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सेक्स काफी हद तक पुरुष केंद्रित हो चुका है, इसमें महिलाओं के लिए ज्यादा कुछ नहीं बचा है- एना

Date : 04-Dec-2019
ब्रिटेन में 40 साल से कम उम्र की एक तिहाई से ज्यादा महिलाओं ने माना है कि सहमति से बनाए जा रहे सेक्स संबंधों के दौरान पार्टनर ने उन्हें थप्पड़ मारा, गला दबाया, हाथ-पैर बांध दिए या फिर थूक दिया. इनमें से किसी भी तरह की हिंसा झेलने वाली महिलाओं में 20 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि इस दौरान वे काफी डर गईं या फिर अपसेट हो गईं. 23 साल की एना बताती हैं कि उन्हें तीन तीन अलग अलग मौकों पर अलग पार्टनर के साथ बनाए गए सेक्स संबंधों के दौरान ऐसी हिंसा का सामना करना पड़ा. उनके साथ इसकी शुरुआत बाल खींचने से हुई फिर थप्पड़ खाने पड़े और इसके बाद उनके पार्टनर ने उनका गला दबाने की कोशिश की एना बताती हैं, मैं काफी हैरान थी. मैं काफी असहज और भयभीत महसूस कर रही थी. अगर कोई आपको गली में थप्पड़ मारे या फिर गला दबाए तो यह उत्पीड़न का मामला बन सकता है. क्या है वजह? एना ने जब इसके बारे में अपने दोस्तों से बातें कीं तो उन्हें पता चला कि यह एक सामान्य बात होती जा रही है. एना बताती हैं, ज़्यादातर लड़के इन कामों में सारे तरीके नहीं अपनाते हों लेकिन कम से कम एक काम तो करते ही हैं. एक दूसरे मौके पर उनके साथी ने उनका गला दबाने की कोशिश की थी, वह भी बिना सहमति के और बिना किसी चेतावनी के. उनका एक पार्टनर इतने बलपूर्वक अंदाज़ में पेश आता था कि उनके शरीर पर जख्म के निशान उभर आते थे और वे कई दिनों तक दर्द महसूस करती थीं. एना कहती हैं, मुझे मालूम है कि कुछ महिलाएं कहेंगी कि वे ये सब पसंद करती हैं. लेकिन समस्या यह है कि पुरुष अनुमान लगाते हैं कि हर महिला ऐसा ही चाहती है. रिसर्च कंपनी सेवांता कॉमरेज ने 18 से 39 साल की 2002 ब्रितानी महिलाओं से पूछा कि सहमति से बनाए गए सेक्स संबंधो के दौरान क्या उन्हें किसी तरह की हिंसा का सामना करना पड़ा है, जिसमें पार्टनर ने उन्हें थप्पड़ मारा हो या फिर गला दबाने की कोशिश की हो या हाथ-पैर बांध दिए या फिर थूक दिया, जो एकदम आवांछित भी रहा हो. इस सैंपल साइज में ब्रिटेन के प्रत्येक हिस्से और हर आयु वर्ग की महिलाएं शामिल हों, इसका ध्यान रखा गया था. इनमें 38 प्रतिशत महिलाओं ने माना है कि उनके साथ ऐसी हिंसा होती है और इनमें कुछ मौकों पर तो यह बिलकुल अवांछित होती है. वहीं 31 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि कई बार ऐसी हिंसा अवांछित नहीं होती है जबकि 31 प्रतिशत महिलाओं ने कहा उन्हें ऐसा अनुभव नहीं हुआ है या फिर वे कुछ कहना नहीं चाहतीं. सेंटर फॉर वीमेंस जस्टिस ने बताया है कि इन आंकड़ों से यह ज़ाहिर होता है कि युवा महिलाओं पर सहमति के सेक्स संबंधों के दौरान हिंसक, ख़तरनाक होने और खुद को नीचा दिखाने वाली हरकतें करने का दबाव बढ़ रहा है. संस्था के मुताबिक, एक्स्ट्रीम स्तर वाली पोर्नोग्राफी की सहज उपलब्धता, आम लोगों तक उसकी पहुंच और उसके इस्तेमाल के चलते ऐसा होने की आशंका है. वीमेंस एड की कार्यकारी चीफ़ एक्जीक्यूटिव एडिना क्लेयर कहती हैं,40 साल से कम उम्र की महिलाओं को ना जाने कितनी बार यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है, खासकर उन पार्टनर से जिनके साथ वे सहमति से सेक्स संबंध बनाती है, लेकिन तब भी वे डर में होती हैं, अपमानित होती हैं. सेक्स के लिए सहमत हो जाने के बाद भी हिंसा यानी थप्पड़ खाना, गला दबाने जैसी हिंसा होने की आशंका कम नहीं होती. मैं डर गई थी एमा की उम्र 30 साल से ज्यादा है और वे हाल फिलहाल लंबे समय के रिलेशनशिप से बाहर निकलीं हैं. इसके बाद उन्होंने किसी के साथ वन नाइट स्टैंड वाला संबंध बनाया. एमा बताती हैं, हम बिस्तर पर पहुंच गए और सेक्स के दौरान- बिना किसी चेतावनी- के उसने मेरा गला दबाना शुरू कर दिया. मैं सदमे में आ गई और काफी डर गई. मैंने उसे कुछ कहा नहीं क्योंकि उस वक्त मुझे लग रहा था कि वह मुझ पर जोर जबर्दस्ती कर सकता है. एमा के मुताबिक उसके पार्टनर का रवैया काफी हद तक पोर्नोग्राफी से प्रभावित था. वह कहती हैं, मुझे लगा है कि यह सब उसने ऑनलाइन देखा होगा और रियल लाइफ़ में भी उसे आजमाना चाहता है. इस रिसर्च में यह भी पता चला है कि सहमति से बनाए गए सेक्स संबंधों के दौरान हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं में 42 प्रतिशत ने माना है कि उस वक्त उन्हें दबाव, मजबूरी या जोर जबर्दस्ती का भाव भी महसूस होता है. हिंसा अब आम बात स्टीवन पोप सेक्स एवं रिलेशनशिप में विशेषज्ञता रखने वाले मनोचिकित्सक हैं. उन्होंने बताया कि ऐसी हिंसा के नाकारात्मक प्रभावों पर वे लंबे समय से काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा, यह चुपचाप फैल चुकी महामारी है. लोग ऐसा करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह सामान्य बात है, लेकिन यह काफी हानिकारक है. हमने कई मामलों में देखा है कि इससे रिलेशनशिप पर असर पड़ता है और सबसे खराब बात यहा है कि ऐसी हिंसा को महिलाएं स्वीकार करने लगती हैं. स्टीवन पोप इस बात पर चिंता जताते हैं कि जो लोग ऐसी हिंसा करते हैं उन्हें इसके खतरे के बारे में मालूम नहीं होता. स्टीवन पोप कहते हैं, लोग जब मरने से बचते हैं तब मेरे पास आते हैं. गला दबाने पर जब उनका दम घुटना खतरनाक स्तर को पार कर जाता है तो कई बार वे लंबे समय तक बेहोश भी हो जाते हैं. यह हमेशा खतरनाक होता है लेकिन लोग इसके बारे में नहीं सोचते हैं. इस मुद्दे पर कैंपेन चलाने वाली फियोना मैकेंजी सर्वे के निष्कर्ष को काफी भयावह बताती हैं. फियोना कहती हैं, मुझे नियमित तौर पर ऐसी महिलाएं मिल रही हैं जिन्हें सहमति से बनाए सेक्स संबंधों के दौरान ऐसी हिंसा का सामना करना पड़ा है या फिर उन्हें मौखिक दुर्व्यवहार झेलना पड़ा. कई मामलों में तो महिलाओं को शुरुआत में इसका पता हीं नहीं चलता है कि यह उत्पीड़न है. फियोना ने जब सहमति से बनाए गए सेक्स संबंधों में हिंसा के मामलों में बढ़ोत्तरी देखी तो उन्होंने एक कैंपेन समूह- वी कैन नॉट कंसेंट टू दिस, शुरू किया. उनके मुताबिक कई मामले ऐसे थे जिसमें सेक्स संबंधों में दौरान कई महिलाओं की हत्या तक हो गई है और सहमति का इस्तेमाल बचाव के लिए किया गया. एना बताती हैं कि सेक्स काफी हद तक पुरुष केंद्रित हो चुका है, इस पर पोर्नोग्राफी का इतना ज्यादा असर है कि इसमें महिलाओं के लिए ज्यादा कुछ नहीं बचा है. एना ये भी बताती हैं कि सेक्स के दौरान हिंसा अब आम बात है. वे कहती हैं, वे आम लड़के होते हैं. उनमें अलग कुछ नहीं होता है, लेकिन मेरे ख्याल से वे पोर्नोग्राफी बहुत ज्यादा देखते हैं. वे पोर्नोग्राफी देखते हैं और अनुमान लगा लेते हैं कि महिलाएं ऐसा ही चाहती हैं, वो भी बिना पूछे. यह शोध अध्ययन हाल में ब्रिटिश टूरिस्ट ग्रेस मिलाने की न्यूज़ीलैंड में हुई हत्या और हत्या के दोषी पुरुष की ओर से अदालत में बचाव के लिए रफ सेक्स की दलील के बाद सामने आया है. ग्रेस मिलाने की हत्या के दोषी ने अदालत में बताया था कि रफ सेक्स के दौरान ग्रेस की मौत हुई थी, हालांकि अदालत ने उन्हें ग्रेस की हत्या किए जाने का दोषी पाया.
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BDD की शिकार किसी महिला से प्यार करना क्या मुश्किल है?

Date : 24-Sep-2019
24 सितंबर 2019 वो हंसमुख हैं, सुंदर हैं, नीली आंखें और लंबे बाल जिन्हें वो अक्सर नए रंग में रंगती हैं. फ़िलहाल उसके बालों का रंग चटख़ लाल है और उसकी मुस्कान बहुत ही प्यारी है. लेकिन लिएन को अपना रूप पसंद नहीं है. वो दिन में कई बार कहती हैं कि वो कुरूप हैं. वो कहती हैं कि वो मोटी हैं जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है. उन्हें लगता है उनका चेहरा कुछ टेढ़ा है जबकि वास्तव में उनका चेहरा सुडौल है. 2015 में हमारी मुलाक़ात टिंडर के ज़रिए हुई. लिएन को वो पसंद था क्योंकि टिंडर पर लगाइ गयी अपनी तस्वीरों में वो कैसी दिखती हैं इसे वो नियंत्रित कर सकती थीं. पहली कुछ मुलाक़ातों के दौरान लगा कि उनमें काफ़ी आत्मविश्वास था. इससे पहले इतनी जल्दी मुझे किसी के साथ इतना सहज महसूस नहीं हुआ था. उनमें ऐसा कुछ था कि मैं पूरी तरह उनकी ओर आकर्षित हो गया. हम दोनों के बीच एक ज़बरदस्त जुड़ाव था और कुछ ही महीनों में मुझे लगा कि मुझे उनसे प्रेम होने लगा है. लिएन के साथ संबंध बनने के छह महीने के भीतर ही स्पष्ट हो गया कि लिएन की अपने शरीर और रूप को लेकर जो समस्या थी वो मात्र आत्मविश्वास की कमी नहीं बल्कि उससे ज़्यादा गंभीर समस्या थी. एक बार हम दोनों साथ बाहर जाने के लिए तैयार हो रहे थे और पता चला कि उनका हेयर स्प्रे ख़त्म हो गया है. मैंने देखा कि इस बात से वो बहुत नाराज़ हो गयी थीं और यह सोच कर परेशान हो रही थीं कि उनके बाल कैसे लगेंगे. तो मैं बाहर दुकान पर गया और उनके लिए एक नया हेयर स्प्रे ख़रीद लाया. वो स्प्रे उस स्प्रे से कुछ अलग था जिसे वो हमेशा इस्तेमाल करती थीं. इस बात पर वो बेहद नाराज़ हो गयीं, यहां तक कि चीज़ें फेंकने लगीं. हम दोनो के बीच काफ़ी झगड़ा हुआ. जब हम दोनो शांत हुए तो मुझे अहसास हुआ कि अपने बारे में उनकी नकारात्मक बातें और अपने रूप को लेकर हर काम एक ख़ास तरीक़े से ही करने की ज़िद सही या सामान्य नहीं है. मैं स्वयं भी ओब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) से प्रभावित रहा हूं. यह एक मानसिक बीमारी है लेकिन मैं उसे नियंत्रण में रख पाता था. मुझे लगा कि उन्हें भी शायद ओसीडी है. मैंने उन्हें सुझाव दिया कि उन्हें डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. हालांकि शुरू में वो इस बात के लिए आश्वस्त नहीं लगीं लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें इस बात से कुछ राहत ज़रूर महसूस हुई कि हमने खुलकर इसके बारे में बात की. बॉडी डिसमॉर्फ़िक डिसऑर्डर तब इस बात का पता चला कि वो एक मनोविकार से पीड़ित है जिसे बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (बीडीडी) कहते हैं. ऐसा माना जाता है कि विश्व की 2% आबादी इससे प्रभावित है. इस मानसिक बीमारी से प्रभावित लोगों को लगता है कि वे कुरूप दिखते हैं. वे अपने रूप की तुलना और लोगों से करते हैं. ऐसे लोग अपने शरीर के किसी विशेष अंग, और आम तौर पर चेहरे को लेकर परेशान रहते हैं. लिएन ने बीडीडी का इलाज करवाने के लिए थेरेपी शुरू कर दी थी. हालांकि उन्हें पता चल गया था कि वो इस मानसिक बीमारी से प्रभावित हैं फिर भी इस बीमारी के साथ निबाह पाना कठिन होता है. हालांकि मैं इस बीमारी से प्रभावित नहीं हूं लेकिन लिएन के साथ रहने का अर्थ है कि यह बीमारी मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गयी है. बीडीडी की वजह से रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अनअपेक्षित स्थितियां पैदा हो जाती हैं. जैसे कि एक बार हम शरबत पीने एक ज्यूस बार में गए लेकिन वहां पहुंचकर लिएन ने भीतर जाने से मना कर दिया क्यों कि वहां एक लड़की बैठी थी, जो लिएन के मुताबिक़ उससे कहीं अधिक सुंदर थी. कभी-कभी यह स्थितियां डरावनी भी हो सकती हैं. अपने रूप को लेकर नकारात्मक भावनाओं की वजह से लिएन कई बार कहती हैं कि उनका मन करता है कि वो अपना चेहरा नोंच लें या अपने बाल जला दें. एक बार तो मैं वहीं मौजूद था जब उन्होंने वाक़ई अपने बाल जलाने की कोशिश की. मैंने उसके हाथ से लाइटर छीन लिया और बालों से दूर कर दिया. उस समय हमारे संबंधों की शुरूआत हुए दो महीने ही हुए थे. मैं बहुत घबरा गया था और समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहूं. और उन्हें कैसे रोकूं. सबसे मुश्किल बात यह है कि हमारा संबंध अंतरंग नहीं है. लिएन के लिए मेरे सामने निर्वस्त्र होना बहुत ही कठिन है. पिछली बार जब हमने संभोग करने का प्रयास किया तो हम ज़्यादा आगे नही बढ़ पाए. यानि वो प्रयास संभोगपूर्व क्रिड़ा या फ़ोर प्ले तक सीमित रहा. मैं हमेशा प्रयास करता हूं कि उसे जिस तरह जो करना है वो करने दूं ताकि वो असहज ना महसूस करे. मगर परेशानी की बात यह है कि आमतौर पर वह चाहती है कि मैं पहल करूं. इससे होता यह है कि हम कभी कभार ही एक दूसरे के साथ थोड़ा कुछ कर पाते हैं. यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उस समय लिएन कैसा महसूस कर रहीं हैं. हम शुरूआत करते हैं, लेकिन उनके भीतर अपने आप के बारे में नकारात्मकता की वजह से सहजता नहीं होती और हम रुक जाते हैं. मुझे लगता है जैसे मेरी ज़िदगी चाक़ू की धार पर चल रही है. सेक्स भले ही सबसे महत्वपूर्ण बात ना हो, लेकिन वो निश्चित ही जीवन का एक बड़ा हिस्सा है. अपनी समस्या का ख़ुद इलाज करने के लिए मैं पॉर्न का इस्तेमाल करता हूं. लिएन बहुत नाराज़ हुई जब उसने पाया कि मेरे फ़ोन में पॉर्न सामग्री है. वो नहीं चाहती कि मैं पॉर्न देखूं क्योंकि उन्हें लगता है कि मुझे पॉर्न देखना उनके साथ सेक्स करने से ज़्यादा पसंद है. हमने एक दूसरे के साथ सेक्स के लिए नज़दीकियां बढ़ाने के कई तरीक़े आज़माए, जैसे रात में डेट पर जाना, मेरा उसे यह बताना कि वह कितनी आकर्षक लगती है, तैयार होने के लिए उसे बहुत सारा समय देना. लेकिन अगर वह अपने आप को लेकर सहज नहीं हो पाए तो यह बहुत ही कठिन है. इसका परिणाम यह है कि हम अपने भविष्य के लिए कोई योजना नहीं बना सकते. हम दोनो 29 साल के हैं. यह ऐसी उम्र है जब उसके सभी दोस्तों की शादी हो रही है. इन गर्मियों में हमें कुछ शादियों में शामिल होना है. हमने शादी और बच्चे पैदा करने के बारे में बातें की. मै चाहूंगा कि हमारे बच्चे हों. उसके साथ बातें एक चरम से दूसरे चरम पर जाती हैं. लिएन कभी कहती हैं वो शादी करना चाहेगी, लेकिन उनके भीतर का बीडीडी कहेगा - नहीं . क्योंकि उन्हें लगता है कि बच्चा पैदा करने से उनके शरीर पर असर पड़ सकता है. फ़िलहाल बीडीडी के इलाज के लिए उनकी थेरेपी चल रही है और उससे मदद भी मिल रही है. लेकिन कई बार मुझे यह भी लगा कि हमें अलग हो जाना चाहिए. एक बार एक संगीत कार्यक्रम के बाद हम दोनों कुछ दोस्तों के साथ एक पब में चले गए. वहां कुछ और दोस्त आ गए जिनके साथ कुछ महिलाएं थीं जो उनकी परिचित थीं. लिएन बहुत नाराज़ हो गयी. मुझे लगता है शायद उन्हें लगा वो उन महिलाओं की तुलना में बदसूरत हैं. वो मुझ पर बरसने लगीं और फिर ग़ुस्से में वहां से चली गयीं. शायद यह उनकी रक्षात्मक प्रतिक्रिया है. हम लोग डेढ़ साल से साथ थे और ऐसी छोटी-छोटी घटनाएं बढ़ती जा रही थीं. वो अकसर ऐसा करती थीं कि किसी दुकान या बार में गयी हों और वहां किसी को देख कर उनका बीडीडी हावी हो जाता था और वो वहां से निकल जाती थीं या मुझ पर बरस जातीं उस दिन पब में हुई घटना के बाद मैंने उनसे कह दिया कि यह बर्ताव हद से बढ़ता जा रहा है. मैंने कहा उन्हें डॉक्टर से मदद लेनी चाहिए क्योंकि मेरे लिए इससे निबटना मुश्किल होता जा रहा है. कई बार लगता है कि वह एक नहीं बल्कि दो व्यक्ति हैं. बीडीडी जैसे उसके भीतर मौजूद जानवर की तरह है. मैंने तय कर लिया है कि जब भी वह कहे कि, मैं कुछ ख़ास नहीं लग रही तो मैं सीधे उसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दूंगा, बल्कि बस उसका हाथ सहला दूंगा या उसे आलिंगन दूंगा. काफ़ी समय तक मैंने इस बारे में अपने दोस्तों या परिवार में किसी से बात नहीं की. मैंने सोचा, यह लिएन का निजी मामला है. फिर पिछले वर्ष हताश होकर अपनी भड़ास निकालने के लिए मैंने अपने माता-पिता से इस बारे में बात की. दोनों ने मुझे सहानुभूति और संवेदनशीलता से सुना. मेरी मां मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करती हैं और लिएन की स्थिति समझती हैं. हालांकि उनकी मुख्य रूचि इस बात में है कि मैं ख़ुश रहूं. मैं उन्हें बार-बार आश्वस्त करता हूं कि मैं ख़ुश हूं. दोस्तों की बात अलग है. उन्हें हाल ही में बीडीडी के बारे में पता चला. उनके लिए यह समझ पाना सबसे मुश्किल था कि मेरे और लिएन के बीच अंतरंग संबंध नहीं थे. मैं तो इससे बिल्कुल नहीं निबट पाता जैसी कई प्रतिक्रियाएं सुनने को मिलीं. लेकिन मुझे अपने और लिएन के बीच प्यार पर पूरा विश्वास है. मैं हर दिन को वो जैसा है वैसे स्वीकार करता हूं और हमारे बीच के अच्छे पलों का आदर करता हूं. हम रोज़ हंसते हैं, ख़ुश होते हैं, एक दूसरे से सब कुछ साझा करते हैं. वह अभी भी मेरी सबसे अच्छी दोस्त है. मुझे पता है शायद लिएन का बीडीडी कभी ख़त्म नहीं होगा. लेकिन मैं ऐसे मक़ाम तक पहुंचना चाहता हूं जहां मुझे हमेशा यह ना महसूस हो कि मैं बहुत ही नाज़ुक स्थिति से गुज़र रहा हूं. मै ऐसी स्थिति में आना चाहता हूं जहां मैं उसे अपने आप से संतुष्ट पाऊं, वो जैसी है उसे लेकर उनमें आत्मविश्वास हो.
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परिवारों में बच्चों की जगह ले रहे हैं पालतू जानवर

Date : 21-Sep-2019
 21 सितम्बर 2019 अमरीकी राज्य मिशिगन के यप्सिलेंटी में लिसा रोचोव अपने पार्टनर कैमरन व्हीलर के साथ बैठी हैं. उनका हस्की पिल्ला ऐरी उनकी गोद में है और सोफ़े पर मंडराने की कोशिश कर रहा है. ऐरी परिवार का नया सदस्य है. रोचोव और व्हीलर पहली बार माता-पिता बनकर संतुष्ट दिख रहे हैं. ऐरी उनकी औलाद है. 24 साल की रोचोव सामाजिक कार्य में स्नातक कर रही हैं और 26 साल के व्हीलर हाई स्कूल में इतिहास के शिक्षक हैं. नौ हफ़्ते का ऐरी उनके परिवार को पूरा करता है. रोचोव कहती हैं, मुझे लगता है कि मां बनने के लिए मुझे अपनी ज़िंदगी का काफ़ी कुछ छोड़ना होगा. उसमें पैसे ख़र्च होंगे, समय बर्बाद होगा और जो मैं करना चाहती हूं वह नहीं कर पाऊंगी.वो नहीं चाहती थीं कि हाई स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही वह मां बन जाएं. इसलिए बच्चों से मुक्त रहना और एक पिल्ले को पालना हमेशा उनके ज़हन में था. एक संगीत समारोह में जब व्हीलर से उनकी मुलाकात हुई तो वो भी कुछ ऐसा ही सोच रहे थे वो कहते हैं, कॉलेज के दिनों में, शायद स्नातक के दौरान, मैं राजनीतिक परिवेश में ज़्यादा जुड़ने लगा और मैंने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बहुत कुछ सीखा. मेरा ख़याल है कि मेरे लिए यह उचित नहीं होगा कि मैं इस दुनिया में एक बच्चे को लेकर आऊं. बच्चों की जगह पालतू जानवर यह दंपती तेज़ी से बढ़ते उस मुखर समूह का हिस्सा है जिसने पूरी तरह बच्चों से मुक्त रहने का फ़ैसला किया है. उनको लगता है कि बच्चे नहीं होने पर वो जो पैसे बचाएंगे उसे वे अपने करियर को आगे बढ़ाने और अपने शौक पूरे करने में ख़र्च कर सकते हैं. इतना ही नहीं, इससे ऐरी जैसे जानवरों का जीवन भी बेहतर होगा. पिछले कई दशक से अमरीका और ब्रिटेन में बिना बच्चों वाले विवाहित जोड़ों की तादाद बढ़ी है. अमरीकी जनगणना ब्यूरो के मुताबिक 1970 में अमरीका के 40 फ़ीसदी विवाहित दंपतियों के बच्चे थे. 2012 में बच्चों वाले दंपति सिर्फ़ 20 फ़ीसदी रह गए. हालांकि इन आंकड़ों में बच्चों वाले अविवाहित जोड़े शामिल नहीं हैं, फिर भी इससे पारंपरिक परिवार इकाइयों में आए बदलाव का पता चलता है. यूएस ब्यूरो ऑफ़ लेबर स्टैटिस्टिक्स के शोध से पता चला है कि 2007 से 2011 के बीच बिना बच्चों वाले विवाहित जोड़ों ने अन्य सभी तरह की पारिवारिक इकाइयों की तुलना में पालतू जानवरों पर ज़्यादा ख़र्च किया पालतू जानवरों को बच्चे जैसा प्यार इन आंकड़ों में वे जोड़े भी शामिल हो सकते हैं जिनके बच्चे बड़े हो गए और अब अलग रहते हैं. माइने यूनिवर्सिटी में समाज विज्ञान की प्रोफ़ेसर डॉक्टर एमी ब्लैकस्टोन का कहना है कि बच्चों से मुक्त परिवार अपने पालतू जानवरों के साथ संबंध के जरिये अपने लालन-पालन के पक्ष को व्यक्त करते हैं. डॉक्टर ब्लैकस्टोन 2008 से ही बच्चों से मुक्त विकल्प पर शोध कर रही हैं. वो कहती हैं, मैं पेशेवर से ज़्यादा निजी तौर पर कुछ जानने के लिए इस क्षेत्र में आई. यूनिवर्सिटी में स्थायी जगह के लिए जिन दिनों वह अपने काग़जात जमा कर रही थीं, उन्हीं दिनों उनकी तीन करीबी दोस्तों ने अपने गर्भवती होने के बारे में बताया. उन्होंने तय किया कि वह मातृत्व पर शोध करेंगी. मेरे दोस्तों ने मुझे बताया था कि वे मातृत्व की ओर खिंच रही हैं. उस वक़्त मुझमें वैसी भावनाएं नहीं थीं. ब्लैकस्टोन को पहले तो लगा कि उनके साथ कुछ गड़बड़ी है. उन्होंने अपने हाईस्कूल के दोस्त लांस से शादी की थी और दोनों खुश थे. पहले उन्होंने बच्चों के बारे में चर्चा की थी लेकिन बहुत जवान होने के कारण उन्होंने यह विचार स्थगित कर दिया था. करीब 35 साल की होने पर उन्हें लगा कि उनके बच्चे होने चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हममें से कोई भी उस समय इसमें दिलचस्पी नहीं ले रहा था. ब्लैकस्टोन और उनके पति के पास एक बिल्ली थी, लेकिन पता चला कि दोनों को उससे एलर्जी थी. बच्चों से मुक्त ज़िंदगी के बारे में और जानने के लिए ब्लैकस्टोन कई दंपतियों और व्यक्तियों से मिलीं जो अपने पालतू जानवरों को बच्चों की तरह मानते थे. तलाक़ के बाद पालतू जानवरों की कस्टडी का विवाद ब्लैकस्टोन ने एक ऐसे व्यक्ति का इंटरव्यू किया जिनकी अपनी संतान नहीं थी और उन्होंने एक कुत्ता पाल रखा था. उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी क्योंकि जानवरों के डॉक्टर ने उनको बताया था कि उनका कुत्ता मरने जा रहा है. वह अपने प्यारे कुत्ते की ज़िंदगी के आख़िरी हफ़्तों में उसके साथ रहना चाहते थे. ब्लैकस्टोन कहती हैं, उन्होंने अपने कुत्ते की देखरेख की, जैसे कोई अपने बच्चे या बीमार मां-बाप की करता है. एक निःसंतान दंपति ने तलाक़ लिया तो अपनी बिल्लियों की कस्टडी हासिल करने पर अड़े रहे. दोनों उन बिल्लियों को अपने बच्चे की तरह समझते थे. आख़िर में एक पार्टनर को बिल्लियों को अपने घर पर रखने का अधिकार मिला और दूसरा उनसे नियमित रूप से मिलने के अधिकार पर राजी हुआ. न्यूयॉर्क सिटी के चित्रकार बेन लेनोवित्ज़ एक बे-औलाद दंपति के बारे में बताते हैं जिन्होंने अपने पालतू जानवरों के पोर्ट्रेट बनवाए थे. उन्होंने अपने एक कुत्ते को 2012 के हरिकेन सैंडी के बाद लावारिस हालत में पाया था. लेनोवित्ज़ कहते हैं, वह जिस तरह से अपने कुत्ते के बारे में बातें करते थे, लगता था कि वह उनका बच्चा है.  फ़र वाले बच्चे  इंटरनेट पर फ़र बेबी सर्च करेंगे तो आपको निःसंतान जोड़ों के लिए पालतू जानवर की कई परिभाषाएं मिलेंगी. लेकिन पालतू जानवरों के बच्चों की जगह लेने का मुद्दा बच्चे-मुक्त समुदाय के लिए भी विवादित विषय है. आर/चाइल्डफ्री सबरेडिट के 5 लाख 94 हजार सदस्य हैं. वे अपने बच्चे-मुक्त ज़िंदगी पर चर्चा करते हैं. बच्चों और पालतू पशुओं को बराबर बताने पर कुछ की भौहें तन जाती हैं. वहीं कुछ लोग आसानी से यह स्वीकार कर लेते हैं कि उनके पास बच्चों की जगह बिल्लियां हैं. विवाहित मगर बे-औलाद फ़िल्म निर्माता मैक्सिन ट्रंप की फ़िल्म टु किड ऑर नॉट टु किड निःसंतान रहने वाले लोगों के बारे में फैली धारणाओं को तोड़ती है. वो कहती हैं, हम अपनी बिल्लियों को अपने परिवार को हिस्सा समझते हैं. लेकिन मैं उनको मेरा बच्चा कहकर नहीं बुलाती. 49 साल की ट्रंप ब्रिटेन की हैं और न्यूयॉर्क और ब्रिटेन के बीच आती-जाती रहती हैं. वो अपने पति जोश ग्रेनर (45 साल) और बिल्ली ऑस्कर वाइल्ड के साथ रहती हैं. यात्राओं से भरी जीवन-शैली के कारण भी ट्रंप बच्चे नहीं चाहतीं और परिवार में एक बिल्ली ही उनके लिए ठीक है. मैं अपने दोस्तों से कुछ निराश थी. वे उनको अपना विचार बदलने के लिए कहते थे, लेकिन ट्रंप को लगता है कि फ़िल्म बनाने से उनको संतोष मिल गया. बच्चा पैदा न करना भी समझदारी भरा फ़ैसला सात साल पहले जब उन्होंने यह काम शुरू किया था तब अपनी पसंद से निःसंतान रहने के बारे में ज़्यादा जानकारियां उपलब्ध नहीं थीं. आज ऐसी ढेरों सूचनाएं मौजूद हैं. यह रोमांचक है क्योंकि यह वास्तव में ऐसा लगता है. क्या हम ऐसे लोगों के लिए, जिन्होंने यह फ़ैसला लिया है, समाज को सामान्य बना सकते हैं ताकि लोग उन्हें अजीब न समझें? अमरीका और दूसरे देशों में भी रोचोव, व्हीलर और अन्य निःसंतान जोड़ों के लिए बच्चे पैदा न करने का फ़ैसला उतना ही समझदारी भरा है जितना कि एक पालतू जानवर को अपनाना. रोचोव कहती हैं, पिछले हफ़्ते हम ऐरी के लिए थोड़े डरे हुए थे. ऐसा किसी भी नये मां-बाप के लिए तब होता है जब लगता है कि उनके बच्चे को बुखार होने वाला है. वे तुरंत ही ऐरी को पशु चिकित्सक के पास ले गए. उसे इमरजेंसी रूम में ले जाया गया. इसमें हज़ार डॉलर से कुछ कम ख़र्च हुआ. मुझे लगता है कि किसी बच्चे को एंबुलेंस में इमरजेंसी रूम ले जाया जाए या सिर्फ़ इमरजेंसी रूम में ही भेजा जाए तो 1,000 डॉलर से कम ख़र्च नहीं होगा. पैसे बचाने के अलावा रोचोव का कहना है कि उनका फ़ैसला उनको बच्चे होने के भावनात्मक बोझ से भी बचाता है. मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं. मुझे पता है कि इंसान होने का क्या मतलब है. एक बच्चे को वह सब देने में सक्षम होना चाहिए जिसकी उसे ज़रूरत है. मुझे नहीं लगता कि मैं वह सब कर सकती हूं.
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हमारे घर हमें कैसे प्रभावित करते हैं इसकी धारणा बचपन से ही बनने लगती है

Date : 21-Sep-2019
घरों का आकार हमारी ज़िंदगी को आकार देता है. बुनियादी तौर पर घर वह जगह है जहां परिवार के लोग साथ रहते हुए अपना सुख-दुख बांटते हैं. घर के आयाम और उसकी बनावट हमारे रिश्तों को विकसित होने का आधार देती है. घर के अंदरूनी हिस्सों का इस्तेमाल कैसे हो, कमरों का विभाजन किस तरह हो और खुली जगह कितनी रहे- इससे हमारे घुलने-मिलने के अवसर और सीमाएं तय होती हैं. लेकिन हमारे रिश्तों को बनाने में सिर्फ़ जगह का हाथ नहीं होता. अमरीका के उटाह प्रांत की ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी की रिसर्च रिपोर्ट 2019 के मुताबिक घर को लेकर हम जितने सकारात्मक रहते हैं, हमारे रिश्ते उतने ही स्वस्थ होते हैं. कार्ली थॉर्नोक पेशे से इंटीरियर डिजाइनर हैं. उन्होंने पश्चिमी अमरीका के 164 परिवारों पर शोध करने वाले दल का नेतृत्व किया. इन सभी परिवारों में बच्चे थे. वे अलग आय वर्ग के थे और उनके घरों का आकार अलग था- कुछ घरों में प्रति व्यक्ति 100 वर्ग फुट से भी कम जगह थी. शोधकर्ताओं ने दो साल तक इन परिवारों के चार बुनियादी पहलुओं पर भौतिक वातावरण के प्रभाव का अध्ययन किया. ये पहलू थे- स्नेह, भावनात्मक जवाबदेही, स्वीकार्यता और फ़ैसले लेना. बच्चों और उनके माता-पिता से सर्वे के कुछ सवालों के लिए रेटिंग देने को कहा गया, जैसे- घर में मुझे भीड़भाड़ लगती है, घर के सदस्यों को लगता है कि वे जैसे हैं परिवार को स्वीकार्य हैं शोधकर्ताओं ने उनके जवाब को घर के आकार, परिवार की आमदनी, कमरे और परिवार के सदस्यों की संख्या के आधार पर परखा. उन्होंने पाया कि प्रति व्यक्ति जगह बढ़ने से परिवार की ख़ुशहाली बढ़ रही थी. लेकिन इस बात ने उन्हें हैरत में डाल दिया कि जगह से ज़्यादा जगह के बारे में परिवार के ख़याल ने रिश्तों पर असर डाला. घर से जुड़ा अतीत हमारे घर हमें कैसे प्रभावित करते हैं इसकी धारणा बचपन से ही बनने लगती है. जिन घरों में हम बड़े होते हैं उनको देखकर हम घर के बारे में अवचेतन में बनी प्राथमिकताओं और धारणाओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं. डॉ. टोबी इसरायल डिजाइन साइकोलॉजिस्ट हैं. उन्होंने Some Place Like Home: Using Design Psychology to Create Ideal Places किताब लिखी है. वह मानती हैं कि हर व्यक्ति की एक विशिष्ट परिवेश आत्मकथा होती है- उस जगह से जुड़ा एक निजी इतिहास होता है जो अवचेतन में मौजूद रहता है. भौतिक स्थानों के साथ जुड़ी हमारी संवेदना समय के साथ संशोधित होती है, दोहरायी जाती है या ख़ारिज की जाती है. इसरायल का कहना है कि बचपन के घरों से मौजूदा घरों की तुलना करना उस स्थान से जुड़े अपने निजी इतिहास को जानने का मज़ेदार तरीका हो सकता है. कई बार लोग उसी तरह के ले-आउट का घर पसंद करते हैं जैसा उनके बचपन में था. कई बार वे पूरी तरह अलग ले-आउट का घर चुनते हैं. यह सब अतीत के अनुभवों पर निर्भर करता है कि आप उनको बदलना चाहते हैं या संरक्षित करना चाहते हैं. इसरायल एक दंपति को याद करती हैं जो अलग-अलग परिवेश के थे. पत्नी न्यूजर्सी के उपनगर में एकल-परिवार घर में पली-बढ़ी थी. उनके पड़ोस में कई परिवार रहते थे और गली बच्चों से भरी रहती थी. पति की परवरिश ग्रीस में पहाड़ों से घिरे समुद्र किनारे मछुआरों के गांव में हुई थी. पति ऐसे घर की तलाश में थे जिसके साथ ढेर सारी जमीन हो और आसपास प्राकृतिक ख़ूबसूरती हो. उनको इस बात की फिक्र नहीं थी कि उनका घर उपनगर में हो या बस्ती में. पत्नी ऐसा घर चाहती थीं जहां ढेर सारे पड़ोसी हों और उनके बच्चों के साथ खेलने वाले बच्चे हों. ऐसा लगता था कि दोनों दो विपरीत धुरों पर खड़े हों. मनोवैज्ञानिक अभ्यास के जरिये उन्होंने घर के बारे में एक-दूसरे की पिछली धारणाओं को समझा और आख़िर में उनमें आम राय बन गई. दोनों को पर्यावरण से प्रेम था, इसलिए उन्होंने ऐसा घर चुना जिसके आसपास ख़ूब पेड़ थे. वह एक विकसित हो रही सोसाइटी का हिस्सा था और मुहल्ले से सीधा जुड़ा था. चूंकि यह घर दोनों की ज़रूरतों को पूरा करता था, इसलिए वे ख़ुशी से इसमें रह सकते थे. फ्लैटमेट्स के साथ रहने वाले लोग पूरे घर को अपने हिसाब से नहीं ढाल सकते, फिर भी वहां गुंजाइश रहती है कि बेडरूम को अपनी पसंद से तैयार किया जाए. आप अपने कमरे को आसरा बनाना चाहते हैं या मनोरंजन की जगह? क्या आपने फ्लैट के कॉमन एरिया में अपने लिए कोई जगह बना ली है या बड़े लॉन्ज को सभी के लिए खुला रखा है? कॉमन एरिया साथ रहने वाले सभी लोगों की स्थानिक ज़रूरतों को प्रतिबिंबित कर सकते हैं- अतीत और वर्तमान दोनों के मन से डिजाइन करना यदि आप अपने घर में बेहतर रिश्ते बनाना चाहते हैं तो संभव है कि यह आर्थिक रूप से मुमकिन न हो या जगह को अपग्रेड करना बहुत चुनौतीपूर्ण हो. लेकिन थॉर्नोक कहती हैं कि अपने घर को बेहतर बनाना हमेशा हमारी पहुंच में होता है. सबसे अहम बात यह है कि हमारी धारणाएं हमारे नियंत्रण में होती हैं और ये सबसे बड़ा प्रभाव डालती हैं, भले ही आपकी जगह एक आलमारी से ज़्यादा बड़ी न हो. थॉर्नोक कहती हैं, शहर तेज़ी से बढ़ रहे हैं. वहां पर्याप्त जगह नहीं है. ऐसे में आपको रचनात्मक होना होगा, क्योंकि मुमकिन है कि आपके हालात बदलने वाले न हों. छोटी से छोटी जगह को भी काम लायक बनाया जा सकता है. उदाहण के लिए, यदि भीड़भाड़ महसूस होता हो तो आप रोशनी और आईनों की मदद से जगह बना सकते हैं. लोग अपने लिए एक आसरा चाहते हैं, जो कई बार पर्दे लगाने या फर्श पर कुछ तकिए व्यवस्थित करने भर से हो जाता है. परिवारों के लिए इसरायल एक और तरकीब सुझाती हैं- एक दूसरी की पसंद साझा करना. अपने घर का एक ले-आउट खींचें और परिवार के हर सदस्य से पूछें कि वे घर के किस हिस्से को प्राइवेट, सेमी प्राइवेट और कॉमन समझते हैं, उसके हिसाब से ले-आउट में अलग-अलग रंग भर दें. इसरायल का कहना है कि एक ही घर को अलग-अलग नज़रिये से देखने पर समस्या क्षेत्रों की पहचान हो सकती है और कहां सुधार करना है, यह भी आसानी से स्पष्ट हो सकता है. थॉर्नोक के मुताबिक स्वस्थ घर के लिए सक्रिय बदलाव करने का मतलब है कि उसमें भौतिक स्थान और वहां होने वाले संवाद का भी ख़याल रखा जाए. फ्लैटमेट्स के साथ कोई घर साझा करना हो या पूरी तरह पारिवारिक घर हो, अपनी जगह को दूसरों के मुताबिक डिजाइन करना सह-जीवन सद्भाव की कुंजी है. वह कहती हैं, हमें इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि हम अपने घर में क्या डाल रहे हैं, हम उसकी संरचनाओं और आसपास की चीज़ों को कैसे बदल रहे हैं. छोटे घरों या मैरी कोन्डो के न्यूनतमवाद की पसंद से प्रेरित सांस्कृतिक आंदोलनों को ध्यान में रखकर हम अक्सर अपने आसपास की चीज़ों और जगह को प्राथमिकता देने की ग़लती करते हैं. इसकी जगह जीवन में बदलाव लाने का असल तरीका यह है कि घर में रहने वाले लोगों पर ध्यान दिया जाए.
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दो लड़कियों की प्रेम कहानी, सिंदूर और स्फूर्ति

Date : 06-Sep-2019
सिंदूर और स्फूर्ति एक-दूसरे से प्यार करती हैं और पिछले तीन साल से साथ रहती हैं. दोनों रिश्ते में हैं और शादी भी करना चाहती हैं लेकिन उनके सामने कई मुश्किलें हैं. पहली मुश्किल तो ये कि भारत में समलैंगिक शादियों को क़ानूनी मान्यता नहीं है और दूसरी मुश्किल समलैंगिक रिश्तों की भारतीय समाज में स्वीकार्यता का नहीं होना है. भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर 2018 को अपने एक ऐतिहासिक फ़ैसले में दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से होने वाले समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध ठहराने वाली धारा-377 को निरस्त कर दिया था. अदालत के इस फ़ैसले के अब एक साल हो गए हैं. इस एक साल में एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए हालात कितने बदले हैं? क्या समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध के दायरे से हटाना ही काफ़ी है?
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घूरकर देखना महिलाओं की आज़ादी के ख़िलाफ़ है. लेकिन बदक़िस्मती से ज़्यादातर देशों में मर्दों को ये आदत होती है.

Date : 05-Sep-2019
हिंदुस्तानी समाज में महिलाओं के सिर पर पल्लू और सीने को आंचल से छुपा कर रखना उनकी शराफ़त माना जाता है. बच्चियों की उम्र बढ़ने के साथ ही उन्हें अहसास कराया जाने लगता है कि वो लड़की हैं, उनमें सेक्शुअल अपील है. मर्दों की नज़रों से बचने के लिए लड़कियों को अपना शरीर ढककर रखना चाहिए. महिलाओं के संदर्भ में लगभग सारी दुनिया में कमोबेश यही सूरतेहाल है. सभी समाज पुरुष प्रधान हैं, लिहाज़ा उन्होंने महिला विरोधी क़ानून ही बनाए. यहां तक कि मर्दों ने ये भी तय कर दिया कि औरतें क्या लिबास पहनें. लेकिन अब औरतें अपनी आज़ादी के लिए आवाज़ उठा रही हैं. इस कड़ी में एक नई मुहिम छिड़ी है, नो ब्रा मूवमेंट दक्षिण कोरिया में इन दिनों हैशटैग #NoBra नाम की मुहिम सोशल मीडिया पर ख़ूब सुर्खियां बटोर रही है. महिलाएं बिना ब्रा के कपड़े पहनकर अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कर रही हैं. इस मुहिम की शुरुआत आख़िर क्यों और कहां से हुई? दक्षिण कोरिया की महिलाएं इन दिनों अपनी ऐसी तस्वीरें ऑनलाइन शेयर कर रही हैं, जिसमें उन्होंने ब्रा नहीं पहन रखी होती है. #NoBra हैशटैग बहुत बड़ा सोशल मीडिया अभियान बन गया है. इसकी शुरुआत, दक्षिण कोरिया की गायिका और अभिनेत्री सुली के अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर बग़ैर ब्रा वाली तस्वीर शेयर करने से हुई. इंस्टाग्राम पर उनके लाखों फ़ॉलोअर हैं. लिहाज़ा देखते ही देखते ये तस्वीर वायरल हो गई. और सुली दक्षिण कोरिया में ब्रा मुक्त अभियान की प्रतीक बन गईं. इस अभियान के ज़रिए दक्षिण कोरिया की महिलाएं ये संदेश देने में जुटी हैं कि ब्रा पहनना या न पहनना निजी आज़ादी का मसला है. इस मसले पर बहुत से लोग सुली की हिमायत में आए तो बहुतों ने आलोचना की. इसमें मर्द और औरतें दोनों शामिल थे. कुछ ने इसे सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का हथकंडा बताया, तो कुछ ने महिलाओं के नाम पर तवज्जो हासिल करने का तरीक़ा. कुछ लोगों ने बड़ी सख़्ती से कहा कि सुली, महिलाओं के आंदोलन को अपनी शोहरत बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं. मिसाल के लिए एक सोशल मीडिया यूज़र ने लिखा- मैं समझती हूं कि ब्रा पहनना या नहीं पहनना निजी मामला है. लेकिन वो हमेशा इतनी टाइट और फिट शर्ट में बिना ब्रा के फोटो खिंचाती हैं जिसमें उनके स्तन बिल्कुल तने हुए नज़र आते हैं. मुझे लगता है उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है. इसी तरह एक अन्य पोस्ट में लिखा है- ब्रा पहनने या नहीं पहनने के लिए हम तुम्हें इल्ज़ाम नहीं धरते. हम तुम्हें बता रहे हैं कि तुम्हें अपने निपल छिपाने चाहिए. औरों ने तो सुली को निशाना बनाते हुए ये भी लिखा कि, तुम्हें शर्म आनी चाहिए. क्या तुम इस हालत में चर्च में जा सकती हो? क्या तुम अपनी बहन के पति से या अपने सास-ससुर से इस हालत में मिल सकती हो? सिर्फ़ मर्द ही नहीं, औरतें भी अहसज महसूस करती हैं. हाल ही में एक और हाई प्रोफ़ाइल सिंगर ह्वासा ने अपनी बिना ब्रा वाली फ़ोटो से इस मुहिम की मशाल को और भड़का दिया है. चुनने की आज़ादी हाल ही में हॉन्ग कॉन्ग से लौटते हुए सुली ने बिना ब्रा के सफ़ेद टी-शर्ट पहनी हुई थी. उनकी ये तस्वीरें वायरल हो गई. अभी तक ये एक महिला की पसंद-नापसंद का मुद्दा था. लेकिन इन तस्वीरों के बाद ये दक्षिण कोरिया की आम महिलओं के लिए भी एक मुहिम बन गई है. अब ये कुछ मुट्ठी भर महिलाओं के चुनने की आज़ादी का मसला नहीं रह गया है. साल 2018 में दक्षिण कोरिया में एस्केप द कॉर्सेट मुहिम भी ज़ोरों पर थी जिसके तहत महिलाओं ने अपने बाल मुंडवा कर बिना मेक-अप वाली तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की थीं. ये एक तरह से महिलाओं की बग़ावत की आवाज़ थी. एस्केप द कॉर्सेट नारा बाक़ायदा गूंजने लगा था. ये नारा महिलाओं की ख़ूबसूरती के उन पैमानों के ख़िलाफ़ था जिन्हें दक्षिण कोरिया के समाज ने महिलाओं के लिए तय किया था. बहुत सी महिलाओं ने बताया कि नो ब्रा मुहिम और एस्केप द कॉर्सेट मुहिम में गहरा रिश्ता है. सोशल मीडिया ने इन दोनों ही मुहिम को आग की तरह फैलाने में मदद की है. इस में एक नए तरह के सामाजिक आंदोलन का संकेत मिलता है. घूरकर देखना महिलाओं को उनकी मर्ज़ी के बग़ैर घूरकर देखना उनकी आज़ादी के ख़िलाफ़ है. लेकिन बदक़िस्मती से ज़्यादातर देशों में मर्दों को ये आदत होती है. दक्षिण कोरिया में महिलाएं आजकल इसी के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रही हैं. वो समाज में मर्दों के दबदबे, यौन हिंसा और छिपकर महिलाओं को देखने के खिलाफ़ मुहिम चला रही हैं. दक्षिण कोरिया में बहुत से सार्वजनिक ठिकानों जैसे होटल के कमरों, बाथरूम और टॉइलेट में कैमरा छुपाकर लगा दिया जाता है, ताकि महिलाओं के निजी पलों को कैमरे में क़ैद कर के देखा जा सके. मर्द छुप कर उन्हें घूरते रहते हैं जबकि ये महिलाओं की निजी आज़ादी का हनन है. दक्षिण कोरिया में महिलाएं इसी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही हैं. साल 2018 में इसके लिए दक्षिण कोरिया में अब तक का सबसे बड़ा महिला अभियान चला था. जब दसियों हज़ार महिलाएं सड़कों पर उतरी थीं और ख़ुफ़िया कैमरों पर पाबंदी लगाने की मांग की थी. बहुत सी महिलाओं का कहना है कि वो ब्रा के बग़ैर रहने की मुहिम के समर्थन में तो हैं. लेकिन मर्दों की घूरने की आदत के सबब वो बिना ब्रा पहने सार्वजनिक स्थानों पर जाने का साहस नहीं जुटा पा रही हैं. इसके लिए वो दक्षिण कोरिया के पुरुषों की लगातार घूरने की आदत को ज़िम्मेदार बताती हैं, जिसे दक्षिण कोरिया में गेज़ रेप यानी घूरकर महिलाओं का बलात्कार करना कहा जाता है. 28 साल की ज्योंग स्योंग युन उन 2014 में बनी डॉक्यूमेंट्री नो ब्रॉबलम की प्रोडक्शन टीम का हिस्सा थीं. उन्होंने ये प्रोजेक्ट अपने कॉलेज के साथियों के साथ शुरू किया था. ये डॉक्युमेंट्री बिना ब्रा के रहने वाली महिलाओं के अनुभवों पर आधारित थी. ज्योंग स्योंग उन का कहना है कि उन्होंने कॉलेज में एक प्रोजेक्ट के तहत लड़कियों से सवाल पूछना शुरू किया था कि आख़िर हम ये क्यों सोचते हैं कि ब्रा पहनना एक सामान्य और वाजिब ज़रूरत है. उनका कहना है कि उन्हें ख़ुशी है कि अब महिलाएं इस मुद्दे पर आम लोगों के बीच खुलकर बात कर रही हैं. साथ ही वो ये भी मानती हैं कि अभी भी बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जो शर्ट से निपल नज़र आने पर शर्मिंदगी महसूस करती हैं. ज्योंग स्योंग का कहना है, अभी भी दक्षिण कोरिया में ऐसी महिलाएं हैं जो ब्रा पहनना जीवन के अन्य कामों की तरह ज़रूरी समझती हैं. और सिर्फ़ इसीलिए ब्रा पहनती हैं. 24 वर्षीय दक्षिण कोरियाई मॉडल पार्क आई-स्योल बॉडी पॉज़िटिविटी मुहिम से जुड़ी हैं. पिछले साल उन्होंने सिओल में तीन दिन तक बिना ब्रा पहने रहने के अनुभव पर डॉक्युमेंट्री बनाई थी. इसके लिए उन्होंने तीन दिन तक शूटिंग की थी. सोशल मीडिया पर आते ही ये वीडियो हिट हो गया. इसे 26 हज़ार व्यूज़ मिले. इनका कहना है कि इनकी बहुत सी फ़ॉलोवर ने पैडेड ब्रा पहनना छोड़कर, अब वायरलेस सॉफ़्ट कप ब्रा पहनना शुरू कर दिया है. वो कहती हैं मुझे ये ग़लतफ़हमी थी कि अगर मैंने बिना वायर वाली ब्रा पहनी तो स्तन लटक जाएंगे और बहुत भद्दे लगेंगे. लेकिन जब उन्होंने बिना ब्रा पहने ख़ुद का वीडियो बनाया, तो उनकी ग़लतफ़हमी दूर हो गई. अब वो गर्मी में बिना वायर वाली ब्रा पहनती हैं और सर्दी में तो पहनती ही नहीं. ये मुहिम सिर्फ़ राजधानी सिओल तक ही सीमित नहीं है. इसने 22 बरस की डिज़ाइनर और छात्रा नाहयून ली को भी प्रेरित किया है. नाहयून ने एक पॉप-अप ब्रांड यिप्पी शुरू किया. कीमयुंग यूनिवर्सिटी में ये उनका मास्टर प्रॉजेक्ट था. इसी साल मई महीने से उन्होंने निपल पैच बेचने शुरू कर दिए हैं. और इसके साथ नारा दिया है अगर आपने ब्रा नहीं पहनी है तो कोई बात नहीं जियोलानम-डू प्रांत की 28 वर्षीय डा-केयुंग का कहना है कि वो अदाकारा और गायिका सुली की बिना ब्रा वाली तस्वीरों से बहुत प्रेरित हैं. अब वो उतनी ही देर ब्रा पहनती हैं जितनी देर अपने बॉस के आस-पास रहती हैं. लेकिन जब अपने बॉयफ़्रेंड के साथ होती हैं, तो ब्रा नहीं पहनतीं. वो कहती हैं, मेरा बॉयफ्रेंड भी कहता है कि अगर मुझे ब्रा के साथ ठीक नहीं लगता, तो मुझे नहीं पहनना चाहिए. इन सभी का एक ही संदेश है कि ब्रा पहनने या नहीं पहनने का फ़ैसला निजी है. लेकिन ब्रा नहीं पहनने पर रिसर्च क्या कहता है ? क्या ब्रा नहीं पहनने का सेहत पर भी असर पड़ता है? ऑस्ट्रेलिया की वोलोनगोंग यूनिवर्सिटी की डॉक्टर डेड्रे मैक्घी का कहना है कि महिलाओं को इस बात का पूरा अधिकार है कि वो ये तय करें कि ब्रा पहननी है या नहीं. लेकिन अगर आप के स्तन भारी हैं, तो उन्हें सहारे की ज़रूरत होती है. ऐसा न होने पर आप के शरीर की बनावट अजीब हो जाती है. इसका असर गर्दन और पीठ पर भी पड़ता है. डॉक्टर डेड्रे मैक्घी का कहना है कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर के ढांचे पर भी असर पड़ता है. त्वचा ढीली पड़ जाती है तो स्तन को प्राकृतिक रूप से मिलने वाला सहारा भी कमज़ोर पड़ जाता है. चर्च में औरतों ने क्यों किया ब्रा प्रोटेस्ट? औरतों को कब और कैसे पहनाई गई ब्रा? डॉक्टर मैक्घी कहती हैं, जब महिलाएं ब्रेस्ट को कोई सहारा दिए बग़ैर एक्सरसाइज़ करती हैं, तो इससे उनके स्तनों में दर्द बढ़ जाता है. वहीं स्पोर्ट्स ब्रा ब्रेस्ट के साथ-साथ कमर और गर्दन के दर्द को रोकने में मददगार होती है. डॉ. मैक्घी के मुताबिक़, स्तन औरत की सेक्शुअल पहचान हैं. रिसर्च से पता चला है कि जिन औरतों के स्तन किसी वजह से (जैसे ब्रेस्ट कैंसर की ) से हटा दिए जाते हैं, वो भी अपनी छाती के हिस्से की हिफ़ाज़त करती हैं. इसी तरह जो महिलाएं इस बात के लिए चिंतित रहती हैं कि उनके ब्रेस्ट कैसे लग रहे हैं, अगर वो बिना ब्रा के रहती हैं तो उन्हें मुश्किल हो सकती है. डॉक्टर मैक्घी कहती हैं जिन महिलाओं की मैस्टेक्टॉमी की सर्जरी हो जाती है, मैं उन्हें भी आत्मविश्वास बढ़ाने और सही पोस्चर रखने के लिए ब्रा पहनने की सलाह देती हूं. डॉक्टर जेनी बरबेज यूनिवर्सिटी ऑफ़ पोर्ट्समाउथ में बायोमेकैनिक्स की सीनियर लेक्चरर हैं. उनका मानना है कि ब्रा पहनने के बाद दर्द या बेचैनी महसूस करने का संबंध ख़राब फिटिंग वाली ब्रा पहनने से है. डॉक्टर जेनी के मुताबिक़, उनके रिसर्च में अब तक ये बात कहीं भी सामने नहीं आई है कि ब्रा पहनने का ताल्लुक़ ब्रेस्ट कैंसर से है. ऐसा पहली बार नहीं है कि महिलाओं ने ब्रा के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ी हो. 1968 में मिस अमरीका ब्यूटी कॉन्टेस्ट के दौरान महिलावादियों ने ब्रा जला कर अपना विरोध जताया था. प्रदर्शन के दौरान महिलाओं ने जो सामान कूड़ेदान में फेंका था, उसमें ब्रा भी शामिल थी. वो इसे महिलाओं के शोषण का प्रतीक मानती थीं. हालांकि उन्होंने ब्रा को कभी जलाया नहीं था, लेकिन इस प्रदर्शन के बाद से ब्रा का जलाया जाना औरतों की आज़ादी से जुड़ी हर मुहिम का हिस्सा बन गया. इसी साल जून महीने में स्विट्ज़रलैंड में हज़ारों महिलाओं ने मुनासिब पगार, बराबरी और यौन उत्पीड़न ख़त्म करने की मांग के लिए सड़क पर जाम लगा दिया और अपनी ब्रा जला डालीं. ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए 13 अक्टूबर को दुनिया भर में नो ब्रा डे के तौर पर मनाया जाने लगा. लेकिन पिछले साल फ़िलिपींस की महिलाओं ने इस दिन को लैंगिक समानता का अधिकार मांगने के दिन के तौर पर मनाना शुरू कर दिया. पत्रकार वनीसा अल्मेडा कहती हैं कि नो ब्रा डे हमें फ़ख़्र महसूस कराता है और ब्रा इस बात का प्रतीक है कि महिलाओं को किस तरह बंधनों में बांध कर रखा गया है. हाल के कुछ वर्षों में ऐसे अभियान चलाने वाले इस मुहिम को और दो क़दम आगे ले गए हैं. वो मर्द और औरत के निपल को लेकर समाज के दोहरे पैमाने को उजागर करते हैं. दिसंबर 2014 में नेटफ़्लिक्स पर फ़्री द निपल नाम की एक डॉक्यूमेंट्री आई थी. इस में न्यूयॉर्क शहर में महिलाओं के स्तन पर सेंसरशिप लगाने और अपराधीकरण के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने वाली महिलाओं के एक समूह की कहानी है. यहीं से फ़्री द निपल मुहिम अंतरराष्ट्रीय अभियान बन गई. दक्षिण कोरिया में चलने वाली हालिया नो ब्रा मुहिम इस बात की मिसाल है कि किस तरह दुनिया भर में महिलाओं पर तमाम तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं. इसमें शामिल महिलाओं को जिस तरह विरोध का सामना करना पड़ा उससे पता चलता है कि दक्षिण कोरिया का समाज सांस्कृतिक रूप से महिलाओं की आज़ादी का कितना बड़ा विरोधी है. लेकिन, दक्षिण कोरिया की बहुत सी महिलाओं के लिए ये आज़ादी और निजता का मामला बन चुका है. इस आंदोलन को जिस तरह समर्थन मिल रहा है, उससे लगता है कि दक्षिण कोरिया की बहुत सी महिलाओं के लिए तब तक इस हैशटैग #NoBra की अहमियत बनी रहेगी, जब तक बिना ब्रा पहने रहना एक आम बात नहीं हो जाती और जब तक दक्षिण कोरियाई समाज महिलाओं की पसंद-नापसंद के इस चुनाव के अधिकार को स्वीकार नहीं कर लेता.
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यौन उत्पीड़न के शिकार बेटे को मां ने ऐसे दिलाया न्याय सोना रॉय

Date : 27-Aug-2019
16 अगस्त 2019, देश अभी भी स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना ही रहा था कि यह दिन मेरे जीवन के यादगार दिनों में शामिल हो गया. मेरे पास पुणे पुलिस स्टेशन से एक कॉल आया. मैम, अभियुक्त को दोषी ठहराया गया है. मैं कुछ देर के लिए जैसे थम सी गई. सबकुछ समझने में मुझे कुछ सेकंड का वक़्त लगा. यह मेरे बेटे को न्याय दिलाने की चार साल की लंबी लड़ाई की जीत थी, जिसके साथ उसके स्कूल के एक चपरासी ने यौन उत्पीड़न किया था. यह अप्रैल 2015 की बात है. मेरा बेटा कुछ हफ़्ते पहले ही 13 साल का हुआ था. हमने उसका एडमिशन पुणे के एक प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल में करवाया था. मुझे आज भी वो पहला दिन याद है जब मैं उसे छोड़कर घर वापस आ रही थी. वो 100 किलोमीटर की दूरी एक अनंतकाल की तरह लग रही थी. मैं बहुत भारी दिल के साथ वापस लौटी थी. यह पहली बार था जब मैं अपने बच्चे से दूर थी. सबकुछ सामान्य ही हो रहा था कि मुझे मेरे बेटे का एक ईमेल मिला, जिसमें उसने बताया कि उसके स्कूल के एक चपरासी ने उसका यौन उत्पीड़न करने की कोशिश की. मम्मा... इस स्कूल के चपरासी बहुत अजीब हैं. उनमें से एक ने मुझे पीछे से पकड़ने की कोशिश की और अपना हाथ मेरी पैंट के अंदर डाल दिया. न्याय की लड़ाई बोर्डिंग स्कूल में उसे छोड़े बमुश्किल से चार दिन ही हुए थे. मैं इस घटना के बाद सन्न थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. तभी उनके पिता ने मुझे फोन किया. उन्हें भी वो ईमेल मिला था, जो मेरे बेटे ने मुझे भेजा था. हमने तुरंत अपने घर नवी मुंबई से उसके बोर्डिंग स्कूल जाने का फ़ैसला किया. मैंने अपने बेटे के स्कूल के इलाक़े के पुलिस स्टेशन को फ़ोन मिलाया और घटना के बारे में बताया. पुलिस अधिकारी बेहद मददगार लगे, जिन्होंने न केवल मुझे आराम से सुना बल्कि बात पूरी होने के बाद तुरंत स्कूल के लिए रवाना हो गए. 15 मिनट के भीतर मुझे फिर से उसी पुलिस अधिकारी का फ़ोन आता है, वो बताते हैं कि मेरा बेटा उनके साथ है और सुरक्षित है. यह सुनकर मुझे कुछ राहत मिली. यहां तक कि उन्होंने मुझे मेरे बेटे से बात भी कराई और तब मेरी जान में जान आई. बोर्डिंग स्कूल पहुंचने के बाद हम उसके प्रिंसिपल से मिले और मैंने कहा कि मैं उस शख़्स को सज़ा दिलाकर रहूंगी. वो मेरी इस बात से नाराज़ हुए. प्रिंसिपल ने पहले ही चपरासी को नौकरी से निकाल दिया था और उसे अपने परिवार के साथ स्कूल परिसर से जाने को कह दिया था. शायद उन्होंने सोचा होगा कि यह सज़ा के रूप में पर्याप्त है लेकिन मेरे अंदर की मां संतुष्ट नहीं थी. मैं एक यौन अपराधी को ऐसे नहीं छोड़ सकती थी. स्कूल के प्रिंसिपल के पास अपनी मजबूरियां थीं. उनके स्कूल की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती और आज मैं उनकी इस दुविधा को पूरी तरह से समझ सकती हूं. मैंने स्थानीय पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज कराई. चपरासी को गिरफ़्तार कर लिया गया और वहीं से मेरे बेटे को न्याय दिलाने की लड़ाई शुरू हुई, जिसका अंत चार साल बाद हुआ है. अपने बेटे से बात करते समय मुझे पता चला कि उस चपरासी ने कुछ और बच्चों के साथ ऐसे दुर्व्यवहार किए थे. उत्पीड़न के शिकार उन बच्चों में मेरे बेटे के कुछ दोस्त भी शामिल थे. जब मैंने अपने बेटे से पूछा कि क्या उन बच्चों ने कभी अपने माता-पिता को इन दुर्व्यवहारों के बारे में बताया, और अगर उन्होंने ऐसा किया तो उनके माता-पिता ने क्या किया. मैं अपने बेटे का जवाब सुन कर सन्न रह गई. उसने बताया कि उनके अभिभावकों ने अपने बच्चों को इस बारे में प्रिंसिपल से शिकायत करने के लिए कहा. बच्चों ने शिकायत की भी लेकिन प्रिंसिपल को पता था कि क्या करना उचित है. मैं इस बारे में सोचती रही कि कोई भी अभिभावक चुप कैसे रह सकता है. या फिर मैं ही तो ग़लत नहीं कर रही हूं और मामले को बड़ा बना रही हूं. बेटे का ईमेल पढ़ने के बाद जब मैं उसके स्कूल जा रही थी तो मेरे अंदर मिली-जुली भावना पनप रही थी. एक तरफ़ मुझे गुस्सा आ रहा था तो दूसरी तरफ़ में असहाय महसूस कर रही थी. मुझे लगा कि मैं अपने बच्चे की रक्षा नहीं कर पाई. मेरे आंखों से आंसू बह रहे थे और ये गुस्से के आंसू थे. बेटा ही तो है... मैं इस लड़ाई में बिल्कुल अकेली थी. मेरे पति ने कहा था कि कोर्ट जाने के झंझट में क्यों फंसना. बच्चे की पढ़ाई प्रभावित हो जाएगी और हम लोगों को परेशानी होगी सो अलग. मेरे रिश्तेदार जानना चाहते थे कि मैं इस मामले को बड़ा मुद्दा क्यों बना रही हूं क्योंकि यह मेरे बेटे के साथ हुआ था न कि बेटी के साथ. लेकिन मुझे पता है कि एक मां की अपने बच्चों के लिए जो भावनाएं होती हैं, उन्हें उसके पति या रिश्तेदार समझ नहीं सकते. मामले को अदालत आने में क़रीब दो साल लग गए और हमारा केस सरकारी वकील लड़ रहा था. कोर्ट की कार्यवाही, तारीख़ों और अन्य क़ानूनी प्रक्रियाओं के बारे में समझने के लिए हमें उनसे मिलने जाना पड़ता था. चार घंटे की थकान भरी ड्राइव के बाद मैं उनसे मिलने पहुंचती थी. मैं अपने छोटे बेटे को भी साथ ले जाती थी क्योंकि वो बहुत छोटा था और उसे घर में अकेले नहीं छोड़ा जा सकता था. और इसके बाद तपती गर्मी और धूप में कोर्ट परिसर में दिनभर खड़ा रहना पड़ता था. यह मेरे छोटे बेटे के लिए किसी यातना से कम नहीं था, लेकिन हम दोनों ने साथ मिलकर इसे मैनेज किया. इस पूरी कवायद में एक अच्छी बात यह थी कि जो पुलिस अधिकारी मेरे बेटे का केस देख रहे थे, वो काफ़ी मददगार थे. वो हर सुनवाई पर न केवल हमारे पास आते थे बल्कि पूरे समय तक हमारे साथ रहते थे. उस सज्जन की वजह से पुलिस विभाग के प्रति मेरा विश्वास बढ़ा है. दिसंबर 2018 में मेरे बेटे को बयान के लिए कोर्ट के कठघरे में बुलाया गया. मुझे नहीं पता था कि यह कैसे होगा क्योंकि जीवन में पहली बार मैं कोर्ट रूम गई थी. मेरे लिए यह सबसे भयावह अनुभव था. उस वक़्त मेरा बेटा 16 साल का हो चुकाल था और दोषियों, अपराधियों और अभियुक्तों से भरे कोर्ट रूम में उसे कठघरे में खड़ा होना पड़ा. जब मेरा बेटा कोर्ट रूम के अंदर था, मुझे बाहर रहने को कहा गया क्योंकि जज साहब को यह लगता था कि मां की मौजूदगी से बच्चे के जवाब प्रभावित होंगे. कोर्ट रूम के बाहर खड़े होकर मैं अंदर झांकने की कोशिश कर रही थी. अंदर क्या चल रहा था, मैं बहुत कुछ नहीं सुन पा रही थी लेकिन मैंने अपने बेटे को अंदर शांत और शालीनता के साथ खड़ा देखा. मैं अपने बेटे के उस चेहरे को कभी नहीं भूल सकती. वो न तो डरा हुआ था और न ही भयभीत दिख रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर दर्द था. मुझे इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि हम बंद कमरे में सुनवाई के लिए आवेदन कर सकते थे, लेकिन मेरे वकील ने इस बारे में मुझे बताया नहीं था. दो घंटे तक मेरे बेटे से पूछताछ की गई और बाद में मुझे पता चला कि उसको असहज करने वाले कई तरह के सवालों का सामना करना पड़ा था. मैं अपने आंसुओं को रोक नहीं सकी, और पहली बार मैं सबके सामने बुरी तरह रोई. मैंने अपने बेटे को गले लगा लिया और उससे कहा कि मैं अब और नहीं लड़ना चाहती अगर उसे यह सब झेलना होगा तो. मेरे बेटे ने मुझे गले लगाते हुए कहा, आप फ़ाइटर हैं. बिना लड़े आप कैसे हार मान सकती हैं? क्या हम इतनी दूर लड़ाई को बीच में छोड़ देने के लिए आए थे? मुझे मेरी मां की याद आ गई जो मुझसे हमेशा कहा करती थी, मज़बूत मांएं ही मज़बूत परिवार बनाती हैं. कमज़ोर मां बनना कोई विकल्प नहीं था. मुझे ख़ुद को साहस देना पड़ा और लड़ाई लड़ने के लिए फिर से खड़ा होना पड़ा. अब मेरी बारी थी. मुझे बचाव पक्ष के वकील के सवालों का जवाब देना था. मुझे भी कुछ ऐसे सवालों से गुज़रना पड़ा जिन्होंने मुझे गुस्से से भर दिया. लेकिन आंसुओं से भरी आंखों से मेरे बेटे ने मेरी तरफ़ देखा और एक मुस्कान के साथ मुझे गुड लक का इशारा किया. बचाव पक्ष के वकील यह मामला बनाने की कोशिश कर रहे थे कि चूंकि मेरा बेटा पहली बार अपनी मां से दूर था इसलिए उसने घर वापस जाने के लिए झूठी कहानी बनाई. उन्होंने मेरे बेटे से भी यह सवाल पूछा था. लेकिन उसने बहुत ही आराम से जवाब दिया, 13 साल की उम्र में ज़्यादातर बच्चे यौन शोषण शब्द से अनजान होते हैं और अगर मुझे किसी बहाने की ज़रूरत होती तो बीमार महसूस करने का बहाना सबसे आसान होता. यहां मुझे इस बात का उल्लेख करना होगा कि हमारे मामले की सुनवाई एक दयालु जज कर रहे थे, जिन्होंने न केवल धैर्यपूर्वक हमारी बातें सुनीं बल्कि कई बार बचाव पक्ष के वकीलों के बुरे सवालों पर आपत्ति भी जताई. अंततः यह अग्नि परीक्षा इस साल मार्च के अंत में ख़त्म हुई और हमें अंतिम फ़ैसले के लिए इंतजार करने को कहा गया. हालांकि मुझे पता था कि मेरा केस कमजोर नहीं है लेकिन मेरे पक्ष में फ़ैसला आएगा, इसको लेकर आशांवित नहीं थी और ऊपरी अदालत में जाने की भी योजना बना रही थी. मेरी सारी दुआएं 16 अगस्त को कुबूल हुईं. अदालत ने उस यौन अपराधी को तीन साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई और पॉक्सो एक्ट के तहत जुर्माना भी लगाया गया. मैं इस फ़ैसले से खुश हूं लेकिन मुझे अफ़सोस है कि मैं उन कई बच्चों की मदद नहीं कर पाई, जिन्होंने यौन दुर्व्यवहार झेले हैं. उनके लिए कोई खड़ा नहीं हुआ, यहां तक की उनकी मांएं भी नहीं. शायद मेरी यह कहानी उन्हें इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का साहस दे पाएं, वो उत्पीड़न और अपराध के ख़िलाफ़ खड़े हों तो हम निश्चित रूप से इस समाज को अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर बना सकते हैं. आज आपकी बारी है कि आप कैसा कल बनाना चाहते हैं.
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शादी के लिए लड़का और लड़की की उम्र अलग-अलग क्‍यों: नासिरूद्दीन

Date : 26-Aug-2019
लड़का और लड़की के लिए शादी की उम्र अलग-अलग क्‍यों है? लड़की की कम और लड़के की ज़्यादा... भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में लड़के और लड़की की शादी की क़ानूनी उम्र में फ़र्क है. लड़की की उम्र कहीं भी लड़के से ज्‍़यादा नहीं रखी गयी है. दिलचस्‍प है कि हमारे देश में तो बालिग होने की कानूनी उम्र दोनों के लिए एक है मगर शादी के लिए न्‍यूनतम क़ानूनी उम्र अलग-अलग. उम्र के अंतर को चुनौती पिछले दिनों दिल्‍ली हाईकोर्ट में वकील अश्विनी कुमार उपाध्‍याय ने एक याचिका दायर की. याचिका में मांग की गयी कि लड़की और लड़कों के लिए शादी की उम्र का क़ानूनी अंतर खत्‍म किया जाए. याचिका कहती है कि उम्र के इस अंतर का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. यह पितृसत्‍तात्‍मक विचारों की देन है. इस याचिका ने एक बार फिर भारतीय समाज के सामाने शादी की उम्र का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया है. जी, यह कोई पहला मौका नहीं है. भारत में शादी की उम्र काफ़ी अरसे से चर्चा में रही है. इसके पीछे सदियों से चली आ रही बाल विवाह की प्रथा को रोकने का ख्‍याल रहा है. ध्‍यान देने वाली बात है, इसके केन्‍द्र में हमेशा लड़की की ज़िंदगी ही रही है. उसी की ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिहाज़ से ही उम्र का मसला सवा सौ साल से बार-बार उठता रहा है. साल 1884 में औपनिवेशिक भारत में डॉक्‍टर रुख्‍माबाई के केस और 1889 में फुलमोनी दासी की मौत के बाद यह मामला पहली बार ज़ोरदार तरीके से बहस के केन्‍द्र में आया. रुख्‍माबाई ने बचपन की शादी को मानने से इनकार कर दिया था जबकि 11 साल की फुलमोनी की मौत 35 साल के पति के जबरिया यौन सम्‍बंध बनाने यानी बलात्‍कार की वजह से हो गयी थी. फुलमोनी के पति को हत्‍या की सजा तो मिली लेकिन वह बलात्‍कार के आरोप से मुक्‍त हो गया. तब बाल विवाह की समस्‍या से निपटने के लिए ब्रितानी सरकार ने 1891 में सहमति की उम्र का क़ानून बनाया. इसके मुताबिक यौन सम्‍बंध के लिए सहमति की उम्र 12 साल तय की गयी. इसके लिए बेहरामजी मालाबारी जैसे कई समाज सुधारकों ने अभियान चलाया. द नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्‍शन ऑफ़ चाइल्‍ड राइट्स (एनसीपीसीआर) की रिपोर्ट चाइल्‍ड मैरेज इन इंडिया के मुताबिक, इसी तरह मैसूर राज्‍य ने 1894 में एक कानून बनाया. इसके बाद आठ साल से कम उम्र की लड़की की शादी पर रोक लगी. इंदौर रियासत ने 1918 में लड़कों के लिए शादी की न्‍यूनतम उम्र 14 और लड़कियों के लिए 12 साल तय की. मगर एक पुख्‍ता क़ानून की मुहिम चलती रही. 1927 में राय साहेब ह‍रबिलास सारदा ने बाल विवाह रोकने का विधेयक पेश किया और इसमें लड़कों के लिए न्‍यूनतम उम्र 18 और लड़कियों के लिए 14 साल करने का प्रस्‍ताव था. 1929 में यह क़ानून बना. इसे ही सारदा एक्‍ट के नाम से भी जाना जाता है. इस कानून में 1978 में संशोधन हुआ. इसके बाद लड़कों के लिए शादी की न्‍यूनतम क़ानूनी उम्र 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल हो गयी. मगर कम उम्र की शादियां रुकी नहीं. तब साल 2006 में इसकी जगह बाल विवाह रोकने का नया क़ानून आया. इस कानून ने बाल विवाह को संज्ञेय जुर्म बनाया. तो क्‍या आज भी बाल विवाह हो रहे हैं 1978 का संशोधन इसीलिए हुआ था कि बाल विवाह रुक नहीं रहे हैं. खासतौर पर 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी नहीं रुक रही है. मुमकिन है, आंकड़ों के बारे में कुछ मतभेद हो लेकिन क़ानूनी उम्र से कम में शादियां हो रही हैं. संयुक्‍त राष्‍ट्र बाल कोष (यूनिसेफ़) के मुताबिक, भारत में बाल विवाह के बंधन में बंधी दुनिया भर की एक तिहाई लड़कियां रहती हैं. राष्‍ट्रीय परिवार स्‍वास्‍थ्‍य सर्वेक्षण 2015-16 के आंकड़े बताते हैं कि पूरे देश में 20-24 साल की लगभग 26.8 फ़ीसदी लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हो चुकी थी. इसके बरअक्‍स 25-29 साल के लगभग 20.4 फ़ीसदी लड़कों की शादी 21 साल से पहले हुई थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 40.7 फ़ीसदी, बिहार में 39.1 फ़ीसदी, झारखंड में 38 फ़ीसदी राजस्‍थान में 35.4 फ़ीसदी, मध्‍यप्रदेश में 30 फ़ीसदी, महाराष्‍ट्र में 25.1 फ़ीसदी लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में हो गई थी. संयुक्‍त राष्‍ट्र जनसंख्‍या कोष (यूएनएफ़पीए) बाल विवाह को मानवाधिकार का उल्‍लंघन कहता है. सभी धर्मों ने लड़कियों की शादी के लिए सही समय उसके शरीर में होने वाले जैविक बदलाव को माना है. यानी माहवारी से ठीक पहले या माहवारी के तुरंत बाद या माहवारी आते ही... लड़कियों की शादी कर देनी चाहिए, ऐसा धार्मिक ख्‍याल रहा है. इसीलिए चाहे आज़ादी के पहले के क़ानून हों या बाद के, जब भी लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने का मुद्दा समाज के सामने आया, बड़े पैमाने पर इसे विरोध का भी सामना करना पड़ा है. आज भी कम उम्र की शादी के पीछे यह बड़ी वजह है. साथ ही, लड़कियों को बोझ मानने, लड़कियों की सुरक्षा, लड़कियों के बिगड़ जाने की आशंका, दहेज, ग़रीबी, लड़कियों की कम पढ़ाई- अनेक ऐसी बातें हैं जो कम उम्र की शादी की वजह बनती हैं मगर उम्र में अंतर की वजह क्‍या है... इसीलिए बहुत जद्दोजेहद के बाद जो भी क़ानून बने उनमें विवाह के लिए लड़के और लड़की के उम्र में अंतर रखा गया. लड़की की उम्र लड़के से कम रखी गयी. चाहे बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम हो या विशेष विवाह अधिनियम, हिन्‍दू विवाह क़ानून हो या पारसी विवाह और तलाक अधिनियम या भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम - सबमें यही माना गया है कि शादी के लिए लड़के को 21 साल और लड़की को 18 साल से कम नहीं होना चाहिए. बिहार के एक गांव में जब उम्र के इस अंतर पर बात की गयी तो लोगों का कहना है कि लड़की अगर लड़के से उम्र में बड़ी हुई तो वह नियंत्रण में नहीं रहेगी. अगर लड़के से मजबूत हुई तो उसके पास नहीं रहेगी. किसी और से दिल लगाएगी. तो इसीलिए लड़की की कम उम्र में शादी के पीछे भी धार्मिक तर्क के अलावा भी तर्क हैं. अगर बड़ी होने तक लड़की की शादी नहीं की गयी तो लड़की के भागने और बिगड़ने का डर रहता है. गांव घर में मां-बाप को ताना दिया जाता है कि अब तक शादी क्‍यों नहीं की. इतना दिन कैसे रखे हुए है या अब तक गाछ यानी पेड़ क्यों पाले हुए है यह फल क्‍यों जोगा कर रखा है. क्‍या इस फल से लाभ ले रहा है पैसा ख़र्च नहीं करना चाहते हैं.... यानी हमारा बड़ा समाज लड़कियों को उसके शरीर से नापता-जोखता है. उसके लिए उम्र के साल बेमानी हैं. बदन से ही वह उसे शादी और मां बनने लायक तय कर देता है. सिर्फ़ बराबर की उम्र से काम कैसे चलेगा बराबर की उम्र, हर चीज में बराबरी की मांग करेगी. मर्दाना सोच वाला हमारा समाज बराबरी की बड़ी बड़ी बातें भले ही खूब जोरशोर से करता हो, स्त्रियों को बराबरी देने में यक़ीन नहीं करता. इसीलिए वह मर्दों से कम उम्र की पत्‍न‍ियां पसंद करता है. ताकि वह कच्‍चे और कमजोर को अपनी रुचि और मन के मुताबिक ढाल सके. दब्‍बू, डरी हुई, भयभीत, दबी हुई शख़्सियत बना कर लड़की को आसानी से अपने काबू में रख सके. जब चाहे जैसे चाहे उसके साथ वैसा सुलूक कर सके. वह इच्‍छा जताने वाली नहीं, इच्‍छा पूरा करने वाली और इच्‍छाएं दबा कर रखने वाली इंसान बन सके. सरकार चुनने की उम्र एक तो पार्टनर चुनने की अलग-अलग क्‍यों विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर अपनी रिपोर्ट में शादी की उम्र पर विचार करते हुए कहा था, अगर बालिग़ होने की सभी यानी लड़का-लड़की के लिए एक ही उम्र मानी गयी है और वही उम्र नागरिकों को अपनी सरकारें चुनने का हक़ देती है तो निश्चित तौर पर उन्‍हें अपने जोड़ीदार/पति या पत्‍नी चुनने के लायक़ भी माना जाना चाहिए. अगर हम सच्‍चे मायनो में बराबरी चाहते हैं तो आपसी रज़ामंदी से शादी के लिए बालिगों के अलग-अलग उम्र की मान्‍यता ख़त्‍म कर देनी चाहिए. इंडियन मैजोरिटी एक्‍ट, 1875 ने बालिग होने की उम्र 18 साल मानी है. बालिग़ होने की इस उम्र को ही मर्दों और स्त्रियों के लिए एक समान तरीके से शादी की क़ानूनी उम्र मान लेनी चाहिए. पति और पत्‍नी की उम्र के बीच अंतर का क़ानूनी तौर पर कोई आधार नहीं है. शादी में शामिल दम्‍पति हर मामले में बराबर हैं और उनकी साझेदारी भी बराबर लोगों के बीच होनी चाहिए. उम्र का अंतर गैरबराबरी है. इस गैरबराबरी को कम से कम क़ानूनी तौर पर ख़त्‍म होना ही चाहिए. लड़कियों को क़ाबू में रखने/ करने के लिए यह छलावा अब बंद होना चाहिए कि लड़कियां बहुत जल्‍दी परिपक्‍व हो जाती हैं, इसलिए उनके लिए शादी की उम्र कम रखी गयी है. अगर वाक़ई में हमारा समाज उन्‍हें परिपक्‍व मानता है तो वह सम्‍मान और समानता में दिखनी चाहिए. यह उम्र के बराबरी से ज़्यादा नज़रिए का मसला है. नज़रिया नहीं बदलेगा तो उम्र बराबर होकर भी बराबरी स्‍त्री की ज़िंदगी की हक़ीक़त से कोसों दूर होगी. उम्‍मीद है, शादी की उम्र के बारे में फ़ैसला लेते वक़्त अदालत विधि आयोग की इस बात पर गौर करेगा. शादी की उम्र के मामले में लड़का-लड़की के बीच दोहरा मापदंड बराबरी के सभी उसूलों के ख़िलाफ़ है. चाहे यह उसूल संविधान के तहत तय किये गए हों या फिर अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर लागू संधि‍यों/ समझौतों के तहत माने गए हों. वैसे 18 साल की शादी जल्‍दी की शादी है. जल्‍दी मां बनने की मांग पैदा करती है. जल्‍दी मां बनने का मतलब, लड़की के लिए अचानक ढेरों ज़िम्‍मेदारियां. बेहतर है, इससे आगे की सोची जाए.
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इमा कैथल या मदर्स मार्केट, एशिया का या शायद पूरी दुनिया का ऐसा सबसे बड़ा बाज़ार है जिसे सिर्फ़ महिलाएं चलाती हैं.(बेन मकेशनी)

Date : 24-Aug-2019
म्यांमार सीमा से सिर्फ़ 65 किलोमीटर पहले उत्तर-पूर्व के एक दूर-दराज़ के कोने में अनूठा बाज़ार लगता है. इंफाल में इमा कैथल या मदर्स मार्केट को कम से कम 4,000 महिलाएं चलाती हैं. यह एशिया का या शायद पूरी दुनिया का ऐसा सबसे बड़ा बाज़ार है जिसे सिर्फ़ महिलाएं चलाती हैं. लेकिन इमा कैथल की सबसे अनोखी बात यह नहीं है. बाज़ार चलाने वाली महिलाओं (जिन्हें इमा कहा जाता है) के नेतृत्व में यह बाज़ार मणिपुरी महिलाओं की सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता का केंद्र है. ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए यहां के अतीत के बारे में थोड़ी जानकारी ज़रूरी ह यहां महिलाओं की चलती है लकदक हरी पहाड़ियों से घिरे मणिपुर में कभी कंगलीपक साम्राज्य फला-फूला था, जो 33 ईस्वी से लेकर 19वीं सदी तक रहा. अंग्रेज़ी शासन ने इसे रियासत में तब्दील कर दिया. मणिपुरी लोगों को बहुत कम उम्र से ही निडर योद्धाओं के रूप में प्रशिक्षित किया जाता था और उन्हें साम्राज्य की सीमा पर तैनात किया जाता था. ज़िंदगी के बाकी सभी काम महिलाओं के हिस्से में थे. यही मणिपुर के समतावादी समाज की नींव में है, जो आज भी मौजूद है. यहां सबका स्वागत है मेहमानों के लिए इमा कैथल का माहौल दोस्ताना है. अगर कोई यहां की इमाओं से निजी तौर पर मिलना चाहे तो उसका भी स्वागत होता है. एक महिला ने मेरा हाथ पकड़ लिया. उसने मेरी आंखों में झांककर देखा और स्थानीय मैतेई भाषा में प्यार से कुछ बोला, जिसका मतलब था, मैं बहुत खुश हूं कि तुम यहां आए हो. शुक्रिया, शुक्रिया. यहां आना एक सकारात्मक असर छोड़ता है, ख़ासकर इमाओं से मुलाक़ात और उनकी कहानियां सुनने के बाद, जिसके लिए वे हरदम तैयार रहती हैं. दोस्ताना माहौल इमाओं की ताक़त का अंदाज़ा उनके बैठने के तरीके और उनकी बॉडी लैंग्वेंज से ही लग जाता है. वे ऊंचे प्लेटफॉर्म पर पैर मोड़कर बैठती हैं और अपनी जांघों पर कोहनी टिकाकर आगे को झुकी रहती हैं. वे आने-जाने वालों से आंखें मिलाकर बातें करती हैं और मज़ाक करने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होती. यहां पुरुष कम ही दिखते हैं. यह बाज़ार तीन बड़ी दो-मंजिला इमारतों में लगता है, जिनकी छतें मणिपुरी शैली की हैं. यहां खाने-पीने की चीज़ों और कपड़े की दुकानें ज़्यादा है. बाज़ार में हलचल कम हो तो यहां की इमाएं लूडो खेलती हुई दिखती हैं, जो उनका पसंदीदा टाइमपास खेल है. प्रगतिशील बाज़ार हाथ से बुने स्कार्फ और सरोंग के ढेर के बीच बैठी थाबातोंबी चंथम 16वीं सदी में इस बाज़ार की शुरुआत को याद करती हैं. मणिपुर में मुद्रा के चलन से पहले इस बाज़ार में वस्तु विनिमय होता था. चावल की बोरियों के बदले मछली, बर्तन और शादी के कपड़े ख़रीदे जाते थे. 2003 में राज्य सरकार ने इमा कैथल की जगह एक आधुनिक शॉपिंग सेंटर बनाने की घोषणा की थी. नई सदी में इस बाज़ार के लिए वह पहला मौका था जब यहां विरोध का झंडा बुलंद हुआ. इमाओं ने रात भर धरना दिया, जिसके बाद सरकार को अपनी योजना रद्द करनी पड़ी. बाज़ार के ठीक बाहर इमा कैथल की तीन इमारतों के ठीक बाहर सैकड़ों दूसरी महिलाएं बैठती हैं. वे फल, सब्जियां, जड़ी-बूटियां और सुखाई हुई मछलियां बेचती हैं, जो मणिपुरी खान-पान का अहम हिस्सा हैं. मिर्च और सब्जियों को मसलकर तीखी चटनी इरोंबा बनाई जाती है. मछलियों के साथ उसकी गंध आसपास की गलियों तक फैली रहती है. बाज़ार के बाहर बैठी इन महिलाओं के पास इमा कैथल में दुकान लगाने का लाइसेंस नहीं होता, इसलिए उनको चौकन्ना रहना पड़ता है. चैंथम कहती हैं, पुलिसवाले उनको गिरफ़्तार नहीं करते या जुर्माना नहीं लगाते, बल्कि वे उनके सामान को बिखेर देते हैं. मैंने नालियों में कुछ ताजे दिखने वाले सेब देखे थे. हो सकता है कि वे ऐसे ही किसी झगड़े के सबूत हों. सम्मान का प्रदर्शन चैंथम मुझे बाज़ार की 4,000 महिलाओं के मुख्य संगठन ख्वैरम्बंद नूरी कैथल को चलाने वाली इमाओं से मिलाने को तैयार हो जाती हैं. वह ख़ुद भी इस संगठन की कार्यकारी सदस्य हैं. एक बिल्डिंग की ऊपरी मंज़िल पर उनका दफ़्तर है. दरवाज़े के बाहर एक आदमी झपकी ले रहा है. मंगोनगांबी तोंगब्रम नाम की एक इमा उसे जगने और जगह खाली करने का आदेश देती हैं. वह झटके से उठ खड़ा होता है और सिर झुकाकर माफ़ी मांगता है. यह सम्मानित व्यक्ति के प्रति सम्मान दिखाना है. सशक्त आवाज़ 60 साल की शांति क्षेत्रीमयम ख्वैरम्बंद नूरी कैथल की अध्यक्ष हैं. वह 4 बच्चों की मां हैं. वह कहती हैं, मुझे लोकतांत्रिक तरीके से 4,000 महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया था. क्यों? मेरी सशक्त आवाज़ के कारण. जब क्षेत्रीमयम बोलती हैं तो सभी इमाएं उनको सुनती हैं. वह साफ़ कर देती हैं कि इमाएं बाज़ार में और पूरे मणिपुर में कोई अंतर नहीं करतीं. जो चीज़ राज्य के लिए अहम है, वे उसके लिए भी संघर्ष करती हैं. जब उनसे इमाओं के सबसे प्रमुख आंदोलन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने एक कहानी सुनाई. 1958 में उत्तर-पूर्व के अलगाववादी और बाग़ी शक्तियों को काबू में रखने के लिए भारत सरकार ने सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) क़ानून यानी अफ़्सपा बनाया था. इससे यहां के अर्धसैनिक संगठन असम राइफ़ल्स को विशेष अधिकार मिल गए. उसने अफ़्सपा क़ानून को गोली मार देने का लाइसेंस समझ लिया. उस पर इन अधिकारों के दुरुपयोग के कई आरोप लगे. 2004 तक असम राइफ़ल्स की 17वीं बटालियन इंफाल के कंगला क़िले में रहती थी. यह कंगलीपक साम्राज्य के समय का महल है जो इमा कैथल से कुछ सौ मीटर दूर स्थित है. उन दिनों आम लोग उधर नहीं जा सकते थे. विरोध का फ़ैसला 2004 में एक युवा मणिपुरी महिला को उसके घर से अगवा किया गया और कंगला क़िले ले जाया गया. उस पर एक बाग़ी के साथ रिश्ते रखने (या ख़ुद बाग़ी होने) के आरोप थे. उसके साथ गैंगरेप किया गया, गुप्तांगों में क़रीब से गोली मारी गई और फिर शरीर को गोलियों से छलनी कर दिया गया. जब उसकी हत्या की ख़बर फैली तो कुछ इमाओं ने इस अमानवीय क्रूरता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का फ़ैसला किया. फिर वह प्रदर्शन हुआ जो पूरे भारत में कुख्यात हो गया. इमा कैथल की 12 महिलाओं ने पूरी तरह नग्न होकर कंगला क़िले तक मार्च किया. उन्होंने अपने हाथों में एक बैनर पकड़ा हुआ था, जिस पर लिखा था- भारतीय सेना हमारा बलात्कार करती है. प्रतीकात्मक जीत यह नग्न प्रदर्शन बेकार नहीं गया. चार महीने बाद 17वीं असम राइफ़ल्स ने कंगला क़िला खाली कर दिया. हालांकि वे मणिपुर के दूसरे हिस्सों में अब भी हैं, लेकिन इमाओं ने उनको मणिपुर की राजधानी के केंद्र से बाहर कर दिया. यह एक प्रतीकात्मक जीत थी. क्षेत्रीमयम कहती हैं, इस बाज़ार की इमाओं के पास एकता की ताक़त है. जब हम 4,000 महिलाएं इकट्ठा हो जाती हैं तो हम सुरक्षित हो जाते हैं और हमारी सम्मिलित आवाज़ में शक्ति आ जाती है. एक विक्रेता की कहानी रानी थिंगुजम (56 साल) ख्वैरम्बंद नूरी कैथल संगठन की सचिव हैं. वह मछली की दुकान लगाती हैं. वह 30 साल की उम्र से ही यहां काम कर रही हैं. उसके कुछ दिन पहले उन्होंने अपने पति को आख़िरी बार देखा था. वह कहती हैं, मेरे छोटे बेटे के जन्म के 6 दिन बाद शाम को मेरे पति एक जवान महिला के साथ घर आए. उन्होंने बताया कि उन्होंने दूसरी शादी कर ली है. वह मुझसे, बच्चों से और परिवार के दूसरे लोगों से उसका परिचय कराने लगे. उस शाम और पूरी रत घर में झगड़ा होता रहा. फिर उसके पति उस दूसरी महिला के साथ घर से निकल गए. थिंगुजम 40 दिनों तक अपने बच्चों के साथ ससुराल में रहीं, लेकिन उनके पति नहीं लौटे. दूसरा जीवन उन दिनों मुझे बार-बार ख़ुद को मारने का ख़याल आता था. मैं चाहती थी कि ज़हर पीकर सो जाऊं और फिर कभी न उठूं. थिंगुजम ने अपने पिता से बात की और वह उनको और बच्चों को अपने घर ले गए. कुछ ही दिनों बाद उनको इमा कैथल में दुकान लगाने का लाइसेंस मिल गया और वह परिवार की मदद करने लगीं. थिंगुजम ने ख़ुद को बाज़ार के प्रति समर्पित कर दिया. वह न सिर्फ़ सचिव के पद तक पहुंचीं, बल्कि एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता भी बन गईं. जनवरी 2019 में थिंगुजम और दो अन्य महिलाएं विमान से दिल्ली पहुंचीं. एक सरकारी बिल के ख़िलाफ़ इमा कैथल में प्रदर्शन हुआ था, जिसमें इमाओं ने ख़ुद को 5 दिनों के लिए अंदर बंद कर लिया था. हालात तब बिगड़ गए थे, जब पुलिस ने उनको निकालने के लिए आंसू गैस का प्रयोग किया, जिसमें 8 महिलाएं घायल हो गईं. थिंगुजम ने इस लड़ाई को भारतीय संसद तक पहुंचाया. सरकार नागरिकता संशोधन विधेयक लेकर आई थी, जिसका मक़सद पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के हिंदू, ईसाई और बौद्ध अल्पसंख्यकों को यहां आने और भारतीय नागरिकता हासिल करने में उनकी मदद करना था. मणिपुर और असम के प्रदर्शनकारियों को डर था कि इस क़ानून से उनके राज्यों में बाहरी लोगों की बाढ़ आ जाएगी. थिंगुजन कहती हैं, हमने मोदी का पुतला जलाया. उनको लगता है कि नई दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार मणिपुर के लोगों की अनदेखी करती है. वह दूर बैठकर फ़ैसले लेती है जो राज्य के हित में नहीं होते. उनका कहना है कि मणिपुर भले ही 2,400 किलोमीटर दूर हो लेकिन आप हमें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. सभी महिलाओं की लड़ाई इमा कैथेल की ज़्यादातर महिलाएं मैतेई जातीय समूह की हैं, जो मणिपुर के मूल निवासी हैं. मैतेई संस्कृति इंफाल और आसपास की घाटियों की प्रमुख संस्कृति है. नागरिकता संशोधन विधेयक से सबसे ज़्यादा मैतेई लोग ही प्रभावित होंगे, क्योंकि वे घाटियों में रहते हैं. पहाड़ियों पर रहने वाली जनजातियों को बाहरी लोगों का उतना सामना नहीं करना पड़ेगा. लेकिन यहां की महिलाएं सिर्फ मैतेई समूह को प्रभावित करने वाले मुद्दों के लिए नहीं लड़तीं. वे समूचे भारत की महिलाओं के लिए लड़ती हैं, भारत की महिला संतरियां कंगला क़िले में युवा महिलाएं हंसती हैं और तस्वीरें खिंचवाने के लिए पोज़ देती हैं. करीने से तैयार लॉन में वे एक-दूसरे का हाथ थामकर मुस्कुराती हैं. 2004 से पहले ऐसा सोचना भी नामुमकिन था. इसका श्रेय निश्चित रूप से इमा कैथल की महिलाओं को जाता है. क्षेत्रीमयम कहती हैं, हम राज्य के लिए लड़ाई जारी रखेंगे. यहां की इमाएं हमेशा मणिपुर की रक्षक होंगी- न सिर्फ मैतेई के लिए, बल्कि उन सबके लिए जो यहां रहते हैं.
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ईद का चाँद तुम ने देख लिया चाँद की ईद हो गई होगी

Date : 24-Aug-2019
डेविड एवरी अमरीका के सिएटल शहर के एक मनोचिकित्सक हैं. एक दिन उनके पास एक शख़्स आया. जिसकी बीमारी बड़ी अजीब थी. वो एक इंजीनियर था, जिससे डेविड एवरी 2005 में भी मिले थे. वो अजीबो-ग़रीब ख़यालात का शिकार था. कभी उसे ख़ुदकुशी का ख़याल आता, तो कभी चांद पर जाने का. उस इंजीनियर की नींद भी उलट-पुलट थी. कभी उसे रात-रात भर नींद नहीं आती थी. और कभी वो दिन के बारह घंटे सोता रहता था. चूंकि वो व्यक्ति इंजीनियर भी था, तो वो अपनी ज़िंदगी की इस उठा-पटक का बराबर हिसाब भी रखता था. जब डेविड एवरी ने उस रिकॉर्ड को गौर से देखा तो पता चला कि उस इंजीनियर की नींद और मूड पर समंदर में होने वाली उठा-पटक से सीधा ताल्लुक़ था. वो ज्वार भाटा से प्रभावित हो रहा था. जब ज्वार आता था, तो उसे रात को नींद नहीं आती थी. पहले तो डेविड एवरी ने उस शख़्स की बातों को ख़ारिज किया. और उसके रिकॉर्ड को सहेज कर रख दिया. इंसान की ज़िंदगी पर चांद का असर 12 साल बाद मशहूर मनोचिकित्सक थॉमस वेहर ने ऐसे ही 17 मरीज़ों के बारे में एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया. इन लोगों को ऐसी बीमारी थी, जिसकी वजह से वो नियमित अंतराल पर कभी डिप्रेशन तो कभी अतिरेक के शिकार हो जाते थे. उनके सामान्य रहने और डिप्रेशन के शिकार होने के चक्र का सीधा ताल्लुक़ चांद के बढ़ने-घटने से पाया गया था. प्राचीन काल से ही इंसान चांद से काफ़ी प्रभावित रहा था. ऐसे में कुछ इंसानों का बर्ताव अगर इससे प्रभावित हो रहा था, तो ये मनोवैज्ञानिकों के लिए बहुत चौंकाने वाली बात नहीं थी. अंग्रेज़ी शब्द लुनैसी (Lunacy) का मतलब पागलपन होता है. ये लैटिन भाषा के शब्द लुनैटकस (lunaitcus) से निकला है, जिसका मतलब है जिस पर चांद का दौरा पड़ता हो. चांद की वजह से... यूनानी दार्शनिक अरस्तू और रोमन प्रकृतिवादी प्लिनी द एल्डर का भी यक़ीन था कि पागलपन और मिर्गी के दौरे चांद की वजह से पड़ते हैं. ये भी माना जाता था कि गर्भवती महिलाओं को अक्सर पूर्णमासी को बच्चे पैदा होते थे. हालांकि, इस बारे में कोई वैज्ञानिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं. इस बात पर भी रिसर्च नहीं की गई है कि मनोरोग के शिकार मरीज़ों में पागलपन का दौरान पूर्णमासी को ज़्यादा पड़ता है. हालांकि एक रिसर्च के मुताबिक़ घरों से बाहर होने वाले अपराधों की तादाद पूर्णमासी को बढ़ जाती है. इस बात पर काफ़ी रिसर्च की गई है कि नींद पर चांद के घटने-बढ़ने का असर होता है. पूर्णमासी के आस-पास लोगों को सोने में ज़्यादा वक़्त लगता है और वो सोते भी कम ही हैं. अमावस की रात हालांकि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के व्लादिस्लाव व्याज़ोवस्की जैसे नींद के विशेषज्ञ इन आंकड़ों को पुख़्ता नहीं मानते. उनका मानना है कि इसके लिए लंबी रिसर्च की ज़रूरत होती है. अमरीकी मनोचिकित्सक विलियम वेहर ने इसी बारे में रिसर्च की थी. और उन्होंने मरीज़ों के बर्ताव पर लंबे समय तक निगाह रखी, तो पाया कि उनके बर्ताव में ऊंच-नीच का ताल्लुक़ चांद के घटने-बढ़ने से है. चांद का धरती पर कई तरह से असर होता है. सबसे बड़ा असर तो हम चांदनी के तौर पर देखते हैं. अमावस्या की रात सबसे अंधेरी होती है, जबकि पूर्णमासी को चटख चांदनी होती है. इसके अलावा समुद्र में ज्वार-भाटा भी चंद्रमा के घटने-बढ़ने के अनुसार आते हैं. पूर्णमासी को ज्वार आते हैं, जबकि अमावस्या को भाटा. वेहर ने भी पाया कि उनके मरीज़ों में चंद्रमा का आकार बढ़ने के साथ ही दौरे पड़ने की तादाद बढ़ जाती है. चिड़चिड़े मिज़ाज के लोग मज़े की बात ये है कि इन मरीज़ों के बर्ताव भी 206 दिनों बाद बदल जाते हैं. क्योंकि हर 206 दिन बाद सुपरमून होता है. स्विटज़रलैंड की बेसेल यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग की विशेषज्ञ एन विर्ज़-जस्टिस को इन आंकड़ों पर यक़ीन भी था. मगर वो इसके पीछे की वजह को समझने में नाकाम रही थीं. एन विर्ज़-जस्टिस मानती हैं कि चटख चांदनी रात में लोगों को ठीक से नींद नहीं आती और वो चिड़चिड़े मिज़ाज के हो जाते हैं. हमारे शरीर की जैविक घड़ी पर चंद्रमा के उतार-चढ़ाव का गहरा असर होता है और उसका 24 घंटे का चक्र प्रभावित होता है. नींद कम आने की वजह से कई लोग डिप्रेशन के भी शिकार हो सकते हैं. हालांकि वेहर मानते हैं कि आज के दौर में इतनी कृत्रिम रौशनी मौजूद होती है कि चांदनी का बहुत असर होना स्वाभाविक बात नहीं है. धरती का चुंबकीय क्षेत्र ऐसे में शायद चांद का गुरुत्वाकर्षण लोगों के बर्ताव पर ज़्यादा असर डालता है. ऐसा माना जाता है कि चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का असर धरती के चुंबकीय क्षेत्रों पर पड़ता है और कुछ लोग इनके प्रति ज़्यादा ही संवेदनशील होते हैं. उनका बर्ताव भी चंद्रमा से प्रभावित हो जाता है. लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के रॉबर्ट विक्स कहते हैं कि समुद्र के पानी में नमक होता है. इस वजह से विद्युतीय तरंगें उनसे प्रवाहित होती हैं. इनका ताल्लुक़ धरती के चुंबकीय क्षेत्र से होता है. कुछ रिसर्च ने सूर्य के चाल चक्र का असर दिल के दौरे, मिर्गी के दौरे, डर और ख़ुदकुशी से पाया है. क्योंकि इनसे विद्युतीय तरंगे पैदा होती हैं. कई बार तो इनसे पावर ग्रिड तक फेल हो जाती हैं. यही वजह है कि कुछ जानकार ये मानते हैं कि इनका हमारे दिल और दिमाग़ पर असर होता है. क्रिप्टोक्रोम का अहम रोल हालांकि अभी इस बारे में सीमित रिसर्च ही हुई है. कुछ कीड़ों, परिंदों और मछलियों मे तो चुंबकीय संवेदना होती है. लेकिन, इंसानों में ये गुण नहीं होता. लेकिन, इस साल हुए एक रिसर्च के मुताबिक़, इंसानों पर चुंबकीय क्षेत्रों का असर होता है. हालांकि इसकी हमारे जीवन में कितनी अहमियत है, इस बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं है. लेकिन, ये तय है कि चुंबकीय तरंगों से हमारे दिमाग़ की गतिविधियां प्रभावित होती हैं. वेहर को भी इस चुंबकीय क्षेत्र के ख़याल से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. एक मक्खी के अंदर एक प्रोटीन होता है जिसका नाम होता है क्रिप्टोक्रोम. ये एक चुंबकीय सेंसर का काम करता है. हमारे शरीर की जो जैविक घड़ी होती है, उसमे क्रिप्टोक्रोम का अहम रोल होता है. चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण हर कोशिका में मौजूद ये जैविक घड़ी, दिमाग़ की मास्टर क्लॉक से संचालित होती है. जब ये क्रिप्टोक्रोम प्रोटीन फ्लैविन नाम के तत्व से मिलता है, तो इससे हमारे शरीर की जैविक घड़ी को ये संदेश जाता है कि अभी दिन है. जब कुछ मक्खियों पर चुंबकीय किरणें डाली गईं, तो उनकी जैविक घड़ी की चाल बदल गई. इससे उनकी नींद भी उलट-पुलट हो गई. अब अगर इंसानों के साथ ऐसा होता है, तो वेहर और एवरी को अपने मरीज़ों के बर्ताव की तह तक पहुंचने में क़ामयाबी मिल गई है. लेकिन, इंसानों में क्रिप्टोक्रोम, मक्खियों से अलग व्यवहार करता है. ऐसे में अब ये तर्क दिया जा सकता है कि वेहर और एवरी के मरीज़ों पर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का असर होता है. जिससे उनका मूड प्रभावित होता है. अराबडॉप्सिस थैलियाना नाम के एक पौधे पर हुई रिसर्च में पाया गया है कि उसकी जड़ों का विकास चंद्रमा के धरती का चक्कर लगाने के हिसाब से चलता है. क्योंकि वो पानी में विकसित होता है और पानी की धार पर चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का असर होता देखा गया है. अब अगर पौधों की कोशिकाओं पर चंद्रमा के चक्र का असर होता है, तो इंसानों की कोशिकाओं पर भी इसका प्रभाव होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. वेहर मानते हैं कि चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उनके मरीज़ों के दिमाग़ पर असर डालती है. इस बारे में कोई दो राय नहीं. हालांकि वो चाहते हैं कि इस बारे में और रिसर्च की जाए
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