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नूर महल में कभी कोई बेगम नहीं ठहरी

Date : 14-Jan-2020
पूर्व रियासत बहावलपुर के नवाबों के पास बहुत दौलत थी. उन्होंने अपने इलाक़े के विकास के लिए दिल खोल कर उसे इस्तेमाल किया और साथ साथ अपनी हैसियत के अनुसार महल बनवाये. रियासत तो नहीं रही मगर उसकी कहानी सुनाने के लिए नवाबों की बनवाई हुई इमारतें मौजूद हैं. ये एक शानदार कहानी है और सुनने से ज़्यादा देखने की है. जब आप पाकिस्तान के बहावलपुर जाने की सोचें तो आपको सिर्फ़ देखने वाली आँख चाहिए और कुछ नहीं. विक्टोरिया अस्पताल, लाइब्रेरी, म्यूज़ियम, ड्रिंग स्टेडियम, एजर्टन कॉलेज जैसी ऐतिहासिक इमारतों से होते हुए अगर आप नूर महल पहुंचे तो आप देख सकते हैं कि रियासत के दौर में बनने वाली सुविधाएं इलाक़े के हिसाब से अपने समय में काफी आधुनिक थी. और फिर नूर महल हरियाली के बीच खड़ी ये खूबसूरत इमारत पश्चिमी और इस्लामी शैली का एक दिलकश मिश्रण है. इसका आकर्षण और शांति आपको दूर से ही अपनी तरफ खींचता है. महल के चारों तरफ़ हरियाली की चादर बिछी हुई है. इसके ठीक सामने घेराव की शक्ल में बने लॉन में बैठ कर इस हलके लाल और सफ़ेद रंग की इमारत को देखते ही आप इसके जादू में गिरफ़्तार हो जाएंगे. लगभग डेढ़ सौ साल पुराना ये महल उन बहुत से महलों में से एक है जो 19वीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के शुरुआत के दौरान बहावलपुर में बने. बाक़ी महल शायद इससे भी ज़्यादा खूबसूरत हैं मगर नूर महल में कुछ अलग ज़रूर है. नूर महल किसने और किसके लिए बनवाया ? इस सवाल के जवाब में बहुत सी कहानियां और किस्से मशहूर हैं. सबसे ज़्यादा जो हमें सुनने को मिला वो कुछ यूं था. नूर महल नवाब सादिक मोहम्मद खान अब्बासी चतुर्थ ने साल 1872 में बनवाने का हुक्म दिया. उन्होंने यह महल अपनी बेग़म के लिए बनवाया था जो तीन साल में बनकर तैयार हुआ. यही वजह है कि इसका नाम उन्हीं के नाम पर है. लेकिन उनकी बेग़म इस महल में सिर्फ़ एक रात रुकीं क्योंकि उन्हें यह बात पसंद नहीं आई कि महल के पास में ही एक कब्रिस्तान मौजूद था. नूरमहल से जुड़ी यही कहानी आपको इंटरनेट पर भी बहुत सी जगह मिलेगी. मगर क्या यह सच है? कोई बेगम यहां नहीं रही रियासत बहावलपुर के आख़िरी अमीर नवाब सर सादिक़ मोहम्मद खान पंचम के नवासे कमरुज्जमा अब्बासी ने बीबीसी को बताया कि सिवाय महल के बनने की तारीख के इस कहानी में कुछ भी सच नहीं है. लोग डायलॉगबाज़ी करते हैं. अपनी तरफ से कहानियां बना लेते हैं कि बेगम का नाम नूरजहां था. जब कुछ नहीं पता तो अच्छा है कि ना बोलो. उनका कहना था कि कोई बेग़म कभी यहां नहीं रही और यह महल किसी भी बेग़म के लिए ना तो बनवाया गया और ना ही इसके नाम में मौजूद नूर किसी बेग़म के नाम से ताल्लुक रखता है. उस जमाने में किसी बेग़म का नाम लेना भी बुरा समझा जाता था. प्रोफेसर डॉ मोहम्मद ताहिर बहावलपुर के ऐतिहासिक सादिक़ एजर्टन कॉलेज के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष हैं और बहावलपुर के इतिहास पर गहरी नज़र रखते हैं. उनका तर्क है कि नूर महल के निर्माण को किसी बेग़म से जोड़ना ग़लत है. उस जमाने में इस इलाके में खुलेआम बेग़म का नाम लेना भी बुरा समझा जाता था. वह कहते थे नवाब साहब के ड्योढ़ी में भी उनकी पत्नी का नाम लेना मना था. यह महल किसी बेग़म के नाम पर नहीं है. पाकिस्तान बनने के बाद नूर महल की देखरेख का ज़िम्मा कुछ दिन वक़्फ़ के पास रहा और फिर पाकिस्तानी फ़ौज को लीज़ पर दे दिया गया जिसने बाद में इसको ख़रीद लिया. इन दिनों इसकी निगरानी फ़ौज के पास है. इसकी इमारत में रियासत की तारीख और ख़ासतौर से नवाब सर सादिक मोहम्मद खान पंचम से जुड़ी चीजें रखी गई हैं. आप एक मामूली रकम का टिकट खरीदकर उसकी सैर कर सकते हैं. नूर महल के नाम में नूर क्या है? कमरुज्जमा अब्बासी के अनुसार जैसे अल्लाह का नूर है वैसे ही इस महल की तुलना नूर यानी रोशनी से की गई है. आफ़ताब हुसैन गिलानी बहावलपुर की इस्लामिया यूनिवर्सिटी के पाकिस्तान स्टडीज विभाग के अध्यक्ष हैं. वह बहावलपुर और उसकी तारीख के हवाले से किताबें और रिसर्च पेपर लिख चुके हैं वह भी कमरुज्जमा से सहमति जताते हैं. आफ़ताब हुसैन गिलानी कहते हैं, नूर महल में नूर का मतलब रोशनी है इस महल में कोई बेगम नहीं ठहरी. नवाब यहां आते थे और चले जाते थे वो भी यहां ठहरे नहीं. रोशनी का इंतज़ाम इस महल का निर्माण इस तरह किया गया है कि इसमें सूरज की रोशनी के दाख़िल होने के लिए ख़ास तौर पर रास्ते रखे गए हैं. महल के सेन्ट्रल हॉल में नवाब के बैठने की जगह के ठीक ऊपर शीशों की दीवार नजर आती है. इसमें शीशों का इस्तेमाल इस तरह किया गया है कि इमारत के हर कोने में कुदरती रोशनी रहती होगी. इसका अंदाजा इस शीशे से लगाया जा सकता है जो नवाब के बैठने की जगह के ऊपर लगा हुआ है. इन दिनों यहां वीकेंड पर लाइट शो आयोजित होते हैं. ये नज़ारा देखने लायक होता है जो नूर महल के अर्थ की सही मायने में अक्कासी करता है. इसमें महल को बाहर से लाइटों से रोशन किया जाता है. इसके गुम्बदों पर नवाबों की तस्वीर भी दिखाई जाती है. नूर महल किसके लिए बनाया गया? कमरुज्जमा अब्बासी के अनुसार यह अतिथिगृह था. उस वक्त की बड़ी-बड़ी रियासतों के नवाब इस में ठहरे हैं. बाद में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो और फ़ातिमा जिन्ना जैसी शख्सियत भी यहां ठहरी है. प्रोफेसर मोहम्मद ताहिर के मुताबिक इस मेहमान खाने में उस वक्त के शाह ईरान के अलावा ब्रिटेन के वायसराय, गवर्नर पंजाब और पाकिस्तान के साबिक सदर और मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर अय्यूब ख़ान भी ठहर चुके हैं. नवाबों के दौर में भी नूर महल में रियासती और सरकारी प्रोग्राम किए जाते थे. रियासत बहावलपुर के आख़िरी तीन नवाब इसी हॉल के अंदर तख्त नशीन हुए थे इसी में उनकी ताजपोशी की गई थी. जर्मन पियानो और हज की गाड़ी मौजूदा नूर महल की इमारत में एक पियानो भी रखा गया है. इसके बारे में बताया जाता है कि यह नवाब सादिक मोहम्मद खान चतुर्थ जिनको सुबह सादिक की उपाधि भी दी गई थी. लोग कहते हैं कि उन्होंने ये पियानो जर्मनी से साल 1875 में मंगाया और अपनी बेग़म को तोहफ़े में दिया था. लेकिन प्रोफेसर ताहिर का कहना है कि ये पियानो असल में नवाब सादिक मोहम्मद खान पंचम का था. वह पियानो बजाना भी जानते थे. नवाब सादिक़ मोहम्मद खान पंचम सन 1935 में सऊदी अरब गए थे. उस सफ़र के दौरान उन्होंने जो गाड़ी इस्तेमाल की वह भी आपको महल के बाहर खड़ी मिलेगी. पूरब और पश्चिम की कला का संगम नूर महल के निर्माण में पश्चिमी और इस्लामी दोनों शैलियों का इस्तेमाल किया गया है. नूर महल के निर्माण में पश्चिमी और इस्लामी दोनों शैलियों के निर्माण का संयोजन हर जगह नज़र आता है. आप जैसे ही इसमें दाख़िल हों और नीचे फर्श पर देखें और सर उठा कर छत को देखें इनमें बनी कलाकृतियां इन दोनों शैलियों के निर्माण को प्रतिबिंबित करती नज़र आएंगी. सेंट्रल हॉल के दोनों तरफ़ रिहाइशी कमरे थे उनमें ज्यादातर अब बंद पड़े हैं. एक कमरा और उसमें लगा बेड और दूसरे फर्नीचर पर्यटकों के लिए खोला गया है. महल के विभिन्न दलानों में रियासत बहावलपुर के दौर की चीज़ें लिबास, हथियार और दूसरी चीजें रखी गई हैं. यूरोप का फ़र्नीचर आफ़ताब हुसैन गिलानी के अनुसार महल का फर्नीचर ब्रिटेन, इटली, फ्रांस और जर्मनी वगैरह से मंगवाया गया था. यह फर्नीचर आपको सेंट्रल हॉल में भी मिलेगा और बेडरूम में भी. आज भी इसकी चमक-दमक कायम है. दीवारों पर तस्वीरों की मदद से नवाब सर सादिक़ मोहम्मद खान अब्बासी पंचम और उनके दौर का इतिहास प्रदर्शित है. महल में एक बिलियर्ड रूम भी मौजूद है जिसमें स्नूकर का मेज़ और जरूरी चीज़ें आज भी मौजूद हैं. उस कमरे का दरवाज़ा सामने बरामदे में खुलता है. शाम को छिपते सूरज की रोशनी बरामदे की मेहराबों से महल में दाख़िल होती है. सुबह से लेकर शाम और फिर चांद की रातों में भी नूर महल में रोशनी ज़रूर रहती है.
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सरकारी मीटिंग समय और पैसे की बरबादी

Date : 10-Dec-2019
फिलिस हार्टमैन को पता है कि दफ़्तरों में होने वाली अंतहीन बैठकों से गुज़रना क्या होता है. एचआर की उनकी पिछली नौकरी में मैनेजर इतनी बैठकें करते थे कि वहां लोगों को नींद आ जाती थी या वो जान-बूझकर देर से आते थे. रोज़ाना कई घंटे गैर ज़रूरी बैठकों में ख़र्च करने के बाद हार्टमैन को अक्सर काम निपटाने के लिए ओवरटाइम करना पड़ता था. हार्टमैन कहती हैं, मुझे जितने घंटे काम करना चाहिए था, मैं वास्तव में उससे ज़्यादा काम कर रही थी. वह पेनसिल्वेनिया के पिट्सबर्ग में पीजीएचआर कंसल्टिंग की संस्थापक और प्रेसिडेंट हैं. वह सोसाइटी फ़ॉर ह्यूमेन रिसोर्स मैनेजमेंट की विशेषज्ञ पैनलिस्ट भी हैं बैठकों से हताश होने वालों में हार्टमैन अकेली नहीं हैं. अमरीका में रोजाना 1.10 करोड़ से 5.50 करोड़ बैठकें होती हैं जिन पर कंपनियों के कार्मिक बजट का 7 से लेकर 15 फ़ीसदी तक ख़र्च होता है. हर हफ़्ते कर्मचारी बैठकों पर करीब 6 घंटे ख़र्च करते हैं, जबकि मैनेजर इस पर औसतन 23 घंटे बिताते हैं. कुछ फ़ैसले लेने और रणनीति बनाने के लिए बैठकें ज़रूरी हैं, लेकिन कुछ कर्मचारी उनको दिन का सबसे फालतू हिस्सा मानते हैं. इसमें न सिर्फ़ सैकड़ों अरब डॉलर की बर्बादी होती है, बल्कि फालतू की बैठकों के बाद काम पर दोबारा ध्यान लगाने में भी कर्मचारियों का वक़्त ज़ाया होता है. संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक इसे मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम (MRS) कहते हैं. औपचारिक नौकरी करने वाले लगभग सभी लोग इस तजुर्बे से गुज़रते हैं. बैठक के बाद थकान महसूस करना नई बात नहीं है. हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने इसे जांच के लायक माना. मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम किसी संगठन की दक्षता और कर्मचारियों के कल्याण से जुड़ा है, तो मनोवैज्ञानिकों ने भी इसके कारण और निदान तलाशने शुरू कर दिए. MRS को मोटे तौर पर मानसिक और शारीरिक थकान से उबरने की धीमी रफ़्तार के रूप में समझा जा सकता है. उटाह यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जोसेफ ए एलेन का कहना है कि कर्मचारी जब फिज़ूल की बैठकों में हिस्सा लेते हैं तो उनका दिमाग ख़र्च होता रहता है. मीटिंग अगर बहुत लंबी खिंच जाए तो सहनशक्ति घटने लगती है. कर्मचारी उसमें मन से शरीक नहीं हो पाते और वह सिर्फ़ एकतरफा व्याख्यान भर रह जाता है. इससे उबरने में समय लगता है, लेकिन बार-बार ऐसा होने से उत्पादकता पर बुरा असर पड़ता है. 1989 में डॉ. स्टीवन हॉबफ़ोल ने संसाधनों के संरक्षण का सिद्धांत दिया था जो कहता है कि जब इंसान के संसाधनों को ख़तरा होता है या वे ख़त्म होने लगते हैं तब मनोवैज्ञानिक तनाव पैदा होता है. जब संसाधन कम होते हैं तो आदमी उनको बचाने में लग जाता है. दफ़्तर के कुछ कर्मचारियों का सबसे कीमती संसाधन उनका ध्यान, सतर्कता और प्रेरणा होती है. बैठकों के बाद उनकी उत्पादकता में अचानक गिरावट आती है, क्योंकि उनको उबरने में समय लगता है. किसी भी व्यक्ति को एक काम से दूसरे काम- जैसे मीटिंग में बैठने से लेकर सामान्य काम करने तक- में अपना दिमाग शिफ़्ट करना पड़ता है. एलेन का कहना है कि हमें पिछले काम से ख़ुद को अलग करना चाहिए और मानसिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अगले काम पर ख़र्च करना चाहिए. अगर हम पहले ही ख़तरनाक स्तर तक खाली हो चुके हैं तो अगले काम में मन लगाना और कठिन हो सकता है. हताश करने वाली बैठकों के बाद लोगों को इंटरनेट पर वक़्त बिताना, कॉफी पीने चले जाना, सहकर्मियों को रोककर उनको मीटिंग के बारे में बताना आम है. बैठकों की थकान से उबरने की सबकी क्षमता अलग-अलग होती है. कुछ लोग इससे ज़ल्दी उबर सकते हैं तो कुछ लोग दिन ख़त्म होने तक इससे नहीं उबर पाते. एलेन का अनुमान है कि सामान्य बैठकों के बाद उबरने में 10 से 15 मिनट लगते हैं, लेकिन मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम की स्थिति में इसमें औसतन 45 मिनट लग सकते हैं. स्थिति तब और ख़राब होती है जब किसी कर्मचारी को आधे-आधे घंटे के अंतराल पर कई बैठकों में हिस्सा लेना पड़ता है. एक के बाद एक कई फालतू बैठकों के बाद वे किसी काम के नहीं रह जाते. एलेन ने जोसेफ म्रोज़ और नेब्रास्का ओमाहा यूनिवर्सिटी में उनके सहकर्मियों के साथ एक रिपोर्ट तैयार की है. इसमें MRS के जाल से बचने के सबसे बेहतर उपायों और दफ़्तर में क्या करें क्या न करें का संक्षिप्त चेकलिस्ट शामिल किया गया है. म्रोज़ और उनकी टीम ने यह सूची बनाने के लिए 200 शोध-पत्रों का अध्ययन किया. उनके पास अब MRS का आधुनिक निदान हो सकता है. म्रोज़ सबसे पहले ख़ुद से यह सवाल करने का सुझाव देते हैं कि क्या हमारी बैठकें ज़रूरी हैं. यदि एजेंडे में शामिल चीज़ें आसानी से समझी जा सकती हैं या वे सिर्फ़ सूचनाएं साझा करने के लिए हैं तो बेहतर हो कि समूह में एक ई-मेल भेज दिया जाए. म्रोज़ कहते हैं, दूसरी चीज़ जो मैं हमेशा कहूंगा कि मीटिंग को जितना संभव हो छोटा रखें. यदि लोगों के पास किसी तरह का तत्काल इनपुट नहीं है तो उसे बाद में देखा जा सकता है. उन्हें घंटे भर लंबी मीटिंग में बैठने की ज़रूरत नहीं है. नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर क्लिफ़ स्कॉट का कहना है कि जब कर्मचारियों को समूह में किसी बैठक में शामिल होने के लिए बुलाया जाता है तब भी वे उसे उबाऊ महसूस करते हैं. फिज़ूल की बैठक के बाद भावनाएं जाहिर करने, शिकायत करने और फिर से काम में ध्यान लगाने में उनका कीमती समय लगता है. यह MRS का मुख्य नुकसान है. समय के साथ कर्मचारी ख़ुद को ऐसी फालतू बैठकों में अधिक बंधा हुए पाते हैं और मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम में ख़र्च होने वाले घंटे अपमानजनक लगने लगते हैं. हार्टमैन को लगता है कि म्रोज़ की तरकीबें कारगर हैं और उनसे गैर ज़रूरी बैठकों का बोझ कम करने में उनको मदद मिली है. अब वह कोई बैठक बुलाती हैं तो उनमें न सिर्फ़ ज़रूरी कर्मचारी होते हैं, बल्कि हर उस विभाग के प्रतिनिधि भी होते हैं जिनका बैठक के एजेंडे से ताल्लुक हो. वह फ़ैसले लेने से पहले गैर-विशेषज्ञों से भी इनपुट लेती हैं. हार्टमैन जैसे मैनेजर अपने सहकर्मियों से अधिक समर्थन और सहयोग हासिल कर सकते हैं. लेकिन बैठकों को ट्रैक पर रखने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मैनेजरों की नहीं होती. म्रोज़ का कहना है कि बैठकों में शामिल लोगों का रुख नकारात्मक हो तो वे सुनियोजित बैठकों को भी पटरी से उतार सकते हैं. यदि अन्य लोग उनकी आलोचना से सहमत होना शुरू कर देते हैं तो शिकायत चक्र शुरू हो जाता है और लीडर के लिए सबको वापस पटरी पर लाना मुश्किल हो जाता है. यदि कोई संगठन म्रोज़ और एलेन के सभी 22 सुझावों को अपनाए तो बैठकों की संख्या बहुत घट जाएगी. बैठक छोटे होंगे तो उसमें कर्मचारियों की भागीदारी भी बढ़ेगी. विशेषज्ञों को लगता है कि भविष्य में यही मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम के मामलों का समाधान होगा. MRS से बचाव के कोई भी उपाय अभी प्रयोगसिद्ध नहीं है, फिर भी एलेन का कहना है कि कुछ तरकीबें मूड को नकारात्मक से सकारात्मक में बदल सकती हैं. यह बहुत आसान है. ऐसी जगह ढूंढ़िए जहां आपको ख़ुशी मिलती हो. वहां जाइए और लौटकर सीधे काम में लग जाइए. इससे रिकवरी की रफ़्तार बढ़ जाएगी. द सरप्राइजिंग साइंस ऑफ़ मीटिंग्स के लेखक स्टीवन रोगेलबर्ग का कहना है कि टीम लीडर सहकर्मियों के बहुमूल्य समय का रक्षक होता है. उसमें कर्मचारियों की सहन-शक्ति और संभावित ख़तरों को देखने का कौशल हो तो टीम लीडर सीमित अवधि में उनको मीटिंग रिकवरी सिंड्रोम से बचा सकते हैं. एलेन का कहना है कि संगठनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है बैठकों के बारे में लचीला रुख. कर्मचारियों के समय को प्राथमिकता देकर कंपनियां समस्या की जड़ को ही समाप्त कर सकती हैं. एलेन कहते हैं, हमें समाजीकरण की वर्षों पुरानी स्क्रिप्ट और बैठकों को दुख की जगह मानना बंद करना होगा. बैठकें कुछ हासिल करने की जगह होनी चाहिए. हमें बस लोगों को इस बात के लिए तैयार करना है कि वे असहाय नहीं है, इसका निदान हो सकता है. कुछ चीज़ें जिनको आप पहले से जानते हैं वे आपके कामकाजी जीवन को बेहतर बना सकती हैं- एक बार में केवल एक मीटिंग.
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वशिष्ठ नारायण सिंह नासा से गुमनामी तक

Date : 14-Nov-2019
पटना 14 नवंबर । वशिष्ठ नारायण सिंह (जन्म : २ अप्रैल १९४२)(मृत्यु : १४ नवम्बर २०१९) एक भारतीय गणितज्ञ थे। उनका जन्म बिहार के भोजपुर जिला में बसंतपुर नाम के गाँव में हुआ। निधन से पूर्व वे मानसिक बिमारी से पीडित थे और बसंतपुर में ही रहते थे। उन्होंने बर्कली के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से १९६९ में गणित में पी.एच.डी की डिग्री प्राप्त की। 14 नवंबर 2019 को उन्हें तबीयत ख़राब होने के चलते पटना ले जाया गया जहाँ डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।। बिहार के जाने-माने गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन हो गया है. दशकों से मानसिक बीमारी से जूझ रहे वशिष्ठ नारायण सिंह ने 74 साल की उम्र में पटना में आख़िरी सांस ली. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनके निधन पर शोक जताया है. वशिष्ठ नारायण सिंह का जीवन काफ़ी उतार-चढ़ाव से भरा रहा. उनका जीवन नासा में काम करने से लेकर गुमनाम होने तक काफ़ी दिलचस्प है. पटना से सीटू तिवारी ने वशिष्ठ नारायण सिंह के जीवन पर 2015 में तब स्टोरी की थी जब उनकी गुमनामी चर्चा में थी. पढ़िए वो पूरी स्टोरी. एक बूढ़े आदमी हाथ में पेंसिल लेकर यूंही पूरे घर में चक्कर काट रहे थे. कभी अख़बार, कभी कॉपी, कभी दीवार, कभी घर की रेलिंग, जहां भी उनका मन करता, वहां कुछ लिखते, कुछ बुदबुदाते हुए. घर वाले उन्हें देखते रहते थे, कभी आंखों में आंसू तो कभी चेहरे पर मुस्कराहट ओढ़े. यह 70 साल का पगला सा आदमी अपने जवानी में वैज्ञानिक जी के नाम से मशहूर था. मिलिए महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह से. तकरीबन 40 साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित वशिष्ठ नारायण सिंह पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिता रहे थे लेकिन किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त थी. पटना में उनके साथ रह रहे भाई अयोध्या सिंह ने कहा था, अमरीका से वो अपने साथ 10 बक्से किताबें लाए थे, जिन्हें वो पढ़ा करते थे. बाक़ी किसी छोटे बच्चे की तरह ही उनके लिए तीन-चार दिन में एक बार कॉपी, पेंसिल लानी पड़ती थी. वशिष्ठ नारायण सिंह ने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी. उनके बारे में मशहूर है कि नासा में अपोलो की लॉन्चिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था. पटना साइंस कॉलेज में बतौर छात्र ग़लत पढ़ाने पर वह अपने गणित के अध्यापक को टोक देते थे. कॉलेज के प्रिंसिपल को जब पता चला तो उनकी अलग से परीक्षा ली गई जिसमें उन्होंने सारे अकादमिक रिकार्ड तोड़ दिए. पाँच भाई-बहनों के परिवार में आर्थिक तंगी हमेशा डेरा जमाए रहती थी. लेकिन इससे उनकी प्रतिभा पर ग्रहण नहीं लगा. वशिष्ठ नारायण सिंह जब पटना साइंस क़ॉलेज में पढ़ते थे तभी कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली की नज़र उन पर पड़ी. कैली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और 1965 में वशिष्ठ नारायण अमरीका चले गए. साल 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए. नासा में भी काम किया लेकिन मन नहीं लगा और 1971 में भारत लौट आए. पहले आईआईटी कानपुर, फिर आईआईटी बंबई और फिर आईएसआई कोलकाता में नौकरी की. इस बीच 1973 में उनकी शादी वंदना रानी सिंह से हो गई. घरवाले बताते हैं कि यही वह वक्त था जब वशिष्ठ जी के असामान्य व्यवहार के बारे में लोगों को पता चला. उनकी भाभी प्रभावती बताती हैं, छोटी-छोटी बातों पर बहुत ग़ुस्सा हो जाना, कमरा बंद करके दिन-दिन भर पढ़ते रहना, रात भर जागना उनके व्यवहार में शामिल था. वह कुछ दवाइयां भी खाते थे लेकिन वे किस बीमीरी की थीं, इस सवाल को टाल दिया करते थे. इस असामान्य व्यवहार से वंदना भी जल्द परेशान हो गईं और तलाक़ ले लिया. यह वशिष्ठ नारायण के लिए बड़ा झटका था. तक़रीबन यही वक्त था जब वह आईएसआई कोलकाता में अपने सहयोगियों के बर्ताव से भी परेशान थे. भाई अयोध्या सिंह कहते हैं, भैया (वशिष्ठ जी) बताते थे कि कई प्रोफ़ेसर्स ने उनके शोध को अपने नाम से छपवा लिया और यह बात उनको बहुत परेशान करती थी. साल 1974 में उन्हें पहला दौरा पड़ा, जिसके बाद शुरू हुआ उनका इलाज. जब बात नहीं बनी तो 1976 में उन्हें रांची में भर्ती कराया गया. घरवालों के मुताबिक़ इलाज अगर ठीक से चलता तो उनके ठीक होने की संभावना थी. लेकिन परिवार ग़रीब था और सरकार की तरफ़ से मदद नहीं मिली. 1987 में वशिष्ठ नारायण अपने गांव लौट आए. लेकिन 89 में अचानक ग़ायब हो गए. साल 1993 में वह बेहद दयनीय हालत में डोरीगंज, सारण में पाए गए. रद्दी हो जाएगा सब आर्मी से सेवानिवृत्त डॉ वशिष्ठ के भाई अयोध्या सिंह बताते हैं, उस वक्त तत्कालीन रक्षा मंत्री के हस्तक्षेप के बाद मेरा बेंगलुरु तबादला किया गया जहां भैया का इलाज हुआ. लेकिन फिर मेरा तबादला कर दिया गया और इलाज नहीं हो सका. तब से अब तक वह घर पर हैं. डॉ वशिष्ठ का परिवार उनके इलाज को लेकर अब नाउम्मीद हो चुका था. घर में किताबों से भरे बक्से, दीवारों पर वशिष्ठ बाबू की लिखी हुई बातें, उनकी लिखी कॉपियां उनको डराती थीं. डर इस बात का थआ कि क्या वशिष्ठ बाबू के बाद ये सब रद्दी की तरह बिक जाएगा. जैसी कि उनकी भाभी प्रभावती कहती भी हैं, हिंदुस्तान में मिनिस्टर का कुत्ता बीमार पड़ जाए तो डॉक्टरों की लाइन लग जाती है. लेकिन अब हमें इनके इलाज की नहीं किताबों की चिंता है. बाक़ी तो यह पागल ख़ुद नहीं बने, समाज ने इन्हें पागल बना दिया.
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ग़ालिब और इज़ारबंद की गाँठें निदा फ़ाज़ली शायर और लेखक

Date : 12-Oct-2019
इतिहास सिर्फ़ राजाओं और बादशाहों की हार-जीत का नहीं होता. इतिहास उन छोटी-बड़ी वस्तुओं से भी बनता है जो अपने समय से जुड़ी होती हैं और समय गुज़र जाने के बाद ख़ुद इतिहास बन जाती हैं. ये बज़ाहिर मामूली चीज़ें बहुत ग़ैरमामूली होती हैं. इसका एहसास मुझे उस वक़्त हुआ जब भारत के पूर्व राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद ने मिर्ज़ा ग़ालिब की याद में एक ग़ालिब म्यूज़ियम बनवाया. दिल्ली में माता सुंदरी कॉलेज के सामने बनी यह ख़ूबसूरत इमारत है, जिसे ऐवाने-ग़ालिब या ग़ालिब इंस्टीट्यूट कहा जाता है, ऐसी ही मामूली चीज़ों से ग़ालिब के दौर को दोहराती है. यह इमारत मुग़ल इमारत-साज़ी का एक नमूना है. आख़िरी मुग़ल सम्राट के समय के शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के समय को, उस समय के लिबासों, बर्तनों, टोपियों, पानदानों, जूतों और छोटे-बड़े ज़ेवरों से दिखाकर एक ऐसा इतिहास रचने को कोशिश की गई है. यह इतिहास उस इतिहास से मुख़्तलिफ़ है जो हमें स्कूल या कॉलेजों में पढ़ाया जाता है जिसमें तलवारों, बंदूकों और तोपों को हिंदू-मुस्लिम नाम देकर आदमी को आदमी से लड़ाया जाता है और फिर अपना अपना वोट बैंक बनाया जाता है. ग़ालिब का इज़ारबंद इस ग़ालिब म्यूज़ियम में और बहुत सी चीज़ों के साथ किसी हस्तकार के हाथ का बना हुआ एक इज़ारबंद भी है. समय गतिशील है, यह एक यथार्थ है.लेकिन म्यूज़ियम में रखी पुरानी चीज़ों में समय का ठहराव भी कोई कम बड़ा यथार्थ नहीं है. आँख पड़ते ही इनमें से हर चीज़ देखने वाले को अपने युग में ले जाती है और फिर देर तक नए-नए मंज़र दिखाती है. मिर्ज़ा ग़ालिब के दिल में बसा था कलकत्ता रेहड़ियों के हुजूम में गुम हुए ग़ालिब ग़ालिब के उस लंबे, रेशमी इज़ारबंद ने मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही व्यवहार किया. ग़ालिब म्यूज़ियम में पड़ा हुआ मैं अचानक 2006 से निकलकर पुरानी दिल्ली की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुज़रकर बल्लीमारान में सहमी सिमटी उस हवेली में पहुँच गया जहाँ ग़ालिब आते हुए बुढ़ापे में गई हुई जवानी का मातम कर रहे थे. इस हवेली के बाहर अंग्रेज़ दिल्ली के गली-कूचों में 1857 का खूनी रंग भर रहे थे. ग़ालिब का शेर है - हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे बेसबब हुआ ग़ालिब दुश्मन आसमाँ अपना हवेली के बाहर के फाटक पर लगी लोहे की बड़ी सी कुंडी खड़खड़ाती है. ग़ालिब अंदर से बाहर आते हैं तो सामने अंग्रेज़ सिपाहियों की एक टोली नज़र आती है. ग़ालिब के सिर पर अनोखी सी टोपी, बदन पर कढ़ा हुआ चोगा और इसमें से झूलते हुए ख़ूबसूरत इज़ारबंद को देखकर टोली के सरदार ने टूटी फूटी हिंदुस्तानी में पूछा, तुमका नाम क्या होता? ग़ालिब - मिर्जा असदुल्ला खाँ ग़ालिब उर्फ़ नौश. अंग्रेज़ -तुम लाल किला में जाता होता था? ग़ालिब-जाता था मगर-जब बुलाया जाता था. अंग्रेज़-क्यों जाता होता था? ग़ालिब- अपनी शायरी सुनाने- उनकी गज़ल बनाने. अंग्रेज़- यू मीन तुम पोएट होता है? ग़ालिब- होता नहीं, हूँ भी. अंग्रेज़- तुम का रिलीजन कौन सा होता है? ग़ालिब- आधा मुसलमान. अंग्रेज़- व्हाट! आधा मुसलमान क्या होता है? ग़ालिब- जो शराब पीता है लेकिन सुअर नहीं खाता. ग़ालिब की मज़ाकिया आदत ने उन्हें बचा लिया. गाठें मैंने देखा उस रात सोने से पहले उन्होंने अपने इज़ारबंद में कई गाठें लगाई थीं. ग़ालिब की आदत थी जब रात को शेर सोचते थे तो लिखते नहीं थे. जब शेर मुकम्मल हो जाता था तो इज़ारबंद में एक गाँठ लगा देते थे. सुबह जाग कर इन गाठों को खोलते जाते थे और इस तरह याद करके शेरों को डायरी में लिखते जाते थे. हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है वो हरेक बात पे कहना कि यूँ होता तो क्या होता इज़ारबंद से ग़ालिब का रिश्ता अजीब शायराना था. इज़ारबंद दो फारसी शब्दों से बना हुआ एक लफ्ज़ है. इसमें इज़ार का अर्थ पाजामा होता है और बंद यानी बाँधने वाली रस्सी. हिंदुस्तानी में इसे कमरबंद कहते हैं. यह इज़ारबंद मशीन के बजाय हाथों से बनाए जाते थे. औरतों के इज़ारबंद मर्दों से अलग होते थे. औरतों के लिए इज़ारबंद में चाँदी के छोटे छोटे घुँघरु भी होते थे और इनमें सच्चे मोती भी टाँके जाते थे. लखनऊ की चिकन, अलीगढ़ की शेरवानी, भोपाल के बटुवों और राजस्थान की चुनरी की तरह ये इज़ारबंद भी बड़े कलात्मक होते थे. ये इज़ारबंद आज की तरह अंदर उड़स कर छुपाए नहीं जाते थे. ये छुपाने के लिए नहीं होते थे. पुरुषों के कुर्तों या महिलाओं के ग़रारों से बाहर लटकाकर दिखाने के लिए होते थे. पुरानी शायरी में ख़ासतौर से नवाबी लखनऊ में प्रेमिकाओं की लाल चूड़ियाँ, पायल, नथनी और बुंदों की तरह इज़ारबंद भी सौंदर्य के बयान में शामिल होता था. मुहावरों में इज़ारबंद इस एक शब्द से क्लासिक पीरियड में कई मुहाविरे भी तराशे गए थे जो उस जमाने में इस्तेमाल होते थे. ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे इनमें कुछ यूँ हैं, इज़ारबंद की ढीली उस स्त्री के लिए इस्तेमाल होता है जो चालचलन में अच्छी न हो. मैंने इस मुहावरे को छंदबद्ध किया है, जफ़ा है ख़ून में शामिल तो वो करेगी जफ़ा इज़ारबंद की ढीली से क्या उमीदें वफ़ा इज़ारबंद की सच्ची से मुराद वह औरत है जो नेक हो वफ़ादार हो इस मुहावरे का शेर इस तरह है, अपनी तो यह दुआ है यूँ दिल की कली खिले जो हो इज़ारबंद की सच्ची, वही मिले इज़ारबंदी रिश्ते के मानी होते हैं, ससुराली रिश्ता. पत्नी के मायके की तरफ़ का रिश्ता. घरों में दूरियाँ पैदा जनाब मत कीजे इज़ारबंदी ये रिश्ता ख़राब मत कीजे इज़ार से बाहर होने का अर्थ होता है ग़ुस्से में होश खोना. पुरानी दोस्ती ऐसे न खोइए साहब इज़ारबंद से बाहर न होइए साहब इज़ारबंद में गिरह लगाने का मतलब होता है किसी बात को याद करने का अमल. निकल के ग़ैब से अश्आर जब भी आते थे इज़ारबंद में ग़ालिब गिरह लगाते थे ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे. कबीर और नज़ीर को पंडितों तथा मौलवियों ने कभी साहित्यकार नहीं माना. कबीर अज्ञानी थे और नज़ीर नादान थे. इसलिए कि वो परंपरागत नहीं थे. अनुभव की आँच में तपाकर शब्दों को कविता बनाते थे. नज़ीर मेले ठेलों में घूमते थे. जीवन के हर रूप को देखकर झूमते थे. इज़ारबंद पर उनकी कविता उनकी भाषा का प्रमाण है. उनकी नज़्म के कुछ शेर - छोटा बड़ा, न कम न मझौला इज़ारबंद है उस परी का सबसे अमोला इज़ारबंद गोटा किनारी बादल-ओ- मुक़्क़ैश के सिवा थे चार तोला मोती जो तोला इज़ारबंद धोखे में हाथ लग गया मेरा नज़ीर तो लेडी ये बोली जा, मेरा धो ला इज़ारबंद
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जासूसी कैमरे के लिए बंदरों ने मातम मनाया

Date : 25-Sep-2019
बंदर के बच्चे जैसी दिखने वाली आकृति पथरीली ज़मीन पर गिरकर बेजान हो गई. अगले कुछ ही पलों में वयस्क बंदरों का झुंड उसके चारों ओर जमा हो गया और वे एक-दूसरे को सांत्वना देने लगे. इस दृश्य में क्या चल रहा है, यह समझने के लिए जानवरों के व्यवहार का विशेषज्ञ होने की ज़रूरत नहीं है. हम शोक या मातम को ख़ास इंसानी अनुभूति मान सकते हैं, लेकिन जैसा कि इस मामले में और अन्य कई मामलों में दिखा है, हम अपने मृतकों के लिए शोक मनाने में अकेले नहीं हैं. बंदरों के दल में जासूस भारत के राजस्थान में लंगूर बंदरों के एक दल को फ़िल्माने के लिए स्पाई इन दि वाइल्ड की टीम ने कैमरे लगे हुए एक एनिमेट्रोनिक बंदर को तैनात किया. बंदरों की टोली में वह जासूस बंदर था, जो पलकें हिला सकता था और लंगूर जैसी कुछ रिकॉर्डेड आवाज़ें निकाल सकता था. बंदरों के दल ने उस घुसपैठिए "जासूस" को अपने दल का सदस्य समझ लिया. एक मादा बंदर ने उस बच्चे को अपनी गोद में बिठाकर उसे पुचकारना चाहा, लेकिन उससे ग़लती हो गई और जासूस बंदर पेड़ की ऊंची डाल से नीचे पथरीली ज़मीन पर गिर पड़ा. वह ज़मीन से उठ नहीं पाया (क्योंकि वह असली बंदर नहीं था). लेकिन उसे गोद में बिठाने वाली मादा बंदर ने समझा कि वह बच्चा उसकी ग़लती से मर गया है. इसके बाद जो हुआ वह दिल को छू जाने वाला था. बंदरों ने जिस शोक का प्रदर्शन किया उसे आप इंसानी व्यवहार से इतर कुछ और नहीं मान सकते. जानवरों का मातम प्राइमेट्स यानी वानर परिवार का शोक मनाना कोई नई बात नहीं है. दल के किसी सदस्य की मौत होने पर वे मातम मनाते हैं, यह पहले भी देखा गया है. शोध से पता चला है कि प्राइमेट्स की कई प्रजातियां मातम मनाने के संकेत प्रदर्शित करती हैं, हालांकि उनके शोक की अवधि और उसकी तीव्रता विभिन्न प्रजातियों में अलग-अलग हो सकती हैं. किसी की मृत्यु होने पर उनमें अवसाद के लक्षण भी देखे गए हैं. मातम के दौरान वे उन उत्तेजनाओं पर भी प्रतिक्रिया नहीं देते जिन पर वे पहले बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया देते थे. ऐसे कुछ चरम मामलों में एक चिंपाजियों के परिवार का है, जिसे जेन गुडॉल ने 1972 में रिकॉर्ड किया था. फ़्लो नाम की मादा चिंपाजी का निधन हुआ तो उसका बेटा फ़्लिंट- जो अपनी मां पर बेहद निर्भर था- उसमें अवसाद के लक्षण दिखने लगे. फ़्लिंट ने समूह में मिलना-जुलना बंद कर दिया और खाना-पीना भी छोड़ दिया. धीरे-धीरे उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली ने जवाब दे दिया. वह बच नहीं पाया और मां की मौत के एक महीने के अंदर ही वह भी चल बसा. मौत से पहले देखरेख 2014 के एक शोध में देखा गया कि सिर्फ़ प्राइमेट्स ही मातम नहीं मनाते, कुछ दूसरी प्रजातियां भी मृत्यु के करीब पहुंचे अपने दल के सदस्यों की फिक्र करते हैं. एक मादा मर्मोसेट (अफ़्रीकी बंदर) पेड़ से गिर गई जिससे उसके सिर में ज़मीन में दबी किसी भारी चीज़ से चोट लग गई. इसके बाद साढ़े तीन साल साथ रहे उसके नर साथी ने उसकी देखरेख की और दूसरे मर्मोसेट से उसे तब तक छिपाकर रखा जब तक कि दो घंटे बाद उसकी मौत नहीं हो गई. प्राइमेट्स के कुछ समूह, जैसे जापानी मकाउ और हाउलर बंदरों को दल से बिछुड़े सदस्यों की फिक्र में जगते हुए देखा गया है. ऐसा पांच दिनों तक हो सकता है. 2018 में डूंडी (स्कॉटलैंड) के कैंपरडाउन वन्यजीव केंद्र को एक सप्ताह के लिए बंद कर दिया गया था ताकि वहां के मकाउ बंदरों के समूह को एक युवा सदस्य का मौत का शोक मनाने का समय मिल सके. कई बार मृत देह के पास खड़े होकर पहरा देने की जगह, प्राइमेट्स का दल मृत बच्चे के शव को अपने साथ लेकर यात्रा करता है. कितने दिन का शोक? प्राइमेट्स समूहों की मादा अपने बच्चों के शव को 10 दिन या उससे भी ज़्यादा समय तक अपने साथ रखने के लिए जानी जाती हैं. लेकिन इन माताओं को अपने बच्चे के मर जाने का पता होता है या नहीं, यह बहस का विषय है. वे मृत शरीर को असामान्य तरीके से साथ रखते हैं. कई बार तो वे उसे उल्टा भी कर देते हैं और फर्श पर घसीटते हुए ले जाते हैं. दिलचस्प है कि जापानी मकाउ बंदर दल के किसी छोटे सदस्य की मौत पर एक ख़ास आवाज़ निकालते हैं. इससे ऐसा लगता है कि उनको मौत के बारे में कुछ तो ज़रूर पता होगा. प्राइमेट्स में मृतक के सम्मान की समझ का स्तर भिन्न हो सकता है. स्पेक्ट्रम के एक छोर पर, कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने कुछ प्राइमेट्स को मृतकों को खाते देखा है यानी परिवार का सदस्य ही परिवार का भोजन बन जाता है. दूसरी तरफ, 2017 में ज़ांबिया के चिम्फुंशी वन्यजीव अनाथालय ट्रस्ट में एक चिंपाजी को दूसरे मृत चिंपाजी के दांत साफ़ करते हुए देखा गया था. चिंपाजी अपने जीवनकाल में दांत साफ़ करते हुए पाए गए हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ था जब अंतिम संस्कार के समय उनको ऐसा करते हुए देखा गया था.
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हिंदी दिवस हिंदी का नया साहित्य ज्ञानकोश (प्रभाकर एम.लल्लन)

Date : 14-Sep-2019
बीते पचास वर्षों में कोई हिंदी साहित्य ज्ञानकोश नहीं बना था. इससे हिंदी जगत में एक तरह का बौद्धिक पिछड़ापन नज़र आने लगा था. इस पिछड़ेपन को दूर करने और समाज के हाशिए पर पहुंचे साहित्य को मुख्यधारा में लाने के लिए कोलकाता स्थित भारतीय भाषा परिषद और वाणी प्रकाशन के साझा प्रयास और सैकड़ों लेखकों की बरसों की मेहनत का नतीजा, सात खंडो में एक वृहद हिंदी साहित्य ज्ञानकोश के तौर पर सामने आया है. वर्ष 2014 से 2017 के बीच तैयार हुए इस ज्ञानकोश में साहित्य और उसके इतर विभिन्न विषयों पर 275 लेखकों के छब्बीस सौ से ज्यादा लेख शामिल हैं. हाल में इसकी पहली प्रति दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को सौंपी गई. इस ज्ञानकोश के प्रकाशन के मौके पर कोलकाता में आयोजित एक समारोह में देश भर से जुटे विद्वानों ने भी इस पहल को ऐतिहासिक और हिंदी के लिए गौरव का पल बताया. साहित्य के विकास में होगी भूमिका भारतीय भाषा परिषद के निदेशक और ज्ञानकोश के प्रधान संपादक डॉ. शंभुनाथ कहते हैं, हिंदी साहित्य के विकास में इसकी अहम भूमिका होगी. साहित्य का संबंध विभिन्न विधाओं से है. लेकिन ऐसा कोई ग्रंथ नहीं था जो साहित्य के व्यापक परिप्रेक्ष्य को विविधता में पाठकों के सामने खोल कर रख सके. आखिर इस बड़े पैमाने पर किसी ज्ञानकोश को तैयार करने का विचार कैसे आया? डॉ. शंभुनाथ बताते हैं कि हिंदी साहित्य का ज्ञानकोश बने लगभग 50 साल हो गए थे. एक नए ज्ञानकोश की जरूरत लंबे समय तक महसूस की जा रही थी. लग रहा था कि हिंदी संसार में अगर बौद्धिक पिछड़ापन बहुत ज्यादा है तो इसकी एक प्रमुख वजह सामयिक ज्ञानकोश का अभाव है. वह बताते हैं कि हिंदी शिक्षा जगत और हिंदी प्रेमियों को ध्यान में रखते हुए इस ज्ञानकोश की रचना का विचार पैदा हुआ था. शंभुनाथ कहते हैं, बीते 50 बरसों से एक अपडेटेड ज्ञानकोश की कमी से हिंदी जगत में एक खाई पैदा हो गई थी. यह ज्ञानकोश बीती आधी सदी की उस खाई को पाटने में अहम भूमिका निभाएगा. इसे हिंदी का पहला विश्वकोश भी कहा जा सकता है. यह हिंदी की दुनिया को समृद्ध करेगा. ज्ञानकोश में 32 विषयों पर 2660 रचनाएं हिंदी साहित्य ज्ञानकोश के प्रधान संपादक डॉ. शंभुनाथ हैं. इसके संपादक मंडल में राधावल्लभ त्रिपाठी, जवरीमल्ल पारख, अवधेश प्रधान, अवधेश कुमार सिंह और अवधेश प्रसाद सिंह शामिल हैं. ज्ञानकोश की भाषा का संपादन वरिष्ठ लेखक राजकिशोर ने किया है जबकि संयोजन की जिम्मेदारी भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने निभाई है. शंभुनाथ बताते हैं कि यह ज्ञानकोश सिर्फ साहित्य तक ही सीमित नहीं है. इसमें पर्यावरण, धर्म, भारतीय संस्कृति, मानवाधिकार, मीडिया कला, इतिहास और समाज विज्ञान समेत 32 विषयों पर 2,660 रचनाएं शामिल की गई हैं. मानक व्याकरण की भी जरूरत इसके प्रकाशन के अवसर पर आयोजित गोष्ठी ज्ञानकोश समारोह में देश भर से जुटे विद्वानों ने भी इस पहल की सराहना की. उनका कहना था कि कोई भी ज्ञानकोश ऐसे ज्ञान का द्वार खोलता है जो पाठकों में जिज्ञासा, खुलापन और रचनात्मकता पैदा करे. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश इस परंपरा और साहित्य को और समृद्ध करेगा. बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय (बीएचयू) के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. अवधेश प्रधान ने कहा, इस कोष का निर्माण नए समय की चुनौतियों के संदर्भ में हुआ है. यह हिंदी शिक्षा जगत के एक बड़े अभाव को पूरा करेगा. इसकी भाषा भी सरल है. वे इसे हिंदी की महान परंपरा की ही एक विकसित कड़ी बताते हैं. संपादक मंडल के सदस्य डॉ. अवधेश प्रसाद सिंह ने कहा कि इस ज्ञानकोश की तरह ही एक मानक हिंदी व्याकरण की भी ज़रूरत है. इग्नू से जुड़े प्रो. जवरीमल्ल पारख ने कहा, आज साहित्य के अध्ययन के लिए ज्ञान के व्यापक क्षेत्रों का अध्ययन भी ज़रूरी है. यह ज्ञानकोश इसी कमी को पूरा करता है. देश की संस्कृति बचाने की कोशिश प्रधान संपादक डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि यह महज कुछ व्यक्तियों का निर्माण नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और हिंदीभाषी समाज की रचनात्मक शक्ति की अभिव्यक्ति है. उन्होंने कहा, हमने एक ऐसे ज्ञानकोश की नींव डाली है जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ इमारत ऊंची करती जाएंगी. ज्ञानकोश समारोह की अध्यक्षता संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के पूर्व कुलपति डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने की. उन्होंने कहा कि यह ज्ञानकोश हिंदी की एक ऐसी उपलब्धि है जो दशकों तक हिंदी पाठकों को आलोकित करेगी. उन्होंने कहा, भारतीय बहुलता में अखंडता की एक दीर्घ परंपरा है जो इस ज्ञानकोश में भी प्रतिबिंबित होती है. यह देश की संस्कृति को बचाने की ही एक कोशिश है. भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने कहा, हम इस ज्ञानकोश का प्रकाशन करके गौरवान्वित महसूस करते हैं. यह हम सब की एक सामूहिक उपलब्धि है. डॉ. शंभुनाथ कहते हैं, यह ज्ञानकोश साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन की स्थापित चारदीवारियों को तोड़ता है और पाठक को जीवंत बनाए रखता है. अतीत और पश्चिम से आच्छादित हुए बिना आलोचनात्मक समावेशिकता ही हिंदी साहित्य ज्ञानकोश के निर्माण की बुनियादी दृष्टि रही है. कोलकाता में जुटे विद्वानों ने कहा कि हिंदी साहित्य ज्ञानकोश साहित्य के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, उन सभी पाठकों और जिज्ञासुओं के लिए भी एक धरोहर है जो अपने देश, समाज, संस्कृतियों और विश्व की सभ्यताओं को समझना चाहते हैं. बीते 50 बरसों में नई दुनिया में ज्ञान के जो विस्फोट हुए हैं, उनकी रोशनी में भारतीय भाषाओं में हिंदी में बना यह पहला ज्ञानकोश है. डॉ. शंभुनाथ बताते हैं, ज्ञानकोश सामान्य शब्दकोश से इस अर्थ में अलग है कि इसमें शब्द के अर्थ और पर्याय भर नहीं होते. इसमें सीमित सूचनाओं की जगह शब्द, बीजशब्द या विविध विषयों की अवधारणात्मक विवेचना होती है. चित्र, नक्शे, आंकड़े, ग्रंथ सूची वगैरह उसे शब्दकोश से भिन्न बनाते हैं.
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अगर ईश्वर नहीं होता, तो हमें उसका आविष्कार करना पड़ता

Date : 28-Aug-2019
अठारहवीं सदी के फ्रांसीसी चिंतक और दार्शनिक वॉल्तेयर ने कहा था कि, अगर ईश्वर नहीं होता, तो हमें उसका आविष्कार करना पड़ता. ईश्वर का ताल्लुक़ धर्म से है. और इंसान जब से समाज में रहने लगा, तब से ही वो ईश्वर, ख़ुदा, गॉड या ऊपरवाले में यक़ीन रखने लगा था. फिर, धर्म को समझाने और उस पर यक़ीन जगाने के लिए इंसानों के बीच से ही पैग़म्बर हुए. इस्लाम के आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद साहब से पहले, ईसाई धर्म के पैग़म्बर ईसा मसीह थे. उससे भी पहले बौद्ध धर्म के प्रणेता महात्मा बुद्ध हुए. और इन सब से पहले पारसी धर्म के पैग़म्बर जरथुस्त्र हुए थे. एकेश्वरवादी की नींव आज से क़रीब 3500 साल पहले कांस्य युग के दौरान ईरान में जरथुस्त्र ने एकेश्वरवाद की नींव रखी थी और अपने अनुयायियों को यक़ीन दिलाया था कि सर्वशक्तिमान ईश्वर सिर्फ़ एक ही है. इसके एक हज़ार साल बाद, दुनिया का पहला एकेश्वरवादी धर्म यानी पारसी धर्म, फ़ारस के साम्राज्य का आधिकारिक मज़हब बन गया था. उस दौर में पारसी धर्म के अग्नि मंदिरों में इबादत के लिए हज़ारों लोग जुटा करते थे. इसके एक हज़ार बरस बाद फ़ारस के साम्राज्य का पतन हो गया. नतीजा ये हुआ कि पारसी धर्म के अनुयायियों पर उनके नए शासकों ने ज़ुल्म ढाने शुरू कर दिए. क्योंकि उनका मज़हब इस्लाम हो चुका था. इसके अगले 1500 वर्ष बाद, यानी आज पारसी धर्म एक मरता हुआ मज़हब है. इसकी पवित्र ज्वाला की हिफ़ाज़त करने वालों की तादाद मुट्ठी भर ही बची है. हम ये सोचते हैं कि धर्मों का आग़ाज़ होता है. ये फलते-फूलते हैं और फिर इनका अंत हो जाता है. लेकिन, हम इस हक़ीक़त को जानते होते हुए भी एक बात नहीं मानते हैं, वो ये कि जब भी कोई नया धर्म शुरू करता है, तो पहले उसे एक नया संप्रदाय माना जाता है. जब हम किसी के विचार को धर्म का दर्जा देते हैं, तो हम ये मानने लगते हैं कि ये वक़्त की बंदिशों से परे है और पवित्रतम है. और जब किसी मज़हब की मौत होती है, तो ये एक मिथक बन जाता है. फिर आख़िरी सत्य का उसका दावा भी ख़त्म हो जाता है. मिस्र, यूनान और दूसरी प्राचीन सभ्यताओं के एक दौर के धर्म आज क़िस्से-कहानियों में तब्दील हो चुके हैं. अब उन्हें पवित्र मान कर उनका अनुसरण कोई नहीं करता. धर्म का बंटवारा समय की तरह ही धर्म भी परिवर्तनशील हैं. जैसे कि ईसाई धर्म वर्ष 1054 में पूर्वी ऑर्थोडॉक्स और कैथोलिक संप्रदाय में बंट गया था. ये ईसाईयत का पहला बंटवारा था. इसके बाद से तो ईसाई धर्म में कई फ़िरक़े हो गए. इस्लाम का भी यही हाल हुआ. कभी सब को एक साथ लेकर चलने वाला इस्लाम आज शिया, सुन्नी, अहमदिया, बोहरा और न जाने कितने संप्रदायों में बंट चुका है. तो, क्या आज के जो धर्म हैं, वो आने वाले वक़्त में और विभाजित होंगे या इन में से कुछ का ख़ात्मा हो जाएगा? या फिर आज के धर्म को हम नए रंग-रूप में देखेंगे? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमें सबसे पहले इस प्रश्न का उत्तर खोजना होगा कि आख़िर धर्म होते क्यों हैं? वॉल्टेयर ने तो कहा ही था कि ख़ुदा अगर नहीं होता, तो हमें उसका आविष्कार करना पड़ता. और इसी बात में हमारे प्रश्न का उत्तर है. आज सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए हमें मज़हब की ज़रूरत होती है. मज़हब समाज के अलग-अलग लोगों को जोड़ने का काम करता है. ये एकजुट होकर मंदिर बना सकते हैं. साथ में शिकार पर जा सकते हैं. या फिर, किसी सियासी दल के समर्थन में एकजुट हो सकते हैं. हर दौर में नए-नए धर्मों का उदय हुआ है. इनमें से ज़्यादातर कच्ची उम्र में ही चल बसे. जो मज़हब बचे, उन्हें अपने अनुयायियों को आस्था के लिए ठोस लाभ देने होते हैं. जैसे कि ईसाई धर्म. अमरीका के बोस्टन स्थित माइंड ऐंड कल्चरल सेंटर के कॉनर वुड्स ईसाई धर्म की मिसाल देते हैं. रोमन साम्राज्य के दौरान बहुत से सामाजिक आंदोलन शुरू किए गए. लेकिन, इन में से ईसाई धर्म की प्रमुखता से उभरा. इसकी ख़ास वजह ये थी कि ये बीमारों की तीमारदारी का पाठ पढ़ाता था. इससे जो लोग ईसाई हो जाते थे, वो बीमारी या जंग की सूरत में अच्छी तीमारदारी की वजह से बच जाते थे. नतीजा ये हुआ कि ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या बढ़ती गई. तो, अलग-अलग समाजों ने अपनी ज़रूरत के हिसाब से धर्म पैदा किए. जैसे कि अरब समुदाय में इस्लाम का उदय हुआ. जिसकी ख़ूबी थी कि ये लोगों को सम्मान, विनम्रता और दान का सबक़ देता था. उस दौर के अरब समाज में ये ख़ूबियां बहुत ही कम देखने को मिलती थीं. इंसान जब शिकारी बना था तो वो हर चीज़ में ईश्वर या पराशक्ति देखता था. सर्वशक्तिमान ईश्वर में एक जैसे यक़ीन की वजह से ही एक-दूसरे से अनजान लोग मज़हब के नाम पर एकजुट होने लगे. लेकिन, जैसे-जैसे विज्ञान ने तरक़्क़ी की और तर्क का पहिया आगे बढ़ा, तो बहुत से लोगों ने ऐलान कर दिया कि वो न तो ईश्वर को मानते हैं और न ही किसी धर्म को. वो तो सरकारों के बनाए क़ानून के हिसाब से चलते हैं. आज दुनिया में धर्मनिरपेक्षता में यक़ीन बढ़ा है. इसे देखते हुए कई लोग ये कहने लगे हैं कि धर्म का कोई भविष्य नहीं है. कल्पना कीजिए कि जन्नत होती ही नहीं जैसे-जैसे इंसानी समाज पेचीदा होता जा रहा है, धर्म पर से यक़ीन डिगने लगा है. पूर्व सोवियत संघ और चीन जैसे कम्युनिस्ट देशों ने तो नास्तिकता को औपचारिक रूप से अपना लिया. लोगों की निजी आस्था भी ऐसे देशों में अस्वीकार्य हो गई. मशहूर समाजशास्त्री पीटर बर्जर ने 1968 में न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि, 21वीं सदी में धर्म को मानने वाले मुट्ठी भर लोग एक जुट होंगे, ताकि वो धर्मनिरपेक्षता के अनुयायियो के बहुमत से ख़ुद को बचा सकें भले ही धर्म में लोगों का यक़ीन कम हुआ है, फिर भी दुनिया भर के मज़हब हाल-फिलहाल में कहीं नहीं जा रहे हैं. प्यू रिसर्च के 2015 के सर्वे के मुताबिक़, वर्ष 2050 तक दुनिया के 87 फ़ीसद लोगों का धर्म पर भरोसा होगा. ये आज के 84 प्रतिशत से ज़्यादा है. इस्लाम को मानने वालों की आबादी सबसे ज़्यादा बढ़ेगी. वहीं, नास्तिकों की तादाद 2050 में घट जाएगी. फिर, बहुत से लोगों का धर्म से यक़ीन नहीं ख़त्म हुआ है. बल्कि वो इसके मौजूदा स्वरूप से नाख़ुश होकर उस पर यक़ीन करना बंद कर रहे हैं. मुसीबतज़दा लोगों का मज़हब में यक़ीन और पक्का हुआ है. वो इसे अपनी मुसीबतों से छुटकारे का ज़रिया मानते हैं. वहीं, जिन लोगों की ज़िंदगी अच्छे से बसर हो रही है, वो धर्मो के मौजूदा स्वरूप को मानने के बजाय अपनी आस्था को नए सिरे से विकसित करते हैं. जैसे कि ईसाई धर्म की बहुत सी प्रथाएं, प्राचीन काल के दैवीय धर्मों की तरह की है. चीन में बहुत से लोगों की जीवनशैली बौद्ध धर्म की महायान शाखा, ताओ धर्म और कन्फ्यूशियस धर्म की परंपराओं से मिलती हैं. यानी ये लोग ईश्वर में कुछ हद तक को यक़ीन रखते हैं. पर वो उसे नए नज़रिए से देखना चाहते हैं. इसीलिए हम ने तमाम समाजों में आध्यात्मिक क्रांतियां होते हुए देखी हैं. आयरलैंड में असात्रु नाम के संप्रदाय को मानने वाले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. तो, भारत में भी आर्य समाज से लेकर ओशो तक, धर्म को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिशें हुई हैं. तो, ख़ुद को किसी मज़हब का न मानने वाला बताने वाले सारे लोग नास्तिक नहीं कहे जा सकते. बल्कि वो मज़हब की बंदिशों को मानने से मना करते हैं. कोई नया धर्म आएगा आने वाले दौर में जब सरकारों का कामकाज बेहतर होगा और समाज को अच्छी तालीम मिलेगी, तो शायद ऐसे लोगों की संख्या और बढ़े. विकसित देशों में तो ऐसा हो ही रहा है. कॉनर वुड्स तो पूंजीवाद को भी एक धर्म का ही स्वरूप मानते हैं. वो कहते हैं कि बाज़ार की अदृश्य शक्तियां ईश्वर जैसी ही हैं. पूंजीवाद के बहुत से क़ायदे हमारे रोज़मर्रा के जीवन पर असर डालते हैं. कॉनर वु़ड्स का कहना है कि कई बार लोग कहते हैं कि वो धर्म की पाबंदियों को नहीं मानते. हमें चलाने के लिए कोई ताक़तवर शक्ति चाहिए. ऐसे माहौल में ही कट्टरवादी नेता सत्तासीन हो जाते हैं. वुड्स भारत के हिंदू राष्ट्रवादियों से लेकर अमरीका के ईसाई इवैंजेलिस्ट तक की मिसाल देते हैं. कुछ जानकार ये मानते हैं कि मौजूदा प्रमुख धर्मों में से कोई एक धर्म अपने अंदर बदलाव लाकर धर्म में यक़ीन न रखने वालों को अपने पाले में कर लेगा. ऐसा हम ने सत्रहवीं सदी में होते देखा था, जब ईसाई धर्म ने अपनी कई बुराइयां दूर कर के ख़ुद को अमरीका में और लोकप्रिय बना लिया था. ब्रिटिश एक्सपर्ट लिंडा वुडहेड ने 2005 में द स्पिरिचुअल रिवोल्यूशन लिखी थी. वो मानती हैं कि आने वाले दौर में कोई नया धर्म विकसित होगा, इसकी संभावना कम है. क्योंकि किसी भी धर्म को फलने-फूलने के लिए सत्ता के साथ की ज़रूरत होती है. वो फारस साम्राज्य के दौरान पारसी धर्म के विकास और रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म के विकास की मिसाल देती हैं. इंटरनेट की भूमिका लेकिन, आज धर्म को एक और ताक़त से समर्थन मिल सकता है, जिसका नाम है इंटरनेट. इंटरनेट पर बहुत से संप्रदायों को मानने वालों को एकजुट किया जा रहा है. मी टू इसकी बड़ी मिसाल है. ऐसे ही कई आंदोलन इंटरनेट की वजह से बेहद लोकप्रिय रहे हैं. अब ये मुहिम तो धर्म नहीं हैं. लेकिन, इनकी मिसाल से ये समझा जा सकता है कि नया धर्म इंटरनेट की मदद से विकसित हो सकता है. इसके कुछ उदाहरण मौजूद भी हैं. जैसे कि कुछ तर्कवादियों ने रोकोज़ बैसिलिस्क के नाम से एक ऐसी ताक़तवर मशीन की कल्पना की है, जिसमें देवताओें वाले कुछ गुण होंगे. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की बेथ सिंगलर कहती हैं कि आज इंटरनेट की मदद से बहुत कम समय में लोगों को किसी ख़ास विचार के लिए एकजुट किया जा सकता है. ऐसे ख्यालात ही धीरे-धीरे धर्म के रूप में विकसित हो जाते हैं. अमरीकी अरबपति एंथनी लेवांडोवस्की जैसे लोगों ने तो अपने विचार के समर्थन में ऑनलाइन ही हज़ारों लोग जुटा लिए. लेखक युवल नोआ हरारी कहते हैं कि आधुनिक समाज की बुनियादें हिल रही हैं. आज लोग भगवान से ज़्यादा डेटा की ज़रूरत समझते हैं. 2011 में स्थापित ट्यूरिंग चर्च तो ईश्वर की तलाश करने तक की बात करती है. 2001 में हुई ब्रिटेन की जनगणना में बहुत से लोगों ने ख़ुद को जेडीइज़्म का अनुयायी बताया था. इंटरनेट की ये ख़ूबी है कि वो कम से कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचने का दम रखता है. हालांकि सिंगलर कहती हैं कि ऐसे कई संप्रदायों ने आगे चलकर लोकप्रियता खो दी थी. क्योंकि जो तेज़ जलता है, वो जल्दी बुझ भी जाता है. वैसे किसी भी विशाल धर्म की शुरुआत मुट्ठी भर अनुयायियों से ही होती है. फिर चाहे ईसा के समर्थक रहे हों या पारसी पैग़म्बर जरथुस्त्र के. जो आगे चल कर विशाल धार्मिक समुदायों में तब्दील हुए. तो, कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि धर्म पूरी तरह से शायद कभी नहीं मरते. ऐसे में ये भी हो सकता है कि नया धर्म किसी कोने में धीरे-धीरे पनप रहा हो.
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भारत का सेक्स स्कैंडल जिसने हिला दी थी दुनिया बेन्यामिन कोहेन इतिहासकार

Date : 23-Aug-2019
अप्रैल 1892 में भारत के दक्षिण भारतीय शहर हैदराबाद में अंग्रेज़ी में लिखा एक आठ पन्ने का पर्चा बांटा गया. उस समय हैदराबाद भारत में ब्रितानी साम्राज्य की सबसे बड़ी और सबसे अमीर रियासत थी. इस पर्चे में एक मुसलमान रईस मेहदी हसन और उनकी भारत में जन्मी ब्रितानी मूल की पत्नी एलन डोनेली के नाम थे. ये पर्चा उनकी ज़िंदगी बर्बाद करने वाला था. 19वीं सदी का भारत ऐसा नहीं था कि अलग-अलग नस्ल के लोगों के बीच प्रेम को सहज माना जाए. शासक, प्रजा के साथ संबंध तक नहीं बनाते थे, शादी करना तो दूर की बात थी. किसी भारतीय मूल के व्यक्ति का किसी गोरी महिला के साथ संबंध होना तो और भी दुर्लभ बात थी. हैदराबाद की रियासत पर उस दौर में निज़ाम का शासन था. ये जोड़ा हैदराबाद के अभिजात्य वर्ग में शामिल था. एलन ब्रितानी मूल की थीं और मेहदी हसन निज़ाम की सरकार में बड़े अधिकारी थे. वो 19वीं सदी के उस दौर के एक प्रभावशाली दंपती थे. उन्हें लंदन में महारानी विक्टोरिया से मुलाक़ात करने का न्यौता भी मिला था. जैसे-जैसे हैदराबाद के प्रशासन में मेहदी हसन का क़द और रुतबा बढ़ रहा था, उनके प्रति स्थानीय लोगों और उत्तर भारत से आए लोगों के मन में जलन भी बढ़ रही थी. वो हैदराबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने और फिर राज्य के गृह सचिव भी रहे. इस सबके साथ ऊंची तनख़्वाह और शानदार ज़िंदगी भी आई. और इसी वजह से उनके साथी उनसे जलने भी लगे. और इसी समय एलन ने भी पर्दा करना छोड़ दिया और वो हैदराबाद के प्रभावशाली वर्ग के साथ उठने-बैठने लगीं. इससे भले ही कुछ लोग दुखी थे लेकिन एलन और मेहदी अपने बढ़ते रुतबे का आनंद उठा रहे थे.भारत में जन्मी ब्रितानी मूल की एलन डोनेली मेहदी हसन की पत्नी थीं. लेकिन उस आठ पन्नों के पर्चे ने इस दंपती का बिलकुल अलग ही इतिहास पेश किया- और ये उनके नाटकीय पतन का कारण भी बना. पर्चे के अनाम लेखक को मेहदी हसन में तो कोई कमी नहीं मिली, उसने एलन को निशाना बनाया. इस पर्चे में तीन ख़ास आरोप लगाए गए. सबसे पहले तो ये दावा किया गया कि एलन मेहदी से शादी करने से पहले एक चर्चित वेश्या थीं, और लेखक ने अन्य मर्दों के साथ मिलकर सेक्स का आनंद लेने के लिए उसे अपने पास ख़ास तौर पर रखा हुआ था. दूसरा आरोप ये लगाया गया कि मेहदी और एलन की कभी शादी हुई ही नहीं थी. और अंतिम आरोप ये लगाया गया कि मेहदी ने आगे बढ़ने के लिए एलन को हैदराबाद के बड़े अधिकारियों के सामने पेश किया. ब्रितानी जज ने की मुकदमे की सुनवाई मेहदी ने अपने दोस्तों की राय के ख़िलाफ़ जाते हुए पर्चा छपवाने वाले के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज करने का फ़ैसला लिया. पर्चा एसएम मित्रा ने छापा था जिन पर रेसीडेंसी कोर्ट में मुक़दमा दर्ज करवाया गया. यहां एक ब्रितानी जज ने मुक़दमे की सुनवाई की. अभियोजक और बचाव पक्ष दोनों ने अपना-अपना पक्ष पेश करने के लिए प्रभावशाली ब्रितानी वकीलों से मुक़दमा लड़वाया. दावा किया जाता है कि दोनों पक्षों ने गवाहों को रिश्वत दी, दोनों ने ही एक दूसरे पर चश्मदीदों को प्रभावित करने के आरोप लगाए. कुछ चश्मदीद तो कटघरे में ही अपने बयानों से पलट गएव और कुछ सुनवाई से पहले. हैरत की बात ये रही कि जज ने मित्रा को पर्चा छापने के आरोप से बरी कर दिया. लेकिन सुनवाई के दौरान जो सहवास, वेश्यावृत्ति, अनाचार, छल, झूठे सबूत पेश करने, रिश्वत देने आदि के अन्य आरोप सामने आए उन्हें जज ने नहीं छुआ. ये पर्चा कांड एक अंतरराष्ट्रीय सनसनी बन गया. निज़ाम की सरकार, भारत में ब्रितानी सरकार, लंदन मे ब्रितानी सरकार के अलावा दुनियाभर के अख़बारों ने नौ महीने तक चले इस मुक़दमे पर नज़र रखी. मेहदी हसन ने रेसिडेंसी कोर्ट में पर्चे के प्रकाशक पर मुक़दमा दर्ज किया फ़ैसला आने के कुछ दिन के भीतर ही मेहदी और एलन ने लखनऊ की ट्रेन पकड़ ली. दोनों उत्तर भारत के इसी शहर में पले-बढ़े थे. मेहदी ने लखनऊ की स्थानीय सरकार में नौकरी पाने के कई प्रयास किए. वो यहां स्थानीय कलक्टर रह चुके थे. उन्होंने अपनी पेंशन पाने या फिर कुछ वज़ीफ़ा पाने के भी भरसक प्रयास किए. लेकिन कुछ नहीं हो सका. एक दौर में मेहदी ने एक पत्र लिखकर महारानी विक्टोरिया के प्रति अपना प्रेम प्रकट किया था और तब अस्तित्व में आ रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भारत के लिए ख़तरनाक तक बता दिया था. लेकिन भारत में ब्रितानी सरकार ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया. निज़ाम की सरकार ने भी उनका कोई साथ नहीं दिया. पैसे की तंगी में बीता बुढ़ापा अंत में निज़ाम की सरकार ने भी उन्हें गृह सचिव के पद से हटा दिया और उन्हें पेंशन या मुआवज़ा तक नहीं दिया. ये उनकी और बेइज़्ज़ती थी. जब 52 साल की उम्र में उनका निधन हुआ तो वो एलन के लिए कोई पैसा नहीं छोड़ कर गए. बढ़ती उम्र के साथ एलन की हालत भी बदतर होती गई. अपनी ज़िंदगी के आख़िरी सालों में एलन ने क्रीम रंग के काग़ज़ पर कांपते हाथों से नीली रोशनाई से हैदराबाद के प्रधानमंत्री और निज़ाम के नाम गुहार पत्र लिखा और अपने लिए कुछ मुआवज़ा मांगा. स्कैंडल और भ्रष्टाचार के समय से आगे निकल आए हैदराबाद के अधिकारियों को एलन पर रहम आ गया और उनके नाम मामूली मुआवज़ा दे दिया गया. लेकिन मदद मिलने के कुछ समय बाद ही प्लेग से एलन की मौत हो गई. इस दंपती की कहानी एक खिड़की खोलती है जिससे हम भारत में ब्रितानी शासनकाल के दौरान के सांस्कृतिक दोगलेपन को देख सकते हैं. और इसके कुछ साल बाद ही भारतीय राष्ट्रवादी ताक़तों ने देश के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे के सामने गंभीर चुनौतियां पेश की. मेहदी और एलन की कहानी उस दौर के भारत की पारंपरिक समझ को चुनौती देती है. उस तूफ़ानी और सनसनी भरे समय में ये दंपती एक दूसरे के साथ रहा, लेकिन उनकी कहानी ने उस दौर के मानदंडों को ऐसी चुनौती दी कि अंततः वो स्वयं ही बर्बाद हो गए. ये पर्चा स्कैंडल औपनिवेशिक भारत के उस इतिहास का अंतिम बिंदु है जिसमें हैदराबाद और अन्य रियासतें ओरिएंटल तानाशाही थीं, इसके कुछ समय बाद ही बहुत सी रियासतें राष्ट्रवाद समर्थक हो गईं. 1885 में शुरु हुई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एलन और मेहदी के 1892 में हुए मुक़दमे के समय तक अपनी जगह बनाने लगी थी. और एलन की मौत के कुछ समय बाद ही, महात्मा गांधी भारत लौटे और भारत की आज़ादी के संघर्ष में कांग्रेस की भूमिका को और मज़बूत किया. एक बड़ा बदलाव होने वाला था जिसमें भारत के राजकुमार, उनका प्रभाव क्षेत्र और उनके स्कैंडल सुर्ख़ियों से दूर जाने वाले थे और पहले पन्ने पर राष्ट्रवादियों को जगह मिलने वाली थी. और इसी बदलाव में वो पर्चा स्कैंडल भी कहीं खो गया.
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सौ साल जीने की संभावना आज जितनी पहले कभी नहीं थी

Date : 10-Aug-2019
कामकाजी दुनिया बड़े बदलाव से गुज़र रही है. कुछ बड़े बदलाव साफ़-साफ़ दिखते हैं- जिनमें मशीनी अक़्ल या कहीं से भी कुछ भी काम करने की तकनीक जैसे मुद्दे शामिल हैं. कुछ विचार अभी उभरने शुरू हुए हैं- जैसे लैंगिक संतुलन सुनिश्चित करने के लिए निगरानी सामग्री या दफ़्तरों में शुद्ध हवा के लिए डिज़ाइन में बदलाव करना. इन सबके पीछे वे लोग हैं जो अपने विचारों और नज़रिये से हमारे कल को आकार देने की क्षमता रखते हैं. यहां पेश हैं वे 101 चीज़ें जो हमारी कामकाजी ज़िंदगी का भविष्य संवार रहे हैं. 1. 100 साल की ज़िंदगी सौ साल जीने की संभावना आज जितनी पहले कभी नहीं थी. समाज और व्यवसाय के लिए यह वरदान है या अभिशाप, यह इसके लिए हमारी तैयारियों पर निर्भर करेगा. 2. 5जी बिना ड्राइवर वाली कारें, रोबोट और स्मार्ट शहर, ये सब 5जी वायरलेस नेटवर्क से चलेंगे. मोबाइल इंटरनेट कनेक्टिविटी का अगला चरण क़रीब-क़रीब यहां आ चुका है. 3. अनुकूलन क्षमता हमेशा बदलाव के दौर से गुज़रते कामकाजी माहौल में कामयाबी के लिए बुद्धि (IQ) से ज़्यादा अनुकूलन (AQ) की अहमियत बढ़ रही है. 4. एल्गोरिद्म न्याय मशीनें आज हमें पहले से ज़्यादा पहचानती हैं, लेकिन वे अनजाने में ही नस्ल, लिंग और कई आधार पर भेदभाव करती हैं. जॉय बुओलैम्विनी जैसे लोग इसे दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे हैं. 5. ध्यान भटकने से बचाने वाला ऐप इंटरनेट ध्यान भटकाने वाला मंच है. एक ऐप इसे ब्लॉक करके आपको ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है. 6. मशीनी अक़्ल ईमेल लिखने के लिए हम मशीनी अक़्ल पर भरोसा करना शुरू कर चुके हैं. क्या वक़्त बचाने वाला यह तरीक़ा हमारे संचार के तरीक़े को भी बदल देगा? 7. नौकरी पर रखने और निकालने का स्वचालन मशीन नौकरी के आवेदनों को छांट सकते हैं. सवाल है कि क्या इसे आपके सोशल मीडिया को देखने, चेहरे के भावों को पढ़ने और नौकरी से निकालने की भी इज़ाज़त दी जानी चाहिए? 8. बायोहैकिंग उत्पादकता बढ़ाने के लिए उपवास, अल्प आहार, पूरक आहार जैसी कई चीज़ों पर काम हो रहा है- भले ही इनकी वैधता प्रमाणित न हो. 9. बायोमेट्रिक सीवी शारीरिक क्षमता पर नज़र रखने वाली पहनने योग्य तकनीक तेज़ी से फैली है. क्या नौकरी देते समय या एप्रेज़ल के समय भी उनका इस्तेमाल होगा? 10. हवादार दफ़्तर दफ़्तर की बिल्डिंग की डिज़ाइन और उसकी सजावट पर पुनर्विचार हो रहा है, क्योंकि ये हमारी सेहत और उत्पादकता दोनों सुधार सकते हैं. 11. बर्नआउट ज़्यादा मेहनत करने और हर चीज़ में बेहतर होने की अपेक्षा पर खरे न उतरने से थकावट और चिंता की भावना पैदा होती है. 12. कार से मुक्त शहर ओस्लो शहर का मुख्य केंद्र कार से मुक्त क्षेत्र बना दिया गया है. कुछ कार प्रेमियों और व्यवसायियों को इसकी कामयाबी में संदेह है, लेकिन इसके फ़ायदे ज़बरदस्त हैं. 13. चीन का 9-9-6 चीन में हफ्ते के 6 दिन सुबह 9 बजे से लेकर रात के 9 बजे तक काम करने की संस्कृति के ख़िलाफ मज़दूरों ने आवाज़ उठानी शुरू कर दी है. 14. सह-आवास कुछ नौजवान परंपरागत घरों को छोड़कर एकसाथ घरों में रहना पसंद कर रहे हैं, जो उनके लिए किफ़ायती भी है. क्या शहरों में भविष्य में साझे-घर ही होंगे? 15. दंपति की ग़ैर-बराबरी बच्चे हो जाने पर पत्नी का ज़्यादा समय घर में गुज़रता है और पति का दफ़्तर में. इसमें संतुलन लाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास की ज़रूरत होती है. 16. क्राउडफ़ंडिंग क्राउडफ़ंडिंग की शुरुआत किसी नये विचार का समर्थन करने और ज़रूरतमंद की मदद करने के लिए हुई थी. अब यह सोशल मीडिया पर रसूखदार लोगों के लिए अहम, मगर विवादित आमदनी का स्रोत बन गया है. 17. गहन ध्यान संचार के साधनों से हमेशा जुड़े रहने का मतलब है कि हम गहराई से नहीं सोच पाते. जो कंपनियां अपने कर्मचारियों से अधिक से अधिक काम लेना चाहती हैं, उनके लिए यह समस्या है. 18. डीग्रोथ आंदोलन आर्थिक विकास से खपत और जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिल रहा है. डीग्रोथ का तर्क है कि हमारी अर्थव्यवस्थाओं के सिकुड़ने के फ़ायदे हो सकते हैं. 19. डिजिटल डिटॉक्सिंग यदि आप स्मार्टफ़ोन की लत से चिंतिंत हैं तो डरने की ज़रूरत नहीं. इंटरनेट से दूर रहने में आपकी मदद के लिए पूरी इंडस्ट्री तैयार हो गई है. 20. डिजिटल घुमक्कड़ जैसे-जैसे दूर रहकर काम करने का चलन बढ़ा है, लग्ज़री और वाई-फ़ाई सेवा के साथ यात्राओं का कारोबार भी बढ़ा है. वे नये लोकप्रिय पर्यटन केंद्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. 21. विविधता की ट्रैकिंग कुछ संगठन लैंगिक संतुलन और विविधता के अन्य पैमानों की निगरानी करते हैं. समस्याओं की समझ होना उसे सुलझाने की दिशा में पहला क़दम है. 22. ई-रेजिडेंसी एस्टोनिया में आप थोड़ी सी फ़ीस देकर डिजिटल निवासी बन सकते हैं. तकनीक लचीलेपन के साथ काम करने की आज़ादी देती है. हो सकता है कि आगे चलकर और देश ई-रेजिडेंसी देने की होड़ करें. 23. इलेक्ट्रिक स्कूटर बे-आवाज़ दोपहिया हर जगह दिखने लगे हैं. लाखों शहरी श्रमिकों के लिए इससे घर तक पहुंच की समस्या का समाधान हो सकता है. 24. कम में काम चलाना मैरी कोंडो ने हमें फिर से व्यवस्थित होना सिखाया है. लेकिन क्या कम से कम चीज़ों से काम चलाने का उनका दर्शन हमारे व्यावसायिक जीवन पर भी लागू हो सकता है? 25. चेहरे से पहचान हमारा चेहरा अब दूसरे देशों में हमें प्रवेश दिला रहा है. फ़ोन भी चेहरा पहचानता है और बैंक खाते भी इससे जुड़ गए हैं. आगे दफ़्तरों की बारी है. 26. आराम का ख़याल दफ़्तरों में बेतकलुफ्फी का माहौल बढ़ रहा है. यहां तक कि कुछ संस्थानों में आराम के नाम पर सूट-टाई की जगह कैजुअल टी-शर्ट, जींस और जैकेट ने ले ली है. 27. FIRE आंदोलन बहुत कम ख़र्च और ज़्यादा बचत करके वित्तीय आज़ादी हासिल करने और जल्दी रिटायर होने (FIRE) की जीवनशैली को अपनाने वाले बढ़ रहे हैं. 28. उड़ान को ना स्वीडन में घरेलू हवाई सेवा का इस्तेमाल कम हो गया है, क्योंकि जलवायु के प्रति सचेत लोग रेलगाड़ियों को तरजीह दे रहे हैं. यदि यह चलन चल पड़ा तो व्यावसायिक उड़ानों के लिए इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. 29. सप्ताह में 4 दिन काम कर्मचारी कामकाजी सप्ताह छोटा चाहते हैं. नियोक्ता ख़ुश, सेहतमंद और उत्पादक कर्मचारी चाहते हैं. क्या 4 दिन के सप्ताह में दोनों ख़ुश रह सकते हैं? 30. फ्रेड स्वानिकर घाना के उद्यमी और लीडरशिप एक्सपर्ट शिक्षा प्रणाली को बदलकर नया मॉडल लाना चाहते हैं जिससे 2035 तक अफ्रीका में लाखों लीडर और नौकरियां तैयार हो सकें. कामयाबी के लिए झटके लगना क्यों है ज़रूरी? दफ़्तरों में डिस्लेक्सिया के बारे में बात करना क्यों ज़रूरी है? 31. फ्रेडी वेगा लैटिन अमरीका के सिर्फ़ आधे लोग यूनिवर्सिटी जाते हैं, लेकिन एक ऑनलाइन शैक्षणिक संस्थापक अच्छे करियर के लिए उनकी मदद को तैयार हैं. 32. छिपा हुआ काम काम के भविष्य को वाकई समझने के लिए कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आपको गिग इकॉनमी के छिपे हुए पक्ष को पहचानना होगा. 33. काम में घोस्टिंग बिना किसी कारण या संवाद के रिश्ता ख़त्म कर लेने की जो ख़ूबी ऑनलाइन डेटिंग में है, वही अब नौकरी बाज़ार में भी जगह बनाने लगी है. 34. गिग की हक़ीक़त स्वरोज़गार अब सामान्य बात है, लेकिन अपना बॉस ख़ुद होने की आज़ादी एक कीमत भी मांगती है. 35. ग्लोबोटिक्स मशीन से शिक्षण और दूर बैठकर काम करने के चलन को साथ मिला दें तो आप पाएंगे कि सफ़ेद पोश नौकरियां और सेवाएं तेज़ी से घट रही हैं. 36. दृढ़ता एक सिद्धांत बताता है कि सफलता का राज़ स्वाभाविक क्षमता या कौशल में नहीं है. यह बहुत अभ्यास से भी हासिल नहीं होता. यह कभी हार न मानने वाली ज़िद है. 37. ख़ुश रहने की कला भारत में दूसरे देशों के मुक़ाबले काम से जुड़े तनाव, चिंता और अवसाद अधिक हैं. कुछ कंपनियां खुशी का अहसास कराने वाले गुरुओं की मदद ले रही हैं. 38. छिपी हुई बीमारी क़रीब 70 करोड़ लोगों को डिस्लेक्सिया है. लेकिन वेबसाइट डिज़ाइन जैसी नई ईजाद और स्मार्ट पेन जैसे उपकरण उनके लिए दफ़्तरों में काम करना आसान बना रहे हैं. 39. छिपी हुई पसंद सोशल मीडिया और वहां के प्रभावशाली लोगों की इकॉनमी, लाइक और फैन्स पर चलती है. क्या हो अगर वह दिखाई न दे? 40. हिरून जापान में अपने थके कर्मचारियों को वहां की कंपनियां अपने कर्मचारियों को हिरून के लिए जाने को प्रेरित कर रही हैं. इसका शाब्दिक अर्थ है- लंच के समय की नींद. 41. ह्यूमैनिक्स मशीनी अक़्ल जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, नौकरियां स्वचालित हो रही हैं. इसलिए लगातार कुछ नया सीखने का दर्शन अपनाने से नौकरी में बने रहने में मदद मिल सकती है. 42. विनम्र बॉस बॉस नेतृत्व करना पसंद करते हैं- लेकिन जब आप लगातार बोलते रहते हैं तो आप बहुत कुछ खो देते हैं. कई नज़रिये सामने आने से बहुत फ़ायदा हो सकता है. 43. कर्मचारियों की निगरानी कुछ कंपनियां अपने कर्मचारियों की निगरानी के लिए हाई-टेक तकनीक अपना रही हैं. यह उनके जीवन में घुसपैठ है और इससे उनकी खुशहाली घटती है. 44. ऑफ़िस में काम दूर से काम करना अच्छा है, लेकिन हो सकता है कि दफ़्तर में बैठकर काम करना उससे भी अच्छा हो. 45. समावेशी कार्यशालाएं भेदभाव की कुछ हाई-प्रोफ़ाइल शिकायतें मिलने के बाद कुछ कंपनियों ने पूर्वाग्रह विरोधी प्रशिक्षण को बंद कर दिया. 46. प्रभावशाली एजेंसियां इंटरनेट के ये सेलिब्रिटीज़ इंसान नहीं हैं, लेकिन प्रतिभा की तलाश करने वाले उनके पीछे लगे रहते हैं. जेल जहां 50 ग्राम तंबाकू की क़ीमत 43,000 रु पांच हज़ार रुपये की कॉफ़ी में ख़ास क्या है? 47. जोमो (JOMO) जॉय ऑफ़ मिसिंग आउट उस ज़रूरत से राहत का प्रतीक है, जो नेटवर्क से लगातार जुड़े रहने और हमेशा उत्पादक बने रहने की मांग करता है. 48. करोशी जापान में काम के प्रति प्रतिबद्धता का प्रदर्शन बहुत मूल्यवान है- लेकिन किस कीमत पर? 49. ककोंडे यह कोरियाई शब्द उस तनाव का प्रतीक है जो आधुनिक दफ़्तरों में अलग-अलग पीढ़ियों के बीच पैदा हो रहा है. 50. #KuToo यूमी इशिकावा ने दफ़्तर में ज़रूरी ऊंची एड़ी के जूते से दर्द के बारे में ट्वीट किया तो अप्रत्याशित एक्टिविस्ट बन गईं. 51. छुट्टी में काम काम के बोझ तले दबे कर्मचारी एक और तरीक़ा निकाल रहे हैं- वे उन कामों को पूरा करने के लिए छुट्टी लेते हैं जिन्हें वे दफ़्तर में पूरा नहीं कर पाते. 52. लिब्रा कुछ क्रिप्टोकरेंसी ढीली पड़ गई हैं. ऐसे में क्या फेसबुक वॉलेट पहली वास्तविक वैश्विक मुद्रा हो सकती है? 53. दो शख़्स, एक नौकरी अपने जैसी ही कुशल साथी के साथ मिलकर कोई एक नौकरी करना महिलाओं, ख़ासकर मांओं के लिए फायदेमंद हो सकता है. 54. लिज़ जॉनसन पैरा ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता कार्यस्थलों पर विविधिता की खाई को पाटने के लिए काम कर रहे हैं. 55. दीर्घायु अर्थव्यवस्था पुरानेपन का विचार कारोबार की सोच का गला घोंट सकता है. युवा पीढ़ी के साथ बुज़ुर्ग श्रमिकों को नियुक्त करने से जनसांख्यिकीय टाइम बम से निपटा जा सकता है. 56. मैरीमे जम्मे सेनेगल में जन्मी ब्रिटिश कारोबारी 2030 तक दस लाख महिलाओं को कोड सिखाना चाहती हैं. 57. मासायोशी सोन जापान की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी सॉफ्टबैंक के सीईओ सिलिकॉन वैली के सबसे महत्वाकांक्षी और सबसे बड़े निवेशक बन गए हैं 58. #MeToo आंदोलन एक विश्वव्यापी आंदोलन ने दफ़्तरों को बदल दिया और अब भी बदल रहा है. 59. मिया पेर्डोमो और आंद्री डे ला पिएड्रा लैटिन अमरीकी कंपनियों को लैंगिक समानता के आधार पर रैंकिंग देने वाली एजेंसी एक्वालेस की संस्थापक यह कंपनियां समानता की राह बदल रही हैं. 60. माइक्रोब्रेक तल्लीनता से काम के दौरान छोटे-छोटे ब्रेक के बड़े फ़ायदे हो सकते हैं. 61. माइक्रोडोजिंग टेक्नोलॉजी सेक्टर के कुछ कर्मचारियों का कहना है कि साइकेडेलिक्स (ड्रग्स) की बहुत थोड़ी मात्रा उनकी उत्पादकता और रचनात्मकता बढ़ाती है. इन दावों के परीक्षण से कुछ वैज्ञानिक प्रमाण मिल रहे हैं. 62. माइक्रोग्रिड्स छोटे और आसानी से स्थापित होने वाले ग्रिड विकासशील देशों में बिजली की कमी का जवाब हो सकते हैं. ये बिजली की कटौती से प्रभावित अर्थव्यवस्था को आगे ले जा सकते हैं. 63. नैनो एन्फ्लूएंसर बड़े नाम वाले प्रभावशाली लोग एक ही पोस्ट के ज़रिये लाखों लोगों से जुड़ सकते हैं, लेकिन बहुत कम फॉलोअर्स मगर प्रामाणिक बात कहने वाले लोगों के लिए नई जगह बन रही है. 64. न्यूरो डायवर्सिटी 94. टिकटॉक वीडियो का अगला सबसे तेज़ विकास यूट्यूब या इंस्टाग्राम पर नहीं हो रहा. टिकटॉक से ढेर सारा पैसा बनाया जा सकता है. 95. अवचेतन पूर्वाग्रह हमारा अवचेतन निर्णय लेने के तरीकों को प्रभावित करता है और हमें पता भी नहीं चलता. इससे दफ़्तरों की विविधता घटती है और भेदभाव का ख़तरा बढ़ता है. 96. यूनिवर्सल बेसिक इनकम यह विचार थॉमस मोर और अन्य लोगों का है. नौकरियों के स्वचालन के बीच इस विचार ने नई लोकप्रियता हासिल की है, लेकिन इसे अभी बड़े पैमाने पर लागू नहीं किया गया है. 97. असीमित छुट्टियां श्रमिक छुट्टियों के लिए लालायित रहते हैं, लेकिन भुगतान वाली असीमित छुट्टियां आपको थका भी सकती हैं. 98. रिटायरमेंट के बाद काम पेंशनभोगी फिर से काम कर रहे हैं- कुछ पसंद से और कछ ज़रूरत से. लेकिन क्या नौकरियों की उनकी ज़रूरत को समायोजित किया जा सकता है? 99. यूएस वूमेन नेशनल टीम (USWNT) फुटबॉल में अमरीकी महिला टीम ने कामयाबी के रिकॉर्ड बनाए हैं, फिर भी उनको कम भुगतान किया जाता है और पुरुष टीम के मुक़ाबले उनके काम की स्थितियां ख़राब हैं. इसलिए वे मुकदमा कर रही हैं. 100. वी कंपनी इस वैश्विक कंपनी को लगता है कि आप काम और ज़िंदगी के बीच की रेखा को धुंधली करने के लिए पहले से कहीं ज़्यादा तैयार हैं. उनका भविष्य इसी पर टिका है. 101. केवल महिलाओं के लिए केवल महिलाओं के लिए कार्यस्थल का विचार तेज़ी से फल-फूल रहा है
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विश्व आदिवासी दिवस

Date : 08-Aug-2019
रायपुर, 8 अगस्त 2019/ मूलनिवासियों को हक दिलाने और उनकी समस्याओं का समाधान, भाषा, संस्कृति, इतिहास के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 को जेनेवा शहर में विश्व के मूलनिवासी प्रतिनिधियों का ’प्रथम अंतर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस’ सम्मेलन आयोजित किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने व्यापक चर्चा के बाद 21 दिसम्बर 1994 से 20 दिसम्बर 2004 तक ’’प्रथम मूलनिवासी दशक’’ और प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मूल निवासी दिवस (विश्व आदिवासी दिवस) मनाने का फैसला लिया और विश्व के सभी देशों को मनाने के निर्देश दिए। भारत के संविधान में व्यक्त ’’सामाजिक न्याय’’ के संकल्प में आदिवासियों को ’’समानता के अधिकार’’ से संपन्न करते हुए उनकी प्रगति के रास्ते खोल दिए है। संविधान की मंशा के अनुरूप छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में आदिवासियों के शैक्षणिक विकास और आर्थिक उन्नति की योजनाएं बनी। उन्हें क्रियान्वित करने के निरंतर प्रयास हो रहे है। इन प्रयासांे के परिणाम भी सामने आने लगे है। साक्षरता का प्रतिशत बढ़ने के साथ ही इनकी उपलब्धियां रेखांकित होने लगी हैं। सामाजिक क्षेत्र में इन वर्गो की प्रतिष्ठा में लगातार वृद्धि हुई है। शासन-प्रशासन में इनकी सहभागिता सम्मानजनक रूप से बढ़ी है। फिर भी विकास की यह यात्रा अभी और लंबी है। प्रगति के अनगिनत सोपान तय किए जाने है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा आदिवासी समुदाय के जल, जंगल और जमीन से जोड़े रखने की सार्थक पहल की गई है। बस्तर और सरगुजा में सिंचाई का प्रतिशत काफी कम है। नरवा, गरूवा, घुरवा, बाड़ी योजना के माध्यम से यहां के नालों को रिचार्ज करने का काम किया जाएगा, जिससे सतही जल और भूमिगत जल की उपलब्धता बढ़ेगी। सरकार द्वारा आदिवासी समाज के हित में विश्व आदिवासी दिवस पर सामान्य अवकाश घोषित करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। बस्तर और सरगुजा में कनिष्ठ कर्मचारी चयन बोर्ड का गठन करने की घोषणा से स्थानीय युवाओं को भर्ती में प्राथमिकता मिलेगी। पांचवीं अनुसूची के जिलों में बस्तर, सरगुजा संभाग और कोरबा जिले में प्रति एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों पर स्थानीय लोगों की भर्ती के लिए आयु सीमा में तीन वर्षीय छूट के आदेश जारी किए हैं। एनएमडीसी के नगरनार प्लांट में गु्रप सी और गु्रप डी की भर्ती परीक्षा दंतेवाड़ा में ही कराने को लेकर एनएमडीसी को सहमत करा लिया गया है। मुख्यमंत्री ने नक्सल पीड़ित युवा बेरोजगारों को डीएमएफ मद से बीएड की डिग्री पूर्ण होने पर रोजगार प्रदान करने की घोषणा की है। इसी प्रकार भोपालपट्टनम में बांस आधारित कारखाना स्थापित करने की घोषणा की गई है। आदिवासियों को अधिकार सम्पन्न बनाने के लिए अब बस्तर और सरगुजा आदिवासी विकास प्राधिकरणों में स्थानीय विधायकों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनाया गया है। पहले इन प्राधिकरणों के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते थे। सरकार ने निर्णय लिया है कि नक्सल प्रभावित अंचलों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के रहवासियों के विरूद्ध दर्ज प्रकरणों की समीक्षा की जाएगी। आपराधिक प्रकरणों से प्रभावित आदिवासियों को राहत और प्रकरण वापसी के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है। श्री भूपेश बघेल ने आदिवासी अंचलों में नई पहल करते हुए इन्द्रावती नदी विकास प्राधिकरण के गठन, बस्तर में आदिवासी संग्राहलय की स्थापना की घोषणा की है। डीएमएफ मद की राशि का उपयोग शिक्षा को बढ़ावा देने और कुपोषण दूर करने के लिए किया जाएगा। आदिवासियों को पौष्टिक आहार और हाट बाजारों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पूरे बस्तर अंचल सहित कोरबा, कबीरधाम, कोरिया जिलों में इसकी शुरूआत हो गई है। सुकमा जिले के घोर नक्सल प्रभावित जगरगुण्डा सहित 14 गांवों की एक पूरी पीढ़ी 13 वर्षों से शिक्षा से वंचित थीं। अब यहां स्कूल भवनों का पुनर्निर्माण कर दिया गया है। साथ ही कक्षा पहली से बारहवीं तक के बच्चों को प्रवेश दिलाकर उनकी शिक्षा प्रारंभ की गई है। यहां 330 बच्चों को निःशुल्क आवासीय सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस तरह 13 साल के अंधकार (तिमिर) के बाद शिक्षा की ज्योति फिर एक बार प्रज्ज्वलित हो उठी हैं। मुख्यमंत्री द्वारा तोंगपाल, गादीरास और जगरगुण्डा को उप तहसील का दर्जा देने की घोषणा की गई है। सरगुजा में नये 100 बिस्तर जिला अस्पताल के लिए 135 पदों का सृजन, उद्यमिता विकास संस्थान की स्थापना की जाएगी। जशपुर जिले में मानव तस्करी रोकने विशेष सेल का गठन, शंकरगढ़ विकासखण्ड में को-आॅपरेटिव बैंक की शाखा खोली जाएगी। जशपुर में एस्टोटर्फ हाॅकी मैदान का निर्माण किया जाएगा। मुख्यमंत्री श्री बघेल के नेतृत्व में सरकार द्वारा प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्र में कुपोषण की चुनौती से निपटने, चिकित्सा और रोजगार की बेहतर व्यवस्था करने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। लोक निर्माण विभाग के माध्यम से संचालित निर्माण कार्यों के द्वारा भी स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के प्रयास हो रहा है। इन क्षेत्रों में लघु वनोपज पर आधारित लघु उद्योगों और प्रसंस्करण इकाईयों को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया गया है। जिससे यहां के नागरिकों को रोजगार और आय अर्जन के अवसर मिल सकेंगे। श्री बघेल ने इन क्षेत्रों में लघु वनोपजों पर आधारित प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना के लिए प्रधानमंत्री से वन अधिनियम के प्रावधानों को शिथिल करने का आग्रह किया गया है, जिससे यहां रोजगारमूलक इकाईयों के लिए जमीन आवंटित करने और संचालित करने के लिए सुविधा मिलेगी। राज्य सरकार द्वारा निर्णय लिया गया है कि डीएमएफ की राशि का उपयोग खदान प्रभावित क्षेत्र में लोगों के जीवन में बेहतर परिवर्तन लाने के लिए किया जाएगा। आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण दूर करने के लिए चना वितरित किया जा रहा है, यहां गुड़ भी दिया जाएगा। बस्तर संभाग में कुपोषण दूर करने के लिए बच्चों और महिलाओं को विशेष पोषण आहार के वितरण का काम प्रारंभ हो चुका है। राज्य सरकार के प्रयासों की सराहना नीति आयोग ने भी की है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की सरकार ने आदिवासी क्षेत्र विकास प्राधिकरणों का अध्यक्ष स्थानीय विधायकों को बनाने का फैसला लिया गया है। इसी तरह तेंदूपत्ता संग्रहण की दर ढाई हजार रूपए से बढ़ाकर चार हजार रूपए प्रति मानक बोरा कर दी गई है। यह दर देश में सबसे अधिक है। अब 15 वनोपजों की खरीदी समर्थन मूल्य पर की जाएगी। बस्तर में प्रस्तावित स्टील प्लांट नहीं बनने पर लोहंड़ीगुड़ा क्षेत्र के किसानों की अधिगृहित भूमि लौटाने का महत्वपूर्ण निर्णय भी लिया गया है। यहां आदिवासियों को 4200 एकड़ जमीन वापस कर राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज करने की कार्रवाई भी पूर्ण कर ली गई है। राज्य सरकार ने आदिवासियों के हित में अनेक ऐतिहासिक निर्णय लिए गए हैं, जिनमें वन अधिकार पट्टों के लिए प्रदेश में पूर्व में अमान्य किए गए लगभग साढ़े चार लाख आवेदनों पर पुनर्विचार करने और समीक्षा कर पट्टे देने जैसा कार्य भी शामिल है। इसी तरह वन क्षेत्रों में सामुदायिक वन अधिकार पट्टे आवंटित करने के कार्य पर जोर देने और बच्चे के जन्म लेने के उपरांत पिता की जाति के आधार पर उसे जाति प्रमाण पत्र तत्काल प्रदान करने का निर्णय भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जानजाति बालिका छात्रावासों में सुरक्षा अमला और बांण्ड्रीवाल आदि निर्माण के लिए बजट में प्रावधान कर क्रियान्वयन किया जा रहा है।
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