Business

Previous123Next

क्या LIC वाकई डुबो रहा है लोगों का पैसा

Date : 24-Jan-2020
नई दिल्ली 24 जनवरी । भारतीय बैंकिंग सिस्टम में डूबते कर्ज़ों की न ख़त्म होती कहानियों के बीच हाल में आई एक ख़बर ने निवेशकों के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी है. भरोसे का प्रतीक माने जाने वाली इस कंपनी के पिछले पाँच साल के आंकड़े वाकई हैरान और परेशान करने वाले हैं. बात हो रही है सरकारी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी की. पिछले पाँच साल में कंपनी के नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स यानी एनपीए दोगुने स्तर तक पहुँच गए हैं. कंपनी के वेबसाइट पर जारी सालाना रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2019 तक एनपीए का ये आंकड़ा निवेश के अनुपात में 6.15 फ़ीसदी के स्तर तक पहुँच गया है, जबकि 2014-15 में एनपीए 3.30 प्रतिशत के स्तर पर थे. यानी पिछले पाँच वित्तीय वर्षों के दौरान एलआईसी के एनपीए में तकरीबन 100 फ़ीसदी का उछाल आया है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि मोदी सरकार एलआईसी को नुक़सान पहुँचा रही है और इससे लोगों का इस संगठन (एलआईसी) पर भरोसा टूट जाएगा राहुल गांधी ने बुधवार को ट्वीट किया, एलआईसी पर लोगों का भरोसा है, इसलिए करोड़ों ईमानदार लोग इसमें निवेश करते हैं. मोदी सरकार लोगों के भविष्य को जोखिम में डालकर एलआईसी को नुक़सान पहुँचा रही है. इससे जनता का एलआईसी पर भरोसा टूट रहा है. सामने आ रहे इन ख़बरों से लोगों में घबराहट पैदा होती है और इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं एलआईसी की 2018-19 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च 2019 को कंपनी के सकल एनपीए 24 हज़ार 777 करोड़ रुपये थे, जबकि कंपनी पर कुल देनदारी यानी कर्ज़ चार लाख करोड़ रुपये से अधिक का था. एलआईसी की कुल परिसंपत्तियाँ 36 लाख करोड़ रुपये की हैं. दरअसल, एलआईसी की ये हालत इसलिए हुई है क्योंकि जिन कंपनियों में उसने निवेश किया था उनकी माली हालत बेहद ख़राब हो गई है और कई कंपनियां तो दिवालिया होने की कगार पर पहुँच गई हैं, इनमें दीवान हाउसिंह रिलायंस कैपिटल, इंडियाबुल्स हाउसिंग फ़ाइनेंस, पीरामल कैपिटल और यस बैंक शामिल हैं. दीवान हाउसिंग में एलआईसी का एक्सपोज़र 6500 करोड़ से अधिक का है, रिलायंस कैपिटल में चार हज़ार करोड़ रुपये का एक्सपोज़र था. एबीजी शिपयार्ड, एमटेक ऑटो और जेपी ग्रुप में भी एलआईसी का काफ़ी अधिक एक्सपोज़र था. एस्कॉर्ट्स सिक्योरिटीज़ में रिसर्च एनालिस्ट आसिफ़ इक़बाल का कहते हैं, इसे इस तरह देखा जा सकता है कि ग़ैरबैंकिंग वित्तीय सेक्टर में हुई तबाही का बड़ा असर एलआईसी पर हुआ है. एलआईसी ने इन कंपनियों में पैसा लगाया था. अब इन एनबीएफ़सी के बेहाल होने से एलआईसी की सेहत भी बिगड़ गई है. इसके अलावा क्योंकि एलआईसी के पास भारी मात्रा में नकदी है, इसलिए सरकार इसे अपने संकटमोचक के रूप में भी इस्तेमाल करती रही है. वितीय रूप से लड़खड़ा रही कई सार्वजनिक कंपनियों के शेयर ख़रीदकर एलआईसी ने इन्हें उबारा है. आसिफ़ इक़बाल कहते हैं, दरअसल, एलआईसी भी वही ग़लती करती रही है, जो कि कई सरकारी और निजी बैंकों ने की है. एलआईसी के एनपीए निजी क्षेत्र के बैंकों यस बैंक, एक्सिस बैंक और आईसीआईसीआई बैंक के एनपीए के क़रीब हैं. ये सही है कि बही खाते की इस बिगड़ी सेहत का असर कंपनी पर ज़रूर दिखेगा और अगर ये एनपीए न होते तो बहीखाते में मुनाफ़े का आंकड़ा बढ़ा हुआ नज़र आता. आसिफ़ इक़बाल कहते हैं, सीधे तौर पर तो एलआईसी के ग्राहकों को डरने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन कहीं न कहीं उनके वित्तीय हितों पर असर तो होगा ही. जब मध्यमवर्ग का कोई व्यक्ति एक ईएमआई नहीं भर पाता तो रिकवरी एजेंट पूरे परिवार को धमकाने चले आते हैं. अब अमीर डिफॉल्टर्स ने एलआईसी के करोड़ों रुपये डुबो दिए हैं तो उन्हें ख़ारिज कर दिया गया है. सरकार अमीरों के लिए है क्या? एजे प्रसाद ने ट्वीट किया, क्या राहुल गांधी को कुछ पता है कि वो एलआईसी के किन एनपीए की बात कर रहे हैं. क्या उन्हें पता है कि ये एलआईसी हाउसिंग फ़ाइनेंस का एक्सपोज़र है. मोदी सरकार इसके लिए कैसे ज़िम्मेदार है. सही होगा कि राहुल गांधी ट्वीट करने से पहले सोच लें.
View More...

सिलाई मशीन: महिलाओं में क्रांतिकारी बदलाव लेकर आई

Date : 18-Jan-2020
18 जनवरी 2020 कभी आपने सोचा है कि छोटी-छोटी चीज़ें किस तरह समाज में बड़े परिवर्तनों को अंजाम देती हैं. सिलाई मशीन भी ऐसी ही एक चीज़ है जो महिलाओं की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव लेकर आई. ये कहानी ज़रा पुरानी है- लगभग 170 साल पुरानी. मगर सिलाई मशीन का जादू आज भी कायम है. आज भी दुनियाभर में महिलाओं के उत्थान की तमाम योजनाओं के केंद्र में सिलाई मशीन ही है. जब भौंचक्के रह गए कुछ लोग सन 1850 से कई साल पहले की बात है. अमरीकी सामाजिक कार्यकर्ता एलिजाबेथ केडी स्टेंटन महिलाओं के अधिकारों को लेकर अपनी बात रख रही थीं. स्टेंटन ने अपने भाषण में महिलाओं को मताधिकार देने की बात कही. उनकी बात सुनकर उनके करीबी समर्थक भी भौंचक्के रह गए क्योंकि उनके समर्थकों के लिए भी ये उस वक्त बेहद महत्वाकांक्षी बात थी. लेकिन ये वो समय था जब समाज धीरे-धीरे बदल रहा था. असफल एक्टर ने बनाई सिलाई मशीन अभिनय की दुनिया में असफल रहने के बाद बॉस्टन में एक शख़्स दुकान किराए पर लेकर कुछ मशीनें बेचने और नई मशीनें इजाद करने की कोशिश कर रहे थे. ये असफल एक्टर लकड़ी के अक्षर बनाने वाली मशीन बेचने की कोशिश में लगे थे. ये वो समय था जब लकड़ी के अक्षर चलन से बाहर जा रहे थे. ये सब कुछ चल ही रहा था कि एक दिन दुकान के मालिक ने इस असफल एक्टर को बुलाकर एक मशीन का प्रोटोटाइप दिखाया. दुकान के मालिक इस मशीन के डिज़ाइन को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे थे. उनसे पहले दशकों से लोग इस मशीन पर काम कर रहे थे लेकिन किसी को सफलता नहीं मिल रही थी. ये एक सिलाई मशीन थी जिसको बेहतर बनाने में दुकान मालिक को अपने किराएदार के अनुभव की ज़रूरत थी. 14 घंटे में सिलती थी एक शर्ट उस दौर के समाज में सिलाई मशीन एक बड़ी चीज़ हुआ करती थी. तत्कालीन अख़बार न्यू यॉर्क हेराल्ड अपनी एक ख़बर में लिखा था, ऐसा कोई कामगार समाज नहीं है जिसे कपड़े सिलने वालों से कम पैसा मिलता हो और जो उनसे ज़्यादा मेहनत करता हो. इस दौर में एक शर्ट बनाने में 14 घंटे से ज़्यादा का समय लगता था. ऐसे में एक ऐसी मशीन बनाना बड़ी व्यापारिक सफलता का वादा था जो कि सरल हो और कपड़े सिलने में कम समय लेती हो. सिलाई करने वालों में ज़्यादातर महिलाएं और बच्चियां थीं. इस काम ने महिलाओं की ज़िंदगी की बोझिल बना दिया था. क्योंकि वे दिन के ज़्यादातर घंटे कपड़े सिलने में ही बिताया करती थीं. महिलाओं की चुप्पी दुकान के मालिक ने जब अपने किराएदार को ये सिलाई मशीन दिखाई तो इस असफल एक्टर ने कहा, आप उस एक चीज़ को ही ख़त्म करना चाहते हैं जो कि महिलाओं को शांत रखती है. - आइज़ैक मेरिट सिंगर. सिंगर करिश्माई व्यक्तित्व के मालिक थे. लेकिन उन्हें एक व्याभिचारी शख़्स भी बताया जाता था. उन्होंने 22 बच्चों को जन्म दिया था. एक महिला ने तो उन पर पीटने का अभियोग भी लगाया था. सिंगर कई सालों तक अपने तीन परिवार चलाते रहे और किसी भी पत्नी को सिंगर की दूसरी पत्नी के बारे में नहीं पता था. सिंगर एक तरह से महिलाओं के अधिकारों के समर्थक नहीं थे. हालांकि, उनके व्यवहार ने कुछ महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की वजह ज़रूर दी. सिंगर के बायोग्राफ़र रूथ ब्रेंडन टिप्पणी करते हैं कि वह एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने फेमिनिस्ट मूवमेंट को मज़बूती प्रदान की थी. सिंगर ने सिलाई मशीन के प्रोटोटाइप को देखने के बाद उसमें कुछ परिवर्तन किए और अपने परिवर्तनों वाली मशीन को लेकर पेटेंट करवा लिया. ये मशीन इतनी बेहतरीन थी जिससे एक शर्ट को बनाने में लगने वाला समय 14 घंटों से घटकर मात्र एक घंटा हो गया. दुर्भाग्य से ये मशीन उन तकनीकों पर भी आधारित थी जिन पर दूसरे अविष्कारकों का पेटेंट था. इनमें आंख की आकृति जैसी सुई थी जो कि धागे को कपड़े से बांधने का काम करती थी. इसके साथ ही कपड़े को आगे बढ़ाने की तकनीक का पेटेंट भी किसी और अविष्कारक के नाम पर था. 1850 के दौरान सिलाई मशीन और उसकी डिज़ाइन पर अधिकारों को लेकर संघर्ष सामने आया. सिलाई मशीन बनाने वाले मशीन बेचने से ज़्यादा अपने प्रतिस्पर्धियों को कानूनी मामलों में फंसाने में व्यस्त थे. आख़िरकार एक वकील ने सभी निर्माताओं को सलाह दी कि सिलाई मशीन बनाने के व्यापार से जुड़े चार व्यापारियों के पास उन सभी तकनीकों के पेटेंट हैं जो कि एक बेहतरीन सिलाई मशीन बनाने के लिए ज़रूरी हैं. और ऐसे में एक दूसरे पर कानूनी केस करने की जगह वे अपनी तकनीकों को एक दूसरे को इस्तेमाल करने दें और इस समूह के बाहर के व्यापारियों पर कानूनी केस करें. इन कानूनी पचड़ों से आज़ाद होते ही सिलाई मशीन का बाज़ार आसमान छूने लगा. लेकिन इस बाज़ार पर सिंगर का अधिपत्य हुआ. ये एक ऐसी बात थी जिसे सिंगर के प्रतिस्पर्धियों के लिए मानना मुश्किल था. वो मानते थे कि इसके लिए सिंगर के कारखाने ज़िम्मेदार थे. सिंगर के प्रतिस्पर्धी अमरीकी सिस्टम के तहत नए दौर के उपकरणों और तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे थे. जबकि सिंगर की मशीनों में अभी भी सामान्य नट-बोल्ट वाली प्रणाली चल रही थी. सिंगर कैसे बने बड़े व्यापारी तमाम दिक्कतों के बावजूद सिंगर और उनके बिजनेस पार्टनर एडवर्ड क्लार्क ने मार्केटिंग के ज़रिए अपने व्यापार को आसमान पर पहुंचाया. इस दौर में सिलाई मशीनें काफ़ी महंगी हुआ करती थीं. और एक मशीन को खरीदने में महीनों की कमाई लगा करती थी. क्लार्क ने इस समस्या के समाधान के लिए एक नया मॉडल विकसित किया. इसके तहत लोग मशीन की पूरी क़ीमत चुकाए बिना मासिक तौर पर किराए पर मशीन ले सकते थे. जब उनके किराये की कुल क़ीमत मशीन की क़ीमत के बराबर हो जाती थी तो मशीन इस्तेमाल करने वाले की हो जाती थी. इस तरह सिलाई मशीन अपनी पुरानी नाकामयाब और धीमे काम करने वाली मशीन की छवि से आज़ाद हो गई. सिंगर के सेल्स एजेंट लोगों के घर जाकर मशीन सेटअप करने लगे. ये एजेंट मशीन देने के बाद वापस लोगों के पास जाकर उनका अनुभव और मशीन ठीक करने जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराते थे. लेकिन इन सभी मार्केटिंग रणनीतियों के बावजूद सिंगर की कंपनी महिलाओं के ख़िलाफ़ सामाजिक राय की वजह से नुक़सान उठा रही थी. सामाजिक कार्यकर्ता स्टेंटन इस सोच के ख़िलाफ़ लड़ रही थीं. ये समझने के लिए दो कार्टूनों पर नज़र डाली जा सकती है. एक कार्टून ये कहता है कि महिलाओं को सिलाई मशीन खरीदने की क्या ज़रूरत है जब वे इससे शादी कर सकती हैं. वहीं, एक सेल्समेन कहता है कि सिलाई मशीन की वजह से महिलाओं को अपने बुद्धि-विवेक को बढ़ाने के लिए समय मिलेगा कुछ लोगों के पूर्वाग्रहों ने इस तरह के शक़ को भी जन्म दिया कि क्या महिलाएं इतनी महंगी मशीनों को चलाने में सक्षम हैं? लेकिन सिंगर का पूरा बिज़नेस मॉडल इसी बात पर निर्भर था कि महिलाएं ये काम कर सकती हैं. सिंगर ने अपने निजी जीवन में महिलाओं को चाहें जितना कम सम्मान दिया हो. लेकिन उन्होंने न्यू यॉर्क के ब्रॉडवे में एक दुकान किराए पर लेकर युवा महिलाओं को नौकरी पर रखा. ये महिलाएं लोगों को मशीनें चलाकर दिखाती थीं. सिंगर अपने विज्ञापन में कहा करते थे - ये मशीन निर्माता की ओर से सीधे परिवार की महिला को बेची गई है. इस विज्ञापन का आशय ये भी था कि महिलाओं को वित्तीय स्वतंत्रता हासिल करनी चाहिए. इसमें कहा गया कि कोई भी महिला इस मशीन की मदद से हर साल एक हज़ार डॉलर कमा सकती है. साल 1860 में न्यू यॉर्क टाइम्स ने अपने एक लेख में कहा कि किसी अन्य अविष्कार ने माँओं और बेटियों को इस मशीन से ज़्यादा राहत नहीं दी है.
View More...

उद्योगपतियों में डर का माहौल, सरकार को नापसंद है आलोचना: राहुल बजाज

Date : 01-Dec-2019
एक कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे गृहमंत्री अमित शाह से उद्योगपति राहुल बजाज ने कुछ तीखे सवाल किये. उन्होंने मॉब लिंचिंग और सांसद साध्वी प्रज्ञा के नाथूराम गोडसे को लेकर दिए बयान में उचित कार्रवाई ना किये जाने का ज़िक्र तो किया ही साथ ही ये भी कहा कि लोग आपसे डरते हैं. राहुल बजाज ने कहा, हमारे उद्योगपति दोस्तों में से कोई नहीं बोलेगा, मैं खुलेतौर पर इस बात को कहता हूं... एक माहौल तैयार करना होगा... जब यूपीए 2 सरकार सत्ता में थी, तो हम किसी की भी आलोचना कर सकते थे. आप अच्छा काम कर रहे हैं, उसके बाद भी, हम आपकी खुले तौर पर आलोचना करें इतना विश्वास नहीं है कि आप इसे पसंद करेंगे. इसके साथ ही बजाज ने आर्थिक स्थिति को लेकर भी अपनी और अपने साथी उद्योगपतियों की चिंता का ज़िक्र किया. इसके बाद राहुल बजाज की टिप्पणी का उत्तर देते हुए अमित शाह ने कहा कि किसी को भी किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है और जैसा कि आप कह रहे हैं कि डर का एक ऐसा माहौल बना है तो हमें इस माहौल को बेहतर करने का प्रयास करना चाहिए. मैं इतना स्पष्ट तौर पर कहना चाहूंगा कि किसा को डरने की ज़रूरत नहीं और ना ही कोई डराना चाहता है. इस मौके पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और रेल व वाणिज्य मंत्री पीयूश गोयल भी मंच पर मौजूद थे.
View More...

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की रैंकिंग में भारत 10 पायदान गिरा

Date : 10-Oct-2019
वर्ल्ड इकॉनोमिक फ़ोरम (WEF) की एक सालाना रिपोर्ट में भारत काफ़ी नीचे फिसल गया है. अर्थव्यवस्था में प्रतियोगिता के लिए लाई जाने वाली बेहतरी को आंकने वाली इस रिपोर्ट में ऐसा कहा गया है. ग्लोबल कॉम्पिटिटिव इंडेक्स में पिछले साल भारत 58वें नंबर पर था लेकिन अब वह 68वें नंबर पर पहुंच गया है. इस इंडेक्स में सबसे ऊपर सिंगापुर है. उसके बाद अमरीका और जापान जैसे देश हैं. ज़्यादातर अफ़्रीकी देश इस इंडेक्स में सबसे नीचे हैं. भारत की रैंकिंग गिरने की वजह दूसरे देशों का बेहतर प्रदर्शन बताया जा रहा है. इस इंडेक्स में चीन भारत से 40 पायदान ऊपर 28वें नंबर पर है, उसकी रैंकिंग में कोई बदलाव नहीं आया है. कज़ाकस्तान, वियतनाम जैसे देश भारत से ऊपर वियतनाम, कज़ाकस्तान और अज़रबैजान जैसे देश भी इस सूची में भारत से ऊपर हैं. ब्रिक्स देशों में चीन सबसे ऊपर है जबकि ब्राज़ील भारत से भी नीचे 71वें नंबर पर हैं. वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी है और काफ़ी स्थिर भी है लेकिन आर्थिक सुधारों की रफ़्तार काफ़ी धीमी है. बेहतर आर्थिक माहौल के मामले में कोलंबिया, दक्षिण अफ़्रीका और तुर्की ने पिछले साल भारत से बेहतर प्रदर्शन किया है और वे भारत से आगे निकल गए हैं. भारत की गिरावट के लिए ज़िम्मेदार कौन इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि दुनिया भर में मंदी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं जिनसे जूझना अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती होगी. इस रैंकिंग में पाकिस्तान 110वें नंबर पर है जबकि नेपाल (108) और बांग्लादेश (105) भी उससे ऊपर हैं. इस रिपोर्ट में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था, मज़ूदरों की दशा और बैंकिंग सेवाओं की हालत को इस गिरावट के लिए ज़िम्मेदार माना गया है. यह गिरावट भारत के लिए निस्संदेह चिंता की बात है. ख़ासतौर पर ऐसे समय में जब भारत को अधिक निवेश और कारोबारी गतिविधियों की ज़रूरत है ताकि सुस्ती से निबटा जा सके.
View More...

सुस्ती या मंदीः भारतीय अर्थव्यवस्था

Date : 10-Oct-2019
10 अक्तूबर 2019 पिछले कुछ समय से ये बहस लगातार गरम है कि अर्थव्यवस्था में मंदी है या नहीं. इस सवाल का जवाब हां या ना में देनेवाले बड़े बड़े खेमे हैं. दोनों खेमों के पास अपने अपने तर्क भी हैं और उनके समर्थन में आंकड़े भी. लेकिन ये पहेली सिर्फ आंकड़ों से हल होनेवाली तो है नहीं. कहा जाता है कि मंदी होती है तो चारों ओर दिखती है. दबे पांव न आती है, न जाती है. लेकिन और किसी की न मानें, रिज़र्व बैंक की तो माननी पड़ेगी. उसके गवर्नर पहले कह चुके हैं कि उन्हें तो फ़रवरी में ही ख़बर थी कि मंदी के आसार हैं और वो तब से ही उससे मुक़ाबले के लिए तलवार भांज रहे हैं. और अब लगातार छह बार पॉलिसी रेट यानी देश भर के बैंकों को ब्याज़ का इशारा करनेवाली दर काटने के बाद भी वो कह रहा है कि बैंकों और गैर बैंकिंग माध्यम यानी दूसरी फाइनेंस कंपनियों से कॉमर्शियल सेक्टर को जानेवाली रकम में 88 परसेंट की गिरावट आई है. यानी जहां पिछले साल 2018 में, अप्रैल से लेकर बीच सितंबर तक, सौ रुपया जाता था इस साल मात्र बारह रुपये गए. सौ रुपये में बारह रुपये सुनने में बड़ी रकम नहीं लगती, इसलिए समझिए कि वो बारह परसेंट रकम है 90,995 हज़ार नौ सौ पंचानबे करोड़ रुपये. और सौ रुपये यानी पिछले साल की रकम थी सात लाख छत्तीस हज़ार करोड़ रुपये. और जो कमी आई है यानी सौ में अट्ठासी, वो हुई छह लाख पैंतालीस हज़ार करोड़ रुपये. इसके साथ और भी आंकड़े हैं रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट में, लेकिन वो सारे गिनाने से बात सुलझेगी कम और उलझेगी ज़्यादा. तो आपकी दिलचस्पी हो तो अख़बारों में या रिज़र्व बैंक की साइट पर तलाश लें. यहां ज़्यादा ज़रूरी और समझने वाली बात ये है कि कॉमर्शियल सेक्टर होता क्या है. आपको लग रहा होगा कि व्यापार के लिए दिया गया सारा कर्ज़ यही तो होता है. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. इसमें मैन्युफैक्चरिंग यानी फैक्टरियां, फार्मिंग यानी खेती और ट्रांसपोर्ट यानी गाड़ियों का कारोबार शामिल नहीं है. तो अब बचा क्या? बचे आपके आसपास दिखने वाले वो सारे काम धंधे जो इन तीन में शामिल नहीं हैं. सारे छोटे व्यापारी, दुकानदार, आढ़ती, और रिटेलर यानी अनाज से लेकर हार्डवेयर और फ्रिज़, टीवी या कार तक के डीलर. दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालें तो समझ में आ जाएगा कि यही लोग हैं जिनके भरोसे अर्थव्यवस्था का चक्का चलता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो बाज़ार में लेनदेन का चक्र चलता रहता है. कर्ज़ नहीं मिल रहा या नहीं ले रहे? तो अब प्रश्न ये है कि बैंक इन्हें कर्ज़ दे नहीं रहें या ये ले नहीं रहे हैं. बजट और उसके बाद आए तीन सप्लिमेंट्स से आप ये तो समझ चुके होंगे कि सरकार पूरा दम लगा रही है कि बैंक इन्हें ही नहीं सभी को कर्ज़ दें. आपके पास भी दिन में पांच सात कॉल आते ही होंगे अलग अलग कंपनियों से या बैंकों से कि वो आपको कर्ज़ देने के लिए कितने आतुर हैं. यानी बैंक तो पैसा देना चाहते हैं और अगर ये ले नहीं रहे हैं तो उसकी वजह क्या है. अर्थशास्त्रियों के पास इसकी कुछ पेचीदा सी वजहें हो सकती हैं. लेकिन हमें समझना ये चाहिए कि आप और हम जब भी कर्ज़ लेते हैं तो क्या सोचकर लेते हैं और कब नहीं लेते. कब लेते हैं कर्ज़? हम घर का कर्ज़ लेते हैं, जब लग रहा होता है कि किराया बढ़ता जा रहा है और कर्ज़ की किस्त तो बढ़ेगी नहीं बल्कि घर का दाम बढ़ेगा, तो जब तक कर्ज़ चुकेगा काफी फायदा भी हो चुका होगा. हम कार का कर्ज़ लेते हैं क्योंकि लगता है कि किस्तों पर कार आ जाएगी, आने जाने में आराम रहेगा साथ ही स्टेटस भी बढ़ेगा. लेकिन इसके साथ एक ज़रूरी बात और है. कर्ज़ हम तभी लेते हैं जब हमें यकीन होता है कि नौकरी बनी रहेगी, तनख़्वाह न सिर्फ मिलती रहेगी बल्कि बढ़ेगी भी. जरा भी शक हुआ तो फिर आदमी सबसे पहले ईएमआई ख़त्म करने के चक्कर में लग जाता है. किस्तों से मुक्ति रहेगी तो बाकी खर्च का इंतजाम तो किसी न किसी तरह से कर लेंगे. अब इसी उदाहरण को एक व्यापारी के नज़रिए से देखिए. धंधा चल रहा है, माल आ रहा है जा रहा है, ग्राहकों की लाइन लगी है- तो उसे कोई फ़िक्र नहीं होती, बैंक से कर्ज़ लिया, और स्टॉक भरा, और ऑर्डर दिए, और माल बेचा. तरक्की की रफ़्तार बढ़ती रहती है. लेकिन अगर एक दिन माल कम बिके, फिर एक हफ़्ता ऐसा निकल जाए, तो फ़िक्र होने लगती है. पूरा महीना हो जाए तो ये चिंता बढ़ जाती है, सप्लायर के ऑर्डर कटने लगते हैं, और जोर ग्राहकों से वसूली पर लग जाता है. यहीं बैंक से कर्ज़ उठना कम होता है और तब तक कम होता रहता है जब तक कि दुकानदारी वापस तेज़ नहीं होती. क्या मंदी आ गयी है, कैसे समझें इसे? और दुकानदारी में मंदा क्यों आता है? कौन सा वक्त होता है जब आप और हम अपने खर्च कम कर देते हैं, ज़रूरी चीजों को छोड़कर बाकी सामान की ख़रीदारी टाल देते हैं? जाहिर है, वही वक्त जब आपको अपनी कमाई और अपने रोज़गार कि फ़िक्र होने लगती है. पता नहीं काम रहेगा या नहीं, पता नहीं वेतन मिलेगा या नहीं. बचत से कब तक काम चलेगा, और बैंक में भी तो ब्याज़ गिरता ही जा रहा है, ऐेसे में जितना बचा के चलो वही सही है. ये बात किसी एक इंसान, एक परिवार या एक मोहल्ले की नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था में विकास के प्रति अविश्वास का संकट है. रिज़र्व बैंक ने पॉलिसी रेट में चवन्नी की कटौती की है, लेकिन साथ ही उसने जीडीपी यानी देश की तरक्की की दर में पूरे अस्सी टका यानी 0.8% की कटौती का अनुमान भी सामने रख दिया है. उम्मीदें, वादे और मार्केट सब हवा सरकार से जो उम्मीदें थीं बजट में वो पूरी नहीं हुईं, उसके बाद आला अफसरों और नेताओं ने सोचा कोई जादू की छड़ी घुमा दी जाए. शेयर बाज़ार के बाजीगरों ने हवा भी बना दी कि जादू चल गया. लेकिन चार दिन की चांदनी, और फिर वही सवाल. आखिर विकास को पटरी पर लाया कैसे जाए. जैसे जैसे दिन बीतेंगे इस सवाल का जवाब मु्श्किल होता जाएगा. मै नहीं जानता कि जवाब क्या है. मैं ये जानता हूं कि मुश्किल बड़ी हो तो सबको साथ मिलकर, मशविरा करके उससे मुक़ाबला करना चाहिए. देश में और देश से बाहर ऐसे बहुत से विद्वान और भारत प्रेमी हैं जो रास्ता निकालने में मदद कर सकते हैं. शर्त सिर्फ एक है कि कोई ये बात समझे और इन सबको साथ बैठाकर रास्ता निकालने की कोशिश करे
View More...

बड़े सरकारी बैंकों का विलय कर देना ही मौजूदा आर्थिक संकट का हल नहीं है.

Date : 03-Sep-2019
नई दिल्ली 3 सितम्बर । वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले हफ़्ते भारत के कुछ प्रमुख सरकारी बैंकों के विलय की घोषणा की. अब इस बात पर चर्चा है कि क्या इस विलय की सच में बहुत ज़रूरत थी? भारत के मौजूदा सामाजिक-आर्थिक हालात को देखते हुए यह सवाल काफ़ी मायने रखता है. आज से पहले इतने व्यापक स्तर पर बैंकों का विलय देखने को नहीं मिला. देश की आज़ादी के बाद 20 जुलाई 1969 को देश के 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था. उस फ़ैसले का मक़सद देश की अर्थव्यवस्था में कृषि, लघु उद्योग और निर्यात पर अधिक ध्यान देना था. इसके साथ ही नए उद्यमियों और पिछड़े तबकों का विकास करना भी एक मक़सद था. इसके बाद 13 अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण भी किया गया था. इस क़दम को भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण नीतिगत फै़सले के तौर पर देखा जाता है. बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पहले भारत की पूरी पूंजी बड़े उद्योगपतियों और औद्योगिक घरानों के ज़रिए ही नियंत्रित होती थी. उस व्यवस्था में बैंकों में पैसे जमा करने वाले के लिए किसी तरह की सुरक्षा की गारंटी नहीं थी. वक़्त गुजरने के साथ-साथ बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ और साल 1991 में कई आर्थिक बदलाव किए गए, जिसके चलते देश का बैंकिंग सेक्टर अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी बन गया. इतना ही नहीं ग्राहकों और निवेशकों में भी बैंक के प्रति भरोसा बढ़ता चला गया. बैंकों के विलय से क्या होगा? पब्लिक सेक्टर के बैंकों का विलय कर उनकी संख्या कम कर देने का परिणाम शायद कुछ वक़्त बाद ही दिखने लगे या हो सकता है इसका दूरगामी परिणाम भी हमारे सामने आए. विशेषकर मानव संसाधन, रोज़गार सृजन और अर्थव्यवस्था के विकास के लिहाज़ से यह फ़ैसला काफ़ी अहम हो सकता है. लेकिन फ़िलहाल इस विलय की वजहों को साफ़ तौर पर नहीं बताया गया है. इस विलय के बाद सबसे पहला असर मानव संसाधन पर पड़ता हुआ महसूस होता है. शायद बैंकों के विलय का फै़सला लेते वक़्त इन बैंको में काम करने वाले कर्मचारियों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. हर बैंक के अपने अलग नियम क़ायदे होते हैं, काम करने का अलग ढंग होता है. उदाहरण के लिए, हाल ही में जिस तरह से भारतीय स्टेट बैंक ने अपनी स्थानीय ब्रांचों का विलय किया, तो उसमें अधिक समस्याएं नहीं आईं क्योंकि एसबीआई मूलतः एक तरह के नियम और आधारभूत ढांचे के तहत काम करता है. लेकिन पब्लिक सेक्टर के इन अलग-अलग बैंकों के मिलने से वहां काम करने वाले कर्मचारियों को कई तरह के बदलावों का सामना करना पड़ेगा. यह चुनौती इन बैंकों में नेतृत्व के स्तर पर भी देखने को मिलेगी. एनपीए की समस्या सुलझेगी? अगला बड़ा सवाल यह है कि क्या इस विलय के बाद बैंकों के नॉन पर्फोर्मिंग एसेट यानी एनपीए की समस्या सुलझ जाएगी, या उस लोन पर नियंत्रण लग पाएगा जिसके वापिस मिलने की उम्मीद कम ही है. क्या इस फ़ैसले से बैंकों की काम करने की क्षमता में कुछ सुधार होगा. भारत की अर्थव्यवस्था इस समय तीन प्रमुख समस्याओं का सामना कर रही हैः 1. अर्थव्यवस्था में सुस्ती है, जीडीपी पाँच प्रतिशत या उससे भी नीचे चली गई है. यह दर्शाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की तरफ़ बढ़ रही है. 2. बैंकों का बहुत ख़राब प्रदर्शन. बैंकों का एनपीए बहुत ज़्यादा हो गया है और उसके वापिस आने की उम्मीद भी बहुत कम है. 3. देश में बेरोज़गारी की दर लगातार बढ़ रही है. यह दर्शाता है कि भारत अपनी विविधता से भरी जनसंख्या का सही लाभ नहीं उठा रहा, जनसंख्या में बहुलता की बात चुनाव के वक़्त काफ़ी इस्तेमाल किया गया. खैर अभी तक तो यह साफ़ नहीं है कि बैंकों के इस विलय से ऊपर बताई गई समस्याओं का हल निकलेगा या नहीं. बीते कुछ समय में सरकारी और निजी दोनों ही सेक्टर के बैंकों में एनपीए बहुत अधिक बढ़ गया है. निजी बैंकों में इस एनपीए को हासिल करने की दर सरकारी बैंकों के मुक़ाबले थोड़ा बेहतर है. इसकी मुख्य वजह यह है कि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की वसूली प्रक्रिया बहुत ही सख्त होती है, जिसमें बहुत ही सूक्ष्म स्तर तक क़र्ज़दाता पर नज़र रखी जाती है. वहीं सरकारी बैंक में इस तरह की प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती. यह दिखाता है कि पब्लिक सेक्टर के बैंकिंग सिस्टम में भी कई तरह के बदलावों की ज़रूरत है. एक सवाल यह भी उठता है कि क्या बड़े बैंकों के विलय से उनके काम करने की क्षमता बेहतर हो जाएगी. इसका पहला फ़ायदा तो यह हो सकता है कि बैंकों के काम का स्तर और बढ़ सकता है जिसमें क़र्ज़ देने की क्षमता और निवेश भी शामिल होगा. वर्तमान में बैंकिंग सिस्टम में चल रहे संकट को दूर करने के लिए चार प्रमुख मुद्दों पर ध्यान देने की ज़रूरत है. अगर कोई शख़्स बैंक से बड़ा क़र्ज़ लेता है और उसे चुकाने में नाकाम रहे तो उस क़र्ज़ का पूरा बोझ बैंक के ऊपर ही ना आ जाए. जैसा कि विजय माल्या और नीरव मोदी के मामलों में हुआ. बड़े क़र्ज़ देते समय बैंक अधिक सख्ती बरतें और नियमों का अधिक ध्यान रखें. जब भी कोई बड़ा कर्ज़ नहीं चुकाता तो उसका भार अकेले बैंक पर पड़ जाता है जिसका असर बाद में अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. बैंक में लाभ को बढ़ाने और जोखिम की संभावनाओं को कम करने के लिए अधिक कुशलता और निपुणता लाने की ज़रूरत है. कुल मिलाकर देखें तो बैंकों के विलय से अलग-अलग बैकों के काम करने के तौर-तरीक़ों में समानता देखने को मिल सकेगी. वैसें बैंकों को भी अपने आधारभूत ढांचे में परिवर्तन की ज़रूरत है. यह भी माना जा सकता है कि इस विलय के दूरगामी परिणामों के तौर पर रोज़गार की उम्मीद लगा रहे युवाओं पर असर पड़े. हो सकता है कि इसके चलते आने वाले वक़्त में बेरोज़गारी और बढ़ जाए. इसके दो प्रमुख कारण हैं. पहला, बैंकों में नए पद तैयार नहीं होंगे. दूसरा, जो मौजूदा पद हैं उनमें अधिक लोग हो जाएंगे खैर, वैसे तो सरकार ने यह भरोसा दिलाया है कि इस फ़ैसले की वजह से किसी की नौकरी नहीं जाएगी. लेकिन कुछ वक़्त बाद हर विभाग में लोगों की संख्या अधिक ज़रूर महसूस होने लगेगी. वहीं दूसरी तरफ़, बैंकों के कुछ ब्रांच कम हो जाने से उन्हें चलाने पर होने वाला खर्च भी बचेगा. रोज़गार के मौक़ों में कमी का असर लंबे वक़्त में अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलेगा. इसलिए मौजूदा वक़्त की यह मांग है कि लोगों के लिए रोज़गार के नए रास्ते तैयार किए जाएं. अगर ऐसा नहीं होता है तो दोबारा आठ प्रतिशत की जीडीपी हासिल करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगा. यही वजह है कि बड़े सरकारी बैंकों का विलय कर देना ही मौजूदा आर्थिक संकट का हल नहीं है.
View More...

70 सालों में नकदी का अभूतपूर्व संकटः नीति आयोग -

Date : 23-Aug-2019
नई दिल्ली के3 अगस्त । नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर छाया नकदी का संकट एक अभूतपूर्व सी परिस्थिति है. राजीव कुमार ने कहा, पिछले 70 सालों में किसी ने ऐसी परिस्थिति नहीं देखी जहाँ सारा वित्तीय क्षेत्र उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है और निजी क्षेत्र में कोई भी दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहा है. कोई भी किसी को कर्ज़ देने को तैयार नहीं है, सब नकद दाबकर बैठे हैं. उन्होंने दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि इस जड़ता वाली स्थिति को तोड़ने के लिए अभूतपूर्व क़दम उठाए जाने की आवश्यकता है. राजीव कुमार ने कहा कि निजी क्षेत्र की आशंकाओं को दूर करने के लिए सरकार को हरसंभव प्रयास करना चाहिए. उन्होंने कहा, नोटबंदी, जीएसटी और आईबीसी (दीवालिया क़ानून) के बाद हर चीज़ बदल गई है. पहले 35 फ़ीसदी नक़दी उपलब्ध होती थी, वो अब काफ़ी कम हो गया है. इन सभी कारणों से स्थिति काफ़ी जटिल हो गई केंद्र सरकार ने प्राविडेंट फ़ंड की ब्याज़ दरों को 8.65 प्रतिशत घोषित करने पर अपनी सहमति दे दी है. वित्तीय वर्ष 2018-19 में इम्प्लाई प्रोविडेंट फ़ंड ऑर्गेनाइजेशन (ईपीएफ़ओ) ने 8.65 प्रतिशत ब्याज़ दर प्रस्तावित किया था. पीएफ़ ब्याज़ दरों को लेकर वित्त मंत्रालय और श्रम मंत्रालय के बीच मतभेद था, लेकिन बाद में इसे सुलझा लिया गया क्योंकि श्रम मंत्रालय की ओर से कहा गया कि ईपीएफ़ओ के पास इतना पैसा है कि वो 4.6 करोड़ सदस्यों को 8.65 प्रतिशत ब्याज़ दे सकता है
View More...

रघुराम राजन ने मंदी पर मोदी सरकार को किया सतर्क

Date : 20-Aug-2019
नई दिल्ली 20 अगस्त 2019 भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में जारी मंदी बहुत चिंताजनक है और सरकार को ऊर्जा क्षेत्र और ग़ैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्रों की समस्याओं को तुरंत हल करना होगा. उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र में निवेश को बढ़ाने के लिए नए सुधारों की शुरुआत करनी होगी. समाचार एजेंसी को दिए इंटरव्यू में रघुराम राजन ने कहा कि भारत में जिस तरह जीडीपी की गणना की गई है उस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है. उन्होंने मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के उस बयान का भी ज़िक्र किया जिसमें उन्होंने जीडीपी को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए जाने की बात कही थी और अपना अनुमान पेश किया था. साल 2018-19 में विकास दर 6.8 प्रतिशत हो गई थी जो 2014-15 के बाद सबसे कम है. कई निजी विशेषज्ञों और सेंट्रल बैंक का अनुमान है कि इस साल भी विकास दर 7 प्रतिशत के सरकारी अनुमान से कम रहने वाली है
View More...

भारत: ऑटो इंडस्ट्री मे मंदी

Date : 14-Aug-2019
भारत में ऑटो इंडस्ट्री का पहिया क्यों थम गया ऑटो इंडस्ट्री में लगातार 9वें महीने गिरावट दर्ज की गई है. ब्रिकी के लिहाज़ से जुलाई का महीना बीते 18 सालों में सबसे ख़राब रहा. इस दौरान बिक्री में 31% की गिरावट दर्ज की गई. सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबिल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) के मुताबिक़ जुलाई में बीते 9 महीनों के दौरान सबसे कम 2,00,790 वाहनों की बिक्री ही हुई. इसके मुताबिक़ स्पोर्ट्स यूटिलिटी वीकल की बिक्री में 15% तो सवारी कार में 36% की गिरावट दर्ज की गई है. सियाम के महानिदेशक विष्णु माथुर कहते हैं कि इस इंडस्ट्री को तुरंत एक राहत पैकेज की ज़रूरत है. उनका कहना है कि जीएसटी की दरों में अस्थायी कटौती से भी इंडस्ट्री को कुछ राहत मिल सकती है. माथुर कहते हैं, ऑटो इंडस्ट्री की स्थिति और बिगड़ने से रोकने के लिए उद्योग प्रतिनिधियों की सरकार के साथ हाल ही में बातचीत हुई है. हमने राहत पैकेज की मांग की. गाड़ियों पर जीएसटी की दर घटाने, स्क्रैपेज पॉलिसी लाने और वित्तीय क्षेत्र- ख़ासकर ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों- को मज़बूत करने की मांग की है. दूसरी ओर फेडरेशन ऑफ़ ऑटोमोबिल डीलर्स एसोसिएशन (फाडा) के मुताबिक़, इस मंदी की वजह से बीते तीन महीने में दो लाख लोगों का रोज़गार छिन गया है. बीते एक वर्ष के दौरान एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत में गाड़ियों की ख़रीद में भारी कमी आई है, इसकी वजह ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में क्रेडिट की कमी का होना बताया गया है. इसकी वजह से इस दौरान देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुज़ुकी और टाटा मोटर्स ने अपने उत्पादन में कटौती की. लिहाजा हज़ारों की संख्या में नौकरियां भी ख़त्म हुई हैं. इनकी वजह से ऑटो इंडस्ट्री अपने सबसे बड़ी गिरावट के दौर में पहुंच गई है. घरेलू बाज़ार में 51 फ़ीसदी हिस्सा रखने वाली मारुति सुज़ुकी ने जनवरी में 1.42 लाख कारें बेचीं. लेकिन छह महीने में ही 31% की गिरावट आ गई और जुलाई में उसकी सिर्फ़ 98,210 कारें बिकीं. घरेलू बाज़ार में दूसरी बड़ी कार निर्माता कंपनी हुंदई की बिक्री में भी ख़ासी गिरावट हुई है. हुंदई की क़रीब 45 हज़ार कारें जनवरी में बिकी थीं लेकिन जुलाई में केवल 39 हज़ार कारों की बिक्री के साथ इसमें 15% की गिरावट हो गई. शेयर बाज़ार में इन कंपनियों के शेयर में तेज़ गिरावट देखी गई है. जनवरी से अब तक मारुति के शेयर की क़ीमतों में 22% की गिरावट हुई है तो टाटा मोटर्स के शेयर इसी अवधि में 29% गिरे. इनकी तुलना में मुंबई शेयर सूचकांक सेंसेक्स इस अवधि के दौरान 2.4% बढ़ा है. मंदी की वजह से कई डीलरशिप बंद हो गए हैं, इसलिए अब इस उद्योग में जीएसटी की दरों में कटौती जैसे उपायों की मांग तेज़ हुई है. ऑटो इंडस्ट्री के लोगों ने मांग की है कि सरकार को ऑटोमोबिइल सेक्टर में जीएसटी की दर 28% से घटाकर 18% करनी चाहिए. फ़रवरी से अब तक रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में लगातार चार बार कटौती की है. लेकिन इंडस्ट्री पर नज़र रखने वाले जानकारों का मानना है कि तरलता (नक़दी) की कमी को पूरा करने के लिए अभी और उपाय करने होंगे. बीते हफ़्ते ऑटो सेक्टर के प्रतिनिधियों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाक़ात कर उन्हें वर्तमान हालात से अवगत कराया. सरकार ने ऑटो इंडस्ट्री की मंदी को दूर करने के लिए परामर्श कर रही है, लेकिन अब तक इसकी मांग को लेकर किसी भी उपाय की घोषणा नहीं की है. सियाम के महानिदेशक विष्णु माथुर कहते हैं कि इस महीने से शुरू होने वाले त्योहारी सीजन में भी ज़्यादा छूट नहीं मिल रही है. माथुर कहते हैं, अप्रैल में शुरू हुए नए वित्तीय वर्ष में सियाम ने पैसेंजर वीकल की वार्षिक बिक्री में 3% से 5% तक की वृद्धि का अनुमान लगाया था. लेकिन अब मंदी को देखते हुए उन पूर्वानुमानों को संशोधित करना पड़ सकता है. जुलाई के महीने में मारुति कारों की बिक्री में 34% की कमी आई जो सात वर्षों के दौरान किसी एक महीने में दर्ज की गई सबसे अधिक गिरावट है. बीते वर्ष इस कार निर्माता के कारों की बिक्री में महज 4.7% का ही इजाफ़ा हुआ. हाल ही में आई रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कंपनी ने अपनी अस्थायी कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी है. जून के अंत तक इनकी संख्या में 6% कम हो गई है. दुनियाभर की कई कंपनियां उड़ने वाली टैक्सियों के कन्सेप्ट पर काम कर रही हैं साथ ही मारुति ने उत्पादन में भी कटौती की है. इस साल के पहले छह महीनों के दौरान इसने उत्पादन में 10% से अधिक की कटौती की है. अपने पैसेंजर वीकल की घरेलू बिक्री में 34% गिरावट दर्ज करने वाले टाटा मोटर्स ने बीते हफ़्ते कहा कि बाज़ार की वर्तमान मुश्किल परिस्थितियों के कारण महाराष्ट्र के कुछ संयंत्रों को बंद कर दिया है. इस बीच, जुलाई के महीने में 15% गिरावट दर्ज करने वाली प्रतिद्वंद्वी कार निर्माता कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा ने कहा है कि वो इस तिमाही में 14 दिनों तक उत्पादन में कटौती करेगा. सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ जुलाई में सभी सेगमेंट की गाड़ियों की बिक्री में गिरावट हुई है. 26% की कमी के साथ इस दौरान महज 56,866 ट्रक और बस बिके जबकि क़रीब 15 लाख यूनिट बिक्री के साथ दोपहिया वाहनों में यह कमी 17% दर्ज की गई है. इस मंदी का प्रभाव गाड़ियों के कलपुर्जे बनाने वाली सहायक कंपनियों पर भी हुआ है. टाटा मोटर्स और अशोक लेलैंड के लिए सस्पेंशन (शॉकर) बनाने वाली जमना ऑटो इंडस्ट्री ने कहा कि कमज़ोर मांग के चलते अगस्त में वो अपने सभी नौ उत्पादन संयंत्रों को बंद कर सकते हैं. इस इंडस्ट्री पर दोहरी मार तब पड़ी जब जून में बजट के दौरान ऑटो पार्ट्स पर ड्यूटी बढ़ाई गई और पेट्रोल, डीज़ल पर अतिरिक्त टैक्स लगाया गया. सिआम के महानिदेशक विष्णु माथुर ने एक न्यूज़ पोर्टल से बातचीत में बताया कि ऑटो इंडस्ट्री ने 3.7 करोड़ से ज़्यादा लोगों को जॉब दे रखा है और अगर मंदी ख़त्म नहीं हुई तो कई नौकरियां जाएंगी.
View More...

भारत की अर्थव्यवस्था की दशा, पूजा मेहरावरिष्ठ

Date : 12-Aug-2019
नई दिल्ली 12 अगस्त । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त वर्ष 2024-25 तक भारत को 5 ख़रब अमरीकी डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है. इस वक़्त भारत की अर्थव्यवस्था क़रीब 2.7 ख़रब अमरीकी डॉलर की है. आर्थिक सर्वे का अनुमान है कि प्रधानमंत्री मोदी के तय किए हुए लक्ष्य तक पहुंचने के लिए देश के जीडीपी को हर साल 8 फ़ीसदी की दर से बढ़ना होगा. इस लक्ष्य के बरक्स, देश की अर्थव्यवस्था में तरक़्क़ी की रफ़्तार धीमी हो गई है. ऐसा पिछले तीन साल से हो रहा है. उद्योगों के बहुत से सेक्टर में विकास की दर कई साल में सबसे निचले स्तर तक पहुंच गई है. देश की अर्थव्यवस्था की सेहत कैसी है, इसका अंदाज़ा हम इन पांच संकेतों से लगा सकते हैं. देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में पिछले तीन वित्तीय वर्षों से लगातार गिरावट आ रही है. 2016-17 में जीडीपी विकास दर 8.2 फ़ीसद प्रति वर्ष थी, तो 2017-18 में ये घटकर 7.2 प्रतिशत रह गई. और, वर्ष 2018-19 में जीडीपी की विकास दर 6.8 फ़ीसद ही दर्ज़ की गई. ताज़ा आधिकारिक आंकड़ों पर यक़ीन करें तो, वर्ष 2019 की जनवरी से मार्च की तिमाही में जीडीपी विकास दर 5.8 फ़ीसद ही रह गई थी, जो पांच साल में सबसे कम है. केवल तीन साल में विकास की रफ़्तार में 1.5 प्रतिशत की कमी (8.2 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत) बहुत बड़ी कमी है. जीडीपी की विकास दर घटने से लोगों की आमदनी, खपत, बचत और निवेश, सब पर असर पड़ रहा है. जिन सेक्टरों पर इस मंदी का सबसे ज़्यादा असर पड़ा है, वहां पर नौकरियां घटाने के एलान हो रहे हैं. अब तक सरकार ने ऐसे कोई क़दम न तो उठाए हैं, न ही उनका ऐलान किया है, जिससे जीडीपी विकास दर में आ रही गिरावट को रोका जा सके. विकास दर घटने से लोगों की आमदनी पर बुरा असर पड़ा है. तो, अब लोग अपने ख़र्चों में कटौती कर रहे हैं. देश में बाज़ार की सबसे बड़ी रिसर्च कंपनी नील्सन की एक रिपोर्ट कहती है कि तेज़ी से खपत वाले सामान यानी फास्ट मूविंग कंज़ंप्शन गुड्स (FMCG) की बिक्री की विकास दर इस साल जनवरी से मार्च के बीच 9.9 प्रतिशत थी. लेकिन, इसी साल अप्रैल से जून की तिमाही में ये घटकर 6.2 फ़ीसद ही रह गई. ग्राहकों की ख़रीदारी के उत्साह में कमी का बड़ा असर ऑटो उद्योग पर पड़ा है. बिक्री घटी है. तो नौकरियों में बड़े पैमाने पर कटौती की जा रही है. सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के आंकड़ों पर ग़ौर करें, तो हर तरह के वाहन की बिक्री में गिरावट आई है. जनवरी से मार्च के बीच जहां ऑटो सेक्टर की विकास दर 12.35 प्रतिशत थी. इस दौरान 69 लाख, 42 हज़ार 742 गाड़ियां बेची गईं. वहीं अप्रैल से जून के बीच केवल 60 लाख, 85 हज़ार 406 गाड़ियों की बिक्री ही दर्ज़ की गई. बड़ी गाड़ियों यानी यात्री वाहनों की बिक्री में बहुत बुरा असर पड़ा है. इस सेक्टर के विकास में पिछले एक साल से लगातार गिरावट ही देखी जा रही है. भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुज़ुकी ने जुलाई महीने में पिछले साल के मुक़ाबले कारों की फ़रोख़्त में 36 प्रतिशत की गिरावट आने की बुरी ख़बर दी है. इसी दौरान हुंडई की गाड़ियों की बिक्री में 10 प्रतिशत की गिरावट आई है. बिक्री में गिरावट से निपटने के लिए गाड़ियों के ख़ुदरा विक्रेता अपने यहां नौकरियों में कटौती कर रहे हैं. देश भर में ऑटोमोबाइल डीलर्स ने पिछले केवल तीन महीनों में ही 2 लाख नौकरियां घटाई हैं. ये आंकड़े फेडरेशन ऑफ़ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन्स (FADA) के हैं. नौकरियों में ये कटौती, ऑटोमोबाइल सेक्टर में की गई उस कटौती से अलग हैं, जब अप्रैल 2019 से पहले के 18 महीनों के दौरान देश के 271 शहरों में गाड़ियों के 286 शो रूम बंद हुए थे. इनकी वजह से 32 हज़ार लोगों की नौकरियां चली गई थीं. देश भर में गाड़ियों के क़रीब 26 हज़ार शो रूम हैं, जिन्हें 15 हज़ार के आस-पास डीलर चलाते हैं. इन शो रूम में क़रीब 25 लाख लोगों को रोज़गार मिला हुआ है. डीलरशिप की इस व्यवस्था में अपरोक्ष रूप से क़रीब 25 लाख और लोगों को भी रोज़गार मिला हुआ है. खपत में कमी की वजह से टाटा मोटर्स जैसी कंपनियों को अपनी गाड़ियों के निर्माण में कटौती करनी पड़ी है. इसका नतीजा ये हुआ है कि कल-पुर्ज़ों और दूसरे तरीक़े से ऑटो सेक्टर से जुड़े हुए लोगों पर भी इसका बुरा असर पड़ा है. जैसे कि जमशेदपुर और आस-पास के इलाक़ों में 30 स्टील कंपनियां बंदी के कगार पर खड़ी हैं. जबकि एक दर्जन के क़रीब कंपनियां तो पहले ही बंद हो चुकी हैं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जमशेदपुर का टाटा मोटर्स का प्लांट दो महीने से 30 दिनों में केवल 15 दिन ही चलाया जा रहा था. बाक़ी के वक़्त ये कारखाना बंद रखा जा रहा था. अर्थव्यवस्था का विकास धीमा होने का रियल एस्टेट सेक्टर पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है. बिल्डरों का आकलन है कि इस वक़्त देश के 30 बड़े शहरों में 12.76 लाख मकान बिकने को पड़े हुए हैं. कोच्चि में मकानों की उपलब्धता 80 महीनों के उच्चतम स्तर पर है. वहीं, जयपुर में ये 59 महीनों, लखनऊ में 55 महीनों और चेन्नई में ये 75 महीनों के अधिकतम स्तर पर है. इसका ये मतलब है इन शहरों में जो मकान बिकने को तैयार हैं, उनके बिकने में पांच से सात बरस लग सकते हैं. आमदनी बढ़ नहीं रही है. बचत की रकम बिना बिके मकानों में फंसी हुई है. और अर्थव्यवस्था की दूसरी परेशानियों की वजह से घरेलू बचत पर भी बुरा असर पड़ रहा है. वित्त वर्ष 2011-12 में घरेलू बचत, जीडीपी का 34.6 प्रतिशत थी. लेकिन, 2018-19 में ये घटकर 30 फ़ीसद ही रह गई. घरेलू बचत की जो रक़म बैंकों के पास जमा होती है, उसे ही वो कारोबारियों को क़र्ज़ के तौर पर देते हैं. जब भी बचत में गिरावट आती है, बैंकों के क़र्ज़ देने में भी कमी आती है. जबकि कंपनियों के विकास और नए रोज़गार के लिए क़र्ज़ का अहम रोल होता है. बैंकों के क़र्ज़ देने की विकास दर भी घट गई है. सितंबर 2018 से ये अब तक के न्यूनमत स्तर पर है. इस साल अप्रैल महीने में क़र्ज़ देने की विकास दर 13 प्रतिशत थी, जो मई मे गिरकर 12.5 फ़ीसद ही रह गई. गैर कृषि क्षेत्र में क़र्ज़ बांटने की रफ़्तार अप्रैल में 11.9 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी. लेकिन, मई में ये घटकर 11.4 फ़ीसद ही रह गई, जो पिछले आठ महीनों में सबसे कम है. सर्विस सेक्टर और उद्योगों को बैंकों के क़र्ज़ देने में भारी कमी देखी जा रही है. मई महीने में सर्विस सेक्टर को लोन की विकास दर 14.8 प्रतिशत थी, जो पिछले 14 महीनों में सबसे कम है. अप्रैल महीने में सर्विस सेक्टर को लोन की विकास दर 16.8 फ़ीसद थी. आम तौर पर जब घरेलू बाज़ार में खपत कम हो जाती है, तो भारतीय उद्योगपति, अपना सामान निर्यात करने और विदेश में माल का बाज़ार तलाशते हैं. लेकिन, अभी स्थिति ये है कि विदेशी बाज़ार में भी भारतीय सामान के ख़रीदारों का विकल्प बहुत सीमित रह गया है. पिछले दो साल से जीडीपी विकास दर में निर्यात का योगदान घट रहा है. मई महीने में निर्यात की विकास दर 3.9 प्रतिशत थी. लेकिन, इस साल जून में निर्यात में (-)9.7 की गिरावट आई है. ये 41 महीनों में सबसे कम निर्यात दर है. निर्यात में बेहतरी की संभावना कम ही दिखती है. इसकी बड़ी वजह ये है कि अमरीका के साथ भारत के व्यापार युद्ध के संकट के बादल मंडरा रहे हैं. अगर अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल हों, तो इसका असर विदेशी निवेश पर भी पड़ता है. अप्रैल 2019 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 7.3 अरब डॉलर था. लेकिन, मई महीने में ये घट कर 5.1 अरब डॉलर ही रह गया. रिज़र्ब बैंक ने जो अंतरिम आंकड़े जारी किए हैं, उनके मुताबिक़, देश में आ रहा कुल विदेशी निवेश, जो शेयर बाज़ार और बॉन्ड मार्केट में निवेश किया जाता है, वो अप्रैल में 3 अरब डॉलर था. पर, मई महीने में ये घटकर 2.8 अरब डॉलर ही रह गया. तो, आख़िर मोदी सरकार की दूसरी पारी की दिक़्क़त क्या है? इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES तो, आख़िर मोदी 2.0 में हालत क्या है? इन सभी बातों का निष्कर्ष ये है कि देश की अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुज़र रही है. निर्माण क्षेत्र में कमी आ रही है. कृषि क्षेत्र का संकट बरक़रार है. किसानों की आमदनी बढ़ नहीं रही है. निर्यात भी जस के तस हैं. बैंकों और वित्तीय संस्थानों की हालत ख़राब है. और रोज़गार के क्षेत्र में बड़ा संकट पैदा हो रहा है. एफएमसीजी सेक्टर की बिक्री घट गई है. कार के निर्माता लगातार उत्पादन घटा रहे हैं. इन बातों से यही संकेत मिलता है कि लोगों ने ख़र्च करना कम कर दिया है. बाज़ार में मांग कम है, तो कारोबारियों ही नहीं, ग्राहकों का भरोसा भी गिर रहा है. अर्थव्यवस्था की जो भी मौजूदा परेशानियां हैं, वो प्रधानमंत्री मोदी और उनके पूर्ववर्ती डॉक्टर मनमोहन सिंह की सुधारों की अनदेखी करने का नतीजा हैं. 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तब, 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की वजह जीडीपी की विकास दर में आई कमी, धीरे-धीरे दोबारा पटरी पर लौट रही थी. लेकिन, जीडीपी की विकास दर की वो रफ़्तार क़ायम नहीं रह सकी और विकास दर फिर से कम हो रही है. इस वक़्त अर्थव्यवस्था की विकास दर में जो गिरावट आ रही है, वो किसी बड़े झटके का नतीजा नहीं है. 2008 और 2011 में कच्चे तेल के दाम में अचानक तेज़ी आने से विकास दर धीमी हुई थी. लेकिन, अभी ऐसे हालात नहीं दिख रहे हैं. ये सरकारों की नीतियों में लगातार नाकामी का नतीजा है. कृषि उत्पादों की क़ीमतों और आयात-निर्यात की नीतियां, टैक्स की नीतियां, श्रमिक क़ानून और ज़मीन के इस्तेमाल के क़ानूनों की कमियों का इस मंदी में बड़ा योगदान है. आज बैंकिंग क्षेत्र में बड़े सुधार की ज़रूरत है, ताकि छोटे और मंझोले कारोबारियों को आसानी से क़र्ज़ मिल सके. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल का शानदार आग़ाज़ हुआ था. लेकिन, जल्द ही वो दिशाहीन हो गई. अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों के जिस ब्लूप्रिंट की घोषणा हुई थी, उसे 2015 के आख़िर में ही त्याग दिया गया. श्रमिक और ज़मीन से जुड़े क़ानूनों में बदलाव की योजना अधूरी है. निर्माण बढ़ाने के लिए ज़रूरी क़दम नहीं उठाए गए. कृषि क्षेत्र के विकास की कमी से निपटने के लिए मेक इन इंडिया की शुरुआत की गई थी. लेकिन, उसका हाल भी बुरा ही है. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में अर्थव्यवस्था को लेकर जो शुरुआती जोश और ऊर्जा देखने को मिली थी, उनके बजाय हम ने नोटबंदी जैसे ग़लत क़दम उठाए जाते हुए देखे. टैक्स व्यवस्था में स्थायी सुधार लाने के लिए जीएसटी को हड़बड़ी में, बिना पूरी तैयारी के ही लागू कर दिया गया था. नेक इरादे से लाए गए इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड जैसे अच्छे क़ानून के सिवा, मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में बड़े आर्थिक सुधार के कोई क़दम नहीं उठाए. वित्त मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा प्रधानमंत्री के कार्यालय को बार-बार आगाह किए जाने के बावजूद, मनमोहन सरकार से विरासत में मिली देश की बदहाल बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था की कमियां दूर करने की नीतियां बनाने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. हमारे देश की अर्थव्यवस्था की बुनियादी संस्थागत कमियों को दूर करने के लिए अच्छे नीयत वाली आर्थिक नीतियों की ज़रूरत है. लेकिन, दिक़्क़त ये है कि क़ाबिल अर्थशास्त्री, मोदी सरकार से दूर जा रहे हैं. ऐसे में अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निपटने के लिए वैसे ज़रूरी क़दमों की उम्मीद नहीं दिखती. मोदी सरकार के दौरान, इला पटनायक, रघुराम राजन, उर्जित पटेल, अरविंद पनगढ़िया, अरविंद सुब्रमण्यम और विरल आचार्य जैसे क़ाबिल अर्थशास्त्रियों की विदाई हो गई. पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार है जब वित्त मंत्रालय में ऐसा कोई आईएएस अधिकारी नहीं है, जिसके पास अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री हो. और जो अर्थव्यवस्था की बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को नीतियां बनाने में मदद कर सके.
View More...
Previous123Next