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प्रेमा ने बच्चों को एक वक़्त का खाना खिलाने के लिए बेचे अपने बाल

Date : 24-Jan-2020
तमिलनाडु के सेलम ज़िले की 31 साल की प्रेमा सेल्वम की कहानी मुश्किलों से घिर जाने के बाद उम्मीद की लौ जगाने वाली कहानी है. पहले बात उनकी मुश्किलों की जिसका अंदाज़ा तब होता है जब वह बताती हैं, सात साल के मेरे बेटे ने स्कूल से लौटने के बाद खाना मांगा. फिर वह भूख से रोने लगा. लेकिन, उनके पास कुछ भी नहीं था और वह एकदम असहाय महसूस कर रही थीं. ये बीते तीन जनवरी, शुक्रवार के दिन की बात है, उन्होंने खाना नहीं बनाया था क्योंकि घर में राशन नहीं था. प्रेमा ने बताया, मेरे पास कुछ भी नहीं था. इसका मुझे दुख हो रहा था. दिल पूरी तरह से टूट चुका था. मैं सोच रही थी कि जब मैं अपने बच्चों को खिला नहीं सकती तो ऐसे जीवन का क्या मतलब है? प्रेमा के पास कोई संपत्ति और गहने नहीं थे. ना कोई क़ीमती सामान या फिर रसोई के बर्तन जिन्हें वह पैसों के लिए बेच सकती थी. प्रेमा ने बताया, मेरे पास दस रूपये भी नहीं थे. घर में बस प्लास्टिक की कुछ बाल्टियां थीं. लेकिन इसके बाद उन्हें महसूस हुआ कि उनके पास कुछ ऐसा है जिसे बेचा जा सकता था. प्रेमा बताती हैं, मुझे एक ऐसी दुकान के बारे में ध्यान आया जहां बाल ख़रीदे जाते हैं. मैं वहां गई और अपने सिर के सारे बाल बेच दिए. मुझे इससे 150 रुपये मिले. इंसानों के सिर के बालों का कारोबार दुनिया भर में होता है और भारत इसका प्रमुख निर्यातक है. जब बाल बेचे जाते हैं तो उन लटों से कृत्रिम बाल तैयार होते हैं. कुछ हिंदू श्रद्धालु अपनी मुराद पूरी होने पर मंदिरों में अपने बालों का दान करते हैं. कारोबारी इसे ख़रीदकर विदेशों में बेचते हैं प्रेमा को बाल बेचकर जितने पैसे मिले उतने पैसों में किसी बड़े शहर के मिडिल क्लास रेस्टोरेंट में एक प्लेट खाना ही मिल सकता है लेकिन अपने गांव में प्रेमा कुछ ज़्यादा सामान ख़रीदने में कामयाब रही. प्रेमा बताती हैं, मैंने अपने तीनों बच्चों के लिए तीन प्लेट चावल ख़रीदे, 20 रुपये प्रति प्लेट के हिसाब से. प्रेमा ने अपने बच्चों के साथ वही खाना खाया, लेकिन यह महज क्षणिक राहत की बात थी. प्रेमा को मालूम था कि उनके पास जो आख़िरी विकल्प था, वह भी अब नहीं रहा. ऐसे में अगला भोजन कैसे मिलेगा, यह चिंता उन्हें खाए जा रही थी. सालों तक वह ईंट बनाने के भट्टे में अपनी पति के साथ मजदूरी करती थीं, इससे इतनी आमदनी हो जाती थी कि परिवार का गुज़ारा चल पाए. उनके पति ने अपना भट्टा चलाने के लिए लोन लिया, लेकिन वो भट्टा नहीं चला पाए. फिर कमाई न होने के कारण वो कर्ज से घिर गए थे. सात महीने पहले उन्होंने खुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली. अपने बाल बेचने के बाद, प्रेमा ने अपने पति का रास्ता ही अपनाया. उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की मैंने एक दुकान पर कीटनाशक मांगा. लेकिन उनके हाव भाव या फिर स्थिति को देखते हुए दुकानदार ने उन्हें डांट डपटकर भगा दिया. घर लौटने के बाद प्रेमा ने कोई और रास्ता आजमाने के बारे में सोचा. उन्होंने जहरीली झाड़ी कनेर के बीज लेकर उसको पीसना शुरु किया. तभी इत्तेफाक से पड़ोस में रहने वाली उनकी बहन उनके घर आ गई और उन्होंने प्रेमा को यह जहरीला पेस्ट बनाने से रोका. प्रेमा ने बताया कि पति के कर्ज लिए गए पैसे को लौटाने के दबाव ने उन्हें तोड़कर रख दिया था. अपने पति की मौत के बाद प्रेमा घर में इकलौती कमाने करने वाली बचीं थीं. वह ईंट के भट्टे में काम करती रहीं. हालांकि, यह काम काफी मेहनत वाला था लेकिन उन्हें खेती वाली मजूदरी से बेहतर पैसे मिल जाते थे. प्रेमा बताती हैं, जब मैं काम पर जाती थी, तब रोजाना 200 रुपये कमा लेती थी. यह परिवार चलाने के लिए बहुत था. वह अपने साथ अपने दोनों बेटों को भी ले जाती थी क्योंकि उनकी उम्र इतनी नहीं हुई थी कि वे स्कूल जाएं. लेकिन बाल बेचने की घटना से तीन महीने पहले से लगातार प्रेमा बीमार रहने लगीं, काम पर नहीं जाने के चलते उनकी आमदनी कम हो गई थी. प्रेमा बताती हैं, मैं ईंटों का बोझ उठा नहीं पा रही थी, बुख़ार के चलते ज्यादातर दिन घर से बाहर नहीं निकल पा रही थी. आमदनी कम होने से प्रेमा क़र्जे़ की किस्त नहीं लौटा पाईं. पैसे देने वालों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया और प्रेमा की निराशा बढ़ती जा रही थी. वह पढ़ी लिखी नहीं हैं इसलिए उन्हें सरकार की योजनाओं के बारे में भी नहीं मालूम था जिससे उन जैसों को मदद मिल सकती है. गरीबों के लिए भारत में परंपरागत बैंकिंग सिस्टम से लोन लेना बहुत मुश्किल होता है. यही वजह है कि प्रेमा और उनके पति ने कहीं ज़्यादा ब्याज दर पर स्थानीय महाजन और पड़ोसियों से क़र्ज़ लिया था. एक तरफ प्रेमा लगातार बीमार रहने लगीं, आमदनी कम हो गई और दूसरी तरफ क़र्जे़ का बोझ बना हुआ था. कोई रास्ता नहीं दिख रहा था, ऐसे वक्त में प्रेमा ने अपने बाल बेचे और उसके बाद आत्महत्या के बारे में भी सोचा. लेकिन ऐसे मुश्किल वक्त में प्रेमा की मदद करने के लिए एक अजनबी शख़्स बाला मुरुगन सामने आए. बाला मुरुगन बताते हैं, मुझे प्रेमा के बारे में अपने एक दोस्त प्रभु से पता चला, जिसका उस इलाक़े में ईंट का भट्टा है. प्रेमा की मुश्किलों की कहानी सुनकर बाला को अपने परिवार की मुश्किलें याद आ गईं. बाला बताते हैं, जब मैं दस साल का था तब मेरे परिवार के पास भी खाने को कुछ नहीं था. मेरी मां घर की पुरानी किताब, काग़ज की रद्दियां बेच कर चावल ख़रीद कर लाई थी. उस वक्त बाला की मां ने भी अपने परिवार सहित आत्महत्या की कोशिश की थी. बाला बताते हैं, मेरी मां ने मुझे और मेरी बहनों को एक लाइन में खड़ा किया. पहले खुद कोई गोली खा ली और उसके बाद जब मेरी बहन गोली निगलने लगी तो मां ने उसे रोका. आखिरी वक्त में बाला की मां ने आत्महत्या के विचार को छोड़ दिया. परिवार वाले आनन-फ़ानन में उन्हें एक डॉक्टर के पास ले गए, डॉक्टर ने बाला की मां को बचा लिया. उस घटना के बाद, बाला ने सालों संघर्ष कर परिवार को ग़रीबी से बाहर निकाला. वे अब एक कंप्यूटर ग्राफिक्स सेंटर चलाते हैं. बाला ने प्रेमा को अपने परिवार के संघर्ष के बारे में बताया और इससे प्रेमा को भी उम्मीद मिली. इसके अलावा प्रेमा के दोस्त प्रभु ने कुछ पैसे दिए ताकि वह परिवार के लिए खाने का इतंज़ाम कर सके. इसके बाद बाला ने प्रेमा के साथ जो कुछ हुआ था, उसे फ़ेसबुक पर लिखा. बाला बताते हैं, महज एक दिन के अंदर मुझे एक लाख बीस हज़ार रुपये की मदद मिल गई. लोगों ने मदद की. मैंने प्रेमा को बताया तो वह बहुत खुश हुईं और कहा कि ये पैसे क़र्ज़ लौटाने के लिए काफ़ी हैं. प्रेमा के अनुरोध पर बाला ने पैसे जुटाने का काम बंद कर दिया. बाला कहते हैं, उन्होंने कहा कि वह काम करके बाक़ी पैसे लौटा देगी. प्रेमा को अब बाक़ी क़र्जे़ के लिए सात सौ रुपये महीने के हिसाब से कर्ज लौटाना है. लेकिन उनके मामले पर ज़िला प्रशासन का भी ध्यान गया और उन लोगों ने भी इनकी मदद के लिए दूध बेचने की डीलरशिप की व्यवस्था करने का भरोसा दिलाया है. प्रेमा का कहना है कि उन्हें अपने बाल कटवाने का कोई अफसोस नहीं हैं. दुर्भाग्य यह है कि भारत में प्रेमा जैसी औरतों की कमी नहीं है. भारत के आर्थिक विकास के बावजूद लाखों लोगों को भोजन जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. विश्व बैंक आंकड़ों के मुताबिक नाइजीरिया के बाद सबसे ज़्यादा गरीब (जिनकी आमदनी रोजाना 1.90 डॉलर से भी कम हो) लोगों का देश है भारत. प्रेमा को अपने साथ तीन बच्चों के भी भोजना की व्यवस्था करनी है. जिस दिन वह काम पर जाती भी हैं तो उस दिन की आमदनी को चार सदस्यों में अगर बांटे तो प्रेमा का परिवार ग़रीबों में भी ग़रीब आंका जाएगा. बाला मुरुगन ने भी प्रेमा की लगातार मदद करने का भरोसा दिया है. इन भरोसों का आलम है कि प्रेमा कहती हैं, अब मुझे महसूस होता है कि आत्महत्या की कोशिश ग़लत फैसला था. लोन चुकाने के लिए अब मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं. प्रेमा बताती हैं कि अजनबियों से मिलने वाली मदद से वह बेहद खुश हैं. उनका कहना है कि इससे ज़िंदगी को लेकर उनका उत्साह लौट आया है.
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ट्विटर:रेप की धमकी, गालियां और भद्दी बातें...ये सब झेलती हैं भारत की महिला

Date : 24-Jan-2020
बलात्कार की धमकियां, गालियां, महिलाविरोधी कमेंट और भद्दी बातें. भारत की महिला नेताएं ये सब झेलती हैं. ट्रोल पेट्रोल इंडिया: एक्सपोज़िंग ऑनलाइन अब्यूज़ फ़ेस्ड बाय वूमन पॉलिटिशियंस नाम के एक नए अध्ययन में पता चला है कि भारतीय महिला नेताओं को ट्विटर पर लगातार दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है. एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की मदद से किए गए इस अध्ययन में 95 भारतीय महिला नेताओं के लिए किए गए ट्वीट्स की समीक्षा की गई. इस अध्ययन में पाया गया कि 95 महिला नेताओं को किए गए 13.8 फ़ीसदी ट्वीट्स या तो आपत्तिजनक थे या फिर अपमानित करने वाले थे. इसका मतलब ये हुआ कि इन सभी महिला नेताओं ने रोज़ 10 हज़ार से भी ज़्यादा अपमानजनक ट्वीट्स का सामना किया. अध्ययन से भी यह भी पता चला कि मुसलमान महिला नेताओं को बाक़ी धर्मों की महिलाओं के मुक़ाबले 91.4% ज़्यादा आपत्तिज़नक ट्वीट किए जाते हैं. मुसलमान महिला नेताओं को बाक़ी महिला नेताओं के मुक़ाबले 55.5 फ़ीसदी ज़्यादा आपत्तिज़नक ट्वीट्स का सामना करना पड़ा. मुसलमान नेताओं के धर्म को लेकर जो अपमानजनक ट्वीट किए गए वो हिंदू नेताओं के लिए गए ट्वीट्स की तुलना में दोगुनी थी. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग की नेताओं को अन्य नेताओं की तुलना में 59 फ़ीसदी ज़्यादा ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा. उनके लिए जाति-आधारित अपशब्दों का इस्तेमाल भी किया गया. एम्नेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने नवंबर 2019 में रिसर्च के नतीजों को ट्विटर से साझा किया और पूछा कि क्या आम चुनाव के दौरान ऑनलाइन ट्रोलिंग रोकने के लिए कोई ख़ास कदम उठाए गए थे? अपने जवाब में ट्विटर ने कहा, ट्विटर को सार्वजनिक बातचीत से गुमराह करने वाली अभद्र भाषा. स्पैम और बाकी दुर्व्यवहारों से मुक्त कराना हमारी प्राथमिकताओं में शामिल है. हम इस दिशा में आगे भी बढ़ रहे हैं और लगातार कोशिश कर रहे हैं ट्विटर पर लोगों का अनुभव सकारात्मक रहे. हालांकि कई महिला नेता ट्विटर के दावों से संतुष्ट नहीं हैं. उनका कहना है कि ट्विटर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने में नाकामयाब साबित हो रहा है. भारतीय जनता पार्टी की नेता शाज़िया इल्मी ने कहा, महिलाओं को बढ़-चढ़कर राजनीति में आना चाहिए लेकिन इस काम को करने की जो क़ीमत मैं चुकाती हूं, वो बहुत ज़्यादा है. ट्विटर पर मैं लगातार ट्रोल होती हूं, ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार होती हूं. मैं कैसी दिखती हूं, मेरा रिलेशनशिप स्टेटस क्या है, मेरे बच्चे क्यों नहीं हैं...जितनी गंदी बातें आप सोच सकते हैं, मैं वो सब झेलती हूं. जो लोग मेरे विचारों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते, वो मेरे काम के बारे में टिप्पणी नहीं करते बल्कि हर संभव भाषा में मुझे वेश्या कहते हैं. आम आदमी पार्टी की आतिशी मार्लेना ने इस बारे में कहा कि सार्वजनिक जगहों पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी महिला की ज़िम्मेदारी नहीं है. उन्होंने कहा, मिसाल के तौर पर अगर कोई महिला सार्वजनिक यातायात का इस्तेमाल करती है तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है. ठीक इसी तरह अगर कोई महिला ट्विटर का इस्तेमाल कर रही है तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित कराना भी ट्विटर की ही ज़िम्मेदारी है. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की नेता कविता कृष्णन का कहना है कि ऑनलाइन ट्रोलिंग से मानसिक तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है. उन्होंने कहा, कई बार ऐसा होता है कि आप किसी ट्वीट को रिपोर्ट करते हैं और फिर ट्विटर कहता है कि वो ट्वीट उसकी नीतियों का उल्लंघन नहीं करता. फिर तो इन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों को रिपोर्टिंग और शिकायत का सारा दिखावा ही बंद कर देना चाहिए. अगर पर किसी पर कोई कार्रवाई ही नहीं कर रहे हैं, तो नीतियां बनाए रखने क ट्रोलिंग का क्या असर होता है? डॉक्टर नीतू राणा पेशे से मनोवैज्ञानिक हैं और लंबे वक़्त से ऑनलाइन ट्रोलिंग का इंसानी दिमाग़ पर होने वाले असर का अध्ययन कर रही हैं. बातचीत में उन्होंने बताया कि ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर ट्रोलिंग का मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर हो सकता है. डॉक्टर नीतू कहती हैं, सोशल मीडिया पर लगातार ट्रोल होने से मानसिक तनाव बढ़ सकता है. ख़ुद को लेकर हीन भावना और असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है. ऑनलाइन उत्पीड़न के शिकार कुछ लोग अलग-थलग रहने लगते हैं और बाक़ियों से दूरी बनाने लगते हैं. डॉक्टर नीतू के मुताबिक़ ट्रोल्स के साथ किसी तरह की बातचीत या बहस में शामिल ही नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा, अगर आप ट्रोल्स के कमेंट्स की परवाह करते हैं, उनका जवाब देते हैं और नाराज़गी जताते हैं तो इससे उनका हौसला बढ़ता है. उन्हें पता चल जाता है कि आप उनकी बातों से परेशान हो रहे हैं और इसलिए वो आपको ज़्यादा परेशान करने लगते हैं. इसलिए जैसे ही कोई आपत्तिजनक कमेंट आए, तुरंत उसे डिलीट या रिपोर्ट करें. सोशल मीडिया पर स्वस्थ्य बहस में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन ख़ुद को उत्पीड़न का शिकार बिल्कुल न बनने दें.
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क्या एनपीआर पर सरकार ने अपना स्टैंड बदल दिया है..

Date : 23-Jan-2020
नई दिल्ली 23 जनवरी । आप क्रोनोलॉजी समझ लीजिए. पहले सीएबी आने जा रहा है. सीएबी आने की बाद एनआरसी आएगा और एनआरसी केवल बंगाल के लिए नहीं आएगा. पूरे देश के लिए आएगा. घुसपैठिए पूरे देश की समस्या हैं. बंगाल चूंकि बॉडर स्टेट है तो वहां की गंभीर समस्या है लेकिन पूरे देश की समस्या है. पहले सीएबी आएगा. सारे शरणार्थियों को नागरिकता दिया जाएगा और अब ज़रा याद कीजिए 18 दिसंबर 2019 को प्रमुख हिंदी अखबारों में दिए इस सरकारी विज्ञापन को. सीएए यानी नागरिकता संशोधन कानून पर अफ़वाह और सच के भ्रम को दूर करने के लिए ये छापा गया था. विज्ञापन में अफ़वाह की श्रेणी में लिखा गया - ऐसे दस्तावेज़ जिनसे नागरिकता प्रमाणित होती हो, उन्हें अभी से जुटाने होंगे अन्यथा लोगों को निर्वासित कर दिया जाएगा. और सच की श्रेणी में लिखा गया - ये ग़लत है. किसी राष्ट्रव्यापी एनआरसी की घोषणा नहीं की गई है. अगर कभी इसकी घोषणा की जाती है तो ऐसी स्थिति में नियम और निर्देश ऐसे बनाए जाएंगे ताकि किसी भी भारतीय नागरिक को परेशानी न हो. सीएए के मुद्दे पर सरकार में चल रहे कंफ्यूजन का ये बेहतरीन उदाहरण था. ऐसा ही कंफ्यूजन नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर पर भी देखने को मिल रहा है. ताज़ा उदाहरण है सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का बयान. बुधवार को कैबिनेट की बैठक के बाद हुए प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जावड़ेकर से एनपीआर में माता-पिता के जन्म स्थान/ जन्म तिथि पर ये सवाल पूछा गया - क्या सरकार ने एनपीआर फॉर्म में माता-पिता के जन्म स्थान/ जन्म तिथि को ड्रॉप कर दिया है?" इस पर उन्होंने कहा, जिस कैबिनेट की बैठक में एनपीआर पर चर्चा हुई थी, उस बैठक के बाद मैंने ख़ुद आपको ब्रीफ किया था. मैंने उस दिन भी साफ किया था कि एनपीआर फॉर्म में कुछ सवाल ऑप्शनल होंगे. ऑप्शनल सवालों का जवाब आपको याद हो तो दीजिएगा. जवाब अगर याद नहीं तो आप नहीं दीजिएगा. माता-पिता के जन्म स्थान या जन्म तिथि अगर आपको नहीं मालूम तो मत दीजिए. इस जवाब पर दोबारा से पत्रकार ने सवाल किया, तो क्या एनपीआर फॉर्म से ये सवाल ही ड्रॉप कर दिया गया है? इस पर उन्होंने कहा, नहीं, ऐसा नहीं है. जवाब नहीं देंगे तो सवाल ड्रॉप ही माना जाएगा न. इसके पहले की वो आगे इस पर और विस्तार से बोलते, उन्होंने अपने जवाब में ही एक सवाल जोड़ दिया, पहले आप ये बताइए. एनपीआर कौन लाया? कांग्रेस ने. कब लाया? 2010 में. तब आप लोगों ने स्वागत किया. ऐसा न्याय तो नहीं हो सकता कि वो लाएँ तो अच्छा है और हम लाएँ तो बुरा है. जावड़ेकर के इस बयान के बाद से ही इस पर चर्चा शुरू हो गई कि क्या एनपीआर पर केन्द्र सरकार ने अपना स्टैंड बदल दिया है? वैसे एनपीआर पर कंफ्यूजन की शुरुआत रामविलास पासवान के बयान से हुई. रामविलास पासवान केन्द्र सरकार में मंत्री भी हैं और सरकार में सहयोगी पार्टी भी. बातचीत में रामविलास पासवान ने कहा, मुझे अपने माता-पिता के जन्म की तारीख नहीं पता, तो उससे संबंधित दस्तावेज़ कहां से लाउंगा. उन्होंने उसी बातचीत में आगे कहा, सरकार इन सवालों को ड्रॉप करने पर विचार कर सकती है. वैसे भी सरकार ने कहा है कि एनपीआर में हर सवाल से जुड़े दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं होगी. दरअसल एनपीआर फ़ॉर्म में जिन 21 पैमानों पर सवाल पूछे जा रहे हैं उनमें से एक सवाल माता-पिता के जन्म स्थान/ जन्म तिथि को लेकर भी है. एनपीआर का विरोध करने वाले राज्य सरकारों को भी इस सवाल पर सबसे ज़्यादा आपत्ति है. विपक्ष का आरोप है कि जैसे ही इस सवाल के जवाब से पता चलेगा आप कहां से आए हैं या आपको अपने पूर्वजों के बारे में नहीं पता, तो आप एक संदिग्ध कैटेगरी में डाल दिए जाएंगे. यही सवाल विपक्ष की चिंता की जड़ है. विपक्ष के एनपीआर के विरोध को ताज़ा हवा इस बात से भी मिली है कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने 9 जनवरी 2020 को केवाईसी फ़ॉर्म के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ में एनपीआर को भी जोड़ दिया गया है. बैंकों को केवाईसी के लिए जारी दिशा निर्देशों के लिए जनवरी में अपडेट करके एक सर्कुलर भेजा गया है. उसी सर्कुलर में केवाईसी के लिए आधिकारिक ज़रूरी दस्तावेज़ों की सूची में एक दस्तावेज़ एनपीआर को भी माना गया है. कांग्रेस पार्टी ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के ज़रिए सरकार को इसी मुद्दे पर घेरा. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, जो चीज़ ऑप्शनल हैं उसको लिखते क्यों हो? आपके फॉर्म में ऐसे प्रश्न आते क्यों हैं? आवश्यकता क्यों है ऐसे प्रश्न की? ऑप्शनल के आधार पर भी डाउटफुल करार दिया जा सकता है. आखिर आरबीआई को आज एनपीआर को केवाईसी डाक्यूमेंट में इसे डालने की ज़रूरत क्यों पड़ी है. डर जनता में नहीं सरकार में होना चाहिए. लेकिन आज सरकार से जनता डरी हुई है. उन्होंने आगे कहा, दरअसल सीएए, एनआरसी, एनपीआर और उसमें लिखे गए छह नए सवाल और आरबीआई की नई गाइडलाइन - सब मिला कर सरकार, ऐसा कॉकटेल तैयार कर रही है, जिससे डर का माहौल पैदा हो. लेकिन हम भारतीय ज़िद्दी पार्टी हैं. हम इसे नहीं मानते हैं. एनपीआर यानी नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर क्या है? मोदी कैबिनेट ने 24 दिसंबर को 2021 की जनगणना और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर को अपडेट करने की मंज़ूरी दे दी. जनगणना 2021 में शुरू होगी लेकिन एनपीआर अपटेड का काम असम को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अप्रैल 2020 से सितंबर 2020 तक चलेगा. गृह मंत्रालय ने 2021 की जनगणना के लिए 8, 754 करोड़ रुपए और एनपीआर अपडेट करने के लिए 3,941 करोड़ रुपए के ख़र्च के प्रस्ताव को भी मंज़ूरी दी है. एनपीआर सामान्य रूप से भारत में रहने वालों या यूजुअल रेजिडेंट्स का एक रजिस्टर है. भारत में रहने वालों के लिए एनपीआर के तहत रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है. यह भारतीयों के साथ भारत में रहने वाले विदेशी नागरिकों के लिए भी अनिवार्य होगा. एनपीआर का मक़सद देश में रहने वाले लोगों के व्यापक रूप से पहचान से जुड़ा डेटाबेस तैयार करना है. पहला एनपीआर 2010 में तैयार किया गया और इसे अपडेट करने का काम साल 2015 में घर-घर जाकर सर्वे के ज़रिए किया गया. अब इसे एक बार फिर से अपडेट करने का काम 2020 में अप्रैल महीने से सितंबर तक 2021 की जनगणना में हाउसलिस्टिंग फ़ेज़ के साथ चलेगा.
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NaseeruddinShah ने कहा 'जोकर' तो अनुपम खेर ने उन्हें 'नशेड़ी' बताया

Date : 23-Jan-2020
नए नागरिकता क़ानून और उसके इर्द-गिर्द जारी राजनीतिक बहस को लेकर फ़िल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और अनुपम खेर के बीच ज़ुबानी जंग हो गई है. हाल ही में नसीरुद्दीन शाह ने एक वीडियो इंटरव्यू में अनुपम खेर को चापलूस और जोकर बताया था, जिसका अब अनुपम खेर ने जवाब दिया है. शाह की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए अनुपम खेर ने बुधवार शाम एक वीडियो ट्वीट किया, जिसके साथ उन्होंने लिखा, जनाब नसीरुद्दीन शाह साहब के लिए मेरा प्यार भरा पैग़ाम! वो मुझसे बड़े हैं. उम्र में भी और तजुर्बे में भी. मैं हमेशा से उनकी कला की इज़्ज़त करता आया हूँ और करता रहूँगा. पर कभी-कभी कुछ बातों का दो टूक जवाब देना ज़रूरी होता है. ये है मेरा जवाब. अपने वीडियो में अनुपम खेर ने नसीरुद्दीन शाह को कुंठित कहकर संबोधित किया है. शाह साहब, मेरे बारे में दिया हुआ आपका इंटरव्यू देखा. आपने मेरी तारीफ़ में कुछ बातें कहीं कि मैं जोकर हूँ, मुझे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, मैं चापलूस हूँ, ये सब मेरे ख़ून में है, वगैरह-वगैरह. तारीफ़ के लिए शुक्रिया, लेकिन मैं आप को और आपकी बातों को बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेता. हालांकि मैंने कभी भी आपकी बुराई नहीं की, आपको बुरा भला नहीं कहा. पर अब ज़रूर कहना चाहूँगा कि आपने अपनी पूरी ज़िंदगी, इतनी कामयाबी मिलने के बावजूद, कुंठा में गुज़ारी है. अगर आप दिलीप कुमार को, अमिताभ बच्चन को, राजेश खन्ना को, शाहरुख ख़ान को, विराट कोहली को दोषपूर्ण बता सकते हैं, उनकी आलोचना कर सकते हैं, तो मुझे विश्वास है कि मैं बढ़िया लोगों में शामिल हूँ. इनमें से किसी ने भी आपकी टिप्पणियों को गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि ये सभी जानते हैं कि जिन पदार्थों का सेवन आप करते हैं, उनकी वजह से क्या सही है और क्या ग़लत है, आपको इसका अंतर ही नहीं पता लगता. मेरी बुराई करके अगर आप एक-दो दिन के लिए सुर्खियों में आते हैं, तो मैं आपको ये ख़ुशी भेंट करता हूँ. भगवान आपको ख़ुश रखे. आपका शुभचिंतक, अनुपम. और आप जानते हैं कि मेरे ख़ून में क्या है? मेरे ख़ून में है हिन्दुस्तान. इसको समझ जाइये बस. जय हो! नसीरुद्दीन शाह ने एक इंटरव्यू में देश के मौजूदा राजनीतिक हालात और उसे लेकर फ़िल्म जगत के रवैये पर टिप्पणी करते हुए अनुपम खेर पर सीधा प्रहार किया था. इस इंटरव्यू में जब नसीर से पूछा गया कि देश की विभाजनकारी राजनीति पर फ़िल्म जगत के लोग प्रतिक्रिया कर रहे हैं और उनमें ऐसे भी हैं जो सरकार की नीतियों के समर्थक हैं इस प्रश्न के बीच में ही नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि ऐसे लोगों (समर्थन करने वाले) की संख्या उन लोगों से काफ़ी कम है जो ऐसी राजनीति का विरोध कर रहे हैं जब सवाल करने वाले पत्रकार ने कहा कि ऐसे लोग ख़ुलकर अपनी बात रख भी रहे हैं तो नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि ऐसे लोग ट्विटर पर काफ़ी बोलते हैं, मैं ट्विटर पर नहीं हूँ, और मैं चाहता हूँ कि ये लोग तय कर लें कि वो किस चीज़ में यकीन रखते हैं इसी जवाब में उन्होंने अनुपम खेर का नाम लेते हुए कहा, ट्विटर पर बोलने वाले लोगों में अनुपम खेर जैसे लोग शामिल हैं और मुझे लगता है उनके जैसे लोगों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए. वो एक मसखरा है, और उनके एनएसडी और एफ़टीटीआई के सहपाठी उनकी चापलूसी करने की प्रकृति की गवाही दे सकते हैं. ये उनके ख़ून में है, इसमें वो कुछ नहीं कर सकते. उन्होंने आगे कहा, और ऐसे लोग जो विरोध कर रहे हैं, उन्हें तय करना चाहिए कि वो क्या कहना चाहते हैं, और हमें हमारी ज़िम्मेदारियाँ ना बताएँ, हमें पता है कि हमारी ज़िम्मेदारियाँ क्या हैं
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50 लाख मुसलमान घुसपैठियों की पहचान होगी

Date : 20-Jan-2020
कलकत्ता 20 जनवरी । पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख दिलीप घोष ने कहा है कि मुसलमान घुसपैठियों की पहचान की जाएगी और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें भारत से बाहर खदेड़ दिया जाएगा. 24 परगना में रैली को संबोधित करते हुए राज्य बीजेपी प्रमुख दिलीप घोष ने कहा, 50 लाख मुसलमान घुसपैठियों की पहचान की जाएगी और ज़रूरत हुई तो उन्हें देश से बाहर निकाल दिया जाएगा. दिलीप घोष ने आगे कहा, पहले उनके नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाएंगे, इसके बाद दीदी (मुख्यमंत्री ममता बनर्जी) तुष्टीकरण नहीं कर पाएंगी. दिलीप घोष ने कहा, जो लोग सीएए का विरोध कर रहे हैं, वो या तो भारत विरोधी है या बंगाली विरोधी हैं. तभी तो ये लोग हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का विरोध कर रहे हैं.
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मोदी का सबसे मज़बूत पक्ष यह है कि वो राहुल गांधी नहीं हैं:रामचंद्र गुहा

Date : 18-Jan-2020
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कहा है कि भारतीय राजनीति में परिश्रमी और आत्मनिर्भर नरेंद्र मोदी के सामने पांचवीं पीढ़ी के वंशज राहुल गांधी के लिए कोई मौक़ा नहीं है. विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी की मुखर आलोचना करने वाले जाने वाले इतिहासकार ने केरल साहित्यिक समारोह के दूसरे दिन ये बातें कहीं. गुहा ने यह भी कहा कि वायनाड ने राहुल गांधी को नेता चुनकर विनाशकारी कदम उठाया है. उन्होंने कहा, अगर आप 2024 में भी राहुल गांधी को दोबारा चुनने की ग़लती करेंगे तो आप नरेंद्र मोदी को ही लाभ पहुंचाओगे. गुहा ने कहा, मैं व्यक्तिगत रूप से राहुल गांधी के ख़िलाफ़ नहीं हूं लेकिन कांग्रेस अब निराशावादी पारिवारिक कंपनी में बदल गई है, जो भारत में हिंदुत्व और अंध-राष्ट्रवाद बढ़ने के कारणों में से एक है. गुहा ने कहा, मोदी का सबसे मज़बूत पक्ष यह है कि वो राहुल गांधी नहीं हैं. वह बेहद परिश्रमी हैं और उन्होंने कभी यूरोप में छुट्टियां नहीं मनाईं.
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18 साल बाद, डॉन करीम लाला को फिर से ज़िंदा किया जा रहा है

Date : 17-Jan-2020
मुम्बई 17 जनवरी । अपनी मौत के 18 साल बाद, गुज़रे दौर के डॉन करीम लाला को फिर से ज़िंदा किया जा रहा है. महाराष्ट्र की शिव सेना के नेता संजय राउत ने अनजाने में वो विषय छेड़ दिया जिस पर पहले बात नहीं होती थी. उन्होंने दावा किया कि इंदिरा गांधी माफ़िया डॉन करीम लाला से मिला करती थीं. इसके साथ ही करीम लाला और उनके कारनामे चर्चा में आ गए हैं. साउथ मुंबई में पाइधुनी गेटो में करीम लाला के दफ़्तर में बड़ी शान के साथ लगाई गई एक तस्वीर पर अचानक बात होने लगी है और इसके आधार पर हर कोई यह दावा कर रहा है कि इंदिरा गांधी ने करीम लाला से मुलाक़ात की थी. दाऊद इब्राहिम के मुंबई का एल कपोन बनने से पहले (माना जता है कि एल कपोन दुनिया के सबसे ख़रनाक माफ़िया सरगना थे) करीम लाला और उनकी क़िस्म के लोगों को सामाजिक दायरों में अवांछित समझा जाता था. सोने के तस्कर हाजी मस्तान मंत्रालय में जाकर सरकार में बैठे लोगों से मिला करते थे और हिंदू-मुस्लिम तनाव को कम करने के लिए हुई कई बातचीतों में भी वह शामिल रहे. अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दौर हाजी मस्तान और करीम लाला दोनों ने ख़ुद को अपने संगठनों के लिए समर्पित कर दिया था हाजी मस्तान ने दलित-मुस्लिम सुरक्षा महासंघ नाम का राजनीतिक संगठन बनाया था और करीम लाला ने पख़्तून जिरगा-ए-हिंद नाम से संगठन बनाया था, जिसने अफ़ग़ानिस्तान से भारत आई पश्तूनों या पठानों के लिए काम किया. करीम लाला ख़ुद भी पठान थे और बहुत कम उम्र में भारत आए थे. भले ही वह फ्रंटियर गांधी ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान से प्रभावित थे मगर उन्होंने जो रास्ता चुना वो फ्रंटियर गांधी के आदर्शों और विचारधारा से ज़रा भी मेल नहीं खाता था. . सबसे पहले ब्याज पर पैसा लगाना शुरु किया भारत आने के बाद शुरुआती सालों में अब्दुल करीम ख़ान उर्फ़ करीम लाला ने जुए के क्लब खोले. जो लोग यहां आकर पैसा हारते, वे अपने घर का खर्च चलाने के लिए ख़ान के आदमियों से उधार लिया करते थे. इस परंपरा को बदलने के लिए ख़ान ने सोचा कि अगर हर महीने अगर उधार पर कर्ज़ वसूला जाए तो फिर लोग उनसे उधार लेना बंद कर देंगे. मगर लाला ने पाया कि हर महीने की 10 तारीख़ को उनका गल्ला ब्याज़ के पैसे से लबालब हो जाता. इस तरह से लाला ने ब्याज़ के लिए पैसे उधार देने का काम शुरू कर दिया. इसके बाद लाला ने अपने लड़कों की मदद से उन किराएदारों से मकान खाली करवाने का काम भी शुरू कर दिया जो इसके लिए राज़ी नहीं होते थे. 50 साल की उम्र तक तक लाला की शख़्सियत काफ़ी बड़ी हो गई थी. इस बीच किसी मुरीद ने लाला को चलने के लिए सोने की नक्काशी वाली एंटीक लाठी तोहफ़े में दी थी. जब कभी लाला किसी पार्टी या सामाजिक समारोहों में जाते और अगर अपनी लाठी किसी जगह रखकर इधर-उधर चले जाते तो किसी की हिम्मत नहीं होती कि इसे छूएं. लोग उस जगह को खाली छोड़ देते, ये समझते हुए कि ये जगह लाला की है. लाला के कुछ करीबी तत्वों के दिमाग़ में यहीं से ख़्याल आया कि किराएदारों से मकान वगैरह खाली करवाने के लिए क्यों न लाला की जगह उनकी छड़ी के ज़रिये उनके प्रभाव का इस्तेमाल किया जाए. जब कोई किरायेदार मकान खाली करने से इनकार करता, उसके दरवाज़े के बाहर छड़ी रख दी जाती और फिर वो किराएदार लाला से पंगा न लेने के डर से तुरंत खाली कर देता. इस लाठी को किरायेदारों के लिए एक तरह से मकान खाली करने का नोटिस समझा जाने लगा. गंगूभाई ने बांधी करीम लाला को राखी दक्षिण मुंबई में गेटो में इस तरह के बाहुबल भरे तौर-तरीकों से बावजूद लाला की पहचान ईमानदारी और न्याय के लिए होती थी. गंगूभाई काठेवाली दक्षिण मुंबई के कमाठीपुरा लेड लाइट इलाक़े में काफ़ी चर्चित थीं. शौक़त ख़ान नाम के एक पठान ने जब दो बार उनका बलात्कार किया तो वो करीम लाला के पास आईं. करीम लाला ने इस मामले में न सिर्फ़ दख़ल दिया बल्कि उन्हें पठान से बचाया भी और अपने आदमी भेजकर शौकत ख़ान की पिटाई भी करवाई. और फिर ये किस्सा चर्चित है कि गंगूबाई ने अपनी रक्षा करने वाले भाई... करीम लाला की कलाई पर राखी बांधी थी. बॉलिवुड निदेशक संजय लीला भंसाली अब इसी पर पर फ़िल्म बना रहे हैं जिसमें आलिया भट्ट, गंगूबाई की भूमिका में होंगी. ये बात ज़्यादा लोगों को मालूम नहीं है कि मुंबई में माफ़िया को उभारने में करीम लाला ने बड़ी भूमिका निभाई थी. करीम लाला ने हाजी मस्तान के साथ क़रीबी बढ़ाई और सोने की तस्करी के काम में अपने बाहुबल की मदद करने का वादा किया. करीम लाला की मदद के बिना हाजी मस्तान के लिए सोने की तस्करी के धंधे में चरम पर पहुंचाना संभव ही नहीं था. और साथ ही अगर दाऊद इब्राहिम के पिता पुलिस कॉन्स्टेबल इब्राहिम कासकर के साथ हाजी मस्तान औरकरीम लाला की दोस्ती नहीं होती तो दाऊद को कभी इनके जैसा बनने की प्रेरणा नहीं मिलती. पुलिस कॉन्स्टेबल इब्राहिम कास्कर भले ही करीम लाला या हाजी मस्तान से आर्थिक मदद लेने से बचते रहे मगर उनके बेटे दाऊद को इससे परहेज़ नहीं था. दाऊद ने इन डॉन्स का अनुसरण किया और अपने इरादों को पूरा करते हुए इनकी चमक को फीका भी कर दिया. इमर्जेंसी के बाद हाजी मस्तान और करीम लाला, दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. इससे एक नया दौर शुरू हुआ. हाजी मस्तान का इरादा बॉलीवुड में प्रवेश करने का था और करीम लाला ने अपनी छवि की फिक्र करते हुए अपना क़दम बढ़ाने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया. सात फ़ुट के करीम लाला को उनके क़द, ट्रेड मार्क सफ़ारी सूट और गहरे काले रंग के चश्मे के लिए पहचाना जाता था. यूँ तो मुंबई में कई अंडरवर्ल्ड सरगनाओं ने काम किया है लेकिन उनमें से एक नाम ऐसा है. अब तक दाऊद इब्राहीम की पहचान एक खतरनाक गैंगस्टर की बन गई थी जो पठानों को निशाने पर ले रहा था. भले ही दाऊद ने करीम लाला की भतीजी समद ख़ान और दूसरे क़रीबी लोगों की जान ली मगर करीम लाला को कभी निशाने पर नहीं लिया. आख़िकरकार दोनों के बीच मक्का में मुलाक़ात हुई, दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया और समझौता हो गया. हाजी मस्तान और करीम लाला की मुसलमान बहुत इज्जत करते थे और उन्हें अपने सभी कार्यक्रमों में आमंत्रित करते थे. दोनों सोशली बहुत एक्टिव थे और शायद इन्हीं में किसी मौक़े पर वह इंदिरा गांधी के साथ कैमरे में कैद हो गए. वैसे संयोग से, करीम लाला कभी क़ानून से नहीं भागे और न ही उनके नाम पर अपराधों की कोई लंबी फेहरिस्त थी. उन्हें 90 के दशक में एक बार जबरन मकान खाली करवाने के मामले में ज़रूर गिरफ़्तार किया गया था.
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कन्हैया कुमार की लोकप्रियता से चिंतित मोदी सरकार

Date : 16-Jan-2020
नई दिल्ली 16 जनवरी। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और युवा नेता कन्हैया कुमार की लोकप्रियता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिंता में डाल दिया है. यह दावा समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में किया गया है. रॉयटर्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक क़रीबी के हवाले से लिखा है कि युवाओं और पहली बार वोट देने जा रहे वोटरों के बीच कन्हैया कुमार की लोकप्रियता से मोदी सरकार चिंतित है. रिपोर्ट में जानकारी देने वाले क़रीबी का नाम नहीं बताया गया है. रॉयटर्स की इस रिपोर्ट के मुताबिक़, केंद्र सरकार कन्हैया कुमार के व्यक्तिगत जीवन और उन्हें मिलने वाली फ़ंडिंग पर भी क़रीब से नज़र रख रही है.
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RTI:टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्य कौन-कौन हैं?

Date : 16-Jan-2020
नई दिल्ली 16 जनवरी । एक आरटीआई याचिका में गृह मंत्रालय के अधिकारियों से यही सवाल पूछा गया है, जिसका जवाब मंत्रालय अब तक नहीं दे पाया है. वरिष्ठ पत्रकार साकेत गोखले ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत पिछले साल 26 दिसंबर को एक अर्ज़ी डाली थी. अर्जी में जो सवाल पूछे गए थे, वो कुछ इस तरह थे: -टुकड़े-टुकड़े गैंग कैसे और कब बना? -इसके सदस्य कौन-कौन हैं? -इसे यूएपीए (अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट) के तहत पाबंदी क्यों नहीं लगाई गई? याचिकाकर्ता साकेत गोखले का कहना है कि उन्होंने ये सवाल पूरी गंभीरता से पूछे हैं और अगर तय अवधि के भीतर (26 जनवरी तक) अर्ज़ी का जवाब नहीं मिला तो वो मामले को मुख्य सूचना आयुक्त तक लेकर जाएंगे. टुकड़े-टुकड़े गैंग शब्द का प्रयोग अमूमन सत्ताधारी बीजेपी और दक्षिणंथी संगठन जेएनयू के छात्रों और वामपंथी विचारधारा के युवाओं के लिए करते हैं. कुछ दिनों पहले ही जेएनयू के पूर्व छात्र रहे भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था कि उनके समय में जेएनयू में टुकड़े-टुकड़े गैंग नहीं था.
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मकर संक्रांति हर साल 14 या 15 जनवरी को ही क्यों?

Date : 14-Jan-2020
मकर संक्रांति एक ऐसा त्यौहार है जो पूरे भारत में अलग-अलग राज्यों में कई नामों और कई तरीक़ों से मनाया जाता है. उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति कहा जाता है तो यही तमिलनाडु में पोंगल के नाम से जाना जाता है जबकि गुजरात में इसे उत्तरायण कहते हैं. असम में इसे माघी बिहू कहते हैं और कर्नाटक में सुग्गी हब्बा, केरल में मकरविक्लु कहा जाता है तो कश्मीर में शिशुर सेंक्रांत. यह त्यौहार भारत ही नहीं, नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी मनाया जाता है. अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से लोग इसे मनाते हैं लेकिन इस त्यौहार के पीछे एक खगोलीय घटना है. मकर का मतलब है कौन्स्टोलेशन ऑफ़ कैप्रिकॉन जिसे मकर राशि कहते हैं. खगोल विज्ञान के कैप्रिकॉन और भारतीय ज्योतिष की मकर राशि में थोड़ा अंतर है. कॉन्सटोलेशन तारों से बनने वाले एक ख़ास पैटर्न को कहा जाता है जिन्हें पहचाना जा सके, प्राचीन काल से दुनिया की लगभग हर सभ्यता में लोगों ने उनके आकार के आधार पर उन्हें नाम दिए हैं, खगोलीय कौन्स्टोलेशन और ज्योतिष की राशियां मोटे तौर पर मिलती-जुलती हैं लेकिन वे एक ही नहीं हैं. संक्रांति का मतलब संक्रमण यानी ट्रांजिशन, इस दिन मोटे तौर पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है. यह विंटर सोलिस्टिस के बाद आता है, यानी सर्दियों की सबसे लंबी रात 22 दिसंबर के बाद. सूर्य के किसी राशि में प्रवेश करने या निकलने का अर्थ यह नहीं है कि सूर्य घूम रहा है, यह पृथ्वी के सूर्य के चारों तरफ़ चक्कर लगाने की प्रक्रिया का हिस्सा है, इसे परिभ्रमण कहते हैं और धरती को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में एक साल का समय लगता है. इसका आसान भाषा में यह मतलब है कि सूर्य किस तारा समूह (राशि) के सामने आ गया है. कहा जाता है कि मकर संक्रांति के बाद से दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी, यह बात तकनीकी तौर पर सही है क्योंकि नॉर्दर्न हैमिस्फ़ियर (उत्तरी गोलार्ध) में 14-15 जनवरी के बाद से सूर्यास्त का समय धीरे-धीरे आगे खिसकता जाता है. फिर आती है 21 मार्च की तारीख़, इसे इक्विनॉक्स कहते हैं जब दिन और रात दिनों ठीक बराबर होते हैं इसका मतलब है कि सूर्य उत्तरी गोलार्ध के तकरीबन बीचो-बीच है. सूर्यास्त का समय धीरे-धीरे आगे खिसकने का मतलब है कि सर्दियां कम होंगी और गर्मी बढ़ेगी क्योंकि सूर्य उत्तरी गोलार्ध के सीध में अधिक समय तक रहेगा. मकर संक्रांति को उत्तरायण इसलिए भी कहते हैं कि सूरज दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की तरफ़ आना शुरू हो जाता है. यह प्रक्रिया समर सोलिस्टिस के दिन पूरी होती है जिस दिन सबसे लंबा दिन होता है, यह तारीख़ 21 जून है. मकर संक्रांति यानी सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने का संक्रमण काल. वैसे भारत में प्रचलित सभी हिंदू कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित हैं यही वजह है कि हिंदू त्यौहारों की अंग्रेज़ी तारीख़ बदलती रहती है. इस समय जो कैलेंडर इस्तेमाल होता है उसे ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं जो सोलर कैलेंडर है यानी सूर्य पर आधारित कैलेंडर है. मकर संक्रांति एक ऐसा त्योहार है जो धरती की तुलना में सूर्य की स्थिति के हिसाब से मनाया जाता है, यही वजह है कि चंद्रमा की स्थिति में मामूली हेरफेर की वजह से यह कभी 14 जनवरी को होता है तो कभी 15 को, लेकिन सूर्य की मुख्य भूमिका होने की वजह से अंग्रेज़ी तारीख़ नहीं बदलती.
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