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कांग्रेस के लिए नेहरू-गांधी बोझ भी है और बड़ी संपत्ति भी, विनोद शर्मा राजनीतिक विश्लेषक

Date : 11-Aug-2019
नई दिल्ली 11 अगस्त । शनिवार को देर रात तक चली कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद सोनिया गांधी को पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया गया. बैठक के बाद कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने मीटिया को बताया उन्हें तब तक के लिए पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुना गया है जब तक एक पूर्णकालिक अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो जाता. बैठक में अध्यक्ष पद से दिया गया राहुल गांधी का इस्तीफ़ा भी स्वीकार कर लिया गया. कार्यसमिति की बैठक से पहले ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि किसी अनुभवी और ग़ैर-गांधी परिवार के शख़्स को चुना जाएगा. लेकिन बैठक ख़त्म हुई और कोई नया नाम सामने नहीं आया. तो क्या कांग्रेस के पास अब वाकई कोई नाम नहीं है या फिर नेहरू-गांधी परिवार के बिना उनका काम नहीं चलता? कांग्रेस की हालत खस्ता है. कांग्रेस के लिए नेहरू-गांधी परिवार एक बहुत बड़ा बोझ भी है और बहुत बड़ी संपत्ति भी. आज के दिन किसी और का नाम किसी को लेने की हिम्मत भी नहीं हुई होगी. ये बता भी नहीं रहे हैं कि किसी और का नाम चला भी या नहीं चला. सोशल मीडिया पर महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेताओं में से एक मुकुल वासनिक का नाम आ रहा था. क्या उनके नाम पर बैठक में चर्चा नहीं हुई होगी? बैठक में किसी समिति में उनके नाम का प्रस्ताव ही नहीं दिया गया या फिर समिति में उनके नाम का प्रस्ताव आया तो शायद उसे समर्थन नहीं मिला. महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेताओं में से एक मुकुल वासनिक के राजनीतिक जीवन की शुरुआत एनएसयूआई से हुई थी. उन्होंने बुलढाना की अपनी पारंपरिक सीट से 1984, 1991 और 1998 में लोकसभा चुनाव जीता था. इस समय वह कांग्रेस महासचिव हैं और गांधी परिवार के काफ़ी क़रीबी समझे जाते हैं. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि सोनिया गांधी के तत्वाधान में क्या चुनाव होंगे और क्या कोई नया अध्यक्ष बनेगा. या फिर सोनिया गांधी ही अंतरिम अध्यक्ष बन रहेंगी और फिर वही पूर्णकालिक अध्यक्ष बनेंगी. सवाल ये भी उठता है कि अगर पार्टी एक कार्यकारी अध्यक्ष भी नहीं चुन पा रही है तो क्या पूर्णकालिक अध्यक्ष चुन सकेगी. आज के दिन की सच्चाई यही है कि कांग्रेस की हालत खस्ता है और उसके हौसले पस्त है. पार्टी को ख़ुद को आने वाले दो-तीन विधानसभा चुनावों के लिए तैयार करना है ना कि पार्टी के भीतर चुनाव करवाने में वो व्यस्त हो जाए. मुझे लगता है कि ये कोई ऐसा फ़ैसला नहीं है कि जिस पर ताली बजाई जाए लेकिन ये ऐसा फ़ैसला भी नहीं है जिस पर बड़ा विवाद हो. ये स्थायी अध्यक्ष का पद नहीं है इसलिए इसमें इतना विवाद भी नहीं है. स्थायी अध्यक्ष के पद के लिए पहले और चुनाव के वक्त व्यापक चर्चा होगी. वैसे भी जब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया तो उनके बाद सोनिया गांधी ही सभी फ़ैसले ले रही थीं. बस हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि अंतरिम अध्यक्ष का जो कार्यकाल हो वो बहुत लंबा न हो जाए, बल्कि कम हो. चार प्रांतों में चुनाव होने तक ही कार्यकाल हो तो बेहतर जिसके बाद पार्टी को अपनी व्यवस्था में परिवर्तन करना चाहिए और पार्टी में चुनाव करवाने चाहिए.
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रमेश बैस को राज्यपाल बनाए जाने का क्या असर होगा छत्तीसगढ़ की राजनीति में

Date : 21-Jul-2019
रायपुर 21 जुलाई । रमेश बैस 7 बार रायपुर से सांसद रह चुके हैं. इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री की जिम्मदारी भी इन्होने संभाली है. रमेश बैस 16वीं लोक सभा के सदस्य रह चुके हैं. बैस 1978 में रायपुर नगर निगम के लिए चुने गए थे. 1980 से 1984 तक मध्यप्रदेश विधान सभा के सदस्य भी थे. वे 1989 में रायपुर, मध्यप्रदेश से 9वीं लोक सभा के लिए चुने गए थे और 11वीं, 12वीं, 13वीं, 14वीं, 15वीं और 16वीं लोक सभा में फिर से निर्वाचित हुए थे. उन्होंने भारत सरकार में केंद्रीय मंत्री के रूप में भी कार्य किया ! बता दें कि रायपुर लोकसभा सीट पर पिछले छह चुनावों से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का ही कब्जा रहा है.  सांसद रमेश बैस यहां से 7 बार जीत चुके हैं. बैस को केवल 1991 में हजार से भी कम वोटो से तकनीकी कारणों से हार का सामना करना पड़ा था और 1996 से 2014 तक लगातार छह बार जीत दर्ज की है ! छत्तीसगढ़ की राजनीति में सांसद रमेश बैस ने 2014 में अपना पिछला लोकसभा चुनाव जितने के बाद कहा था कि, ‘हमारे सामने आवाज उठाने वाला कोई नहीं है. अब बोलने का मौका आ गया है, हमें एक होकर बोलना होगा! जुलाई 2014 में प्रदेश कुर्मी समाज के प्रदेश स्तरीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उस दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि,छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल नहीं, बल्कि ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) बहुल राज्य है. लेकिन लंबे समय से गुमराह किया जाता रहा है कि छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है ! उन्होंने कई बार इसी तरह के अपने राजनितिक बयानों से अपनी ही पार्टी की पूर्ववर्ती रमन सरकार के लिए छत्तीसगढ़ में असमंजस की स्थिति पैदा की ! पिछली सरकार में उनकी वरिष्ठता की कई   बार अनदेखी की रमेश बैस के राज्यपाल बनाए जाने का असर छतीसगढ़ के राजनीति में दिखेगा  छत्तीसगढ़ में ओबीसी वर्ग की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा है, कुर्मी समाज के रमेश बैस छत्तीसगढ़ की राजनीति में बहुत बड़ा ओबीसी  चेहरा है ! उन्हें राज्यपाल बनाए जाने का सार्थक सन्देश स्वाभाविक रूप से भाजपा के पक्ष में जाएगा ! चूंकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी कुर्मी समाज से ही प्रतिनिधित्व करते हैं, जाहिर है रमेश बैस को राज्यपाल बनाने के दौरान इस बात का भी विशेष ध्यान रखा गया होगा !
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 इक्छा मृत्यु की राह पर है कांग्रेस?

Date : 12-Jul-2019
कांग्रेस मौजूदा राजनीति के संभवत: अपने सबसे बड़े संकट से जूझ रही है. पार्टी की उम्मीद कहे जा रहे युवा अध्यक्ष राहुल गांधी ने पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं और कार्यसमिति के सामने इस्तीफ़ा सौंपने के पचास दिन के बाद भी नए नेतृत्व का चुनाव नहीं हो पाया है. उधर लगातार प्रदेश इकाइयों से कांग्रेस के लिए बुरी ख़बरें आ रही हैं. कर्नाटक में वह जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के साथ अपनी गठबंधन सरकार बचाने के लिए संघर्ष कर रही है और गोवा में उसके दो तिहाई विधायकों ने रातोंरात भाजपा का पटका पहन लिया है. मध्य प्रदेश में भी मुख्यमंत्री कमलनाथ की बड़ी ऊर्जा विधायकों को एकजुट रखने में ख़र्च हो रही है. कांग्रेस की ऐसी हालत का ज़िम्मेदार कौन है, क्या पार्टी ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कांग्रेस मुक्त भारत के सपने की ओर बढ़ चली है और इससे उबरने का क्या कोई रास्ता नज़र आता है? इन्हीं सवालों के साथ  कुलदीप मिश्र ने कांग्रेस की सियासत पर नज़र रखने वाले दो वरिष्ठ पत्रकारों विनोद शर्मा और स्वाति चतुर्वेदी से बात की. कांग्रेस राजनीति करना ही नहीं चाहती: स्वाति चतुर्वेदी का नज़रिया कांग्रेस मुक्त भारत का सपना नरेंद्र मोदी और अमित शाह नहीं, बल्कि ख़ुद कांग्रेस पार्टी साकार कर रही है. ऐसा लगता है कि उन्होंने ख़ुद इच्छामृत्यु का फ़ैसला कर लिया है. मैं एक पत्रकार हूं और चुनाव नतीजे आने के पहले ही मैंने लिखा था कि भाजपा यह चुनाव जीतती है तो कांग्रेस की तीनों प्रदेश सरकारें ख़तरे में आ जाएंगी. एक पत्रकार को अगर ये बात पता है तो कांग्रेस के नेता किस दुनिया में रह रहे हैं. कर्नाटक की वह तस्वीर याद करिए जब मुंबई में कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार सरकार बचाने की कोशिश में कितने अकेले नज़र आ रहे थे. जब यह बात ट्विटर पर आ गई तो हाल ही में मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा का बयान आया कि उन्होंने डीके शिवकुमार से फोन पर बात कर ली है. क्या आज कल कांग्रेस नेता शक्तिप्रदर्शन और समर्थन फोन पर करने लगे हैं? मध्य प्रदेश में ये हाल है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक-एक मंत्री को दस-दस विधायकों पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी दी है ताकि वे टूटे नहीं. ऐसे सरकार कैसे चलेगी? ये हाल तब है, जब हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में इसी साल चुनाव होने हैं. यहां सीधे भाजपा और कांग्रेस की टक्कर है. एक ज़माने में कांग्रेस की हाईकमान बड़ी शक्तिशाली समझी जाती है जो अब लगता है कि बिल्कुल ख़त्म ही हो गई है. राहुल गांधी को इस्तीफ़ा दिए पचास दिन हो गए. वो दो दिन पहले अमेठी गए. अच्छा होता कि वो मुंबई जाते और वहां कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार के बगल में खड़े होते, अपनी मुंबई इकाई को बुलाते, उनके पास तीन पूर्व मुख्यमंत्री हैं, उन्हें बुलाते और एक संदेश देते. राजनीति सड़कों पर होती है, सोशल मीडिया पर नहीं. पर आज कल ऐसा लगता है कि कांग्रेस राजनीति करना ही नहीं चाहती. सही बात है कि विपक्ष के बिना लोकतंत्र हो ही नहीं सकता. लेकिन विपक्ष ख़ुद को ख़त्म कर रहा है तो हम इसमें भाजपा को कैसे दोष दे सकते हैं. यहां तक कि इतना समय बीत जाने के बाद भी नेतृत्व परिवर्तन पर न कोई गंभीरता है, न कोई नेता है. इसके पीछे एक वजह ये भी हो सकती है कि कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसके केंद्र में वंशवाद है. वहां अब तक ये व्यवस्था थी कि शीर्ष पद गांधी परिवार के साथ रहेगा और बाक़ी सब उनके नीचे होंगे. और गांधी परिवार उन्हें चुनाव जिताएगा. अब गांधी परिवार चुनाव जिता नहीं पा रहा. अब जो भी नया अध्यक्ष बनेगा, उसे ताक़त के दूसरे केंद्र गांधी परिवार से भी डील करना होगा. कांग्रेस जिस तरह की पार्टी है, वे लोग सब गांधी परिवार की तरफ़ जाएंगे. दरबारी परंपरा इस देश में कांग्रेस के साथ आई है. मेरी ख़ुद कई नेताओं से बात हुई है और वे कहते हैं कि हमें इस पद से क्या मिलेगा? हम ये पद क्यों लें? एक तो हमें गांधी परिवार की कठपुतली की तरह काम करना होगा और सारी पार्टी हम पर ही हमले करेगी. धागे से बंधा पत्थर और कांग्रेस की केंद्रीय ताक़त: विनोद शर्मा का नज़रिया अभी जो हुआ है, वो बहुत ही विचलित करने वाला है. एक वैज्ञानिक सिद्धांत है कि केंद्रीय बल, जिसे सेंट्रिफ्यूगल फोर्स कहते हैं, जब वो ख़त्म हो जाता है तो यही होता है. जब आप किसी धागे पर पत्थर बांधकर उसे घुमा रहे हों और बीच में उसे छोड़ दें तो पत्थर धागे समेत छिटककर दूर जा गिरता है. यही हो रहा है. कांग्रेस का नेतृत्व जो उसका केंद्रीय बल था, वो आज नदारद है. इसका असर उसकी प्रांतीय इकाइयों पर दिख रहा है. ख़ासकर उन प्रांतों में जहां कांग्रेस कमज़ोर हैं और जहां नेताओं की नीयत भी ख़राब हैं, वहां टूट-फूट हो रही है. मैं गोवा को इस संदर्भ में नहीं गिनूंगा. गोवा का आयाराम गयाराम वाला इतिहास रहा है. वहां के विधायक एक पार्टी में स्थिर नहीं रहे और वे दल बदलने में माहिर हैं. लेकिन कर्नाटक में जो हो रहा है और उससे पहले तेलंगाना में जो हुआ, वो परेशान करने वाली स्थिति है. जहां तक कांग्रेस मुक्त भारत के नारे का ताल्लुक़ है, वो नारा जिसने भी दिया हो, मैं नहीं समझता कि वो आदमी लोकतंत्र में विश्वास रखता है. देश को एक मज़बूत विपक्ष की ज़रूरत होती है. मनोविज्ञान में एंटी नेस्ट सिन्ड्रोम होता है. जब चिड़िया के बच्चे घोंसला छोड़कर उड़ जाते हैं तो उनकी मां डिप्रेशन में आ जाती है. ये 134 बरस की पार्टी राहुल गांधी के घर छोड़ जाने से डिप्रेशन के दौर से गुज़र रही है. उसे समझ नहीं आ रहा है कि फ़ैसला कैसे ले. काफ़ी दोष राहुल का, पर सारा नहीं अगर आप ये चाहते हैं कि इसका सारा दोष मैं राहुल गांधी पर मढ़ दूं, तो उन्हें सारा दोष तो नहीं लेकिन बहुतेरा दोष ज़रूर दूंगा. अगर वो पद छोड़ना चाहते थे तो उससे पहले उन्हें अपने अंतरिम उत्तराधिकारी के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करानी चाहिए थी. उस अंतरिम नेता के तत्वाधान में कार्यसमिति या नए अध्यक्ष के चुनाव हो सकते थे. ऐसे चिट्ठी लिखकर चले जाना कोई अच्छी प्रथा नहीं है. अगर आप जा रहे हैं तो आप अपने तमाम नेताओं को बुलाइए, एक समागम कीजिए, अपनी बात रखिए और कहिए कि अध्यक्ष पद पर न रहते हुए भी आप पार्टी में सक्रिय रहेंगे. ये सब उन्हें करना चाहिए था जिससे कार्यकर्ता का हौसला बना रहता, उसे लगता कि यह नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है लेकिन पार्टी विघटित नहीं हो रही. जब मैं नेतृत्व परिवर्तन की बात करता हूं तो मैं व्यवस्था परिवर्तन की भी बात करता हूं. अगर आपको याद हो तो मशीरुल हसन साहब ने तीन-चार अंकों में कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्तावों का एक सारांश प्रकाशित किया. वो जलवा था उस समय कांग्रेस कार्यसमिति का कि उसके प्रस्ताव देश का राजनीतिक एजेंडा तय करते थे. आपको कांग्रेस कार्यसमिति को एक सामूहिक नेतृत्व के स्वरूप में स्वीकार करना चाहिए. कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव हों. वहां जो साठ-सत्तर लोग बैठते हैं, उनकी जगह कोई 12 या 21 लोग बैठे हों. जो संजीदा हों और विवेकशील हों और जिनका पार्टी में सम्मान हो. ये सामूहिक नेतृत्व राजनीतिक फ़ैसले लेने में नए अध्यक्ष की मदद करे. मैं समझता हूं कि इस नए सामूहिक नेतृत्व में गांधी परिवार की भी भूमिका हो सकती है. ये बात सच है कि गांधी परिवार कांग्रेस के लिए बोझ भी है और ताक़त भी है. बोझ इसलिए कि उसके साथ कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप नत्थी होता है. लेकिन हमें ये समझना चाहिए कि गांधी परिवार लोकतांत्रिक वंशवाद का उदाहरण है. वो चुनाव लड़कर आते हैं, चुनाव में हारते और जीतते हैं. लोकतांत्रिक वंशवाद के ऐसे उदाहरण पूरे दक्षिण एशिया और पूरी दुनिया में हैं. मैं नहीं कहता कि ये अच्छी बात है. इसके बिना अगर आप काम चला सकते हैं तो चलाइए. लेकिन मैं समझता हूं कि आने वाले वक़्त में गांधी परिवार की एक भूमिका होगी और वह भूमिका फ़ैसले लेने की सामूहिकता तक सीमित होना चाहिए. ऐसा न हो कि वो पार्टी के भीतर ताक़त का एक समांतर केंद्र बन जाएं. इसके लिए मानसिक बदलाव लाना होगा. रवैया बदलना होगा. संगठन में बदलाव करने होंगे और फ़ैसला लेने की प्रक्रिया को बदलना होगा. 
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 कांग्रेस मे इस्तीफ़ों की झड़ी के पीछे क्या कारण हैं?

Date : 30-Jun-2019
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस में इस समय इस्तीफ़ों की झड़ी लग चुकी है लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस्तीफ़ा देने वालों में अधिकतर अनजाने नाम ही हैं. कांग्रेस की विभिन्न राज्य इकाइयों को मिलाकर अब तक 100 से अधिक पदाधिकारी अपना इस्तीफ़ा सौंप चुके हैं. इनमें सबसे बड़ा नाम केवल राज्यसभा सांसद विवेक तनखा का है जो पार्टी के क़ानूनी और मानवाधिकार सेल के चेयरमैन भी हैं. विवेक तनखा ने ट्वीट कर सुझाव दिया कि सभी को पार्टी के पदों से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए ताकि राहुल गांधी को अपनी टीम चुनने के लिए पूरी छूट मिल सके. इससे पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी इस्तीफ़ा देने की बात कही थी. इनके अलावा इस्तीफ़ा देने वालों में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमिटी के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश लिलौठिया और तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमिटी की कार्यकारी अध्यक्ष पूनम प्रभाकर भी शामिल हैं. वहीं, शनिवार को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के 35 पदाधिकारियों ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. इन्होंने लोकसभा चुनाव में राज्य में पार्टी की हार के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार बताते हुए इस्तीफ़ा दिया लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन इसको स्वीकार नहीं किया गया था. इसके बाद कथित तौर पर गुरुवार को हरियाणा के कांग्रेस नेताओं के साथ हुई बैठक में राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने हार की ज़िम्मेदारी ली लेकिन राज्य इकाइयों में किसी ने हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा नहीं दिया जिसके बाद इस्तीफ़ों की झड़ी शुरू हो गई. हालांकि, कांग्रेस पर क़रीबी नज़र रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी ने ऐसी कोई बात नहीं की थी और मीडिया के द्वारा यह अफ़वाह फैली. इन इस्तीफ़ों को किस तरह से देखा जाना चाहिए? इस पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि यह साफ़-साफ़ सिर्फ़ कुछ नेताओं की नौटंकी नज़र आती है. वह कहती हैं, इतनी पुरानी कांग्रेस पार्टी में ऐसी हार के एक महीने बाद यह हंगामा हो रहा है और उसे कोई दिशा नहीं दिख रही है. राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेकर बड़ी बात कही थी लेकिन अभी भी उनका इस्तीफ़ा नहीं स्वीकार किया गया है. कांग्रेस की स्थिति साफ़-साफ़ नज़र नहीं आ रही है और जो हालिया इस्तीफ़े हो रहे हैं, उससे लग रहा है कि एक नौटंकी सी चल रही है. ऐसा कहा जा रहा है कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने का पूरा मन बना चुके हैं. तो अब सवाल यह उठता है कि क्या यह इस्तीफ़े उन्हें अपने फ़ैसले पर सोचने को मजबूर करने के लिए हैं? इस सवाल पर कांग्रेस पर बारीकी से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं कि राहुल गांधी पद नहीं लेंगे यह पूरा तय है. वह कहते हैं, कुछ दिनों पहले कांग्रेस संसदीय समिति की बैठक में राहुल गांधी ने साफ़ कर दिया था कि वह अब और अध्यक्ष बने नहीं रहेंगे. लेकिन वह राजनीति में सक्रिय रहेंगे. इस्तीफ़ा देने वाले कोई बड़ा नाम नहीं है और जनता उनके नाम तक नहीं जानती है और यह केवल नेता बनने की कोशिश है. 2014 में पार्टी की हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी पार्टी के पदों से इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन उसे नहीं माना गया. इससे पहले शरद पवार के पार्टी छोड़ने पर सोनिया गांधी ने इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन वह भी स्वीकार नहीं किया गया. तो क्या अभी भी राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहिए? विनोद शर्मा कहते हैं कि कांग्रेस को अपना अंतरिम अध्यक्ष चुनना चाहिए जो एक साल तक कामकाज चलाए इसके बाद वह अपना अध्यक्ष चुने. विनोद शर्मा कहते हैं, वक़्त की अगर ज़रूरत है कांग्रेस पार्टी को नया नेता चुनने के लिए तो वह एक अस्थाई अध्यक्ष बना दें ताकि पार्टी का कामकाज चलता रहे और पार्टी महासचिव का पद प्रियंका गांधी को दे दें और इससे उनकी मुसीबतें सुलझ जाएंगी. प्रियंका गांधी के संगठन में अहम पद पर बने रहने से कांग्रेस की मुश्किलें कैसे हल होंगी? इस पर विनोद शर्मा कहते हैं, कांग्रेस के सामने बड़ी दुविधा यह है कि उसके नेता यह सोचते हैं कि गांधी परिवार के बिना पार्टी एकजुट नहीं रहेगी और इस बात में काफ़ी हद तक सच्चाई भी है. इस सच्चाई के चलते उन पर वंशवाद का आरोप भी लगता है. नया अध्यक्ष अगर प्रियंका को महासचिव पद पर बनाए रखता है तो वह संगठन को मज़बूती दे सकती हैं. वहीं, नीरजा चौधरी का मानना है कि कांग्रेस को अगर फिर से जीवित होना है तो उसे अध्यक्ष बदलने के अलावा भी बहुत कुछ करना होगा. वह कहती हैं, गांधी-नेहरू परिवार के किसी सदस्य के अध्यक्ष पद पर न बने रहने से भी कांग्रेस अच्छा कर सकती है. लेकिन इसमें इन लोगों का समर्थन होना ज़रूरी है. नई ऊर्जा अगर पार्टी में लानी है तो उन लोगों को आगे लाना होगा जिनको जन समर्थन प्राप्त है. ज़मीनी नेताओं को आगे लाना होगा. विनोद शर्मा कांग्रेस पार्टी में पुरानी जान डालने के लिए काडर को महत्वपूर्ण बताते हुए. वह कहते हैं कि पार्टी में इस समय नए काडर की भर्ती की ज़रूरत है. वह कहते हैं, इस पार्टी में अगर नए रक्त का संचार करना है तो इसको बड़े स्तर पर सदस्यता अभियान शुरू करना होगा. इसके लिए सिर्फ़ केंद्र और राज्यों में सिर्फ़ नेताओं को बदलने से काम नहीं चलेगा. उसके साथ-साथ पार्टी को जनता से जुड़े हुए मुद्दों को लेकर काम करना होगा और सड़कों पर उतरना होगा.
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कांग्रेस-AAP गठबंधन पर अब भी मंथन जारी, कांग्रेस बोली- हमारा स्टैंड क्लियर, गेंद AAP के पाले में

Date : 16-Apr-2019
नई दिल्ली: कांग्रेस  के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल ने सोमवार को कहा उनकी पार्टी दिल्ली में आम आदमी पार्टी  के साथ 4-3 फार्मूले के तालमेल वाले अपने रुख पर कायम है और अब फैसला आम आदमी पार्टी को करना है. पटेल ने ट्वीट कर कहा, हम स्पष्ट तौर पर कहना चाहते हैं. हमारी दिल्ली इकाई के विरोध के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष ने दिल्ली में आप के साथ तालमेल का फार्मूला निकालने के लिए स्थानीय नेताओं को मनाया. परंतु आप ने हरियाणा में भी सीटों की मांग पर जोर दिया. हमारा रुख स्पष्ट है. अब गेंद उनके पाले में है. बता दें, इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी  ने कहा कि उनकी पार्टी दिल्ली में आप के साथ गठबंधन करने को तैयार है, लेकिन अरविंद केजरीवाल  फिर से यूटर्न ले रहे हैं. बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव  में गठबंधन को लेकर आप और कांग्रेस के बीच औपचारिक बातचीत आगामी बुधवार को फिर से शुरु होगी. गठबंधन के फार्मूले को लेकर हालांकि दोनों दलों में अभी भी मतभेद कायम है. सूत्रों के अनुसार कांग्रेस नेता अहमद पटेल और आप के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह की अगुवाई में दोनों दलों के नेताओं की बैठक तय की गयी है. प्रस्तावित बैठक में राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार भी मौजूद रहेंगे. गठबंधन के मुद्दे पर पवार की मध्यस्थता में कांग्रेस और आप नेताओं की यह दूसरी औपचारिक बैठक है. हाल ही में पवार की मौजूदगी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी और तेदेपा प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और आप संयोजक अरविंद केजरीवाल की बैठक हुई थी.  राहुल गांधी ने आम आदमी पार्टी को ऑफर की दिल्ली की 4 सीटें, केजरीवाल बोले- गठबंधन आपकी इच्छा नहीं सिर्फ दिखावाआप के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि बुधवार को होने वाली बैठक में पार्टी की ओर से हरियाणा और दिल्ली की सीटों पर गठबंधन की संभावनाओं पर विचार किया जायेगा. उन्होंने बताया कि इस फार्मूले के तहत कांग्रेस द्वारा हरियाणा की तीन सीटें आप और जननायक जनता पार्टी के लिये छोड़ने के लिये तैयार होने पर दिल्ली में कांग्रेस को तीन सीटें देने पर बात की जायेगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि हरियाणा के लिये कांग्रेस के तैयार नहीं होने पर आप दिल्ली की सात में से दो सीट कांग्रेस के लिये छोडने पर बात करेगी. इधर कांग्रेस आप के साथ सिर्फ दिल्ली में ही गठबंधन करने के रुख पर कायम है. दिल्ली में 5 पूर्व मुस्लिम विधायकों की चिट्ठी ने कांग्रेस के लिए खड़ी की बड़ी मुश्किलआप के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि बुधवार को होने वाली बैठक में पार्टी की ओर से हरियाणा और दिल्ली की सीटों पर गठबंधन की संभावनाओं पर विचार किया जायेगा. उन्होंने बताया कि इस फार्मूले के तहत कांग्रेस द्वारा हरियाणा की तीन सीटें आप और जननायक जनता पार्टी के लिये छोड़ने के लिये तैयार होने पर दिल्ली में कांग्रेस को तीन सीटें देने पर बात की जायेगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि हरियाणा के लिये कांग्रेस के तैयार नहीं होने पर आप दिल्ली की सात में से दो सीट कांग्रेस के लिये छोडने पर बात करेगी. इधर कांग्रेस आप के साथ सिर्फ दिल्ली में ही गठबंधन करने के रुख पर कायम है. कांग्रेस के दिल्ली के प्रभारी पीसी चाको ने पिछले शुक्रवार को कहा था कि आप के साथ गठबंधन को लेकर अगर बातचीत होती है इसके दायरे में सिर्फ दिल्ली की सात सीटें होंगी. केजरीवाल ने रविवार को कहा था कि भाजपा की सत्ता में वापसी, देश के लिये बहुत बड़ा खतरा साबित होगी इसलिये देशहित में उनकी पार्टी कुछ भी करने को तैयार है. दिल्ली की सात सीटों पर 12 मई को मतदान होगा.
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पुनर्जीवित हुआ राफेल मामला

Date : 14-Apr-2019
कुछ रोज पहले एक टीवी चैनल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू चला। इस दौरान एंकर ने राफेल मामले पर सवाल पूछ दिया। मोदी इससे नाराज नज़र आए। फिर तीखे अंदाज में जवाबी सवाल किया कि क्या आपको सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं है। जाहिर है, उनका इशारा इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले की तरफ था। उसे सरकार और सत्ताधारी दल ने क्लीन चिट माना था। तब आए फैसले को सरकार की बहुत बड़ी जीत समझा गया। लेकिन अब वह सब कुछ पलट गया है। सुप्रीम कोर्ट मामले में दायर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। उसने सरकार की यह दलील ठुकरा दी है कि ऑफिशियल सिक्रेट ऐक्ट के तहत आने वाले लीक हुए दस्तावेज सुनवाई का आधार नहीं हो सकते। इससे सरकार और सत्ताधारी दल के पांव तले से जमीन खिसक गई है। जाहिर है, राफेल मामले में गोपनीय दस्तावेजों को आधार बनाकर सुनवाई करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने राफेल मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश तीन अहम दस्तावेजों को आधार बनाकर सुनवाई करने की मंजूरी दे दी है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने कहा- हम केंद्र की ओर से समीक्षा याचिका की स्वीकार्यता पर उठाई प्रारंभिक आपत्ति को खारिज करते हैं। कोर्ट ने मामले में लीक हुए दस्तावेज पर केंद्र सरकार के गोपनीयता के दावे को ठुकाराते हुए कहा कि जो नए दस्तावेज पब्लिक डोमेन में मौजूद हैं, उसको आधार बनाते हुए याचिकाओं पर आगे की सुनवाई की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के लिए नई तारीख तय करेगा। इससे पहले मामले की सुनवाई के दौरान केन्द्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने फ्रांस के साथ हुए राफेल सौदे से संबंधित दस्तावेजों की गोपनीयता का दावा किया था। केंद्र ने दलील दी थी कि सूचना के अधिकार कानून की धारा 8 1ए के अनुसार भी इस जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है। पुनर्विचार याचिका दायर करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और वकील प्रशांत भूषण का कहना था कि नए दस्तावेज बेहद महत्वपूर्ण हैं, लिहाजा इन पर विचार किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार कर लिया है। इससे ये सारा मामला पुर्जीवित हो गया है। 
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मोदी के सवाल पर सोनिया ने कहा- 2004 न भूलें, वाजपेयी जी भी अजेय थे, लेकिन हम जीते

Date : 11-Apr-2019
रायबरेली. यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने रायबरेली से चौथीबार पर्चा दाखिल किया। इससे पहले उन्होंनेरोड शो किया, इस दौरान राहुल-प्रियंका साथ में थे। पर्चा दाखिल करने के बाद सोनिया से सवाल किया गया कि क्या आप नरेंद्र मोदी को अजेयसमझती हैं, इस पर उन्होंने जवाब दिया कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। उन्होंने कहा कि 2004 ना भूलें। तब वाजपेयी जी भी अजेय थे, लेकिन हम जीते। सोनिया इस सीट पर 2004 से प्रतिनिधित्व करतीआ रहीं हैं। इस बार उनका मुकाबला कभी कांग्रेस मेंरहे दिनेश प्रताप सिंह से है। दिनेश कोभाजपा ने उम्मीदवार बनाया है। सोनिया ने पर्चा दाखिल करने से पहले हवन किया। 1967 से ही गांधी परिवार पूजा-पाठ करके ही कलेक्ट्रेट में नामांकन के लिए पहुंचताहै। सोनिया भी उसी परंपरा का पालन करती आई हैं।सपा-बसपा गठबंधन ने नहीं उतारा उम्मीदवार रायबरेली सीट पर सपा-बसपा गठबंधन ने उम्मीदवार नहीं उतारा है। इस सीट पर 5वें चरण में 6 मई को मतदान होगा। सोनिया ने साल 2004, 2006 के उपचुनाव, 2009 और 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की। साल 1957 के बाद कांग्रेस ने इस सीट पर उपचुनाव सहित 19 बार जीत दर्ज की है। इस सीट से तीन बार हारा गांधी परिवार का उम्मीदवार इस सीट से कांग्रेस को 1977, 1996 और 1998 में हार का सामना करना पड़ा। आपातकाल के बाद 1977 में भारतीय लोक दल के राज नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हराया था।1996 एवं 1998 में भाजपा उम्मीदवार अशोक कुमार सिंह ने इस सीट पर जीत दर्ज की। यहां से फिरोज गांधी, इंदिरा गांधी, अरुण नेहरू, शीला कौल और सतीश शर्मा चुनाव लड़ चुके हैं।
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कमलनाथ के ओएसडी प्रवीण कक्कड़ के घर रेड में कितने पैसे मिले

Date : 10-Apr-2019
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने ओसएसडी ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी प्रवीण कक्कड़ को लेकर विवाद में हैं. आयकर विभाग ने कक्कड़ के इंदौर स्थित घर में सात अप्रैल को तड़के सवा तीन बजे रेड मारी थी. कक्कड़ ने कहा कि उनका परिवार सो रहा था तभी उनके घर के दो दरवाज़े तोड़ आईटी डिपार्टमेंट के अधिकारी घुस गए और घर की तलाशी ली. आयकर विभाग की इस छापेमारी के बाद प्रदेश में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी आक्रामक हो गई और मुख्यमंत्री कमलनाथ पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का आरोप लगाया. आख़िर प्रवीण कक्कड़ के घर से आयकर विभाग ने क्या ज़ब्त किया? आठ अप्रैल की रात नौ बजकर 23 मिनट पर इनकम टैक्स इंडिया ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर बताया, मध्य प्रदेश में हुई छापेमारी में संगठित अवैध धंधा सामने आया है. राजनीति, कारोबार और सरकारी सेवा से जुड़े अलग-अलग व्यक्तियों के पास से क़रीब सबसे दिलचस्प है कि आयकर विभाग से क़रीब दस घंटे पहले मध्य प्रदेश में बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने एक ट्वीट किया. उस ट्वीट में कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है, मप्र मे तबादला एक्सप्रेस पटरी से उतरने के कारण दुर्घटनाग्रस्त. जान का कोई नुक़सान नहीं लेकिन 281 करोड़ के माल के नुक़सान का अनुमान. 281 करोड़ रुपए बरामद किए गए हैं जिनका कोई हिसाब नहीं है.विजयवर्गीय के इस ट्वीट को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के आधिकारिक बयान से पहले कैलाश विजयवर्गीय को 281 करोड़ का आँकड़ा कहां से मिला? कांग्रेस का कहना है कि विजयवर्गीय के ट्वीट से साफ़ है कि यह रेड केंद्र सरकार के इशारे पर राजनीति से प्रेरित है. प्रवीण कक्कड़ के घर से आयकर विभाग के अधिकारी क्या लेकर गए? कक्कड़ ने कहा, मेरे घर से वो कुछ भी नहीं लेकर गए. न कोई नक़दी ले गए और न ही जूलरी. उन्हें कोई नक़दी नहीं मिली थी. जो जूलरी मिली उसके भी हिसाब थे. हमारे पास कुछ भी बेहिसाब नहीं था. हमने सबके दस्तावेज़ दिखाए हैं.प्रवीण कक्कड़ ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक याचिका दाख़िल की है कि उनके घर में आयकर विभाग ने उन्हें अपमानित करने के लिए रेड मारी है और यह राजनीति से प्रेरित है. हाईकोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया है और कक्कड़ की तरफ़ से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल कोर्ट में दलील देंगे. प्रवीण कक्कड़ के बेटे का मध्य प्रदेश में बड़ा कारोबार है. वो सिक्यॉरिटी गार्ड एजेंसी, तीर्थाटन और कंप्यूटर से जुड़े कारोबार करते हैं. इसके साथ ही कक्कड़ परिवार की बड़ी कमाई प्रॉपर्टी के रेंट से भी है. कक्कड़ का कहना है कि इंदौर संभाग में आयकर विभाग ने उन्हें सबसे ज़्यादा कर चुकाने के लिए सम्मानित भी किया है. कांग्रेस के मध्य प्रदेश प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी कहते हैं कि प्रवीण कक्कड़ के पास अपनी संपत्तियों का पूरा हिसाब है. वो कहते हैं, प्रवीण कक्कड़ ने सारे दस्तावेज़ दिखा दिए हैं. कुछ भी अवैध नहीं मिला है. बीजेपी नेता ने आयकर विभाग से पहले ही रेड में मिली रक़म का आँकड़ा कैसे बताया? साफ़ है कि यह छापा राजनीति से प्रेरित है. कक्कड़ को आयकर विभाग ने ही सम्मानित किया है. आयकर विभाग को अब चुनाव के वक़्त अचानक रेड की ज़रूरत क्यों पड़ी?आख़िर कैलाश विजयवर्गीय ने आयकर विभाग से पहले ट्वीट कैसे किया? इस सवाल के जवाब में मध्य प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, इसका कोई मतलब नहीं है कि कैलाश जी ने पहले ट्वीट कैसे किया. कमलनाथ सरकार जवाब दे कि ट्रांसपोर्ट विभाग में लूट क्यों मची है? बरामद हुए पैसे कहां से आए? पूरे मामले में एक और व्यक्ति का नाम आया है और उनका नाम है अश्विन शर्मा. शर्मा के भोपाल स्थित घर पर भी आईटी डिपार्टमेंट ने रेड मारी है. अश्विन शर्मा को बीजेपी का क़रीबी बताया जा रहा है. भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार डॉ राकेश पाठक कहते हैं कि अश्विन शर्मा के बाद बीजेपी बैकफुट पर आ गई है. पाठक कहते हैं, अश्विन शर्मा को शिवराज सिंह चौहान के सरकार में कई कॉन्ट्रैक्ट मिले. उनके एनजीओ को शिवराज सरकार ने ख़ूब काम दिए हैं और शर्मा इन्हीं के राज में फले-फूले हैं. चुनाव के वक़्त में यह रेड राजनीति से प्रेरित है. हालांकि बीजेपी को इसका कोई फ़ायदा नहीं मिलेगा. जहां तक प्रवीण कक्कड़ की बात है तो पिछले तीन महीने में कक्कड़ अमीर नहीं बने हैं. पिछले 15 सालों से बीजेपी की सरकार थी और कक्कड़ के बेटे का करोबार बीजेपी सरकार में भी चल रहा था. इस बात को प्रवीण कक्कड़ भी कहते हैं कि उनके बेटे का कारोबार कोई कमलनाथ के कार्यकाल में नहीं स्थापित हुआ है. वो कहते हैं, मेरे परिवार का बिज़नेस शिवराज की सरकार में भी था. हालांकि बीजेपी अश्विन शर्मा से संबंधों को ख़ारिज कर रही है. बीजेपी प्रवक्त दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, यह बिल्कुल बकवास है कि अश्विन शर्मा का बीजेपी से संबंध है. अगर हमारी सरकार में उन्हें ठेके मिले हैं तो देने वालों से बात कीजिए. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार इन छापेमारियों को लेकर चुनाव आयोग के अधिकारियों ने राजस्व सचिव एबी पांडे और सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्सेस के चेयरमैन पीसी मोडी से मुलाक़ात की है. विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि सत्ताधारी बीजेपी एजेंसियों का इस्तेमाल चुनावी फ़ायदे के लिए कर रही है. अब चुनाव आयोग ने कहा है कि एजेंसियां रेड करने से पहले उन्हें सूचित करें.प्रवीण कक्कड़ कौन हैं? कक्कड़ मध्य प्रदेश पुलिस के पूर्व अधिकारी हैं. वो आरटीओ विभाग में भी काम कर चुके हैं. मध्य प्रदेश की राजनीति पर क़रीब से नज़र रखने वालों का कहना है कि प्रवीण कक्कड़ ने आरटीओ विभाग में रहकर ख़ूब कमाई की थी. कक्कड़ कमलनाथ के ओएसडी बनने से पहले यूपीए में मंत्री रहे कांतिलाल भूरिया के ओएसडी थे. कहा जाता है कि कक्कड़ जब कांतिलाल भूरिया के ओएसडी थे तब कई भूमि सौदे में शामिल थे. जब पिछले साल के आख़िर में कांग्रेस की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कक्कड़ को अपना ओएसडी नियुक्त किया. नोटबंदी के दौरान कक्कड़ ने बैंक में 80 लाख रुपए जमा किए थे. कहा जा रहा है कि तब से ही कक्कड़ निशाने पर थे क्योंकि आयकर विभाग ने उनसे इस नक़दी का हिसाब मांगा था और जो जवाब मिला उससे वो संतुष्ट नहीं था. फ़्रीप्रेस जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भोपाल में प्रतीक जोशी और अश्विन शर्मा के घर से 16 करोड़ रुपए मिले हैं. अश्विन से पत्रकारों ने पूछा कि उनका मुख्यमंत्री कमलनाथ से क्या संबंध है तो उन्होंने कहा था, मैं बीजेपी का आदमी हूं. प्रवीण कक्कड़ और अश्विन शर्मा में क्या संबंध हैं? इस सवाल के जवाब में कक्कड़ ने कहा कि वो अश्विन शर्मा को जानते हैं लेकिन कोई संबंध नहीं है. उन्होंने कहा कि दोनों की उम्र में भी काफ़ी फ़र्क़ है. कक्कड़ ने कहा कि अश्विन शर्मा 33 या 34 साल के हैं जबकि उनकी उम्र 50 के आसपास है. एक सवाल ये भी उठ रहा है कि आईटी डिपार्टमेंट दिल्ली से सीआरपीएफ़ के जवानों को लेकर क्यों आया? भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार विजय दत्त श्रीधर कहते हैं, आईटी डिपार्टमेंट को राज्य पुलिस से मदद लेनी चाहिए थी लेकिन वो दिल्ली से सीआरपीएफ़ के जवानों को लेकर आया. ये तो संघीय ढांचा का सम्मान नहीं है. श्रीधर दत्त का मानना है कि चुनाव के वक़्त इस छापेमारी पर शक होना लाज़िमी है.
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सिर्फ आतंक, पाक, घुसपैठियों के नाम पर वोट का कटोरा

Date : 03-Apr-2019
हरिशंकर व्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सारे भाषण अब  आतंक, पाक के नाम पर वोट मांगने और विरोधियों को गाली दे कर अपने को चौकीदार बताने के हो गए है। अब नरेंद्र मोदी यह नहीं बताते है कि उन्होंने नीम कोटेड यूरिया का नियम बनाया तो उससे किसानों को कितना फायदा हुआ। बाकी मुद्रा योजना, जन धन खाते, शौचालय, आवास, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया आदि की बातें तो छोड़िए किसानों के खाते में दो-दो हजार रुपए भेजने की योजना का भी जिक्र नहीं हो रहा है। प्रचार की एकमात्र थीम राष्ट्रीय सुरक्षा की है। इससे भी प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह दोनों के नर्वस होने का अंदाजा लग रहा है कि वे हर सभा में आतंकवाद, पाकिस्तान और घुसपैठियों के नाम पर वोट मांग रहे हैं।  याद करें कैसे गुजरात में विधानसभा चुनाव के प्रचार में मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और दूसरे कांग्रेस नेताओं के पाकिस्तानी प्रतिनिधियों से मिलने का मुद्दा उठाया था और कहा था कि उनके खिलाफ कांग्रेस पाकिस्तान के साथ मिल कर साजिश कर रही है। दो दशक तक गुजरात का ‘विकास’ करने के बाद मोदी को इस नाम पर वोट मांगना पड़ा था। उसी तरह पांच साल तक जम कर ‘विकास’ करने के बाद मोदी कह रहे हैं कि उनके हारने की दुआ पाकिस्तान में मांगी जा रही है। वे गुजरात के प्रचार की तरह ही लोकसभा के प्रचार में विपक्ष को पाकिस्तानपरस्त साबित करने में जुटे हैं।  चुनाव आयोग की ओर से सेना के अभियानों के राजनीतिक इस्तेमाल पर पाबंदी का सख्त आदेश जारी होने के बावजूद प्रधानमंत्री को इसकी परवाह नहीं है। वे हर सभा में वायु सेना के पराक्रम का जिक्र कर रहे हैं और विपक्ष पर निशाना साध रहे हैं। उन्होंने 28 और 29 मार्च की अपनी सभी छह रैलियों में इसका जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष सेना पर सवाल उठा रहा है इसलिए उसको सजा मिलनी चाहिए। अभी तक इस बात पर बहस चल रही है कि बालाकोट अभियान में आखिर क्या हुआ था पर प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि पाकिस्तान लाशें गिन रहा था और विपक्ष सवाल उठा रहा है।  पांच साल तक किए अपने कामों खास कर नोटबंदी व जीएसटी जैसे कथित गेमचेंजर फैसलों पर वोट मांगने की बजाय मोदी और शाह दोनों देश की सुरक्षा के नाम पर वोट मांग रहे हैं। अमित शाह अपनी हर सभा में कह रहे हैं कि मोदी के हाथों में ही देश सुरक्षित है। खुद मोदी ने ओड़िशा के जयपुर में शुक्रवार को सभी में लोगों से पूछा कि उनको कैसा प्रधानमंत्री चाहिए, जो दुश्मन की सीमा में घुस कर मारे वैसा या जो चुपचाप तमाशा देखे वैसा? उनके प्रचार का सारा नैरेटिव मजबूत बनाम मजबूर प्रधानमंत्री का है।  राष्ट्रीय सुरक्षा की इस सारी बहस में बहुत सावधानी से यह प्रयास किया जा रहा है कि सारा फोकस पाकिस्तान पर रहे। इसमें चीन का नाम कहीं से नहीं आने पाए। पाकिस्तान के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास भी हो रहा है। तभी योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की सहारनपुर सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी इमरान मसूद को पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर का दामाद बता पर लोगों से वोट मांगे। तभी अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में अपनी सभाओं में कहा कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनी तो वह असम की तर्ज पर बंगाल के लिए भी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनाएगी और एक एक घुसपैठिए को खोज कर भारत से बाहर निकालेगी। अब कुल मिला कर पाकिस्तान के आतंकवादियों के नाम पर, कश्मीर के अलगाववादियों के नाम पर, असम और बंगाल के घुसपैठियों के नाम पर और विपक्षी पार्टियों के मुस्लिम उम्मीदवारों के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं। 2014 में चुनाव जीतने के बाद लाल किले से अपने भाषण में मोदी ने कहा था कि वे पांच साल बाद देश की जनता के सामने अपने कामकाज का हिसाब रखेंगे। पर अफसोस की बात है कि पांच साल के बाद कामकाज का हिसाब रखने की बजाय मोदी देश की सुरक्षा के नाम पर वोट मांग रहे हैं। हालांकि पांच साल में पहले से ज्यादा जवान मारे गए हैं, ज्यादा आतंकवादी हमले हुए हैं, राष्ट्री सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पैदा हुई हैं पर झूठे-सच्चे आंकड़ों के सहारे बताया जा रहा है कि देश मोदी के हाथ में ही सुरक्षित रह सकता है। इससे भाजपा के शीर्ष नेताओं की नर्वसनेस दिखती है और उनका आत्मविश्वास हिला हुआ दिख रहा है। 
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राहुल गाँधी बदले-बदले से नज़र आते हैं ! रेहान फ़ज़ल

Date : 01-Apr-2019
जब इंदिरा गाँधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं तो वो सिर्फ़ 42 साल की थीं. संजय गांधी ने जब अपना पहला चुनाव लड़ा था तो वो मात्र 30 साल के थे. राजीव गाँधी जब राजनीति में आए थे तो उन्होंने अपने जीवन के सिर्फ़ 36 वसंत देखे थे. राहुल जब पहली बार 2004 में राजनीति में आए तो वो भारतीय राजनीति के मानकों के हिसाब से बच्चे ही थे, हालाँकि उस समय उनकी उम्र 34 साल की हो चुकी थी. दिलचस्प बात ये है कि राजनीति में डेढ़ दशक से भी अधिक समय बिता देने और चालीस की उम्र पार कर जाने के बावजूद उन्हें बच्चा ही समझा जाता रहा. लेकिन, जब 2008 में एक इंटरव्यू में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने राहुल को बच्चा कह कर ख़ारिज करने की कोशिश की तो उन्होंने उसका अच्छा प्रतिवाद भी किया और कहा- अगर मैं उनकी नज़र में बच्चा हूँ तो आप इसे पसंद कीजिए या नापसंद , भारत की 70 फ़ीसदी आबादी भी बच्चा है. भारतीय राजनीति में अभी भी युवा होने को नादानी से जोड़ कर देखा जाता है. लेकिन, भारतीय राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले पंडित मानेंगे कि राहुल गांधी उस लेबल से अब बाहर निकल आए हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव में शीर्ष पद के दावेदार हैं. जब राउल विंसी कहलाते थे राहुल गांधी अगर लोकसभा चुनाव मोदी बनाम राहुल न हुए तो... इंदिरा गांधी के बहुत चहेते थे राहुल राहुल गाँधी का राजनीतिक बपतिस्मा अपनी दादी इंदिरा गाँधी को देखते-देखते हुआ. 19 जून, 1970 को राहुल के जन्म के कुछ दिनों बाद इंदिरा गाँधी ने अमरीका में रह रही अपनी दोस्त डोरोथी नॉर्मन को लिखा, राहुल की झुर्रियाँ ख़त्म हो गईं हैं लेकिन उसकी डबल चिन अब भी बरकरार है. इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वालीं कैथरीन फ़्रैंक लिखती हैं, बचपन से ही प्रियंका और राहुल अक्सर सुबह उनके निवास के लॉन में होने वाले दर्शन दरबार में उनके साथ हुआ करते थे. इस दरबार में वो आम लोगों से मिलती थीं. रात में भी वो इन दोनों को अक्सर अपने ही शयन-कक्ष में सुलाती थीं.दून, स्टीवेंस, हारवर्ड और केंब्रिज में पढ़ाई राहुल गांधी ने पहले दून स्कूल में पढ़ाई की और फिर इसके बाद दिल्ली के मशहूर सेंट स्टीफेंस कॉलेज में. इसके बाद वो अमरीका चले गए जहाँ उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के छात्र के रूप में दाख़िला लिया. सुरक्षा कारणों से उन्हें हार्वर्ड से हट कर विंटर पार्क, फ़्लोरिडा के एक कॉलेज में दाख़िला लेना पड़ा. वहाँ से उन्होंने 1994 में अंतरराष्ट्रीय संबंधों में डिग्री ली. इसके बाद वो केंब्रिज विश्वविद्यालय के मशहूर ट्रिनिटी कॉलेज चले गए. वहाँ से उन्होंने 1995 में डेवलपमेंट स्टडीज़ में एमफ़िल किया. इसके बाद वो लंदन में दुनिया में ब्रैंड स्ट्रेटेजी की बड़ी कंपनी मॉनीटर ग्रुप में नौकरी करने लगे. उन्होंने इस कंपनी में अपना नाम बदल कर तीन साल तक नौकरी की. जब तक वो वहाँ रहे उनके साथियों को इसकी भनक भी नहीं लग पाई कि वो इंदिरा गाँधी के पोते के साथ काम कर रहे हैं. वर्ष 2002 में राहुल वापस भारत लौटे. उन्होंने कुछ लोगों के साथ मिल कर मुंबई में एक कंपनी शुरू की, बैकॉप्स सर्विसेज़ लिमिटेड. वर्ष 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में दिए गए हलफ़नामे में उन्होंने साफ़ लिखा कि इस कंपनी में उनके 83 फ़ीसदी शेयर हैं. 2008 की गर्मियों में भारत के उस समय के सबसे बड़े बॉक्सिंग कोच और द्रोणाचार्य विजेता ओमप्रकाश भारद्वाज के पास भारतीय खेल प्राधिकरण की तरफ़ से एक फ़ोन आया. उनको बताया गया कि 10, जनपथ से एक साहब आपसे संपर्क करेंगे. कुछ देर बाद पी माधवन ने भारद्वाज को फ़ोन कर कहा कि राहुल गाँधी आपसे बॉक्सिंग सीखना चाहते हैं. भारद्वाज इसके लिए तुरंत राज़ी हो गए. राहुल गांधी की जीवनी लिखने वाले जतिन गांधी बताते हैं, जब फ़ीस की बात आई तो भारद्वाज ने सिर्फ़ ये मांग की कि उन्हें उनके घर से पिक करा लिया जाए और ट्रेनिंग के बाद उन्हें वापस उनके घर छोड़ दिया जाए. भारद्वाज ने 12 तुग़लक लेन के लॉन पर राहुल गांधी को मुक्केबाज़ी की ट्रेनिंग दी. ये सिलसिला कई हफ़्तों तक चला, सप्ताह में तीन दिन. इस दौरान कई बार सोनिया, प्रियंका और उनके बच्चे माएरा और रेहान भी राहुल को ट्रेनिंग करते देखने आते थे. भारद्वाज याद करते हैं कि वो जब भी राहुल को सर या राहुल जी कह कर संबोधित करते थे, तो वो उन्हें हमेशा टोक कर कहते थे कि वो उन्हें सिर्फ़ राहुल कहें. वो उनके छात्र हैं. भारद्वाज बताते हैं, एक बार मुझे प्यास लगी और मैंने पानी पीने की इच्छा प्रकट की. हालांकि, वहाँ कई नौकर मौजूद थे, लेकिन राहुल खुद दौड़ कर मेरे लिए पानी लाए. ट्रेनिंग ख़त्म हो जाने के बाद वो हमेशा मुझे गेट तक छोड़ने जाते थे.बॉक्सिंग ही नहीं राहुल ने तैराकी, स्क्वॉश, पैराग्लाइडिंग और निशानेबाज़ी में भी महारत हासिल की. अब भी वो चाहे जितना व्यस्त हों, कसरत के लिए थोड़ा समय निकाल ही लेते हैं. अप्रैल, 2011 में मुंबई में खेले जा रहे विश्व कप मैच के दौरान राहुल अपने कुछ साथियों के साथ चौपाटी के न्यू यॉर्कर रेस्तराँ पहुंचे जहाँ उन्होंने पित्ज़ा, पास्ता और मेक्सिकन टोस्टाडा का ऑर्डर किया. रेस्तराँ के मैनेजर ने राहुल से खाने का बिल लेने से इनकार कर दिया लेकिन उन्होंने ज़ोर देकर 2223 रुपए का बिल चुकाया. अब भी राहुल दिल्ली की मशहूर ख़ान मार्केट में कभी-कभी कॉफ़ी पीने जाते हैं. आंध्र भवन की कैंटीन में भी उन्होंने कई बार दक्षिण भारतीय थाली का आनंद उठाया है.
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