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रघुराम राजन ने मंदी पर मोदी सरकार को किया सतर्क

Date : 20-Aug-2019
नई दिल्ली 20 अगस्त 2019 भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में जारी मंदी बहुत चिंताजनक है और सरकार को ऊर्जा क्षेत्र और ग़ैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्रों की समस्याओं को तुरंत हल करना होगा. उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र में निवेश को बढ़ाने के लिए नए सुधारों की शुरुआत करनी होगी. समाचार एजेंसी को दिए इंटरव्यू में रघुराम राजन ने कहा कि भारत में जिस तरह जीडीपी की गणना की गई है उस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है. उन्होंने मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के उस बयान का भी ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने जीडीपी को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए जाने की बात कही थी और अपना अनुमान पेश किया था. साल 2018-19 में विकास दर 6.8 प्रतिशत हो गई थी जो 2014-15 के बाद सबसे कम है. कई निजी विशेषज्ञों और सेंट्रल बैंक का अनुमान है कि इस साल भी विकास दर 7 प्रतिशत के सरकारी अनुमान से कम रहने वाली है
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भारत: ऑटो इंडस्ट्री मे मंदी

Date : 14-Aug-2019
भारत में ऑटो इंडस्ट्री का पहिया क्यों थम गया ऑटो इंडस्ट्री में लगातार 9वें महीने गिरावट दर्ज की गई है. ब्रिकी के लिहाज़ से जुलाई का महीना बीते 18 सालों में सबसे ख़राब रहा. इस दौरान बिक्री में 31% की गिरावट दर्ज की गई. सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबिल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) के मुताबिक़ जुलाई में बीते 9 महीनों के दौरान सबसे कम 2,00,790 वाहनों की बिक्री ही हुई. इसके मुताबिक़ स्पोर्ट्स यूटिलिटी वीकल की बिक्री में 15% तो सवारी कार में 36% की गिरावट दर्ज की गई है. सियाम के महानिदेशक विष्णु माथुर कहते हैं कि इस इंडस्ट्री को तुरंत एक राहत पैकेज की ज़रूरत है. उनका कहना है कि जीएसटी की दरों में अस्थायी कटौती से भी इंडस्ट्री को कुछ राहत मिल सकती है. माथुर कहते हैं, ऑटो इंडस्ट्री की स्थिति और बिगड़ने से रोकने के लिए उद्योग प्रतिनिधियों की सरकार के साथ हाल ही में बातचीत हुई है. हमने राहत पैकेज की मांग की. गाड़ियों पर जीएसटी की दर घटाने, स्क्रैपेज पॉलिसी लाने और वित्तीय क्षेत्र- ख़ासकर ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों- को मज़बूत करने की मांग की है. दूसरी ओर फेडरेशन ऑफ़ ऑटोमोबिल डीलर्स एसोसिएशन (फाडा) के मुताबिक़, इस मंदी की वजह से बीते तीन महीने में दो लाख लोगों का रोज़गार छिन गया है. बीते एक वर्ष के दौरान एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत में गाड़ियों की ख़रीद में भारी कमी आई है, इसकी वजह ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में क्रेडिट की कमी का होना बताया गया है. इसकी वजह से इस दौरान देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुज़ुकी और टाटा मोटर्स ने अपने उत्पादन में कटौती की. लिहाजा हज़ारों की संख्या में नौकरियां भी ख़त्म हुई हैं. इनकी वजह से ऑटो इंडस्ट्री अपने सबसे बड़ी गिरावट के दौर में पहुंच गई है. घरेलू बाज़ार में 51 फ़ीसदी हिस्सा रखने वाली मारुति सुज़ुकी ने जनवरी में 1.42 लाख कारें बेचीं. लेकिन छह महीने में ही 31% की गिरावट आ गई और जुलाई में उसकी सिर्फ़ 98,210 कारें बिकीं. घरेलू बाज़ार में दूसरी बड़ी कार निर्माता कंपनी हुंदई की बिक्री में भी ख़ासी गिरावट हुई है. हुंदई की क़रीब 45 हज़ार कारें जनवरी में बिकी थीं लेकिन जुलाई में केवल 39 हज़ार कारों की बिक्री के साथ इसमें 15% की गिरावट हो गई. शेयर बाज़ार में इन कंपनियों के शेयर में तेज़ गिरावट देखी गई है. जनवरी से अब तक मारुति के शेयर की क़ीमतों में 22% की गिरावट हुई है तो टाटा मोटर्स के शेयर इसी अवधि में 29% गिरे. इनकी तुलना में मुंबई शेयर सूचकांक सेंसेक्स इस अवधि के दौरान 2.4% बढ़ा है. मंदी की वजह से कई डीलरशिप बंद हो गए हैं, इसलिए अब इस उद्योग में जीएसटी की दरों में कटौती जैसे उपायों की मांग तेज़ हुई है. ऑटो इंडस्ट्री के लोगों ने मांग की है कि सरकार को ऑटोमोबिइल सेक्टर में जीएसटी की दर 28% से घटाकर 18% करनी चाहिए. फ़रवरी से अब तक रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में लगातार चार बार कटौती की है. लेकिन इंडस्ट्री पर नज़र रखने वाले जानकारों का मानना है कि तरलता (नक़दी) की कमी को पूरा करने के लिए अभी और उपाय करने होंगे. बीते हफ़्ते ऑटो सेक्टर के प्रतिनिधियों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाक़ात कर उन्हें वर्तमान हालात से अवगत कराया. सरकार ने ऑटो इंडस्ट्री की मंदी को दूर करने के लिए परामर्श कर रही है, लेकिन अब तक इसकी मांग को लेकर किसी भी उपाय की घोषणा नहीं की है. सियाम के महानिदेशक विष्णु माथुर कहते हैं कि इस महीने से शुरू होने वाले त्योहारी सीजन में भी ज़्यादा छूट नहीं मिल रही है. माथुर कहते हैं, अप्रैल में शुरू हुए नए वित्तीय वर्ष में सियाम ने पैसेंजर वीकल की वार्षिक बिक्री में 3% से 5% तक की वृद्धि का अनुमान लगाया था. लेकिन अब मंदी को देखते हुए उन पूर्वानुमानों को संशोधित करना पड़ सकता है. जुलाई के महीने में मारुति कारों की बिक्री में 34% की कमी आई जो सात वर्षों के दौरान किसी एक महीने में दर्ज की गई सबसे अधिक गिरावट है. बीते वर्ष इस कार निर्माता के कारों की बिक्री में महज 4.7% का ही इजाफ़ा हुआ. हाल ही में आई रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कंपनी ने अपनी अस्थायी कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी है. जून के अंत तक इनकी संख्या में 6% कम हो गई है. दुनियाभर की कई कंपनियां उड़ने वाली टैक्सियों के कन्सेप्ट पर काम कर रही हैं साथ ही मारुति ने उत्पादन में भी कटौती की है. इस साल के पहले छह महीनों के दौरान इसने उत्पादन में 10% से अधिक की कटौती की है. अपने पैसेंजर वीकल की घरेलू बिक्री में 34% गिरावट दर्ज करने वाले टाटा मोटर्स ने बीते हफ़्ते कहा कि बाज़ार की वर्तमान मुश्किल परिस्थितियों के कारण महाराष्ट्र के कुछ संयंत्रों को बंद कर दिया है. इस बीच, जुलाई के महीने में 15% गिरावट दर्ज करने वाली प्रतिद्वंद्वी कार निर्माता कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा ने कहा है कि वो इस तिमाही में 14 दिनों तक उत्पादन में कटौती करेगा. सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ जुलाई में सभी सेगमेंट की गाड़ियों की बिक्री में गिरावट हुई है. 26% की कमी के साथ इस दौरान महज 56,866 ट्रक और बस बिके जबकि क़रीब 15 लाख यूनिट बिक्री के साथ दोपहिया वाहनों में यह कमी 17% दर्ज की गई है. इस मंदी का प्रभाव गाड़ियों के कलपुर्जे बनाने वाली सहायक कंपनियों पर भी हुआ है. टाटा मोटर्स और अशोक लेलैंड के लिए सस्पेंशन (शॉकर) बनाने वाली जमना ऑटो इंडस्ट्री ने कहा कि कमज़ोर मांग के चलते अगस्त में वो अपने सभी नौ उत्पादन संयंत्रों को बंद कर सकते हैं. इस इंडस्ट्री पर दोहरी मार तब पड़ी जब जून में बजट के दौरान ऑटो पार्ट्स पर ड्यूटी बढ़ाई गई और पेट्रोल, डीज़ल पर अतिरिक्त टैक्स लगाया गया. सिआम के महानिदेशक विष्णु माथुर ने एक न्यूज़ पोर्टल से बातचीत में बताया कि ऑटो इंडस्ट्री ने 3.7 करोड़ से ज़्यादा लोगों को जॉब दे रखा है और अगर मंदी ख़त्म नहीं हुई तो कई नौकरियां जाएंगी.
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भारत की अर्थव्यवस्था की दशा, पूजा मेहरावरिष्ठ

Date : 12-Aug-2019
नई दिल्ली 12 अगस्त । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त वर्ष 2024-25 तक भारत को 5 ख़रब अमरीकी डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है. इस वक़्त भारत की अर्थव्यवस्था क़रीब 2.7 ख़रब अमरीकी डॉलर की है. आर्थिक सर्वे का अनुमान है कि प्रधानमंत्री मोदी के तय किए हुए लक्ष्य तक पहुंचने के लिए देश के जीडीपी को हर साल 8 फ़ीसदी की दर से बढ़ना होगा. इस लक्ष्य के बरक्स, देश की अर्थव्यवस्था में तरक़्क़ी की रफ़्तार धीमी हो गई है. ऐसा पिछले तीन साल से हो रहा है. उद्योगों के बहुत से सेक्टर में विकास की दर कई साल में सबसे निचले स्तर तक पहुंच गई है. देश की अर्थव्यवस्था की सेहत कैसी है, इसका अंदाज़ा हम इन पांच संकेतों से लगा सकते हैं. देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में पिछले तीन वित्तीय वर्षों से लगातार गिरावट आ रही है. 2016-17 में जीडीपी विकास दर 8.2 फ़ीसद प्रति वर्ष थी, तो 2017-18 में ये घटकर 7.2 प्रतिशत रह गई. और, वर्ष 2018-19 में जीडीपी की विकास दर 6.8 फ़ीसद ही दर्ज़ की गई. ताज़ा आधिकारिक आंकड़ों पर यक़ीन करें तो, वर्ष 2019 की जनवरी से मार्च की तिमाही में जीडीपी विकास दर 5.8 फ़ीसद ही रह गई थी, जो पांच साल में सबसे कम है. केवल तीन साल में विकास की रफ़्तार में 1.5 प्रतिशत की कमी (8.2 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत) बहुत बड़ी कमी है. जीडीपी की विकास दर घटने से लोगों की आमदनी, खपत, बचत और निवेश, सब पर असर पड़ रहा है. जिन सेक्टरों पर इस मंदी का सबसे ज़्यादा असर पड़ा है, वहां पर नौकरियां घटाने के एलान हो रहे हैं. अब तक सरकार ने ऐसे कोई क़दम न तो उठाए हैं, न ही उनका ऐलान किया है, जिससे जीडीपी विकास दर में आ रही गिरावट को रोका जा सके. विकास दर घटने से लोगों की आमदनी पर बुरा असर पड़ा है. तो, अब लोग अपने ख़र्चों में कटौती कर रहे हैं. देश में बाज़ार की सबसे बड़ी रिसर्च कंपनी नील्सन की एक रिपोर्ट कहती है कि तेज़ी से खपत वाले सामान यानी फास्ट मूविंग कंज़ंप्शन गुड्स (FMCG) की बिक्री की विकास दर इस साल जनवरी से मार्च के बीच 9.9 प्रतिशत थी. लेकिन, इसी साल अप्रैल से जून की तिमाही में ये घटकर 6.2 फ़ीसद ही रह गई. ग्राहकों की ख़रीदारी के उत्साह में कमी का बड़ा असर ऑटो उद्योग पर पड़ा है. बिक्री घटी है. तो नौकरियों में बड़े पैमाने पर कटौती की जा रही है. सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के आंकड़ों पर ग़ौर करें, तो हर तरह के वाहन की बिक्री में गिरावट आई है. जनवरी से मार्च के बीच जहां ऑटो सेक्टर की विकास दर 12.35 प्रतिशत थी. इस दौरान 69 लाख, 42 हज़ार 742 गाड़ियां बेची गईं. वहीं अप्रैल से जून के बीच केवल 60 लाख, 85 हज़ार 406 गाड़ियों की बिक्री ही दर्ज़ की गई. बड़ी गाड़ियों यानी यात्री वाहनों की बिक्री में बहुत बुरा असर पड़ा है. इस सेक्टर के विकास में पिछले एक साल से लगातार गिरावट ही देखी जा रही है. भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुज़ुकी ने जुलाई महीने में पिछले साल के मुक़ाबले कारों की फ़रोख़्त में 36 प्रतिशत की गिरावट आने की बुरी ख़बर दी है. इसी दौरान हुंडई की गाड़ियों की बिक्री में 10 प्रतिशत की गिरावट आई है. बिक्री में गिरावट से निपटने के लिए गाड़ियों के ख़ुदरा विक्रेता अपने यहां नौकरियों में कटौती कर रहे हैं. देश भर में ऑटोमोबाइल डीलर्स ने पिछले केवल तीन महीनों में ही 2 लाख नौकरियां घटाई हैं. ये आंकड़े फेडरेशन ऑफ़ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन्स (FADA) के हैं. नौकरियों में ये कटौती, ऑटोमोबाइल सेक्टर में की गई उस कटौती से अलग हैं, जब अप्रैल 2019 से पहले के 18 महीनों के दौरान देश के 271 शहरों में गाड़ियों के 286 शो रूम बंद हुए थे. इनकी वजह से 32 हज़ार लोगों की नौकरियां चली गई थीं. देश भर में गाड़ियों के क़रीब 26 हज़ार शो रूम हैं, जिन्हें 15 हज़ार के आस-पास डीलर चलाते हैं. इन शो रूम में क़रीब 25 लाख लोगों को रोज़गार मिला हुआ है. डीलरशिप की इस व्यवस्था में अपरोक्ष रूप से क़रीब 25 लाख और लोगों को भी रोज़गार मिला हुआ है. खपत में कमी की वजह से टाटा मोटर्स जैसी कंपनियों को अपनी गाड़ियों के निर्माण में कटौती करनी पड़ी है. इसका नतीजा ये हुआ है कि कल-पुर्ज़ों और दूसरे तरीक़े से ऑटो सेक्टर से जुड़े हुए लोगों पर भी इसका बुरा असर पड़ा है. जैसे कि जमशेदपुर और आस-पास के इलाक़ों में 30 स्टील कंपनियां बंदी के कगार पर खड़ी हैं. जबकि एक दर्जन के क़रीब कंपनियां तो पहले ही बंद हो चुकी हैं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जमशेदपुर का टाटा मोटर्स का प्लांट दो महीने से 30 दिनों में केवल 15 दिन ही चलाया जा रहा था. बाक़ी के वक़्त ये कारखाना बंद रखा जा रहा था. अर्थव्यवस्था का विकास धीमा होने का रियल एस्टेट सेक्टर पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है. बिल्डरों का आकलन है कि इस वक़्त देश के 30 बड़े शहरों में 12.76 लाख मकान बिकने को पड़े हुए हैं. कोच्चि में मकानों की उपलब्धता 80 महीनों के उच्चतम स्तर पर है. वहीं, जयपुर में ये 59 महीनों, लखनऊ में 55 महीनों और चेन्नई में ये 75 महीनों के अधिकतम स्तर पर है. इसका ये मतलब है इन शहरों में जो मकान बिकने को तैयार हैं, उनके बिकने में पांच से सात बरस लग सकते हैं. आमदनी बढ़ नहीं रही है. बचत की रकम बिना बिके मकानों में फंसी हुई है. और अर्थव्यवस्था की दूसरी परेशानियों की वजह से घरेलू बचत पर भी बुरा असर पड़ रहा है. वित्त वर्ष 2011-12 में घरेलू बचत, जीडीपी का 34.6 प्रतिशत थी. लेकिन, 2018-19 में ये घटकर 30 फ़ीसद ही रह गई. घरेलू बचत की जो रक़म बैंकों के पास जमा होती है, उसे ही वो कारोबारियों को क़र्ज़ के तौर पर देते हैं. जब भी बचत में गिरावट आती है, बैंकों के क़र्ज़ देने में भी कमी आती है. जबकि कंपनियों के विकास और नए रोज़गार के लिए क़र्ज़ का अहम रोल होता है. बैंकों के क़र्ज़ देने की विकास दर भी घट गई है. सितंबर 2018 से ये अब तक के न्यूनमत स्तर पर है. इस साल अप्रैल महीने में क़र्ज़ देने की विकास दर 13 प्रतिशत थी, जो मई मे गिरकर 12.5 फ़ीसद ही रह गई. गैर कृषि क्षेत्र में क़र्ज़ बांटने की रफ़्तार अप्रैल में 11.9 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी. लेकिन, मई में ये घटकर 11.4 फ़ीसद ही रह गई, जो पिछले आठ महीनों में सबसे कम है. सर्विस सेक्टर और उद्योगों को बैंकों के क़र्ज़ देने में भारी कमी देखी जा रही है. मई महीने में सर्विस सेक्टर को लोन की विकास दर 14.8 प्रतिशत थी, जो पिछले 14 महीनों में सबसे कम है. अप्रैल महीने में सर्विस सेक्टर को लोन की विकास दर 16.8 फ़ीसद थी. आम तौर पर जब घरेलू बाज़ार में खपत कम हो जाती है, तो भारतीय उद्योगपति, अपना सामान निर्यात करने और विदेश में माल का बाज़ार तलाशते हैं. लेकिन, अभी स्थिति ये है कि विदेशी बाज़ार में भी भारतीय सामान के ख़रीदारों का विकल्प बहुत सीमित रह गया है. पिछले दो साल से जीडीपी विकास दर में निर्यात का योगदान घट रहा है. मई महीने में निर्यात की विकास दर 3.9 प्रतिशत थी. लेकिन, इस साल जून में निर्यात में (-)9.7 की गिरावट आई है. ये 41 महीनों में सबसे कम निर्यात दर है. निर्यात में बेहतरी की संभावना कम ही दिखती है. इसकी बड़ी वजह ये है कि अमरीका के साथ भारत के व्यापार युद्ध के संकट के बादल मंडरा रहे हैं. अगर अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल हों, तो इसका असर विदेशी निवेश पर भी पड़ता है. अप्रैल 2019 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 7.3 अरब डॉलर था. लेकिन, मई महीने में ये घट कर 5.1 अरब डॉलर ही रह गया. रिज़र्ब बैंक ने जो अंतरिम आंकड़े जारी किए हैं, उनके मुताबिक़, देश में आ रहा कुल विदेशी निवेश, जो शेयर बाज़ार और बॉन्ड मार्केट में निवेश किया जाता है, वो अप्रैल में 3 अरब डॉलर था. पर, मई महीने में ये घटकर 2.8 अरब डॉलर ही रह गया. तो, आख़िर मोदी सरकार की दूसरी पारी की दिक़्क़त क्या है? इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES तो, आख़िर मोदी 2.0 में हालत क्या है? इन सभी बातों का निष्कर्ष ये है कि देश की अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुज़र रही है. निर्माण क्षेत्र में कमी आ रही है. कृषि क्षेत्र का संकट बरक़रार है. किसानों की आमदनी बढ़ नहीं रही है. निर्यात भी जस के तस हैं. बैंकों और वित्तीय संस्थानों की हालत ख़राब है. और रोज़गार के क्षेत्र में बड़ा संकट पैदा हो रहा है. एफएमसीजी सेक्टर की बिक्री घट गई है. कार के निर्माता लगातार उत्पादन घटा रहे हैं. इन बातों से यही संकेत मिलता है कि लोगों ने ख़र्च करना कम कर दिया है. बाज़ार में मांग कम है, तो कारोबारियों ही नहीं, ग्राहकों का भरोसा भी गिर रहा है. अर्थव्यवस्था की जो भी मौजूदा परेशानियां हैं, वो प्रधानमंत्री मोदी और उनके पूर्ववर्ती डॉक्टर मनमोहन सिंह की सुधारों की अनदेखी करने का नतीजा हैं. 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तब, 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की वजह जीडीपी की विकास दर में आई कमी, धीरे-धीरे दोबारा पटरी पर लौट रही थी. लेकिन, जीडीपी की विकास दर की वो रफ़्तार क़ायम नहीं रह सकी और विकास दर फिर से कम हो रही है. इस वक़्त अर्थव्यवस्था की विकास दर में जो गिरावट आ रही है, वो किसी बड़े झटके का नतीजा नहीं है. 2008 और 2011 में कच्चे तेल के दाम में अचानक तेज़ी आने से विकास दर धीमी हुई थी. लेकिन, अभी ऐसे हालात नहीं दिख रहे हैं. ये सरकारों की नीतियों में लगातार नाकामी का नतीजा है. कृषि उत्पादों की क़ीमतों और आयात-निर्यात की नीतियां, टैक्स की नीतियां, श्रमिक क़ानून और ज़मीन के इस्तेमाल के क़ानूनों की कमियों का इस मंदी में बड़ा योगदान है. आज बैंकिंग क्षेत्र में बड़े सुधार की ज़रूरत है, ताकि छोटे और मंझोले कारोबारियों को आसानी से क़र्ज़ मिल सके. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल का शानदार आग़ाज़ हुआ था. लेकिन, जल्द ही वो दिशाहीन हो गई. अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों के जिस ब्लूप्रिंट की घोषणा हुई थी, उसे 2015 के आख़िर में ही त्याग दिया गया. श्रमिक और ज़मीन से जुड़े क़ानूनों में बदलाव की योजना अधूरी है. निर्माण बढ़ाने के लिए ज़रूरी क़दम नहीं उठाए गए. कृषि क्षेत्र के विकास की कमी से निपटने के लिए मेक इन इंडिया की शुरुआत की गई थी. लेकिन, उसका हाल भी बुरा ही है. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में अर्थव्यवस्था को लेकर जो शुरुआती जोश और ऊर्जा देखने को मिली थी, उनके बजाय हम ने नोटबंदी जैसे ग़लत क़दम उठाए जाते हुए देखे. टैक्स व्यवस्था में स्थायी सुधार लाने के लिए जीएसटी को हड़बड़ी में, बिना पूरी तैयारी के ही लागू कर दिया गया था. नेक इरादे से लाए गए इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड जैसे अच्छे क़ानून के सिवा, मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में बड़े आर्थिक सुधार के कोई क़दम नहीं उठाए. वित्त मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा प्रधानमंत्री के कार्यालय को बार-बार आगाह किए जाने के बावजूद, मनमोहन सरकार से विरासत में मिली देश की बदहाल बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था की कमियां दूर करने की नीतियां बनाने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. हमारे देश की अर्थव्यवस्था की बुनियादी संस्थागत कमियों को दूर करने के लिए अच्छे नीयत वाली आर्थिक नीतियों की ज़रूरत है. लेकिन, दिक़्क़त ये है कि क़ाबिल अर्थशास्त्री, मोदी सरकार से दूर जा रहे हैं. ऐसे में अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निपटने के लिए वैसे ज़रूरी क़दमों की उम्मीद नहीं दिखती. मोदी सरकार के दौरान, इला पटनायक, रघुराम राजन, उर्जित पटेल, अरविंद पनगढ़िया, अरविंद सुब्रमण्यम और विरल आचार्य जैसे क़ाबिल अर्थशास्त्रियों की विदाई हो गई. पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार है जब वित्त मंत्रालय में ऐसा कोई आईएएस अधिकारी नहीं है, जिसके पास अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री हो. और जो अर्थव्यवस्था की बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को नीतियां बनाने में मदद कर सके.
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टीवी चैनलों की ज़रूरत बन चुका है नफ़रत का कारोबार

Date : 25-Jul-2019
देश के अंदर कहीं भी और किसी भी तरह की घटना होती है, तो टीवी चैनलों को उसमें संवेदनशीलता कम बल्कि उसका व्यवसायीकरण ज़्यादा दिखता है. नफ़रत का कारोबार अब टीवी चैनलों की ज़रूरत बन चुका है. ऐसा लगता है कि इसके बिना अब ये धंधा नहीं चल सकता है. क़रीब 8-9 महीने पहले मैंने लिखा था कि एजेंडा सेटिंग थ्योरी किस तरीके से दर्शकों पर हावी है. उस वक़्त भी मैंने आज तक के कार्यक्रम दंगल का एक महीने का विश्लेषण किया था. उसमें हर दो-तीन दिन में राम मंदिर पर बहस की गयी थी. अब ज़रा आज तक, ज़ी न्यूज़ और एबीपी न्यूज़ की शाम के वक़्त की बहसों का मुद्दा देखिये. हर दिन हिंदू, राम, कश्मीर, पाकिस्तान, मुसलमान, इमरान खान के आसपास ये एंकर भटकते रहते हैं. कुछ ख़ास और अधूरे तथ्यों को लेकर उसे तोड़ना-मरोड़ना लगा ही रहता है. सांप्रदायिकता फैलाने के लिए तैयार माल बिना रुके बेचा जा रहा है. तीनों चैनलों की ये सभी तस्वीरें जुलाई महीने की हैं. सिर्फ़ इस 3 हफ़्ते में इन चटकदार विषयों पर इतनी बार बहस की गयी है, अगर आप साल के हर महीने का विश्लेषण करेंगे तो कमोबेश यही स्थिति मिलेगी. इसी जुलाई महीने में पूरा देश अलग-अलग आपदाओं से जूझता रहा है, लेकिन इन चैनलों के लिए वो आम घटनाएं रहीं. इस तरह की कवरेज का नतीजा मैं यही निकाल पाता हूं कि अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ एजेंडा चलाकर ये लोग जनता के बीच गोलवलकर और गोडसे जैसी चेतना का विकास जोरदार तरीके से कर रहे हैं और बेशक इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा सत्तारूढ़ पार्टी को हो रहा है. आपने देखा होगा कि इसी साल फरवरी-मार्च में किस तरीके से इन्हीं लोगों ने स्टूडियो से ही भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध का शानदार प्लॉट तैयार कर दिया था. स्टूडियो के ग्राफिक्स से सिर्फ़ आग, गोला और रॉकेट ही फेंके जा रहे थे. चुनाव भी बेहद नज़दीक था. सबकुछ इतना बढ़िया हुआ कि 23 मई को एंकर्स के चेहरे पर ग़ज़ब की चमक थी. वैसे इनके राष्ट्रवादी एजेंडे में सवाल कहीं भी नहीं है, सिर्फ़ उन्माद है. अगर सवाल होता तो इसी एजेंडे में सरकार से एक बार पूछने की ज़ुर्रत करते कि पुलवामा हमले की एनआईए जांच का क्या हुआ? देश के अंदर कहीं भी और किसी भी तरह की घटना होती है, तो टीवी चैनलों के लिए उसमें संवेदनशीलता कम, बल्कि उसका व्यवसायीकरण ज़्यादा दिखता है. पिछले महीने मुज़फ़्फ़रपुर की घटना के बारे में वो चैनलों के लिए टीआरपी का मसला हो गया. अब जब मुज़फ़्फ़रपुर की वो घटना और उसकी चर्चा का दौर समाप्त हो गया, तो फिर स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर पिछले एक महीने में इन चैनलों पर कितनी बार चर्चा की गयी? हाल में चेन्नई पानी की भीषण किल्लत से जूझता रहा, लेकिन इन पर चैनल क्यों बहस नहीं कर पाये. मराठवाड़ा और विदर्भ में सूखे की भीषण स्थिति पर चर्चा करने के बदले इन्होंने पाकिस्तान को मुद्दा बनाना ठीक समझा. हिंदू धर्म और राम ही इन समस्याओं का समाधान कर दें, शायद इसीलिए इस पर बारंबार बहस हो रही है. वैमनस्यता की भावना ऐसी कि स्वास्थ्य, कृषि, मानवाधिकार, आदिवासी, शिक्षा, विज्ञान, प्रदूषण सभी मुद्दे-सवाल ग़ायब हैं. बाढ़ भी इन लोगों के लिए टीआरपी मटीरियल हो जाता है. रिपोर्टर को सीने तक भरे पानी में ठेल देते हैं और चैनल में बैठकर मज़ा लूटते हैं. मैं सोच रहा था कि चैनल वाले इन एंकरों को ग्राफ़िक्स के बदले असल में चंद्रयान से भेज दिया जाता तो कितना अच्छा होता. शायद यहां कुछ बच जाता! अब नफ़रत और वैमनस्य की एक ऐसी दीवार कायम कर दी गयी है कि अगले कई वर्षों तक यह नहीं टूट सकेगी. लोगों को एक बात साफ़ कर दूं कि इन एंकरों को इस तरह द्वेष फैलाने के पैसे मिल रहे हैं, सब प्रायोजित है. मैंने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तक अपनी आंखों से सप्ताह में हर दिन एक ही स्क्रिप्ट और एक ही पैनलिस्टों की सूची को देखा है. वही मौलाना और वही पंडे. लेकिन आप क्यों अपनी बौद्धिकता खो रहे हैं? क्या आपके भीतर इस नफ़रत के व्यवसाय का बहिष्कार करने की हिम्मत नहीं है? क्या आपको रोज़गार, पानी, शिक्षा, स्वच्छ हवा और मूलभूत सुविधाएं नहीं चाहिए? 100 बच्चों की मौत के बाद पनपा आपका गुस्सा कहां चला जाता है? क्या आप शाम को टीवी ऑन कर देते हैं? आप लोगों की सहायता के लिए मैं एक बार फिर प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन की एजेंडा सेटिंग थ्योरी को लिख देता हूं. पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान कई बार हमारा ध्यान इस पर दिलाया जाता है. लिपमैन ने अपनी पुस्तक पब्लिक ओपिनियन में लिखा था- लोग वास्तविक दुनिया की घटनाओं पर नहीं, बल्कि उस मिथ्या छवि के आधार पर प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हैं जो हमारे दिमाग़ में बनायी गयी है/जाती है. मीडिया हमारे मस्तिष्क में ऐसी छवि गढ़ने और एक झूठा परिवेश (माहौल) बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इन टीवी बहसों को लेकर वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया कहते हैं, साधारण-सी बात है कि जो बुनियादी सवाल हैं, उन सवालों की तरफ़ लोगों का ध्यान न जाये, उसे हटाने के लिए अगर सबसे बड़ा मंच कोई हो सकता है तो वह मीडिया का मंच होता है. उसी भूमिका में मीडिया है और इसका उसे पैसा मिल रहा है. जो पूरी (सिस्टम की) लूट है उसमें मीडिया हिस्सेदार है, उसे हिस्सा मिल रहा है. अनिल कहते हैं कि इसका काउंटर यही हो सकता है कि वैकल्पिक मीडिया और लोगों का आंदोलन एकजुट हो. सिर्फ़ एक के खड़ा होने से कुछ भी नहीं होगा. मिडिया सरकार के बनाये हुए एजेंडे पर अपने आपको ढालने लगी है. यह शिफ़्ट पिछले 10-15 सालों में धीरे-धीरे हुई है. सरकार जैसी राजनीतिक फ़िज़ा तय कर रही है, उसी तरह प्रेस भी अब राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के चश्मे से ही सबकुुुछ देखना चाहती है. राष्ट्रवादी एजेंडे को लेकर शुंगलू कहते हैं, पाकिस्तान को लेकर टीवी मीडिया शुरू से ही राष्ट्रवादी रहा है. जब से टीवी न्यूज़ चैनल्स आयेे, तभी से वे पाकिस्तान को लेकर आक्रामक और कट्टर रहे हैैं. लेकिन नयी सरकार के आने के बाद पाकिस्तान के साथ हिंदू-मुस्लिम भी इस आक्रामकता में जुड़ गया है. शुंगलू कहते हैं, प्रेस का एजेंडा सरकार तय कर रही है. पूरी मीडिया सरकार के राष्ट्रवादी एजेंडे पर चल रही है. लेकिन अब भी मीडिया का कुछ हिस्सा है, जो सरकार से अलग लाइन लेकर चल रहा है. सरकार से सवाल कर रहा है, और जहां नीतियों में खोट है उसे बताकर सरकार को आईना दिखा रहा है.
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भारतीय अर्थव्यवस्था मे खतरनाक विरोधाभास

Date : 21-Apr-2019
भारतीय अर्थव्यवस्था में एक गहरा विरोधाभास देखा जा रहा है। नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की ग्रोथ रेट 6.6 प्रतिशत है। पिछले डेढ़ दशकों में अपने ही प्रदर्शन की तुलना में यह कमजोर है, लेकिन वैश्विक परिदृश्य में तुलनात्मक दृष्टि से इसे प्रशंसनीय कहा जाएगा। बहरहाल, कई अन्य महत्वपूर्ण संसूचकों पर नजर डालें तो अर्थव्यवस्था की स्थिति सिरे से निराशाजनक लगती है। फरवरी 2019 में आए आंकड़े बताते हैं कि कोर सेक्टर में केवल 2.1 प्रतिशत वृद्धि हुई है और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक मात्र 0.1 प्रतिशत ऊपर गया है। भारत की निर्यात वृद्धि पिछले पांच वर्षों में शून्य रही है, जो 1991 के बाद से शायद ही कभी हुआ हो। भारत की बचत और निवेश की दरें 2003 में 30 प्रतिशत की सीमा पार करने के बाद 2008 में 35 प्रतिशत तक गईं, जिससे भारत पूर्वी एशिया की तीव्र वृद्धि वाली अर्थव्यवस्थाओं जैसा लगने लगा। लेकिन अभी ये 30 प्रतिशत से नीचे चली गई हैं। नौकरियों की किल्लत हमारा कृषि क्षेत्र भी लड़खड़ा रहा है, लेकिन भारत पर नजर रखने वालों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय देश में नौकरियों की स्थिति है। इस बारे में आधिकारिक आंकड़े जारी करने पर रोक लगा दी गई है, लेकिन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनमी के विस्तृत अध्ययन तथा बीच-बीच में सरकारी नौकरियों के लिए उमड़ने वाली आवेदनकर्ताओं की प्रचंड तादाद से यह स्पष्ट है कि हालात बहुत खराब हैं। भारत की शानदार ग्रोथ और इन संसूचकों को एक साथ कैसे देखा जाए? चौंकाएंगे ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के परिणाम, जनता मोदी के पक्ष विरोधाभास की व्याख्या बढ़ती असमानता के जरिये की जा सकती है। देश की आर्थिक वृद्धि चोटी के अमीरों के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जबकि समाज का व्यापक हिस्सा- कामगार तबके, किसान, छोटे व्यापारी बड़ी मुश्किल से इंच-इंच आगे बढ़ पा रहे हैं। ऐसा कैसे हुआ और इससे उबरने के लिए भारत क्या करे? यहां यह मानना जरूरी है कि भारत में कई अच्छी नीतिगत पहलकदमियां ली गई हैं तो 2016 की नोटबंदी जैसी कुछ गलतियां भी हुई हैं। संसार भर के विशेषज्ञों में अब इस बात को लेकर सहमति सी बन गई है कि नोटबंदी एक भारी भूल थी। इसने छोटे व्यापारियों, मजदूरों और किसानों पर काफी नकारात्मक प्रभाव डाला, जबकि अमीरों को कमोबेश अप्रभावित छोड़ दिया। दिलचस्प बात यह है कि 2016-17 के आर्थिक सर्वे में वित्त मंत्रालय ने 1982 के बाद से अचानक नोटबंदी करने वाले जिन देशों की सूची दी है, वे हैं- उत्तरी कोरिया, वेनेजुएला, म्यांमार, इराक, रूस, सोवियत संघ, घाना, ब्राजील और साइप्रस। यह सूची स्वयं नोटबंदी की विफलता को व्याख्यायित करती हुई सी लगती है। पॉलिसी बनाने में गलतियां हो जाती हैं। इन गलतियों को समय से स्वीकार करके इन्हें दुरुस्त करना प्रफेशनल होने की निशानी है। इससे देश में भरोसा कायम रहता है। पहलकदमियों में भी दिखती रही है। जैसे नई आरक्षण नीति को लें, जिसके तहत ‘आर्थिक रूप से कमजोर’ तबके को सरकारी नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण मिलना है। इसका दायरा कुछ इस तरह तैयार किया गया है कि इसमें देश की सबसे अमीर 5 फीसदी आबादी को छोड़ कर सभी आ जाते हैं। मगर इसमें भी जो चीज ज्यादा चर्चा में नहीं आई, वह है यह प्रावधान कि अनुसूचित और अन्य वंचित जातियों के प्रत्याशी ये नौकरियां हासिल नहीं कर पाएंगे। यूं कहें कि नई आरक्षण नीति ने वंचित जातियों को उन दस फीसदी नौकरियों की दौड़ से बाहर कर दिया जो पहले उनकी पहुंच में हुआ करती थीं। व्यापार एक ऐसा क्षेत्र है जहां भारत को स्वाभाविक बढ़त हासिल है। चीन में बढ़ती मजदूरी को देखते हुए हमारे लिए निर्यात बढ़ाना खास मुश्किल नहीं होना चाहिए था। इससे रोजगार पैदा होते और खेती पर भी इसका अच्छा असर होता। लेकिन निर्यात में बढ़ोतरी श्रम सस्ता होने भर से नहीं हो जाती। इसके लिए सुविचारित नीतियों की, मसलन विनिमय दरों के प्रबंधन की भी आवश्यकता होती है। संपन्न देशों की ही तरह भारत भी चलायमान विनिमय दर व्यवस्था फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट सिस्टम को लेकर प्रतिबद्ध है। लेकिन फ्लोटिंग सिस्टम का मतलब यह नहीं होता कि कोई हस्तक्षेप ही न किया जाए। इस बारे में काफी रिसर्च उपलब्ध है, जिसका उचित इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सरकार की जिस एक पहलकदमी का मैंने समर्थन किया है और वह है नौकरशाही से जुड़े खर्चों में कटौती। वर्ल्ड बैंक के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स के मुताबिक भारत 2016 में 189 देशों में 130वें स्थान से 2018 में 190 देशों में सीधे 77वें नंबर पर आ गया। इससे भारत को रोजगार और निर्यात बढ़ाने में खासी मदद मिलनी चाहिए थी। मगर पीछे मुड़ कर देखने से साफ हो जाता है कि वास्तव में हुआ क्या। नौकरशाही पर खर्च में व्यापक कटौती करने के बजाय खास तौर पर उन दस मदों में ही खर्चे कम किए गए, जिन्हें आधार बनाकर विश्व बैंक किसी देश की नौकरशाही पर आने वाले खर्चों का आकलन करता है। इस तरह की चुनिंदा छेड़छाड़ ने भारत सरकार को वर्ल्ड बैंक की पुरजोर तारीफ तो दिला दी, लेकिन इससे ज्यादा कुछ भी हासिल नहीं किया जा सका। बांटने वाली नीति आखिर में, मैं यही कहना चाहूंगा कि आर्थिक नीतियों से जुड़ी ज्यादातर गड़बड़ियां थोड़े या इससे कुछ ज्यादा समय के लिए ही मुश्किलें पैदा करती हैं। भारत के लिए दीर्घकालिक चिंता की बात यह है कि यहां कुछ खास समूह लोगों को बांटने वाली बातें प्रचारित कर रहे हैं। भारत में विभिन्न जातियों के हिंदू ही नहीं, ईसाई, यहूदी, मुस्लिम, पारसी, सिख, बौद्ध आदि भी रहते हैं। सवर्ण हिंदुओं और बाकी समुदायों के बीच दरार डालने की यह कोशिश पूरे देश का मनोबल तोड़ सकती है और विकास को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकती है।
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शोरूम में कैरी बैग के लिए पैसे देते हैं, तो न दें

Date : 16-Apr-2019
किसी शोरूम में सामान खरीदने के बाद जब आप काउंटर पर जाते हैं तो अक्सर कैरी बैग खरीदने के लिए कहा जाता है. आप कभी 3 या 5 रुपये देकर ये बैग खरीद लेते हैं या कभी इनकार करते हुए ऐसे ही सामान ले जाते हैं. लेकिन, चंड़ीगढ़ में एक शख़्स ने बाटा के शोरूम से 3 रूपये में बैग तो खरीदा पर उन्हें इसके बदले में 4000 रूपये मुआवज़े में मिले. अक्सर शोरूम में सामान रखने के कैरी बैग के लिए 3 से 5 रूपये लिए जाते हैं. अगर आप कैरी बैग खरीदने से इनकार करते हैं तो आपको सामान के लिए किसी भी तरह का बैग नहीं दिया जाता. चंडीगढ़ के रहने वाले दिनेश प्रसाद रतुड़ी ने 5 फरवरी, 2019 को बाटा के शोरूम से 399 रूपये में जूते खरीदे थे. जब उनसे काउंटर पर कैरी बैग के लिए पैसे मांगे गए तो उन्होंने पैसे देने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि कैरी बैग देना कंपनी की जिम्मेदारी है. हालांकि, आखिर में कोई विकल्प न होने पर उन्हें बैग खरीदना पड़ा. कैरी बैग सहित उनका बिल 402 रूपये बन गया.इसके बाद दिनेश ने चंडीगढ़ में जिला स्तरीय उपभोक्ता फोरम में इसकी शिकायत की और शुल्क को गैर-वाजिब बताया. इस शिकायत पर सुनवाई के बाद उपभोक्ता फोरम ने दिनेश प्रसाद के हक़ में फ़ैसला सुनाया. फोरम ने कहा कि उपभोक्ता से ग़लत तरीके से 3 रूपये लिए गए हैं और बाटा कंपनी को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के लिए दिनेश प्रसाद रतुड़ी को 3000 रूपये मुआवज़े के तौर पर देने होंगे.साथ ही मुकदमे के खर्चे की भरपाई के लिए अलग से 1000 रूपये और देने होंगे. बाटा कंपनी को दंडात्मक जुर्माने के तौर पर उपभोक्ता कानूनी सहायता खाते में 5000 रूपये जमा कराने का भी आदेश दिया गया है. उपभोक्ता फोरम ने बाटा कंपनी को ये भी आदेश दिया कि वो सभी ग्राहकों को निशुल्क कैरी बैग दे और व्यापार के अनुचित तरीकों का प्रयोग बंद करे. लेकिन, कई उपभोक्ता सामान के अलावा कैरी बैग के लिए भी भुगतान कर देते हैं. रकम बहुत छोटी होती है इसलिए कोई कोर्ट नहीं जाता. पर अब इस मामले का उपभोक्ता के पक्ष में आना कई तरह से महत्वपूर्ण बन गया है.बैग के ज़रिए प्रचार इस आदेश में एक खास बात ये है कि उपभोक्ता फोरम ने कैरी बैग पर लिखे बाटा कंपनी के नाम पर आपत्ति जताई है. दिनेश प्रसाद के वकील देवेंद्र कुमार ने बताया, हमने कोर्ट में कहा कि इस बैग पर बाटा कंपनी का नाम लिखा है और अगर हम इसे लेकर जाते हैं तो ये कंपनी का प्रचार होगा. एक तरह से कंपनी अपने प्रचार के लिए हमसे पैसे ले रही है. उपभोक्ता फोरम ने शिकायतकर्ता की इस दलील से सहमति जताई और इसे प्रचार का ही एक तरीका बताया. फोरम ने अपने आदेश में लिखा, शिकायत में बताए गए कैरी बैग को हमने देखा. उस पर बाटा का विज्ञापन बाटा सरप्राइज़िंगली स्टाइलिश लिखा हुआ है. यह विज्ञापन दिखाता है कि बाटा स्टाइलिश है और ये उपभोक्ता को विज्ञापन एजेंट के तौर पर इस्तेमाल करता है. उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता पुष्पा गिरिमाजी भी मानती हैं कि ये कंपनी की जिम्मेदारी है कि वो उपभोक्ताओं को कैरी बैग मुफ़्त दे. वह कहती हैं, अगर हम कुछ सामान खरीदते हैं तो उसे ऐसे ही हाथ में तो ले जा नहीं ते, तो बैग देना जरूरी है. फिर जब हम इतना सामान खरीद रहे हैं तो दुकानदार की एक जिम्मेदारी भी बनती है. उसके लिए पैसा लेना बिल्कुल गलत है. वह इसे कंपनियों की कमाई का एक ज़रिया बताती हैं. पुष्पा गिरिमाजी कहती हैं, जब से प्लास्टिक बैग पर रोक लगाई गई है तब से कंपनियों ने पैसे देकर कैरी बैग देने का चलन शुरू कर दिया है. अगर आप सब्जी खरीदने जाते हैं या छोटा-मोटा सामान लेते हैं तो इसके लिए अपना बैग ले जाने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन महंगे सामानों में बैग के लिए पैसे लेना ठीक नहीं है. ये पैसे कमाने का एक तरीका बन गया है. हालांकि, बाटा ने शिकायत पर अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि उसने ऐसा पर्यावरण सुरक्षा के मकसद से किया है. लेकिन, उपभोक्ता फोरम का कहना था कि अगर कंपनी पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ऐसा कर रही थी तो उसे ये बैग मुफ़्त देना चाहिए था.कंपनी का नाम न लिखा हो तो इस मामले में कैरी बैग पर कंपनी का नाम लिखा होने के चलते ये प्रचार का मामला बना. अगर बैग पर कंपनी का नाम न हो और सादा कागज हो तो क्या पैसे लिए जा सकते हैं. पुष्पा गिरिमाजी ऐसे में भी पैसे लेना गलत मानती हैं. वह कहती हैं, कई शोरूम ऐसे होते हैं जहां अंदर बैग ले जाने की मनाही होती है. इससे उलझन रहती है कि कहां बैग लेकर जाएं और कहां नहीं. कई बार लोग साथ में बैग लेकर चलते भी नहीं है. इसलिए बैग मुफ़्त में ही देने चाहिए. साथ ही वो कहती हैं कि ये बहुत अच्छी बात है कि किसी उपभोक्ता ने ये कदम उठाया. इसका असर दूसरी कंपनियों पर भी पड़ सकता है. किसी अन्य मामले में भी इसका संदर्भ लिया जा सकेगा. इससे ये साबित हुआ है कि कैरी बैग के लिए पैसे देना जरूरी नहीं है.इस पर रोक कैसे लगे पुष्पा गिरिमाजी कहती हैं कि कंपनियों को इससे रोकने के लिए कोर्ट के आदेश के साथ-साथ लोगों की आपत्ति की भी जरूरत है. वह कहती हैं, अगर लोग शोरूम में जाकर ये पूछना शुरू करेंगे कि वो कैरी बैग देते हैं या नहीं और इसी आधार पर शॉपिंग करेंगे तो कंपनियों पर असर जरूर पड़ेगा. हालांकि, कोर्ट के ऐसे फैसले भी काफी असर डालेंगे. वहीं, दिनेश प्रसाद रतुड़ी के मामले में बाटा कंपनी राज्य स्तर पर भी अपील कर सकती है. एडवोकेट दिनेश प्रसाद ने बताया, अगर कंपनी मामले को आगे ले जाती है तो हम भी लड़ेंगे. पर अभी उपभोक्ता फोरम के आदेश से हम खुश हैं.
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मनमोहन के कार्यकाल में सेंसेक्‍स देता था धमाकेदार रिटर्न, मोदी सरकार में घटी स्‍टॉक इनवेस्‍टर्स की कमाई

Date : 09-Apr-2019
2004 से 2009 के बीच यूपीए-1 यानी मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सेंसेक्‍स ने 22.9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से 180 प्रतिशत का रिटर्न दिया। यूपीए के दूसरे कार्यकाल में हर साल 12.22 प्रतिशत की दर से 77.98 प्रतिशत का रिटर्न मिला।मई 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सत्‍ता में आने के बाद सेंसेक्‍स ने हर साल 9.37 प्रतिशत का रिटर्न दिया है। हालांकि पिछली सरकारों के मुकाबले रिटर्न्‍स की दर कम है। मई में जब मोदी सरकार बनी थी, तब से पिछले शुक्रवार (5 अप्रैल) तक सेंसेक्‍स में 56 प्रतिशत का रिटर्न मिला है जबकि निफ्टी 9.52 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से करीब 58 फीसदी बढ़ा है। हालांकि मिड और स्‍मॉल कैप के शेयरों में 2005-07 के बाद का सबसे अच्‍छा समय देखा गया। मोदी सरकार बनने के बाद, मिड-कैप इंडेक्‍स 12.68 प्रतिशत की दर से प्रत प्रति वर्ष बढ़ा जबकि स्‍मॉल कैप के शेयर हर साल 10.85 फीसदी की दर से उछले।अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्‍व वाली एनडीए सरकार के बाद मोदी सरकार में स्‍टॉक मार्केट्स ने सबसे कम रिटर्न्‍स दिए हैं। पिछले दो दशकों की इक्विटी परफॉर्मेंस का इकॉनमिक टाइम्‍स का एक अध्‍ययन बतलाता है कि 2004 से 2009 के बीच यूपीए-1 यानी मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सेंसेक्‍स का सबसे अच्‍छा दौर था। इस दौरान सेंसेक्‍स में 22.9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से 180 प्रतिशत का रिटर्न दिया। इसकी वजह विदेशी संस्‍थागत निवेश के साथ-साथ रिकॉर्ड आर्थिक और कॉर्पोरेट कमाई रही। यूपीए के दूसरे कार्यकाल में सेंसेक्‍स ने हर साल 12.22 प्रतिशत की दर से 77.98 प्रतिशत का रिटर्न दिया।1 सितंबर, 2013 से 30 मई, 2014 के बीच निफ्टी में 32 प्रतिशत की बढ़त देखी गई। मार्केट में रिकरवरी रघुराम राजन को भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाए जाने तथा मोदी के अगला प्रधानमंत्री चुने जाने की प्रबल संभावनाओं के चलते शुरू हुई। ईटी ने फंड मैनेजर्स के हवाले से कहा कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में स्‍टॉफ परफॉर्मेंस का आंकलन करते समय आर्थिक वास्‍तविकताओं का ध्‍यान भी रखना होगा। कोटक म्‍युचुअल फंड्स के एमडी नीलेश शाह ने अखबार से कहा, पिछले पांच साल में अर्थव्‍यवस्‍था वैसी रही है जैसे किसी घर की मरम्‍मत हो रही हो। हमारे बैंकिंग सिस्‍टम की रिपेयरिंग हो गई है, मुद्रास्‍फीति पर नियंत्रण हुआ है, टैक्‍स कंप्‍लायंस अच्‍छा हुआ है। इन सभी कदमों से शुरू में तकलीफ होगी पर लंबे समय में यह फायदा करेंगे।
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विश्व व्यापार संगठन

Date : 03-Apr-2019
विश्व व्यापार संगठन वर्ल्द ट्रेड ऑर्गनाइजेशन/डब्ल्यूटीओ एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो विश्व व्यापार के लिए नियम बनाता है। इसकी स्थापना 1995 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाए गए गैट GATT के स्थान पर लाने के लिए की गई थी। वर्तमान समय में इसके 164 सदस्य हैं। इसका सही ans 164 है लेकिन कुछ कारणों से ये पहले 165 लिखा जा रहा था इसलिए सही कर दिया गया है , VDD, || डब्ल्यूटीओ के सचिव और महानिदेशक जेनेवा में निवास करते हैं। सचिवालय जिसमें अब केवल 550 लोग काम करते हैं और संगठन के सभी पहलुओं के संचालन का प्रशासनिक कार्य संभालते हैं। सचिवालय के पास कानूनी निर्णय लेने की कोई शक्ति नहीं है लेकिन ऐसा करने वालों को यह महत्वपूर्ण सेवाएं और परामर्श प्रदान करता है।
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विदेशी बाजारों में सोने पर दबाव

Date : 28-Mar-2019
वैश्विक स्तर पर पीली धातु में नरमी के बीच स्थानीय जेवराती माँग आने से दिल्ली सर्राफा बाजार में गुरुवार को सोना 35 रुपये चमककर 33,095 रुपये प्रति दस ग्राम पर पहुँच गया जबकि औद्योगिक ग्राहकी उतरने से चाँदी 270 रुपये लुढ़ककर डेढ़ सप्ताह के निचले स्तर पर 38,000 रुपये प्रति किलोग्राम बिकी। विदेशी बाजारों में सोने पर दबाव रहा। सोना हाजिर 1.15 डॉलर टूटकर 1,307.90 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। जून का अमेरिकी सोना वायदा भी 3.30 डॉलर फिसलकर 1,313.60 डॉलर प्रति औंस बोला गया। बाजार विश्लेषकों ने बताया कि दुनिया की अन्य प्रमुख मुद्राओं की तुलना में डॉलर में रही तेजी से पीली धातु दबाव में आयी है।डॉलर का सूचकांक आज करीब चौथाई फीसदी चढ़ गया। इससे अन्य मुद्राओं वाले देशों के लिए सोने का आयात महँगा हो गया। इस स्थिति में सोने की माँग घटती है और कीमत गिरती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चाँदी हाजिर भी 0.01 डॉलर की बढत में 15.24 डॉलर प्रति औंस पर रही। स्थानीय बाजार में ग्राहकी बनी रहने से सोना स्टैंडर्ड 35 रुपये की बढ़त में 33,095 रुपये प्रति दस ग्राम पर पहुँच गया। सोना बिटुर भी इतना ही चढ़कर 32,925 रुपये प्रति दस ग्राम बिका। आठ ग्राम वाली गिन्नी 26,400 रुपये पर टिकी रही। चाँदी की औद्योगिक माँग कमजोर रहने से उस पर दबाव रहा। चाँदी हाजिर 270 रुपये टूटकर 38,850 रुपये प्रति किलोग्राम रह गयी। यह 18 मार्च के बाद का इसका निचला स्तर है। चाँदी वायदा 285 रुपये की गिरावट में 38,000 रुपये प्रति किलोग्राम बोली गयी। हालाँकि, सिक्का लिवाली और बिकवाली पूरी मजबूती से गत दिवस के क्रमश: 80 हजार और 81 हजार रुपये प्रति सैकड़ा पर टिके रहे। दिल्ली सर्राफा बाजार में दोनों कीमती धातुओं के दाम (रुपये में) इस प्रकार रहे:- सोना स्टैंडर्ड प्रति 10 ग्राम : 33,095 सोना बिटुर प्रति 10 ग्राम : 32,925 चाँदी हाजिर प्रति किलोग्राम: 38,850 चांदी वायदा प्रति किलोग्राम : 38,000 सिक्का लिवाली प्रति सैकड़ा : 80,000 सिक्का बिकवाली प्रति सैकड़ा : 81,000 गिन्नी प्रति आठ ग्राम : 26,400
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ये है कोहिनूर से भी बड़ा 900 करोड़ का हीरा

Date : 26-Mar-2019

आपने आज तक कितना बड़ा हीरा देखा है? किसी को कान में पहने देखा होगा, किसी को कान की बालियों में हीरा पहने देखा होगा...ज्यादा से ज्यादा किसी को हीरों के हार पहने देखा होगा..
लेकिन क्या आप जानते हैं पुराने जमाने में हैदराबाद के निज़ाम हीरे का इस्तेमाल 'पेपर वेट' के तौर पर करते थे.
इतना ही नहीं एक निज़ाम तो अंग्रेजों की नज़र से छुपाने के लिए इसे जूतों में पहना करते थे.यकीन नहीं आता, तो आप खुद भी अपनी नंगी आंखों से देख सकते हैं अब इस हीरे को. इस हीरे का एक नाम भी है - जैकब डॉयमंड

दिल्ली के राष्ट्रीय संग्राहलय में हैदराबाद के निज़ाम के आभूषणों की प्रदर्शनी लगी है. ये हीरा दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में जारी प्रदर्शनी में रखा है
ये है दुनिया का सातवां सबसे बड़ा हीरा है. ये साइज़ में कोहिनूर से भी बड़ा है
और इस हीरे की आज की कीमत सुन कर शायद आप भी पीछे के 'जीरो' गिनने लग जाएं.
इस हीरे की कीमत है 900 करोड़ रुपए.
फिलहाल इस हीरे का मालिकाना हक़ भारत सरकार के पास है.


 

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