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भारत को बेहतर विपक्ष की ज़रूरत - अभिजीत बनर्जी

Date : 27-Jan-2020
नई दिल्ली 27 जनवरी । नोबेल पुरुस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा है कि अधिनायकवाद और आर्थिक सफलता में कोई संबंध नहीं है. उन्होंने कहा है, भारत को एक बेहतर विपक्ष की ज़रूरत है. और विपक्ष किसी भी लोकतंत्र का दिल होता है. सत्तारूढ़ दल को बेहतर विपक्ष की आकांक्षा होनी चाहिए ताकि वह उसे नियंत्रण में रख सके.
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गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि जायर बोलसोनारो काफी चर्चा में है

Date : 26-Jan-2020
भारत आज अपना 71वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. इस मौक़े पर ब्राज़ील के राष्ट्रपति ज़ायर बोलसोनारो भारत के मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद होंगे. बोलसोनारो की यह पहली भारत यात्रा है. गणतंत्र दिवस से पूर्व भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्राज़ील के राष्ट्रपति बोलसोनारो ने एक-दूसरे से मुलाक़ात की. दोनों नेताओं के बीच 15 समझौते हुए. ये समझौते स्वास्थ्य, जैव ऊर्जा सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, भू-गर्भ और खनिज संसाधनों सहित अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हुए. ब्राज़ील के राष्ट्रपति बोलसोनारो की गिनती अति दक्षिणपंथी नेता के तौर पर की जाती है. उन्हें ब्राज़ील का ट्रंप भी कहा जाता है. गणतंत्र दिवस के क्या मायने हैं इनके लिए बीते दिनों बोलसोनारो काफी चर्चा में भी रहे. अमेज़न के वर्षा वनों में लगी भयानक आग के लिए एक बड़ा वर्ग उन्हें ज़िम्मेदार मानता है. इस वर्ग का मानना है कि बोलसोनारो की नीतियां अमेज़न के वर्षा वन में लगी आग के लिए ज़िम्मेदार थीं और उन्होंने समय पर और कारगर कार्रवाई भी नहीं की. लेकिन बोलसोनारो का परिचय सिर्फ़ एक दक्षिण पंथी नेता के तौर पर नहीं है. 64 साल के ज़ायर बोलसोनारो अपने बयानों को लेकर विवादों में रहते हैं. वे गर्भपात, नस्ल, शरणार्थी और समलैंगिकता को लेकर भड़काऊ बयान दे चुके हैं. बोलसोनारो पूर्व सेना प्रमुख रह चुके हैं और वे ख़ुद की छवि ब्राजील के हितों के रक्षक के तौर पर पेश करते हैं. महिला विरोधी बयान देने वाले बोलसोनारो ने जब चुनाव के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी तो उनके विरोध में कई रैलियां की गईं. अक्टूबर साल 2018 में आए नतीजों ने उन्हें शीर्ष पद पर बिठा दिया. उनकी जीत ब्राज़ील में आए दक्षिणपंथी रुझान को भी दर्शाती है. ब्राज़ील 1964 से 1985 तक सैन्य शासन में रहा है. हिटलर जैसे तानाशाह कुछ मीडिया के जानकार उन्हें ट्रंप ऑफ ट्रॉपिक्स यानी ब्राज़ील का ट्रंप कहते हैं. उनके चुनाव और सोशल मीडिया प्रचार की तुलना ट्रंप के चुनावी प्रचारों से की गई थी. बोलसोनारो के प्रतिद्वंदी रहे सिराओ गोमेज़ उन्हें ब्राज़ील का हिटलर भी कह चुके हैं. महिला-विरोधी छवि साल 2014 में रियो डी जेनेरियो से बतौर कांग्रेस उम्मीदवार उन्हें सबसे ज़्यादा वोट मिले थे. ख़ास बात ये है कि इस दौरान भी उन्होंने कई भड़काऊ बयानों से सुर्ख़ियां बटोरी थीं. साल 2016 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति डिल्मा रोसेफ़ पर चल रहे महाअभियोग के दौरान कांग्रेस सदस्यों द्वारा मतदान किए जा रहे थे उस वक़्त बोलसानरो ने दिवंगत नेता कर्नल एलबर्टो उस्तरा को अपना वोट दिया था. एलबर्टो ब्राज़ील के बेहद विवादित नेता हैं. जिन पर देश में सेना की तानाशाही के दौरान कैदियों को प्रताड़ित करने का आरोप है. इसी साल उन्होंने अपनी सहयोगी पर बेहद विवादित और अपमानजनक बयान दिया. उन्होंने कहा, वह महिला इस लायक नहीं है कि उसका बलात्कार किया जाए, वह बेहद बदसूरत और मेरे टाइप की नहीं है. बीते कुछ सालों में उन्होंने अपने सीमा से जुड़े प्रस्तावों को और बढ़ाया है. इसके साथ ही वे आम लोगों की सुरक्षा और क़ानून-व्यवस्था की बात करते हैं. ब्राज़ील में बढ़ते अपराध के बीच उनकी ये बातें उन्हें आम मतदाताओं के बीच लोकप्रिय बनाने का एक बड़ा कारण मानी गईं. 11 सितंबर 2018 को उन्होंने ट्वीट किया, सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है, ये बेहद ज़रूरी है. लोग रोज़गार चाहते हैं, शिक्षा चाहते हैं. लेकिन नौकरियों का कोई मतलब नहीं होगा यदि वो घरों को आएं और रास्ते में ही लूट लिए जाएं तो. यदि ड्रग्स की तस्करी स्कूलों में होगी तो शिक्षा का कोई मतलब नहीं होगा. साल 2011 में प्लेब्यॉय को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, मैं अपने बेटे को एक समलैंगिक होने से बेहतर एक सड़क हादसे में मरते देखना चाहूंगा. साल 2018 जून में एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, राजनीतिक रूप से सही होना वामपंथियों का काम है. मुझ पर हमेशा सबसे ज़्यादा हमले होते रहे हैं. ब्राज़ील के कई नौजवानों को उनकी भाषाशैली रिझाती है तो कई को उनके सोशल मीडिया पर कही जाने वाली बातें लुभाती हैं. हालांकि कई ऐसे लोग भी हैं जो समलैंगिकता पर उनके विचारों पर असहमति दर्शाते हैं. बोलसोनारो का जन्म 21 मार्च,1955 को साउ पाउलो के कैंपिनास शहर में हुआ था. साल 1977 में उन्होंने अगलस नेग्रास मिलेट्री अकादमी से ग्रेजुएशन किया. साल 1986 में उन्हें एक पत्रिका में लिखे लेख के लिए जेल जाना पड़ा था. इस लेख में उन्होंने सेना की कम तनख़्वाह की शिकायत की थी. साल 1990 में वे पहली बार कांग्रेस गए. बोलसोनारो के वैवाहिक जीवन की बात करें तो उन्होंने तीन शादियां की हैं.
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योगी आदित्यनाथ ने कहा 'आज़ादी' के नारे लगाए तो देशद्रोह का केस होगा

Date : 23-Jan-2020
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चेतावनी दी है कि आज़ादी के नारे लगाने को देशद्रोह की श्रेणी में माना जाएगा. कानपुर में नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में एक रैली के दौरान उन्होंने कहा, धरना प्रदर्शन के नाम पर कश्मीर में जो कभी आज़ादी के नारे लगते थे, अगर इस प्रकार के नारे लगाने का कार्य करोगे, तो ये देशद्रोह की श्रेणी में आएगा और फिर सरकार इस पर कठोरतम कार्रवाई करेगी. ये स्वीकार्य नहीं हो सकता है. साथ ही उन्होंने विपक्षी दलों पर देश की क़ीमत पर राजनीति करने और विरोध के लिए महिलाओं को धरने पर बैठाने का आरोप लगाया. योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ऐसी महिलाओं को आगे करके विरोध प्रदर्शन करवाया जा रहा है जिन्हें सीएए की कोई जानकारी नहीं है. उनसे पूछो तो वो कहते हैं घर के मर्दों ने कहा कि हम इतने अक्षम हो चुके हैं कि कुछ कर सकें इसलिए तुम्हीं जाकर धरने पर बैठो. देश में कई जगहों पर नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. उत्तर प्रदेश में भी कई जगहों पर सीएए का विरोध किया गया है.
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क्यों वायरल हो रहा है प्रिया वर्मा डिप्टी कलेक्टर का वीडियो

Date : 20-Jan-2020
भोपाल 20 जनवरी । रविवार देर शाम से ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. गुलाबी रंग का कोट पहने एक महिला इस वीडियो में कुछ प्रदर्शनकारियों को धकेलती नज़र आ रही हैं. वीडियो में दिखता है कि कुछ देर बाद यही महिला एक प्रदर्शनकारी को पकड़ती हैं और फिर थप्पड़ मारती हैं. यह महिला दरअसल मध्य प्रदेश के राजगढ़ की डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा हैं. राजगढ़ में धारा 144 लागू है, बावजूद इसके बीजेपी के कुछ कार्यकर्ताओं ने बरौरा क़स्बे में नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में रैली निकाली थी. इसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई. ये वीडियो उसी झड़प के दौरान का है. इस वीडियो को समाचार एजेंसी भी जारी किया है जिसमें एक जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हाथापाई हो रही है. प्रिया वर्मा भी वहीं मौजूद थीं और इसी बीच किसी ने उनके बाल खींच दिए. #WATCH Madhya Pradesh: A protestor pulls hair of Rajgarh Deputy Collector Priya Verma, after she hits BJP workers and drags them. The clash broke out during a demonstration in support of #CAA. 21 साल की उम्र में डीएसपी बनीं प्रिया वर्मा इंदौर के पास के एक गांव मांगलिया की रहने वाली हैं. साल 2014 में प्रिया वर्मा ने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास की थी. उनकी पहली पोस्टिंग भैरवगढ़ जेल में बतौर जेलर हुई. इसके बाद साल 2015 में वो डीएसपी बन गईं. साल 2017 में एक बार फिर परीक्षा देकर उन्होंने प्रदेश में चौथा स्थान हासिल किया और डिप्टी कलेक्टर बनीं. कलेक्टर का वीडियो भी हुआ शेयर एक अन्य वीडियो में प्रिया वर्मा के अलावा एक और महिला प्रदर्शनकारियों से उलझती हुई नज़र आ रही हैं. इस वीडियो को मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शेयर किया है. यह महिला राजगढ़ की कलेक्टर निधि निवेदिता हैं. उनका वीडियो ट्वीट करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने लिखा है, "कलेक्टर मैडम, आप यह बताइए कि क़ानून की कौन सी किताब आपने पढ़ी है जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों को पीटने और घसीटने का अधिकार आपको मिला है. @ChouhanShivraj कलेक्टर मैडम, आप यह बताइये कि कानून की कौन सी किताब आपने पढ़ी है जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों को पीटने और घसीटने का अधिकार आपको मिला है? सरकार कान खोलकर सुने ले, मैं किसी भी कीमत पर मेरे प्रदेशवासियों के साथ इस प्रकार की हिटलरशाही बर्दाश्त नहीं करूंगा! #CAA @ChouhanShivraj इस पूरे मामले को लेकर डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा का नाम ट्विटर पर भी ट्रेंड कर रहा है. कुछ लोगों ने उनकी इस कार्रवाई को लेकर राज्य की कमलनाथ सरकार पर सवाल उठाए हैं तो कुछ लोगों का कहना है कि क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जो क़दम उठाया गया, वह सही था. एएनआई की ख़बर के मुताबिक़, राजगढ़ में धारा 144 का उल्लंघन करने के आरोप में 124 लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई है. साथ ही 17 अभियुक्तों तो हिरासत में भी लिया गया है. दो लोगों के ख़िलाफ़ डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा को धक्का देने और बाल खींचने के आरोप में भी दो लोगों पर एफ़आईआर दर्ज की गई है. जिनमें से एक अभियुक्त को हिरासत में भी ले लिया गया है. राज्य सरकार की ओर से अभी तक तो इस पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है लेकिन इस वीडियो के सामने आने के बाद राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे लोकतंत्र का काला दिन बताया है. उन्होंने लिखा, आज का दिन लोकतंत्र के सबसे काले दिनों में गिना जाएगा.
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CAA लागू करने से इनकार नहीं कर सकते राज्य: कपिल सिब्बल

Date : 19-Jan-2020
नई दिल्ली 19 जनवरी । पूर्व केंद्रीय मंत्री, जानेमाने वकील और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने कहा है कि नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) संसद में पारित हो चुका है और अब कोई राज्य इसे लागू करने से इनकार नहीं कर सकता क्योंकि ऐसा करना असंवैधानिक होगा. कपिल सिब्बल का कहना है, सीएए के पास हो जाने के बाद कोई राज्य ये नहीं कह सकता कि मैं इसे लागू नहीं करूंगा. ये असंभव है और ऐसा करना असंवैधानिक होगा. आप इसका विरोध कर सकते हैं, विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर सकते हैं और केंद्र सरकार से इसे वापस लेने के लिए कह सकते हैं. कपिल सिब्बल के इस बयान से पहले केरल सरकार ने सीएए को संविधान में उल्लेखित समानता, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. पंजाब विधानसभा ने भी सीएए के ख़िलाफ़ सदन में प्रस्ताव पारित किया था. केरल और पंजाब की तरह राजस्थान, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की सरकारों ने भी सीएए का विरोध करते हुए कहा है कि वो इसे लागू नहीं करेंगी. सीएए के विरोध में बीते लगभग एक महीने से दिल्ली के शाहीन बाग़ में बड़ी संख्या में लोग धरने पर बैठे हैं. शाहीन बाग़ की तर्ज़ पर भारत के कुछ अन्य शहरों में भी लोगों ने सीएए का विरोध किया है.
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नागरिकता सिर्फ अधिकार नहीं: चीफ़ जस्टिस बोबड़े

Date : 19-Jan-2020
नागपुर 19 जनवरी । नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) पर जारी विवाद के बीच भारत के चीफ़ जस्टिस एस. ए. बोबड़े ने कहा है कि नागरिकता सिर्फ लोगों के अधिकारों के बारे में नहीं है, बल्कि समाज के प्रति उनके कर्तव्यों के बारे में भी है. नागपुर में एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में जस्टिस बोबड़े ने कहा कि कुछ शिक्षण संस्थानों की मानसिकता बेहद कमर्शियल हो गई है. उन्होंने कहा कि शिक्षा का असल मकसद बुद्धि और चरित्र का विकास करना है, लेकिन दुर्भाग्य से कुछ संस्थान वाणिज्यिक मानसिकता वाले बन गए हैं. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय शिक्षा का उद्देश्य क्या होना चाहिए, इसका जवाब हमें तलाशना चाहिए.
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दोषियों को माफ़ करने की सलाह पर भड़कीं निर्भया की माँ

Date : 18-Jan-2020
निर्भया की माँ आशा देवी ने सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह के उस ट्वीट पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उनसे दोषियों को माफ़ कर देने की अपील की गई थी. निर्भया की माँ ने समाचार एजेंसी से बात करते हुए कहा, इंदिरा जयसिंह कौन है जो मुझे सुझाव दे रही हैं? पूरा देश चाहता है दोषियों को फांसी की सज़ा दी जाए. उन जैसे लोगों की वजह से बलात्कार पीड़ितों के साथ न्याय नहीं हो पाता है. सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने ट्वीट करके लिखा था, मैं आशा देवी का दर्द समझती हूं, फिर भी अपील करती हूं कि वह सोनिया गांधी के उदाहरण पर चलें जिन्होंने नलिनी को माफ़ करते हुए कहा था कि वह उनके लिए मृत्युदंड नहीं चाहतीं. हम आपके साथ हैं मगर मृत्युदंड के पक्ष में नहीं हैं. इस पर निर्भया की माँ आशा देवी ने कहा, यक़ीन नहीं होता कि इंदिरा जयसिंह ने इस तरह का सुझाव देने की हिम्मत भी कैसे कर ली. मैं सुप्रीम कोर्ट में कई कई बार उनसे मिली हूं. उन्होंने कभी मेरा हाल नहीं पूछा और आज वह दोषियों के लिए बोल रही हैं. ऐसे लोगों की रोज़ी-रोटी बलात्कारियों का समर्थन करके चलती है, इसीलिए बलात्कार की घटनाएं थम नहीं रहीं. निर्भया मामले में दोषियों के ख़िलाफ़ नया डेथ वॉरंट जारी किया गया है. पटियाला कोर्ट ने दोषियों को फांसी देने के लिए एक फ़रवरी को सुबह छह बजे का वक्त तय किया है.
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संघ:अगली योजना दो बच्चों का क़ानून

Date : 17-Jan-2020
संघ प्रमुख ने कहा- अगली योजना दो बच्चों का क़ानून बनवाना है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि आरएसएस की आगामी योजना देश में दो बच्चों का क़ानून लागू कराना है. मोहन भागवत ने ये बात पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में गुरुवार को संघ के कार्यकर्ताओं से बातचीत के लिए आयोजित जिज्ञासा सत्र के दौरान कही. आरएसएस प्रमुख गुरुवार से चार दिन के लिए मुरादाबाद के दौरे पर हैं. संघ प्रमुख का कहना था कि ये योजना संघ की है लेकिन इस पर कोई भी फ़ैसला सरकार को लेना है. संघ प्रमुख ने इस कार्यक्रम में स्वयंसेवकों के कई सवालों के जवाब दिए. राम मंदिर के मुद्दे पर उन्होंने कहा, संघ की भूमिका इस प्रकरण में सिर्फ़ ट्रस्ट निर्माण होने तक है. इसके बाद संघ ख़ुद को इससे अलग कर लेगा. कार्यकर्ताओं के सवालों के जवाब में मोहन भागवत ने कहा कि मथुरा और काशी का मामला संघ के एजेंडे में ना तो कभी था और ना ही आगे रहेगा. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद-370 हटाने, सीएए लागू करने जैसे मामलों में संघ पूरी तरह से सरकार के साथ है.
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यौन हिंसा की शिकायत की क्या क़ीमत चुकाती हैं औरते

Date : 16-Jan-2020
(चेतावनी : हो सकता है कि यह लेख आपको विचलित करे) ऐसा हो सकता है कि किसी औरत ने रेप की शिकायत की हो और उसके मामले में कार्रवाई भी हुई हो जिसके बाद उसे न्याय भी मिल गया हो, लेकिन ऐसे मामलों की भी कमी नहीं है जिनमें जब किसी औरत ने अपने साथ हुए रेप की शिकायत की तो उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए तबाह हो गई. अगर आपको ये लगता है कि ऐसा सिर्फ़ भारत में होता है, तो ऐसा नहीं है. चेतावनी : हो सकता है कि यह लेख आपको विचलित करे क्या रेप की शिकायत करने के साथ ही औरत की ज़िंदगी बर्बाद हो जाती है? इस बात पर एकतरफ़ा कुछ भी नहीं कहा जा सकता. क्योंकि ये सच है कि कुछ औरतों को न्याय मिलता है लेकिन इस सच को भी नकारा नहीं जा सकता कि कुछ औरतों को अपनी बात रखने की भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है. बीते कुछ सालों में रेप से जुड़े मामलों को लेकर जागरुकता बढ़ी है. कई तो ऐसे मामलों भी सामने आए जिन पर यक़ीन करना मुश्किल होता है. प्रोड्यूसर हार्वे विंस्टन का मामला हो या फिर अभिनेता बिल कोस्बी का केस. इन हाई प्रोफ़ाइल मामलों ने रेप और यौन हिंसा जैसे मामलों को सुर्खियों में ला दिया है. भारत में हुए गैंग रेप के मामलों और स्पेन में भी हुई ऐसी घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने व्यापक रूप से प्रकाशित किया. इन सबका एक नतीजा ये हुआ कि #MeToo जैसे आंदोलन पूरी दुनिया में शुरू हो गए. द रेपिस्ट इज़ यू जैसे गाने पूरी दुनिया में छा गए. लेकिन सिर्फ़ जागरुकता ही पर्याप्त नहीं है. पीड़ित को न्याय भी तो मिले- रेप पीड़ितों के लिए अभियान चलाने वालों का कहना है कि अपनी शिकायतें लेकर आने वाली महिलाओं की संख्या निश्चित तौर पर बढ़ी है लेकिन इससे किसी भी तरह रेप के मामले नहीं घटे हैं. अकेले ब्रिटेन में साल 2019 के आंकड़े अपने निम्नतम स्तर पर रहे. इंग्लैंड और वेल्स में पुलिस द्वारा दर्ज किए गए रेप केस के हर सौ मामलों में से सिर्फ़ तीन मामलों में ही अभियुक्तों को सज़ा मिली. जबकि दस साल पहले रेप के अभियुक्त को कोर्ट से सज़ा मिलना आज की तुलना में काफी आसान था. साइप्रस का न्याय और शर्मिंदगी इसी सप्ताह एक बेहद घबराई-परेशान ब्रिटिश किशोरी अपने घर लौटी. साइप्रस की क़ानूनी कार्रवाई के चलते यह किशोरी बीते छह महीने से हिरसात में थी. साइप्रस का न्याय- धिक्कार है! महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली कार्यकर्ताओं के लिए यह नारा बन गया. इन प्रदर्शनों में वो औरतें भी शामिल थीं जो इसरायल से थीं, वे कोर्ट के बाहर खड़ी होकर ये नारे बार-बार दोहरा रही थीं. " वे उस किशोरी के समर्थन में खड़ी थीं जिसे रेप का झूठा आरोप लगाने को लेकर सज़ा सुनाई गई थी. साइप्रस के सांसद कोउकोउमा ने कहा कुछ लोग कह सकते हैं कि यह राहत की ख़बर हो सकती है, उस लड़की के लिए भी. लेकिन इस सारे मामले की कार्रवाई और इस सामले को जिस तरह से आगे बढ़ाया गया वो बिल्कुल भी ठीक नहीं था. बहुत से सवाल थे जिनका जवाब मिलना बाकी था. यह केस जुलाई 2019 का है. जब एक किशोरी ने पुलिस से कहा कि 12 इसरायली मर्द उसके कमरे में धमक पड़े. उस वक़्त वो उनके एक दोस्त के साथ आपसी सहमति से सेक्स कर रही थी. उसका कहना था कि वो कमरे में धमक पड़े और उन्होंने उसका रेप किया. उन मर्दों को गिरफ़्तार किया गया लेकिन गवाही की ज़रूरत नहीं समझी गई. दावे पीछे रह गए हालांकि उस किशोरी से घंटों तक पूछताछ की गई. और जिस वक़्त पुलिस उससे पूछताछ कर रही थी वहां उसके साथ कोई वक़ील नहीं था. और अंत में वो अपने ही किए दावों से पीछे हट गई. सभी 12 इसरायली आज़ाद कर दिए गए और वे घर लौट गए लेकिन इस लड़की को जेल भेज दिया गया. उनकी मां का कहना था कि उनकी बेटी अपने साथ हुए रेप की शिकायत कराने बतौर पीड़ित गई थी लेकिन... उनकी मां ने कहा, उससे एक दूसरा बयान दर्ज कराने को कहा गया और उसने बताया कि उसे इस झूठा बयान को देने के लिए मजबूर किया गया. उसने मुझे बताया कि जिस वक़्त ये सारा कुछ हो रहा था वो बुरी तरह से डर हुई थी. उन्होंने कहा कि वो उसे गिरफ़्तार कर लेंगे. उन्होंने कहा कि अगर उसने इस नए बयान पर हस्ताक्षर नहीं किए तो वे उसके ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय वारंट लेकर आएंगे और उसे गिरफ़्तार कर लेंगे. और अगर वो उनके दिए बयान पर हस्ताक्षर कर देती है तो वे उसे जाने देंगे. और उस समय वो सिर्फ़ और सिर्फ़ वहां से निकलना चाहती थी. उस किशोरी की वक़ील लेविस पावर क्यूसी ने बताया, यह बेहद परेशान करने वाला और चिंता में डालने वाला था. वो क़रीब साढ़े चार हफ़्ते के लिए हिरासत में थी. वो एक ऐसी जेल में थी जहां पहले से ही आठ औरतें थीं. उसकी ज़मानत की शर्ते भी बेहद कठोर थीं. " लेकिन अब वो आज़ाद है और अपने घर जा सकती है लेकिन उसका नाम पुलिस की लिस्ट में आ चुका है. उनकी मां का कहना है कि उनकी बेटी अब भी उस बुरे वक़्त के सदमे से बाहर नहीं आ सकी है. किशोरी का कहना है कि पुलिस ने उसे उसकी बात से पलटने के लिए मजबूर किया. उस पर झूठ बोलने के लिए दबाव डाला. उनकी वक़ील का कहना है कि उनकी लीगल टीम यूरोपियन कोर्ट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स जाने के लिए विचार कर रही है. यह केस अभी तक ख़त्म नहीं हुआ है. लड़कियों की इज़्ज़त को दांव पर लगाने जैसा है ये भले ही कोई रेप केस अमरीका में हुआ हो, स्पेन में हुआ हो, भारत में हुआ हो, साइप्रस में हुआ हो या फिर ब्रिटेन में, इस बात से इनक़ार नहीं किया जा सकता है कि रेप के मामले में महिला को ही सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है. बहुत से मामलों में पीड़ित को लग सकता है कि अभियुक्त के बजाय पुलिस, मीडिया और न्याय व्यवस्था और लोगों द्वारा उन्हें ही कठघरे में खड़ा कर दिया गया है. चैरिटी संस्था रेप क्राइसिस इंग्लैंड एंड वेल्स की प्रवक्ता कैटी रसेल का कहना है कि भले ही एक लंबी न्याय प्रक्रिया के बाद रेप पीड़िता को न्याय मिल भी जाए तो भी इस दौरान उनके साथ जिस तरह का व्यवहार होता है वो मनोबल तोड़ने के लिए काफी होता है. इन सबके पीछे लिंग भेद और गलत भावना निहित होती है. महिलाओं के लिए ऐसा मान लिया जाता है कि उनका उन्हीं के शरीर पर अधिकार नहीं है क्योंकि वो पुरुषों की तुलना में उतनी महत्वपूर्ण नहीं. मेरे साथ भी बलात्कार हुआ एक ओर जहां साइप्रस की रेप पीड़िता अपने घर लौट चुकी है वहीं बहुत सी औरतें हैं जिन्होंने ये स्वीकार किया है कि साइप्रस में उनके साथ भी बलात्कार हुआ. उन्होंने माना कि उन्होंने अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार की शिकायत नहीं दर्ज कराई. उन्होंने माना कि इसके पीछे एक ही वजह थी और वो था उनका डर. सोफ़ी(बदला हुआ नाम) छुट्टियां बिताने साइप्रस गई थीं. उन्होंने कहा जो हुआ, वह देखना बेहद दुखद था. मैं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही थी. वहां ऐसा लग रहा था कि वहां मौजूद मर्द मुझे उनकी मर्ज़ी से छूने के लिए आज़ाद हैं. सोफ़ी बताती हैं कि वो एक बीच पार्टी में थीं और तभी एक शख़्स उनके लिए एक ड्रिंक लेकर आया. मैं यह समझ पा रही थी कि मैं धीरे-धीरे अब अचेत हो रही हूं और उसके बाद मैं एक बात समझ गई थी कि कोई मेरे साथ यौन हिंसा कर रहा है. अगली सुबह जब सोफ़ी टॉयलेट गईं तो उन्हें उनकी वजाइना से कंडोम मिला. जिससे पुष्टि हो गई कि उनके साथ रेप हुआ. सोफ़ी कहती हैं कि वो शिकायत करना चाहती थीं लेकिन उन्हें किसी से समर्थन नहीं मिला. हालांकि अब वो अपने उस फ़ैसले को लेकर खुश ही हैं कि उन्होंने शिकायत नहीं की वरना उन्हें भी उस किशोरी की तरह बहुत कुछ झेलना पड़ता. हमें बदलाव की ज़रूरत है एक बड़ी समस्या यह है कि हर संस्कृति क़ानून के तहत सहमति को अपने तरीके से समझती है. कुछ देशों जैसे ब्रिटेन में, अगर सहमति से सेक्स नहीं किया है तो यह रेप की श्रेणी में आता है. साल 2018 के स्वीडन के क़ानून के तहत निष्क्रिय होना सेक्स के लिए सहमति देने का संकेत नहीं है. लेकिन हर जगह ऐसे नियम नहीं हैं. केटी रसेल कहती हैं, अगर हम चाहते हैं कि चीज़ें सुधरें तो सिर्फ़ क़ानून बनाना ही काफी नहीं है.बात अगर भारत की करें तो यहां रेप अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कोर्ट जा रही एक महिला को उसके अभियुक्तों ने ही जला दिया. मान्यताओं को बदलने की ज़रूरत है हमें एक तरह के सांस्कृतिक बदलाव की ज़रूरत है जो रुढ़ियों और ग़लत विचारों से परे हो. इसरायल में रेप क्राइसिस सेंटर एसोसिएशन के प्रमुख ओरित सोलिट्ज़ेनू ने बताया कि वो किशोरी के परीक्षण के लिए साइप्रस गए थे. उन्होंने बताया कि बलात्कार के बारे में झूठ बोलेने की सज़ा चौंकाने वाली थी. उन्होंने मुझे सज़ा के बारे में जो बताया वो पूरी तरह से एक पिछड़ी सोच को दिखाने वाला था. साफ़ समझ आ रहा था कि उन्हें बलात्कार की गंभीरता का अंदाज़ा नहीं. वहां के जज को यह अवश्य समझना चाहिए कि क्या होता है जब एक लड़की कहती है कि उसके साथ रेप हुआ है. रेप पीड़िता, सोशल मीडिया और बदले की भावना बहुत बार ऐसा भी होता है कि रेप पीड़िता और उसके परिवार को सोशल मीडिया पर लोगों के भद्दे कमेंट्स झेलने पड़ते हैं और बहुत बार ऐसा भी होता है कि उन्हें बदले की भावना का भी शिकार होना पड़ता है. कई बार रीवेंज पॉर्न का. साइप्रस अटैक के घंटों बाद एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें बहुत से आदमी एक ब्रिटिश औरत के साथ सेक्स करते दिख रहे थे. स्पेन में जिस महिला के साथ गैंग रेप हुआ उसने भी इस बात की पुष्टि की कि उसके साथ रेप करने वालों ने उसका वीडियो बनाया था. जिसे बाद में बहुत से ग्रुप में शेयर भी किया गया. रेप के झूठे आरोप लगाए जाते हैं लेकिन ये बहुत कम मामलों में होता है. शायद एक प्रतिशत से भी कम मामलों में ऐसा होता है. और कोई ऐसा करे भी क्यों...कौन इस तरह सामने आना चाहेगा और अपनी ज़िंदगी को तमाशा बनाना चाहेगा?
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फांसी की सज़ा सरकारी छुट्टी के दिन नहीं होती,और क्या होता हैं

Date : 15-Jan-2020
फांसी के दिन क्या-क्या होता है और कैसे 16 दिसंबर 2012. देश के लगभग हर ज़हन में दर्ज ये वही तारीख़ है, जब निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. सात साल बाद मुजरिमों को 22 जनवरी को फांसी हो सकती है. दिल्ली में तिहाड़ जेल नंबर-3 में फांसी दी जाती है. देश के दूसरे हिस्सों में और भी कई ऐसी जेल हैं, जहां दोषियों को फांसी दी जाती है. दिल्ली की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और दिल्ली सेंटर ऑन द डेथ पेनल्टी के डायरेक्टर अनुप सुरेंद्रनाथ के मुताबिक़ भारत की 30 से ज़्यादा जेलों में फांसी का तख्ता है. यानी यहां फांसी देने के इंतज़ाम हैं. कैसे दी जाती है फांसी हर राज्य का अपना अलग जेल मैनुअल होता है. दिल्ली के जेल मैनुअल के मुताबिक़ ब्लैक वॉरंट सीआरपीसी (कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर) के प्रावधान के तहत जारी किया जाता है इसमें फांसी की तारीख़ और जगह लिखी होती है. इसे ब्लैक वॉरंट इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके चारों ओर (बॉर्डर पर) काले रंग का बॉर्डर बना होता है. फांसी से पहले मुजरिम को 14 दिन का वक़्त दिया जाता है ताकि वो चाहें तो अपने परिवार वालों से मिल लें और मानसिक रूप से अपने आप को तैयार कर ले. जेल में उनकी काउंसलिंग भी की जाती है. अगर क़ैदी अपनी विल तैयार करना चाहता है तो इसके लिए उसे इजाज़त दी जाती है. इसमें वो अपनी अंतिम इच्छा लिख सकता है. अगर मुजरिम चाहता है कि उसकी फांसी के वक़्त वहां पंडित, मौलवी या पादरी मौजूद हो तो जेल सुप्रिटेंडेंट इसका इंतज़ाम कर सकते हैं. क़ैदी को एक स्पेशल वॉर्ड की सेल में अलग रखा जाता है. फांसी की तैयारी की पूरी ज़िम्मेदारी सूपरिटेंडेंट की होती है. वो सुनिश्चित करते हैं कि फांसी का तख़्ता, रस्सी, नक़ाब समेत सभी चीज़ें तैयार हों. उन्हें देखना होता है कि फांसी का तख्ता ठीक से लगा हुआ है, लीवर में तेल डला हुआ है, सफ़ाई करवानी होती है, रस्सी ठीक हालत में है. फांसी के एक दिन पहले शाम को, फांसी के तख़्ते और रस्सियों की फिर से जाँच की जाती है. रस्सी पर रेत के बोरे को लटकाकर देखा जाता है, जिसका वज़न क़ैदी के वज़न से डेढ़ गुना ज़्यादा होता है. जल्लाद फांसी वाले दिन से दो दिन पहले ही जेल आ जाता है और वहीं रहता है. फांसी देने का वक़्त फांसी हमेशा सुबह-सुबह ही होती है. नवंबर से फ़रवरी - सुबह आठ बजे मार्च, अप्रैल, सितंबर से अक्टूबर - सुबह सात बजे मई से अगस्त - सुबह छह बजे सूपरिटेंडेंट और डेप्युटी सूपरिटेंडेंट फांसी के तय वक़्त से कुछ मिनटों पहले ही क़ैदी के सेल में जाते हैं. सूपरिटेंडेंट पहले क़ैदी की पहचान करता है कि वो वही है, जिसका नाम वॉरंट में है. फिर वो क़ैदी को उसकी मातृभाषा में वॉरंट पढ़कर सुनाते हैं. उसके बाद सूपरिटेंडेंट की ही मौजूदगी में मुजरिम की बातें रिकॉर्ड की जाती है. फिर सूपरिटेंडेंट, जहां फांसी दी जानी है, वहां चले जाते हैं. डिप्टी सूपरिटेंडेंट सेल में ही रहते हैं और उनकी मौजूदगी में मुजरिम को काले कपड़े पहनाकर, उसके हाथ पीछे से बांध दिए जाते हैं. अगर उसके पैर में बेड़ियां हैं तो वो हटा दी जाती हैं. फिर आता है वह पल फिर उसे फांसी के तख्ते की तरफ़ ले जाया जाता है. उस वक़्त डेप्युटी सूपरिटेंडेंट, हेड वॉर्डन और छह वॉर्डन उसके साथ होते हैं. दो वॉर्डन पीछे चल रहे होते हैं, दो आगे और एक-एक तरफ़ से मुजरिम की बांह पकड़ी जाती है. मुजरिम फांसी वाली जगह पहुंचता है. उस जगह सूपरिटेंडेंट, मैजिस्ट्रेट और मेडिकल ऑफ़िसर पहले से मौजूद होते हैं. सूपरिटेंडेंट, मैजिस्ट्रेट को बताता है कि उन्होंने क़ैदी की पहचान कर ली है और उसे वॉरंट उसकी मातृभाषा में पढ़कर सुना दिया है. क़ैदी को फिर हैंगमैन (जल्लाद) के हवाले कर दिया जाता है. अब अपराधी को फांसी के तख्ते पर चढ़ना होता है और उसे फांसी के फंदे के ठीक नीचे खड़ा किया जाता है. उस वक़्त तक वॉर्डन उसकी बांहे पकड़कर रखते हैं. इसके बाद जल्लाद उसके दोनों पैर टाइट बांध देता है और उसके चेहरे पर नक़ाब डाल देता है. फिर उसे फांसी का फंदा पहनाया जाता है. जिन्होंने बाहें पकड़ रखी थी, अब वो वॉर्डन पीछे हो जाते हैं. रेहान फ़ज़ल बता रहे हैं कश्मीरी पृथकतावादी मक़बूल बट्ट के अंतिम क्षणों के बारे में. फिर जैसे ही जेल सूपरिटेंडेंट इशारा करते हैं, हैंगमैन (जल्लाद) लीवर को खींच देता है. इससे मुजरिम जिन दो फट्टों पर खड़ा होता है वो नीचे वेल में गिर जाते हैं और मुजरिम फंदे से लटक जाता है. रस्सी से मुजरिम की गर्दन जकड़ जाती है और धीरे-धीरे वह मर जाता है. बॉडी आधे घंटे तक लटकती रहती है. आधे घंटे के बाद डॉक्टर उसे मरा हुआ घोषित कर देता है. उसके बाद उसकी बॉडी को उतार लिया जाता है और पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया जाता है. सूपरिटेंडेंट अब फांसी का वॉरंट लौटा देता है और ये पुष्टी करता है कि फांसी की सज़ा पूरी हुई. हर फांसी के तुरंत बाद सूपरिटेंडेंट, इंस्पेक्टर जनरल को रिपोर्ट देता है. फिर वो वॉरंट उस कोर्ट को वापस लौटा देते हैं, जिसने ये जारी किया था. पोस्टमॉर्टम के बाद मुजरिम की बॉडी परिवार वालों को सौंप दी जाती है. अगर कोई सुरक्षा कारण है तो जेल सूपरिटेंडेंट की मौजूदगी में शव को जलाया या दफ़नाया जाता है. यहां ये ध्यान देने वाली बात है कि फांसी की सज़ा पब्लिक हॉलीडे यानी सरकारी छुट्टी के दिन नहीं होती.
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