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सौ साल जीने की संभावना आज जितनी पहले कभी नहीं थी

Date : 10-Aug-2019
कामकाजी दुनिया बड़े बदलाव से गुज़र रही है. कुछ बड़े बदलाव साफ़-साफ़ दिखते हैं- जिनमें मशीनी अक़्ल या कहीं से भी कुछ भी काम करने की तकनीक जैसे मुद्दे शामिल हैं. कुछ विचार अभी उभरने शुरू हुए हैं- जैसे लैंगिक संतुलन सुनिश्चित करने के लिए निगरानी सामग्री या दफ़्तरों में शुद्ध हवा के लिए डिज़ाइन में बदलाव करना. इन सबके पीछे वे लोग हैं जो अपने विचारों और नज़रिये से हमारे कल को आकार देने की क्षमता रखते हैं. यहां पेश हैं वे 101 चीज़ें जो हमारी कामकाजी ज़िंदगी का भविष्य संवार रहे हैं. 1. 100 साल की ज़िंदगी सौ साल जीने की संभावना आज जितनी पहले कभी नहीं थी. समाज और व्यवसाय के लिए यह वरदान है या अभिशाप, यह इसके लिए हमारी तैयारियों पर निर्भर करेगा. 2. 5जी बिना ड्राइवर वाली कारें, रोबोट और स्मार्ट शहर, ये सब 5जी वायरलेस नेटवर्क से चलेंगे. मोबाइल इंटरनेट कनेक्टिविटी का अगला चरण क़रीब-क़रीब यहां आ चुका है. 3. अनुकूलन क्षमता हमेशा बदलाव के दौर से गुज़रते कामकाजी माहौल में कामयाबी के लिए बुद्धि (IQ) से ज़्यादा अनुकूलन (AQ) की अहमियत बढ़ रही है. 4. एल्गोरिद्म न्याय मशीनें आज हमें पहले से ज़्यादा पहचानती हैं, लेकिन वे अनजाने में ही नस्ल, लिंग और कई आधार पर भेदभाव करती हैं. जॉय बुओलैम्विनी जैसे लोग इसे दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे हैं. 5. ध्यान भटकने से बचाने वाला ऐप इंटरनेट ध्यान भटकाने वाला मंच है. एक ऐप इसे ब्लॉक करके आपको ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है. 6. मशीनी अक़्ल ईमेल लिखने के लिए हम मशीनी अक़्ल पर भरोसा करना शुरू कर चुके हैं. क्या वक़्त बचाने वाला यह तरीक़ा हमारे संचार के तरीक़े को भी बदल देगा? 7. नौकरी पर रखने और निकालने का स्वचालन मशीन नौकरी के आवेदनों को छांट सकते हैं. सवाल है कि क्या इसे आपके सोशल मीडिया को देखने, चेहरे के भावों को पढ़ने और नौकरी से निकालने की भी इज़ाज़त दी जानी चाहिए? 8. बायोहैकिंग उत्पादकता बढ़ाने के लिए उपवास, अल्प आहार, पूरक आहार जैसी कई चीज़ों पर काम हो रहा है- भले ही इनकी वैधता प्रमाणित न हो. 9. बायोमेट्रिक सीवी शारीरिक क्षमता पर नज़र रखने वाली पहनने योग्य तकनीक तेज़ी से फैली है. क्या नौकरी देते समय या एप्रेज़ल के समय भी उनका इस्तेमाल होगा? 10. हवादार दफ़्तर दफ़्तर की बिल्डिंग की डिज़ाइन और उसकी सजावट पर पुनर्विचार हो रहा है, क्योंकि ये हमारी सेहत और उत्पादकता दोनों सुधार सकते हैं. 11. बर्नआउट ज़्यादा मेहनत करने और हर चीज़ में बेहतर होने की अपेक्षा पर खरे न उतरने से थकावट और चिंता की भावना पैदा होती है. 12. कार से मुक्त शहर ओस्लो शहर का मुख्य केंद्र कार से मुक्त क्षेत्र बना दिया गया है. कुछ कार प्रेमियों और व्यवसायियों को इसकी कामयाबी में संदेह है, लेकिन इसके फ़ायदे ज़बरदस्त हैं. 13. चीन का 9-9-6 चीन में हफ्ते के 6 दिन सुबह 9 बजे से लेकर रात के 9 बजे तक काम करने की संस्कृति के ख़िलाफ मज़दूरों ने आवाज़ उठानी शुरू कर दी है. 14. सह-आवास कुछ नौजवान परंपरागत घरों को छोड़कर एकसाथ घरों में रहना पसंद कर रहे हैं, जो उनके लिए किफ़ायती भी है. क्या शहरों में भविष्य में साझे-घर ही होंगे? 15. दंपति की ग़ैर-बराबरी बच्चे हो जाने पर पत्नी का ज़्यादा समय घर में गुज़रता है और पति का दफ़्तर में. इसमें संतुलन लाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास की ज़रूरत होती है. 16. क्राउडफ़ंडिंग क्राउडफ़ंडिंग की शुरुआत किसी नये विचार का समर्थन करने और ज़रूरतमंद की मदद करने के लिए हुई थी. अब यह सोशल मीडिया पर रसूखदार लोगों के लिए अहम, मगर विवादित आमदनी का स्रोत बन गया है. 17. गहन ध्यान संचार के साधनों से हमेशा जुड़े रहने का मतलब है कि हम गहराई से नहीं सोच पाते. जो कंपनियां अपने कर्मचारियों से अधिक से अधिक काम लेना चाहती हैं, उनके लिए यह समस्या है. 18. डीग्रोथ आंदोलन आर्थिक विकास से खपत और जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिल रहा है. डीग्रोथ का तर्क है कि हमारी अर्थव्यवस्थाओं के सिकुड़ने के फ़ायदे हो सकते हैं. 19. डिजिटल डिटॉक्सिंग यदि आप स्मार्टफ़ोन की लत से चिंतिंत हैं तो डरने की ज़रूरत नहीं. इंटरनेट से दूर रहने में आपकी मदद के लिए पूरी इंडस्ट्री तैयार हो गई है. 20. डिजिटल घुमक्कड़ जैसे-जैसे दूर रहकर काम करने का चलन बढ़ा है, लग्ज़री और वाई-फ़ाई सेवा के साथ यात्राओं का कारोबार भी बढ़ा है. वे नये लोकप्रिय पर्यटन केंद्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. 21. विविधता की ट्रैकिंग कुछ संगठन लैंगिक संतुलन और विविधता के अन्य पैमानों की निगरानी करते हैं. समस्याओं की समझ होना उसे सुलझाने की दिशा में पहला क़दम है. 22. ई-रेजिडेंसी एस्टोनिया में आप थोड़ी सी फ़ीस देकर डिजिटल निवासी बन सकते हैं. तकनीक लचीलेपन के साथ काम करने की आज़ादी देती है. हो सकता है कि आगे चलकर और देश ई-रेजिडेंसी देने की होड़ करें. 23. इलेक्ट्रिक स्कूटर बे-आवाज़ दोपहिया हर जगह दिखने लगे हैं. लाखों शहरी श्रमिकों के लिए इससे घर तक पहुंच की समस्या का समाधान हो सकता है. 24. कम में काम चलाना मैरी कोंडो ने हमें फिर से व्यवस्थित होना सिखाया है. लेकिन क्या कम से कम चीज़ों से काम चलाने का उनका दर्शन हमारे व्यावसायिक जीवन पर भी लागू हो सकता है? 25. चेहरे से पहचान हमारा चेहरा अब दूसरे देशों में हमें प्रवेश दिला रहा है. फ़ोन भी चेहरा पहचानता है और बैंक खाते भी इससे जुड़ गए हैं. आगे दफ़्तरों की बारी है. 26. आराम का ख़याल दफ़्तरों में बेतकलुफ्फी का माहौल बढ़ रहा है. यहां तक कि कुछ संस्थानों में आराम के नाम पर सूट-टाई की जगह कैजुअल टी-शर्ट, जींस और जैकेट ने ले ली है. 27. FIRE आंदोलन बहुत कम ख़र्च और ज़्यादा बचत करके वित्तीय आज़ादी हासिल करने और जल्दी रिटायर होने (FIRE) की जीवनशैली को अपनाने वाले बढ़ रहे हैं. 28. उड़ान को ना स्वीडन में घरेलू हवाई सेवा का इस्तेमाल कम हो गया है, क्योंकि जलवायु के प्रति सचेत लोग रेलगाड़ियों को तरजीह दे रहे हैं. यदि यह चलन चल पड़ा तो व्यावसायिक उड़ानों के लिए इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. 29. सप्ताह में 4 दिन काम कर्मचारी कामकाजी सप्ताह छोटा चाहते हैं. नियोक्ता ख़ुश, सेहतमंद और उत्पादक कर्मचारी चाहते हैं. क्या 4 दिन के सप्ताह में दोनों ख़ुश रह सकते हैं? 30. फ्रेड स्वानिकर घाना के उद्यमी और लीडरशिप एक्सपर्ट शिक्षा प्रणाली को बदलकर नया मॉडल लाना चाहते हैं जिससे 2035 तक अफ्रीका में लाखों लीडर और नौकरियां तैयार हो सकें. कामयाबी के लिए झटके लगना क्यों है ज़रूरी? दफ़्तरों में डिस्लेक्सिया के बारे में बात करना क्यों ज़रूरी है? 31. फ्रेडी वेगा लैटिन अमरीका के सिर्फ़ आधे लोग यूनिवर्सिटी जाते हैं, लेकिन एक ऑनलाइन शैक्षणिक संस्थापक अच्छे करियर के लिए उनकी मदद को तैयार हैं. 32. छिपा हुआ काम काम के भविष्य को वाकई समझने के लिए कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आपको गिग इकॉनमी के छिपे हुए पक्ष को पहचानना होगा. 33. काम में घोस्टिंग बिना किसी कारण या संवाद के रिश्ता ख़त्म कर लेने की जो ख़ूबी ऑनलाइन डेटिंग में है, वही अब नौकरी बाज़ार में भी जगह बनाने लगी है. 34. गिग की हक़ीक़त स्वरोज़गार अब सामान्य बात है, लेकिन अपना बॉस ख़ुद होने की आज़ादी एक कीमत भी मांगती है. 35. ग्लोबोटिक्स मशीन से शिक्षण और दूर बैठकर काम करने के चलन को साथ मिला दें तो आप पाएंगे कि सफ़ेद पोश नौकरियां और सेवाएं तेज़ी से घट रही हैं. 36. दृढ़ता एक सिद्धांत बताता है कि सफलता का राज़ स्वाभाविक क्षमता या कौशल में नहीं है. यह बहुत अभ्यास से भी हासिल नहीं होता. यह कभी हार न मानने वाली ज़िद है. 37. ख़ुश रहने की कला भारत में दूसरे देशों के मुक़ाबले काम से जुड़े तनाव, चिंता और अवसाद अधिक हैं. कुछ कंपनियां खुशी का अहसास कराने वाले गुरुओं की मदद ले रही हैं. 38. छिपी हुई बीमारी क़रीब 70 करोड़ लोगों को डिस्लेक्सिया है. लेकिन वेबसाइट डिज़ाइन जैसी नई ईजाद और स्मार्ट पेन जैसे उपकरण उनके लिए दफ़्तरों में काम करना आसान बना रहे हैं. 39. छिपी हुई पसंद सोशल मीडिया और वहां के प्रभावशाली लोगों की इकॉनमी, लाइक और फैन्स पर चलती है. क्या हो अगर वह दिखाई न दे? 40. हिरून जापान में अपने थके कर्मचारियों को वहां की कंपनियां अपने कर्मचारियों को हिरून के लिए जाने को प्रेरित कर रही हैं. इसका शाब्दिक अर्थ है- लंच के समय की नींद. 41. ह्यूमैनिक्स मशीनी अक़्ल जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, नौकरियां स्वचालित हो रही हैं. इसलिए लगातार कुछ नया सीखने का दर्शन अपनाने से नौकरी में बने रहने में मदद मिल सकती है. 42. विनम्र बॉस बॉस नेतृत्व करना पसंद करते हैं- लेकिन जब आप लगातार बोलते रहते हैं तो आप बहुत कुछ खो देते हैं. कई नज़रिये सामने आने से बहुत फ़ायदा हो सकता है. 43. कर्मचारियों की निगरानी कुछ कंपनियां अपने कर्मचारियों की निगरानी के लिए हाई-टेक तकनीक अपना रही हैं. यह उनके जीवन में घुसपैठ है और इससे उनकी खुशहाली घटती है. 44. ऑफ़िस में काम दूर से काम करना अच्छा है, लेकिन हो सकता है कि दफ़्तर में बैठकर काम करना उससे भी अच्छा हो. 45. समावेशी कार्यशालाएं भेदभाव की कुछ हाई-प्रोफ़ाइल शिकायतें मिलने के बाद कुछ कंपनियों ने पूर्वाग्रह विरोधी प्रशिक्षण को बंद कर दिया. 46. प्रभावशाली एजेंसियां इंटरनेट के ये सेलिब्रिटीज़ इंसान नहीं हैं, लेकिन प्रतिभा की तलाश करने वाले उनके पीछे लगे रहते हैं. जेल जहां 50 ग्राम तंबाकू की क़ीमत 43,000 रु पांच हज़ार रुपये की कॉफ़ी में ख़ास क्या है? 47. जोमो (JOMO) जॉय ऑफ़ मिसिंग आउट उस ज़रूरत से राहत का प्रतीक है, जो नेटवर्क से लगातार जुड़े रहने और हमेशा उत्पादक बने रहने की मांग करता है. 48. करोशी जापान में काम के प्रति प्रतिबद्धता का प्रदर्शन बहुत मूल्यवान है- लेकिन किस कीमत पर? 49. ककोंडे यह कोरियाई शब्द उस तनाव का प्रतीक है जो आधुनिक दफ़्तरों में अलग-अलग पीढ़ियों के बीच पैदा हो रहा है. 50. #KuToo यूमी इशिकावा ने दफ़्तर में ज़रूरी ऊंची एड़ी के जूते से दर्द के बारे में ट्वीट किया तो अप्रत्याशित एक्टिविस्ट बन गईं. 51. छुट्टी में काम काम के बोझ तले दबे कर्मचारी एक और तरीक़ा निकाल रहे हैं- वे उन कामों को पूरा करने के लिए छुट्टी लेते हैं जिन्हें वे दफ़्तर में पूरा नहीं कर पाते. 52. लिब्रा कुछ क्रिप्टोकरेंसी ढीली पड़ गई हैं. ऐसे में क्या फेसबुक वॉलेट पहली वास्तविक वैश्विक मुद्रा हो सकती है? 53. दो शख़्स, एक नौकरी अपने जैसी ही कुशल साथी के साथ मिलकर कोई एक नौकरी करना महिलाओं, ख़ासकर मांओं के लिए फायदेमंद हो सकता है. 54. लिज़ जॉनसन पैरा ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता कार्यस्थलों पर विविधिता की खाई को पाटने के लिए काम कर रहे हैं. 55. दीर्घायु अर्थव्यवस्था पुरानेपन का विचार कारोबार की सोच का गला घोंट सकता है. युवा पीढ़ी के साथ बुज़ुर्ग श्रमिकों को नियुक्त करने से जनसांख्यिकीय टाइम बम से निपटा जा सकता है. 56. मैरीमे जम्मे सेनेगल में जन्मी ब्रिटिश कारोबारी 2030 तक दस लाख महिलाओं को कोड सिखाना चाहती हैं. 57. मासायोशी सोन जापान की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी सॉफ्टबैंक के सीईओ सिलिकॉन वैली के सबसे महत्वाकांक्षी और सबसे बड़े निवेशक बन गए हैं 58. #MeToo आंदोलन एक विश्वव्यापी आंदोलन ने दफ़्तरों को बदल दिया और अब भी बदल रहा है. 59. मिया पेर्डोमो और आंद्री डे ला पिएड्रा लैटिन अमरीकी कंपनियों को लैंगिक समानता के आधार पर रैंकिंग देने वाली एजेंसी एक्वालेस की संस्थापक यह कंपनियां समानता की राह बदल रही हैं. 60. माइक्रोब्रेक तल्लीनता से काम के दौरान छोटे-छोटे ब्रेक के बड़े फ़ायदे हो सकते हैं. 61. माइक्रोडोजिंग टेक्नोलॉजी सेक्टर के कुछ कर्मचारियों का कहना है कि साइकेडेलिक्स (ड्रग्स) की बहुत थोड़ी मात्रा उनकी उत्पादकता और रचनात्मकता बढ़ाती है. इन दावों के परीक्षण से कुछ वैज्ञानिक प्रमाण मिल रहे हैं. 62. माइक्रोग्रिड्स छोटे और आसानी से स्थापित होने वाले ग्रिड विकासशील देशों में बिजली की कमी का जवाब हो सकते हैं. ये बिजली की कटौती से प्रभावित अर्थव्यवस्था को आगे ले जा सकते हैं. 63. नैनो एन्फ्लूएंसर बड़े नाम वाले प्रभावशाली लोग एक ही पोस्ट के ज़रिये लाखों लोगों से जुड़ सकते हैं, लेकिन बहुत कम फॉलोअर्स मगर प्रामाणिक बात कहने वाले लोगों के लिए नई जगह बन रही है. 64. न्यूरो डायवर्सिटी 94. टिकटॉक वीडियो का अगला सबसे तेज़ विकास यूट्यूब या इंस्टाग्राम पर नहीं हो रहा. टिकटॉक से ढेर सारा पैसा बनाया जा सकता है. 95. अवचेतन पूर्वाग्रह हमारा अवचेतन निर्णय लेने के तरीकों को प्रभावित करता है और हमें पता भी नहीं चलता. इससे दफ़्तरों की विविधता घटती है और भेदभाव का ख़तरा बढ़ता है. 96. यूनिवर्सल बेसिक इनकम यह विचार थॉमस मोर और अन्य लोगों का है. नौकरियों के स्वचालन के बीच इस विचार ने नई लोकप्रियता हासिल की है, लेकिन इसे अभी बड़े पैमाने पर लागू नहीं किया गया है. 97. असीमित छुट्टियां श्रमिक छुट्टियों के लिए लालायित रहते हैं, लेकिन भुगतान वाली असीमित छुट्टियां आपको थका भी सकती हैं. 98. रिटायरमेंट के बाद काम पेंशनभोगी फिर से काम कर रहे हैं- कुछ पसंद से और कछ ज़रूरत से. लेकिन क्या नौकरियों की उनकी ज़रूरत को समायोजित किया जा सकता है? 99. यूएस वूमेन नेशनल टीम (USWNT) फुटबॉल में अमरीकी महिला टीम ने कामयाबी के रिकॉर्ड बनाए हैं, फिर भी उनको कम भुगतान किया जाता है और पुरुष टीम के मुक़ाबले उनके काम की स्थितियां ख़राब हैं. इसलिए वे मुकदमा कर रही हैं. 100. वी कंपनी इस वैश्विक कंपनी को लगता है कि आप काम और ज़िंदगी के बीच की रेखा को धुंधली करने के लिए पहले से कहीं ज़्यादा तैयार हैं. उनका भविष्य इसी पर टिका है. 101. केवल महिलाओं के लिए केवल महिलाओं के लिए कार्यस्थल का विचार तेज़ी से फल-फूल रहा है
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विश्व आदिवासी दिवस

Date : 08-Aug-2019
रायपुर, 8 अगस्त 2019/ मूलनिवासियों को हक दिलाने और उनकी समस्याओं का समाधान, भाषा, संस्कृति, इतिहास के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 को जेनेवा शहर में विश्व के मूलनिवासी प्रतिनिधियों का ’प्रथम अंतर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस’ सम्मेलन आयोजित किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने व्यापक चर्चा के बाद 21 दिसम्बर 1994 से 20 दिसम्बर 2004 तक ’’प्रथम मूलनिवासी दशक’’ और प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मूल निवासी दिवस (विश्व आदिवासी दिवस) मनाने का फैसला लिया और विश्व के सभी देशों को मनाने के निर्देश दिए। भारत के संविधान में व्यक्त ’’सामाजिक न्याय’’ के संकल्प में आदिवासियों को ’’समानता के अधिकार’’ से संपन्न करते हुए उनकी प्रगति के रास्ते खोल दिए है। संविधान की मंशा के अनुरूप छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में आदिवासियों के शैक्षणिक विकास और आर्थिक उन्नति की योजनाएं बनी। उन्हें क्रियान्वित करने के निरंतर प्रयास हो रहे है। इन प्रयासांे के परिणाम भी सामने आने लगे है। साक्षरता का प्रतिशत बढ़ने के साथ ही इनकी उपलब्धियां रेखांकित होने लगी हैं। सामाजिक क्षेत्र में इन वर्गो की प्रतिष्ठा में लगातार वृद्धि हुई है। शासन-प्रशासन में इनकी सहभागिता सम्मानजनक रूप से बढ़ी है। फिर भी विकास की यह यात्रा अभी और लंबी है। प्रगति के अनगिनत सोपान तय किए जाने है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा आदिवासी समुदाय के जल, जंगल और जमीन से जोड़े रखने की सार्थक पहल की गई है। बस्तर और सरगुजा में सिंचाई का प्रतिशत काफी कम है। नरवा, गरूवा, घुरवा, बाड़ी योजना के माध्यम से यहां के नालों को रिचार्ज करने का काम किया जाएगा, जिससे सतही जल और भूमिगत जल की उपलब्धता बढ़ेगी। सरकार द्वारा आदिवासी समाज के हित में विश्व आदिवासी दिवस पर सामान्य अवकाश घोषित करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। बस्तर और सरगुजा में कनिष्ठ कर्मचारी चयन बोर्ड का गठन करने की घोषणा से स्थानीय युवाओं को भर्ती में प्राथमिकता मिलेगी। पांचवीं अनुसूची के जिलों में बस्तर, सरगुजा संभाग और कोरबा जिले में प्रति एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों पर स्थानीय लोगों की भर्ती के लिए आयु सीमा में तीन वर्षीय छूट के आदेश जारी किए हैं। एनएमडीसी के नगरनार प्लांट में गु्रप सी और गु्रप डी की भर्ती परीक्षा दंतेवाड़ा में ही कराने को लेकर एनएमडीसी को सहमत करा लिया गया है। मुख्यमंत्री ने नक्सल पीड़ित युवा बेरोजगारों को डीएमएफ मद से बीएड की डिग्री पूर्ण होने पर रोजगार प्रदान करने की घोषणा की है। इसी प्रकार भोपालपट्टनम में बांस आधारित कारखाना स्थापित करने की घोषणा की गई है। आदिवासियों को अधिकार सम्पन्न बनाने के लिए अब बस्तर और सरगुजा आदिवासी विकास प्राधिकरणों में स्थानीय विधायकों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनाया गया है। पहले इन प्राधिकरणों के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते थे। सरकार ने निर्णय लिया है कि नक्सल प्रभावित अंचलों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के रहवासियों के विरूद्ध दर्ज प्रकरणों की समीक्षा की जाएगी। आपराधिक प्रकरणों से प्रभावित आदिवासियों को राहत और प्रकरण वापसी के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है। श्री भूपेश बघेल ने आदिवासी अंचलों में नई पहल करते हुए इन्द्रावती नदी विकास प्राधिकरण के गठन, बस्तर में आदिवासी संग्राहलय की स्थापना की घोषणा की है। डीएमएफ मद की राशि का उपयोग शिक्षा को बढ़ावा देने और कुपोषण दूर करने के लिए किया जाएगा। आदिवासियों को पौष्टिक आहार और हाट बाजारों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पूरे बस्तर अंचल सहित कोरबा, कबीरधाम, कोरिया जिलों में इसकी शुरूआत हो गई है। सुकमा जिले के घोर नक्सल प्रभावित जगरगुण्डा सहित 14 गांवों की एक पूरी पीढ़ी 13 वर्षों से शिक्षा से वंचित थीं। अब यहां स्कूल भवनों का पुनर्निर्माण कर दिया गया है। साथ ही कक्षा पहली से बारहवीं तक के बच्चों को प्रवेश दिलाकर उनकी शिक्षा प्रारंभ की गई है। यहां 330 बच्चों को निःशुल्क आवासीय सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस तरह 13 साल के अंधकार (तिमिर) के बाद शिक्षा की ज्योति फिर एक बार प्रज्ज्वलित हो उठी हैं। मुख्यमंत्री द्वारा तोंगपाल, गादीरास और जगरगुण्डा को उप तहसील का दर्जा देने की घोषणा की गई है। सरगुजा में नये 100 बिस्तर जिला अस्पताल के लिए 135 पदों का सृजन, उद्यमिता विकास संस्थान की स्थापना की जाएगी। जशपुर जिले में मानव तस्करी रोकने विशेष सेल का गठन, शंकरगढ़ विकासखण्ड में को-आॅपरेटिव बैंक की शाखा खोली जाएगी। जशपुर में एस्टोटर्फ हाॅकी मैदान का निर्माण किया जाएगा। मुख्यमंत्री श्री बघेल के नेतृत्व में सरकार द्वारा प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्र में कुपोषण की चुनौती से निपटने, चिकित्सा और रोजगार की बेहतर व्यवस्था करने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। लोक निर्माण विभाग के माध्यम से संचालित निर्माण कार्यों के द्वारा भी स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के प्रयास हो रहा है। इन क्षेत्रों में लघु वनोपज पर आधारित लघु उद्योगों और प्रसंस्करण इकाईयों को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया गया है। जिससे यहां के नागरिकों को रोजगार और आय अर्जन के अवसर मिल सकेंगे। श्री बघेल ने इन क्षेत्रों में लघु वनोपजों पर आधारित प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना के लिए प्रधानमंत्री से वन अधिनियम के प्रावधानों को शिथिल करने का आग्रह किया गया है, जिससे यहां रोजगारमूलक इकाईयों के लिए जमीन आवंटित करने और संचालित करने के लिए सुविधा मिलेगी। राज्य सरकार द्वारा निर्णय लिया गया है कि डीएमएफ की राशि का उपयोग खदान प्रभावित क्षेत्र में लोगों के जीवन में बेहतर परिवर्तन लाने के लिए किया जाएगा। आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण दूर करने के लिए चना वितरित किया जा रहा है, यहां गुड़ भी दिया जाएगा। बस्तर संभाग में कुपोषण दूर करने के लिए बच्चों और महिलाओं को विशेष पोषण आहार के वितरण का काम प्रारंभ हो चुका है। राज्य सरकार के प्रयासों की सराहना नीति आयोग ने भी की है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की सरकार ने आदिवासी क्षेत्र विकास प्राधिकरणों का अध्यक्ष स्थानीय विधायकों को बनाने का फैसला लिया गया है। इसी तरह तेंदूपत्ता संग्रहण की दर ढाई हजार रूपए से बढ़ाकर चार हजार रूपए प्रति मानक बोरा कर दी गई है। यह दर देश में सबसे अधिक है। अब 15 वनोपजों की खरीदी समर्थन मूल्य पर की जाएगी। बस्तर में प्रस्तावित स्टील प्लांट नहीं बनने पर लोहंड़ीगुड़ा क्षेत्र के किसानों की अधिगृहित भूमि लौटाने का महत्वपूर्ण निर्णय भी लिया गया है। यहां आदिवासियों को 4200 एकड़ जमीन वापस कर राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज करने की कार्रवाई भी पूर्ण कर ली गई है। राज्य सरकार ने आदिवासियों के हित में अनेक ऐतिहासिक निर्णय लिए गए हैं, जिनमें वन अधिकार पट्टों के लिए प्रदेश में पूर्व में अमान्य किए गए लगभग साढ़े चार लाख आवेदनों पर पुनर्विचार करने और समीक्षा कर पट्टे देने जैसा कार्य भी शामिल है। इसी तरह वन क्षेत्रों में सामुदायिक वन अधिकार पट्टे आवंटित करने के कार्य पर जोर देने और बच्चे के जन्म लेने के उपरांत पिता की जाति के आधार पर उसे जाति प्रमाण पत्र तत्काल प्रदान करने का निर्णय भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जानजाति बालिका छात्रावासों में सुरक्षा अमला और बांण्ड्रीवाल आदि निर्माण के लिए बजट में प्रावधान कर क्रियान्वयन किया जा रहा है।
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आमार शोनार बांग्ला, आमि तोमाए भालोबाशी...

Date : 07-Aug-2019
आमार शोनार बांग्ला, आमि तोमाए भालोबाशी... चिरोदिन तोमार आकाश, तोमार बाताश, आमार प्राने बजाए बाशी.... हिंदी में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का ये गीत कुछ इस तरह से है, मेरा प्रिय बंगाल, मेरा सोने जैसा बंगाल, मैं तुमसे प्यार करता हूँ... सदैव तुम्हारा आकाश, तुम्हारी वायु, मेरे प्राणों में बाँसुरी सी बजाती है... रवींद्रनाथ टैगोर ने साल 1905 में बंगभग के समय इसे लिखते समय शायद ही ये सोचा होगा कि 66 साल बाद बांग्लादेश वजूद में आएगा और ये गीत उसका राष्ट्रगान बनेगा. बांग्लादेश से रवींद्रनाथ का रिश्ता केवल इसी गीत तक सीमित नहीं है. उनकी कविताएं बांग्लादेश के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं. उनके लिखे साहित्य का एक बड़ा हिस्सा यहीं लिखा गया. एक तरह से कहा जाए तो टैगोर जितने भारत के हैं, टैगोर दुनिया में शायद पहली ऐसी शख्सियत हैं जिनके लिखे गीत दुनिया के दो बड़े देशों का राष्ट्रगान हैं. बांग्लादेश में टैगोर परिवार की तीन बड़ी ज़मींदारियां थीं. पहला कालीग्राम परगना स्थित पोतिसर. दूसरा इब्राहिमपुर परगने में सिलाईदाहा, जो इस समय कुश्तिया ज़िले में है लेकिन बंटवारे से पहले ये अविभाजित नदिया ज़िले का हिस्सा था. तीसरा पाबना ज़िले में शहज़ादपुर परगना. ढाका से क़रीब ढाई सौ किलोमीटर दूरी पर मौजूद पोतिसर गांव पहले राजशाही ज़िले का हिस्सा था, लेकिन 1984 में ये नौगांव में शामिल हो गया बांग्लादेश अवामी लीग से जुड़े इसराफिल आलम नौगांव के सांसद हैं. वे बताते हैं, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल क्रांतिकारी प्रफुल्ल चंद्र चाकी का गृह ज़िला बोगरा भी पोतिसर ज्यादा दूर नहीं है. रवींद्रनाथ टैगोर के इस गांव में सर्किट हाउस का होना यहां की अहमियत बताने के लिए काफ़ी था. बदलते वक्त के साथ इस गांव में भी काफ़ी तब्दीलियां हुईं हैं, लेकिन पोतिसर की पहचान आज भी कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर से होती है. सांसद इसराफिल आलम ने बताया कि साल 1830 में रवींद्रनाथ टैगोर के दादा सर द्वारकानाथ टैगोर ने अंग्रेजों से यहां की जमींदारी ख़रीदी थी. नागौर नदी के किनारे बसा ये गांव राजधानी ढाका समेत देश के बाकी ज़िलों से भी रेल-सड़क मार्ग से जुड़ा है. पोतिसर से बारह किलोमीटर दूर अतरई रेलवे स्टेशन है. ब्रिटिश भारत के समय बने इस स्टेशन का अपना ऐतिहासिक महत्व है. महात्मा गांधी, प्रफुल्ल चंद्र रॉय, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और मोहम्मद अली जिन्ना समेत कई बड़े नेताओं के आगमन का गवाह रहा है अतरई स्टेशन. रवींद्रनाथ टैगोर पहली बार साल 1891 में पोतिसर आए थे. एक ज़मींदार परिवार से संबंध रखने के बावजूद ज़मींदारी के पेशे से कोई ख़ास लगाव उन्हें नहीं था. वे विशुद्ध प्रकृति प्रेमी थे. उनके मन में लोगों के प्रति करुणा का भाव था. शायद यही वजह है कि उन्होंने अपने समय की रूढ़ियों और विसंगतियों पर भी ज़ोरदार प्रहार किया. ज़मींदारी प्रथा के उस दौर में कोई रैयत-किसान अपने मालिक के समक्ष बैठने की हिम्मत नहीं कर सकते थे. ऐसे दौर में रवींद्रनाथ टैगोर पोतिसर में अपने रैयत-काश्तकारों से आमने-सामने बैठकर बातें करते थे. टैगोर ने जहां पतिसर में आम, पलाश और पीपल के पेड़ों की छांव में बैठकर कालजयी उपन्यास, लघु कहानियां एवं कविताओं की रचना की. वहीं, उन्होंने वहां के चासी-किसानों की समस्याओं को भी रेखांकित किया. साल 1909 में प्रकाशित चर्चित उपन्यास गोरा की रचना टैगोर ने पोतिसर में ही की थीं. साथ ही उन्होंने अपने मशहूर काव्य संग्रह चैताली में शामिल चौवन कविताएं, बिदाय ओभिशाप, लघु कहानी प्रतिहिंसा ठाकुर दा और निबंध इंग्रेज ओ भारतबासी यहीं लिखी गई थीं. रवींद्रनाथ टैगोर संग्रहालय के प्रभारी मोहम्मद सोहेल इम्तियाज़ बताते हैं, साल 1913 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उन्हें मिला ये सम्मान पोतिसर वासियों के लिए भी बेहद गर्व की बात थी. गांव वासियों के आग्रह पर रवींद्रनाथ टैगोर 1914 में पोतिसर आए और उन्होंने अपने रैयतों को संबोधित किया. नोबेल पुरस्कार में मिले एक लाख आठ हज़ार रुपये से किसानों की बेहतरी के लिए उन्होंने पोतिसर में कृषि बैंक और सहकारी समिति की स्थापना की. भूमिहीन किसानों के बच्चों की शिक्षा के लिए टैगोर ने यहां एक स्कूल भी बनाया, जो आज भी चल रहा है. पोतिसर से उनका बहुत लगाव था. यही वजह थी कि जब भी उन्हें मौका मिलता वे यहां आते. अपने एक पत्र में टैगोर ने लिखा है, पोतिसर आना आत्म साक्षात्कार जैसा अनुभव है. 76 साल की उम्र में गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर आख़िरी बार पोतिसर आए थे. तारीख़ थी 27 जुलाई 1937 और मौक़ा था बांग्ला त्योहार पुण्य उत्सव का. चार साल बाद (7 अगस्त 1941) उनका निधन हो गया. राजशाही यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर मोहम्मद अमीरूल मोमिन चौधरी बताते हैं, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की हुकूमत यहां बांग्ला भाषी आवाम पर जबरन उर्दू थोपना चाहती थी. उनकी नज़रों में हमारी भाषा और साहित्य का कोई मतलब नहीं था. उनकी ज्यादा दिनों तक नहीं चली और चौबीस साल बाद यानी 1971 में लाखों लोगों की कुर्बानियां और संघर्ष के बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ. नया देश बनने पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का सम्मान और बढ़ गया, जब उनके लिखे गीत आमार शोनार बांग्ला को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया. पोतिसर में तीन एकड़ जमीन पर जो संग्रहालय है, उसे कचहरीबाड़ी और कुटीबाड़ी भी कहते हैं. यहां कुल तेरह कमरे हैं और यही रवीद्रनाथ टैगोर की पुश्तैनी हवेली थी. इस संग्रहालय में उनके जीवन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण चीज़ें मौजूद हैं. जिस पलंग और कुर्सी पर कभी टैगोर बैठा करते थे, वो इस संग्रहालय में आज भी अच्छी स्थिति में है. इस संग्रहालय में उनसे जुड़ीं क़रीब तीन सौ चीज़ें हैं. रवींद्र सरोवर के किनारे उनकी एक भव्य प्रतिमा भी है, जिसकी डिजाइन राजशाही यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट के प्रोफ़ेसर कनक कुमार पाठक ने तैयार किया था. कचहरीबाड़ी संग्रहालय की कस्टोडियन नाहिद सुल्ताना बताती हैं कि इस मुद्रा में कविगुरु की प्रतिमा पूरे उप-महाद्वीप में नहीं है. पोतिसर स्थित कचहरीबाड़ी संग्रहालय को देखने के लिए देश-विदेश से हजारों लोग हर साल आते हैं. विशेषकर उनके जन्मदिन (7 मई) और पुण्यतिथि (7अगस्त) को. बांग्लादेश कला एवं संस्कृति मंत्रालय की तरफ से साल के इन दो तिथियों पर रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में यहां भव्य आयोजन होता है. बांग्लादेश अवामी लीग से जुड़े इसराफिल आलम यहां के स्थानीय सांसद हैं. वो बताते हैं, रवींद्रनाथ टैगोर की वजह से इस गांव की पहचान पूरे विश्व में है. दुनिया के अलग-अलग कोने से यहां लोग घूमने और उनके विषय में शोध करने के लिए आते हैं.
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तापमान बढ़ने पर रोक लगाने के लिए कुछ नहीं किया गया तो दुनिया में भारी तबाही होगी.

Date : 03-Aug-2019
31 जुलाई, 2019 दुनिया लगातार गर्म होती जा रही है. ऐसा लगता है कि जुलाई 2019 अब तक के सबसे गर्म महीने के तौर पर दर्ज़ किया गया. अगर हम 1880 से 1900 की तुलना करें तो पूरी धरती में जुलाई का महीना पिछले 10 सालों से लगातार सबसे गर्म महीना रहा है. वैज्ञानिकों ने चेताया है कि दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा नहीं बढ़ने देना चाहिए, नहीं तो जलवायु परिवर्तन के भयावह परिणाम देखने को मिलेंगे. यहां 1850 से 1900 के बीच तापमानों की तुलना की गई है, तब बड़े पैमाने पर ओद्यौगिकीकरण नहीं हुआ था. तब पृथ्वी का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका था. भले ही यह बहुत ज़्यादा नहीं लग रहा हो लेकिन जलवायु परिवर्तन की अंतरराष्ट्रीय संस्था आईपीसीसी के मुताबिक अगर दुनिया के देशों ने तापमान बढ़ने पर रोक लगाने के लिए कुछ नहीं किया गया तो दुनिया में भारी तबाही होगी. समुद्र का जलस्तर बढ़ जाएगा, लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा. अकाल, लू और भीषण बरसात जैसी भीषण मौसमी घटनाएं सामने आएंगी. चावल,मक्का और गेहूं जैसी फसलों का उत्पादन ख़तरे में आ जाएगा. अगर दुनिया भर का तापमान मौजूदा रफ़्तार से बढ़ता रहे, तो इस शताब्दी के अंत तक तापमान 3 से 5 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता इसका क्या मतलब हो सकता है? न्यूयार्कअमरीका करीब 80 लाख की आबादी के साथ न्यूयॉर्क दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले शहरों में से एक है. लेकिन यहां समुद्री बाढ़ और तूफ़ान आने की आशंका बनी रहती है. अक्टूबर और नवंबर, 2012 के दौरान हरिकेन तूफ़ान का उदाहरण सामने है. तब शहर के सबवे और सुरंग सब पानी से भर गए थे, जिसके चलते शहर की बिजली काट दी गई थी. इस तूफ़ान के आने के चलते 50 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी.
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मानव जैसे दिखने वाले रोबोट बनाने का ट्रेंड बढ़ा है क्या ये भविष्य के लिए संभावित ख़तरा नहीं हैं?

Date : 29-Jul-2019
बीते कुछ वक़्त में मानव जैसे दिखने वाले रोबोट बनाने का ट्रेंड बढ़ा है लेकिन क्या इस तरह की मानव जैसी नज़र आने वाली मशीनों को बनाना डरावना नहीं? क्या ये भविष्य के लिए संभावित ख़तरा नहीं हैं? हालांकि, आइज़ैक ऐसिमोव के रोबोट्स पर आधारित उपन्यास, 1980 के दशक की फ़िल्म का किरदार जॉनी 5, हॉलीवुड की फ़िल्म एवेंजर्सः द एज ऑफ़ अलट्रॉन और चैनल 4 की साइंस-फिक्शन ड्रामा फ़िल्म ह्यूमन्स.में रोबोट्स को मानव के बेहद क़रीब दिखाया गया है. इन फ़िल्मों में रोबोट्स के बच्चे हैं, ऐसे प्राणी हैं जो भावनाओं को और मानव जैसी चेतना को समझ सकते हैं. लेकिन ये कितना सच है और इसकी कितनी ज़रूरत है? डॉ. बेन गोएर्टज़ेल ने एक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस सॉफ़्टवेयर तैयार किया है. इसके आधार पर सोफ़िया नाम के एक रोबोट को तैयार किया गया है जो मानव सदृश रोबोट है. इसे हॉन्गकॉन्ग स्थित कंपनी हैनसन रोबोटिक्स ने बनाया है. उनका कहना है कि रोबोट्स को इंसानों की तरह दिखना चाहिए ताकि रोबोट्स को लेकर इंसान के मन में जो संदेह हैं वो दूर हों. आने वाले वक़्त में इंसानों जैसे रोबोट होंगे क्योंकि लोग उन्हें पसंद करते हैं. उनके मुताबिक़, अगर मानव जैसे दिखने वाले रोबोट होंगे तो लोग उन्हें आदेश दे सकेंगे और अपनी गर्लफ्रेंड के बारे में उनसे बात कर सकेंगे. मुझे लगता है कि सॉफ़्टबैंक के पेपर रोबोट देखने में बहुत ही बुरे होते हैं. जबकि सोफ़िया आपकी आंखों में देखेगी और ये आपकी तरह के चेहरे भी बना सकेगी. यह बिल्कुल अलग अनुभव होगा, बजाय पेपर रोबोट की छाती पर लगे मॉनिटर पर देखने के. फिलहाल 20 नए सोफ़िया रोबोट बनाए जा चुके हैं और इनमें से छह रोबोट पूरी दुनियाभर में इस्तेमाल हो रहे हैं. इन रोबोट्स का इस्तेमाल भाषण देने और तकनीकी का प्रशिक्षण देने के लिए किया जा रहा है. बहुत सी कंपनियों ने अपने ग्राहकों को लुभाने के लिए सोफ़िया का इस्तेमाल करने के उद्देश्य से हैनसन रोबोटिक्स से संपर्क किया है लेकिन एक बात जो बहुत स्पष्ट है कि वो चाहे सोफ़िया हो या फिर पेपर रोबोट जैसे मानवीय रोबोट, अभी भी इनका निर्माण बहुत महंगा है और ख़ुद डॉ. गोएर्टज़ेल भी इस बात से इनकार नहीं करते हैं. हालांकि उनकी इस बात से बहुत से रोबोटिस्ट असहमति जताते हैं. क्या विद्रोही हो सकते हैं रोबोट? इंट्यूशन रोबोटिक्स के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. स्क्युलर रोबोट के मनुष्य की तरह दिखने और बोलने की बात को सिरे से ख़ारिज करते हैं. वो इसे लेकर विरोध रखते हैं. उनकी कंपनी एलिक्यू नाम के आकार में छोटे सामाजिक रोबोट बनाती है जिसका उद्देश्य बुजुर्गों के अकेलेपन को दूर करना है. यह रोबोट बात कर सकता है और सवालों के जवाब दे सकता है. वो कहते है कि जो लोग एलिक्यू का इस्तेमाल करते हैं उन्हें ये याद दिलाना पड़ता है कि यह एक मशीन है कोई सच का इंसान नहीं और ऐसा करना वाकई तक़लीफदेह होता है. वह अनकेनी वैली के प्रभाव को लेकर चिंता ज़ाहिर करते हैं. रोबोटिस्ट मसाहिरो मोरी का विचार है कि रोबोट्स जितने ज़्यादा मनुष्य के क़रीब होते जाएंगे उतना ही अधिक हमें उनसे डरना होगा और उतना अधिक वे विद्रोही भी होते जाएंगे. उनका मानना है कि नैतिक तौर पर रोबोट्स से इंसान की तरह होने की उम्मीद करना ग़लत है. रोबोट को होंगे कानूनी अधिकार? इंसान को एक वक़्त पर निश्चत तौर पर एहसास होगा कि ये रोबोट हैं, असली में कुछ नहीं औऱ फिर वे ख़ुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे. वो कहते हैं आपको बेवकूफ़ बनाने और जो आपको चाहिए वो आपको देने में मैं कोई संबंध नहीं देखता हूं. एलिक्यू बहुत ही प्यारा है और यह एक दोस्त है. अपने शोध के आधार पर हम यह तो कह सकते हैं कि यह एक सकारात्मक आत्मीयता दे सकता है और अकेलेपन को दूर कर सकता है और वो भी इंसान होने का नाटक किए बग़ैर. कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के रोबोटिक्स इंस्टीट्यूट के एक शोध प्रोफ़ेसर डॉ. रीड सिमन्स भी इस पर सहमति जताते हैं. हम में से बहुत से लोग मानते हैं कि एक रोबोट के लिए इतना ही बहुत है कि वो आंखें झपका सके और उसमें कुछ ख़ासियत हों. बजाय इसके की वो एकदम मानव जैसे व्यवहार करे. मैं इस बात का प्रबल समर्थक हूं कि हमें अनकेनी वैली जैसी स्थिति से दूर रहने की ज़रूर है क्योंकि इससे कई तरह की उम्मीदों का जन्म होगा जिसे तकनीकी किसी भी सूरत में पूरा नहीं कर सकेगी. सिंगुलैरिटीनेट वो प्लेटफ़ॉर्म है जहां डेवलेपर्स आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एप्स तैयार कर सकते हैं. जिनका इस्तेमाल सोफ़िया जैसे रोबोट्स में किया जाता है. इसकी स्थापना करने वाले डॉ. गोएर्टज़ेल का मानना है कि वक़्त के साथ रोबोट्स स्मार्ट होते जाएंगे और अगर इंसानों से ज़्यादा नहीं तो इंसानों जितने तो हो ही जाएंगे. और इसके बाद हम मानव जैसे नज़र आने वाले जितने ज़्यादा रोबोट्स अपने चारों तरफ़ देखेंगे उतनी ही जल्दी हम इसके अभ्यस्त हो जाएंगे. वो कहते हैं कई बार ऐसा भी होता है कि लोग इंसानों की तुलना में मशीनों से ज़्यादा सहज हो जाते हैं. लेकिन क्या हम आने वाले समय में कभी उस स्तर तक पहुंच पाएंगे जहां रोबोट्स में चेतना होगी, पसंद-नापसंद की आज़ादी होगी और उन्हें भी क़ानूनी अधिकार होंगे? डॉ. गोएर्टज़ेल के मुताबिक़, "मुझे लगता है कि अगर रोबोट्स भी इंसानों जितने समझदार हो गए तो उनके पास चेतना भी होगी. चाहिए दयावान रोबोट आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है लेकिन ये सोच अब भी बहुत व्यापक नहीं है. वो कहते हैं कि कुछ पांच पहले तक आर्टिफ़िशियल जनरल इंटेलिजेंस पर बहुत कम रिसर्च होती थी लेकिन अब इसे लेकर गंभीरता बढ़ी है और गूगल जैसी बड़ी कंपनियां इस ओर देख रही हैं. हमें इंसानों से ज़्यादा दयालु रोबोट्स की ज़रूरत है. लेकिन बहुत से रोबोटिक्स और कंप्यूटर साइंटिस्ट्स उनकी इस बात से असहमति रखते हैं. डॉ. स्क्युलर कहते हैं कि यह संभव नहीं है. भावना एक विशिष्ट मानवीय गुण है और यह पूरी तरह जीवित लोगों के लक्षण हैं. वो कहते हैं नैतिकता और मूल्यों को आंकड़ों के आधार पर सेट नहीं किया जा सकता है. यह उन भावनाओं और नैतिकताओं से जुड़ा हुआ है जिनके साथ हम बड़े होते हैं. लेकिन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से ये मानव की तरह व्यवहार करना सीख सकते हैं और ये समझा जा सकता है कि कैसे प्रतिक्रिया देनी है. इंट्यूशन रोबोटिक्स, टोयोटा रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है जिसके तहत कार के लिए एक डिजीटल साथी बनाया जा सके. इसका मक़सद लोगों को कार में सुरक्षित रखना है. इंसान के दिमाग की नकल मुश्किल ब्लैक मिरर के हालिया अंक में मायली सायरस एक ऐसी पॉप सिंगर की भूमिका में हैं जिसने अपनी पूरी पहचान एक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस सिस्टम में डाउनलोड की है ताकि एशले टू नाम की छोटी रोबोट गुड़िया बनाई जा सके. विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की चीज़ें हमेशा से कल्पना में ही रहेंगी. डॉ. सिमन्स कहते हैं मैं कहूंगा कि किसी इंसान के लिए अपने दिमाग़ और व्यक्तित्व को रोबोट में डाउनलोड करना संभव नहीं है. हम किसी इंसान के दिमाग को कॉपी करने से अभी बहुत दूर हैं. हालांकि डॉ. गोएर्टज़ेल ज़ोर देकर कहते हैं कि जब 1920 के दशक में निकोला टेस्ला ने रोबोट का विचार दिया तो किसी ने भी उस पर यक़ीन नहीं किया था लेकिन अब जो है वो सबके सामने है. कई बार चीज़ें मानवीय सोच से परे होती हैं.
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फील्ड मार्शल की उपाधि अब तक केवल दो लोगों को मिली है- फील्ड मार्शल के. एम.करियप्पा और फील्ड मार्शल सैम मोनक शॉ को।

Date : 28-Jul-2019
जानें इंडिया आर्मी की वो रोचक बातें, जो इसके अधिकारियों को बनाती है खास देश की सुरक्षा के लिए भारतीय सेना हमेशा तत्पर रहती है। फील्ड मार्शल से लेकर जेनरल या सेना प्रमुख, लेफ्टिनेंट जेनरल, मेजर जेनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल, लेफ्टिनेंट कर्नल, मेजर, कैप्टन, लेफ्टिनेंट सबकी एक अलग भूमिका है। इन सभी के लिए क्या कार्यकाल निश्चित है   1. अब तक किसको मिली है फील्ड मार्शल (अवैनिक पद) की उपाधि? -फील्ड मार्शल की उपाधि अब तक केवल दो लोगों को मिली है- फील्ड मार्शल के. एम.करियप्पा और फील्ड मार्शल सैम मोनक शॉ को। 2. लेफ्टिनेंट जेनरल बैज की पहचान क्या है?  - डंडा क्रॉस और तलवार के ऊपर राष्ट्रीय चिंह का निशान मौजूद है। इनका कार्यकाल 60 वर्ष तक होता है।  
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अगर हाई-टेक निगरानी की परिपाटी बन जाए तो ऐसा लगेगा चौबीसों घंटे हम जेल मे है

Date : 25-Jul-2019
हायर और फ़ायर वाली गिग इकॉनमी तेज़ी से पैर पसार रही है. एक अनुमान के मुताबिक़ अमरीका में 5.7 करोड़ लोग और ब्रिटेन में 11 लाख लोग अल्पकालिक नौकरियां कर रहे हैं. इसमें और तेज़ी आने वाली है. 2035 तक हममें से ज़्यादातर लोग लंबी अवधि के क़रार के बिना नौकरियां कर रहे होंगे और इंटरनेट से जुड़े अरबों उपकरणों (IoT) के ज़रिये हमारी हर हरकत पर नज़र रहेगी. भविष्य की चुनौतियों और अवसरों को रेखांकित करने वाली रॉयल सोसाइटी ऑफ़ आर्ट्स, मैन्युफ़ैक्चरर्स एंड कॉमर्स (आरएसए) की एक रिपोर्ट में इसका ख़ाका खींचा गया है, लेकिन यह पहले से ही हक़ीक़त बन रही है. एक ऑनलाइन रिटेलर की पूर्व कर्मचारी सारा मैकिंटोश कहती हैं, शिफ्ट शुरू होने और ख़त्म होने के समय मुझे (सॉफ्टवेयर में) लॉग इन करना पड़ता था और हर ब्रेक के बारे में बताना पड़ता था, यहां तक कि टॉयलेट जाने के बारे में भी. वे गिनेंगे कि मैंने उनके सिस्टम पर कितना काम किया, फिर मेरे काम के घंटे से ब्रेक निकालकर उसमें भाग देंगे और देखेंगे कि मैंने दिन का टारगेट पूरा किया है या नहीं. ट्रेडस यूनियन कांग्रेस (टीयूसी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ब्रिटेन के 56% श्रमिकों को लगता है कि काम पर उनकी जासूसी होती है. उनके इंटरनेट इस्तेमाल, कीस्ट्रोक्स और वेब कैमरे की निगरानी होती है. पहनने योग्य उपकरणों और चेहरे पहचानने की तकनीक का इस्तेमाल करके उनके लोकेशन और पहचान की जांच की जाती है. ट्रेड्स यूनियन कांग्रेस की रिपोर्ट में एक कंस्ट्रक्शन मज़दूर का उदाहरण दिया गया है, जिसे अंगूठा लगाने के बाद काम मिला है. उसके साथ कोई क़रार नहीं हुआ. किसी प्रक्रिया में समय नहीं लगा, लेकिन यह उसकी निजता का उल्लंघन है. रॉयल सोसाइटी की रिपोर्ट में 2035 तक चार स्थितियों की कल्पना की गई है. इनमें से एक को सटीक अर्थव्यवस्था कहा गया है. लेखकों ने 2035 इसलिए चुना क्योंकि यह लोगों की कल्पना में थोड़ा दूर लगता है, लेकिन यह समय इतना पास भी है कि इसकी संभावनाओं के बारे में आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है. RSA में अर्थव्यवस्था के निदेशक असीम सिंह कहते हैं, 2035 परिचित सा होगा, लेकिन अलग होगा. उनका कहना है कि रिपोर्ट के चार परिदृश्य इसलिए डिजाइन किए गए हैं ताकि यह देखा जा सके कि भविष्य किधर जा सकता है. सटीक अर्थव्यवस्था का परिदृश्य होने की संभावना अन्य तीन परिदृश्यों से अधिक नहीं है, लेकिन यह सबसे ज़्यादा परेशान करने वाला है. सटीक अर्थव्यवस्था परिदृश्य में कंपनियां सेंसरों से जुटाए गए रियल-टाइम डेटा का इस्तेमाल संसाधनों के कुशल आवंटन में कर सकेंगी. स्वास्थ्य और खुदरा क्षेत्र में 2035 तक गिग इकॉनमी पैटर्न सामान्य बात हो जाएगी, ऐसे में कंपनियां मांग के हिसाब से श्रम रणनीतियां बना सकेंगी. इसके अलावा सेंसर्स के विस्तार से वे कर्मचारियों की हर गतिविधि का विश्लेषण भी कर सकेंगी. खुदरा क्षेत्र की दुकानों में सेंसर्स से ग्राहकों की संख्या के बारे में सूचना इकट्ठा की जाएगी. पहने जा सकने वाले उपकरणों से स्टाफ़ की हरकतों पर नज़र रखी जा सकेगी. डेटा के आधार पर कर्मचारियों को स्टार रेटिंग दी जाएगी और मैनेजर उनका इस्तेमाल कर्मचारियों को पुरस्कृत करने या दंडित करने में कर सकेंगे. सिंह का कहना है कि टाइमशीट और निगरानी उपकरणों के ज़रिये गोदामों और कॉल सेंटरों में काम करने वाले लोगों पर नज़र रखने का काम शुरू हो चुका है. बेथिया स्टोन एक पीआर एजेंसी में काम करती हैं. वहां टाइमशीट सॉफ्टवेयर के सहारे हर 15 मिनट, 30 मिनट और एक घंटे के ब्लॉक का लॉग तैयार किया जाता है. इसका नतीजा यह हुआ है कि कर्मचारी पहले से ज़्यादा ओवरटाइम करने लगे हैं और माहौल चिंताजनक और तनावपूर्ण हो गया है. स्टोन ने छात्र रहते हुए भी इस निगरानी का अनुभव किया था जब वह एक सुपरमार्केट में काम करती थी. मुझे हर मिनट एक निश्चित संख्या में चीज़ों को स्कैन पड़ता था. यदि वह संख्या घट जाए तो अंडर परफॉर्मेंस माना जाता था और अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती थी. सिंह का कहना है कि इस तरह की निगरानी बढ़ती जा रही है. नौकरियां घट रही हैं और श्रमिक एक अस्थायी काम से दूसरे अस्थायी काम में जा रहे हैं. नियोक्ता उनसे और अधिक की उम्मीद कर रहे हैं. यह सिर्फ़ काम के घंटे का मामला नहीं है. यह निजता, ख़ुशी, स्वायत्तता और मशीनीकृत दुनिया में ख़ुद को इंसान के रूप में महसूस करने के सामने चुनौती है. कुछ कर्मचारी ख़ुश हैं रिपोर्ट के मुताबिक़, निगरानी की इस व्यवस्था को उन श्रमिकों का समर्थन भी मिल सकता है जिनको लगता है कि इससे कामचोर सहकर्मियों पर लगाम लगेगी, प्रदर्शन के आधार पर उनको ज़्यादा भुगतान किया जाएगा और उनके लिए आगे बढ़ने के नये मौक़े खुलेंगे. सिंह कहते हैं, इस अर्थव्यवस्था का चरम लक्ष्य 1984 उपन्यास के परिदृश्य से मेल खाता है जिसमें एक ऐसी दुनिया की बात है जहां काम की दुनिया, राजनीतिक और सामाजिक दुनिया एक दूसरे से जुड़े हैं और पूरी तरह नियंत्रित हैं. उनको लगता है कि अगर हम अनुमति देते हैं तो तकनीक इस प्रक्रिया की रफ़्तार बढ़ा सकती है. गिग इकॉनमी की डिजाइन नियोक्ताओं को मांग के आधार पर कर्मचारियों को समायोजित करने की आज़ादी देती है. श्रमिक अल्प अवधि में अपनी पसंद का काम चुन सकते हैं. सैद्धांतिक तौर पर सुनने में यह भले ही अच्छा लगे, लेकिन इसके नुक़सान भी हैं. एबरडीन यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर कीथ बेंडर का कहना है कि कंपनियां अपने कर्मचारियों की निष्ठा खो देती हैं. दूसरी नौकरी नहीं होने पर श्रमिकों को शून्य घंटे के क़रार करने को मजबूर किया जाता है जिसमें नौकरी की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती. रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़िलहाल शून्य-घंटे के अनुबंधों में ख़राब भुगतान किया जाता है, लेकिन भविष्य में विशेष प्लेटफॉर्म तैयार होंगे. गिग इकॉनमी में ध्रुवीकरण होगा. ऊंची रेटिंग वाले लोगों को उनकी पसंद के काम मिलेंगे, जबकि दूसरे निराश-हताश श्रमिकों को हतोत्साहित करने वाले कामों में झोंक दिया जाएगा. मांग वाले श्रमिकों- जैसे नर्स या डॉक्टर- को फ़ायदा होगा क्योंकि वे असामान्य घंटों में काम के ज़्यादा पैसे ले सकेंगे. नियोक्ता की लगातार निगरानी में अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए कुछ श्रमिक दिमाग़ी क्षमता बढ़ाने वाली दवाइयां भी ले सकते हैं. युवा श्रमिकों के लिए आगे बढ़ना और करियर की सीढ़ी पर तेज़ी से चढ़ना आसान होगा, लेकिन ऐसा पुराने और कम लचीले सहकर्मियों की क़ीमत पर होगा. बेंडर पूछते हैं कि क्या बूढ़े लोग हार जाएंगे. वह कहते हैं, रुढ़िवादी सोच तो यही है कि पुरानी पीढ़ी तकनीक और नई पीढ़ी के साथ नहीं चल पाएगी. लेकिन एक तर्क यह भी है कि नये लोग निजता को पिछली पीढ़ी जितनी अहमियत नहीं देते, इसलिए वे भी जोखिम में रहेंगे. बूढ़े हों या जवान, बेंडर मानते हैं कि अधिक संपन्न लोग अस्थायी कार्य स्थितियों में अपने हितों का बचाव कर पाएंगे क्योंकि उनके पास अधिक नक़दी है. सिंह इससे सहमत हैं. उनका कहना है कि हम निगरानी असमानता की दोहरी प्रणाली का भी जोखिम उठा रहे हैं. जिनके पास साधन हैं वे बेहतर स्थितियों की मांग कर सकते हैं, लेकिन जिनके पास साधन नहीं हैं वे पीड़ित होंगे. इस प्रकार संभावना यह है कि कई श्रमिक कम भुगतान वाली नौकरियों के लिए लड़ने के लिए छोड़ दिए जाएंगे. बेंडर कहते हैं, अगर हम व्यापक हो गिग इकॉनमी की जड़ तक जाएं तो हमें मौलिक रूप से पुनर्विचार करना होगा. उदाहरण के लिए, नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) और सेहत की देखरेख करने वाली दूसरी एजेंसियों के पास लोगों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं सुलझाने के लिए ज़्यादा संसाधन होने की संभावना होगी, क्योंकि रोज़गार की सुरक्षा नहीं होना तनावपूर्ण होगा. पीआर कर्मचारी स्टोन कहती हैं कि हालांकि किसी ने भी उनके काम के घंटे को लेकर उनकी आलोचना नहीं की, लेकिन वह जानती हैं कि उनकी निगरानी की जा रही है. यही तनावपूर्ण है. दिमाग़ में यह चलता रहता है कि आपके सीनियर यह न सोचें कि आप कम काम कर रहे हैं. निगरानी से दफ़्तरों में भरोसा भी टूटता है. सेल्स टीम की एडमिन सहायक कार्ली थॉम्पसेट ने जो ईमेल और संदेश अपने सहकर्मी को भेजे, उसे उनके नियोक्ता ने भी पढ़ लिए. वह कहती हैं, इससे हमारे और मैनेजरों के संबंध बिगड़ गए क्योंकि हमें लगा कि हमसे बच्चों की तरह सलूक किया जा रहा था. ऑफ़लाइन निगरानी भी जारी रही. यदि हम खड़े होते या एक-दूसरे से बातें कर रहे होते तो हम पर हमेशा नज़र रखी जाती थी. ऐसा लगता था जैसे हम जेल में हों. थियोडोसिउ कहते हैं, इस तरह की निगरानी का एक ऑर्वेलियन (मुक्त समाज विरोधी) पहलू है क्योंकि कर्मचारियों की हर गतिविधि की निगरानी और उसका विश्लेषण हो सकता है. उन पर कर्मचारियों का नियंत्रण नहीं होता और वे नहीं जानते कि उनकी सूचनाएं नियोक्ता किस तरह मनमाने ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं. वह चेतावनी देते हैं कि लगातार निगरानी के कारण कर्मचारी दफ़्तर से अपने जीवन के किसी भी पहलू को नियंत्रित करना बंद कर देंगे, जिससे तनाव बढ़ने का ख़तरा रहेगा. इस तरह की कार्यस्थितियां से कर्मचारियों का मानसिक और शारीरिक दोनों नुक़सान होगा. रॉयल एकेडमी ऑफ़ इंजीनियरिंग की वाइस प्रेसिडेंट नाओमी क्लाइमर कहती हैं, वैसे तो कर्मचारियों की निगरानी के पक्ष में भी कुछ सकारात्मक तर्क दिए जाते हैं, जैसे सुरक्षा और अच्छे प्रदर्शन की पहचान, लेकिन यह अक्सर इस तरह लागू किया जाता है जिससे यह कर्मचारियों की स्वायत्तता और गरिमा को कम करता है और तनाव बढ़ाता है. गिग इकॉनमी को पहले से ही ग़रीबों को और क़मजोर करने का दोषी ठहराया जाता है. अत्यधिक निगरानी की तकनीक आ जाने से आख़िरी नतीजा सरकारों, श्रम संगठनों और संघों पर निर्भर करेगा कि वे जोखिम में पड़े लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए कैसा नियामक ढांचा तैयार करते हैं. सिंह का कहना है कि हमें नये सामाजिक अनुबंधों या 21वीं सदी के सुरक्षा तंत्र की ज़रूरत है, जो सभी को समृद्ध करने और आगे बढाने में सहायक हो. कल्याणकारी योजनाओं को और बड़ा और साहसिक बनाना होगा, जितना 7 दशक पहले (ब्रिटिश सुधारक) विलियम बेवरिज ने कल्याणकारी राज्य बनाते समय सोचा था. वैसा ही जैसे 1984 में विंस्टन स्मिथ बिग ब्रदर से लड़ते हैं. लीड्स यूनिवर्सिटी बिज़नेस स्कूल में अर्थशास्त्र के प्रमुख डेविड स्पेंसर का मानना है कि अत्यधिक निगरानी का विरोध होगा और इसका प्रभाव सीमित रह जाएगा. आख़िर में, हमारे पास विकल्प होगा कि तकनीक का विकास कैसे हो. सिंह कुछ उदाहरण देते हैं. हर नियोक्ताओं को सामूहिक रूप से यह कहना चाहते हैं कि गोदाम के कर्मचारियों को टैग करना ठीक नहीं है. हमें ज़ोर देकर कहना चाहिए कि निगरानी के इस युग में मानव अधिकार क़ानून पर फिर से विचार करना चाहिए. हमें यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि हमारी आवाज़ सुनी जाए. हमें स्वचालन और मशीनी अक़्ल पर विचार-विमर्श के लिए मंच चाहिए. हमें ख़राब परिपाटियों पर चर्चा करके उनको दूर करने की ज़रूरत है और सरकार और व्यापार को अपने साथ लाने की आवश्यकता है. आज़ादी का मतलब ग़ुलामी नहीं है. हम बिग ब्रदर को सब कुछ देखने से रोक सकते हैं, अगर हम सतर्क रहें.
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सोना हो, पढ़ना हो या कभी ऐसे ही शांति से बैठे रहना हो तो पहली जगह, बिस्तर ही याद आती है

Date : 21-Jul-2019
दिनभर की थकान अपने बिस्तर पर जाकर ही दूर होती है. सोना हो, पढ़ना हो या कभी ऐसे ही शांति से बैठे रहना हो तो पहली जगह, बिस्तर ही याद आती है. लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है कि जिस बिस्तर पर सोकर आप अपनी सारी थकान दूर करते हैं उसका इतिहास क्या रहा है? वो आया कहां से? इतिहासकार ग्रेग जेनर का कहना है कि बिस्तर के अस्तित्व का सबसे पहला प्रमाण 77 हज़ार साल पहले पाषाण काल में मिलता है. दक्षिण अफ्ऱीका की गुफाओं में लोग अपने हाथ से बने बिस्तरों पर सोते थे. वो बिस्तर चट्टान के बने होते थे. ग्रेग कहते हैं, गुफाएं बहुत आरामदायक नहीं थी और वहां तरह-तरह के कीड़े होते थे. ऐसे में फ़र्श से थोड़ा ऊपर उठकर सोना पड़ता था. ग्रेग बताते हैं कि उस समय के लोग खाना भी बिस्तर पर ही खाते थे जिसके बाद वो बिस्तर चिकना हो जाता था. इसलिए फिर वो उनमें आग लगा देते थे. पुरात्तवविदों को राख की कई ऐसी जली हुई परते मिली हैं जो इस बात का प्रमाण देती हैं. ग्रेग बताते हैं, 10 हज़ार साल पहले नव-पाषाण काल में तुर्की के आधुनिक दिनों में कैटैलहॉक ऐसा पहला शहर था, जहां सोने के लिए लोग ज़मीन के थोड़ा ऊपर बिस्तर लगाते थे. वहीं, ओर्कनेयस (स्कॉटलैंड) के स्कारा ब्रे नाम के गांव में भी इसी तरह के पत्थर के बने बिस्तर देखे गए हैं. ग्रेग कहते हैं, वहां के निवासी पत्थरों का ढेर लगाकर उससे एक तरह से बिस्तर बना लेते थे जिससे वो उस पर लेट सकें. इस पर कुछ बिछा भी सकते थे. ज़मीन के ऊपर लगाए गए पत्थर के बिस्तर असल में दुनिया के पहला पलंग था. ग्रेग का कहना है, लकड़ी के बने बेड को जानवरों के आकार में बनाया जाता था. बेड के पैरों को जानवरों की तरह बनाने में सुंदर नक्काशी का काम किया जाता था. लेकिन वे आधुनिक बेड की तरह सपाट नहीं थे. वे नीचे की ओर थोड़े से झुके होते थे. साथ ही आप नीचे की ओर फिसले नहीं, इसके लिए बेड के निचले सिर पर एक आड़ बनी होती थी. पश्चिम देशों के साथ-साथ चीन के कुछ हिस्सों में भी उठे हुए बेड को ऊंचे दर्जे से जोड़कर देखा जाता था. लेकिन, जापान में ऐसा नही था. वहां आज भी पारंपरिक टेटामी बिस्तर लोकप्रिय हैं और लोग ज़मीन पर बिस्तर लगाकर सोते हैं. ग्रेग के मुताबिक़, कज़ाकिस्तान में आज भी ज़मीन पर बिस्तर लगाने की परंपरा है. वो एक तरह से गद्दे इस्तेमाल करते हैं जिन्हें तशक कहा जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पारंपरिक तौर पर यहां के लोग खानाबदोश रहे हैं और उन्हें अपना टैंट व बेड साथ लेकर घूमना पड़ता है. ये परंपरा आज भी बनी हुई है.
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बुजुर्ग लुक में नजर आए सेलेब्स के लिए बुरी खबर, सुरक्षित नहीं Face App

Date : 18-Jul-2019
दुनिया भर में फ़ेसऐप की धूम मची है. इस ऐप के ज़रिए लोग अपने बुढ़ापे की संभावित तस्वीर देख रहे हैं. सोशल मीडिया पर फ़ेसऐप की तस्वीरें अंधाधुंध पोस्ट की जा रही हैं. यह ऐप किसी भी व्यक्ति की तस्वीर को कृत्रिम तरीक़े से बुज़ुर्ग चेहरे में तब्दील कर देता है. लेकिन आपको अपने बुढ़ापे की तस्वीर जितनी रोमांचित कर रही है उसके अपने ख़तरे भी हैं. यह रूसी ऐप है. जब आप ऐप को फ़ोटो बदलने के लिए भेजते हैं तो यह फ़ेसऐप सर्वर तक जाता है. फ़ेसऐप यूज़र्स की तस्वीर को चुनकर अपलोड करता है. इसमें बदलाव कृत्रिम इंटेलिजेंस के ज़रिए किया जाता है. इसमें सर्वर का इस्तेमाल होता है और ऐप के ज़रिए ही आपको फ़ोटो खींचना होता है. दरअसल, उस ऐप को केवल आप एक फ़ोटो ही नहीं दे रहे हैं बल्कि बहुत कुछ दे रहे होते हैं. आपकी इस तस्वीर का उस वक़्त तो लगता है कि निजी इस्तेमाल हो रहा है लेकिन बाद में इसका सार्वजनिक इस्तेमाल भी किया जा सकता है.यह ऐप आपके फ़ोन से सूचनाओं को हासिल कर सकता है और बाद में इन सूचनाओं का विज्ञापन में इस्तेमाल किया जा सकता है. संभव है कि यह ऐप आपकी आदतों और रुचियों का समझने की कोशिश कर रहा है ताकि विज्ञापन में इस्तेमाल किया जा सके. इसे मार्केटिंग के हथियार के तौर पर भी देखा जा रहा है. कई लोग इस बात की चिंता भी जता रहे हैं कि यह ऐप आपके फ़ोन की सारी तस्वीरों तक पहुंच सकता है. कई लोगों ने यह भी दावा किया है कि ऐप खोलते ही इंटरनेट पर सारी तस्वीरें अपलोड होने लगीं. हालांकि आईओएस और आईफ़ोन में यह विकल्प आता है कि किन तस्वीरों को हैंडओवर करना चाह रहे हैं और किन तस्वीरों को नहीं. फ़ेसऐप को लेकर अमरीकी सीनेट में भी चिंता जताई गई है. सीनेट में अल्पसंख्यक नेता चक शुमर ने फ़ेसऐप की जांच की मांग की है. ट्विटर पर पोस्ट किए पत्र में शुमर ने लिखा है, यह बहुत ही चिंताजनक है. अमरीकी नागरिकों के निजी डेटा विदेशी ताक़तें हासिल कर रही हैं. इन चिंताओं को फ़ेसऐप ने सिरे से ख़ारिज कर दिया है. यह ऐप सेंट पीटर्सबर्ग स्थित कंपनी वायरलेस लैब की है. इस कंपनी का कहना है कि लोगों की तस्वीरें स्थायी रूप से स्टोर नहीं की जा रही हैं और न ही पर्सनल डेटा में सेंधमारी की जा रही है. कंपनी का कहना है कि यूजर्स जिन तस्वीरों को चुन रहे हैं उन्हीं की एडिटिंग की जा रही है. शुमर ने इस ऐप की जांच एफ़बीआई और फ़ेडरल ट्रेड कमिशन से कराने की मांग की है. शुमर ने अपने पत्र में लिखा है, मैं अमरीकी नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा और उसमें सेंधमारी की आशंका को लेकर चिंतित हूं. कई लोग इस बात से अनजान हैं कि इसके ख़तरे क्या हैं. शुमर ने जांच की मांग तब की है जब डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी ने कथित रूप से 2020 के अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में ऐप के इस्तेमाल को लेकर चेतावनी दी है.सुरक्षा अधिकारी बॉब लॉर्ड ने कथित रूप से अपने स्टाफ़ से कहा है कि निजता पर कितना संकट है इसे लेकर स्थिति बहुत साफ़ नहीं है लेकिन यह साफ़ है कि इसे इस्तेमाल नहीं करने का फ़ायदा ही है. कंपनी का कहना है कि अभी उसके आठ करोड़ यूजर्स हैं. 2017 में फ़ेसऐप काफ़ी विवाद में आ गया था जब उसके एक फीचर में यूजर्स की नस्ल को एडिट करने की सुविधा थी. इसकी आलोचना शुरू हुई तो बाद में कंपनी ने माफ़ी मांग ली और उस फीचर को वापस ले लिया था. नई डिवाइस अलग अलग भाषाओं के लोगों को आपक में बात करने में मदद करती है. फ़ेसऐप कोई नया नहीं है. एथनिसिटी फिल्टर्स को लेकर दो साल पहले यह विवाद में आया था. इसमें एक नस्ल से दूसरे नस्ल में चेहरा बदलने का टूल था. हालांकि फ़्रेंच साइबर सिक्यॉरिटी के एक रिसर्चर का कहना है कि फ़ेसऐप केवल वही तस्वीर लेता है जो यूज़र्स सबमिट करते हैं.
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295 तलाबों का शहर दरभंगा पानी के लिए तरस रहा है

Date : 18-Jul-2019
दरभंगा(बिहार) 18 जुलाई। बीते चार महीनों से जिस जल संकट के चलते दरभंगा और आसपास के जिले के लोगों का जन जीवन अस्त व्यस्त हो रखा था, वह संकट अब दूर हो चुका है. बूंद बूंद पानी को तरस रहे लोगों के सामने अब बाढ़ की चुनौती सामने है. लेकिन महज एक सप्ताह पहले दरभंगा भीषण जल संकट के दौर से गुजर रहा था. बीते चार महीनों से दरभंगा के लोग पानी के लिए तरस रहे थे. इस दौरान आम चुनाव की सरगर्मियां भी देखने को मिलीं, लेकिन दरभंगा में पानी की किल्लत कोई चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया. चुनाव किसी उत्सव की भांति ही हुआ और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार गोपाल ठाकुर एक बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब रहे. शहर में उनके चुनावी प्रचार का केंद्र रहा दरभंगा का वीआईपी माना जाने वाला बलभद्रपुर. इसी बलभद्रपुर में एक चापाकल के पास भरी दोपहरिया में पानी के लिए कुछ लोग जमा थे, इसकी वजह यह थी कि यह इंडियन मार्का चापाकल था और उसमें पानी आ रहा था. कैमरे और माइक को देखती हुई कई महिलाएं भी घरों से बाहर निकल आईं और बताने लगीं कि पानी के लिए तरस रहे हैं और काम चलाने जितने पानी के लिए उन्हें घंटों टैंकरों के सामने संघर्ष करना पड़ रहा है. यह दरभंगा के शहरी हिस्से के करीब हर कोने की तस्वीर थी. इसकी सबसे बड़ी वजह इलाके में भूजल के स्तर का अचानक से गिर जाना था. जून महीने में दरभंगा के शहरी इलाकों में करीब 75 फीसदी घरों के चपाकल पानी नहीं दे रहे थे. कुछ चपाकलों में सुबह सुबह पानी जरूर रहा करता था जो दिन चढ़ने के साथ ही सूखने लगता था. दरभंगा के लहेरियासराय स्टेशन के समीप बहादुरपुर मोहल्ले के मदन मोहन बताते हैं, "पांच सौ घरों के बीच एक ही चापाकल काम कर रहा है. पानी की विकट समस्या है. यह चापाकल भी जिला प्रशासन की ओर खुदवाया गया इंडियन मार्का चापाकल है और एक चपाकल से आस पास के करीब पांच सौ परिवारों का गुजारा जैसे तैसे हो पाया. दरभंगा नगर निगम के मुताबिक इंडियन मार्का -2 के करीब 720 चापाकल दरभंग के शहरी इलाकों में लगाए गए हैं. ऐसे एक चापाकल लगाने में सरकार करीब 50 हज़ार रुपये ख़र्च कर रही है. जाहिर है दरभंगा शहर की तीन लाख आबादी के लिए इतने चापाकल पूरे नहीं हैं और पूरे जिले की आबादी तो 35 लाख से ज्यादा है. ग्रामीण इलाकों में भी पानी का संकट ऐसा ही था, हालांकि बारिश और आस पड़ोस में आयी बाढ़ के बाद स्थिति में काफी सुधार हुआ है. लेकिन इस सुधार से पहले सैकड़ों की संख्या में लोगों ने अपने अपने घरों पर समरसबिल पंप लगवाने पड़े. समरसबिल पंप लगाने के लिए तीन सौ फीट से ज्यादा की खुदाई करना पड़ता है और इस पंप को लगाने का औसत ख़र्च भी करीब एक लाख रुपये बैठता है. बलभद्रपुर के निवासी वसीम अहमद काजमी बताते हैं, हमारे चापाकल में पानी आ नहीं रहा था और टैंकरों के सामने घंटो खड़े रहना पड़ता था. आख़िरकार जैसे तैसे पैसों का इंतजाम करके 90 हज़ार रुपये में समरसिबल पंप लगवाया है, तब राहत मिली है. दरभंगा के मशहूर कुशेश्वरस्थान में है घर है हृदय नारायण चौधरी का. चौधरी गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उनके काका (पिता के भाई) गिरीश्वर चौधरी बिहार के इकलौते ऐसे शख्स थे जो गांधी के दांडी यात्रा में उनके साथ चले थे. हृदय नारायण चौधरी दरभंगा और आसपास के जिलों में नदियों को बचाने का अभियान चला रहे हैं. वे बताते हैं, हमारे यहां तो 30 फीट नीचे कुओं में पानी मिल जाता था. नदी तलाबों में हम नहा लेते थे. आज स्थिति ये हो गई कि पत्नी एक दिन टैंकर से पानी लाते हुए गिर गई तो कर्जा लेकर समरसिबल पंप गड़वाया है. 80 हज़ार रुपये का ख़र्चा आया है. समरसिबल पंप एक तरफ तो सुविधासंपन्न लोग लगा रहे हैं, लेकिन इससे नुकसान आस पड़ोस में रह रहे गरीबों को उठाना पड़ रहा है. समरसिबल पंप लगाए जाने के बाद आस पास के घरों के चापाकल का पानी आना बंद हो जाता है वैसे तो दरभंगा में जल संकट मार्च के बाद से ही गहराने लगा था. इसकी सबसे बड़ी वजह पिछले साल बारिश में हुई कमी मानी जा रही है. पिछले साल यानी 2018 में दरभंगा में औसत से 40-45 फीसदी कम बारिश हुई थी. लेकिन लोगों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले दिनों में पानी का संकट इतना बढ़ जाएगा. दरभंगा के जिला विकास आयुक्त कारी प्रसाद महतो कहते हैं, दरभंगा में जल संकट की तीन प्रमुख वजहें हैं- बीते कुछ सालों से लगातार वर्षा कम हो रही है, हमारे जल स्रोत भी तेजी से सूखते जा रहे हैं, कहीं उसको भर लिया गया है तो कई जगहों पर उसका अतिक्रमण किया जा रहा है. इसके अलावा घरों में भी इस्तेमाल होने वाला पानी नालियों में बहकर बर्बाद हो रहा है, वह जमीन के नीचे तक नहीं पहुंचता है. दरभंगा नगर निगम आयुक्त रवींद्रनाथ बताते हैं, दरभंगा में बारिश के जल संचयन को लेकर जागरूकता का नितांत अभाव है, सरकार 2014 के बाद से कोशिश कर रही है कि रेन हार्वेस्टिंग की दिशा में प्रगति हो लेकिन वह नहीं हो रही है. इत्तेफाक़ यह है कि जिले के जिलाधिकारी त्यागराजन एसएम भी इसी दौरान जिले में पदस्थापित हुए हैं. कह सकते हैं कि उनके लिए स्थिति सिर मुंडाते ही ओले पड़ने जैसी है, लेकिन 34 साल के त्यागराजन समस्या की गंभीरता को युद्धस्तर पर निपटने की कोशिश की. उन्होंने ज्यादा संकट झेल रहे इलाकों में टैंकर और नल के जरिए पानी भेजने के लिए एक कंट्रोल रूम बनाकर उसकी खुद ही मानिटरिंग शुरू की. उनकी इस कोशिश की तारीफ़ ज़िले के आम लोग खूब कर रहे हैं. त्यागराजन इससे पहले राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालांदा में नल जल योजना को सुचारू रूप से संचालित कर चुके हैं, लिहाजा उन्होंने इस काम को यहां भी युद्ध स्तर पर कराने की कोशिश की है, हालांकि अब उनके सामने जिले के अलग अलग हिस्सों में होने वाले जल जमाव को हटाने की भी हो गई है. यह भी संयोग है कि राज्य के जल संसाधन मंत्रालय का ज़िम्मा दरभंगा क्षेत्र से ही आने वाले जनता दल यूनाइटेड के नेता संजय झा के जिम्मे है. वे अपने इलाके में पानी के संकट को लोगों की आदतों से जोड़कर भी देखते हैं. वे कहते हैं, किसने सोचा होगा कि हमेशा पानी से लबालब रहने वाले दरभंगा में लोग पानी के लिए तरसेंगे. हम लोगों ने मनमाने ढंग से पानी को बर्बाद किया है, अब हमें उसको सही ढंग से इस्तेमाल का तरीका सीखना होगा. त्यागराजन यह मानते हैं कि मौजूदा समस्या का स्थायी हल भूजल का स्तर बढ़ाना ही है और इसके लिए कोशिश की जा रही है. उन्होंने बताया कि कई जगहों पर तलाब और नहर की खुदाई की जा रही है. इसके तहत अहिल्याबाई तलाब का जीर्णोद्वार कराया गया है. त्यागराजन के मुताबिक, ज़िले में 217 तलाब हैं, जिनकी नापी कराई जा रही है, 26 तलाबों का अब तक नापी कराई गई है, इनमें पांच तलाबों में अतिक्रमण पाया है और अतिक्रमण करने वालों को नोटिस भेजा गया है. ऐतिहासिक तौर पर दरभंगा तलाबों, नदियों और नालों का शहर रहा है. पश्चिम में बागमती और पूर्व और उत्तर में कमला नदी के बीच में बसा है दरभंगा शहर, जिसके शहर के तौर पर स्थापित होने का प्रमाण 1150 ईस्वी में मिलता है. तिरहुत के राजा गंगदेव सिंह के समय में इस शहर के निर्माण हुआ था. पौराणिक रूप से त्रेता युग में राम के मिथिला यात्रा में दरभंगा में उनके रात्रि विश्राम करने का उल्लेख भी मिलता है. लेकिन 12वीं सदी से लेकर 19वीं सदी तक बागमती और कमला नदी के बीचों बीच बसा दरभंगा, बिहार का एक प्रमुख राजनीतिक केंद्र बना रहा. मिथिलांचल के इलाके को अगर भू विज्ञान की नजर से देखें तो यह हिस्सा ऐसा है जहां हिमालय से उतरने वाली कई नदियां सीधे उतरती है और फिर मैदान हिस्सों में सरपट भागती हुई आगे बढ़ती हैं. ऐसे तिरहुत का यह इलाका डूबने और तैरने वाले लोगों का समाज था, जो नदियों के साथ रहने और जीने की कला सीख चुका था. मौजूदा समय में उत्तर बिहार में आई बाढ़ को जिस तरह से आपदा बताया जा रहा है, वह यह भी बताता है कि हमारे योजनाकारों का स्वभाव, प्रकृति के नियमों को बदलने में ज्यादा विश्वास रखने वाला हो गया है. एक समय था जब इस जिले में 15 से भी ज्यादा नदियां बहा करती थीं. इन नदियों के नाम थे- जीबछ, बकिया, जमबाड़ी, नून, कदाना, व्या, खिरौदी, लकंडी, करेह, धमड़ा, जमुनी, कमला, बलान, बागमती, गंडक, कोसी, गंगा, कल्याणी, परावना, तिलयुगा. इन नामों को देखें तो इनमें किसी के नाम में दुख या पीड़ा का बोध होने वाला पर्यायवाची शब्द नहीं मिलेगा. आज जिन नदियों को आपदा के तौर पर देखा जाता है उन्हें प्राचीन समाज आभूषणों के तौर पर देखता रहा था. दरअसल, उत्तर बिहार की नदियां हिमालय से उतरते समय इधर-उधर सीदी बहने के बदले आड़ी-तिरछी गोल आकार में क्षेत्र को बांधती हुई चलती हैं, गांवों को लपेटती है और उन गांवों का आभूषणों से श्रृंगार किया करती है. प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहा करते थे कि उत्तरी बिहार के गांव नदियों के आभूषणों से ऐसे सजे हुए हैं कि बिना पैर धोए आप इन गांवों में प्रवेश नहीं कर सकते. खिरौदी नामक नदी का नामकरण ही क्षीर अर्थात दूध से हुआ है यानी इस नदी का पानी इतना साफ़ था. लेकिन अब ये नदियां आपको दरभंगा में दिखाई नहीं देती हैं, क्योंकि बाढ़ की आशंका के चलते दरभंगा से पहले ही नदियों के पानी को रोक दिया गया है. कमला और बागमती की नदियों के पानी को भी बाढ़ की आशंका के चलते दरभंगा से पहले बांध के जरिए रोक दिया गया है, जिसके चलते इन नदियों के जल दरभंगा में निकलने वाले दूसरे चौर, आहर, पाइन जैसे परंपरागत स्रोत भी सूख गए हैं जिसका असर भूजल स्तर पर पड़ा है. दरभंगा में हर कस्बे में एक तलाब हुआ करता था. लेकिन इसकी संख्या लगातार कम होती गई. जिले में तालाब बचाओ अभियान समिति चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता नारायण चौधरी बताते हैं, ज़िला गजेटियर 1964 के मुताबिक ज़िले में 350 से 400 तलाबों का जिक्र है. 300 से इनकी संख्या कम होते होते कागजों में 200 तक रह गई है, जबकि हकीकत में ज़िले में 100 तलाब ही रह गए हैं राज्य के जल संसाधन मंत्री संजय झा, बहुत सारे तलाब को भर लिया गया है, एक-एक गांव में 10-15 तलाब थे. लेकिन अब वे कम होते जा रहे हैं जो हैं उनकी देखभाल नहीं हो रही है. बेहद डरावनी स्थिति है. हालांकि दरभंगा के जिलाधिकारी एम त्यागराजन बताते हैं कि जिला प्रशासन के पास 217 तलाबों के रिकॉर्ड मौजूद हैं. हर तलाब की मापी हो रही है और अतिक्रमण करने वालों को हम लगातार नोटिस भेज रहे हैं, कार्रवाई कर रहे हैं. हालांकि ऐसा कर पाने के लिए राज्य प्रशासन कितनी इच्छाशक्ति दिखाती है, ये सवाल बना हुआ है. तलाब भरने की एक समस्या की ओर इशारा करते हुए नारायण चौधरी बताते हैं, असल में है क्या कि दरभंगा में ट्रेड कामर्स है नहीं, इंडस्ट्री है नहीं. ऐसे में भ्रष्ट नौकरशाह और नेता आपस में मिलकर एक तलाब भर लेते हैं और यह चार-पांच करोड़ का बिजनेस हो जाता है, सबमें पैसा बंट जाता है. ऐसा भी नहीं है कि दरभंगा के तलाबों को लेकर एकदम चुप्पी व्याप्त रही है, पिछले कुछ सालों में कुछ तलाबों को भर लिए जाने के मामले स्थानीय तौर पर सुर्खियां भी बटोरते रहे हैं, लोगों की हत्याएं तक हो चुकी हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में कुछ होता नहीं है. तलाबों का अतिक्रमण और उसको भरा जाना ही एकलौता संकट नहीं है, जो तलाब मौजूद हैं, उनकी उड़ाही भी सालों से नहीं हो सकी है. जिसके चलते तलाब का तल, कूड़ा कचरा तलछट आदि से जम चुका है. जिसके चलते तलाबों का पानी भी सड़ने लगा है. ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विद्यानाथ झा बताते हैं, तलाबों के पानी सड़ने से तलाबों के जीवों का जीवन भी नष्ट होता जा रहा है. एक समय दरभंगा में अलग अलग तरह के एक सौ से ज्यादा प्रजाति की मछलियां पाई जाती थीं. आज दरभंगा के तलाबों में इतना प्रदूषण है कि मछलियां मर जाती है. यह संकट अकेले दरभंगा का भी नहीं है. बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 1990 की शुरुआत तक बिहार में 2,50,000 तलाब हुआ करते थे लेकिन इनमें अब महज 93,000 तलाब बचे हैं. उधर जुलाई महीने के पहले सप्ताह में सूखा एवं जल संकट के समाधान के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि प्रदेश के सभी तलाबों और कुओं के अतिक्रमण मुक्त कराने का निर्देश दिया है. उन्होंने कहा कि पताल से भी खोजकर निकाल लेंगे सारे तलाब. लेकिन पटना से लेकर दरभंगा तक जिन तलाबों पर अवैध निर्माण की विशाल इमारतें खड़ी हो चुकी हैं, उन तलाबों को कैसे निकाल पाएगी सरकार, ये सवाल बना हुआ है. दरभंगा के तलाबों पर कब्जे के कई मामलों में ज़िले में राजनतीति की संलिप्ता भी बताई जाती है. दरभंगा शहरी क्षेत्र के विधायक संजय सरावगी कहते हैं, दरअसल यह प्रशासन की इच्छाशक्ति का मामला है, अगर प्रशासन सख्ती बरते तो तलाबों का अतिक्रमण नहीं हो सकता है. हमलोग विधायिका में हैं, यह अतिक्रमण रोकना प्रशासन का काम है, हम लोगों ने तलाबों के अतिक्रमण की बात को विधानसभा में भी उठाया है.हम प्रशासन का हर संभव सहयोग करने को भी तैयार हैं. वहीं दरभंगा के बहादुरपुर विधानसभा से राष्ट्रीय जनता दल के विधायक भोला प्रसाद यादव कहते हैं, सरकार में जो लोग हैं उनकी संलिप्ता की बदौलत कई तलाबों को भर कर लोगों ने घर बना लिया. तलाब आवासीय भूखंड के तौर पर विकसित हो गए. राज्य सरकार ने इसपर कोई सख्ती से ध्यान नहीं दिया. लोग मनमाने ढंग से तलाबों का अतिक्रमण कर रहे हैं दरभंगा और आसपास के लिए यह संकट भले नया हो लेकिन बिहार के पटना-गया-नालंदा जैसे जिलों में भी पानी का संकट बीते कई सालों से गर्मी के महीनों में गहराता रहा है. इसी को ध्यान में रखते हुए बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पिछले दिनों अपने सात निश्चय कार्यक्रम में हर घर को पीने के लिए नल का पानी मुहैया कराने की योजना बनाई है. राज्य के जल संसाधन मंत्री संजय झा कहते हैं, जल नल योजना नहीं होती तो दरभंगा में और भी भयानक स्थिति हो जाती है. लोगों की आधी जान इस योजना के चलते ही बची है. बिहार के नौ सौ गांवों तक नल जल योजना पहुंच चुकी है. इस नल जल योजना के शुरुआत की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. राज्य सरकार ने इस योजना का पायलट चरण पटना से सटे पाली इलाके में किया था. इस योजना की शुरुआत जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि यह प्रयोग पाली गांव में पहले पहल 150 घरों तक पानी पहुंचाने के लिए किया गया और तीन चार दिन के बाद स्थिति यह थी कि वहां के लोगों की प्रतिक्रिया थी- नल जल से बेहतर अपना चापाकल. हालांकि सरकार ने अपनी योजना जारी रखी और आज यह योजना राज्य के अलग अलग हिस्सों में शुरू हो चुकी है. दरभंगा में इस जल संकट के दौरान ही इस योजना को लागू किया गया है. लेकिन कम समय को देखते हुए अभी बस्तियों के सामने तक ही नल लगा है, जहां पर पानी के लिए लोगों की भीड़ जमा हो जाती है क्योंकि पानी सुबह और शाम निर्धारित घंटों के लिए ही आता है. दरभंगा के जिला विकास आयुक्त कारी प्रसाद महतो बताते हैं, जल नल योजना को ठीक ढंग से लागू करने के लिए हमें हर घर तक पाइप पहुंचानी होगी, प्रशिक्षित प्लंबरों की कमी के चलते इस काम को तेज रफ्तार से करना संभव नहीं है. हालांकि जिन इलाकों में भूजल की स्थिति पहले से ही खराब रही हो, उन इलाकों में नल के जरिए जल पहुंचाने का विचार अच्छा हो सकता है लेकिन दरभंगा जैसे जिलों में इस योजना को लागू करने का विरोध भी शुरू हो गया है. दरभंगा के बहादुरपुर के विधायक भोला प्रसाद यादव कहते हैं, यह पूरी तरह से फेल योजना है. यह पैसे का जबर्दस्त लूट है. डीप बोरिंग के चलते पानी तो है लेकिन उसका पाइप लाइन ठीक नहीं है, ठीक ढंग से कनेक्शन नहीं है, पानी आता है तो पूरा का पूरा सड़क पर बह जाता है. इससे बेहद कम पैसे में इंडियन मार्का चापाकल लगाया जा सकता है, लेकिन सरकार का ध्यान समस्या ख़त्म करने पर नहीं है. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे डब्ल्यू कलाम के सहयोगी और तेजस को विकसित करने वाले वैज्ञानिक टीम में शामिल रहे मानस बिहारी वर्मा दरभंगा में ही रहते हैं. वे बताते हैं कि राज्य सरकार की नल जल योजना एक्सपर्ट और विभिन्न साझेदारों की सलाह के बिना आनन फानन में तैयार की गई थी. यह भी जाहिर होता है कि सरकार इस योजना को आनन फानन में लागू भी कर रही है. वैसे नल के जरिए पीने का पानी पहुंचाने से लोगों को सुविधाएं जरूर मिलती हैं, लेकिन यह समस्या कोई स्थायी समाधान नहीं है. चर्चित पुस्तक जल-थल-मल के लेखक और पर्यावरण से जुड़े मसलों पर गंभीरता से काम करने वाले पत्रकार सोपान जोशी बताते हैं, हमारे देश की जलवायु बाकी दुनिया से अलग है, हमारा देश-समाज-इतिहास सब-का-सब चौमासे से बना है, यानी मॉनसून से. हमारी जल व्यवस्था अपने मिट्टी-पानी के स्वभाव से बनी थी. हर कोई बारिश के पानी को संजो के ज़मीन में रोकने के जतन करता था. गुलामी के 200 साल में इन पुराने तरीकों को तोड़ के पानी की लूट पर आधारित एक नयी व्यवस्था खड़ी की गयी. वर्ल्ड बैंक के निर्देशों पर मानवीय सूचकांकों का हवाला देकर सरकारें नल जल योजना को लागू करने पर जोर देती रहती हैं और भारत के तमाम महानगरों में यह व्यवस्था दिखाई देती है. लेकिन इसके योजनाकार ये बात भूल जाते हैं कि शहरों में बड़े बड़े पाइपों के जरिए ग्रामीण इलाकों से पानी खींचकर लाया जाता है और फिर उसे घर-घर तक पहुंचाया जाता है. दिल्ली में जहां पीने का पानी यमुना के जरिए लाया जा रहा है वहीं इसके एनसीआर रीजनल में गंगा का पानी खींचकर लाया जा रहा है. लेकिन जब यह सिलसिला छोटे शहरों और कस्बों में अपनाया जाना लगा, तो सबसे बड़ी समस्या ये उत्पन्न होगी कि उन हिस्सों के लिए पानी किन लोगों के हक को मारकर लाया जाएगा. इतना ही नहीं, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर में पानी की उपलब्धता और उसके उपयोग को राशनिंग करना, पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे के बड़े खेल का हिस्सा भर है. यह माना जाता है कि नल के जरिए जल आने पर एक तो प्रत्येक घर को इसके लिए कीमत देनी होगी. और आगे चलकर पानी की उपलब्धता कुछ लीटर और कुछ घंटे तक सीमित कर दिया जाएगा. यानी जल जैसे प्राकृतिक संसाधन का मामूली हिस्से पर आम लोग निर्भर बनाए जाएंगे जबकि वहीं दूसरी ओर बोतलबंद पानी का कारोबार करने वाले कारपोरेट समूह जमीन के नीचे के पानी का अंधाधुंध दोहन करते रहेंगे. सोपान जोशी इस मुद्दे पर कहते हैं, आज़ादी के बाद हमारे पढ़े-लिखे समाज और उसकी राजनीति ने पानी की इसी लूट को आदर्श मान लिया, इसे विकास का नाम दे दिया. हमारी सरकारें इस विकास के बोरवेल से हमारे समाज के पानी का दोहन कर रही हैं. हर राजनीतिक दल लूटे हुए पानी को बाँट के वोट बटोरना चाहता है. इसमें हर तरह के राजनीतिक नारे भी खप जाते हैं.अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय व्यापार भी इस लूट से मुनाफ़ा कमाने के लिए तैयार हैं. इस लूट की मानसिकता में राष्ट्रीयता से कोई अंतर नहीं पड़ता, राष्ट्रवाद से भी नहीं. जमीन के नीचे के पानी पर प्रभुत्व की इस लड़ाई से दरभंगा के आम लोगों को बहुत ज्यादा मतलब नहीं है. क्योंकि उन्हें तो पीने के पानी की चिंता ज्यादा है, जिसका सामना वे पहली बार कर रहे हैं. दरभंगा के लहेरियासराय स्टेशन के समीप बहादुरपर मोहल्ले की महिलाओं को टैंकर से पानी लेने के लिए रोजाना तीन से चार घंटे तक संघर्ष करना पड़ रहा था, ऐसे में ज्यादातर महिलाएं चाहती है कि जल्दी से घर घर तक नल लग जाए ताकि पानी के लिए बेहद मुश्किल नहीं हो. एक महिला का कहना था, कितना समय बर्बाद करें अगर घर घर तक नल पहुंच जाए तो बहुत अच्छा हो जाएगा. पानी के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. लेकिन नल जल योजना के लिए पानी कहां से आएगा, यह पूछे जाने पर वह कोई जवाब नहीं देती हैं, कहती हैं पहले सरकार तक हमारी बात तो पहुंचाइए. लेकिन असली सवाल यही है कि जल नल योजना से क्या बिहार में जल संकट का स्थायी हल है. संजय झा भरोसा जताते हैं कि उनकी सरकार बिहार में जल संरक्षण को लेकर काफी गंभीर है और आने वाले दिनों इसको लेकर एक व्यापक नीति बनाने पर काम कर रही है. हालांकि बरसात शुरू होने के बाद जल संकट की समस्या कम होती जाएगी, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार जल संरक्षण को लेकर किस तरह का प्रावधान लेकर आती है और अपने नदी और तलाब के जल स्तर को बनाए रखने के लिए कितनी गंभीर कोशिश करती है. नरायण चौधरी बताते हैं, दरभंगा में इस साल पानी का जो संकट देखने को मिला है वह 15 साल से लगातार दस्तक दे रही चुनौती के बाद आया है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बिहार सरकार इन सालों में कभी तलाब और नदियों को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम नहीं कर रही है. नरायण चौधरी कहते हैं, हमने अपने तलाबों और नदियों की हत्या कर दी है, अगर हम उनको पुनर्जीवित नहीं करेंगे तो कोई भी हल जल संकट की समस्या का निदान नहीं हो सकता. सोपान जोशी कहते हैं, कोई सरकार पानी पर कुछ समझदारी से काम करना चाहती है, तो सबसे पहले वह ईमानदारी से इसका आकलन करेगी कि सरकारी योजनाओं ने पानी की लूट और बर्बादी को कैसा बढ़ावा दिया है. इसके बाद यह बात हो कि पहले की गलतियों को सुधारने के व्यवहारिक तरीके क्या हो सकते हैं. ऐसा होता है, तो कुछ नया-ताज़ा होने की उम्मीद जगेगी. वर्ना किसी नये नाम से, किसी नयी योजना के माध्यम से पानी की लूट के और नये तरीके निकल आएँगे. दरभंगा से आने वाले फिल्मकार और सामाजिक कार्यकर्ता रवि पटवा पिछले कुछ महीनों से दरभंगा को ग्रीन सिटी बनाने के लिए जल संरक्षण अभियान चला रहे हैं. रवि पटवा कहते हैं, मिथिला की धरती पर कम से कम दो लाख पेड़ लगाने की योजना है हमलोगों की है. इससे जिले में जल संकट को दूर करने में मदद मिलेगी. हालांकि अपने इस अभियान में रवि पटवा जून महीने तक केवल 670 पेड़ ही लगा पाए हैं और उनके अभियान को एक लंबा रास्ता तय करना है. लेकिन ऐसे लोगों के चलते दरभंगा में जल और पर्यावरण को लेकर जागरूकता का स्तर निश्चित तौर पर बढ़ रहा है. हालांकि पिछले एक सप्ताह के बाद बारिश के बाद दरभंगा के आम चापाकलों में पानी आने लगा है और दरभंगा शहर में जगह जगह जल जमाव भी हो चुका है. पीने का पानी का संकट पूरी तरह भले दूर नहीं हुआ है लेकिन आम लोगों के सामने अब घर से बाहर निकलने का संकट पैदा हो गया है, जाहिर है जल जमाव और जल निकासी के लिए भी जिला प्रशासन के पास कोई व्यवस्था नहीं है. दरभंगा शहरी क्षेत्र के विधायक संजय सारावगी बताते हैं, दरभंगा में आज तक सीवर सिस्टम नहीं बन पाया है. क्योंकि इस काम के लिए 450 करोड़ रुपये का अनुमानित बजट है. इतनी बड़ी धनराशि सरकार के पास नहीं है. अकेला विधायक कहां से पैसा दे सकता है. लेकिन हम लोग लगे हुए हैं. पहले तो नाली और गड्ढे थे, वह अब नहीं हैं. हक़ीकत में, नदियों और तलाबों के रहने से हर साल आने वाली बाढ़ों का असर भी कम होता है और गर्मी के दिनों में पानी का संकट भी नहीं होता है इस बुनियादी बात को दरभंगा के लोग, अधिकारी और नेता जब तक नहीं समझेंगे तब तक दरभंगा एक त्रासदी से दूसरी त्रासदी की ओर भागते हुए लोगों का शहर बना रहेगा.
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