Life Style

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बहुत छोटी उम्र में मेरी शादी मेरे कज़न से तय कर दी गई थी, नायला

Date : 12-Aug-2019
बहुत छोटी उम्र में मेरी शादी मेरे कज़न से तय कर दी गई थी. इसे लेकर मैं हमेशा असहज रहती थी. स्कॉटलैंड की रहने वाली 30 वर्षीय नायला ने ये बात स्कॉटलैंड के द नाइन कार्यक्रम में कही. नायला बताती हैं, मुझे बचपन से ही पता था कि मेरे कज़न के साथ मेरा रिश्ता तय कर दिया गया है. इसे लेकर मैं हमेशा से ही असहज रही है. मेरे घरवाले इस बात को लेकर चिंतित रहा करते थे कि कहीं मैं पश्चिमी संस्कृति में रच-बस न जाऊं. उनको लगता था कि वो मुझे इन सब से बचा रहे हैं. मीरपुरी मुस्लिम परिवार में कड़े तौर-तरीक़ों के साथ बड़ी हुईं नायला कहती हैं कि वो अपने विचारों को खुलकर प्रकट करना चाहती थीं और एक अलग तरह से ज़िंदगी जीना चाहती थीं. 17 साल की उम्र में उन्हें पाकिस्तान ले जाए जाने की घटना नायला को आज भी याद है. वो बताती हैं, उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि तुमने पाप किया है, अब तुम्हें अपने कज़न से शादी करनी होगी, तुमने अपने परिवार की नाक कटा दी है. अब बस शादी करके तुम हमारी इज़्ज़त बचा सकती हो. शुरुआत में नायला ने ये सब करने से मना कर दिया. लेकिन घरवाले लगातार मिन्नतें करते रहे जिसके बाद आख़िरकार नायला को अपने घरवालों की बात माननी पड़ी. वो बताती हैं, मैं सिर्फ़ उन्हें चुप कराना चाहती थी. इसके बाद मेरी हालत कुछ ऐसी थी कि शरीर से प्राण निकल रहे हों. तन-मन और दिमाग़ सुन्न होता जा रहा था क्योंकि मैं बेबस हो गई थी. पाकिस्तान में पाँच हफ्ते बिताने के बाद नायला अपने पति के बिना स्कॉटलैंड वापस आ गईं. उनके पति को कुछ दिनों बाद आना था. लेकिन इसके कुछ महीनों बाद ही नायला अपना घर छोड़ कर अपनी दोस्त के यहां रहने चली गईं. वो बताती हैं, मैंने अपना सामान बांध लिया और मैं भाग गई. मैं एक साल तक घर से बाहर रही. मुझे घर से, परिवार से और समुदाय के लोगों से बहुत गालियां मिलीं. नायला से कहा गया कि वो कभी अपने भाई और बहन से नहीं मिल पाएंगी. वो अपना दर्द बताते हुए कहती हैं कि ये सब ऐसा था मानों आपकी पूरी दुनिया आपसे कहे कि वो आपसे कुछ नहीं चाहती. आज़ाद मुसलमान महिला एक साल के बाद वो अपने घर लौटीं. नायला बताती हैं कि उनके परिवार वालों ने उन्हें अपना लिया लेकिन उनका समुदाय इस बात से नाराज़ था. वो कहती हैं, ये मुश्किल था लेकिन हमने किया. हमने धर्म से पहले प्यार को चुना इसके बाद नायला का तलाक़ हुआ और वो पढ़ने के लिए अबेरदीन यूनिवर्सिटी चली गईं. नायला कहती हैं, तबसे मैं एक आज़ाद मुसलमान महिला हूं. किसी भी व्यक्ति की ज़बरदस्ती शादी करना क़नूनन जुर्म है. ज़बरदस्ती चाहे शारीरिक रूप से हो या मानसिक रूप से या फिर आर्थिक रूप से दबाव बनाकर शादी करवाना भी क़ानूनन ज़ुर्म है. ब्रिटेन सरकार के हाल ही में जारी किए आँकड़ों के अनुसार पिछले साल ज़बरदस्ती शादी के 1,764 मामले सामने आए थे. स्कॉटलैंड में साल 2017 में ऐसे 18 मामले थे जो पिछले साल 30 हो गए. ब्रिटेन सरकार की बनाई यूनिट कहती है कि ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या बताती हैं कि लोग इस बात को लेकर जागरूक नहीं हैं कि ज़बरदस्ती शादी करना क़ानूनन जुर्म है. नायला कहती हैं, मुझे नहीं लगता हमने इसका कोई पक्का उपाय तलाशा है. शिक्षा और जागरूकता तो इसमें अहम भूमिका निभाते ही हैं लेकिन मुझे लगता है परिवार वालों को समझना चाहिए कि ज़बरदस्ती शादी करने से वो अपनी बेटी को कितना दर्द दे रहे हैं. मुझे लगता है लोगों को समझने की ज़रूरत है कि जब किसी महिला को ज़बरदस्ती शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है तो वो मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से बहुत कमज़ोर हो जाती है
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चेन्नई:समलैंगिक होने के कारण दो महिलाओं को होटल से बाहर निकालने की चर्चा

Date : 05-Aug-2019
चेन्नई 5 अगस्त । चेन्नई में रहने वाली दो महिलाओं ने एक होटल पर आरोप लगाया है कि 28 जुलाई को वह होटल में पार्टी करने गई थीं लेकिन होटल ने उन्हें बाहर निकाल दिया. दोनों महिलाएं एक समलैंगिंक कपल हैं और उनका कहना है कि इसी कारण होटल से उन्हें बाहर निकाला गया. रसिका गोपालाकृष्णन ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट पर इस घटना के बारे में लिखा, 28 जुलाई दिन शनिवार मैं अपनी गर्लफ़्रेंड के साथ द स्लेट होटल के बार में गई, मैं अपनी पार्टनर के साथ डांस कर रही थी और हमने देखा कि चार-पांच लोग जो हमें घूर रहे थे. उनका इस तरह घूरना हमें बेहद असहज कर रहा था. जैसा कि मैं देख सकती थी कि वहां सभी लोग एंजॉय कर रहे थे लेकिन लोगों की नज़रें हम पर थीं. हमें समझ नहीं आ रहा था कि हमें लोगों का इतना अटेंशन क्यों मिल रहा है. आख़िर लोगों के लिए ये हज़म कर पाना इतना मुश्किल क्यों है कि दो लड़कियां एक साथ डांस कर रही हैं. हम वॉशरूम की तरफ़ जा रहे थे और मुझे महसूस हो रहा था कि वो घूरती नज़रें मेरा पीछा कर रही हैं. थोड़ी देर बाद वॉशरूम के दरवाज़े को ज़ोर ज़ोर से खटखटाया गया और बाहर से आवाज़ आई बाहर आओ! हमने दरवाज़ा खोला तो सामने चार बाउंसर खड़े थे और एक महिला बाउंसर भी साथ थी. उन्होंने हमसे पूछा कि हम लोग वॉशरूम में क्या कर रहे थे. उन्होंने हम पर आरोप लगाया कि हम वॉशरूम में कुछ और कर रहे थे हमें कहा गया कि हमारी कई शिकायतें उन्हें मेहमानों से मिली हैं. उन लोगों ने हमें तुरंत होटल से निकल जाने को कहा. आख़िर ये शिकायतें किस बात की मिली थीं मैं ये जानने के लिए बेहद उत्सुक हूं. क्या हमने किसी को कोई चोट पहुंचाई थी, क्या हमने किसी से लड़ाई की या गालियां दीं किसी को. हम लोग ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे थे जिससे किसी को कोई परेशनी हो फिर भी हमें बिना कोई कारण बताए ही होटल बार से बाहल निकाल दिया गया. होटल के स्टाफ़ का ऐसा बर्ताव कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता. मैं उस सोच से दुखी हूं, जो उन लोगों के बारे में रखी जाती है जो साधारण और आम चीज़ों से कुछ अलग करते हैं. वो हमें एक ऐसी चीज़ के लिए दोषी ठहरा रहे थे जो मैंने किया ही नहीं था.l द स्लेट के प्रबंधन की ओर से बताया गया, पिछले 27 महीनों से हम अपने ग्राहकों की सेवा कर रहे हैं. सेक्सुएलिटी और जेंडर से जुड़े मसले बेहद व्यक्तिगत होते हैं और हम उनका सम्मान करते हैं. हम हर तरह के प्यार का सम्मान करते हैं, हम ना सिर्फ़ समलैंगिक रिश्तों का सम्मान करते हैं बल्कि समर्थन भी करते हैं. हमें लेकर सोशल मीडिया पर दो लोग लिख रहे हैं और कुछ मुख्यधारा के मीडिया संस्थान हमारा वर्जन जाने बिना इन बेबुनियाद अपराधों का प्रचार कर रहे हैं. जहां तक उस रात का सवाल है, उस दिन दो कॉलेज की लड़कियां कुछ ड्रिंक के बाद डांस कर रही थी. उनके डांस करने के तरीके से अन्य ग्राहक असहज हो गए. इसके बाद दोनों लड़कियों ने एक ही वॉशरूम में खुद को बंद कर लिया. हमारे एक ग्राहक को वही वॉशरूम इस्तेमाल करना था. हमारी फ़ीमेल स्टॉफ़ ने विनम्रता से निवेदन किया कि वह लड़कियां वॉशरूम से बाहर आ जाएं. वहां कोई भी पुरुष बाउंसर नहीं जा सकता था. इस घटना के चश्मदीद गवाह हमारे पास हैं.
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पकड़वा या पकड़ौआ विवाह या फिर फ़ोर्स्ड मैरिज

Date : 30-Jul-2019
ये तो कोर्ट का शुक्र मनाइए जिससे कुछ राहत मिली, नहीं तो मेरा जीना मुश्किल हो गया था. पुलिस भी इस मामले में मिली हुई है. स्थानीय थाने ने वीडियो वायरल होने के बाद मुझे बचाया था और 16 घंटे तक थाने में बैठाकर रखा, लेकिन एफ़आईआर नहीं लिखी. उलटे पुलिस मुझ पर दबाव डालती रही कि मैं ये शादी मान लूं. क्या पुलिस का यही काम है? 29 साल के विनोद कुमार की आवाज़ में राहत और ग़ुस्सा, दोनों के अहसास गुंथे हुए थे. राहत उन्हें कोर्ट के फ़ैसले से मिली थी और ग़ुस्सा उनका बिहार पुलिस पर था. पेशे से इंजीनियर विनोद कुमार की जबरन शादी का वीडियो साल 2017 के दिसंबर महीने में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. वीडियो में 03 दिसंबर 2017 को विनोद कुमार की डरा-धमकाकर शादी करवाई जा रही थी. विनोद उसमें रोते हुए, शादी की रस्मों को निभाने से इनकार करते हुए देखे जा सकते थे. विनोद ने इस शादी को मानने से इनकार कर दिया था. उन्होंने पटना के परिवार न्यायालय में शादी की वैधता को चुनौती दी, जिस पर मई 2019 में प्रिंसिपल जज कृष्ण बिहारी पाण्डेय ने फ़ैसला देते हुए शादी को अमान्य क़रार दिया. कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद विनोद कहते हैं, लोगों के लिए अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल है कि मेरे और मेरे परिवार के लिए ये दो साल कितने परेशानी देने वाले थे. लड़की वाले लगातार धमकी दे रहे हैं. वो कहते हैं कि तुम्हें लड़की को रखना होगा, वरना नतीजा भुगतना पड़ेगा. कोर्ट में शादी की वैधता को चुनौती देने के अलावा विनोद ने आपराधिक मुक़दमा भी दर्ज किया था. वो बताते है, इसमें मैंने लड़की के भाई, बहनोई समेत परिवार के 8 लोगों और 2 पुलिसवालों को, जिन्होंने मेरी एफ़आईआर नहीं लिखी थी, उनको आरोपी बनाया है. ये तो कोर्ट का शुक्र मनाइए जिससे कुछ राहत मिली, नहीं तो मेरा जीना मुश्किल हो गया था. पुलिस भी इस मामले में मिली हुई है. स्थानीय थाने ने वीडियो वायरल होने के बाद मुझे बचाया था और 16 घंटे तक थाने में बैठाकर रखा, लेकिन एफ़आईआर नहीं लिखी. उलटे पुलिस मुझ पर दबाव डालती रही कि मैं ये शादी मान लूं. क्या पुलिस का यही काम है? 29 साल के विनोद कुमार की आवाज़ में राहत और ग़ुस्सा, दोनों के अहसास गुंथे हुए थे. राहत उन्हें कोर्ट के फ़ैसले से मिली थी और ग़ुस्सा उनका बिहार पुलिस पर था. पेशे से इंजीनियर विनोद कुमार की जबरन शादी का वीडियो साल 2017 के दिसंबर महीने में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. वीडियो में 03 दिसंबर 2017 को विनोद कुमार की डरा-धमकाकर शादी करवाई जा रही थी. विनोद उसमें रोते हुए, शादी की रस्मों को निभाने से इनकार करते हुए देखे जा सकते थे. विनोद ने इस शादी को मानने से इनकार कर दिया था. उन्होंने पटना के परिवार न्यायालय में शादी की वैधता को चुनौती दी, जिस पर मई 2019 में प्रिंसिपल जज कृष्ण बिहारी पाण्डेय ने फ़ैसला देते हुए शादी को अमान्य क़रार दिया. कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद विनोद कहते हैं, लोगों के लिए अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल है कि मेरे और मेरे परिवार के लिए ये दो साल कितने परेशानी देने वाले थे. लड़की वाले लगातार धमकी दे रहे हैं. वो कहते हैं कि तुम्हें लड़की को रखना होगा, वरना नतीजा भुगतना पड़ेगा. कोर्ट में शादी की वैधता को चुनौती देने के अलावा विनोद ने आपराधिक मुक़दमा भी दर्ज किया था. वो बताते है, इसमें मैंने लड़की के भाई, बहनोई समेत परिवार के 8 लोगों और 2 पुलिसवालों को, जिन्होंने मेरी एफ़आईआर नहीं लिखी थी, उनको आरोपी बनाया है. क्या है पकड़वा या पकड़ौआ विवाह? विनोद की शादी जिस तरह से हुई, वो बिहार में बहुत प्रचलित है. बिहार में इसे पकड़वा या पकड़ौआ विवाह या फिर फ़ोर्स्ड मैरिज भी कहते हैं. इसमें लड़के का अपहरण करके मार-पीट और डरा-धमकाकर उसकी शादी करवा दी जाती है. 80 के दशक में उत्तरी बिहार में विशेष तौर पर बेगूसराय ज़िले में इसका बहुत प्रचलन था. बेगूसराय में बाकायदा कई गिरोह ऐसी शादियां करवाने के लिए बने थे. इस शादी में इंटरमीडिएट और मैट्रिक की परीक्षा देने वाले नाबालिग लड़कों से लेकर नौकरी करने वाले नौजवानों का अपहरण किया जाता था. बाद में मार-पीट के बल पर या डरा-धमकाकर शादी करा दी जाती थी. इस तरह की शादियों में शामिल लोग मानते हैं कि इन पकड़वा शादियों को कुछ साल के इंतज़ार के बाद मान्यता मिल जाती है. सहरसा की रामरति देवी बताती हैं, 10 साल पहले बहु के घरवाले बेटे का अपहरण कर ले गए थे. बहुत मारा पीटा. मेरा ज़रा भी मन नहीं था कि हम लड़की(बहु) घर लाएं. लेकिन फिर समाज बैठा, पंचायती हुई. बहु को घर नहीं लाते तो बेटे की शादी समाज में नहीं होती और यहां तक कि उसकी छोटी बहन की शादी में भी समस्या पैदा हो जाती. बिहार पुलिस मुख्यालय के आंकड़े देखें तो फोर्स्ड मैरिज यानी जबरन शादी के आंकड़े लगातार बढ़ रहे है. इनमें वो आंकड़े शामिल नहीं हैं जो जोड़े प्रेम-प्रसंग में घर से भागते हैं. साल 2018 में फोर्स्ड मैरिज के 4301 मामले दर्ज़ हुए. जबकि मई 2019 तक 2005 मामले दर्ज़ हो चुके हैं. इससे पहले के सालों में भी देखें तो फोर्स्ड मैरिज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. पकड़वा विवाह के शिकार विनोद उन गिने चुने लोगों में से हैं जिन्होंने इस तरह की शादी को अमान्य घोषित करवाने के लिए लड़ाई लड़ी. जानकारों की मानें तो पकड़वा शादी को अमान्य करार देने का यह संभवतः पहला फ़ैसला है. हालांकि इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है. पटना के परिवार न्यायालय में 20 साल से प्रैक्टिस कर रहीं अधिवक्ता विभा कुमारी बताती हैं, पकड़वा विवाह में शादी को अमान्य घोषित करवाने के मामले बहुत ही कम आते हैं. वो रेयर हैं. बाकी नपुंसकता, कोई गंभीर बीमारी, शादी के लिए किसी और को दिखाना, शादी किसी और से कर देने के मामले खूब आते हैं. पकड़वा विवाह के इस मामले में कोर्ट फ़ैसला ले पाई क्योंकि अपील करने वाले के पास मजबूत सबूत था. पकड़वा विवाह के मामले में आपकी शादी जबरन करवाई गई है, ये साबित करने की ज़िम्मेदारी लड़के के ऊपर होती है. शेखपुरा ज़िले के रवीन्द्र कुमार झा ने बताया कि उनके 15 साल के बेटे की शादी साल 2013 में जबरन 11 साल की बच्ची से करा दी गई थी. रवीन्द्र कुमार झा का कहना है कि उन्होंने इस शादी मानने से इनकार कर दिया तो नवादा ज़िले के लड़की वालों ने उनके परिवार पर दहेज प्रताड़ना (498 A) का केस कर दिया. इस मामले की वकील सुधा अम्बष्ठ बताती हैं, इस मामले में मैंने एंटीसिपेटरी बेल दिलवाई और बाद में शादी को अमान्य घोषित करवाने के लिए ये मामला शेखपुरा फैमिला कोर्ट गया जहां कुछ तकनीकी दिक्कतों के चलते साल 2018 में इसे जज ने ख़ारिज कर दिया. पकड़वा विवाह का दंश पूरा परिवार झेलता है. बोकारो में नौकरी कर रहे विनोद का परिवार पटना में रहता है. 4 भाई-बहन वाले इस परिवार में विनोद और उसकी छोटी बहन की शादी होनी बाकी है. विनोद बताते हैं, छोटी बहन की शादी के लिए परेशान है, लेकिन शादी नहीं हो रही. जहां जाते हैं वहां सब कहते हैं कि इनका परिवार मुकदमे में फंसा हुआ है तो फिर वहां शादी कैसे कर सकते हैं. निश्चित तौर पर कोर्ट के इस फ़ैसले ने विनोद की ज़िंदगी को आगे बढ़ाने की क़ानूनी इजाज़त दे दी है. विनोद की शादी जिस तरह से हुई, वो बिहार में बहुत प्रचलित है. बिहार में इसे पकड़वा या पकड़ौआ विवाह या फिर फ़ोर्स्ड मैरिज भी कहते हैं. इसमें लड़के का अपहरण करके मार-पीट और डरा-धमकाकर उसकी शादी करवा दी जाती है. 80 के दशक में उत्तरी बिहार में विशेष तौर पर बेगूसराय ज़िले में इसका बहुत प्रचलन था. बेगूसराय में बाकायदा कई गिरोह ऐसी शादियां करवाने के लिए बने थे. इस शादी में इंटरमीडिएट और मैट्रिक की परीक्षा देने वाले नाबालिग लड़कों से लेकर नौकरी करने वाले नौजवानों का अपहरण किया जाता था. बाद में मार-पीट के बल पर या डरा-धमकाकर शादी करा दी जाती थी. इस तरह की शादियों में शामिल लोग मानते हैं कि इन पकड़वा शादियों को कुछ साल के इंतज़ार के बाद मान्यता मिल जाती है. सहरसा की रामरति देवी बताती हैं, 10 साल पहले बहु के घरवाले बेटे का अपहरण कर ले गए थे. बहुत मारा पीटा. मेरा ज़रा भी मन नहीं था कि हम लड़की(बहु) घर लाएं. लेकिन फिर समाज बैठा, पंचायती हुई. बहु को घर नहीं लाते तो बेटे की शादी समाज में नहीं होती और यहां तक कि उसकी छोटी बहन की शादी में भी समस्या पैदा हो जाती. बिहार पुलिस मुख्यालय के आंकड़े देखें तो फोर्स्ड मैरिज यानी जबरन शादी के आंकड़े लगातार बढ़ रहे है. इनमें वो आंकड़े शामिल नहीं हैं जो जोड़े प्रेम-प्रसंग में घर से भागते हैं. साल 2018 में फोर्स्ड मैरिज के 4301 मामले दर्ज़ हुए. जबकि मई 2019 तक 2005 मामले दर्ज़ हो चुके हैं. इससे पहले के सालों में भी देखें तो फोर्स्ड मैरिज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. पकड़वा विवाह के शिकार विनोद उन गिने चुने लोगों में से हैं जिन्होंने इस तरह की शादी को अमान्य घोषित करवाने के लिए लड़ाई लड़ी. जानकारों की मानें तो पकड़वा शादी को अमान्य करार देने का यह संभवतः पहला फ़ैसला है. हालांकि इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है. पटना के परिवार न्यायालय में 20 साल से प्रैक्टिस कर रहीं अधिवक्ता विभा कुमारी बताती हैं, पकड़वा विवाह में शादी को अमान्य घोषित करवाने के मामले बहुत ही कम आते हैं. वो रेयर हैं. बाकी नपुंसकता, कोई गंभीर बीमारी, शादी के लिए किसी और को दिखाना, शादी किसी और से कर देने के मामले खूब आते हैं. पकड़वा विवाह के इस मामले में कोर्ट फ़ैसला ले पाई क्योंकि अपील करने वाले के पास मजबूत सबूत था. पकड़वा विवाह के मामले में आपकी शादी जबरन करवाई गई है, ये साबित करने की ज़िम्मेदारी लड़के के ऊपर होती है. शेखपुरा ज़िले के रवीन्द्र कुमार झा ने बताया कि उनके 15 साल के बेटे की शादी साल 2013 में जबरन 11 साल की बच्ची से करा दी गई थी. रवीन्द्र कुमार झा का कहना है कि उन्होंने इस शादी मानने से इनकार कर दिया तो नवादा ज़िले के लड़की वालों ने उनके परिवार पर दहेज प्रताड़ना (498 A) का केस कर दिया. इस मामले की वकील सुधा अम्बष्ठ बताती हैं, इस मामले में मैंने एंटीसिपेटरी बेल दिलवाई और बाद में शादी को अमान्य घोषित करवाने के लिए ये मामला शेखपुरा फैमिला कोर्ट गया जहां कुछ तकनीकी दिक्कतों के चलते साल 2018 में इसे जज ने ख़ारिज कर दिया. पकड़वा विवाह का दंश पूरा परिवार झेलता है. बोकारो में नौकरी कर रहे विनोद का परिवार पटना में रहता है. 4 भाई-बहन वाले इस परिवार में विनोद और उसकी छोटी बहन की शादी होनी बाकी है. विनोद बताते हैं, छोटी बहन की शादी के लिए परेशान है, लेकिन शादी नहीं हो रही. जहां जाते हैं वहां सब कहते हैं कि इनका परिवार मुकदमे में फंसा हुआ है तो फिर वहां शादी कैसे कर सकते हैं. निश्चित तौर पर कोर्ट के इस फ़ैसले ने विनोद की ज़िंदगी को आगे बढ़ाने की क़ानूनी इजाज़त दे दी है.
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दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है

Date : 28-Jul-2019
आपने ब्रेकअप के बाद अक्सर लोगों को ये कहते सुना होगा कि वो मेरे टाइप की नहीं थी या नहीं था. उसका और मेरा मिज़ाज नहीं मिलता था. या फिर किसी के साथ एक-दो डेट पर जाने के बाद ही लोग कहने लगते हैं कि वो मेरे जैसा/जैसी नहीं है. रिश्तों के इस नए दौर में मेरे टाइप के साथी की तलाश अंतहीन है. पर, क्या किसी ने भी ये जानने की कोशिश की है कि दुनिया में मेरे टाइप के के जैसी कोई चीज़ है भी या नहीं? हालिया रिसर्च से ये बात तो सामने आई है कि हम उम्र का फ़ासला शिक्षा, बालों के रंग और लंबाई को देख कर अपने साथी चुनते हैं. लेकिन, इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि लोग अपने मिज़ाज के हिसाब से ख़ास तरह का पार्टनर तलाशते हैं. लेकिन, पिछले दिनों एक रिसर्च के नतीजे सामने आए हैं, जिससे ये पता चलता है कि अगर आप अपने टाइप के पार्टनर को खोज रहे हैं, तो आपको आईने में देखने की ज़रूरत है. ये रिसर्च, जर्मनी में 12 हज़ार से ज़्यादा लोगों पर क़रीब 9 साल तक की गई थी. इस में वही लोग शामिल किए गए थे, जो खुले मिज़ाज के थे. जो नए तजुर्बे करने के लिए राज़ी थे. जो आसानी से किसी से सहमत हो जाते थे और ईमानदार थे. रिसर्च टीम ने इन लोगों के रोमांटिक संबंधों पर पूरे नौ बरस तक नज़र रखी. इन लोगों से ये भी कहा गया था कि वो अपने पार्टनर को भी इस रिसर्च का हिस्सा बनने के लिए राज़ी करें. 9 साल बाद इस रिसर्च में केवल 332 लोग ऐसे बचे थे, जो कम से कम दो रूमानी रिश्तों में जुड़े. इतने बड़े सर्वे में केवल 332 लोगों का एक से ज़्यादा रोमांटिक रिलेशनशिप में रहना चौंकाने वाली बात थी. लेकिन, इससे रिसर्च एक नतीजे पर पहुंच सके, इन 332 लोगों ने अपने मौजूदा साथियों की वही ख़ूबियां बताईं, जो उनके पुराने पार्टनर में थीं. इसका मतलब ये हुआ कि रिसर्च में शामिल लोग भले ही ये मान रहे थे कि अपने साथी को लेकर उनकी अपेक्षाएं बदल गईं. लेकिन, हक़ीक़त ये थी कि वो अपने पार्टनर में कुछ ख़ास गुण तलाश रहे थे और वो गुण उन्हें पहले पार्टनर में भी मिला और दूसरे में भी. तभी वो उनसे जुड़ सके. क्यों ढूंढ़ते हैं अपने टाइप पार्टनर अब आप ये बात मानें या न मानें, अगर आप किसी साथी को तलाश रहे हैं, तो हो सकता है कि जिसकी तलाश हो उसमें आप अपने एक्स यानी पुराने पार्टनर जैसे गुण ही खोजते हैं और मिलने पर उसके साथ आसानी से जुड़ जाते हैं. मज़े की बात ये है कि जर्मनी में जो रिसर्च हुई, उसमें न केवल साथियों के गुण एक जैसे थे, बल्कि कइयों के तो पार्टनर भी वही थे, यानी पुराने वाले. अपने रोमांटिक साथी में अपने जैसे गुण तलाशना कोई ग़ैर मामूली बात नहीं है. हम सब अपने आस-पास के ऐसे ही लोगों से जुड़ते हैं, जिनसे हमारे विचार और आदतें मेल खाती हैं. ऐसे रिश्तों में आप को अपने ख़यालात और आदतें नहीं बदलनी होतीं. हां, कुछ लोग जीवन में नए-नए प्रयोग करने के लिए अलग-अलग साथियों के साथ वक़्त बिताकर उन्हें आज़माते हैं. रिसर्च से ये भी पता चला कि बहिर्मुखी लोगों के अपने जैसी ख़ूबियों वाले साथी से रूमानी रिश्ते बनाने की संभावना बहुत कम ही होती है. तो, अगर हमारे रिश्ते हमारी सोच के समर्थक लोगों से बनते हैं. पर, अगर हम खुले ज़हन के हैं, तो हम जीवन में नए तरह के साथी के साथ भी तजुर्बे कर सकेंगे, ताकि दुनिया को देखने का एक नया नज़रिया हमें मिले. इस रिसर्च से ऑनलाइन डेटिंग के लिए भी नई उम्मीदें जगी हैं. जैसे संगीत सुनाने वाले ऐप आप की पसंद के हिसाब से गाने सुझाते हैं. वैसे ही, डेटिंग ऐप भी आप को आप के मिज़ाज के हिसाब से ही ऐसे लोगों से जुड़ने का सुझाव देंगे, जिनका व्यवहार आप से मिलता हो. अब रिसर्च से हमें ये तो पता नहीं चला कि ऐसे रिश्ते कितने समय तक चले. इसलिए, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि कोई रिश्ता कितने दिन तक चलने वाला है. अपने पार्टनर के साथ बहुत ज़्यादा समानता आपके विकास में बाधक बन सकती है. अगर, आप से जुड़ने से पहले आपके पार्टनर का कोई पुराना रिश्ता रहा है, तो वो आप के लिए मुसीबत भी बन सकता है. क्योंकि नए साथी के गुण उसके पुराने पार्टनर से मिलते होंगे, तो आप के लिए ये फ़िक्र और नाउम्मीदी की बात है. इसके विपरीत, अगर आपके मौजूदा साथी का मिज़ाज आपके पुराने पार्टनर से मिलता है, तो उससे मज़बूत रिश्ता क़ायम करना आसान होगा. तो, तलाक़ के बढ़ते मामलों के लिए इस बात को दोष न दें कि लोगों को उनके टाइप का साथी नहीं मिला, इसलिए तलाक़ हो गया. वैसे, इस तरह के रिसर्च का ये मतलब नहीं है कि अपने सोलमेट की तलाश आप को खत्म कर देनी चाहिए. जीवनसाथी के चुनाव में बहुत से मुद्दे असर डालते हैं. लेकिन, अगर आप का नया रिलेशनशिप स्टेटस, पहले जैसा ही दिखे, तो ये हैरानी की बात नहीं होगी.
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विवाहिता ने अपने पति से 10 रुपये के स्टांप पेपर पर सिंदूर का नाता व्हाट्सएप द्वारा नाता तोड़ा

Date : 25-Jul-2019
बागेश्वर, : हिंदू धर्म में सात फेरों के साथ जीवन भर साथ निभाने की शपथ पति-पत्नी के रिश्ते की नींव रखती है। एक विवाहिता ने अपने पति से 10 रुपये के स्टांप पेपर पर सिंदूर का नाता एक झटके में तोड़ दिया। स्टांप पेपर के वाट्सएप ग्रुप में सार्वजनिक होने से परिजन भी शर्मशार हैं और पति भी इस चुप्पी साधे हुए है। दस रुपये के स्टांप पेपर पर पति से संबंध विच्छेद का मैसेज क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। मोबाइल, इंटरनेट, वाहट्सएप, फेसबुक समेत तमाम सोशल मीडिया लोगों के दिलों-दिमाग में इस कदर घर करने लगा है कि पारिवारिक संबंध दरकने लगे हैं। एक पत्नी ने अपने पति को छोडऩे के लिए स्टांप पेपर का सहारा लिया है। हालांकि इसमें रिश्तों में बिखराव की स्थिति तो स्पष्ट नहीं है लेकिन पति द्वारा बच्चों को उससे अलग रखने का गुस्सा जरूर छलका है।  क्षेत्र की एक विवाहिता ने 18 जुलाई को स्थानीय तहसील में जाकर दस रुपये का स्टांप पेपर खरीदा। उसमें अपने हाथ से पति को संबोधित विवाह विच्छेद की बातें लिखी हैं। विवाहिता ने स्टांप पेपर पर लिखा कि वह अपने पति से रिश्ता तोड़ रही है। आज के बाद न तो वह मेरी जिंदगी में आएगा और न ही मैं उसकी जिंदगी में आऊंगी। यह कदम अपनी मर्जी से उठा रही हूं, इसमें किसी का कोई दवाब नहीं है। मैं अपनी जिंदगी कहीं भी काम कर काट सकती हूं। हमेशा के लिए पति को छोड़ रही हूं और एक दूसरे की जिंदगी में कभी नहीं आएंगे। किसी को उसके पीछे आने की भी जरूरत नहीं है। बच्चों की परवरिश भी पति खुद करे, क्योंकि वह बच्चों को उससे दूर ही रखते रहे हैं। स्टांप पेपर के वाट्सएप ग्रुप पर सार्वजनिक होने से परिजन भी काफी शर्मसार हैं और उन्होंने गुमशुदगी पुलिस में दर्ज कराई है। इधर, सीओ महेश चंद्र जोशी ने बताया कि यदि पति-पत्नी कांउसलिंग के लिए आते हैं तो दोनों को काउंसलरों से मदद दी जा सकती है।
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मर्द और औरत दोनों के कपड़े पहनने वाला अर्पित भल्ला

Date : 23-Jul-2019
हरयाणा निवासी 21 साल के अर्पित भल्ला मर्द और औरत दोनों के कपड़े पहनते हैं. वो साड़ी भी पहनते हैं, हैरम पैंट्स भी और क्रॉप्ड टॉप भी. वो ऐसे कपड़े पहनकर ऑफ़िस भी जाते हैं और बाज़ार भी. अर्पित कहते हैं कि कपड़ों का कोई जेंडर नहीं होता और हमें दूसरों के कपड़ों, दूसरों के लुक्स को लेकर ज़्यादा संवेदनशील होने की ज़रूरत है.।
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हम से ये बार-ए-लुत्फ़ उठाया न जाएगा एहसाँ ये कीजिए कि ये एहसाँ न कीजिए

Date : 23-Jul-2019
 आपने सोचा कि आपके सबसे अच्छे विचार बाथरूम में ही क्यों आते हैं? अकेले रहकर ख़ुद से गुफ़्तगू करना और अपनी कमियों और अपनी ताक़त का विश्लेषण करना, क्रिएटिविटी के लिए बहुत ज़रूरी माना जाता है. लेकिन दुनिया में अकेले रहने को लेकर ज़्यादातर अवधारणा यही है कि इससे लोग डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. आज के दौर में अकेलेपन को महामारी कहा जाता है. सामाजिक तौर पर अलग-थलग पड़ने का असर हमारी सेहत पर होता है, ये बात बहुत से विशेषज्ञ कहते हैं. जैसे कि दिल की बीमारी, दिल का दौरा और समय से पहले मौत हो जाना. लेकिन आप को ये समझना होगा कि अकेलेपन और ख़ुद के साथ अकेले वक़्त बिताने में फ़र्क़ है. इसके कई फ़ायदे हैं. आप की ख़ुद से अच्छी दोस्ती हो जाती है. आप का ध्यान चीज़ों पर बेहतर होता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि अलग-थलग महसूस करना आप की सेहत के लिए नुक़सानदेह होता है. ब्रिटेन की सरकार ने तो अकेलेपन को नई सदी में सेहत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक माना है. अगर आप लंबे वक़्त तक अकेलेपन के शिकार होते हैं, तो इससे आप दुखी हो जाते हैं. धीरे-धीरे ये बीमारी आप के दिल और ज़हन में घर कर जाती है. कम वक़्त के लिए भी अलग और अकेले रहना सेहत पर बुरा असर डालता है. जैसे कि क़ैदियों को एकदम अलग रखा जाता है. तो उनकी सेहत बिगड़ती है. कुल मिलाकर, अकेलापन ऐसा अहसास है, जो आप को कहीं भी अकेला महसूस कराता है. आप किसी महफ़िल में भी ख़ुद को तन्हा पाते हैं. लोगों से घिरे होकर भी अपने ख़यालों में खोए रहते हैं. किसी से जुड़ाव नहीं महसूस नही करते । अकेलेपन का ताल्लुक़ इस बात से बिल्कुल नहीं है कि आप के आस-पास कितने लोग हैं. ये एक ज़हनी एहसास है, जो अंदर से महसूस होता है. जब आप को लगता है कि लोग आप को समझ नहीं पा रहे हैं, आपके नज़रिए से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते हैं. तो ऐसे हालात भी आप को अकेला महसूस कराते हैं. कुछ लोग बहुत भीड़-भाड़ पसंद नहीं करते. ऐसे अंतर्मुखी लोगों के गिने-चुने दोस्त होते हैं. उन्हें देखकर लगेगा कि वो अकेलेपन के शिकार हैं. तमाम रिसर्च से ये बात पुख़्ता तौर पर मालूम हुई है कि अंतर्मुखी लोगों के दोस्त ज़्यादा मज़बूती से जुड़े होते हैं. गुणात्मक रूप से भी वो बेहतर लोगों से ही जुड़े होते हैं. जो लोग अंतर्मुखी नहीं भी हैं, उनके लिए भी कुछ वक़्त के लिए अकेले रहना फ़ायदेमंद हो सकता है. इससे रिलैक्स करने में उन्हें मदद मिलती है दुनियाभर में दस हज़ार लोगों पर किए गए सर्वे के मुताबिक़, लोगों के रिलैक्स करने के पांच टॉप नुस्खे अकेले रहकर काम करने वाले थे. जैसे कि पढ़ना. तीसरा सबसे लोकप्रिय फॉर्मूला था अकेले समय बिताना. जबकि दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताने का नंबर 12वां था. अलग-थलग रहने से आपके दिमाग़ का फ़ोकस बढ़ता है. ये क्रिएटिविटी को जन्म देता है. जब हमारा ज़हन स्थिर होता है, तो वो क़ुदरती तौर पर काम करता है. वो यादों को सहेजता है. पुराने कचरे को साफ़ करता है और नए आइडियाज़ को जन्म देता है. यही वजह है कि अक्सर हमारे बेहतरीन विचार बाथरूम में या अकेले टहलते हुए जन्म लेते है. अकेलेपन से हमें एक फ़ायदा और भी होता है. वो ये कि हम नए लोगों से जुड़ने और अपना दायरा बढ़ाने की ज़रूरत महसूस करते हैं. तो अगर आप लगातार अकेलापन महसूस करते हैं. डिप्रेशन के शिकार होते हैं या आप को सेहत से जुड़ी दूसरी परेशानियां होती हैं, तो आप को डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. लेकिन अगर आप अकेले कुछ वक़्त अपने साथ बिताना चाहते हैं. कुछ पढ़ना या फिर कुछ अलग करना चाहते हैं, तो इस अकेलेपन को एन्जॉय कीजिए. आख़िर किसी ने सच ही तो कहा है... अकेले हैं तो क्या ग़म है चाहें तो हमारे बस में क्या नहीं...
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इंसान की फ़ितरत है कि उसे अच्छाई कम और बुराई ज़्यादा नज़र आती हैं.

Date : 18-Jul-2019
18 जुलाई 2019 दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं जिसमें सिर्फ़ अच्छाई या सिर्फ़ बुराई हो. लेकिन इंसान की फ़ितरत है कि उसे अच्छाई कम और बुराई ज़्यादा नज़र आती हैं. शायद इसीलिए किसी के अच्छे व्यवहार से ज़्यादा उसका बुरा बर्ताव याद रहता है. तमाम रिसर्च भी कहती हैं कि शख़्सियत का नकारात्मक पहलू इंसान में रचनात्मक सोच पैदा करता है. लेकिन ऐसी सोच वाले किसी को धोखा देने से भी नहीं चूकते. नई रिसर्च से साबित होता है कि हर इंसान में क़ुदरती तौर पर बहुत सी अच्छाइयां होती हैं. व्यक्तित्व के बहुत से पहलुओं पर रिसर्च करने वाले मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि हर इंसान बुनियादी तौर पर अच्छा होता है. दो दशक पहले रिसर्च की गई थी कि कोई इंसान किसी को धोखा देने या कोई भी बुरा काम करने से पहले कुछ सोचता क्यों नहीं. इसके बाद डार्क ट्रायड की थ्योरी दी गई. यानी ऐसे गुण, जिनकी वजह से लोग किसी को भी नुक़सान पहुंचाने की सोच रखते हैं. या सिर्फ़ अपने भले की सोचते हैं. इनके लिए तीन नाम दिए गए. नारसिसिज़्म, साइकोपैथ और मैकियावेलियनिज़्म. अमरीका की कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक स्कॉट बेरी कॉफ़मेन ने ये पता लगाने की कोशिश की कि आख़िर ऐसे लोग अपने काम-काज में कैसे कामयाबी हासिल कर लेते हैं या रिश्तों में निबाह कैसे करते हैं? उन्होंने इसके लिए लंबी रिसर्च की. कुछ समय बाद प्रोफ़ेसर बेरी को लगा कि नकारात्मकता के साथ-साथ शख़्सियत के पॉजिटिव यानी लाइट ट्रायड पर भी रिसर्च की जानी चाहिए. लिहाज़ा अपने तीन साथियों के साथ उन्होंने इंसानी शख़्सियत के तीन सकारात्मक पहलुओं पर रिसर्च की. पहला पहलू है मानवतावाद, यानी एक इंसान का दूसरे इंसान से कैसा रिश्ता रहता है. दूसरा पहलू है कैन्टियानिज़्म यानी आचारनीति. ये शब्द जर्मनी के बड़े दार्शनिक विचारक इमैनुअल कांट के नाम पर आधारित है, जिन्हें इस थ्योरी का जन्मदाता कहा जाता है. तीसरा पहलू है मानवता में विश्वास. माना जाता है कि हर इंसान बुनियादी तौर पर अच्छा होता है. अमरीका की वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक विलियम फ़लीसन का कहना है कि शख़्सियत के ये तीनों ही पहलू इंसान को बेहतर बनाने के मामले में फिट बैठते हैं. इनके मुताबिक़ जब इंसान ये सोच बना लेता है कि दूसरे लोग भी अच्छे है तो उसमें ख़ुद को ख़तरों से बचाने का डर कम हो जाता है. दूसरों को उनके ग़लत कामों की सज़ा देने का भाव कम हो जाता है. रिसर्च से पता चलता है कि ना तो कोई भी शख़्स ख़ुद में पूरी तरह डार्क ट्रायड रखता है और ना ही लाइट ट्रायड रखता है. अगर आपको ख़ुद के बारे में जानना हो कि आप में कौन सा ट्रायड किस स्तर का है? तो आप कॉफ़मेन की वेबसाइट पर एक टेस्ट के ज़रिए पता कर सकते हैं. शख़्सियत का डार्क ट्रायड पहलू इतना भी बुरा नहीं है जितना कि माना जाता है. बल्कि ऐसे लोगों में लीडरशिप संभालने की भरपूर क्षमता होती है साथ ही वो मुखर और बहादुर होते हैं. लिहाज़ा रिसर्चर कहते हैं कि इस पहलू को छिपाने से बेहतर है कि इसका भरपूर लाभ उठाया जाए. वहीं अगर किसी की शख़्सियत में लाइट ट्रायड पहलू ज़्यादा है, तो इसका मतलब ये नहीं कि उनकी ज़िंदगी बहुत बेहतर और आसान होती है. इस पहलू के लोगों की ख़ासियत होती है कि वो सभी को ख़ुश रखने की कोशिश करते हैं. लेकिन ऐसा संभव नहीं है. बहुत से लोग होंगे जो आप से सहमत नहीं होंगे. ऐसे में अपनी प्रामाणिकता बरक़रार रखना ज़रूरी है. लाइट ट्रायड पहलू वाले लोगों की एक कमी और भी है कि वो बहुत जल्द ख़ुद को क़ुसूरवार मान लेते हैं. और शर्मिंदा भी ज़ल्दी हो जाते हैं. मनोवैज्ञानिक टाया कोहेन का कहना है कि अपने किए ग़लत काम पर शर्मिंदा होना बुरी बात नहीं है. बल्कि इससे इंसान को भविष्य में सावधान रहने की प्रेरणा मिलती है. लेकिन छोटी-छोटी बातों पर ख़ुद को ही ग़लत मानकर आत्मग्लानि से घिर जाना अच्छा नहीं है. रिसर्च साबित करती हैं कि हमारा किरदार जीवन भर बनता और बदलता रहता है. बुनियादी तौर पर हमारी शख़्सियत हमारी आदतों का परिणाम होती है. हमारी आदतों के मुताबिक़ ही हमारा मिज़ाज बनता है. लेकिन ज़िंदगी में हम जिस तरह के लोगों के साथ मिलना-जुलना शुरू कर देते हैं, उसी के मुताबिक़ हमारे अंदर अच्छाइयां और बुराइयां पनपने लगती हैं. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि तमाम बुराइयों के बावजूद कोई ना कोई अच्छाई हर इंसान में ज़रूर होती है.
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भारत में सेक्स ऐसा मसला है, जिसमें दिलचस्पी तो सबकी है, लेकिन बात करने से लोग हिचकते हैं

Date : 17-Jul-2019
भारत में सेक्स ऐसा मसला है, जिसमें दिलचस्पी तो सबकी है, लेकिन बात करने से लोग हिचकते हैं. पुरुष तो फिर भी सेक्स के बारे में अपना नज़रिया बयां कर देते हैं. लेकिन महिलाएं अगर खुलकर इस बारे में बात करना भी चाहें, तो उन्हें ग़लत नज़रों से देखा जाता है. सेक्स के मामले में महिलाएं शर्म और सामाजिक बंदिशों के चलते अक्सर मौन रहती हैं. यूं तो प्राचीन भारतीय समाज शारीरिक संबंधों को लेकर काफ़ी खुले ज़हन का रहा था. जिसकी मिसाल हमें खजुराहो के मंदिरों से लेकर वात्स्यायन के विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ कामसूत्र तक में देखने को मिलती है. लेकिन जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ा, हमारा देश जिस्मानी रिश्तों के प्रति संकुचित होता चला गया. मर्द-औरत के यौन संबंध से जुड़ी बातों में पर्देदारी और पहरेदारी हो गई. हालांकि, अब यौन संबंधों को लेकर फिर से एक बड़ा बदलाव आ रहा है. ऐसा बदलाव जो क्रांतिकारी है. क़ुदरती तौर पर सेक्स का मतलब सिर्फ़ बच्चे पैदा करने और परिवार बढ़ाने तक ही सीमित था. लेकिन साइंस की बदौलत अब सेक्स के बिना भी बच्चे पैदा किए जा सकते हैं. आईवीएफ़ और टेस्ट ट्यूब के ज़रिए ये पूरी तरह संभव है. दुनिया का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी 1978 में पैदा हुआ था. उसके बाद से अब तक क़रीब 80 लाख बच्चे इस तकनीक के ज़रिए दुनिया में आ चुके हैं. रिसर्चरों का मानना है कि भविष्य में इस तरीक़े से पैदा हुए बच्चों की तादाद में भारी इज़ाफ़ा देखने को मिलेगा. लेखक हेनरी टी ग्रीली का कहना है कि आने वाले समय में 20 से 40 साल की उम्र वाले सेहतमंद जोड़े लैब में गर्भ धारण कराना पसंद करेंगे. वो सेक्स बच्चा पैदा करने के लिए नहीं बल्कि ज़िस्मानी ज़रूरत और ख़ुशी के लिए करेंगे. अगर बच्चे बिना सेक्स के पैदा हो सकते हैं तो फिर सेक्स की क्या ज़रूरत है? सेक्स का काम मर्द, औरत की जिस्मानी ज़रूरत को पूरा करना और उन दोनों का रिश्ता मज़बूत करना है. लेकिन यहां भी धर्म बहुत बड़ा रोड़ा है. हर धर्म, यौन संबंध को लेकर कई तरह की पाबंदियां और नियम-क़ायदे बताता है. ईसाई धर्म में कहा गया है कि मर्द-औरत को सेक्स सिर्फ़ बच्चे पैदा करने के लिए करना चाहिए. अगर शारीरिक सुख और ख़ुशी के लिए सेक्स किया जाए तो वो अनैतिक है. हालांकि ईसाई धर्म की भी पुरानी किताब के सोलोमोन सॉन्ग में जोश के साथ सेक्स करने को बेहतरीन बताया गया है. साथ ही यौन संबंध को पति-पत्नी के बीच ही नहीं, बल्कि दो प्यार करने वालों के बीच की निजी चीज़ बताया गया है. ग्रीस के बड़े दार्शनिक अरस्तू इस विषय पर रोशनी डालते हुए कहते हैं कि प्यार कामुक इच्छाओं का अंत है. यानी अगर दो लोगों के बीच मोहब्बत है तो उसका मुकाम शारीरिक संबंध बनाने पर पूरा होता है. इनके मुताबिक़ सेक्स कोई मामूली काम नहीं है. बल्कि, ये किसी को प्यार करने और किसी का प्यार पाने के लिए एक ज़रूरी और सम्मानजनक काम है. जबकि अमरीकी समाजशास्त्री डेविड हालपेरिन का कहना है कि सेक्स सिर्फ़ सेक्स के लिए होता है. उसमें ज़रूरत पूरी करने या कोई रिश्ता मज़बूत करने जैसी कोई चीज़ शामिल नहीं होती. हो सकता है कि जब इंसान ने सेक्स शुरू किया हो, तब वो सिर्फ़ शारीरिक ज़रूरत पूरी करने का माध्यम भर रहा हो. लेकिन जब परिवार बनने लगे, तो हो सकता है कि इसे रिश्ता मज़बूत करने का भी माध्यम समझा जाने लगा. लेकिन आज समाज पूरी तरह बदल गया है. आज तो सेक्स पैसे देकर भी किया जा रहा है. बहुत से लोग पेशेवर ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए सेक्स को हथियार बनाते हैं. ऐसे हालात में यक़ीनन किसी एक की शारीरिक ज़रूरत तो पूरी हो जाती है. लेकिन, रिश्ता मज़बूत होने या जज़्बाती तौर पर एक दूसरे से जुड़ने जैसी कोई चीज़ नहीं होती. ऐसे में फिर सेक्स का मतलब क्या है? इसका मतलब यही है कि सेक्स सिर्फ़ सेक्स के लिए किया जाए. इसमें बारीकियां ना तलाशी जाएं. बदलते समय के साथ आज ना सिर्फ़ इंसानी रिश्ते बदल रहे हैं. बल्कि यौन संबंध को लेकर लोगों का बर्ताव और रिश्तों के प्रति सोच भी बदल रही है. 2015 में अमरीका की सैन डियागो यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर जीन एम ट्वींग ने एक रिसर्च पेपर में कहा था कि 1970 से 2010 तक अमरीका में बहुत हद तक लोगों ने बिना शादी के सेक्शुअल रिलेशनशिप को स्वीकार करना शुरू कर दिया था. नई पीढ़ी का मानना है कि सेक्शुएलिटी समाज की बंदिशों में नहीं बंधी होनी चाहिए. रिसर्चर ट्वींग के मुताबिक़ सेक्शुअल नैतिकता समय की पाबंद नहीं है. उसमें बदलाव होते रहे हैं, हो रहे हैं और आगे भी जारी रहेंगे. अब तो ये बदलाव इतनी तेज़ी से हो रहे हैं कि शायद हम ये बदलाव स्वीकार करने के लिए तैयार भी नहीं हैं. जिस्मानी रिश्ते केवल मर्द और औरत के बीच नहीं बनते. बल्कि लेस्बियन और गे रिलेशनशिप को भी कई देशों ने मान्यता देनी शुरू कर दी है. ये कोई मानसिक या शारीरिक विकृति भी नहीं है. हालांकि धार्मिक और सामाजिक दोनों ही रूप से इसे अनैतिक व्यवहार माना जाता रहा है. धर्म तो कहता है कि समान लिंग वाले जानवर तक आपस में संबंध नहीं बनाते. क्योंकि वो जानते हैं कि ये अनैतिक है. जबकि साइंस कहती है कि जापानी मकाक, फल मक्खियां, फ़्लोर फ़्लाइज़, अल्बाट्रॉस पक्षी और बोटल नोज़ डॉल्फ़िन समेत ऐसी क़रीब 500 प्रजातियां हैं, जिनके बीच होमोसेक्शुएलिटी होती है. लेकिन हम इन्हें, लेस्बियन, गे या हेट्रोसेक्सुअल जैसे नाम नहीं देते. आख़िर इन सबके बीच लाइन खींची किसने? शायद उन लोगों ने जिन्होंने सेक्स को सिर्फ़ बच्चे पैदा करने की ज़रूरत समझा. अगर सेक्स क्यों? के जुमले से सवालिया निशान हटा लिया जाए तो शायद लोग इसका बेहतर मतलब समझ पाएंगे. सेक्स की ख़्वाहिश क़ुदरती प्रक्रिया है. जैसे-जैसे यौन सबंध के प्रति लोगों की सोच बदल रही है, वैसे-वैसे लोगों ने गे और लेस्बियन रिश्तों को भी स्वीकार करना शुरू कर दिया है. हाल ही में 141 देशों में की गई रिसर्च ये बताती है कि 1981 से 2014 तक एलजीबीटी समुदाय को स्वीकार करने की दर में क़रीब 57 फ़ीसद इज़ाफ़ा हुआ है. इसमें मीडिया, मेडिकल सपोर्ट और मनोवैज्ञानिक संस्थाओं के सकारात्मक साथ ने बहुत अहम रोल निभाया है. इसके अलावा आज पोर्न देखने का चलन जितना बढ़ चुका है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि लोगों में सेक्स की भूख कितनी ज़्यादा है. पोर्न देखने से कुछ मिले या ना मिले, लेकिन जानकारों का तो यहां तक कहना है कि भविष्य में सेक्स और भी ज़्यादा डिजिटल और सिंथेटिक हो जाएगा. यही नहीं भविष्य में सेक्स के और भी नए-नए तरीक़े सामने आ सकते हैं. अभी तक टेस्ट ट्यूब और आईवीएफ़ को वही लोग अपना रहे हैं, जो प्राकृतिक तरीक़े से बच्चा पैदा करने में असफल हैं. हो सकता है आने वाले समय में सभी लोग इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू कर दें. बच्चा पैदा करने के लिए नर और मादा के अंडों का मिलन ज़रूरी है. लेकिन गे और लेस्बियन के संदर्भ में ये संभव नहीं है. लिहाज़ा ऐसे लोग बच्चे की चाहत पूरी करने के लिए इस तकनीक का ख़ूब इस्तेमाल कर रहे हैं. बॉलीवुड में इसकी कई मिसालें मौजूद हैं. कमिटमेंट और शादी जैसे रिश्तों को लेकर भी बहुत से नए आइडिया अभी सामने आ सकते हैं. बीमारियों पर नियंत्रण के बाद इंसान की उम्र भी बढ़ गई है. 1960 से 2017 तक इंसान की औसत उम्र क़रीब 20 साल बढ़ चुकी है. एक अंदाज़े के मुताबिक़ 2040 तक इसमे 4 साल का और इज़ाफ़ा हो जाएगा. अमरीकी जीव वैज्ञानिक और भविष्यवादी स्टीवेन ऑस्टाड के मुताबिक़ आने वाले समय में हो सकता है कि इंसान 150 बरस तक जिए. इतनी लंबी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक ही सेक्स पार्टनर के साथ गुज़ारा मुश्किल होगा. लिहाज़ा वो समय-समय पर अपना यौन संबंध का साथी बदलता रहेगा. और इसकी शुरुआत हो चुकी है. बड़े शहरों में इसकी मिसालें ख़ूब देखने को मिलती हैं. तलाक़ के मामले बढ़ रहे हैं. 2013 के सर्वे के मुताबिक़ अमरीका में हर दस में से चौथे जोड़े की दूसरी या तीसरी शादी होती है. आने वाले समय में कमिटमेंट और शादीशुदा ज़िंदगी को लेकर भी कई नए आइडिया सामने आ सकते हैं. क़ुदरत अपने मुताबिक़ इंसान को बदलती रही है और बदलती रहेगी. अब बदलाव हमें अपनी सोच में करने की ज़रूरत है. सेक्स और सेक्शुअल पसंद को लेकर हमें अपने विचार बदलने की ज़रूरत है. वो दिन दूर नहीं जब सारी दुनिया सेक्स को ख़ुशी और मनोरंजन का माध्यम यानी सिर्फ़ सेक्स ही मानेगी. न कि बच्चे पैदा करने का माध्यम.
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आपके लुक्स से तय होती है आपकी शख़्सियत

Date : 10-Jul-2019
10 जुलाई 2019 इंसान की शख़्सियत कई चीज़ों के मेल से बनती है. इसमें सबसे बड़ा रोल हमारी पढ़ाई-लिखाई और रहन-सहन का होता है. इसके बाद नंबर आता है लिबास का. आप कैसे कपड़े पहनते हैं, इसका आपकी शख़्सियत पर बहुत गहरा असर पड़ता है. पर, बात यहीं पर नहीं ख़त्म होती. एक और चीज़ बहुत अहम हैं, वो हैं इंसान के नैन-नक़्श और क़द-काठी. दूसरे के साथ आपका बर्ताव भी शख़्सियत का अहम हिस्सा होता है. रिसर्च बताती हैं कि हमारा चेहरा-मोहरा न सिर्फ़ सामने वाले पर असर डालने में अपना रोल निभाता है. बल्कि, ये शख़्सियत के बहुत से पहलुओं पर भी असर डालते हैं. इससे हमारी सोच भी प्रभावित होती है. यहां तक कि रूमानी रिश्ते बनाने में भी हमारे चेहरे-मोहरे का अहम रोल होता है. जैसे कि बातूनी लोगों का सामाजिक दायरा काफ़ी बड़ा होता है. क्योंकि वो सबसे बात-चीत करते हैं. विचारों का आदान-प्रदान करते हैं. इससे उन्हें ख़ुद भी अपनी अलग विचारधारा बनाने में मदद मिलती है. इससे उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ता है, और उनके व्यक्तित्व में निखार आता है. एक जर्मन यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक़ जो लोग लंबे-चौड़े और सेहतमंद होते हैं, वो बोलने वाले भी ज़्यादा होते हैं. क्योंकि उनके ज़हन में कहीं ना कहीं ये बात होती है कि वो जिस्मानी तौर पर दूसरे से बेहतर हैं. और बेहतरी का यही एहसास उनमें आत्मविश्वास जगाता है. लेकिन, यही बात औरतों पर इसके उलट लागू होती है. अगर महिलाएं लंबे-चौड़े शरीर वाली होती हैं, तो ये उनमें आत्मविश्वास कम कर देता है. क्योंकि दुनिया भर में आम तौर से महिलाएं मर्दों के मुक़ाबले दुबले-पतले शरीर और कम लंबाई वाली होती हैं. ऐसे में अगर किसी महिला का शरीर आम महिलाओं से हटकर होता है, तो ये उसके ख़िलाफ़ जाता है. दरअसल शारीरिक शक्ति, ज़्यादा बोलना और आक्रामकता के बारे में रिसर्च मर्दों को ज़हन में रखकर हुई हैं. क्योंकि विकासवादी सिद्धांत के मुताबिक़ समाज में अन्य प्रजातियों से लड़कर परिवार बनाने का काम हमेशा से मर्द का रहा है. इसीलिए लहीम-शहीम और ताक़तवर आदमियों को समाज में अलग नज़र से देखा जाता है. उनके शरीर की बनावट उन्हें समाज में अलग रुतबा दिलाती है. कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में मर्द और औरत दोनों को ज़हन में रखकर शारीरिक मज़बूती और खुलकर विचार रखने के पहलुओं पर रिसर्च हुई. लेकिन, इस रिसर्च में भी मर्दों का पलड़ा भारी पाया गया. एक रिसर्च तो यहां तक कहती है कि मज़बूत शरीर और अच्छे नैन-नक़्श वाले मर्द महिलाओं के साथ जल्दी घुल-मिल जाते हैं. अगर इतिहास पर भी नज़र डालें, तो हम पाते हैं कि हमारे जितने भी पूर्वज शारीरिक रूप से ज़्यादा सक्षम और अच्छी शख़्सियत के मालिक रहे हैं, उनके बच्चे भी ज़्यादा रहे हैं. हालिया रिसर्च भी इस ओर इशारा करती हैं कि ऐसे मर्दों को अपना रोमांटिक पार्टनर ज़्यादा जल्दी मिल जाते हैं. उनके कई रूमानी रिश्ते बनने की संभावना होती है. इसी वर्ष प्रकाशित होने वाली एक रिसर्च तो ये भी दावा करती है कि शारीरिक रूप से मज़बूत मर्द की सोच सियासी मामलों में भी अलग होती है. इस रिसर्च में अमरीका, डेनमार्क और वेनेज़ुएला जैसे 12 देशों के पुरुष शामिल थे. रिसर्च में पाया गया कि शारीरिक रूप से आकर्षक और दमदार शख़्सियत वाले ज़्यादातर पुरुष राजनीतिक समतावाद के ख़िलाफ़ थे. जबकि महिलाओं के संबंध में ऐसी रिसर्च के नतीजे मिले-जुले हैं. हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे विचार, रिश्तों में कमिटमेंट, दूसरों के साथ बर्ताव, सियासी विचारों में लेफ़्ट या राइट विंग होना या तो हमारे दिमाग़ का खेल होता है. या फिर कोई रूहानी ताक़त हम से ऐसा कराती है. लेकिन हाल की रिसर्च के मुताबिक़ शख़्सियत के इन पहलुओं पर शारीरिक बनावट और चेहरे मोहरे का भी गहरा असर होता है. हालांकि अभी इस तरह की रिसर्च भी विवादों के दायरे में हैं.
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