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कांग्रेस मे बदलाव: थोड़े समय के लिए कांग्रेस के अंदर आंतरिक संघर्ष जारी रहेगा

Date : 11-Oct-2019
तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद ने हे हाउस से 2015 में प्रकाशित अपनी पुस्तक द अदर साइड ऑफ द माउंटेन में नरमी के साथ पार्टी के उन सहयोगियों को निशाने पर लिया था जिन्होंने पाला बदल लिया था. खुर्शीद ने अपनी पुस्तक में सर थॉमस मूर के रिचर्ड रोपर पर की गई एक दिलचस्प प्रतिक्रिया का जिक्र किया था. रॉबर्ट बोल्ट के नाटक, मैन फॉर आल सीजंस के मुताबिक थॉमस मूर पर चलाए जा रहे राजद्रोह के मुक़दमे में रिचर्ड रोपर को वेल्स का अटॉर्नी जेनरल नियुक्त किया गया था. मूर कहते हैं, वेल्स के लिए? क्यों रिचर्ड दुनिया के लिए आत्मा देने वाले शख़्स को कोई मुनाफ़ा नहीं हो रहा है...लेकिन वेल्स के लिए? चार सालों के बाद, खुर्शीद खुद असंतुष्ट नेता की तरह बर्ताव कर रहे हैं, बयान दे रहे हैं. उनका यह रूप तब सामने आया है जब कांग्रेस महराष्ट्र और हरियाणा के चुनावी मैदान में है. ऐसे में, राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद अचानक छोड़ने को लेकर किया जा रहा विलाप, ग़लत समय में सामने आया है और यह शरारत भरा लग रहा है. खुर्शीद का व्यवहार, गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मणिशंकर अय्यर के नासमझी भरे बयान से कहीं ज़्यादा कुटिलता भरा जान पड़ रहा है. अगर खुर्शीद और दूसरे असंतुष्ट नेता पार्टी में किसी बदलाव को लेकर वाक़ई गंभीर हैं तो उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्यों में से 15 प्रतिशत लोगों को एकजुट करना चाहिए ताकि सोनिया गांधी को नेतृत्व के मुद्दे पर पार्टी का सत्र बुलाने के लिए बाध्य किया जाता. 1993-95 के दौर में अर्जुन सिंह ने पीवी नरसिम्हाराव के समय में यही करने की कोशिश की थी. मौजूदा चुनावी परिदृश्य से राहुल गांधी ग़ायब हैं और कांग्रेस इसका कोई स्पष्टीकरण पेश नहीं कर पाई है. वायनाड से संसद में प्रतिनिधित्व करने के सिवा राहुल गांधी के पास आधिकारिक तौर पर फ़िलहाल पार्टी में कोई पद नहीं है. हो सकता है कि चुनाव से दूर रहने के लिए यह राहुल गांधी की सोची समझी रणनीति हो. राहुल थोड़े अपरंपरागत राजनीतिज्ञ हैं और कुछ मौकों पर बेहद स्पष्टता से बयान देते आए हैं. हो सकता है उनका अपना आंकलन ये रहा हो, कि उनकी मौजूदगी से चुनाव में कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है या फिर आशंका के मुताबिक ही कांग्रेस के कमज़ोर प्रदर्शन के बाद, उनकी ग़ैरमौजूदगी को बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके. राहुल की शंकाएं निराधार नहीं हैं. 2019 के आम चुनाव में हार के बाद, कई कांग्रेसी नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि राहुल के आक्रामक बयान चौकीदार चोर है और रफ़ाल का मुद्दा उठाने से पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा. सैद्धांतिक तौर पर कहा जाए, तो यह समझना ज़रूरी है कि नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य की विफलता का पहले कोई उदाहरण नहीं रहा है. हर तरह का कांग्रेसी गांधी परिवार के सदस्यों को अपना निर्विवाद नेता मानता है और इसके बदले में चुनावी कामयाबी और सत्ता की उम्मीद करता है. जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव और सोनिया गांधी (1998 से 2017 तक के अवतार) तक नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य ना तो नाकाम रहा और ना ही अचानक से राजनीति से दूर हुआ. इसके चलते कांग्रेसी नेता आंखें मूंद कर परिवार के सदस्यों को फॉलो करते आए और उनसे अलग कुछ देखना नहीं चाहा. ऐसे में राहुल गांधी और अब प्रियंका गांधी के सामने, भव्यता के इस भ्रमजाल के साथ रहने और कांग्रेसियों के राजनीतिक प्रवृति को सही साबित करने की चुनौती है. एक और बात है, राहुल गांधी का इस्तीफ़ा, पार्टी और नेहरू गांधी परिवार के बीच बने सुंतलन की स्थिति को भी तोड़ने की कोशिश है. यह एक तरह से परिवार के बाहर के नेताओं पर बेहतर करने और सामने आकर नेतृत्व करने के लिए भी दबाव डालता है. यह वह पहलू है जिसे ना तो पार्टी और ना ही पार्टी के नेता अब तक स्वीकार कर पाए हैं. उदाहरण के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया का उदाहरण ही देखें, वे अपनी वंशावली के चलते खुद को महान मराठा के तौर पर पेश करते आए हैं लेकिन महाराष्ट्र और ख़ासकर पश्चिमी महाराष्ट्र में उनका योगदान और उनकी मौजूदगी नगण्य ही है. एआईसीसी स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख के तौर पर सिंधिया ने कई चूकों को छिपाया है. केवल जालेगांव ज़िले को ही देखें तो कांग्रेस ने सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को 10 सीटें दे दी हैं, जबकि यहां कांग्रेस सात और एनसीपी चार सीटों पर चुनाव लड़ती रही हैं. कांग्रेस ने अपने दमदार और जीतने वाले उम्मीदवारों की उपेक्षा क्यों की, इसका कोई ठोस जवाब नहीं है. इसके अलावा, यह भी याद रखे जाने की ज़रूरत है कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के एक जोड़ीदार के तौर पर काम करने का लंबा इतिहास रहा है. तालमेल बनाकर काम करने और रफ़्तार से काम करने के लिए ज़रूरी है कि नजदीकी लोगों की समीक्षा जरूरी होती है. जब इंदिरा गांधी ने सत्ता संभाली तब पार्टी के पुराने वफ़ादारों और खुद को नेहरू का करीबी बताने वालों को पार्टी से बाहर जाना पड़ा था. अगर थोड़े समय के लिए महासचिव का पद छोड़ दें तो संजय गांधी (1974-80) भी पार्टी में किसी आधिकारिक पद पर नहीं रहे लेकिन कई संस्थागत और प्रशासनिक मामलों में उनकी इंदिरा गांधी जितनी ही चलती थी. जून, 1980 में हवाई दुर्घटना में हुई उनकी मौत से कुछ सप्ताह पहले ही उनके सहयोगी रहे रामचंद्र रथ उन्हें पार्टी अध्यक्ष के तौर पर देख रहे थे. रथ उस वक्त कहा करते थे, सुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरू बेहद कम उम्र में कांग्रेस अध्यक्ष बन गए थे. ऐसे में अगर संजय गांधी पार्टी अध्यक्ष बनते हैं तो पूरी तरह से लोकतांत्रिक ही होगा. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. संजय गांधी के बड़े भाई राजीव गांधी 1983 में कांग्रेस महासचिव बने, तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. कांग्रेस मुख्यालय 24, अकबर रोड में उन्हें इंदिरा गांधी की बगल वाला कमरा आवंटित किया गया था. राजीव जो कहा करते थे वह सबसे महत्वपूर्ण होता था लेकिन संजय गांधी के नजदीक रहने वाले लोग कहीं नजर नहीं आ रहे थे. इसी तरह राजीव गांधी के समय में महत्वपूर्ण माने जाने वाले कई लोग सोनिया गांधी के समय में नजर नहीं आए. सोनिया गांधी का राहुल गांधी के साथ (2006 से 2014 तक-जब वे कांग्रेस महासचिव के तौर पर कार्यरत थे) कामकाजी रिश्ते के दौरान यह स्पष्ट दिखा था कि टीम राहुल (अजय माकन, आरपीएन सिंह, मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं) से अलग यूपीए सरकार के मंत्रियों को राहुल गांधी से ऊपर जाकर फैसला लेने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था. हालांकि सोनिया गांधी का अपना आजमाया हुआ तरीका है, ठंडा कर के खाओ यह राहुल गांधी के कामकाजी तरीके से एकदम अलग है. कांग्रेस पार्टी में अबी 150 महत्वपूर्ण नेता है, जो विभिन्न स्तर पर अहम पदों पर काबिज हैं. मौजूदा समय में सोनिया गांधी संतुलन साधने की कोशिश कर रही हैं ताकि सत्ता का हस्तांतरण आसानी से हो जाए. ऐसे में कांग्रेसी नेताओं के बयानबाजी का एक उद्देश्य सोनिया गांधी का ध्यान आकर्षित करने के लिए भी हो सकता है ताकि 150 प्रभावी कांग्रेसी नेताओं- वर्किंग कमेटी, पार्टी मुख्यालय, प्रदेश कांग्रेस प्रमुख, विधानसभा में नेता (विपक्ष) या फिर नजदीकी नेताओं की मंडली में शामिल हो पाएं. सोनिया गांधी की मुश्किल यह है कि उनकी नजर इस बात पर है कि इतिहास उनका आकलन किस तरह से करेगा? ऐसे में वह नहीं चाहती हैं कि राहुल गांधी की नाकामी का उनके अपने शानदार रिकॉर्ड, 2004 और फिर 2009 में कांग्रेस को सत्ता में लाने पर कोई असर पड़े. इसलिए वह पार्टी अनुशासन का डंडा नहीं चलाना चाहतीं. वहीं दूसरी ओर, मिलिंद देवड़ा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, संजय निरूपम और टीम राहुल के तमाम दूसरे नेता अब पार्टी गतिविधियों से खुद को कटा हुआ महसूस कर रहे हैं. वे उम्मीद कर रहे थे राहुल गांधी के नेतृत्व में वे खुद तो चमकेंगे ही साथ ही बड़े फ़ैसले लेंगे. लेकिन इसके बजाए, अहमद पटेल, गुलाम नबी आज़ाद, आनंद शर्मा और दूसरे अन्य नेताओं ने वापसी की है. ऐसे में लग रहा है कि थोड़े समय के लिए कांग्रेस के अंदर ये आंतरिक संघर्ष जारी रहेगा.
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राहुल गांधी के कारण हार की समीक्षा नहीं हो पाई: सलमान ख़ुर्शीद

Date : 09-Oct-2019
नई दिल्ली 9 अक्टूबर । कांग्रेस के सीनियर नेता और पूर्व विदेश मंत्री सलमान ख़ुर्शीद ने कहा है कि लंबे समय से इस बात की प्रतीक्षा की जा रही है कि पार्टी लोकसभा चुनाव में हार के कारणों का विश्लेषण करे. सलमान ख़ुर्शीद ने कहा कि कांग्रेस अब तक ऐसा नहीं कर पाई क्योंकि राहुल गांधी ने पार्टी प्रमुख का पद छोड़ दिया था और एक तरह से कांग्रेस हार के बाद नेतृत्व विहीन रही. पूर्व विदेश मंत्री ने कहा कि वो पार्टी प्रमुख की अस्थायी व्यवस्था से ख़ुश नहीं हैं. राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद सोनिया गांधी को कांग्रेस का अंतरिम प्रमुख बनाया गया है. ख़ुर्शीद ने कहा, मैं इस व्यवस्था से ख़ुश नहीं हूं. जो भी हमारी नेता हैं, मैं उन्हें चाहता हूं और वो बनी रहें. मैं चाहता हूं कि वो पद पर रहें. मैं अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहा हूं ताकि ये कहीं दर्ज हो.
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सोनिया गांधी ने क्यों दी 370, असम और राम मंदिर से दूर रहने की सलाह: नज़रिया राधिका रामाशेषन

Date : 13-Sep-2019
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की गुरुवार को एक बैठक हुई जिसमें पार्टी को पटरी पर लाने की एक ठोस कोशिश दिखाई दी. इस बैठक की अध्यक्षता पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने की. हालांकि, सोनिया गांधी के ब्लूप्रिंट का कुछ हिस्सा आरएसएस-बीजेपी के चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने के फॉर्मूले से मिलता-जुलता था. लेकिन फिर भी उन्होंने दिखाया कि उन्होंने कांग्रेस के उबर न पाने के कारणों पर गंभीरता से सोच-विचार किया है. साथ ही इन स्थितियों से पार्टी को निकालने के तरीके ढूंढने की कोशिश की है. सोनिया गांधी के संदेश में एक और बात जो निकलकर आई, जो उनके नज़रिये को राहुल गांधी से कुछ अलग दिखाती है. राहुल गांधी आधुनिक तकनीक के चश्मे से राजनीति को देखते हैं लेकिन सोनिया गांधी के विचार इससे अलग हैं. सोनिया गांधी ने कहा कि सोशल मीडिया पर सक्रिय होना और आक्रामक दिखना ही काफ़ी नहीं है. इससे ज़्यादा जरूरी है लोगों से सीधे तौर पर जुड़ना. आंदोलन के एक ठोस एजेंडे के साथ गलियों-कूचों, गांवों और शहरों में निकलना जरूरी है. इस बैठक में कांग्रेस के मुद्दे भी कुछ बदलते नज़र आए. सोनिया गांधी ने आर्थिक मंदी, नौकरियों की कमी और निवेशकों के डगमगाए विश्वास जैसे प्रमुखों मुद्दों को लोगों के सामने उठाने की बात कही. एक तरह से उन्होंने कांग्रेस को सामाजिक ध्रुवीकरण करने वाले मसलों जैसे अनुच्छेद 370 को हटाना, असम में एनआरसी और राम मंदिर से दूर रहने की सलाह दी है. सोनिया गांधी ने कांग्रेस को लोगों की रोज़ी-रोटी के मुद्दे पर ध्यान देने पर जोर दिया. उन्होंने शायद ये महसूस किया है कि अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे भले ही पार्टी को कम समय में चुनावी फ़ायदा नहीं दिला सकते लेकिन बीजेपी को राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर हराने की कोशिश करके अपनी फ़ज़ीहत कराने का कोई मतलब नहीं है. पिछले दिनों नरम हिंदुत्व कार्ड खेलने के राहुल के प्रयासों से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ है कांग्रेस के कोऑर्डिनेटर सोनिया गांधी ने ये भी माना है कि जब तक कांग्रेस को व्यवस्थित नहीं किया जाता तब तक किसी भी अभियान का कोई फायदा नहीं होगा. उन्होंने ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर्स नियुक्त करने का फ़ैसला किया है. ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर सामूहिक संपर्क अभियान पर जाने से पहले कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करते समय कांग्रेस के दृष्टिकोण और विचारधारा के बारे में बताएगा. हालांकि, ये बीजेपी के प्रचारक से थोड़ा अलग होगा क्योंकि ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर के लिए चुनाव न लड़ने की कोई बाध्यता नहीं होगी. सोनिया गांधी ने घर-घर जाकर सदस्यता अभियान चलाने की बात कही जिसमें मुख्यमंत्रियों से लेकर बूथ कार्यकर्ताओं तक को शामिल करने की योजना है ताकि निचले स्तर तक संपर्क बनाया जा सके. ये एक और सीख है जो कांग्रेस ने बीजेपी से ली है जिसमें राजनीतिक गतिविधियों के मामले में शीर्ष नेता से लेकर काडर के व्यक्ति तक में कोई अंतर नहीं है. आखिर में, सोनिया गांधी ने ज़ोर देकर कहा कि कांग्रेस को अपनी विरासत को बीजेपी को नहीं हड़पने देना चाहिए, हालांकि ये सलाह बहुत देर से आई. उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी के पास अपने ग़लत उद्देश्यों के लिए महात्मा गांधी, सरदार पटेल और बीआर अंबेडकर जैसे महान प्रतीकों के संदेशों को अपने अनुसार बदलने के तरीके हैं. आर्थिक मसलों पर ज़ोर अर्थव्यवस्था कांग्रेस के लिए प्रमुख मुद्दा रहा जो इस बात से भी साबित होता है कि पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर कई साक्षात्कार दिए जो बैठक के दिन बड़े हिंदी और अंग्रेजी अख़बारों में प्रकाशित हुए. इन साक्षात्कारों में उन्होंने सरकार से मीडिया में ख़बरें प्रभावित करने के तरीकों को छोड़कर देश के सामने मौजूद संकट को स्वीकारने का अनुरोध किया. नब्बे के दशक में वित्त मंत्री रहते हुए देश को ख़राब आर्थिक स्थिति से निकालने वाले मनमोहन सिंह ने मौजूदा आर्थिक हालात सुधारने के लिए जीएसटी के रेशनलाइजेशन (भले ही इससे अल्पकालिक राजस्व हानि हो) और ग्रामीण खपत में वृद्धि जैसे उपायों का सुझाव दिया. आज की बैठक ने कांग्रेस के अंदर एक धारणा को मजबूत किया कि सोनिया गांधी अब भी पार्टी के लिए जरूरी है पार्टी में गुटबाज़ी का खामियाजा इस बैठक की एक वजह ये भी थी कि लगभग हर राज्य और ख़ास तौर पर कांग्रेस शासित राज्यों में पार्टी नेताओं में मनमुटाव और गुटबाज़ी है. जिससे ये बात साबित होती है कि बीजेपी नेतृत्व ने कांग्रेस को अपंग बना दिया है. मध्य प्रदेश का ही उदाहरण लें तो राज्य के बड़े नेताओं मुख्यमंत्री कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच तब से ही टकराव बना हुआ है जब से कांग्रेस सत्ता में आई है. कमलनाथ इस बैठक में शामिल नहीं थे जबकि सिंधिया वहां मौजूद थे. सोनिया गांधी को दो दिग्गज नेताओं के बीच टकराव को ख़त्म करने वाला माना जाता था लेकिन अब वो बात भी नहीं रही. इन हालात में बीजेपी के लिए मध्य प्रदेश में कर्नाटक जैसी स्थितियां बनाने का रास्ता आसान हो गया है. इसी तरह राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट एक-दूसरे से नज़रें तक नहीं मिलाते. बुधवार को सचिन पायलट ने अपराध रोकने में असफलता को लेकर सरकार की आलोचना की थी. जाहिर है कि कांग्रेस को मजबूत रखने के लिए सिर्फ़ सत्ता मिलना ही काफ़ी नहीं है. हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हालात और ख़राब हैं जिनमें जल्द ही चुनाव होने वाले हैं. इन सभी राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगियों की सरकार है. हरियाणा में एक नया विवाद तब पैदा हो गया जब सोनिया गांधी की विश्वासपात्र कुमारी सैलजा ने प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी के पसंदीदा अशोक तंवर की जगह ली. सोनिया गांधी ने पूर्व मुख्यमंत्री और मजबूत जाट नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा को चुनाव समिति का प्रमुख बनाकर एक और विवाद छिड़ने से तो रोक लिया लेकिन अशोक तंवर की नाराज़गी खुले तौर पर जाहिर हो गई. उन्होंने कह दिया कि वो कांग्रेस के लिए काम करेंगे लेकिन सैलजा और हुडा के नेतृत्व में नहीं. महाराष्ट्र में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ बीजेपी और शिवसेना में जाने का सिलसिला जारी है. सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के हालात ठीक करने की कोई कोशिश नहीं की है. वहीं, एनसीपी प्रमुख शरद पवार भी बेबस नज़र आते हैं. झारखंड में भी गुटबाज़ी है क्योंकि हफ़्तों पहले प्रदेश कांग्रेस प्रमुख अजॉय कुमार ने भी मनमुटाव के चलते पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है. उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों सुबोधकांत सहाय और प्रदीप कुमार बलमुचु के समर्थकों के कथित हमले के बाद ये फ़ैसला लिया था. लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन एकजुट नहीं है. ये दिखाता है कि कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए सोनिया गांधी को कई और बैठकें करने, जोश जगाने और मनोबल बढ़ाने की जरूरत होगी. उन्होंने इस बैठक के साथ शायद इसकी शुरुआत की है.
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मध्य प्रदेश कांग्रेस में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है

Date : 06-Sep-2019
भोपाल 6 सितम्बर। मध्य प्रदेश कांग्रेस में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है, कहना बेहतर रहेगा. हाल ही में कमलनाथ सरकार के एक मंत्री उमंग सिंघार ने दिग्विजय सिंह की शिकायत पार्टी अध्यक्ष से कर दी कि वे मंत्रियों के काम में दबाव बनाने के साथ-साथ पार्टी को नुक़सान पहुंचाने का काम कर रहे हैं. दरअसल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सभी मंत्रियों को पत्र लिखकर उनके द्वारा की गई सिफारिशों के कम्प्लायंस की जानकारी मांगी थी. जिस पर उमंग सिंघार सहित कुछ अन्य मंत्रियों ने आपत्ति की. उनका कहना था कि वो अपने कामों के लिए मुख्यमंत्री के प्रति उत्तरदायी हैं. अगर हर राज्यसभा सदस्य या अन्य नेता को इस तरह कम्प्यालंस करना पड़े तो काम करना मुश्किल हो जाएगा. उमंग ने तो मीडिया के सामने खुलकर दिग्विजय सिंह पर माफियाओं के साथ मिले होने का आरोप भी लगाया. उमंग सिंघार के इन आरोपों पर मुख्यमंत्री कमलनाथ सहित पार्टी आलाकमान खामोश है. मंत्रियों को यह हिदायत ज़रूर दे दी गई है कि सार्वजनिक बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप ना करें. इसके बावजूद कांग्रेस से कोई ना कोई विधायक, मंत्रियों पर या तो आरोप लगाते हुए या उन आरोपों का खंडन करते हुए बयान जारी कर रहे हैं. इस बयानबाज़ी को मध्यप्रदेश में कांग्रेस के तीन दिग्गज नेताओं की आपसी प्रतिद्वंदिता और गुटबाज़ी के तौर पर देखा जा रहा है. उमंग सिंघार ने जब दिग्विजय सिंह पर आरोप लगाए तो उस पर सभी बड़े कांग्रेसी नेताओं ने चुप्पी साधे रखी. इतना ही नहीं पार्टी के दूसरे दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इन आरोपों को जायज़ तक ठहरा दिया. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो मुख्यमंत्री कमलनाथ से आग्रह तक कर दिया कि वो दोनों नेताओं को बैठाकर इस मामले का हल निकाले क्योंकि उमंग द्वारा उठाए गए मुद्दे गंभीर हैं. ज्योतिरादित्य के इस बयान को गुटबाज़ी के तौर पर ही देखा जा रहा है. मध्यप्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच वर्चस्व की लड़ाई विधानसभा चुनाव के वक़्त से ही चल रही है. चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष बनने और चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनने की बाज़ी कमलनाथ के हाथ लगी. ऐसे में बाकी दोनों नेता अपनी-अपनी चालों में लग गए. यही वजह है कि कमलनाथ को भी अपनी चालें चलनी पड़ रही हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रास्ते मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं, तो वहीं दिग्विजय सिंह सरकार में अपनी निर्णायक भूमिका बनाए हुए हैं. इसे देखते हुए मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी यह व्यंग्य करने से नहीं चूकते कि मुख्यमंत्री तो कमलनाथ हैं लेकिन सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं. मंत्री उमंग सिंघार के आरोप ने उनके व्यंग्य को धरातल दे दिया. ऐसा नहीं माना जाना चाहिए कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच वर्चस्व की यह लड़ाई इसलिए है कि कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व का संकट है. ऐसा खुला संघर्ष मध्यप्रदेश कांग्रेस में तब भी हुआ था, जब जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे ताकतकवार नेता पार्टी अध्यक्ष हुआ करते थे. 1965 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मूलचंद देशधारा ने पार्टी के भीतर घमासान कर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू को चुनाव हरवा दिया. इसकी वजह यह थी कि देशधारा नेहरू विरोधी थे और काटजू को नेहरू ने चुना था. इसके बाद देशधारा को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और इस गुट के नेता तखतमल जैन को राज्य की राजनीति से बाहर करते हुए दिल्ली में कांग्रेस का महासचिव बनाया गया था. 1980 में अर्जुन सिंह को संजय गांधी की पसंद पर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया तो उन्हें पूरा कार्यकाल शुक्ल बंधुओं, प्रकाश चंद सेठी, मोतीलाल वोरा और माधवराव सिंधिया से जूझना पड़ा. अलबत्ता दिग्विजय सिंह को इस तरह के झंझटों से थोड़ा राहत इसलिए रही क्योंकि शीर्ष स्तर पर कमज़ोर नेतृत्व रहा दूसरी तरफ हवाला कांड के चलते अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया और कमलनाथ को पार्टी ने किनारा कर दिया था. उस समय माधवराव सिंधिया और अर्जुन सिंह कांग्रेस छोड़कर ही चले गए थे. श्यामा चरण शुक्ल हालांकि तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए लेकिन दबावों के चलते वो एक बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए. कांग्रेस के ताज़ा हालात की बात करें तो कमलनाथ सरकार में दिग्विजय सिंह निर्णायक भूमिका में हैं. ऐसा लगता है कि कमलनाथ उनके दबाव में काम कर रहे हैं. इसकी तीन वजह समझ आती हैं. पहली, मध्यप्रदेश की राजनीति से कमलनाथ बहुत वाकिफ नहीं हैं और ऐसे में दिग्विजय सिंह उनके लिए मददगार बन सकते हैं. दूसरा, ज्योतिरादित्य सिंधिया को अलग-थलग करने में भी उन्हें दिग्विजय सिंह की ज़रूरत है. और तीसरा, तकनीकि रूप से कमलनाथ सरकार के पास बहुमत का पूरा आंकड़ा नहीं है ऐसे में सरकार पर आने वाले संकट से बचाने में दिग्विजय सिंह उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं. हालांकि इन ज़रूरतों के बावजूद कमलनाथ वक़्त वक़्त पर दिग्विजय सिंह को झटका देने में भी पीछे नहीं रहते. मसलन, दिग्विजय सिंह को उनकी मर्ज़ी के बिना भोपाल सीट से लोकसभा चुनाव का प्रत्याशी बनाया गया, जिसमें उन्हें हार मिली. दिग्विजय सिंह से कमलनाथ को वैसी चुनौती नहीं है जैसी सिंधिया से है. सिंधिया प्रदेश अध्यक्ष पद और मुख्यमंत्री पद दोनों के दावेदार हैं. जबकि दिग्विजय सिंह किंगमेकर की भूमिका में रहना पसंद करते हैं. ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व में सिंधिया को प्रदेश की राजनीति में रखने की इच्छा नहीं है. लोकसभा चुनाव के वक़्त गुना लोकसभा सीट से सिंधिया की उम्मीदवारी की घोषणा आखिर में की गई थी. जबकि इस परंपरागत सीट से किसी और नाम पर विचार करने का सवाल ही नहीं था. वहीं चुनाव से पहले उन्हें आधे उत्तरप्रदेश की कमान सौंप दी गई. इसके बाद जब मध्यप्रदेश में वो प्रदेश अध्यक्ष के मुख्य दावेदार थे तो उन्हें महाराष्ट्र चुनाव स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया. इन्हीं सब के चलते ऐसी ख़बरें भी आने लगी थीं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी दादी की तर्ज़ पर कांग्रेस से बगावत कर भाजपा में शामिल तो नहीं हो जाएंगे. दिग्विजय सिंह और सिंधिया के रिश्ते कभी मधुर नहीं रहे, फिर चाहे वो माधवराव सिंधिया हों या ज्योतिरादित्य सिंधिया. ऐसे में दोनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई स्वाभाविक है. दोनों अपने-अपने तरीकों से मुख्यमंत्री कमलनाथ पर दबाव बनाते रहते हैं. और अलग-अलग मुद्दों पर पत्र लिखकर उसे सार्वजनिक भी कर दिया जाता है. गैरबहुमत की सरकार होने के कारण कमलनाथ को भाजपा से ख़तरा होना चाहिए था लेकिन वह ख़तरा दूर-दूर तक नहीं दिखता. अलबत्ता वो अपनी ही पार्टी की कलह से जूझ रहे हैं. कमलनाथ सरकार बनने के दिन से ही सभी यह मान रहे थे कि अमित शाह अपने ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर लोकसभा चुनाव होते ही इस सरकार को गिराने की कोशिशें करेंगे. लेकिन अभी तक ऐसे कोई संकेत देखने को नहीं मिले हैं. कांग्रेस में जो सार्वजनिक घमासान मचा हुआ है उसे बड़े नेता हवा देने में लगे हुए हैं. यदि इस पर पार्टी हाईकमान कोई निर्णायक रुख अख्तियार नहीं करती है तो मुख्यमंत्री कमलनाथ की मुश्किलें और बढ़ती जाएंगी.
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कांग्रेस के लिए नेहरू-गांधी बोझ भी है और बड़ी संपत्ति भी, विनोद शर्मा राजनीतिक विश्लेषक

Date : 11-Aug-2019
नई दिल्ली 11 अगस्त । शनिवार को देर रात तक चली कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद सोनिया गांधी को पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया गया. बैठक के बाद कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने मीटिया को बताया उन्हें तब तक के लिए पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुना गया है जब तक एक पूर्णकालिक अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो जाता. बैठक में अध्यक्ष पद से दिया गया राहुल गांधी का इस्तीफ़ा भी स्वीकार कर लिया गया. कार्यसमिति की बैठक से पहले ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि किसी अनुभवी और ग़ैर-गांधी परिवार के शख़्स को चुना जाएगा. लेकिन बैठक ख़त्म हुई और कोई नया नाम सामने नहीं आया. तो क्या कांग्रेस के पास अब वाकई कोई नाम नहीं है या फिर नेहरू-गांधी परिवार के बिना उनका काम नहीं चलता? कांग्रेस की हालत खस्ता है. कांग्रेस के लिए नेहरू-गांधी परिवार एक बहुत बड़ा बोझ भी है और बहुत बड़ी संपत्ति भी. आज के दिन किसी और का नाम किसी को लेने की हिम्मत भी नहीं हुई होगी. ये बता भी नहीं रहे हैं कि किसी और का नाम चला भी या नहीं चला. सोशल मीडिया पर महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेताओं में से एक मुकुल वासनिक का नाम आ रहा था. क्या उनके नाम पर बैठक में चर्चा नहीं हुई होगी? बैठक में किसी समिति में उनके नाम का प्रस्ताव ही नहीं दिया गया या फिर समिति में उनके नाम का प्रस्ताव आया तो शायद उसे समर्थन नहीं मिला. महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेताओं में से एक मुकुल वासनिक के राजनीतिक जीवन की शुरुआत एनएसयूआई से हुई थी. उन्होंने बुलढाना की अपनी पारंपरिक सीट से 1984, 1991 और 1998 में लोकसभा चुनाव जीता था. इस समय वह कांग्रेस महासचिव हैं और गांधी परिवार के काफ़ी क़रीबी समझे जाते हैं. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि सोनिया गांधी के तत्वाधान में क्या चुनाव होंगे और क्या कोई नया अध्यक्ष बनेगा. या फिर सोनिया गांधी ही अंतरिम अध्यक्ष बन रहेंगी और फिर वही पूर्णकालिक अध्यक्ष बनेंगी. सवाल ये भी उठता है कि अगर पार्टी एक कार्यकारी अध्यक्ष भी नहीं चुन पा रही है तो क्या पूर्णकालिक अध्यक्ष चुन सकेगी. आज के दिन की सच्चाई यही है कि कांग्रेस की हालत खस्ता है और उसके हौसले पस्त है. पार्टी को ख़ुद को आने वाले दो-तीन विधानसभा चुनावों के लिए तैयार करना है ना कि पार्टी के भीतर चुनाव करवाने में वो व्यस्त हो जाए. मुझे लगता है कि ये कोई ऐसा फ़ैसला नहीं है कि जिस पर ताली बजाई जाए लेकिन ये ऐसा फ़ैसला भी नहीं है जिस पर बड़ा विवाद हो. ये स्थायी अध्यक्ष का पद नहीं है इसलिए इसमें इतना विवाद भी नहीं है. स्थायी अध्यक्ष के पद के लिए पहले और चुनाव के वक्त व्यापक चर्चा होगी. वैसे भी जब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया तो उनके बाद सोनिया गांधी ही सभी फ़ैसले ले रही थीं. बस हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि अंतरिम अध्यक्ष का जो कार्यकाल हो वो बहुत लंबा न हो जाए, बल्कि कम हो. चार प्रांतों में चुनाव होने तक ही कार्यकाल हो तो बेहतर जिसके बाद पार्टी को अपनी व्यवस्था में परिवर्तन करना चाहिए और पार्टी में चुनाव करवाने चाहिए.
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रमेश बैस को राज्यपाल बनाए जाने का क्या असर होगा छत्तीसगढ़ की राजनीति में

Date : 21-Jul-2019
रायपुर 21 जुलाई । रमेश बैस 7 बार रायपुर से सांसद रह चुके हैं. इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री की जिम्मदारी भी इन्होने संभाली है. रमेश बैस 16वीं लोक सभा के सदस्य रह चुके हैं. बैस 1978 में रायपुर नगर निगम के लिए चुने गए थे. 1980 से 1984 तक मध्यप्रदेश विधान सभा के सदस्य भी थे. वे 1989 में रायपुर, मध्यप्रदेश से 9वीं लोक सभा के लिए चुने गए थे और 11वीं, 12वीं, 13वीं, 14वीं, 15वीं और 16वीं लोक सभा में फिर से निर्वाचित हुए थे. उन्होंने भारत सरकार में केंद्रीय मंत्री के रूप में भी कार्य किया ! बता दें कि रायपुर लोकसभा सीट पर पिछले छह चुनावों से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का ही कब्जा रहा है.  सांसद रमेश बैस यहां से 7 बार जीत चुके हैं. बैस को केवल 1991 में हजार से भी कम वोटो से तकनीकी कारणों से हार का सामना करना पड़ा था और 1996 से 2014 तक लगातार छह बार जीत दर्ज की है ! छत्तीसगढ़ की राजनीति में सांसद रमेश बैस ने 2014 में अपना पिछला लोकसभा चुनाव जितने के बाद कहा था कि, ‘हमारे सामने आवाज उठाने वाला कोई नहीं है. अब बोलने का मौका आ गया है, हमें एक होकर बोलना होगा! जुलाई 2014 में प्रदेश कुर्मी समाज के प्रदेश स्तरीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उस दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि,छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल नहीं, बल्कि ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) बहुल राज्य है. लेकिन लंबे समय से गुमराह किया जाता रहा है कि छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है ! उन्होंने कई बार इसी तरह के अपने राजनितिक बयानों से अपनी ही पार्टी की पूर्ववर्ती रमन सरकार के लिए छत्तीसगढ़ में असमंजस की स्थिति पैदा की ! पिछली सरकार में उनकी वरिष्ठता की कई   बार अनदेखी की रमेश बैस के राज्यपाल बनाए जाने का असर छतीसगढ़ के राजनीति में दिखेगा  छत्तीसगढ़ में ओबीसी वर्ग की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा है, कुर्मी समाज के रमेश बैस छत्तीसगढ़ की राजनीति में बहुत बड़ा ओबीसी  चेहरा है ! उन्हें राज्यपाल बनाए जाने का सार्थक सन्देश स्वाभाविक रूप से भाजपा के पक्ष में जाएगा ! चूंकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी कुर्मी समाज से ही प्रतिनिधित्व करते हैं, जाहिर है रमेश बैस को राज्यपाल बनाने के दौरान इस बात का भी विशेष ध्यान रखा गया होगा !
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 इक्छा मृत्यु की राह पर है कांग्रेस?

Date : 12-Jul-2019
कांग्रेस मौजूदा राजनीति के संभवत: अपने सबसे बड़े संकट से जूझ रही है. पार्टी की उम्मीद कहे जा रहे युवा अध्यक्ष राहुल गांधी ने पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं और कार्यसमिति के सामने इस्तीफ़ा सौंपने के पचास दिन के बाद भी नए नेतृत्व का चुनाव नहीं हो पाया है. उधर लगातार प्रदेश इकाइयों से कांग्रेस के लिए बुरी ख़बरें आ रही हैं. कर्नाटक में वह जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के साथ अपनी गठबंधन सरकार बचाने के लिए संघर्ष कर रही है और गोवा में उसके दो तिहाई विधायकों ने रातोंरात भाजपा का पटका पहन लिया है. मध्य प्रदेश में भी मुख्यमंत्री कमलनाथ की बड़ी ऊर्जा विधायकों को एकजुट रखने में ख़र्च हो रही है. कांग्रेस की ऐसी हालत का ज़िम्मेदार कौन है, क्या पार्टी ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कांग्रेस मुक्त भारत के सपने की ओर बढ़ चली है और इससे उबरने का क्या कोई रास्ता नज़र आता है? इन्हीं सवालों के साथ  कुलदीप मिश्र ने कांग्रेस की सियासत पर नज़र रखने वाले दो वरिष्ठ पत्रकारों विनोद शर्मा और स्वाति चतुर्वेदी से बात की. कांग्रेस राजनीति करना ही नहीं चाहती: स्वाति चतुर्वेदी का नज़रिया कांग्रेस मुक्त भारत का सपना नरेंद्र मोदी और अमित शाह नहीं, बल्कि ख़ुद कांग्रेस पार्टी साकार कर रही है. ऐसा लगता है कि उन्होंने ख़ुद इच्छामृत्यु का फ़ैसला कर लिया है. मैं एक पत्रकार हूं और चुनाव नतीजे आने के पहले ही मैंने लिखा था कि भाजपा यह चुनाव जीतती है तो कांग्रेस की तीनों प्रदेश सरकारें ख़तरे में आ जाएंगी. एक पत्रकार को अगर ये बात पता है तो कांग्रेस के नेता किस दुनिया में रह रहे हैं. कर्नाटक की वह तस्वीर याद करिए जब मुंबई में कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार सरकार बचाने की कोशिश में कितने अकेले नज़र आ रहे थे. जब यह बात ट्विटर पर आ गई तो हाल ही में मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा का बयान आया कि उन्होंने डीके शिवकुमार से फोन पर बात कर ली है. क्या आज कल कांग्रेस नेता शक्तिप्रदर्शन और समर्थन फोन पर करने लगे हैं? मध्य प्रदेश में ये हाल है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक-एक मंत्री को दस-दस विधायकों पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी दी है ताकि वे टूटे नहीं. ऐसे सरकार कैसे चलेगी? ये हाल तब है, जब हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में इसी साल चुनाव होने हैं. यहां सीधे भाजपा और कांग्रेस की टक्कर है. एक ज़माने में कांग्रेस की हाईकमान बड़ी शक्तिशाली समझी जाती है जो अब लगता है कि बिल्कुल ख़त्म ही हो गई है. राहुल गांधी को इस्तीफ़ा दिए पचास दिन हो गए. वो दो दिन पहले अमेठी गए. अच्छा होता कि वो मुंबई जाते और वहां कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार के बगल में खड़े होते, अपनी मुंबई इकाई को बुलाते, उनके पास तीन पूर्व मुख्यमंत्री हैं, उन्हें बुलाते और एक संदेश देते. राजनीति सड़कों पर होती है, सोशल मीडिया पर नहीं. पर आज कल ऐसा लगता है कि कांग्रेस राजनीति करना ही नहीं चाहती. सही बात है कि विपक्ष के बिना लोकतंत्र हो ही नहीं सकता. लेकिन विपक्ष ख़ुद को ख़त्म कर रहा है तो हम इसमें भाजपा को कैसे दोष दे सकते हैं. यहां तक कि इतना समय बीत जाने के बाद भी नेतृत्व परिवर्तन पर न कोई गंभीरता है, न कोई नेता है. इसके पीछे एक वजह ये भी हो सकती है कि कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसके केंद्र में वंशवाद है. वहां अब तक ये व्यवस्था थी कि शीर्ष पद गांधी परिवार के साथ रहेगा और बाक़ी सब उनके नीचे होंगे. और गांधी परिवार उन्हें चुनाव जिताएगा. अब गांधी परिवार चुनाव जिता नहीं पा रहा. अब जो भी नया अध्यक्ष बनेगा, उसे ताक़त के दूसरे केंद्र गांधी परिवार से भी डील करना होगा. कांग्रेस जिस तरह की पार्टी है, वे लोग सब गांधी परिवार की तरफ़ जाएंगे. दरबारी परंपरा इस देश में कांग्रेस के साथ आई है. मेरी ख़ुद कई नेताओं से बात हुई है और वे कहते हैं कि हमें इस पद से क्या मिलेगा? हम ये पद क्यों लें? एक तो हमें गांधी परिवार की कठपुतली की तरह काम करना होगा और सारी पार्टी हम पर ही हमले करेगी. धागे से बंधा पत्थर और कांग्रेस की केंद्रीय ताक़त: विनोद शर्मा का नज़रिया अभी जो हुआ है, वो बहुत ही विचलित करने वाला है. एक वैज्ञानिक सिद्धांत है कि केंद्रीय बल, जिसे सेंट्रिफ्यूगल फोर्स कहते हैं, जब वो ख़त्म हो जाता है तो यही होता है. जब आप किसी धागे पर पत्थर बांधकर उसे घुमा रहे हों और बीच में उसे छोड़ दें तो पत्थर धागे समेत छिटककर दूर जा गिरता है. यही हो रहा है. कांग्रेस का नेतृत्व जो उसका केंद्रीय बल था, वो आज नदारद है. इसका असर उसकी प्रांतीय इकाइयों पर दिख रहा है. ख़ासकर उन प्रांतों में जहां कांग्रेस कमज़ोर हैं और जहां नेताओं की नीयत भी ख़राब हैं, वहां टूट-फूट हो रही है. मैं गोवा को इस संदर्भ में नहीं गिनूंगा. गोवा का आयाराम गयाराम वाला इतिहास रहा है. वहां के विधायक एक पार्टी में स्थिर नहीं रहे और वे दल बदलने में माहिर हैं. लेकिन कर्नाटक में जो हो रहा है और उससे पहले तेलंगाना में जो हुआ, वो परेशान करने वाली स्थिति है. जहां तक कांग्रेस मुक्त भारत के नारे का ताल्लुक़ है, वो नारा जिसने भी दिया हो, मैं नहीं समझता कि वो आदमी लोकतंत्र में विश्वास रखता है. देश को एक मज़बूत विपक्ष की ज़रूरत होती है. मनोविज्ञान में एंटी नेस्ट सिन्ड्रोम होता है. जब चिड़िया के बच्चे घोंसला छोड़कर उड़ जाते हैं तो उनकी मां डिप्रेशन में आ जाती है. ये 134 बरस की पार्टी राहुल गांधी के घर छोड़ जाने से डिप्रेशन के दौर से गुज़र रही है. उसे समझ नहीं आ रहा है कि फ़ैसला कैसे ले. काफ़ी दोष राहुल का, पर सारा नहीं अगर आप ये चाहते हैं कि इसका सारा दोष मैं राहुल गांधी पर मढ़ दूं, तो उन्हें सारा दोष तो नहीं लेकिन बहुतेरा दोष ज़रूर दूंगा. अगर वो पद छोड़ना चाहते थे तो उससे पहले उन्हें अपने अंतरिम उत्तराधिकारी के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करानी चाहिए थी. उस अंतरिम नेता के तत्वाधान में कार्यसमिति या नए अध्यक्ष के चुनाव हो सकते थे. ऐसे चिट्ठी लिखकर चले जाना कोई अच्छी प्रथा नहीं है. अगर आप जा रहे हैं तो आप अपने तमाम नेताओं को बुलाइए, एक समागम कीजिए, अपनी बात रखिए और कहिए कि अध्यक्ष पद पर न रहते हुए भी आप पार्टी में सक्रिय रहेंगे. ये सब उन्हें करना चाहिए था जिससे कार्यकर्ता का हौसला बना रहता, उसे लगता कि यह नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है लेकिन पार्टी विघटित नहीं हो रही. जब मैं नेतृत्व परिवर्तन की बात करता हूं तो मैं व्यवस्था परिवर्तन की भी बात करता हूं. अगर आपको याद हो तो मशीरुल हसन साहब ने तीन-चार अंकों में कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्तावों का एक सारांश प्रकाशित किया. वो जलवा था उस समय कांग्रेस कार्यसमिति का कि उसके प्रस्ताव देश का राजनीतिक एजेंडा तय करते थे. आपको कांग्रेस कार्यसमिति को एक सामूहिक नेतृत्व के स्वरूप में स्वीकार करना चाहिए. कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव हों. वहां जो साठ-सत्तर लोग बैठते हैं, उनकी जगह कोई 12 या 21 लोग बैठे हों. जो संजीदा हों और विवेकशील हों और जिनका पार्टी में सम्मान हो. ये सामूहिक नेतृत्व राजनीतिक फ़ैसले लेने में नए अध्यक्ष की मदद करे. मैं समझता हूं कि इस नए सामूहिक नेतृत्व में गांधी परिवार की भी भूमिका हो सकती है. ये बात सच है कि गांधी परिवार कांग्रेस के लिए बोझ भी है और ताक़त भी है. बोझ इसलिए कि उसके साथ कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप नत्थी होता है. लेकिन हमें ये समझना चाहिए कि गांधी परिवार लोकतांत्रिक वंशवाद का उदाहरण है. वो चुनाव लड़कर आते हैं, चुनाव में हारते और जीतते हैं. लोकतांत्रिक वंशवाद के ऐसे उदाहरण पूरे दक्षिण एशिया और पूरी दुनिया में हैं. मैं नहीं कहता कि ये अच्छी बात है. इसके बिना अगर आप काम चला सकते हैं तो चलाइए. लेकिन मैं समझता हूं कि आने वाले वक़्त में गांधी परिवार की एक भूमिका होगी और वह भूमिका फ़ैसले लेने की सामूहिकता तक सीमित होना चाहिए. ऐसा न हो कि वो पार्टी के भीतर ताक़त का एक समांतर केंद्र बन जाएं. इसके लिए मानसिक बदलाव लाना होगा. रवैया बदलना होगा. संगठन में बदलाव करने होंगे और फ़ैसला लेने की प्रक्रिया को बदलना होगा. 
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 कांग्रेस मे इस्तीफ़ों की झड़ी के पीछे क्या कारण हैं?

Date : 30-Jun-2019
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस में इस समय इस्तीफ़ों की झड़ी लग चुकी है लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस्तीफ़ा देने वालों में अधिकतर अनजाने नाम ही हैं. कांग्रेस की विभिन्न राज्य इकाइयों को मिलाकर अब तक 100 से अधिक पदाधिकारी अपना इस्तीफ़ा सौंप चुके हैं. इनमें सबसे बड़ा नाम केवल राज्यसभा सांसद विवेक तनखा का है जो पार्टी के क़ानूनी और मानवाधिकार सेल के चेयरमैन भी हैं. विवेक तनखा ने ट्वीट कर सुझाव दिया कि सभी को पार्टी के पदों से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए ताकि राहुल गांधी को अपनी टीम चुनने के लिए पूरी छूट मिल सके. इससे पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी इस्तीफ़ा देने की बात कही थी. इनके अलावा इस्तीफ़ा देने वालों में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमिटी के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश लिलौठिया और तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमिटी की कार्यकारी अध्यक्ष पूनम प्रभाकर भी शामिल हैं. वहीं, शनिवार को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के 35 पदाधिकारियों ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. इन्होंने लोकसभा चुनाव में राज्य में पार्टी की हार के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार बताते हुए इस्तीफ़ा दिया लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन इसको स्वीकार नहीं किया गया था. इसके बाद कथित तौर पर गुरुवार को हरियाणा के कांग्रेस नेताओं के साथ हुई बैठक में राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने हार की ज़िम्मेदारी ली लेकिन राज्य इकाइयों में किसी ने हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा नहीं दिया जिसके बाद इस्तीफ़ों की झड़ी शुरू हो गई. हालांकि, कांग्रेस पर क़रीबी नज़र रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी ने ऐसी कोई बात नहीं की थी और मीडिया के द्वारा यह अफ़वाह फैली. इन इस्तीफ़ों को किस तरह से देखा जाना चाहिए? इस पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि यह साफ़-साफ़ सिर्फ़ कुछ नेताओं की नौटंकी नज़र आती है. वह कहती हैं, इतनी पुरानी कांग्रेस पार्टी में ऐसी हार के एक महीने बाद यह हंगामा हो रहा है और उसे कोई दिशा नहीं दिख रही है. राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेकर बड़ी बात कही थी लेकिन अभी भी उनका इस्तीफ़ा नहीं स्वीकार किया गया है. कांग्रेस की स्थिति साफ़-साफ़ नज़र नहीं आ रही है और जो हालिया इस्तीफ़े हो रहे हैं, उससे लग रहा है कि एक नौटंकी सी चल रही है. ऐसा कहा जा रहा है कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने का पूरा मन बना चुके हैं. तो अब सवाल यह उठता है कि क्या यह इस्तीफ़े उन्हें अपने फ़ैसले पर सोचने को मजबूर करने के लिए हैं? इस सवाल पर कांग्रेस पर बारीकी से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं कि राहुल गांधी पद नहीं लेंगे यह पूरा तय है. वह कहते हैं, कुछ दिनों पहले कांग्रेस संसदीय समिति की बैठक में राहुल गांधी ने साफ़ कर दिया था कि वह अब और अध्यक्ष बने नहीं रहेंगे. लेकिन वह राजनीति में सक्रिय रहेंगे. इस्तीफ़ा देने वाले कोई बड़ा नाम नहीं है और जनता उनके नाम तक नहीं जानती है और यह केवल नेता बनने की कोशिश है. 2014 में पार्टी की हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी पार्टी के पदों से इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन उसे नहीं माना गया. इससे पहले शरद पवार के पार्टी छोड़ने पर सोनिया गांधी ने इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन वह भी स्वीकार नहीं किया गया. तो क्या अभी भी राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहिए? विनोद शर्मा कहते हैं कि कांग्रेस को अपना अंतरिम अध्यक्ष चुनना चाहिए जो एक साल तक कामकाज चलाए इसके बाद वह अपना अध्यक्ष चुने. विनोद शर्मा कहते हैं, वक़्त की अगर ज़रूरत है कांग्रेस पार्टी को नया नेता चुनने के लिए तो वह एक अस्थाई अध्यक्ष बना दें ताकि पार्टी का कामकाज चलता रहे और पार्टी महासचिव का पद प्रियंका गांधी को दे दें और इससे उनकी मुसीबतें सुलझ जाएंगी. प्रियंका गांधी के संगठन में अहम पद पर बने रहने से कांग्रेस की मुश्किलें कैसे हल होंगी? इस पर विनोद शर्मा कहते हैं, कांग्रेस के सामने बड़ी दुविधा यह है कि उसके नेता यह सोचते हैं कि गांधी परिवार के बिना पार्टी एकजुट नहीं रहेगी और इस बात में काफ़ी हद तक सच्चाई भी है. इस सच्चाई के चलते उन पर वंशवाद का आरोप भी लगता है. नया अध्यक्ष अगर प्रियंका को महासचिव पद पर बनाए रखता है तो वह संगठन को मज़बूती दे सकती हैं. वहीं, नीरजा चौधरी का मानना है कि कांग्रेस को अगर फिर से जीवित होना है तो उसे अध्यक्ष बदलने के अलावा भी बहुत कुछ करना होगा. वह कहती हैं, गांधी-नेहरू परिवार के किसी सदस्य के अध्यक्ष पद पर न बने रहने से भी कांग्रेस अच्छा कर सकती है. लेकिन इसमें इन लोगों का समर्थन होना ज़रूरी है. नई ऊर्जा अगर पार्टी में लानी है तो उन लोगों को आगे लाना होगा जिनको जन समर्थन प्राप्त है. ज़मीनी नेताओं को आगे लाना होगा. विनोद शर्मा कांग्रेस पार्टी में पुरानी जान डालने के लिए काडर को महत्वपूर्ण बताते हुए. वह कहते हैं कि पार्टी में इस समय नए काडर की भर्ती की ज़रूरत है. वह कहते हैं, इस पार्टी में अगर नए रक्त का संचार करना है तो इसको बड़े स्तर पर सदस्यता अभियान शुरू करना होगा. इसके लिए सिर्फ़ केंद्र और राज्यों में सिर्फ़ नेताओं को बदलने से काम नहीं चलेगा. उसके साथ-साथ पार्टी को जनता से जुड़े हुए मुद्दों को लेकर काम करना होगा और सड़कों पर उतरना होगा.
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कांग्रेस-AAP गठबंधन पर अब भी मंथन जारी, कांग्रेस बोली- हमारा स्टैंड क्लियर, गेंद AAP के पाले में

Date : 16-Apr-2019
नई दिल्ली: कांग्रेस  के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल ने सोमवार को कहा उनकी पार्टी दिल्ली में आम आदमी पार्टी  के साथ 4-3 फार्मूले के तालमेल वाले अपने रुख पर कायम है और अब फैसला आम आदमी पार्टी को करना है. पटेल ने ट्वीट कर कहा, हम स्पष्ट तौर पर कहना चाहते हैं. हमारी दिल्ली इकाई के विरोध के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष ने दिल्ली में आप के साथ तालमेल का फार्मूला निकालने के लिए स्थानीय नेताओं को मनाया. परंतु आप ने हरियाणा में भी सीटों की मांग पर जोर दिया. हमारा रुख स्पष्ट है. अब गेंद उनके पाले में है. बता दें, इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी  ने कहा कि उनकी पार्टी दिल्ली में आप के साथ गठबंधन करने को तैयार है, लेकिन अरविंद केजरीवाल  फिर से यूटर्न ले रहे हैं. बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव  में गठबंधन को लेकर आप और कांग्रेस के बीच औपचारिक बातचीत आगामी बुधवार को फिर से शुरु होगी. गठबंधन के फार्मूले को लेकर हालांकि दोनों दलों में अभी भी मतभेद कायम है. सूत्रों के अनुसार कांग्रेस नेता अहमद पटेल और आप के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह की अगुवाई में दोनों दलों के नेताओं की बैठक तय की गयी है. प्रस्तावित बैठक में राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार भी मौजूद रहेंगे. गठबंधन के मुद्दे पर पवार की मध्यस्थता में कांग्रेस और आप नेताओं की यह दूसरी औपचारिक बैठक है. हाल ही में पवार की मौजूदगी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी और तेदेपा प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और आप संयोजक अरविंद केजरीवाल की बैठक हुई थी.  राहुल गांधी ने आम आदमी पार्टी को ऑफर की दिल्ली की 4 सीटें, केजरीवाल बोले- गठबंधन आपकी इच्छा नहीं सिर्फ दिखावाआप के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि बुधवार को होने वाली बैठक में पार्टी की ओर से हरियाणा और दिल्ली की सीटों पर गठबंधन की संभावनाओं पर विचार किया जायेगा. उन्होंने बताया कि इस फार्मूले के तहत कांग्रेस द्वारा हरियाणा की तीन सीटें आप और जननायक जनता पार्टी के लिये छोड़ने के लिये तैयार होने पर दिल्ली में कांग्रेस को तीन सीटें देने पर बात की जायेगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि हरियाणा के लिये कांग्रेस के तैयार नहीं होने पर आप दिल्ली की सात में से दो सीट कांग्रेस के लिये छोडने पर बात करेगी. इधर कांग्रेस आप के साथ सिर्फ दिल्ली में ही गठबंधन करने के रुख पर कायम है. दिल्ली में 5 पूर्व मुस्लिम विधायकों की चिट्ठी ने कांग्रेस के लिए खड़ी की बड़ी मुश्किलआप के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि बुधवार को होने वाली बैठक में पार्टी की ओर से हरियाणा और दिल्ली की सीटों पर गठबंधन की संभावनाओं पर विचार किया जायेगा. उन्होंने बताया कि इस फार्मूले के तहत कांग्रेस द्वारा हरियाणा की तीन सीटें आप और जननायक जनता पार्टी के लिये छोड़ने के लिये तैयार होने पर दिल्ली में कांग्रेस को तीन सीटें देने पर बात की जायेगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि हरियाणा के लिये कांग्रेस के तैयार नहीं होने पर आप दिल्ली की सात में से दो सीट कांग्रेस के लिये छोडने पर बात करेगी. इधर कांग्रेस आप के साथ सिर्फ दिल्ली में ही गठबंधन करने के रुख पर कायम है. कांग्रेस के दिल्ली के प्रभारी पीसी चाको ने पिछले शुक्रवार को कहा था कि आप के साथ गठबंधन को लेकर अगर बातचीत होती है इसके दायरे में सिर्फ दिल्ली की सात सीटें होंगी. केजरीवाल ने रविवार को कहा था कि भाजपा की सत्ता में वापसी, देश के लिये बहुत बड़ा खतरा साबित होगी इसलिये देशहित में उनकी पार्टी कुछ भी करने को तैयार है. दिल्ली की सात सीटों पर 12 मई को मतदान होगा.
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पुनर्जीवित हुआ राफेल मामला

Date : 14-Apr-2019
कुछ रोज पहले एक टीवी चैनल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू चला। इस दौरान एंकर ने राफेल मामले पर सवाल पूछ दिया। मोदी इससे नाराज नज़र आए। फिर तीखे अंदाज में जवाबी सवाल किया कि क्या आपको सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं है। जाहिर है, उनका इशारा इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले की तरफ था। उसे सरकार और सत्ताधारी दल ने क्लीन चिट माना था। तब आए फैसले को सरकार की बहुत बड़ी जीत समझा गया। लेकिन अब वह सब कुछ पलट गया है। सुप्रीम कोर्ट मामले में दायर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। उसने सरकार की यह दलील ठुकरा दी है कि ऑफिशियल सिक्रेट ऐक्ट के तहत आने वाले लीक हुए दस्तावेज सुनवाई का आधार नहीं हो सकते। इससे सरकार और सत्ताधारी दल के पांव तले से जमीन खिसक गई है। जाहिर है, राफेल मामले में गोपनीय दस्तावेजों को आधार बनाकर सुनवाई करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने राफेल मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश तीन अहम दस्तावेजों को आधार बनाकर सुनवाई करने की मंजूरी दे दी है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने कहा- हम केंद्र की ओर से समीक्षा याचिका की स्वीकार्यता पर उठाई प्रारंभिक आपत्ति को खारिज करते हैं। कोर्ट ने मामले में लीक हुए दस्तावेज पर केंद्र सरकार के गोपनीयता के दावे को ठुकाराते हुए कहा कि जो नए दस्तावेज पब्लिक डोमेन में मौजूद हैं, उसको आधार बनाते हुए याचिकाओं पर आगे की सुनवाई की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के लिए नई तारीख तय करेगा। इससे पहले मामले की सुनवाई के दौरान केन्द्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने फ्रांस के साथ हुए राफेल सौदे से संबंधित दस्तावेजों की गोपनीयता का दावा किया था। केंद्र ने दलील दी थी कि सूचना के अधिकार कानून की धारा 8 1ए के अनुसार भी इस जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है। पुनर्विचार याचिका दायर करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और वकील प्रशांत भूषण का कहना था कि नए दस्तावेज बेहद महत्वपूर्ण हैं, लिहाजा इन पर विचार किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार कर लिया है। इससे ये सारा मामला पुर्जीवित हो गया है। 
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