकता कम हो जाती है. और समय के साथ यह आपकी सेक्स की ताक़त को कम कर सकता है या गंभीर मामलों में नपुंसकता पैदा कर सकता है. शोध में बताया गया है कि कुछ फ्लेवोनॉयड्स (पौधों से बने) से समृद्ध खाद्य पदार्थ खाने से नपुंसकता का ख़तरा कम होता है. अध्ययन में पाया गया कि ब्लूबेरी और अन्य खट्टे फलों में पाए जाने वाला एंथोसायनिन में नपुंसकता को रोकने की क्षमता होती है. फ्लेवोनोइड्स से भरे खाद्य पदार्थों और व्यायाम से नपुंसकता की समस्या को 21% तक कम किया जा सकता है. कुछ शोध बताते हैं कि नपुंसकता को रोकने और यौन क्रिया को बनाए रखने के लिए संतुलित आहार बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. इनमें साबुत अनाज, फल, सब्ज़ियां, फलियां, अखरोट और जैतून का तेल शामिल है. एंथोसायनिन इसमें बड़ी भूमिका निभान सकते हैं और इसके स्रोतों में चेरी, ब्लैकबेरी, क्रैनबेरी, रास्पबेरी, कुछ अंगूर और लाल पत्ता गोभी शामिल हैं . सेक्स की इच्छा बढ़ाने वाली खाद्य सामग्री को एफ़्रोडिज़ियेक्स कहा जाता है जिसका नाम ग्रीक देवी एफ़्रोडाइटी के नाम पर पड़ा है. इन्हें तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: कामेच्छा, सेक्स की ताक़त और यौन सुख. वैज्ञानिक रूप से यह साबित नहीं हुआ है कि यह मनुष्यों पर काम करता है या नहीं. वास्तव में एकमात्र एफ़्रोडिज़ियेक्स खाद्य पदार्थ के काम करने की पुष्टि हुई है जो पके और सड़े हुए फल की गंध है. यौन स्वास्थ्य के विशेषज्ञ डॉ. क्रिकमैन का कहना है कि उन्हें लगता है कि लोग कामोत्तेजक चीजें सिर्फ इसलिए खाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे काम करेंगे. वह सुझाव देते हैं कि अगर आपके लिए कुछ काम करता है, तो उसने काम कैसे किया है यह बात मायने नहीं रखती है? कई कामोत्तेजक खाद्य पदार्थ हैं, लेकिन कई बार पौधे के अर्क और पदार्थों को सेवन करने की सलाह दी जाती है अगर उन्हें इस बात का नहीं पता कि इससे फ़ायदा होगा या नुकसान तो उन्हें प्रयोग नहीं करना चाहिए. यदि आपकी सेक्स की इच्छा या शक्ति कम है, तो संभव है कि आपको कोई मेडिकल समस्या हो इसलिए हमेशा अपने डॉक्टर से परामर्श करें
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पॉकेट में पड़ा मोबाइल फोन बना जासूस स्मार्ट फोन बना खतरा

Date : 30-Jun-2019
30 जून 2019 अधिकांश लोगों के लिए उनका स्मार्ट फ़ोन दुनिया देखने की एक खिड़की जैसा है. लेकिन क्या हो, अगर ये खिड़की आपकी निजी ज़िंदगी में झांकने का ज़रिया बन जाए. क्या आपने कभी इस तथ्य पर मनन किया है कि आपकी जेब में ही आपका जासूसी करने वाला मौजूद है? फ़र्ज़ करिए, अगर हैकर दूर से ही आपके फ़ोन में स्पाईवेयर इंस्टाल कर दें, जिसके सहारे आपकी सारी निजी सूचनाओं तक उनकी पहुंच हो जाए, यहां तक कि कूट भाषा में बंद संदेशों तक और यही नहीं अगर ये स्पाईवेयर आपके फ़ोन के कैमरे और माइक्रोफ़ोन तक को नियंत्रित करने की सुविधा हैकर को दे दे, तो इसका नतीजा क्या होगा? जितना असंभव ये लगता है, उतना है नहीं और हमने कुछ ऐसे साक्ष्यों की जांच पड़ताल की है जिसमें पूरी दुनिया भर में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों के कामों की जासूसी करने के लिए ऐसे सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन सवाल उठता है कि ये कौन कर रहा है और क्यों? और अपने जेब में मौजूद इन ख़ुफ़िया सॉफ़्टवेयर से बचने के लिए क्या किया जा सकता है? हथियार जितना ताक़तवर सॉफ्टवेयर सैन फ़्रैंसिस्को के लुकआउट में माइक मरे एक सिक्युरिटी एक्सपर्ट हैं. ये कंपनी सरकारों, उद्योगों और उपभोक्ताओं को उनके फ़ोन में डेटा सुरक्षित करने को लेकर सलाह देती है. वो बताते हैं कि अभी तक विकसित जासूसी के अत्याधुनिक सॉफ़्टवेयर कैसे काम करते हैं और ये सॉफ़्टवेयर इतने ताक़तवर हैं कि इन्हें एक हथियार के रूप में क्लासीफ़ाइड किया गया है और उन्हें कड़ी शर्तों पर ही बेचा जा सकता है. माइक कहते हैं, ऑपरेटर आपके जीपीएस के सहारे आपको ट्रैक कर सकता है. वो बताते हैं, वे कभी और कहीं भी आपके कैमरे को ऑन कर सकते हैं और आपके चारो ओर जो घटित हो रहा है उसे रिकॉर्ड कर सकते हैं. आपके पास सोशल मीडिया के जितने ऐप हैं उनके अंदर तक पहुंच बना लेते हैं. इसके मार्फ़त वे आपकी सारी तस्वीरें, सारे संपर्क, आपके कैलेंडर की सूचनाएं, आपके इमेल की सूचनाओं और आपके हर दस्तावेज तक उनकी पहुंच है. आपका ही फ़ोन करता है आपकी जासूसी, आख़िर कैसे? ये सॉफ़्टवेयर आपके फ़ोन को लिसनिंग डिवाइस में बदल देते हैं जो आपको ट्रैक करता है और जो कुछ भी इसमें होता है, वो चुरा लेता है. स्पाईवेयर सालों से बनते रहे हैं, लेकिन इन नए स्पाईवेयर से हमारे सामने एक पूरी नई दुनिया का रहस्य खुलता है. यात्रा के दौरान ये सॉफ़्वेयर डेटा नहीं पकड़ता, लेकिन जब ये स्थिर होता है, आपके फ़ोन के सारे फंक्शन पर उसका नियंत्रण हो जाता है और टेक्नोलॉजी इतनी अत्याधुनिक है कि इसे पकड़ पाना लगभग नामुमकिन है. मैक्सिको के ड्रग माफ़िया के पकड़े जाने की कहानी मैक्सिको का ड्रग माफ़िया एल चैपो का साम्राज्य अरबों खरबों का था. जेल से भागने के बाद वो छह महीने तक फरार रहा. इस दौरान उसके विशाल नेटवर्क में सुरक्षा और पनाह मिलती रही. एहतियात के तौर पर वो कूट भाषा वाले फ़ोन ही इस्तेमाल करता था, जिसे हैक करना असंभव माना जाता है. लेकिन ये दावा किया जाता है कि मैक्सिको के अधिकारियों ने एक नया जासूसी सॉफ़्टवेयर ख़रीदा और एल चैपो के क़रीबियों के फ़ोन में उसे इंस्टाल कर दिया, जिसके सहारे वे उसके छिपने की जगह तक पहुंचने में क़ामयाब हो गए. पॉकेट में पड़ा मोबाइल फोन बना जासूस एल चैपो की गिरफ़्तारी दिखाती है कि इस तरह के सॉफ़्टवेयर, चरमपंथियों और संगठित अपराध के ख़िलाफ़ लड़ाई में क़ीमती हथियार साबित हो सकते हैं. सुरक्षा कंपनियों ने कूट भाषा वाले फ़ोन और ऐप में सेंध लगाकर कई हिंसक चरमपंथियों को रोका और बहुतों की जानें बचाईं. ब्रिटिश ब्लॉगर जिसे निशाना बनाया गया रोरी डोनाघी एक ब्लॉगर हैं जिन्होंने मध्यपूर्व के लिए एक अभियान शुरू किया और वेबसाइट बनाई. वो संयुक्त अरब अमीरात में मानवाधिकार उल्लंघन की कहानियां बाहर ला रहे थे. इनमें आप्रवासी कामगारों से लेकर क़ानून के शिकार होने वाले टूरिस्टों तक की कहानियां. उनको पढ़ने वालों की संख्या बहुत नहीं थी, यानी कुछ सौ लोग थे और उनकी कहानियों के शीर्षक भी आज की ख़बरों की तरह चटपटी या सनसनीखेज़ नहीं होती थीं. जब उन्होंने एक नई वेबसाइट मिडिल ईस्ट आई पर काम करना शुरू किया तो उनके साथ कुछ अजीब घटित हुआ. उन्हें अजनबियों की ओर से अजीबोग़रीब मेल आने शुरू हो गए जिनमें लिंक हुआ करते थे. रोरी ने इन संदिग्ध इमेल को यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो में एक रिसर्च ग्रुप सिटिज़ेन लैब को भेजा. ये ग्रुप पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ डिज़िटल जासूसी की घटनाओं की पड़ताल करता है. उन्होंने पाया कि ये लिंक उन्हें अपने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट में डाउनलोड करने के लिए भेजे जा रहे थे. बल्कि भेजने वाले को इस बात की जानकारी देने के लिए भी ये भेजे जा रहे थे कि टार्गेट के पास किस किस्म का एंटीवायरस सुरक्षा है ताकि मालवेयर की पहचान न होने पाए. ये बहुत ही उच्च परिष्कृत तकनीक थी. पता चला कि रोरी को मेल भेजने वाली कंपनी अबू धाबी में संयुक्त अरब अमीरात के लिए काम करती है. ये कंपनी उन लोगों पर नज़र रखती है जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा या उन्हें चरमपंथी माना जाता है. कंपनी ने ब्रिटिश ब्लॉगर का कोड नाम भी रखा था, गिरो, इसके साथ ही वे उनके पूरे परिवार के साथ उनकी भी निगरानी करता था. नागरिक अधिकार कार्यकर्ता की निगरानी पुरस्कारों से सम्मानित नागरिक अधिकार कार्यकर्ता अहमद मंसूर सालों से यूएई सरकार के निशाने पर रहे हैं. साल 2016 में उन्हें संदिग्ध टेक्स्ट मिला, उसे उन्होंने सिटिज़न लैब को भेजा. एक ब्लैंक आईफ़ोन का इस्तेमाल करते हुए रिसर्च टीम ने उस लिंक पर क्लिक किया और जो दिखा वो हैरान करने वाले था. स्मार्टफ़ोन का नियंत्रण किसी और के पास चला गया था और वहां डेटा ट्रांसफ़र होने लगा. आईफ़ोन को सबसे सुरक्षित माना जाता है लेकिन स्पाईवेयर ने इसमें भी सेंध लगा ली थी. फ़ोन हैकिंग में गोपनीयता क़ानून का सहारा इसके बाद से ऐपल को अपने हर ग्राहक को नियमित रूप से अपडेट भेजना शुरू करना पड़ा. ये तो पता नहीं चला कि मंसूर के फ़ोन से क्या सूचनाएं इकट्ठा हुईं, लेकिन बाद में उन्हें गिरफ़्तार किया गया और दस साल के लिए जेल में डाल दिया गया. इस समय वो एकांतवास की सज़ा भुगत रहे हैं. लंदन में स्थित यूएई के दूतावास ने बीबीसी को बताया कि उनके सुरक्षा संस्थान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करते हैं लेकिन ख़ुफ़िया मामलों पर टिप्पणी करने से उसने मना कर दिया. पत्रकार जो शिकार हुए अक्तूबर 2018 में पत्रकार जमाल खशोग्ज़ी इस्तांबुल में सऊदी दूतावास में गए और लौट कर कभी वापस नहीं आए. सऊदी सरकार के एजेंट के हाथों वो मारे गए. खशोग्ज़ी के मित्र उमर अब्दुलअजीज़ ने पाया कि उनका फ़ोन सऊदी सरकार ने हैक कर लिया था. उमर का मानना है कि इस हत्या में इस हैकिंग की बड़ी भूमिका थी. हालांकि सऊदी सरकार ने हैकिंग के पीछे अपना हाथ होने से इनकार किया है. ज़ीरो क्लिक टेक्नोलॉजी मई 2019 में व्हाट्सऐप मैसेंजर की सुरक्षा में एक बहुत बड़ी सेंध लगी थी. ये ऐप फ़ोन के सॉफ़्टवेयर में घुसपैठ का ज़रिया बन गया. एक बार ओपन होते ही हैकर अपना स्पाईवेयर फ़ोन में डाउनलोड कर सकता था. यहां तक कि उपभोक्ता को क्लिक करने की भी ज़रूरत नहीं थी. एक कॉल के बाद फ़ोन में सेंध लग जाती और वो हैंग हो जाता. इसे ज़ीरो क्लिक टेक्नोलॉजी कहते हैं. इसके बाद व्हाट्सऐप ने अपने डेढ़ अरब उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा अपडेट जारी किए. कैसे निपटें इस तरह के स्पाईवेयर बनाने वाले डेवलपर्स के लिए ख़ास एस्पोर्ट लाइसेंस की ज़रूरत होती है, जैसे डिफ़ेंस के अन्य मामलों में होता है. इसका एकमात्र मकसद होता है गंभीर अपराधियों को पकड़ना. लेकिन सिटिज़न लैब ने एक पूरी सूची तैयार की है जिसमें दर्ज है कि किस सरकार ने इसका कब कब ग़लत इस्तेमाल किया. हथियारों की तरह ही सॉफ़्टवेयर बेचने के बाद भी इसके रख रखाव की ज़िम्मेदारी डेवलपर्स की होती है, इसलिए उन्हें भी ज़िम्मेदार ठहराए जाने की संभावना बनती है. डिज़िटल जासूसी के मामले में इसराइली कंपनी एएसओ ग्रुप अग्रणी रही है. अब्दुलअज़ीज़ के वकील अब इस कंपनी को कोर्ट में घसीटने जा रहे हैं क्योंकि उनके फ़ोन की हैकिंग में इस कंपनी का हाथ था. लेकिन तभी से उस वकील के पास रहस्यमयी व्हाट्सऐप कॉल आने लगे. एनएसओ ने टिप्पणी करने से इनकार किया है लेकिन एक बयान जारी कर कहा है कि वो अधिकृत सरकारी एजेंसियों को टेक्नोलॉजी मुहैया कराता है और इससे कई लोगों को जान बचाई गई है. पकड़ में न आने वाला स्पाईवेयर क़ानूनी डिज़िटल जासूसी उद्योग का मक़सद है ऐसा स्पाईवेयर बनाना जो 100 प्रतिशत पकड़ा न जा सके. अगर ये संभव हुआ तो कोई इस बात की भी शिकायत नहीं कर पाएगा कि इसका ग़लत इस्तेमाल हुआ है, क्योंकि किसी को पता ही नहीं चलेगा. हम सभी डेवलपर्स के हाथों की कठपुतली होंगे, चाहे वे क़ानूनी हों या नहीं. हो सकता है कि ये जेम्स बॉंड टाइप लगे, लेकिन वाकई ये हकीक़त में है. ये ख़तरा सच्चाई है और हम सभी को भविष्य के लिए अपने दिमाग में इसे रखना ज़रूरी है.
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अक्सर थका हुआ महसूस करना कितना ख़तरनाक है?

Date : 27-Jun-2019
27 जून 2019 1970 के दशक की शुरुआत में अगर आपने बर्नआउट से पीड़ित होने की बात की होती तो तय मानिए कि कुछ भौंहें ज़रूर तन जातीं. उन दिनों अनौपचारिक रूप से इस शब्द का इस्तेमाल नशीली दवाइयों के सेवन से पड़ने वाले दुष्प्रभावों को बताने में किया जाता था. मसलन दिमाग की सक्रियता घट जाना, जो अक्सर पार्टियों में जाने वालों के लिए आम बात थी. न्यूयॉर्क में जर्मन-अमरीकी मनोवैज्ञानिक हर्बर्ट फ्रायडेनबर्गर ने 1974 में पहली बार नशेड़ियों और बेघर लोगों के एक क्लीनिक में इस समस्या की पहचान की. लेकिन वह नशेड़ियों के बारे में नहीं सोच रहे थे. क्लीनिक चलाने वाले स्वयंसेवक मुश्किलों से गुज़र रहे थे. उनके पास बहुत काम था, प्रेरणा की कमी थी और वे मानसिक रूप से थक गए थे. यह काम पहले उनको बहुत फायदेमंद लगता था, लेकिन अब वे चिड़चिड़े और खिन्न रहने लगे थे. वे अपने रोगियों का भी उतना ख्याल नहीं रख पा रहे थे जिसके वे हकदार थे. विश्वव्यापी बीमारी फ्रायडेनबर्गर ने इस चिंताजनक स्थिति को लंबे समय तक ज़्यादा काम करने से होने वाली थकान के रूप में परिभाषित किया. इसका वर्णन करने के लिए उन्होंने बर्नआउट शब्द को चुना. यह शब्द तुरंत ही लोकप्रिय हो गया. आज दुनिया भर में इसे जाना जाता है. बर्नआउट कितना व्यापक है, इसके आंकड़े आने बहुत मुश्किल हैं. 2018 में अकेले ब्रिटेन में ही काम के तनाव से 5,95,000 लोग पीड़ित थे. खिलाड़ी इससे पीड़ित हैं. यूट्यूब के सितारे इसके शिकार हैं. उद्यमी इससे परेशान हैं. ख़ुद फ्रायडेनबर्गर इसके शिकार हो गए थे. पिछले महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस विश्वव्यापी समस्या को बीमारी की मान्यता दी. बीमारियों के वर्गीकरण के अंतरराष्ट्रीय मैनुअल में इसे लगातार काम के तनाव से उत्पन्न सिंड्रोम बताया गया. WHO के मुताबिक बर्नआउट के तीन तत्व हैं- थकान, नौकरी से ऊब और ख़राब प्रदर्शन. इसे नज़रंदाज़ करना और इसके इलाज में देरी करना ठीक नहीं है. किसी भी दूसरी बीमारी की तरह इसे बढ़ने देना और देर हो जाने पर इलाज ढूंढना कारगर नहीं हो सकता. आयरलैंड की डबलिन काउंटी की मनोचिकित्सक सिओबन मरे कहती हैं, बर्नआउट से पहले के संकेत और लक्षण बहुत हद तक अवसाद जैसे होते हैं. मरे ने दि बर्नआउट सॉल्यूशन नामक किताब भी लिखी है. वह शराब और शुगर के ज़्यादा इस्तेमाल से बचने की सलाह देती हैं. थकान यदि नहीं उतर रही है तो उस पर भी ध्यान दीजिए. सुबह 10 बजे तक सोने पर भी अगर फिर से सोने की इच्छा करे या टहलने की ऊर्जा ना मिले तो सतर्क हो जाइए. जैसे ही आप इस तरह महसूस करना शुरू करते हैं, मरे डॉक्टर के पास जाने की सलाह देती हैं. वह कहती हैं, अवसाद और बर्नआउट से पहले की स्थिति एक जैसी है. बर्नआउट को बीमारी मान लेने के बारे में बहुत उत्साह है, लेकिन इसे अब भी पेशेगत घटना ही माना गया है. दोनों में अंतर समझने वाले पेशेवर चिकित्सक की सहायता लेना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अवसाद के इलाज के लिए तो कई विकल्प मौजूद हैं लेकिन बर्नआउट का सबसे बेहतर इलाज अब भी जीवनशैली के बदलाव में ही है.
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अक्सर थका हुआ महसूस करना कितना ख़तरनाक है?

Date : 27-Jun-2019
26 जून 2019 1970 के दशक की शुरुआत में अगर आपने बर्नआउट से पीड़ित होने की बात की होती तो तय मानिए कि कुछ भौंहें ज़रूर तन जातीं. उन दिनों अनौपचारिक रूप से इस शब्द का इस्तेमाल नशीली दवाइयों के सेवन से पड़ने वाले दुष्प्रभावों को बताने में किया जाता था. मसलन दिमाग की सक्रियता घट जाना, जो अक्सर पार्टियों में जाने वालों के लिए आम बात थी. न्यूयॉर्क में जर्मन-अमरीकी मनोवैज्ञानिक हर्बर्ट फ्रायडेनबर्गर ने 1974 में पहली बार नशेड़ियों और बेघर लोगों के एक क्लीनिक में इस समस्या की पहचान की. लेकिन वह नशेड़ियों के बारे में नहीं सोच रहे थे. क्लीनिक चलाने वाले स्वयंसेवक मुश्किलों से गुज़र रहे थे. उनके पास बहुत काम था, प्रेरणा की कमी थी और वे मानसिक रूप से थक गए थे. यह काम पहले उनको बहुत फायदेमंद लगता था, लेकिन अब वे चिड़चिड़े और खिन्न रहने लगे थे. वे अपने रोगियों का भी उतना ख्याल नहीं रख पा रहे थे जिसके वे हकदार थे. विश्वव्यापी बीमारी फ्रायडेनबर्गर ने इस चिंताजनक स्थिति को लंबे समय तक ज़्यादा काम करने से होने वाली थकान के रूप में परिभाषित किया. इसका वर्णन करने के लिए उन्होंने बर्नआउट शब्द को चुना. यह शब्द तुरंत ही लोकप्रिय हो गया. आज दुनिया भर में इसे जाना जाता है. बर्नआउट कितना व्यापक है, इसके आंकड़े आने बहुत मुश्किल हैं. 2018 में अकेले ब्रिटेन में ही काम के तनाव से 5,95,000 लोग पीड़ित थे. खिलाड़ी इससे पीड़ित हैं. यूट्यूब के सितारे इसके शिकार हैं. उद्यमी इससे परेशान हैं. ख़ुद फ्रायडेनबर्गर इसके शिकार हो गए थे. पिछले महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस विश्वव्यापी समस्या को बीमारी की मान्यता दी. बीमारियों के वर्गीकरण के अंतरराष्ट्रीय मैनुअल में इसे लगातार काम के तनाव से उत्पन्न सिंड्रोम बताया गया. WHO के मुताबिक बर्नआउट के तीन तत्व हैं- थकान, नौकरी से ऊब और ख़राब प्रदर्शन. इसे नज़रंदाज़ करना और इसके इलाज में देरी करना ठीक नहीं है. किसी भी दूसरी बीमारी की तरह इसे बढ़ने देना और देर हो जाने पर इलाज ढूंढना कारगर नहीं हो सकता. आयरलैंड की डबलिन काउंटी की मनोचिकित्सक सिओबन मरे कहती हैं, बर्नआउट से पहले के संकेत और लक्षण बहुत हद तक अवसाद जैसे होते हैं. मरे ने दि बर्नआउट सॉल्यूशन नामक किताब भी लिखी है. वह शराब और शुगर के ज़्यादा इस्तेमाल से बचने की सलाह देती हैं. थकान यदि नहीं उतर रही है तो उस पर भी ध्यान दीजिए. सुबह 10 बजे तक सोने पर भी अगर फिर से सोने की इच्छा करे या टहलने की ऊर्जा ना मिले तो सतर्क हो जाइए. जैसे ही आप इस तरह महसूस करना शुरू करते हैं, मरे डॉक्टर के पास जाने की सलाह देती हैं. वह कहती हैं, अवसाद और बर्नआउट से पहले की स्थिति एक जैसी है. बर्नआउट को बीमारी मान लेने के बारे में बहुत उत्साह है, लेकिन इसे अब भी पेशेगत घटना ही माना गया है. दोनों में अंतर समझने वाले पेशेवर चिकित्सक की सहायता लेना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अवसाद के इलाज के लिए तो कई विकल्प मौजूद हैं लेकिन बर्नआउट का सबसे बेहतर इलाज अब भी जीवनशैली के बदलाव में ही है.
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दबा कर घी खाती हूं - शिल्पा शेट्टी

Date : 27-Jun-2019
 27 जून 2019 अब बात जब योग की हो तो बॉलीवुड को भी यहां जोड़ देते हैं. योग दिवस के आस-पास बॉलीवुड सितारे आपको योग से जुड़ने और योगा करने की अपील हमेशा करते नज़र आते हैं. पर इन सब के बीच में शिल्पा शेट्टी कुंद्रा योग की बात ना करें ऐसा कैसे हो सकता है? शिल्पा शेट्टी पहले भी फिटनेस की CD s ला चुकी हैं. सोशल मीडिया पर उनके योग और व्यायाम वाले वीडियोज़ जमकर पसंद और फॉलो किए जाते हैं. वहीं शिल्पा मानती हैं कि अगर आपको लगता है कि आप योग से वज़न नहीं घटा सकते तो ऐसा ग़लत है. शिल्पा मानती हैं की योग उनके जीवन में हर तरीक़े से ख़ुशियां लाता है, उनके पति राज कुंद्रा ने भी योग करना शुरू किया है और 8 किलो वज़न घटा चुके हैं. जब उनसे डाइटिंग के बारे में पूछा गया तो वो घबरा कर कहती हैं, लोगों को नुट्रिशन के बारे में समझ होना बहुत ज़रूरी है. 30% आपका वर्कआउट होता है चाहे जिम हो या योग. लेकिन 70% आपकी सही डाइट ज़रूरी है. लेकिन डाइट का मतलब यह नहीं है कि आप अपने खाने में तेल डालना बंध कर दो. उन्होंने कहा, अच्छे फाइबर खाओ, अच्छे कार्ब्स खाओ, मैं तो दबा कर ज़ीरा आलू खाती हूं, पता नहीं क्यों लोग आलू से परेज़ करते हैं. कौन कहता है आलू खाने से मोटे होते हैं, किसने कहा है ओलिव आयल में खाना पकाओ. मैं तो खाने में दबा कर घी डालती हूं और खाती भी हूं. घी के बिना तो मेरा खाना अधूरा है. आज कल की ज़िन्दगी में भागदौड़ बहुत आम है, हम सभी कभी ना कभी डॉक्टर के चक्कर लगते हैं और ना जाने कितनी प्रिसक्राइब की गई दवाइयां ले लेते हैं, लेकिन फ्री में कुदरती तौर पर दिए गए योगा का उपयोग कोई नहीं करता. शिल्पा शेट्टी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि अगर आप फ्लेक्सिबल या लचीले नहीं है तब भी योग किया जा सकता है. वो कहती है, योग हर कोई कर सकता है, छोटा-बड़ा, किसी भी उम्र का व्यक्ति. चाहे आप फ्लेक्सिबल हो या ना हो, मैं भी कई आसान नहीं कर पाती, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं योग करना छोड़ दू.
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