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नागरिका बिल पर इमरान को भारत की सलाह, अपना घर देखे पाकिस्तान

Date : 13-Dec-2019
नई दिल्ली 13 दिसम्बर । भारत सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की टिप्पणी के बाद उनको अपना घर देखने की सलाह दी है. इमरान ख़ान ने विधेयक के लोक सभा से पारित होने के बाद ट्विटर पर लिखा था - हम भारत के इस विधेयक की सख़्त निंदा करते हैं जो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के सारे मानदंडों और पाकिस्तान सरकार के साथ द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन करता है. ये आरएसएस के हिंदू राष्ट्र की योजना का हिस्सा है जिसे फ़ासीवादी मोदी सरकार बढ़ा रही है. इमरान ख़ान के बयान पर गुरुवार को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार की प्रतिक्रिया को प्रकाशित किया है जिसमें उन्होंने इमरान ख़ान को सलाह दी है. रवीश कुमार ने कहा, मैं भारत के अंदरूनी मामलों पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के हर अवांछित और अमर्यादित बयान का जवाब नहीं देना चाहते. ऐसे बयान देकर पाकिस्तान ख़ुद को अपने यहाँ ईशानिंदा के डरावने क़ानून के नाम पर अल्पसंख्यों के दमन से छुटकारा नहीं पा सकता.
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पिता ने अपने दोस्त के साथ मुझे बेडरूम में धकेल दिया

Date : 12-Dec-2019
बारह बरस की इस बच्ची ने अपनी मदद करने वालों को बताया कि हर हफ़्ते के आख़िर में लोग उस के घर आते थे और उसका रेप करते थे. ये सिलसिला पिछले दो वर्षों से चल रहा था. बलात्कारियों में से कुछ तो उसके पिता की जान-पहचान वाले होते थे और कई ऐसे भी होते थे जिन्हें वो भी नहीं जानते थे. उसने बताया कि इन सब की शुरुआत तब हुई जब उसके पिता ने अपने कुछ दोस्तों को शराब पीने के लिए घर पर बुलाना शुरू किया. वो शराब पीकर नशे में उससे छेड़खानी करते थे और वो ये काम लड़की के माँ-बाप के सामने करते थे. कई बार उनमें से कुछ लोग उसकी माँ के साथ एक कमरे वाले मकान के इकलौते सीलन भरे बेडरूम के भीतर कुछ देर के लिए गुम हो जाते थे. उस लड़की ने बताया कि एक दिन उसके पिता ने उसे भी उनके एक दोस्त के साथ बेडरूम में धकेल दिया. फिर उसने बेडरूम के दरवाज़े को बाहर से बंद कर लिया. उस आदमी ने उसके साथ बलात्कार किया. उस लड़की का बचपन बहुत जल्द ही एक डरावने ख़्वाब में तब्दील हो गया था. उसका पिता लोगों को बुलाता था और अपनी बेटी के साथ सोने के लिए उनकी बुकिंग करता था. इसके एवज़ में वो उन लोगों से पैसे लेता था. इस लड़की की मदद करने वालों का मानना है कि तब से कम से कम 30 लोगों ने इस लड़की के साथ बलात्कार किया. 20 सितंबर 2019 को कुछ अध्यापकों से मिली जानकारी के बाद बाल कल्याण विभाग के अधिकारियों ने इस बच्ची को उसके स्कूल से बचाया और उसे एक संरक्षण गृह में ले गए. बाल कल्याण विभाग के अधिकारियों के मुताबिक़ बच्ची का मेडिकल परीक्षण करने पर उसके साथ बलात्कार की तस्दीक़ हो गई. बलात्कार के इस मामले में बच्ची के पिता समेत चार लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. उनपर बलात्कार करने और बच्ची से यौन हिंसा के साथ-साथ पोर्नोग्राफ़ी के लिए बच्चों के इस्तेमाल के केस दर्ज किए गए हैं. अदालत ने सभी आरोपियों की ज़मानत की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी है. पुलिस को अब उन पाँच और लोगों की तलाश है जिनपर इस बच्ची से बलात्कार और उसके यौन शोषण के इल्ज़ाम हैं. मामले की तफ़्तीश कर रहे अधिकारियों के पास क़रीब 25 लोगों के नाम और तस्वीरें हैं जो लड़की के परिवार के परिचित हैं. अधिकारियों ने इन लोगों की तस्वीरों को बच्ची को दिखाया है ताकि बाक़ी के आरोपियों की शिनाख़्त कर उन्हें गिरफ़्तार किया जा सके. लेकिन बच्ची ने पुलिस अधिकारियों से कहा है कि मुझे उनके चेहरे याद नहीं हैं. ज़ेहन में सब कुछ धुंधला-धुंधला सा है. इस बच्ची का परिवार दक्षिण भारत के काफ़ी समृद्ध शहर में रहता है. ये शहर अपनी हरी भरी पहाड़ियों, साफ़ हवा और ताज़े पानी की छोटी-छोटी नदियों के लिए मशहूर है. लेकिन इस शहर की अच्छी क़िस्मत बच्ची के परिवार को छूकर भी नहीं निकली. सितंबर के उस दिन स्कूल को कुछ अध्यापकों के माध्यम से इस बच्ची के बारे में पता चला था. ये सभी उसी मोहल्ले में रहते हैं जहाँ बच्ची का घर है. उन्होंने बताया, इस परिवार के साथ कुछ तो गड़बड़ है. इसके घर में कुछ ना कुछ ग़लत चल रहा है. उस बच्ची से बात करने की कोशिश कीजिए. स्कूल के प्रबंधन ने महिलाओं की मदद करने वाले समूह से फ़ौरन ही एक सलाहकार को बुलाया. अगली सुबह वो परामर्शदाता स्कूल आ गईं. स्टाफ़ रूम में वो लड़की और ये सलाहकार आमने-सामने बैठे. ऊपर के कमरे में लड़की की माँ इन सब बातों से अनजान अध्यापकों और अभिभावकों की मीटिंग में हिस्सा ले रही थी. परामर्श देने वाली महिला ने लड़की से पूछा, तुम मुझे अपने और अपने परिवार के बारे में बताओ.उन्होंने कई घंटों तक बातचीत की. लड़की ने कहा कि घर में उसका समय बहुत मुश्किल से बीतता था क्योंकि उसके पिता के पास कोई काम नहीं था. किराया ना भरने पर उसके परिवार को कभी भी घर से निकाला जा सकता था. ये कहते कहते वो लड़की रोने लगी. उसके बाद वो ख़ामोश हो गई. उसकी मदद के लिए आई महिला ने लड़की को स्कूल में चलने वाली बच्चियों की ख़ास कक्षाओं के बारे में बताया. और ये भी बताया कि बच्चियों का शोषण कितनी आम बात है. उसे बीच में टोकते हुए लड़की ने कहा कि, मेरे घर में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है. मेरे पिता मेरी माँ के साथ ज़बरदस्ती करा रहे हैं. तब उस महिला ने लड़की से पूछा कि क्या वो इस बारे में कुछ और जानकारी दे सकती है? लड़की ने बताया कि एक बार एक आदमी जो उसकी माँ के पास आया था, उसने उसी को अपना शिकार बनाया था. तब उसकी माँ ने उस आदमी को बहुत बुरा-भला कहा था. लेकिन उसके बाद जब वो स्कूल चली आई तो बहुत से लोग उसकी माँ के पास आए थे. उसने बताया कि इसके बाद बड़ी संख्या में लोग उनके घर आने लगे थे. देर रात तक शराब पीने के बाद वो उसका यौन शोषण करते थे. तब बच्ची की मदद के लिए आई महिला ने उससे पूछा कि क्या उसे कुछ गर्भनिरोधक दवाओं के बारे में पता है जिससे वो गर्भवती न हो और उसे बीमारियाँ ना हों. लड़की ने कहा, नहीं, नहीं. हम कंडोम का इस्तेमाल करते हैं. ये उस बातचीत के दौरान पहली बार था, जब लड़की ने माना कि वो लोग उसके साथ भी यौन संबंध बनाते हैं. इसके बाद उस लड़की ने बचपने के गुम हो जाने की बेहद भयावह दास्तान सुनाई. उसने बताया, बहुत से मर्द उसके घर आते थे और उसकी माँ को लेकर बेडरूम में चले जाते थे. मैंने सोचा कि ये आम बात है. फिर मेरे पिता ने मुझे भी अजनबी लोगों के साथ उस कमरे में धकेलना शुरू कर दिया. कई बार उसके पिता उसे अपनी नग्न तस्वीरें लेने को मजबूर करते थे. फिर वो ये तस्वीर उन लोगों को भेजते जो उससे मिलने आया करते थे. लड़की ने बताया कि इस साल की शुरुआत में उसके माँ-बाप तब बहुत परेशान हो गए थे, जब तीन महीने तक उसकी माहवारी नहीं हुई. वो उसे एक डॉक्टर के पास लेकर गए. डॉक्टर ने लड़की का अल्ट्रासाउंड टेस्ट कराया और फिर कुछ दवाएं खाने के लिए दीं. अब तक बच्ची से बात कर रही महिला को अंदाज़ा हो गया था कि वो नियमित रूप से बलात्कार की शिकार हो रही है. उसने बाल कल्याण अधिकारियों को बुलाया और लड़की को बताया कि वो उसे बाल संरक्षण गृह में ले जा रहे हैं. उस लड़की पर इस बात का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. तभी उसकी माँ, जो पैरेंट्स-टीचर मीटिंग से निकल कर बाहर आ रही थी, उसने देखा कि उसकी बेटी को कार में बैठाकर कहीं ले जाया जा रहा है तो वो चिल्लाने लगी, तुम मेरी बच्ची को ऐसे कैसे ले जा सकते हो? तब बच्ची से बात कर रही महिला ने बताया कि वो उसे इसलिए ले जा रहे हैं क्योंकि उसे कुछ जज़्बाती परेशानियाँ हो रही हैं और उसे सलाह मशविरे की ज़रूरत है. बच्ची की माँ ने कहा कि मेरी इजाज़त के बग़ैर मेरी बच्ची की मदद करने वाले तुम लोग कौन होते हो? तब तक उसकी बेटी बाल संरक्षण गृह के लिए रवाना हो चुकी थी और पिछले दो महीनों से वो यौन शोषण की शिकार अन्य लड़कियों के साथ वहाँ रह रही है. बच्चों के यौन शोषण के मामले में भारत का रिकॉर्ड बेहद शर्मनाक है. आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक़ बच्चों के यौन शोषण के ज़्यादातर अपराध वो लोग करते हैं जो उनकी जान-पहचान वाले होते हैं. जैसे कि रिश्तेदार, पड़ोसी और जिनके यहाँ ये बच्चे काम करते हैं. बच्चों के साथ यौन अपराध के सब से ताज़ा उपलब्ध आंकड़े साल 2017 के हैं. इनके मुताबिक़ पूरे भारत में बच्चों से बलात्कार के 10 हज़ार 221 केस दर्ज किए गए थे. पिछले कुछ वर्षों में भारत में बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. ऐसे बच्चों की मदद करने वाले परामर्शदाता बताते हैं कि जैसा इस बच्ची के साथ हुआ, बच्चों के यौन शोषण के ऐसे भयावह क़िस्से बेहद आम हैं. जिस संरक्षण गृह में ये लड़की रह रही है, वहाँ 12 से 16 बरस की उम्र की तीन ऐसी लड़कियाँ हैं जिनका उनके पिता ने ही यौन शोषण किया था. एक सलाहकार ने बताया कि वो 15 बरस की एक गर्भवती बच्ची को परीक्षा दिलाने के लिए ले गई थी. उसकी प्रेगनेंसी आख़िरी दौर में थी. उस लड़की का बलात्कार उसके पिता ने ही किया था. उस सलाहकार ने बताया, जब उस लड़की के बच्चा पैदा हुआ तो हमने उसे सलाह दी कि वो इस बच्चे से छुटकारा पा ले तो उसने कहा कि मैं अपने बच्चे को कैसे किसी और को दे दूं? ये मेरे पिता का बच्चा है. मैं इसे पालूंगी-पोसूंगी. इस लेख में जिस लड़की का ज़िक्र है वो संरक्षण गृह पहुँची तो कई दिनों तक बेसुध होकर सोई. उसके बाद उसने डायरी में लिखा कि वो अपनी अम्मा से कितनी मोहब्बत करती है. वहीं उस लड़की की माँ कहती है कि उसकी बेटी ने ये क़िस्सा (यौन शोषण का) ख़ुद से गढ़कर सुनाया है क्योंकि वो अपने माँ-बाप से लड़ती रहती थी और उन्हें सबक़ सिखाने की धमकी भी देती थी. उसकी माँ कहती है कि एक वक़्त था जब हालात इतने बुरे नहीं थे. उसका पति तब कई बार एक दिन में एक हज़ार रुपए तक कमा लेता था. अब उस ख़ाली मकान में अकेली वो महिला ही बची है. उसका पति जेल में है और मुक़दमे का इंतज़ार कर रहा है. वहीं, उसकी बेटी बाल संरक्षण गृह में रह रही है. इस महिला ने कहा कि मैं बहुत अच्छी माँ हूं. मेरी बेटी को मेरी ज़रूरत है. उसके घर की पुरानी पड़ चुकी दीवारों से पेंट झड़ रहा है. बेटी की मौजूदगी में उसकी यादें इन्हीं दीवारों में ज़िंदा हैं. लड़की की माँ बताती है, जब वो यहाँ रहती थी तो इन्हीं दीवारों पर तस्वीरें बनाती थी. कुछ लिखा करती थी. वो दिन भर बस यही करती थी. बच्ची ने एक काग़ज़ पर लिखा था, दोस्तो, अगर मैं खुलकर अपने दिल की गहराई में बंद बातों को कह पाई तो ये अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि होगी. उसने इस काग़ज़ को दरवाज़े पर चिपकाया हुआ था. कुछ महीने पहले ही माँ और बेटी में घर के दरवाज़े में बनी एक पेंटिंग को लेकर झगड़ा हुआ था. दरअसल, एक दिन जब ये लड़की स्कूल से लौटी तो उसने नीला रंग लिया और ताड़ के एक पेड़ की तस्वीर बनाई. साथ ही उसने एक घर को भी उकेरा जिसकी चिमनी से धुआँ निकल रहा था. उसने ये तस्वीर घर के बाहरी दरवाज़े पर बनाई थी. उसकी उम्र की बहुत सी लड़कियाँ अपनी कल्पनाओं में शायद ऐसी ही तस्वीरें तो बनाती हैं. लेकिन उसकी माँ नाराज़ हो गईं. इसके बाद उसने माँ से माफ़ी मांगने वाला नोट दरवाज़े पर लिखा और बाहर चली गई थी. उस लड़की ने नोट में लिखा था- सॉरी अम्मा.
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अब जीना मुश्किल हो गया: पवन जल्लाद

Date : 12-Dec-2019
नई दिल्ली 12 दिसम्बर ।  तिहाड़ जेल (Tihar Jail) में बंद निर्भया गैंगरेप (Nirbhaya Gangrape) कांड के दोषियों को फांसी (Execution) देने का रास्ता लगभग साफ हो गया है. उन्हें फांसी पर लटकाने की तैयारियां चल रही हैं. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के मेरठ (Meerut) के रहने वाले पवन जल्लाद (Pawan Jallad) को बुलाने के लिए लेटर लिखा गया है. लेकिन फांसी से पहले पवन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से एक मार्मिक अपील की है. अब तो जीना भी मुश्किल हो गया है, ऐसा कहते हुए पवन एक लेटर में अपनी आपबीती लिखकर सभी को भेज रहा है. पीढ़ी दर पीढ़ी फांसी देने का काम कर रहा है परिवार पवन जल्लाद मेरठ की आलोक विहार कालोनी का रहने वाला है. पवन का परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी जेल में फांसी देने का काम करता है. पवन से पहले उसके परदादा लक्ष्मण सिंह, दादा कल्लू जल्लाद और पिता मम्मू सिंह भी फांसी देने का काम करते थे. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब पवन फांसी देता है. पवन का बीवी, बच्चों संग छोटे-बड़े भाइयों वाला परिवार है. निर्भया गैंगरेप केस में दोषियों को फांसी दिए जाने का जिक्र आते ही पवन एक बार फिर से चर्चाओं में आ गया है. पवन जल्लाद ने लेटर में दर्द बयां किया  पवन जल्लाद ने बताया कि पिता के बाद से मैं इस काम को विभिन्न जेलों में जाकर अंजाम दे रहा हूं. कुछ समय पहले तक मुझे मेरठ जेल से तीन हजार रुपये महीना मानदेय मिलता था. मेरे अथक प्रयासों के बाद मानदेय बढ़ाकर पांच हजार रुपये मिलने लगा. लेकिन आज की इस महंगाई के दौर में अब पांच हजार रुपये भी नाकाफी साबित हो रहे हैं. परिवार का पालन-पोषण करना कठिन होता जा रहा है. मैं बीते काफी समय से लगातार संबंधित अधिकारियों से मानदेय बढ़ाने के संबंध में गुहार लगा चुका हूं. लेकिन अभी तक इस मामले में मेरी सुनवाई नहीं हुई है. मुश्किल हो गया है बच्चों को पढ़ाना और घर चलाना पवन जल्लाद का कहना है कि मेरा मकान टूट-फूट गया है. बच्चे बड़े हो गए हैं. उनकी पढ़ाई-लिखाई कराना मुश्किल होता जा रहा है. कई बार तो स्कूल की फीस तक नहीं जा पाती है. इस परेशानी को देखते हुए मेरे बेटे ने इस काम को करने के लिए अभी से मना कर दिया है. आर्थिक परेशानियों के चलते मेरा जीना मुश्किल हो गया है. साइकिल पर कपड़े रखकर गली-गली फेरी लगाता हूं, तब कहीं जाकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो पाता है.
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हैदराबाद एनकाउंटर स्क्रिप्ट रेडीमेड,रिटायर्ड जज सुदर्शन रेड्डी को संदेह

Date : 11-Dec-2019
हैदरबाद 10 दिसम्बर । (बाला सतीश)हैदराबाद में पिछले दिनों एक पशु चिकित्सक के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले में पकड़े गए चार अभियुक्तों की पुलिस कार्रवाई में मारे जाने को लेकर जहाँ देश के एक बड़े तबक़े में पुलिस की तारीफ़ हुई वहीं एक तबक़े ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए. सवाल उठाने वालों में से एक बड़ा नाम सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी है। ये एनकाउंटर कैसे हुआ इसका आकलन नहीं किया जा सकता. लेकिन ये सब जिन परिस्थितियों में ये हुआ, उसे देखकर संदेह पैदा होता है. कहा गया कि संदिग्धों ने पुलिस से हथियार छीने और फिर उनपर गोलीबारी की. जिसके बाद पुलिस मुठभेड़ में अभियुक्तों की जान चली गई. लेकिन ऐसा नहीं लगता कि पुलिस और संदिग्धों के बीच मुठभेड़ हुई होगी. बल्कि जिस तरह से संदिग्धों को मौक़ा-ए-वारदात पर ले जाया गया, उसे देखकर लगता है कि उन्हें सीधे गोली मारी गई. तेलुगू बोलने वाले राज्य में पहले भी ऐसे कई मामले सामने आते रहे हैं, जिसमें पुलिस ने ऐसी ही कहानी बताई थी. स्क्रिप्ट रेडीमेड है. पुलिस कहती है कि हम उनकी जांच कर रहे थे या हम उन्हें जेल ले जा रहे थे या हम उन्हें कोर्ट से जेल ले जा रहे थे, तब उन्होंने हमारे हथियार छीन लिए और गोलीबारी की जिसमें एक-दो पुलिस वाले घायल हुए. हमारे पास कोई और विकल्प नहीं था और हमने उनपर गोली चला दी. ये पुरानी कहानी है और इसमें कुछ नया नहीं है. जनता मामले में तुरंत न्याय ज़रूर चाहती थी लेकिन उनकी मांग ये नहीं थी. कुछ लोगों ने ये मांग उठाई ज़रूर थी, लेकिन इसे पूरे समाज की मांग नहीं कहा जा सकता है. अगर पूरा समाज भी ये मांग कर रहा होता तो भी ये नहीं किया जा सकता था मारे गए लोग संदिग्ध थे, दोषी साबित नहीं हुए थे. उनके खिलाफ अब तक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई थी. उनका जुर्म साबित होना बाकी था. लेकिन जितनी गंभीर ये घटना थी, बलात्कार के बाद जिस तरह से पीड़ित लड़की को मार दिया गया, कोई भी समझदार व्यक्ति मामले में जल्द न्याय दिए जाने की और दोषी साबित हुए लोगों को सज़ा देने की मांग करेगा. मीडिया नैरेटिव बना रहा है कि ये न्यायिक व्यवस्था की विफलता है. लेकिन मामला तो अब तक न्यायालय में पहुंचा ही नहीं था. क्या न्यायालय की कोई भी ऐसी भूमिका थी, जिसके आधार पर आप कह सकें कि न्यायिक व्यवस्था अपना काम करने में विफल रही. हां, आम तौर पर कहा जाए तो न्यायिक प्रक्रिया धीमी है. कई मामले सालों तक लटके रहते हैं, लेकिन इसकी कई वजहें हैं. इसमें सिर्फ न्याय व्यवस्था की ग़लती नहीं है. लेकिन मैं इस बात पर सहमत हूं कि न्याय मिलने में देरी नहीं होनी चाहिए. इसके लिए सभी को इस दिशा में मिलकर काम करना होगा. लेकिन इससे इस बात को सही नहीं ठहराया जा सकता कि राज्य कानून को अपने हाथ में ले ले. इस मामले में अब अभियुक्त पीड़ित बन चुके हैं. कल तक वो अभियुक्त थे लेकिन अब वो और उनके परिवार पीड़ित हैं. भारत का संविधान सभी को समानता, जीने का, स्वतंत्रता का अधिकार देता है और राज्य को उन अधिकारों को प्रभावित नहीं करना चाहिए. मानवाधिकार कार्यकर्ता जब भी कोई मांग करते हैं तो वो राज्य के खिलाफ मांग करते हैं, ना कि किसी व्यक्ति के खिलाफ. ज़रूरी नहीं है कि सभी अभियुक्तों के लिए निष्पक्ष मुकदमा चलाए जाने की मांग करना पीड़ित के खिलाफ है. निष्पक्ष मुकदमा और जल्द न्याय, एक तरह से मौलिक अधिकार हैं. सेल्फ डिफेंस के लिए पुलिस के पास कोई अलग अधिकार नहीं है. सेल्फ डिफेंस आम आदमी और पुलिस के लिए एक जैसा है. जबतक स्थिति बहुत बुरी ना हो जाए, कि किसी की जान पर ही बन आए, तबतक किसी को मार देना सेल्फ़ डिफेंस नहीं है. उदाहरण के लिए कोई आपके घर में ज़बरदस्ती घुस आता है, लेकिन उसके पास कोई हथियार नहीं है. तो आप उसे पकड़ सकते हो, लेकिन गोली नहीं मार सकते. अगर आप उसे मार देते हैं तो ये सेल्फ़ डिफेंस नहीं होगा. इस हैदराबाद के मामले में भी जो परिस्थितियां दिख रही हैं, उसके मुताबिक इसे सेल्फ़ डिफेंस नहीं कहा जा सकता. इस देश में कितने अभियुक्त दोषी साबित होते हैं? इसका अनुपात क्या है? कितने मामलों में ये पता चल पाता है कि कोई मामला निष्पक्ष तरह से चलाया गया, जहां अभियोजन पक्ष ने सच को दबाया. जहां असली दोषियों को छोड़ दिया गया और निर्दोष लोगों को सज़ा हुई. अगर जनता जो सोचती वही सही होता तो 100 फ़ीसदी मामलों में लोगों को दोषी ठहराया जाता. क्यों महात्मा गांधी की हत्या मामले में कुछ अभियुक्त बरी हो गए थे? राजीव गांधी हत्या मामले में कुछ लोग क्यों बरी हो गए थे? जॉन एफ कैनेडी हत्या मामले में क्यों कुछ लोग बरी हो गए थे? इसलिए ये नहीं मानना चाहिए कि जांच एजेंसियां जो भी कहती हैं वही सही है. मीडिया इसे सच मानता है और लोगों को कहता है कि यही सच है. लेकिन जज को ये सच या राय प्रभावित नहीं कर सकता. जज हर पक्ष को जानकर ही फ़ैसला देता है.
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1300 किलोमीटर पैदल चला बाघ अपने अनुकूल क्षेत्र, और साथी की तलाश

Date : 04-Dec-2019
4 दिसंबर 2019 भारत में एक बाघ ने अब तक की सबसे लंबी पैदल यात्रा की है. यह यात्रा 807 मील यानी 1300 किलोमीटर की है, जिसे उसने पाँच महीने में पूरी की है. विशेषज्ञों का मानना है कि ढाई साल का यह बाघ शायद अपने अनुकूल क्षेत्र, साथी या फिर शिकार की तलाश में है. बाघ के गर्दन में रेडियो कॉलर लगा था और वह जून के महीने में महाराष्ट्र के एक वन्यजीव अभयारण्य से निकला था. इसके बाद उसकी यात्रा को उसके रेडियो कॉलर के ज़रिए ट्रैक किया गया. अपनी इस लंबी यात्रा के दौरान वह खेतों, पानी, राज्यमार्गों और पड़ोसी राज्यों से होकर गुज़रा था. इस बीच सिर्फ़ एक दफ़ा ही उसकी भिड़ंत इंसानों से हुई और यह तब हुआ, जब कुछ लोगों का एक समूह उसके आराम फ़रमाने वाली जगह में घुस आया. झाड़ियों वाली इस जगह पर हुए संघर्ष में बाघ ने एक व्यक्ति को घायल भी कर दिया था. सात ज़िलों और पड़ोसी राज्य की यात्रा C1 नाम का यह बाघ तीन शावकों में से एक है, जिनका जन्म टिपेश्वर वन्यजीव अभयारण्य के T1 में हुआ था. यह अभयारण्य 10 बाघों का घर है. फ़रवरी के महीने में बाघ के गर्दन में रेडियो कॉलर लगाया गया था और तब से मॉनसून के आने तक वह अभयारण्य के जंगलों में घूमता रहा ताकि ख़ुद के रहने के लिए अनुकूल जगह तलाश सके. जून के महीने में उसने अभयारण्य छोड़ दिया था और उसके बाद से वह महाराष्ट्र के सात ज़िलों और पड़ोसी राज्य तेलंगाना की यात्रा कर चुका है. बीते सप्ताहांत को वह महाराष्ट्र के दूसरे वन्यजीव अभयारण्य में पाया गया. वन्यजीव अधिकारियों का कहना है कि बाघ किसी ख़ास तरीक़े से यात्रा नहीं करते हैं. 9 महीने में 5 हज़ार लोकेशन पर पाया गया बाघ इस बाघ के लोकेशन को हर घंटे ट्रैक किया जाता था और पिछले 9 महीनों में उसकी उपस्थिति 5 हज़ार जगहों पर दर्ज की गई है. वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया से जुड़े वरिष्ठ जीव वैज्ञानिक डॉ. बिलाल हबीब ने कहा, बाघ संभवतः अनुकूल क्षेत्र, भोजन और साथी की तलाश में है. भारत में बाघों के अधिकांश क्षेत्र भर चुके हैं और नए बाघ को नई जगह तलाशनी पड़ रही है. यह बाघ दिन में छिप जाता था और रात को यात्रा करता था. भूख मिटाने के लिए वह जंगली सुअर और मवेशियों का शिकार करता था. डॉ. हबीब ने इंसान से बाघ की एक दफ़ा हुई भिड़ंत की भी पुष्टि की और बताया कि यह दोनों के बीच एक मामूली संघर्ष था. उन्होंने बताया कि वे लोग यह भी नहीं जानते थे कि उनके पीछे बाघ घूम रहा था. हालांकि वन्यजीव अधिकारियों का कहना है कि बाघ को किसी भी अप्रिय दुर्घटना से बचाने के लिए उसे पकड़े जाने और नज़दीक के अभयारण्य में भेजने की ज़रूरत है. उन्हें यह भी डर है कि वे निकट भविष्य में बाघ के साथ अपना संपर्क खो देंगे क्योंकि रेडियो कॉलर की बैटरी 80 फ़ीसदी ख़त्म हो चुकी है. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है लेकिन जंगल तेज़ी से सिकुड़ रहे हैं और पेट भरने के लिए उन्हें आसानी से शिकार नहीं मिल रहे हैं. वे मानते हैं कि प्रत्येक बाघ को अपनी भूख मिटाने के लिए उसके अपने क्षेत्र में 500 ऐसे जानवरों का होना ज़रूरी होता है जिनमें प्रजनन की शक्ति हो.
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सिक्योरिटी किसी का स्टेटस सिंबल नहीं हो सकता- अमित शाह

Date : 03-Dec-2019
नई दिल्ली 3 दिसम्बर। केंद्र सरकार ने राज्य सभा में भी एसपीजी संशोधन बिल को पारित करा लिया है. इस संशोधन के बाद एसपीजी की सुरक्षा केवल प्रधानमंत्री और उनके परिवार को मिलेगी. कुछ ही दिन पहले सरकार ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की एसपीजी की सुरक्षा हटा ली थी. इसको लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सड़क से लेकर संसद तक में गांधी परिवार की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को राज्य सभा में इस संशोधन पर जारी बहस में कहा, गांधी परिवार को ध्यान में रखकर एसपीजी संशोधन बिल लाया गया है, कहना सही नहीं है. हमने इस बिल को लाने से पहले ही उनके ख़तरे का आकलन करते हुए उनकी एसपीजी सुरक्षा हटाई थी. अमित शाह ने कहा, एसपीजी एक्ट में ये पाँचवां संशोधन है और यह गांधी परिवार को ध्यान में रखकर नहीं लाया गया है. मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि पिछले चार संशोधन केवल एक परिवार को ध्यान में रखकर लाए गए थे. अमित शाह ने इस बिल के पास होने से पहले कहा, सिक्यूरिटी किसी का स्टेट्स सिंबल नहीं होना चाहिए. क्यों केवल एसपीजी की मांग की जा रही है? एसपीजी कवर की सुरक्षा केवल राष्ट्र प्रमुख के लिए है. ये हम किसी को नहीं दे सकते. हम एक परिवार की आलोचना नहीं कर रहे हैं, हम वंशवादी राजनीति के ख़िलाफ़ हैं. केंद्रीय गृहमंत्री शाह ने कहा कि एसपीजी के नए बिल से अगर किसी का नुक़सान होना है तो पीएम मोदी का होना है क्योंकि पाँच साल बाद उनकी एसपीजी सिक्योरिटी चली जाएगी. अमित शाह ने ये भी कहा कि चंद्रशेखर, वीपी सिंह, पीवी नरसिम्हाराव, आईके गुजराल और मनमोहन सिंह जैसे पूर्व प्रधानमंत्रियों की सुरक्षा को बदलकर जेड प्लस किया गया था लेकिन उस समय कांग्रेस ने कोई नाराज़गी नहीं दिखाई एसपीजी संशोधन बिल 2019 राज्यसभा में पारित हो गया, हालांकि कांग्रेस के सदस्यों ने इस दौरान सदन का बहिष्कार किया. इससे पहले यह बिल 27 नवंबर को लोकसभा में पास हो गया था. इसके तहत अब एसपीजी सुरक्षा सिर्फ़ प्रधानमंत्री और उनके साथ उनके आवास में रहने वालों के लिए ही होगी. प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री को ये सुरक्षा पांच साल तक मिलेगी, इस दौरान प्रधानमंत्री के परिवार को भी ये सुरक्षा मिलेगी.
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जज को मिलने वाला सम्मान और मेरे सर्वेंट क्वॉर्टर की छोटी सी जगह मेरी प्रेरणा बनी: अर्चना कुमारी

Date : 03-Dec-2019
पटना 3 दिसम्बर । अर्चना कुमारी ने 2018 में हुई 30वीं बिहार न्यायिक सेवक परीक्षा में सफलता हासिल की है. हम लोगों का परिवार एक कमरे के सर्वेंट क्वॉर्टर में रहता था और हमारे क्वॉर्टर के आगे जज साहब की कोठी थी. पापा दिन भर जज साहब के पास खड़े रहते थे. बस वही कोठी, जज को मिलने वाला सम्मान और मेरे सर्वेंट क्वॉर्टर की छोटी सी जगह मेरी प्रेरणा बनी. 34 साल की अर्चना के पिता सोनपुर रेलवे कोर्ट में चपरासी के पद पर थे. और अब उनकी बिटिया अर्चना कुमारी ने 2018 में हुई 30वीं बिहार न्यायिक सेवक परीक्षा में सफलता हासिल की है. बीते नवंबर के आख़िरी हफ़्ते में घोषित नतीजों में अर्चना को सामान्य श्रेणी में 227वां और ओबीसी कैटेगरी में 10वीं रैंक मिली है. फ़ोन पर बात करती अर्चना की आवाज़ में ख़ुशी, बेहद साधारण परिवार से निकलकर बड़ी उपलब्धि हासिल करने का गर्व, विनम्रता, सब कुछ महसूस किया जा सकता था. घर में ग़रीबी का डेरा मूल रूप से पटना के धनरूआ थाना अंतर्गत मानिक बिगहा गांव की अर्चना अपने गांव में जज बिटिया के नाम से मशहूर हो रही हैं. चार भाई-बहन में सबसे बड़ी अर्चना के लिए लेकिन उनका ये सफ़र जिंदगी के बहुत घुमावदार रास्तों से गुज़रा. बचपन में ही अस्थमा की बीमारी के चलते वो बहुत बीमार रहती थीं और घर में ग़रीबी का डेरा था. पटना के राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, शास्त्रीनगर से बारहवीं पास अर्चना ने पटना यूनिवर्सिटी से साइकोलॉजी ऑनर्स किया है. लेकिन इसी बीच ग्रैजुएशन की पढ़ाई करते समय साल 2005 में उनके पिता गौरीनंदन प्रसाद की असामयिक मृत्यु हो गई. अर्चना बताती हैं, बहुत मुश्किल था क्योंकि सबसे बड़ी होने के नाते भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी थी. चूंकि मैने कंप्यूटर सीखा था तो मैंने अपने ही स्कूल में कंप्यूटर सिखाना शुरू किया ताकि घर ख़र्च में मदद की जा सके. तीन बहनें थीं तो घरवालों पर शादी का बहुत दबाव था. 21 साल की उम्र में मेरी शादी कर दी गई और मैंने भी ख़ुद को समझा लिया कि मेरी पढ़ाई का अंत अब हो गया. पति, घर, बच्चे और करियर लेकिन छह साल की उम्र से ही जज बनने का सपना देख रही अर्चना ख़ुशकिस्मत निकलीं. उनके पति राजीव रंजन ने उन्हें उनके सपनों को पूरा करने में मदद की. 2006 में अर्चना की शादी हुई थी. पति ने उनमें पढ़ने की ललक दिखी तो साल 2008 में पुणे विश्वविद्यालय में अर्चना ने एलएलबी कोर्स में दाखिला ले लिया. अर्चना बताती है, मेरी पूरी पढ़ाई हिंदी माध्यम से थी, इसलिए रिश्तेदारों ने कहा कि मैं जल्द ही पुणे यूनिवर्सिटी के अंग्रेज़ी माहौल से भाग आऊंगी. वो बार-बार कहते थे कि मेरे पति गोइठा में घी सुखा रहे हैं. मेरे सामने अंग्रेज़ी में तो पढ़ाई करने की चुनौती तो थी ही, और बिहार से पहली बार बाहर निकली थी. 2011 में क़ानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो पटना वापस आईं तो गर्भवती हो गईं. साल 2012 में उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया. बच्चे की पैदाइश के बाद की ज़िम्मेदारी बड़ी थी. लेकिन अर्चना ने अपने सपनों और मां की ज़िम्मेदारी का संतुलन साधा. वो अपने 5 माह के बच्चे और अपनी मां के साथ आगे की पढ़ाई और तैयारी के लिए दिल्ली चली गईं. यहां उन्होंने एलएलएम की पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की और साथ ही अपनी आजीविका के लिए कोचिंग में क़ानून के छात्रों को पढ़ाया भी. अच्छी शिक्षा और परिवार का सहयोग अर्चना की सफलता में उनके पूरे परिवार का सहयोग है. उनकी सातवीं तक पढ़ी मां प्रतिमा देवी कहती हैं, बिटिया का रिजल्ट जब से निकला है नींद नहीं आई है और खाना भी खाया नहीं जा रहा है. अपनी ख़ुशी के बारे में आपको क्या बताएं और अगर इसके पापा रहते तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. प्रतिमा देवी को ख़ुद अपनी पढ़ाई ना कर पाने का बहुत अफ़सोस रहा. लेकिन उन्होंने अपनी तीनों बेटियों को अच्छी शिक्षा दी. अर्चना के पति राजीव रंजन पटना के पटना मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग में क्लर्क हैं. बात करते हुए उन्होंने कहा, अर्चना में पढ़ने की बहुत ललक है. मैंने उसे पढ़ाया जिसका नतीजा आपके सामने है. मेरी कोशिश हमेशा यही रहेगी कि वो और ज़्यादा तरक़्क़ी करें.
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अयोध्या मामले पर पुनर्विचार याचिका दायर करेगा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

Date : 17-Nov-2019
नई दिल्ली 17 नवम्बर । ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने का फ़ैसला किया है. बोर्ड ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि रविवार को बोर्ड की कार्यकारिणी की बैठक हुई जिसमें सुप्रीम कोर्ट के नौ नवंबर के फ़ैसले पर विस्तार से चर्चा हुई. बैठक के बाद बोर्ड के सचिव ज़फ़रयाब जिलानी, बोर्ड के सदस्य क़ासिम रसूल इलियास और दूसरे साथियों के साथ ने पत्रकारों को संबोधित किया. प्रेस वार्ता के दौरान ज़फ़रयाब जिलानी ने बताया कि मुस्लिम पक्षकारों में से मिसबाहुद्दीन, मौलाना महफ़ूज़ुर्रह्मान, मोहम्मद उमर और हाजी महबूब ने पुनर्विचार याचिका दायर करने पर अपनी सहमति दे दी है. एक अन्य पक्षकार इक़बाल अंसारी के बारे में पूछे जाने पर ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा कि इक़बाल अंसारी पर ज़िला
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जजों को मौन रहना चाहिएः रंजन गोगोई

Date : 16-Nov-2019
नई दिल्ली 16 नवम्बर । सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई का शुक्रवार को अंतिम कार्यदिवस था, वो 17 नवंबर को वे रिटायर हो जाएंगे. अंतिम दिन रंजन गोगोई अगले चीफ़ जस्टिस एसए बोबडे के साथ कोर्ट पहुंचे, वो सिर्फ़ 3 मिनट तक कोर्ट में बैठे और 10 मामलों में नोटिस व स्टे का आदेश देकर कहा, आप सभी को धन्यवाद रंजन गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट के साथी जजों को मीडिया से दूरी बनाए रखने की सलाह दी. उन्होंने पत्रकारों से बातचीत करने के बजाय लिखित बयान जारी किया है. रंजन गोगोई ने कहा, बेंच की अपने जजों से अपनी स्वाधीनता का प्रयोग करते समय मौन बनाए रखने की अपेक्षा होती है. ऐसा नहीं है कि जज बोलते नहीं. वे बोलते हैं, लेकिन जब उनके कार्य की अनिवार्यता हो. इससे आगे बिल्कुल नहीं. रंजन गोगोई सुर्खियों में तब आए थे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के तीन अन्य जजों के साथ मिलकर 12 जनवरी 2018 को तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. भारतीय न्यायव्यवस्था के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी.
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महात्मा गांधी की मौत आकस्मिक घटना ?

Date : 16-Nov-2019
16 नवंबर 2019 गांधीजी की मौत कैसे हुई थी ? यह सभी जानते है कि 30 जनवरी, 1948 को दिल्ली के बिरला भवन में नाथूराम गोडसे ने गांधीजी के सीने पर तीन गोलियां दागे थे, जिससे राष्ट्रपिता की तत्काल मौत हो गयी थी. लेकिन ओडिशा सरकार की मानें तो महात्मा की मौत एक आकस्मिक घटना थी! गांधीजी के जीवन की झांकियों को लेकर ओडिशा सरकार के स्कूल और गणशिक्षा विभाग द्वारा प्रस्तुत एक पुस्तिका में कहा गया है 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिरला भवन में हुए एक आकस्मिक घटनाक्रम में गांधीजी की मौत हो गयी थी. लाखों की संख्या में छापी गयी इस पुस्तिका की ज़्यादातर प्रतियाँ बच्चों में बंट भी चुकी हैं. सरकार द्वारा एक पुस्तिका में गांधीजी की मौत को लेकर स्कूली बच्चों को ऐसे भ्रमात्मक तथ्य दिए जाने को लेकर लेकर राज्य में भारी विवाद खड़ा हो गया है. गांधीवादी, बुद्धिजीवी और शिक्षक ही नहीं, आम लोग भी इससे सख्त नाराज़ हैं. इस मुद्दे पर पूछे जानेपर जानेमाने गांधीवादी नेता प्रह्लाद सिंह ने कहा, यह पुस्तिका प्रस्तुत करने के लिए इतिहासकारों और गाँधी दर्शन के जानकारों को लेकर एक कमिटी बनाने की ज़रुरत थी. लेकिन लगता है कि इसकी पूरी ज़िम्मेदारी या तो किसी अफसर को या किसी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को दे दी गई. गलती चाहे जिसकी भी हो सरकार को इस भूल के लिए बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए. साथ की इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए. सभी पुस्तिकाओं को तत्काल वापस लेकर इस गलती को सुधार कर नई पुस्तिका प्रकाशित करने के बाद ही बच्चों में बांटी जानी चाहिए. ओडिशा विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता नरसिंह मिश्र ने कहा है कि यह उन लोगों को काम लगता है जो गाँधीजी से घृणा करते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे मनोरंजन महान्ति, लोकशक्ति अभिजान के संयोजक प्रफुल्ल सामंतराय तथा अन्य कई विशिष्ट व्यक्तियों ने भी पुस्तिका में राष्ट्रपिता के बारे में दी गई ग़लत जानकारी को लेकर गहरी नाराजगी जताई है और सभी पुस्तिकाओं को तत्काल वापस लिए जाने की मांग की है. शुक्रवार को विधानसभा में भी इस मुद्दे पर गहरी चिंता प्रकट की गई. शून्यकाल के दौरान कांग्रेस के साथ साथ सत्तारूढ़ बीजेडी के विधायकों ने भी इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इस पर तुरंत कार्यवाही की मांग की. बीजेडी के सौम्यरंजन पटनायक ने कहा कि किसी ने बुरी नीयत से यह काम किया है. सदस्यों की मांग को संज्ञान में लेते हुए अध्यक्ष सूर्यनारायण पात्र ने स्कूल और गणशिक्षा मंत्री समीर दाश को इस सन्दर्भ में कल सदन में बयान रखने का निर्देश दिया. मामले के तूल पकड़ने के बाद सरकार अब डैमेज कन्ट्रोल मोड में है. स्कूल और गणशिक्षा मंत्री समीर दाश से इस बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, हमने इसे काफी गंभीरता से लिया है. हम पूरे मामले की तहकीकात कर रह रहे हैं. इसमें जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ ज़रुर कार्रवाई होगी. मंत्री को शनिवार को विधानसभा में इस बारे में बयान रखना है, इसलिए माना जा रहा है कि शनिवार सुबह तक सरकार इसपर किसी ठोस कदम की घोषणा करेगी. हालांकि, गुरूवार को जब मामला पहले सामने आया, तब कारवाई की बात कर रहे मंत्री दाश के तेवर बिलकुल अलग थे. इस मुद्दे पर उनकी पहली प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी, इसमें ग़लत क्या है? हत्या भी तो आखिर एक आकस्मिक घटना ही है, जैसे आग लगना एक दुर्घटना है. हाँ, मैं यह मानता हूँ कि बाद में इसका विस्तार से व्याख्या की जानी चाहिए थी. हत्या जैसे शब्द से बच्चों को दूर रखने के लिए ऐसा किया गया है. मंत्री के इस तर्क पर तंज कसते हुए प्रह्लाद सिंह ने कहा, फिर तो भारत के समूचे इतिहास को नए सिरे से लिखना होगा. भगत सिंह की फांसी भी आखिर एक आकस्मिक घटना ही थी. आम चुनाव के बाद भाजपा और बीजेडी के बीच गहराते हुए मधुर संबंध के मद्देनज़र कई लोग इसमें केंद्र सरकार की भूमिका होने का अनुमान लगा रहे हैं. गौरतलब है कि गुजरात में स्कूली किताबों में गांधीजी ने आत्महत्या की थी लिखे जाने को लेकर पहले ही बवाल हो चुका है.
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