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विधवा मां के लिए एक योग्य वर चाहिए

Date : 13-Nov-2019
मुझे अपनी विधवा मां डोला अधिकारी के लिए एक योग्य वर चाहिए. मैं रोज़गार के सिलसिले में ज़्यादातर समय घर से बाहर रहता हूं. ऐसे में मेरी मां घर में अकेली पड़ जाती हैं. मुझे लगता है कि एकाकी जीवन गुजारने की बजाय सबको बेहतर तरीके से जीने का अधिकार है." पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले में फ्रेंच कॉलोनी रहा चंदननगर अक्सर जगद्धात्री पूजा और बिजली के कारीगरों की वजह से सुर्खियों में रहता है. लेकिन इस बार वो इलाके के एक युवक गौरव अधिकारी के फ़ेसबुक पर लिखे इस पोस्ट के कारण सुर्खियों में है. इसी महीने आस्था नामक एक युवती ने भी अपनी मां के लिए 50 साल के एक सुंदर व्यक्ति की तलाश में एक ट्वीट किया था. वो ट्वीट काफी वायरल हुआ था. आस्था ने कहा था कि वह अपनी मां के लिए जो आदमी तलाश रही हैं उसे जीवन में काफी स्थापित और शाकाहारी होना चाहिए. इसके अलावा वो शराब नहीं पीता हो पांच साल पहले गौरव के पिता का निधन हो गया था. उसके बाद उनकी 45 वर्षीया मां घर में अकेले ही रहती हैं. लेकिन आखिर उन्होंने फ़ेसबुक पर ऐसी पोस्ट क्यों लिखी? गौरव बताते हैं, मेरे पिता कुल्टी में नौकरी करते थे. वर्ष 2014 में उनके निधन के बाद मां अकेले पड़ गई हैं. मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान हूं. मैं सुबह सात बजे ही नौकरी पर निकल जाता हूं और लौटने में रात हो जाती है. पूरे दिन मां अकेले ही रहती हैं. मुझे महसूस हुआ कि हर आदमी को साथी या मित्र की जरूरत है. क्या आपने इस पोस्ट को लिखने से पहले अपनी मां से बात की थी? गौरव ने बताया, मैंने मां से बात की थी. मां मेरे बारे में सोच रही हैं. लेकिन मुझे भी उनके बारे में सोचना है. एक संतान के तौर पर मैं चाहता हूं कि मां के जीवन के बाकी दिन बेहतर तरीके से गुजरें. क्या लिखा था गौरव ने? गौरव ने आखिर अपने फेसबुक पोस्ट में क्या लिखा है? उन्होंने लिखा है, मेरी मां डोला अधिकारी हैं. मेरे पिता का निधन पांच साल पहले हो गया था. नौकरी की वजह से मैं अधिकतर घर से बाहर रहता हूं. इससे मां अकेली पड़ जाती हैं. मेरी मां को किताबें पढ़ना और गाने सुनना पसंद हैं. लेकिन मैं अपनी मां के लिए एक साथी चाहता हूं. मुझे लगता है कि पुस्तकें और गीत कभी किसी साथी की जगह नहीं ले सकते. एकाकी जीवन गुजारने की बजाय बेहतर तरीके से जीना ज़रूरी है. मैं आने वाले दिनों में और व्यस्त हो जाऊंगा. शादी होगी, घर-परिवार होगा. लेकिन मेरी मां? हमलोगों को रुपये-पैसे, जमीन या संपत्ति का कोई लालच नहीं हैं. लेकिन भावी वर को आत्मनिर्भर होना होगा. उसे मेरी मां को ठीक से रखना होगा. मां की खुशी में ही मेरी खुशी है. इसके लिए हो सकता है कि कई लोग मेरी खिल्ली उड़ाएं या किसी को लग सकता है कि मेरा दिमाग ख़राब हो गया है. ऐसे लोग मुझ पर हंस सकते हैं. लेकिन उससे मेरा फैसला नहीं बदलेगा. मैं अपनी मां को एक नया जीवन देना चाहता हूं. चाहता हूं कि उनको एक नया साथी और मित्र मिले. उनकी इस पोस्ट पर कैसी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं? गौरव बताते हैं, इस पोस्ट के बाद कई लोगों ने फोन कर विवाह की इच्छा जताई है. इनमें डाक्टर और मैरीन इंजीनियर से लेकर शिक्षक तक शामिल हैं. उनमें से किसी योग्य पात्र को तलाश कर मां का दूसरा विवाह कराना ही फिलहाल मेरा प्रमुख लक्ष्य है. लेकिन क्या समाज के लोग इस पोस्ट के लिए आपका मजाक नहीं उड़ा रहे हैं? गौरव का कहना है कि "पीठ पीछे तो लोग लाख तरह की बातें करते हैं. लेकिन अब तक सामने किसी ने कुछ नहीं कहा है. वह कहते हैं, मैंने महज प्रचार पाने के लिए यह पोस्ट नहीं लिखी है. बहुत से युवक-युवतियां मेरी तरह अपने मां-बाप के बारे में जरूर सोचते होंगे. लेकिन समाज के डर से वह लोग आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते." गौरव को उम्मीद है कि उनकी इस पहल से ऐसे दूसरे लोग भी आगे आएंगे. गौरव जिस बऊबाजार इलाके में रहते हैं उसी मोहल्ले के शुभमय दत्त कहते हैं, "ये एक अच्छी पहल है. कई लोग कम उम्र में ही पति या पत्नी के निधन से अकेले पड़ जाते हैं. रोजी-रोटी की व्यस्तता की वजह से संतान भी उनका वैसा ध्यान नहीं रख पाती. ऐसे में जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत का विचार बुरा नहीं है. एक सामाजिक संगठन मानविक वेलफेयर सोसायटी के सदस्य सोमेन भट्टाचार्य कहते हैं, ये पहल सराहनीय है. लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही. लेकिन अपनी मां के भविष्य के बारे में एक पुत्र की यह चिंता समाज की बदलती मानसिकता का संकेत है.
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सुप्रीम कोर्ट के चार फ़ैसले: भारत में बहुत कुछ बदल सकते हैं

Date : 07-Nov-2019
  भारतीय सुप्रीम कोर्ट अगले कुछ दिनों में कुछ ऐसे अहम फ़ैसले सुनाएगा जिससे देश के मौजूदा हालात में काफ़ी कुछ बदल सकता है. सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं और 18 नवंबर को जस्टिस बोबडे उनकी जगह लेंगे. ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि 17 नवंबर से पहले कुछ बड़े मामलों में फ़ैसला आ जाएगा. इनमें जिस मामले पर फ़ैसले पर सबसे ज़्यादा बेसब्री से इंतज़ार किया जा रहा है वो है अयोध्या का बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद. सुप्रीम कोर्ट जब इस पर फ़ैसला सुनाएगा तो ये निश्चित रूप से ऐतिहासिक होगा. उम्मीद जताई जा रही है कि पांच जजों वाली संवैधानिक बेंच इस मामले पर 4-15 नवंबर के बीच फ़ैसला सुनाएगी. बेंच की अगुवाई सीजेआई रंजन गोगोई कर रहे हैं. उनके अलावा जस्टिस शरद अरविंद बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अब्दुल नज़ीर शामिल हैं. भारत सरकार के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन परासरन का कहना है कि अयोध्या मामला बेहद संवेदनशील है इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद भी बहुत सावधानी बरतनी होगी. परासरन ने कहा, अयोध्या मामला राजनीतिक और धार्मिक, दोनों मायनों में बहुत संवेदनशील है. यह चार दशक से भी पुराना विवाद है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट चाहे जो फ़ैसला सुनाए, सभी समुदायों में शांति का माहौल बनाए रखना होगा. जानी-मानी वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा भी परासरन से सहमति जताती हैं. उन्होंने कहा कि अदालत का फ़ैसला चाहे जो जो, हमें इसका स्वागत करना होगा और किसी भी क़ीमत पर क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभाले रखनी होगी. अयोध्या मामले के अलावा, कुछ दूसरे महत्वपूर्म मामले भी हैं, जिन पर जस्टिस रंजन गोगोई अपने दो हफ़्तों में फ़ैसला सुनाएंगे. इनमें रफ़ाल डील और सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश जैसे मामले शामिल हैं. रफ़ाल सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच रफ़ाल सौदा मामले पर फ़ैसला सुनने वाली है. बेंच में जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ़ हैं. रफ़ाल डील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर, 2018 को दिए अपने फ़ैसले में भारत की केंद्र सरकार को क्लीन चिट दे दी थी. हालांकि इस फ़ैसले की समीक्षा के लिए अदालत में कई याचिकाएं दायर की गईं और 10 मई, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था. फ़्रांस से 36 रफ़ाल फ़ाइटर जेट के भारत के सौदे को चुनौती देने वाली जिन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की, उनमें पूर्व मंत्री अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की याचिकाएं शामिल थीं. सभी याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से उसके पिछले साल के फ़ैसले की समीक्षा करने की अपील की थी. सबरीमला मंदिर अगले दो हफ़्तों में सुप्रीम कोर्ट भारत के दक्षिण भारतीय राज्य केरल स्थित सबरीमला अय्यपा मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर भी अपना आख़िरी फ़ैसला सुनाएगा. वैसे तो सर्वोच्च अदालत ने 28 सितंबर, 2018 को अपने फ़ैसले में सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश का हक़ दिया था. हालांकि इस फ़ैसले की समीक्षा के लिए 60 याचिकाएं फिर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गईं. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली बेंच ने 6 फ़रवरी, 2019 को इन सभी याचिकाओं पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था. इस बेंच की अगुवाई भी जस्टिस रंजन गोगोई ने की. 28 सितंबर 2018 को सीजेआई रंजन गोगोई की अगुवाई में जस्टिस आर. फली नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की बेंच ने सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की इजाज़त दे दी थी. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से नाख़ुश कई संस्थाओं और समूहों ने इसकी समीक्षा के लिए याचिकाएं दायर कीं. फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने वालों में नायर सर्विस सोसायटी (NSS) और मंदिर के तंत्री (पुजारी) भी शामिल हैं. सबरीमला में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर भारत में काफ़ी लंबी-चौड़ी बहस हुई है. मासिक धर्म से गुज़रने वाली महिलाओं को मंदिर में न जाने दिए जाने को महिलावादी और प्रगतिशील संगठनों ने महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का हनन बताया है. वहीं, कई धार्मिक संगठनों की दलील है कि चूंकि अयप्पा ब्रह्मचारी माने जाते हैं, इसलिए 10-50 वर्ष की महिलाओं को उनके मंदिर में जाने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए. मुख्य न्यायाधीश कार्यालय RTI के दायरे में आता है? अगले दो हफ़्तों में सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक बेंच यह फ़ैसला भी सुनाएगी कि क्या भारतीय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई (सूचना के अधिकार) के दायरे में आता है या नहीं. इस संवैधानिक बेंच में जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एनवी रामन्ना, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना हैं. बेंच की अगुवाई जस्टिस गोगोई कर रहे हैं. सूचना अधिकार कार्यकर्ता कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने सीजेआई ऑफ़िस को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए याचिका दायर की थी. सुभाष चंद्र अग्रवाल का पक्ष रखने वाले वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि अदालत में सही लोगों की नियुक्ति के लिए जानकारियां सार्वजनिक करना सबसे अच्छा तरीका है. प्रशांत भूषण ने कहा, सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति और ट्रांसफ़र की प्रक्रिया रहस्यमय होती है. इसके बारे सिर्फ़ मुट्ठी भर लोगों को ही पता होता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फ़ैसलों में पारदर्शिता की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है लेकिन जब अपने यहां पारदर्शिता की बात आती है तो अदालत का रवैया बहुत सकारात्मक नहीं रहता. प्रशांत भूषण ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति से लेकर तबादले जैसे कई ऐसे मुद्दे हैं जिनमें पारदर्शिता की सख़्त जरूरत है और इसके लिए सीजेआई कार्यालय को आरटीआई एक्ट के दायरे में आना होगा.
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ख़ुश और कामयाब होते हैं आत्ममुग्ध लोग

Date : 05-Nov-2019
 05 नवम्बर 2019 कई बार आप सोचते होंगे कि कोई फ़ेसबुक पर अपनी ही डीपी पर लव रिऐक्शन कैसे दे सकता है या सोते-उठते आई लव माइसेल्फ़ लिखकर फ़ोटो कैसे पोस्ट कर सकता है? ये अजीब और झुंझलाहट भरा भले ही लगता हो लेकिन सच तो ये है कि बहुत से लोग ऐसा करते हैं और मुद्दे की बात यह है कि ऐसे लोग अपनी ज़िंदगी में काफ़ी ख़ुश रहते हैं. मनोवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मानना है कि आत्ममुग्ध लोग अजीब तो होते हैं लेकिन वो बाकियों के मुकाबले ज़्यादा ख़ुश रहते हैं. आत्ममुग्ध यानी ख़ुद पर ही मुग्ध या मोहित रहने वाले लोग. अंग्रेज़ी में इन्हें Narcissist कहा जाता है. ये वो लोग होते हैं जो ख़ुद को दूसरों से बेहतर और महान समझने के भ्रम में रहते हैं. आत्ममुग्ध लोग ख़ुद को ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देते हैं और इन्हें दूसरों के आकर्षण का केंद्र बनना पसंद होता है. उत्तरी आयरलैंड की क्वीन्स यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिकों ने Narcissism (आत्ममुग्धता) पर शोध किया जिसमें पता चला कि आत्ममुग्ध लोग आसानी से डिप्रेशन और तनाव के शिकार नहीं होती. अध्ययन में ये भी सामने आया कि आत्ममुग्ध लोगों का रवैया अक्सर दूसरों को परेशान करता है लेकिन वो इसकी परवाह नहीं करते. इस रिसर्च की अगुवाई करने वाले मनोवैज्ञिक डॉक्टर कोस्टास पैपॉजॉर्ज का कहना है कि आत्ममुग्ध होने के अपने फ़ायदे हैं. शोधकर्ता ये समझने की कोशिशों में जुटे हुए हैं कि आधुनिक समाज के हर क्षेत्र में चाहे वो राजनीति हो, सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स या सेलिब्रिटी कल्चर, आत्ममुग्धता बढ़ने का चलन क्यों देखा जा रहा है. ऐसा तब है जब आत्ममुग्धता को सामाजिक तौर पर अच्छा नहीं माना जाता. कम शर्म और कम पछतावा मनोवैज्ञानिक आत्ममुग्ध लोगों को ऐसे व्यक्तियों के रूप में परिभाषित करते हैं जो दंभ भरा रवैया रखते हैं, ख़ुद को दूसरों से बेहतर समझते हैं, ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास से भरे होते हैं, दूसरों का दुख दर्द कम समझते हैं और जिनमें कम शर्म, कम पछतावा होता है. मनोवैज्ञानिक ये समझने की कोशिश भी कर रहे हैं कि इतनी नकारात्मक आदतों के बावजूद आत्ममुग्ध लोग अमूमन फ़ायदे में क्यों रखते हैं. मनोवैज्ञानिक आत्ममुग्धता को इंसानों का स्याह पहलू मानते हैं. ये कुछ-कुछ वैसा ही है जैसी साइकोपैथी (एक तरह का पर्सनैलिटी डिसऑर्डर) सत्ता के करीब पहुंचने में कामयाब हालिया रिसर्च से ये भी पता चला है कि आत्ममुग्ध लोग कार्यक्षेत्र और निजी ज़िंदगी में अपेक्षाकृत ज़्यादा कामयाब होते हैं. आत्ममुग्ध लोगों में एक किस्म की मानसिक मज़बूती होती है जिसकी वजह से वो निराशा से जल्दी उबर जाते हैं. डॉक्टर कोस्टास का मानना है कि अक्सर दूसरों के विचारों और व्यवहार को अपने ख़िलाफ़ मानते हैं. ऐसे लोग कई बार असुरक्षा की भावना से भी घिरे होते हैं. डॉक्टर कोस्टास कहते हैं कि इन सारे नकारात्मक पहलुओं के बावजूद आत्ममुग्ध व्यक्तित्व वाले लोग कई तरह से फ़ायदे में रहते हैं
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आपके व्हाट्सऐप मैसेज पर सरकार की नज़र !

Date : 01-Nov-2019
कई लोगों को लगता है कि इन नए नियमों के ज़रिए अभिव्यक्ति की आज़ादी पर असर पड़ेगा. भारत सरकार ने सोशल मीडिया पर आने वाले मैसेजों पर नज़र रखने की योजना बनाई है. जबसे यह बात सामने आई है तभी से सोशल मीडिया यूजर्स और निजता के क्षेत्र में काम करने वाले कार्यकर्ता इस पर शक़ भरी निगाहों से देख रहे हैं. इतना ही नहीं सोशल मीडिया चलाने वाली कंपनियों को भी इसमें कुछ ना कुछ ग़लत नज़र आ रहा है. टेक्नोलॉजी लेखक प्रशांतो के रॉय सरकार के इस क़दम पर अपने विचार रख रहे हैं. भारत का सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय अगले साल जनवरी से कुछ नए नियम जारी करने जा रहा है. इन नए नियमों की ज़द में वो कंपनियां आएंगी जो लोगों को मैसेज भेजने का मंच प्रदान करती हैं. इन कंपनियों में कई सोशल मीडिया एप्स, वेबसाइट्स और कई ई-कॉमर्स कंपनियां भी शामिल हैं. दरअसल इस फै़सले का मकसद फ़ेक न्यूज़ को रोकना बताया गया है, जिसकी वजह से साल 2017 और 2018 के बीच 40 कई अफ़वाहें फैली और इसके चलते 40 से ज़्यादा लोगों की जान चली गई. फ़ेक न्यूज़ से हिंसा इन फ़ेक न्यूज़ के पीछे ग़लत तथ्य और जानकारियां होती हैं, लोग इन मैसेजों को देखकर गुस्से में आ जाते हैं और कई मौकों पर भीड़ किसी एक शख़्स पर टूट पड़ती है. ये तमाम मैसेजे कुछ ही घंटों में हज़ारों और लाखों मोबाइलों पर फॉरवर्ड किए जाते हैं और इन्हें रोक पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है. साल 2018 के एक मामले में तो एक सरकारी कर्मचारी ही भीड़ की हिंसा के शिकार हो गए थे, उन्हें सरकार ने गांवों में जाकर सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफ़वाहों पर यक़ीन ना करने की घोषणा करने का काम दिया था. पिछले दो साल के भीतर सोशल मीडिया से ग़लत जानकारी फैलने की वजह से भीड़ की हिंसा के 50 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं. इन सोशल मीडिया एप्स में फ़ेसबुक, यूट्यूब, शेयरचैट और स्थानीय भाषाओं में चलने वाली अन्य एप्स शामिल हैं. लेकिन जिस एप्स से सबसे ज़्यादा फ़ेक न्यूज़ फैली वह है व्हाट्सऐप. भारत में व्हाट्सऐप के 40 करोड़ से अधिक यूजर्स हैं. पिछले साल जब अफ़वाहों के चलते भीड़ की हिंसा के कई मामले सामने आए तो सरकार ने व्हाट्सऐप से अपील की कि वह इन ग़लत सूचनाओं को फ़ैलने से रोकने के इंतजाम करे. इसके बाद व्हाट्सऐप ने कई कदम भी उठाए. जिसमें किसी मैसेज को फॉरवर्ड करने की लिमिट तय करना और फॉरवर्ड मैसेज के ऊपर फॉरवर्ड लिखकर बताना शामिल हैं. हालांकि सरकार का मानना है कि व्हाट्सऐप की तरफ से उठाए गए ये क़दम नाकाफ़ी हैं और उन्हें व्हाट्सऐप मैसेजों पर खुद नज़र रखनी होगी, ठीक जैसे चीन अपने देश में करता है. इसके साथ ही सरकार चाहती है कि व्हाट्सऐप किसी मैसेज या वीडियो के ओरिजनल सेंडर का भी पता लगाए और यह जानकारी सरकार को दे. भारत के अटर्नी जनरल ने इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट में कहा, अगर ये सोशल मीडिया कंपनियां जांच एजेंसियों के साथ अपना डेटा को डीक्रिप्ट नहीं कर सकतीं, खासतौर पर तब जबकि वो मामले देशद्रोह, पोर्नोग्राफ़ी या अन्य अपराधों से जुड़ें हों तो इन कंपनियों को भारत में व्यापार करना ही नहीं चाहिए. एक सरकारी अधिकारी ने मुझसे ऑफ़ द रिकार्ड कहा, देखिए, ये सोशल मीडिया कंपनियां हमें रोकने के लिए कोर्ट में भी चली गईं. उन्होंने यह भी बताया कि चीन में ऑनलाइन निगरानी का स्तर बहुत ज़्यादा है. उनका कहना काफ़ी हद तक ठीक भी था क्योंकि चीन में प्रचलित ऐप वीचैट पर कई बार वो शब्द अपने आप ग़ायब हो जाते हैं जिन पर प्रतिबंध लगा हुआ ह व्हाट्सऐप की प्रतिक्रिया व्हाट्सऐप का कहना है कि उन्होंने जो क़दम उठाए हैं वो कारगर साबित हुए हैं. व्हाट्सऐप की एक प्रवक्ता के अनुसार जबसे उन्होंने फॉरवर्ड मैसेज को आगे फॉर्वर्डेड लिखना शुरू किया और उनकी लिमिट तय की तब से फॉर्वर्ड मैसेज में 25 प्रतिशत की कमी आई है. उन्होंने यह भी बताया कि उनकी कंपनी ने एक महीने के भीतर करीब 20 लाख ऐसे अकाउंट्स को बैन किया है जो बल्क में मैसेज भेजते थे, इसके साथ ही कंपनी लोगों को ज़ागरुक करने के लिए कई कार्यक्रम भी चला रही है. इस बीच निजता के क्षेत्र में काम करने वाले कार्यकर्ताओं की असल चिंता इस बात से है कि सरकार किसी मैसेज को ओरिजनल सेंडर को ट्रेस करना चाहती है. सरकार कहती है कि वह फ़ेस मैसेज भेजने वालों को ट्रेस करना चाहती है जबकि कार्यकर्ताओं को डर है कि इसके ज़रिए सरकार उनकी आलोचना करने वालों पर भी निशाना साधेगी. कार्यकर्ताओं की ये चिंताएं बेवजह भी नहीं हैं, हाल फिलहाल में जब कभी किसी ने सरकार के फ़ैसलों की आलोचना की है तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई भी की गई है. फिर चाहे कश्मीर में सरकार के क़दम की आलोचना हो या प्रधानमंत्री को पत्र लिखने वाले लोगों पर देशद्रोह का मामला दर्ज करने की बात हो. व्हाट्सऐप में संपर्क विभाग के ग्लोबल हेड कार्ल वूग ने इसी साल फ़रवरी में दिल्ली में कहा था, 'वो जो चाहते हैं, हम सबकुछ नहीं दे सकते. मतलब पूरा का पूरा इनक्रिप्शन हम नहीं दे सकते. इसके लिए पूरे व्हाट्सऐप के ढांचे को ही बदलना होगा. ऐसा करने पर व्हाट्सऐप वो प्रोडक्ट नहीं रहेगा जो वह अभी है. इसकी बुनियाद ही प्राइवेसी पर टिकी है. ज़रा सोचिए कि आपकी तरफ से भेजे गए हर एक मैसेज को आपके नंबर के साथ कहीं दर्ज किया जाए तो वहां निजता कहां रह जाएगी. नए नियमों का असर कई ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर पड़ेगा साल 2011 से ही भारत के क़ानून ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए काफ़ी सरल रहे हैं. फ़ोन पर दो लोगों के बीच क्या बातचीत हो रही है इसके लिए किसी फ़ोन कंपनी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाता. इसी तरह ई-मेल के ज़रिए किसी भी तरह की जानकारी साझा करने पर कोई ई-मेल कंपनी पर सवाल नहीं उठाता. जब तक कि प्रशासन किसी कंपनी से उनके डेटा साझा करने की मांग नहीं करती तब तक वो किसी भी तरह की क़ानूनी बाधाओं से बचे रहते हैं. लेकिन सरकार अब जो नए नियम लाने जा रही है उससे इन कंपनियों के लिए मुश्किल हालात पैदा होने जा रहे हैं. इतना ही नहीं सरकार ने अपने प्रस्ताव में यह भी लिखा है कि जिस भी प्लेटफ़ॉर्म पर भारत में 50 लाख से ज़्यादा यूजर्स होंगे तो उन्हें भारत में अपना दफ़्तर खोलना होगा. यह क़दम इसलिए है कि अगर कभी कोई समस्या होती है तो स्थानीय तौर पर इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा. व्हट्सएप का कहना है कि उनकी तरफ से उठाए गए कदम काफी कारगर साबित हुए हैं. भारत सरकार की तरफ से प्रस्तावित इन क़ानूनों का प्रभाव सोशल मीडिया के अलावा दूसरे प्लेटफॉर्म पर भी पड़ेगा. उदाहरण के लिए अगर ये नियम-क़ानून लागू हो जाते हैं तो विकीपीडिया भारतियों के लिए अपना एक्सेस बंद कर सकता है. अभी यह भी साफ़ नहीं है कि अगर कुछ मैसेजिंग प्लेटफॉर्म जैसे सिग्नल और टेलीग्राम इन नियमों को नहीं मानते हैं तो उन पर क्या असर पड़ेगा. ऐसा माना जा रहा है कि तब इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को कहा जाएगा कि वो इन मैसेजिंग प्लेटफॉर्म को एक्सेस ही ना दें. एक तरफ जहां निजता के क्षेत्र में काम करने वाले कार्यकर्ता सरकार के इस क़दम को शक़ भरी नज़रों से देख रहे हैं वहीं सार्वजनिक नीतियों से जुड़े प्रोफेशनल्स का मानना है कि सरकार इन प्लेटफॉर्म को बंद करने की जगह उनके लिए नए रास्ते तलाश रही है. एक ग्लोबल टेक्नोलॉजी कंपनी के इंडिया पॉलिसी प्रमुख ने कहा कि सभी नेता, अधिकारी और पुलिस अधिकारी व्हाट्सऐप का इस्तेमाल करते हैं, कोई भी इसे बंद नहीं करना चाहेगा. सरकार सिर्फ़ इस इतना चाहती है कि व्हाट्सऐप इस गंभीर समस्या के प्रति सख़्त क़दम उठाए. हालांकि बाक़ी लोगों की तरह ही वो यह नहीं बता सके कि वो किस तरह के सख़्त क़दमों की बात कर रहे हैं.
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भारत में कुछ लोगों के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहुत ज़्यादा है और कुछ के पास बहुत कम:जस्टिस बोबडे

Date : 30-Oct-2019
नई दिल्ली 30 अक्टूबर । भारतीय सुप्रीम कोर्ट के अगले मुख्य न्यायधीश जस्टिस शरद अरविंद बोबडे ने एक  इंटरव्यू मे कहा है कि भारत में कुछ लोगों के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहुत ज़्यादा है और कुछ के पास बहुत कम. उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस के दो पहलू हैं. जस्टिस बोबडे ने कहा, इस बहस का एक वो पहलू है जहां कुछ लोग सार्वजनिक और सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म्स पर कुछ भी कहकर निकल जाते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती. दूसरा पहलू ये है कि कुछ लोगों को अपनी बात रखने के लिए प्रताड़ित किया जाता है. संवैधानिक अदालतों में महिला जजों की कम संख्या के बारे में पूछने पर जस्टिस बोबडे ने कहा, मैं पूरी कोशिश करूंगा कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों को चुनने में निष्पक्ष रवैया अपनाया जाए लेकिन दिक़्कत है महिला जजों की उपलब्धता. हाई कोर्ट में जज बनने के लिए के लिए कम से कम 45 वर्ष उम्र होनी चाहिए. हम रातोरात महिला जजों की संख्या नहीं बढ़ा सकते. इसके लिए एक तय प्रक्रिया अपनानी होगी. जस्टिस बोबडे भारत के सुप्रीम कोर्ट के 47वें मुख्य न्यायाधीश होंगे. वो 18 नवंबर को शपथ लेंगे.
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मुख्यमंत्री के हाव-भाव हमें ठीक नहीं लगे और न ही हम उनसे मुलाक़ात के बाद संतुष्ट नहीं हैं, माँ कुसुम तिवारी

Date : 22-Oct-2019
लखनऊ 22 अक्टूबर । लखनऊ में हुए कमलेश तिवारी हत्याकांड में पुलिस ने तमाम ऐसे सबूतों के मिलने का दावा किया है जिनसे इस हत्याकांड को अंजाम देने वालों की पहचान हो सके, एसआईटी की टीमें कई राज्यों की पुलिस से भी संपर्क में हैं लेकिन तीन दिन के बाद भी इस मामले में पुलिस कथित तौर पर सिर्फ़ साज़िशकर्ताओं तक ही पहुंच सकी है, हत्या को अंजाम देने वाले अभी भी उसकी पहुंच से दूर हैं. हालांकि राज्य के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि मुख्य अभियुक्तों की गिरफ़्तारी जल्द ही होगी. सोमवार को उन्होंने मीडिया को इस बारे में जानकारी दी, हमारी कई टीमें अलग-अलग जगहों पर लगी हैं और हम हत्या को अंजाम देने वालों के क़रीब तक पहुंच चुके हैं. जल्द ही उनकी गिरफ़्तारी होगी. इस हत्याकांड में मिलने वाले हर सबूत की कड़ी से कड़ी जोड़ने की हम कोशिश में हैं. हर पहलू की जांच की जा रही है. किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. डीजीपी ने बताया, गुजरात एटीएस ने जिन तीन अभियुक्तों को पकड़ा था उन्हें लखनऊ लाकर उनसे पूछताछ की जा रही है. बिजनौर से जिन दो मौलानाओं को गिरफ़्तार किया है, उनसे भी पूछताछ कर रही है. पुलिस के मुताबिक, अब तक इस घटना से जुड़े सीसीटीवी फ़ुटेज, तमंचा, होटल से बरामद भगवा रंग का कुर्ता जैसे तमाम सबूत मिल चुके हैं जिनसे हमलावरों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है. डीजीपी ने बताया कि यूपी पुलिस अन्य राज्यों जैसे - महाराष्ट्र, गुजरात - इत्यादि के संपर्क में भी है. सोमवार को यूपी पुलिस ने कमलेश तिवारी हत्याकांड को अंजाम देने वाले दोनों अभियुक्तों पर ढाई-ढाई लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया है. आपसी रंज़िश का मामला? वहीं कमलेश तिवारी के परिजन बार-बार इस घटना के लिए आपसी रंज़िश के एंगल की ओर इशारा कर रहे हैं. यही नहीं, घटना के दिन लखनऊ के एसएसपी ने भी सबसे पहले आपसी रंज़िश की वजह से ही हत्या की आशंका जताई थी लेकिन उसके बाद से भी पुलिस की जांच कमलेश तिवारी के पांच साल पुराने बयान और उसके बाद उन्हें मिली धमकी के इर्द-गिर्द चल रही है. डीजीपी ओपी सिंह ने पहले कहा था कि इसके पीछे आतंकी साज़िश नहीं है लेकिन अब वो किसी भी संभावना से इनकार नहीं कर रहे हैं. वहीं इस मामले के तार महाराष्ट्र से भी जुड़ते नज़र आ रहे हैं. नागपुर एटीएस ने सोमवार को सैयद आसिम अली को गिरफ्तार किया है. बताया जा रहा है कि कमलेश की हत्या करने के बाद एक शूटर ने आसिम से बात की थी. पुलिस इस हत्याकांड में आसिम की मुख्य भूमिका मान रही है. पुलिस मुरादाबाद, पीलीभीत और शाहजहांपुर में भी अभियुक्तों की तलाशी का अभियान चला रहा ह मुख्यमंत्री से मुलाक़ात इस बीच, रविवार को कमलेश तिवारी के परिवार ने मुख्यमंत्री के बुलावे पर लखनऊ में उनके सरकारी आवास पर मुलाक़ात की. रविवार की इस मुलाक़ात पर परिजनों ने संतुष्टि जताई थी लेकिन अब परिजनों का आरोप है कि उन्हें मुख्यमंत्री से मिलाने के लिए अधिकारी ज़बरन ले गए. कमलेश तिवारी की मां कुसुम तिवारी पत्रकारों से यह बताते हुए बेहद ग़ुस्से में थीं. उनका कहना था, हमारे यहां इस स्थिति में 13 दिन तक घर से बाहर नहीं निकला जाता है. हमने ये कहा था लेकिन अधिकारी लोग ज़बर्दस्ती करते रहे मुख्यमंत्री के यहां जाने की. मुख्यमंत्री के हाव-भाव हमें ठीक नहीं लगे और न ही हम उनसे मुलाक़ात के बाद संतुष्ट नहीं हैं. संतुष्ट रहते तो इतना क्रोध आपको न दिखता. इससे पहले कमलेश तिवारी के बेटे सत्यम तिवारी ने भी पुलिस की जांच से असंतोष जताते हुए एनआईए से इस हत्याकांड की जांच कराने की मांग की थी. कमलेश तिवारी की मां ने भी राज्य पुलिस पर अविश्वास जताते हुए किसी सक्षम एजेंसी से जांच की अपील की है. कमलेश तिवारी की मां शुरू से ही बीजेपी के एक स्थानीय पर कमलेश तिवारी की हत्या का आरोप लगा रही हैं. दिलचस्प बात ये है कि पुलिस ने अभी तक उस बीजेपी नेता से पूछताछ भी नहीं किया है. यूपी पुलिस के एक रिटायर्ड अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, पुलिस को जिस तरीक़े से ताबड़तोड़ सबूत मिल रहे हैं, उनके सामान और कपड़े तक मिल चुके हैं और उनकी लोकेशन भी ट्रेस की जा चुकी है, तो सवाल उठता है अब तक इस घटना को अंजाम देने वाले कैसे बचे हुए हैं? सोशल मीडिया पर पुलिस सख़्त वहीं, कमलेश तिवारी की हत्या के बाद से सोशल मीडिया पर कई तरह की अफ़वाहों को देखते हुए पुलिस ने सख़्ती दिखाई है. सोशल मीडिया पर तथ्यहीन और धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली पोस्ट डालने के आरोप में अब तक करीब दो दर्जन मामले दर्ज किए जा चुके हैं और चार लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है. राज्य के डीजीपी ओपी सिंह ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया पर साजिश रचने वालों के खिलाफ साक्ष्य जुटाकर उनके ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत कार्रवाई की जाएगी. कमलेश तिवारी के पैतृक गांव, सीतापुर ज़िले के महमूदाबाद क़स्बे में लोगों का तांता लगा हुआ है. इसी छोटे से क़स्बे में कमलेश तिवारी का परिवार रहता है. उनके यहां आने-जाने वालों की भीड़ और बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि मामले की सुनवाई को देखते हुए यहां न सिर्फ़ सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दीगई है. सीतापुर में धारा 144 लगा दी गई है और कमलेश तिवारी के घर पर आने-जाने वालों पर गहन निगरानी रखी जा रही है. इस बीच, राजधानी लखनऊ में 18 अक्टूबर को हिंदू समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या ने तीखे तेवरों के लिए चर्चित कई अन्य हिंदू नेताओं को विचलित कर दिया है. अब वे अपनी सुरक्षा को लेकर काफ़ी चिंतित नजर आ रहे हैं. इनमें से कई नेताओं ने बीजेपी के बड़े नेताओं से संपर्क कर सुरक्षा की सिफ़ारिश कराने को कहा है.
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मुझे अपने काम के लिए नोबेल मिला है और उन्हें मेरे काम पर सवाल खड़ा करने से कुछ भी हासिल नहीं होगा,अभिजीत बनर्जी

Date : 20-Oct-2019
नई दिल्ली 20 अक्टूबर । अभिजीत बनर्जी को उनकी पत्नी और अर्थशास्त्री एस्टर डुफ़लो के साथ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर माइकल क्रेमर को 2019 का अर्थशास्त्र के लिए प्रतिष्ठित नोबेल सम्मान मिला तो भारतीय मीडिया में ये ख़बर प्रमुखता से चली. अभिजीत बनर्जी का जन्म भारत में हुआ था और मास्टर तक यहीं पढ़े-लिखे भी. बनर्जी के जेएनयू में पढ़े होने की भी ख़ूब चर्चा हुई. ऐसा इसलिए भी क्योंकि बीजेपी के कई नेताओं के निशाने पर जेएनयू रही है. अभिजीत बनर्जी मोदी सरकार के नोटबंदी के फ़ैसले को आलोचक रहे हैं और 2019 के आम चुनाव में उन्होंने कांग्रेस पार्टी के घोषणापत्र तैयार करने में मदद की थी. कांग्रेस के घोषणापत्र में न्याय स्कीम अभिजीत बनर्जी का ही आइडिया था. न्याय स्कीम के तहत कांग्रेस पार्टी ने 2019 के आम चुनाव में वादा किया था कि वो सरकार बनाती है तो देश के बीस फ़ीसदी सबसे ग़रीब परिवारों को हर साल उनके खाते में 72 हज़ार रुपए ट्रांसफर करेगी. हालांकि चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से हार गई. अभिजीत बनर्जी के नोबेल मिलने पर भारत सरकार की बहुत ठंडी प्रतिक्रिया रही. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर एक औपचारिक बधाई दी. लेकिन भारत सरकार के रेल और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की अभिजीत बनर्जी पर टिप्पणी सबसे ज़्यादा चर्चा में रही. पीयूष गोयल ने शुक्रवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा था, अभिजीत बनर्जी ने नोबेल सम्मान जीता है इसके लिए हम उन्हें बधाई देते हैं. लेकिन आप सभी जानते हैं कि वो पूरी तरह से वाममंथी विचारधारा के साथ हैं. उन्होंने कांग्रेस को न्याय योजना बनाने में मदद की थी लेकिन भारत की जनता ने पूरी तरह से नकार दिया. पीयूष गोयल की इस टिप्पणी पर अभिजीत बनर्जी ने प्रतिक्रिया दी है. अभिजीत अपनी नई किताब गुड इकोनॉमिक्स फोर हार्ड टाइम्स: बेटर एंसर टू आवर बिगेस्ट प्रॉब्मलम्स को लॉन्च करने दिल्ली आए हुए हैं. पीयूष गोयल को जवाब दिल्ली में उनसे पीयूष गोयल की टिप्पणी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि इस तरह की टिप्पणी से कोई मदद नहीं मिलेगी. मुझे अपने काम के लिए नोबेल मिला है और उन्हें मेरे काम पर सवाल खड़ा करने से कुछ भी हासिल नहीं होगा. अगर बीजेपी भी कांग्रेस पार्टी की तरह अर्थशास्त्र को लेकर सवाल पूछेगी तो क्या मैं सच नहीं बताऊंगा? मैं बिल्कुल सच बताऊंगा. मैं एक प्रोफ़ेशनल हूं तो सभी के लिए हूं. किसी ख़ास पार्टी के लिए नहीं हूं. अर्थव्यवस्था को लेकर जो मेरी समझ है वो पार्टी के हिसाब से नहीं बदलेगी. अगर कोई मुझसे सवाल पूछेगा तो मैं उसके सवाल पूछने के मक़सद पर सवाल नहीं खड़ा करूंगा. मैं उन सवालों का जवाब दूंगा. अभिजीत ने कहा, मैंने भारत में कई राज्य सरकारों के साथ काम किया है. इसमें बीजेपी की भी सरकारें हैं. मैंने गुजरात में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ मिलकर काम किया है. तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे और मेरा तब का अनुभव बहुत बढ़िया रहा था. मुझे उस वक़्त किसी राजनीतिक व्यक्ति के तौर पर नहीं देखा गया था बल्कि एक विशेषज्ञ के तौर पर लिया गया और उन्होंने उन नीतियों को लागू भी किया था. मैं एक प्रोफ़ेशनल हूं तो वही हूं और ऐसा सबके लिए हूं. मैंने हरियाणा में खट्टर के साथ भी काम किया है. अभिजीत बनर्जी पर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की टिप्पणी को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर मोदी सरकार को निशाने पर लिया है. राहुल ने ट्वीट कर कहा, प्रिय अभिजीत बनर्जी, नफ़रत ने इन हठियों को अंधा बना दिया है. इन्हें इस बात का कोई इल्म नहीं है कि एक प्रोफ़ेशनल क्या होता है. आप दशकों तक कोशिश करते रह जाएंगे लेकिन ये नहीं समझेंगे. इतना तय है कि लाखों भारतीयों को आपके काम पर गर्व है. नोबेल मिलने के बाद एमआईटी में पत्रकारों से बातचीत में अभिजीत बनर्जी ने कहा था कि राजकोषीय घाटा और मुद्रा स्फीति के संतुलन के लक्ष्य से चिपके रहने से भारतीय अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती नहीं जाएगी. आख़िर इसका मतलब क्या है? इस सवाल के जवाब में अभिजीत ने कहा, मुझे नहीं लगता है कि यह कोई रॉकेट साइंस है. भारतीय अर्थव्यवस्था में जो कुछ हो रहा है उसके मूल्यांकन के आधार पर ही ऐसा कह रहा हूं. भारत की अर्थव्यवस्था में सुस्ती मांगों में कमी के कारण है. अगर हमारे पास पैसा नहीं है तो बिस्किट नहीं ख़रीदेंगे और बिस्किट कंपनी बंद हो जाएगी. मुझे लगता है कि मांग को बढ़ाना चाहिए. मतलब लोगों के पास पैसे हों ताकि खर्च कर सकें. ओबामा सरकार ने अमरीका में यही किया था. इसका विचारधारा से कोई मतलब नहीं है. भारत की अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती मांगों में कमी के कारण है. अभिजीत बनर्जी की किताब में कहा गया है कि भारत तेज़ गति से वृद्धि दर हासिल करने के लिए ऐसी नीतियों पर चल रहा है जिनसे ग़रीबों की मुश्किलें बढ़ रही हैं. इसका मतलब क्या है? इसके जवाब में अभिजीत बनर्जी ने कहा, ऐसा कई देशों में हुआ है. अमरीका और ब्रिटेन में क्या हुआ? 1970 के दशक में इन देशों की वृद्धि दर में गिरावट आई तो वो कभी संभल नहीं पाई. उन्हें कोई आडिया नहीं था कि ये गिरावट क्यों है. तब इसके लिए कहा गया कि ज़्यादा टैक्स और ज़्यादा पुनर्वितरण इसके लिए ज़िम्मेदार है. बाद में इनमें कटौती की गई. यह रीगन और थैचर शैली की अर्थव्यवस्था थी. क्या भारत की अर्थव्यवस्था इसी ओर बढ़ रही है? इसके जवाब में अभिजीत ने कहा, नहीं, मैं ये कह रहा हूं कि इस तरह की गिरावट में सरकारों की ये स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है. हमलोग ये कह रहे हैं कि हमें इस बात को लेकर आगाह होना चाहिए कि ऐसी नीतियों से अमरीका और ब्रिटेन को कई मदद नहीं मिली थी. बल्कि इन नीतियों से विषमता बढ़ी है. इन नीतियों से वैसी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है जो ट्रंप कर रहे हैं और जिससे ब्रेग्ज़िट को हवा मिली. तो भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए क्या करना होगा? इसके जवाब में अभिजीत बनर्जी ने कहा, मैं कोई मैक्रोइकनॉमिस्ट नहीं हूं. लेकिन अगर मैं नीतिनिर्माता होता तो पहले व्यापक रूप से डेटा जुटाता. इसके बाद अगर मैं इस निर्णय पर पहुंचता कि यह मांग आधारित समस्या है तो मैं ग़रीबों के हाथों में पर्याप्त पैसे देता. ये ऐसी बात है जिसमें मैं पूरी तरह से भरोसा करता हूं. ओबामा प्रशासन ने भी यही काम किया था. यह कोई नई बात नहीं है.
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प्यास बुझाने के लिए कमीज़ों से पसीना निचोड़कर पीना पड़ा था:मेक्सिको के जंगलों में भारतीय कामगार

Date : 19-Oct-2019
नई दिल्ली 19 अक्टूबर। शुक्रवार को मेक्सिको सरकार ने इन लोगों को वापस भारत भेज दिया मेक्सिको से भारत डिपोर्ट किए गए लोगों की आपबीती भयावह दर्दनाक है, जिसमें उन्होंने बताया है कि कैसे वो मानव तस्करों, बीमारी और प्यास से लड़ते हुए पनामा के जंगलों के मुश्किल रास्तों से होते हुए मेक्सिको पहुंचे थे. उनके मुताबिक मेक्सिको तक के इस सफर में उन्हें महीनों लग गए. लेकिन शुक्रवार को मेक्सिको सरकार ने इन लोगों को वापस भारत भेज दिया. इन लोगों में पंजाब और हरियाणा के 300 से ज़्यादा युवा प्रवासी शामिल थे. इन लोगों ने पहले वीज़ा एजेंट्स से संपर्क किया, जिन्होंने प्रति व्यक्ति 15 से 20 लाख रुपये मांगे. लेकिन किसान परिवारों के ये बेरोज़गार लड़के परिवारों को पीछे छोड़कर दूसरे रास्ते से अमरीका निकल पड़े. इन लोगों ने कुछ यूट्यूब वीडियो देखे और ऐसे लोगों के बारे में सुना, जो सफलतापूर्वक अमरीका पहुंच गए थे. 26 साल के सेवक सिंह ने बताया, मैंने यूट्यूब पर यात्रा के वीडियो देखे थे. उसे देखकर नहीं लगा कि ये सफर इतना भयानक होगा. मुझे नहीं पता था कि हमें एक जंगल से होकर जाना होगा. जहां न खाना मिलेगा और न ही पानी. युवकों ने बताया कि प्यास बुझाने के लिए उन्होंने कमीज़ों से पसीना निचोड़कर पीना पड़ा था.
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भारतीय अर्थव्यवस्था में अब भी गड़बड़ी - IMF प्रमुख

Date : 18-Oct-2019
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि भारत ने अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातों पर काम किया है लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो लंबी अवधि के विकास के लिए ज़रूरी हैं उन पर काम किए जाने की ज़रूरत है. आईएमएफ़ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टलीना जॉर्जिवा ने गुरुवार को वाशिंगटन में संवाददाताओं से कहा, भारत ने अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातों पर काम किया है लेकिन कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिस पर काम किए जाने की ज़रूरत है. वित्तीय क्षेत्र में बैंकिंग सेक्टर, विशेष रूप से गैर बैंकिंग संस्थाओं को लेकर सुधार किए जाने की ज़रूरत है. आईएमएफ़ ने मंगलवार को अपनी वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक की ताज़ा रिपोर्ट में भारत के विकास दर के अनुमान को 0.90 बेसिस पॉइंट घटाते हुए 6.1 फ़ीसदी कर दिया है. यह इस साल तीसरी बार है जब आईएमएफ़ ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास दर में कटौती की है. जुलाई के महीने में ही आईएमएफ़ ने 2019-20 में भारतीय विकास दर के 7 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया था जबकि इसी वर्ष अप्रैल में इसके 7.3 फ़ीसदी रहने की बात की थी सारी दुनिया के साथ भारत में भी मुश्किल दौर में अर्थव्यवस्था, IMF का अनुमान बुल्गारिया की इकोनॉमिस्ट क्रिस्टलीना जॉर्जिवा सितंबर के अंत में ही आईएमएफ़ की प्रमुख बनी हैं. उनके इस पद पर आने के बाद पहली बार ये आंकड़े आए हैं. जॉर्जिवा ने कहा कि, भारत को उन चीज़ों पर काम जारी रखना होगा जो लंबे समय तक विकास की गति को बनाए रखने के लिए ज़रूरी हैं. साथ ही उनका कहना था कि भारत सरकार अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए काम कर रही है, लेकिन भारत को अपने राजकोषीय घाटे पर लगाम लगानी होगी. हालांकि जॉर्जिवा ने कहा कि बीते कुछ वर्षों में भारत में विकास दर बहुत मजबूत रही है और आईएमएफ़ अभी भी उसके लिए बेहद मजबूत विकास दर का अनुमान लगा रही है. 6.1 फ़ीसदी विकास पर क्या बोलीं निर्मला सीतारमण? अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के विकास दर को 6.1 फ़ीसदी किए जाने पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का भी बयान आया है. आईएमएफ़ और विश्व बैंक की वार्षिक बैठक में भाग लेने वाशिंगटन पहुंचीं सीतारमण ने कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और आईएमएफ़ ने भले ही विकास दर के अनुमानों को घटा दिया है लेकिन देश की अर्थव्यवस्था अब भी सबसे तेज़ी से विकास कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि मैं चाहती हूं कि यह और तेज़ी से विकास कर सके. इसके लिए मैं हरसंभव कोशिश करूंगी लेकिन सच यह है कि भारत अब भी तुलनात्मक रूप से तेज़ी से विकास कर रहा है. क्या है भारत में सुस्ती का कारण? मंगलवार को ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने कहा था कि एक दशक पहले आए वित्तीय संकट के बाद पहली बार सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था इतनी सुस्त दिखाई दे रही है. भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर आईएमएफ़ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि, कुछ गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं की कमज़ोरी और उपभोक्ता और छोटे और मध्यम दर्जे के व्यवसायों के कर्ज़ लेने की क्षमता पर पड़े नकारात्मक असर के कारण भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान में कमी आई है. आईएमएफ़ के मुताबिक़ लगातार घटती विकास दर का कारण घरेलू मांग का उम्मीद से अधिक कमज़ोर रहना है. मानव पूंजी में निवेश भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. कामगारों में महिलाओं की तादाद लगातार बढ़ाते रहने की ज़रूरत है. यह बेहद महत्वपूर्ण है. भारत में महिलाएं बहुत प्रतिभाशाली हैं लेकिन वे घर पर रहती हैं. पूरी दुनिया की विकास दर महज 3 फ़ीसदी मुद्राकोष ने अनुमान लगाया है कि इस साल पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में कुल मिलाकर मात्र 3 फ़ीसदी ही विकास होगा लेकिन इसके 2020 में 3.4 तक रहने की उम्मीद है. आईएमएफ़ ने यह भी कहा, वैश्विक अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर में है और हम 2019 के विकास दर को एक बार फिर से घटाकर 3 फ़ीसदी पर ले जा रहे हैं जो कि दशक भर पहले आए संकट के बाद से अब तक के सबसे कम है. ये जुलाई के वैश्विक विकास दर के उसके अनुमान से भी कम है. जुलाई में यह 3.2 फ़ीसदी बताई गई थी. आईएमएफ़ ने कहा, आर्थिक वृद्धि दरों में आई कमी के पीछे विनिर्माण क्षेत्र और वैश्विक व्यापार में गिरावट, आयात करों में बढ़ोतरी और उत्पादन की मांग बड़े कारण हैं. आईएमएफ़ ने कहा इस समस्या से निपटने के लिए नीति निर्माताओं को व्यापार में रूकावटें ख़त्म करनी होंगी, समझौतों पर फिर से काम शुरू करना होगा और साथ ही देशों के बीच तनाव कम करने के साथ-साथ घरेलू नीतियों में अनिश्चितता ख़त्म करनी होगी. दुनिया के कई देशों पर होगा असर? आईएमएफ़ का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती के कारण इस साल दुनिया के 90 फ़ीसदी देशों में वृद्धि दर कम ही रहेगी. आईएमएफ़ ने कहा है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था 2020 में तेज़ी से 3.4 फ़ीसदी तक जा सकती है. हालांकि इसके लिए उसने कई ख़तरों की चेतावनी भी दी है क्योंकि यह वृद्धि भारत में आर्थिक सुधार पर निर्भर होने के साथ-साथ वर्तमान में गंभीर संकट से जूझ रही अर्जेंटीना, तुर्की और ईरान की अर्थव्यवस्था पर भी निर्भर करती है. उन्होंने कहा, इस समय पर कोई भी गलत नीति जैसे कि नो-डील ब्रेक्सिट या व्यापार विवादों को और गहरा करना, विकास और रोज़गार सृजन के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकती है. आईएमएफ़ के अनुसार कई मामलों में सबसे बड़ी प्राथमिकता अनिश्चितता या विकास के लिए ख़तरों को दूर करना है.
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हर साल नहीं कह सकते कि ये यूपीए की देन हैः मनमोहन

Date : 18-Oct-2019
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को अर्थव्यवस्था में संकट के लिए यूपीए के शासन पर दोष मढ़ना बंद करे क्योंकि एनडीए भी पांच साल से अधिक सरकार में रह चुकी है और कुछ प्रामाणिक काम करने के लिए यह पर्याप्त लंबा समय है. उन्होंने कहा, जब मैं ऑफिस में था, तब जो हुआ वो हो चुका है. कुछ कमजोरियां थीं, लेकिन आप हमेशा हर ग़लती के लिए यूपीए को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते. सरकार के तौर पर आप हर साल यह कहकर नहीं निकल सकते कि यह यूपीए सरकार की देन है. आप समाधान निकालने में असमर्थ हैं जिससे कि अर्थव्यवस्था में सुधार हो, ख़ास कर हमारी बैंकिंग सिस्टम को मजबूत बनाने में
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